(अग्रज एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं। आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ “तन्मय साहित्य ” में प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना “अखबार में…….। )
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ संजय दृष्टि ☆ धनतेरस☆
इस बार भी धनतेरस पर चाँदी का सिक्का खरीदने से अधिक का बजट नहीं बचा था उसके पास। ट्रैफिक के चलते सिटी बस ने उसके घर से बाजार की 20 मिनट की दूरी 45 मिनट में पूरी की। बाजार में भीड़ ऐसी कि पैर रखने को जगह नहीं। भारतीय समाज की विशेषता यही है कि पैर रखने की जगह न बची होने पर भी हरेक को पैर टिकाना मयस्सर हो ही जाता है।
भीड़ की रेलमपेल ऐसी कि दुकान, सड़क और फुटपाथ में कोई अंतर नहीं बचा था। चौपहिया, दुपहिया, दोपाये, चौपाये सभी भीड़ का हिस्सा। साधक, अध्यात्म में वर्णित आरंभ और अंत का प्रत्यक्ष सम्मिलन यहाँ देख सकते थे।
….उसके विचार और व्यवहार का सम्मिलन कब होगा? हर वर्ष सोचता कुछ और…और खरीदता वही चाँदी का सिक्का। कब बदलेगा समय? विचारों में मग्न चला जा रहा था कि सामने फुटपाथ की रेलिंग को सटकर बैठी भिखारिन और उसके दो बच्चों की कातर आँखों ने रोक लिया। …खाना खिलाय दो बाबूजी। बच्चन भूखे हैं।..गौर से देखा तो उसका पति भी पास ही हाथ से खींचे जानेवाली एक पटरे को साथ लिए पड़ा था। पैर नहीं थे उसके। माज़रा समझ में आ गया। भिखारिन अपने आदमी को पटरे पर बैठाकर उसे खींचते हुए दर-दर रोटी जुटाती होगी। आज भीड़ में फँसी पड़ी है। अपना चलना ही मुश्किल है तो पटरे के लिए कहाँ जगह बनेगी?
…खाना खिलाय दो बाबूजी। बच्चन भूखे हैं।…स्वर की कातरता बढ़ गई थी।..पर उसके पास तो केवल सिक्का खरीदने भर का पैसा है। धनतेरस जैसा त्योहार सूना थोड़े ही छोड़ा जा सकता है।…वह चल पड़ा। दो-चार कदम ही उठा पाया क्योंकि भिखारिन की दुर्दशा, बच्चों की टकटकी लगी उम्मीद और स्वर में समाई याचना ने उसके पैरों में लोहे की मोटी सांकल बाँध दी थी। आदमी दुनिया से लोहा ले लेता है पर खुदका प्रतिरोध नहीं कर पाता।
पास के होटल से उसने चार लोगों के लिए भोजन पैक कराया और ले जाकर पैकेट भिखारिन के आगे धर दिया।
अब जेब खाली था। चाँदी का सिक्का लिए बिना घर लौटा। अगली सुबह पत्नी ने बताया कि बीती रात सपने में उसे चाँदी की लक्ष्मी जी दिखीं।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(श्री अरुण कुमार डनायक जी महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक जी वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचाने के लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है। आज से हम एक नई संस्मरणात्मक आलेख श्रृंखला आरम्भ कर रहे हैं। इस श्रृंखला में श्री अरुण कुमार डनायक जी ने अपनी सामाजिक सेवा यात्रा को संस्मरणात्मक आलेख के रूप में लिपिबद्ध किया है। हम आपके इस संस्मरणात्मक आलेख श्रृंखला को अपने पाठकों से साझा करने हेतु श्री डनायक जी के ह्रदय से आभारी हैं। इस कड़ी में प्रस्तुत है प्रथम भाग – “अमरकंटक का भिक्षुक”। )
☆ संस्मरण ☆ अमरकंटक का भिक्षुक -1 ☆ श्री अरुण कुमार डनायक ☆
साँवला रंग, पांच फीट के लगभग ऊंचाई, दुबली पतली काया, आखों में बहुत थोड़ी रोशनी और उमर इकहत्तर वर्ष, ऐसे एक जूनूनी व्यक्ति से मेरा परिचय हुआ मार्च 2020 के प्रथम सप्ताह में I वे भोपाल एक कार्य से आए थे और हमें फोन कर बोले कि डाक्टर एच एम शारदा ने आपसे मिलने को बोला था, कब और कहाँ मुलाक़ात हो सकती है I मैं तब शासकीय मिडिल स्कूल खाईखेडा में स्मार्ट क्लास को बच्चों को समर्पित करने में व्यस्त था सो शाम को पांच बजे का समय मुलाक़ात हेतु नियत हुआ I वे समय से पहले ही आगए और प्रतीक्षारत बाहर खड़े थे। प्रेम से मिले और अपने भोपाल आने की व्यथा-कहानी सुनाते रहे। बीच-बीच में बैगा आदिवासियों की भी चर्चा करते, अपने अमरकंटक में आ बसने की कहानी सुनाते, गरीबों के बारे में अपनी प्रेम और करुणा व्यक्त करते रहे। मैं तो दिन भर का थका हारा था सो चुपचाप सुनता रहा। जब जाने लगे तो मुझे आमंत्रित किया कि पोंडकी आश्रम जरूर आएँ ऐसी ‘दादा’ शारदा की भी इच्छा है। उनकी सरलता, विनम्रता और महानता का एहसास तब हुआ, जब जाते जाते उन्होंने हाथ जोड़े और अचानक मेरे चरणों की ओर झुक गए। मैं अचकचा गया, और गले लगाकर कहा कि ‘दादा आप उम्र में बड़े हैं ऐसा क्यों कर रहे हैं ?’ उन्होंने उतनी ही विनम्रता से उत्तर दिया ‘ आप बच्चों के लिए काम करते हैं, ‘दादा’ शारदा ने आपकी बहुत तारीफ़ की थी, मेरी बैगा बच्चियों के लिए भी आप अमरकंटक आइये।’
उनके आमंत्रण को अस्वीकार करना मुश्किल था, पर कोरोना संक्रमण ने बाधित कर दिया और फिर मुहूर्त आया जब डाक्टर एच एम शारदा जी ने बताया कि ‘पोंडकी आश्रम’ में एक हाल के निर्माण हेतु भूमि पूजन समारोह 31 अक्टूबर को होना है, शामिल होने जा सकते हैं क्या ?’ मैं तो अवसर की तलाश में ही था, फ़ौरन हाँ कर दी और 29 अक्टूबर को अमरकंटक एक्सप्रेस में बैठकर 30 अक्टूबर के सुबह सबेरे पेंड्रा रोड स्टेशन उतर गया। आश्रम से जीप आई थी लेने और मैं जब पांच बजे सुबह पहुंचा तो वे कृशकाय बुजुर्ग बाट जोहते बैठे थे, प्रेम से मिले और दिन भर के प्रोग्राम के बारे में बताया, दस बजे नाश्ता करने के बाद फर्रीसेमर गाँव चलेंगे, तब तक आप आराम कीजिए, कहकर चले गए।
नींद तो आखों से गायब थी और जैसे ही सूर्योदय हुआ, मैं अतिथि गृह से बाहर निकल कर आश्रम में चहल कदमी करने लगा। दूर एक निर्माणाधीन बरामदे में वे दिख गए, मिस्त्रियों द्वारा किये गए काम का मुआयना कर रहे थे। मैं उनके पास पहुँच गया, फिर क्या था, उन्होंने पूरा आश्रम घुमाया। स्कूल के पांच कमरे और एक प्राचार्य कक्ष उन्होंने, भारत सरकार के आदिवासी कल्याण मंत्रालय, दक्षिण पूर्व कोयला परियोजना व जनसहयोग से, थोड़ी थोड़ी राशि एकत्रित कर बनवाये हैं। दक्षिण पूर्व कोयला परियोजना के एक महाप्रबंधक ने आर्थिक सहयोग का आश्वासन दिया था, लेकिन अचानक उनका स्थानान्तरण हो गया तो नीचे फर्श का काम अटक गया। इसी काम को ठेकेदार ने पूरा करने का आश्वासन इस शर्त के साथ दे दिया कि ‘जब रुपया आ जाये तो दे देना’ और उन्होंने ने भी ईश्वर के भरोसे हाँ कह दी। आश्रम में भारतीय जीवन बीमा निगम और दक्षिण पूर्व कोयला परियोजना के सहयोग से दो भवन बनाए गए हैं जिनमे एक सौ छात्राएं निवास करती हैं। मदनलाल शारदा फैमली फ़ाउंडेशन ने, छात्रावास की निवासिनी छात्राओं के लिए दस पलंग व दो अति आधुनिक शौचालय बनवाकर आश्रम को दिए हैं।
आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि फ़ाउंडेशन के कर्ता-धर्ता डाक्टर शारदा उनसे आजतक प्रत्यक्ष नहीं मिले हैं, केवल फोन पर चर्चा हुई है, और सहयोग कर रहे हैं। जयपुर के एक जैन परिवार ने अपनी माता स्वर्णा देवी की स्मृति में चिकित्सालय हेतु भवन बनवाकर दिया है और होम्योपैथिक व एलोपैथिक दवाइयों के मासिक खर्च की प्रतिपूर्ति किशनगढ़, राजस्थान के श्री डी कुमार द्वारा की जाती हैं। भारतीय स्टेट बैंक, अमरकंटक व पूर्व सांसद मेघराज जैन जी ने एक-एक एम्बुलेंस दान दी है, जिसका प्रयोग पैसठ ग्रामों में निवासरत विलुप्तप्राय बैगा जनजाति के आदिवासियों को चिकित्सा सुविधा प्रदान करने में होता है। स्कूल के सामने स्वामी विवेकानंद की प्रतिमा एक मंदिर में स्थापित है और समीप ही छात्राओं के भोजन हेतु हाल व रसोईघर है। कुछ निर्माण कार्य चल रहे हैं, श्री फुन्देलाल सिंह जी द्वारा प्रदत्त विधायक निधि (75%) व जनसहयोग (25%) से एक हाल निर्माणाधीन है, जिसका उपयोग व्यवसायिक गतिविधियों के प्रशिक्षण हेतु होगा और यहाँ हथकरघा, सिलाई-कढाई आदि की मशीने स्थापित की जाएँगी ताकि आदिवासियों को स्वरोजगार उपलब्ध हो सके। पांच गायों की गौशाला है, फलोद्यान है, साग-सब्जी का बगीचा है, जिसके उत्पाद छात्राओं के हेतु हैं। यह सब कुछ जनसहयोग से हुआ है। और इसको मूर्तरूप दिया है पांच फूट के दुबले-पतले डाक्टर प्रबीर सरकारजी ने जो 1995 में जेब में 1040/- रुपया लेकर यहाँ आये थे और ‘माई की बगिया’ में एक झोपडी में रहकर आदिवासियों की सेवा करने लगे। इसीलिये स्वामी विवेकानंद के इस भक्त को मैंने ‘अमरकंटक का भिक्षुक’ कहा है। वे जब चर्चा करते हैं तो स्वामीजी के अमृत वचन भी सुनाते रहते हैं, आप भी आत्मविभोर होकर पढ़िए :
“नाम, जश, ख्याति, प्रतिपत्ति, पद, धन, सम्पत्ति, सबकुछ केवल कुछ दिन के लिए है। वह व्यक्ति सच्चा जीवन बिताता है जो दूसरे के लिए अपना जीवन समर्पण करता है।’
पुनश्च :- मैं तीन दिन पौंडकी में रुका, तीन गाँव और उनके तीन मोहल्ले देखे, सेवा कार्य किया, आश्रम के आयोजनों में भाग लिया, डाक्टर साहब, उनके वालिटियर्स व ग्रामीणों से चर्चा की इस अनुभव को मैं धीरे धीरे दो तीन किस्तों में सुनाऊंगा।
(श्री जयेश कुमार वर्मा जी का हार्दिक स्वागत है। आप बैंक ऑफ़ बरोडा (देना बैंक) से वरिष्ठ प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। हम अपने पाठकों से आपकी सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ समय समय पर साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण कविता धुँए का दर्द…।)
( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें सफर रिश्तों का तथा मृग तृष्णा काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता रिश्तों में जमी बर्फ। )
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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 21 ☆ रिश्तों में जमी बर्फ☆
सांगू लागला, “या लोकांनीच सदा भैयाच्या मोबाईल वरनंआम्हा खूप जणांना फोन केले. मी पलीकडच्याच गल्लीत होतो… ताबडतोब पोहोचलो…. आम्ही सर्वांनी… तिथे दोन चार लोक होते त्यांनी मिळून सदाभैयाला सरकारी हॉस्पिटलमध्ये ऍडमिट केलं. पण… पण तो…!”
इब्राहिमला पुढं बोलवेना.. थोडे हुंदके आवरुन तो पुढं म्हणाला, “पण हॉस्पिटलच्या डॉक्टरांनी त्याचं स्टेटमेंट घेतलं आणि पाच मिनिटांनी होत्याचं नव्हतं झालं.
विजयला घडलेल्या प्रकाराचा थोडा थोडा उलगडा झाला. बायकांचा गलका ऐकून त्यानं इकडं तिकडं पाहिलं… आई चक्कर येऊन पडली होती… त्याला एकदम जबाबदारीची जाणीव झाली. आता आपणच पुढे होऊन सगळं करायला पाहिजे या विचाराने डोळे पुसून, सुन्न मन आणि बधीर, जड झालेलं डोकं या सगळ्यांकडे दुर्लक्ष करून तो उठला. त्याला सुचत गेलं. आईला सावरायला हवं… काका, मामा, आत्या कोणा कोणाला फोन पोहोचलेत, सगळी विचारपूस करायला हवी. ‘त्यानं पाहिलं…..
जशी आई सावध झाली तसे कॅमेरे आणि स्पीकर तिच्याकडे वळलेत बाबांचा देह, भावंडांचं रडणं, आईचं आक्रंदन सगळं टिपलं जाऊ लागलंय… त्यांच्या आयुष्यातली ही सर्वात दुःखद घटना त्यांचं घर सोडून इतरत्र सर्व टीव्ही चॅनेल वर आवेशा-आवेशात इतर बातम्या थांबून ब्रेकिंग न्यूजच्या रूपानं खणखणू लागली. मधूनच जे मीडिया कर्मी पोलीस चौकीत जाऊन पोहोचले होते ते तिथला वृत्तांत कव्हर करत होते. पोलिसांची हैवानियत, अत्याचार, गरिबांची पिळवणूक यावर भाष्य करता करता पोलीस इन्स्पेक्टर ला प्रश्न विचारून हैराण करत होते.
“त्या पोलिसाला अटक केलीये अन सस्पेंड केलंय. खात्यामार्फत चौकशीचे आदेश मिळालेत. अपराध्याला वाचवलं जाणार नाही. त्याला योग्य ती शिक्षा मिळेल.”ऑफिसर पाठ केल्यासारखी उत्तरं देत होते.
“सर, त्यांच्या गल्लीतल्या तरुणांना अटक केलीय?”
“हातात रॉकेल, डिझेलचे कॅन घेऊन पोलीस चौकी पेटवायला निघाले होते ते… पत्थरबाजी करून खिडक्यांच्या काचा फोडल्यात. दाखवा ते टीव्हीवर.”इन्स्पेक्टर आपली बाजू मांडत होता.
“ताबडतोब त्यांना ताब्यात घेऊन स्थिती नियंत्रणात आणलीय आम्ही…. आणि छोट्या चिल्यापिल्यांना वॅनमधून पुन्हा गल्लीत सोडलंय.”मोठ्या फुशारकीनं ऑफिसर सांगत होता. “कायदा-सुव्यवस्थेचा प्रश्न आम्ही खूप चांगल्या तऱ्हेने हाताळलाय.”
“पण सर, त्याची विधवा पत्नी, छोटी छोटी मुलं… त्यांचं काय पुढं?… त्यांचा काय अपराध?…. त्यांनी आता कसं जगायचं?”
“चौकशी पूर्ण झाली की सरकार योग्य तो निर्णय घेईल. दोन लाख रुपये मृताच्या संबंधितास देण्यात येतील. एका मुलाला नोकरी देण्यात येईल… नो मोअर क्वेश्चन्स!” त्यांच्या बोलण्यात सहानुभूतीचा लवलेशही नव्हता.
जमलेल्या मित्रमंडळींनी जड अंत:करणानं उत्तर क्रियेची तयारी सुरू केली. नातेवाईक पण पहाटेपर्यंत येऊन पोहोचले. विजयनं यंत्रवत् सारा अंत्यविधी पार पडला. घरी पोहोचताहेत तो त्यांच्या परिवाराला भेटायला येणाऱ्या लोकांची रीघ लागली होती… तोच दोन-तीन मोठ्या मोठ्या कार गल्लीत येऊन पोहोचल्या’ मानवाधिकार आयोगाचे’ लोक घरात आले. पुन्हा कालचे तेच तेच प्रश्न आणि तीच उत्तरे… पोलीस व्यवस्थेवर ताशेरे उडवून झाले… शाब्दिक सहानुभूती देऊन झाली .”आमच्या मीटिंगमध्ये प्रस्ताव मांडतो. तुमच्या कुटुंबाला आम्ही वाऱ्यावर सोडणार नाही… सर्वतोपरी मदत करू… “आश्वासने देऊन धुरळा उडवत गाड्या निघून गेल्या. पाठोपाठच ‘महिला आयोग’ ‘विधवा पुनर्वसन मंडळ’ संस्थांच्या मोठमोठ्या कार्यकर्त्या महिला आल्या. “तुमच्या पाठीशी आम्ही खंबीरपणे उभ्या आहोत. त्या पोलिसाला शिक्षा दिल्याशिवाय आम्ही गप्प बसणार नाही. तुम्हाला आर्थिक मदत करू.”आश्वासनाचा पाऊस पडला अन् त्यांच्या गाड्याही दृष्टीआड झाल्या.
एका देखण्या आणि हुशार कुत्र्याने स्वतःच्या कर्तृत्वावर लखपती होऊन जागतिक कीर्ती मिळविलेली कुठे ऐकली आहे का ?..होय आहे!!!
एका वयस्कर जोडप्याने एक का़ँली़ जातीचा कुत्रा पाळला होता त्याचं नाव पाँल. अत्यंत हूड होता. तो कोणाच्याही अंगावर जायचा. मिळेल ते फाडायचा. गाड्यांच्या मागे धावायचा. वयस्क असल्याने मालकाला त्रास व्हायला लागला. अखेर त्यांनी त्याला ‘श्वान प्रशिक्षण’ केंद्रात दाखल केले. थोडा मोठा असल्याने नाखुषीतच त्यांनी त्याला ठेवून. घेतले पाँलचे तेथे शिक्षण सुरू झाले.एका महिन्यातच शिक्षक विदरवँ त्याच्यावरक्स त्याच्यावर बेहद्द खुश झाले .आता तो नविन मालकाचा, शिक्षकाचा लाडका झाला. त्याचा हूडपणा कमी झाला.पाच ते सहा महिन्यात अत्यंत अवघड कामे तो चपळाईने आणि डौलदार पणे करायला लागला. पाणीदार डोळे, सुळसुळणारे पिंगट केस, पन्नास पौंड वजन यामुळे तो देखणा आणि रुबाबदार दिसायला लागला.
सात आठ महिने गेले. एक दिवस पाँ आणि त्याचे शिक्षकल आणि त्याचे शिक्षक विदरवँक्स यांना सुवर्णसंधी आली. उज्ज्वल भविष्य दिसायला लागलं. चित्रपटासाठी ‘काँली जातीचा कुत्रा पाहिजे’ अशी जाहिरात आली. हॉलीवूडमध्ये निवड करण्यासाठी 300 कुत्रे आले होते. पाँलने स्टुडिओमध्ये उत्तम आणि अवघड कामे रुबाबात करून दाखवून वाहवा व टाळ्या मिळविल्या. अनेक चाचण्या झाल्या आणि त्यात पाँल हा चित्रपटासाठी निवडला गेला. चित्रपटाचे नाव “लँसी कम होम” या चित्रपटाचा नायक म्हणून पाँलचे काम सुरू झाले. एका चाचणीत नदीमध्ये होडीतून उडी मारून नदीच्या दुसऱ्या टोकाला पोचताच थकल्यासारखे रांगत जाऊन नंतर उभं रहायचं हे काम त्याने अतिशय उत्तमरीत्या वठविले. विदरवँक्सना धन्यता वाटली आणि आनंदाने डोळ्यात आनंदाश्रू तरळू लागले .चित्रपट अपेक्षेपेक्षा जास्त यशस्वी ठरला. तो काळ 1943. लँसीचे आणखी चित्रपट काढण्यासाठी अनेक देशातून पत्रे येऊ लागली. अनेक करारही झाले. आणखी चित्रपट यायला लागले .आता लँसीची स्वतःची कमाई किती झाली असेल ?? आश्चर्य वाटेल…!!!
वार्षिक 50000 डॉलर (1945-46)
दुसऱ्या महायुद्धाच्या लढाईत शत्रूचे संकट पुढे असताना सैनिकांना मार्गदर्शन करून त्यांचे प्राण वाचविण्याचे काम, बर्फाळ प्रदेशात सैनिकांबरोबर पँराशूट मधून उतरून शत्रूला जेरीस आणण्याचे काम लँसी-पाँलने अतिशय उत्तमरितीने पार पाडून शाबासकी मिळवली. काहीवेळा प्रेक्षकात हास्याचे फवारे उडविले.तसेच डोळ्यात अश्रू उभे करण्याची खुबी आणि तंत्रही त्याला जमले होते. त्याच्या देखण्या रुपाची आणि कर्तबगारीची स्तुती करणारी हजारो पत्रे यायला लागली. त्याच्या पायाचा ठसा आणि फोटोसाठी मागण्या यायला लागल्या.त्याच्या रेखा चित्रांची मासिके निघाली. त्याच्या स्वामीनिष्ठेच्या गोष्टी शाळेतले शिक्षक विद्यार्थ्यांना सांगायला लागले. त्याच्या निष्ठेवर धर्म उपदेशक प्रवचन सांगायला लागले . लँसी-पाँल हॉलीवूडचा एक अमोल कुत्रा होता. केवळ श्वान प्रदर्शनात उपस्थित राहण्यासाठी त्याला दिवसाचे 1000 डॉलर्स मिळत होते. आता चित्रीकरणासाठी लांबचा प्रवास तो स्वतःच्या विमानातून, रेल्वेचा प्रवास वातानुकूलित खास डब्यातून आणि इतर प्रवास खास बांधणीच्या गाडीतून करत होता.
लँसीच्या मोठेपणाचे आणि समजूतदारपणा चे उदाहरण सांगता येईल. चित्रीकरणासाठी त्याचा कॅनडाला मुक्काम होता. त्यावेळी जखमी झालेल्या सैनिकांच्या हॉस्पिटल मध्ये जवानानीच पाँलला आमंत्रित केले .त्याचे चित्रपट पाहून सैनिकांना त्याला प्रत्यक्ष पहाण्याची उत्सुकता होती. हॉस्पिटल मध्ये पाँल-लँसी फिरू लागला. सैनिकांना खूप आनंद झाला. त्यांचे चेहरे खुलले. अनेक जण त्याला हात लावण्याची इच्छा व्यक्त करू लागले .निराश होऊन शय्येवर पडलेला सैनिक त्याला पहाताच उठून बसला. त्याने सैनिकाचा हात चाटून शेक हँड केले. सैनिकाला आनंद झाला .डॉक्टर आणि औषधाचे काम पाँल-लँसीने केले.
मूळ मालकाला नकोसा झालेला, शिक्षकांनीही थोड्या नापसंतीने ठेवून घेतलेला पाँल-लँसी लखपती झाला.
☆ मनमंजुषेतून ☆ माझी वाटचाल…. मी अजून लढते आहे –4 ☆ सुश्री शिल्पा मैंदर्गी ☆
(पूर्ण अंध असूनही अतिशय उत्साही. साहित्य लेखन तिच्या सांगण्यावरून लिखीत स्वरूपात सौ.अंजली गोखले यांनी ई-अभिव्यक्ती साठी सादर केले आहे.)
शाळेमध्ये असल्यापासून अनेक स्पर्धांमध्ये मला बक्षीसं मिळत होती. सुरूवातीला अर्थातच वक्तृत्व स्पर्धेमध्ये. शाळेतली एक आठवण अजूनही माझ्या लक्षात चांगली राहिले आहे. कर्मवीर भाऊराव पाटील यांच्यावर केले होते. माझा नंबर ही आला होता, कितवा ते आत्ता आठवत नाही. पण बक्षीस समारंभ सुरू झाल्यावर माझे नाव पुकारले गेले. मी खाली ग्राउंड वर बसले होते. मी उठून उभी राहिले आणि मैत्रिणी बरोबर स्टेज कडे जाणार तोच बक्षीस देणारे प्रमुख पाहुणे मला म्हणाले, थांब तू बोलू नको मीच खाली येतो. आणि आश्चर्य म्हणजे स्टेजवरून प्रमुख पाहुणे माझ्यासाठी खाली आले आणि माझी पाठ थोपटून त्यांनी मला बक्षीस दिले. त्यांच्या या मोठेपणाची अजूनही मला आठवण येते.
अशीच एक कॉलेजमधली आठवण. त्यावेळी गॅदरिंग मध्ये माझे नृत्य ठरलेलेच असायचे. एफ वाय ला असताना बक्षीस वितरणासाठी माननीय शिवाजीराव भोसले यांना कॉलेजमध्ये बोलावले होते. त्यावेळी मला तीन_चार बक्षिसे मिळाली होती. माझे ठरलेले वक्तृत्व, कथाकथन, कॉलेजमध्ये अंताक्षरी स्पर्धा होती. आमच्या ग्रुपचे प्रमुख मीच होते. त्यामध्ये वेगवेगळे राऊंड झाले. आमच्या ग्रुप चा पहिला नंबर आला. शिवाय मला प्रश्नमंजुषा मध्ये बक्षीस मिळाले होते. स्टेजवर घेण्यासाठी मी तीन-चार दा गेले होते. गॅदरिंग असल्यामुळे साडी नेसली होते. त्यावेळी शिवाजीराव भोसले सरांनी माझे कौतुक केले आणी म्हणाले,”किती बक्षीस मिळवलीस ग”. अजूनही त्यांचा तो आवाज, कौतुकाचे बोल माझ्या कानात आहेत. त्यांनी दिलेली शाबासकी माझ्या डोळ्यांना ना न दिसता ही मला जाणवली. विशेष म्हणजे त्यांच्या भाषणामध्ये अर्धा भाग ते माझ्यावरच बोलले. माझ्यावर एक छोटीशी कविता सुद्धा केली आणि ती म्हणूनही दाखवली. मला त्याचे शब्द आठवत नाहीत. पण अर्थ आठवतो आहे. परमेश्वर मला म्हणतोय, तुझे डोळे माझ्याकडे आहेत, पण माझं लक्ष तुझ्याकडे आहे. हा मोठा आशय अजूनही माझ्या लक्षात आहे. त्याचा गर्भितार्थ मी कधीच विसरणार नाही.
२००७ च्या एप्रिल मध्ये, रंगशारदा मिरज तिथे मुंबईच्या लोकांनी योगाचे शिबिर घेतले होते. केला मी जात होते. शेवटच्या दिवशी गप्पांमध्ये मी नृत्य शिकते, विशारदची परीक्षा देणार आहे, असं त्यांना सांगितल्यावर त्यांना खूपच आश्चर्य वाटलं. जुलैमध्ये त्यांचा मला फोन आला. गुरुपौर्णिमेनिमित्त मुंबईला एका कार्यक्रमात नाच करशील का असे विचारले. येण्या-जाण्याचा खर्च आम्ही करतो. बाबांनी होकार दिला. खरंतर माझ्या मनात शंका होती. मुंबईच्या स्टेजवर माझे कसं होईल ही भिती होती, माझाच मला अंदाज नव्हता. पण काय सांग त्या लोकांनी अक्षरशः डोक्यावर उचलून घेतलं. नाचाचे पूर्ण गाणे संपेपर्यंत टाळ्या थांबल्या नाहीत. माझा मेकअप, आत्मविश्वास यामुळे त्यांना मी अंध आहे, हे पटतच नव्हतं. कितीतरी बायकांनी नंतर माझा हात हातात घेऊन, गालावरून हात फिरवून, अगदी डोळ्यांना हात लावून खात्री करून घेतली. त्यावेळी मुंबई गाजवली. कितीतरी संस्थांमार्फत मला बक्षीस मिळाली.
आणखी एक अनुभव सांगते. सांगलीमध्ये अपंग सेवा केंद्रातर्फे माझा एक कार्यक्रम झाला. तो पाहायला वालचंद कॉलेजचे रिटायर्ड जोगळेकर सर आले होते. त्यावेळी ते 80 वर्षांचे असतील. माझा नाच झाल्यावर मुद्दाम मला भेटून ते म्हणाले,”छान नृत्य केलेस.अग, आम्हाला रस्त्यावरूनही नीट चालता येत नाही.”त्यांचं हे कौतुक ऐकून उत्साह वाढला आणि आपण काही कमी नाही हे जाणवले. नुसतं सहानुभूती म्हणून ते बोलत नव्हते, हे त्यांच्या शब्दातून कळले.
या माझ्या नृत्यासाठी माझ्या मैत्रिणी, शिक्षिका आणि माझी आई या सगळ्यांचे खूपच सहकार्य आणि मदत मिळत होती. माझी ड्रेपरी दागिने घालणे , मेकअप करणे यासाठी त्यांची मदत मोलाची होती. स्टेजवर जाऊन उभ करायलाही कोणी तरी मैत्रीण लागायची. नृत्याचे फोटो आले की त्याच मला वर्णन करून सांगायच्या. असे ते शाळा कॉलेजचे रम्य दिवस होते.