(अग्रज एवं वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं। आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ “तन्मय साहित्य ” में प्रस्तुत है आपके अतिसुन्दर कुछ दोहे….। )
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
पुनर्पाठ मेंआज एक लघुकथा->
☆ संजय दृष्टि ☆ घड़ी… ☆
अंततः यमलोक को झुकना पड़ा। मर्त्यलोक और यमलोक में समझौता हो गया। समझौते के अनुसार जन्म के साथ ही बच्चे की कलाई पर यमदूत जीवनकाल दर्शाने वाली घड़ी बांध जाता। थोड़ी समझ आते ही अब हर कोई कलाई पर बंधी घड़ी की सूइयाँ पीछे करने लग गया।
वह अकाल मृत्यु का युग था। उस युग में हर कोई जवानी में ही गुज़र गया।
केवल एक आदमी उस युग में बेहद बुजुर्ग होकर गुज़रा। सुनते हैं, उसने अपनी कलाई पर बंधी घड़ी बचपन में ही उतार फेंकी थी।
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆संपादक– हम लोग ☆पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti. An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.
We present an English Version of Shri Sanjay Bhardwaj’s Hindi Poetry “चातक ” published previously as ☆ संजय दृष्टि –चातक ☆. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) for this beautiful translation.)
☆ Chaatak ☆
… agreed that you write well but also try to understand the world some time. Learn worldliness. One cannot always drink nectar alone. Write something peppery-spicy. Get into the river, stream, puddle, pond, and quench your thirst. How long can you live with dry throat?
… I’m of Chaatak family. If I drink, I drink water of Swati Nakshatra only, else, my thirst craving will remain my destiny…
(श्री अरुण कुमार डनायक जी महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है.
आदरणीय श्री अरुण डनायक जी ने गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर 02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है. लेख में वर्णित विचार श्री अरुण जी के व्यक्तिगत विचार हैं। ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक दृष्टिकोण से लें. हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ प्रत्येक बुधवार को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – बिना मजदूरी किये खाना पाप है. ……… ”)
☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर विशेष ☆
☆ गांधी चर्चा # 40 – बापू के संस्मरण – 14 – बिना मजदूरी किये खाना पाप है. ……… ☆
एक समय अवधेश नाम का एक युवक वर्धा में गांधीजी के आश्रम में आया । बोला, “मैं दो-तीन रोज ठहरकर यहां सब कुछ देखना चाहता हूँ । बापूजी से मिलने की भी इच्छा है । मेरे पास खाने-पीने के लिए कुछ भी नहीं है । मैं यहीं भोजन करूँगा।”
गांधीजी ने उसे अपने पास बुलाया । पूछा, ” कहाँ के रहने वाले हो और कहाँ से आये हो?” अवधेश ने उत्तर दिया, “मैं बलिया जिले का रहने वाला हूँ । कराची कांग्रेस देखने गया था । मेरे पास पैसा नहीं है। इसलिए कभी मैंने गाड़ी में बिना टिकट सफर किया, कभी पैदल मांगता-खाता चल पड़ा । इसी प्रकार यात्रा करता हुआ आ रहा हूँ।”
यह सुनकर गांधीजी गम्भीरता से बोले,”तुम्हारे जैसे नवयुवक को ऐसा करना शोभा नहीं देता। अगर पैसा पास नहीं था तो कांग्रेस देखने की क्या जरुरत थी? उससे लाभ भी हुआ? बिना मजदूरी किये खाना और बिना टिकट गाड़ी में सफर करना, सब चोरी है और चोरी पाप है । यहाँ भी तुमको बिना मजदूरी किये खाना नहीं मिल सकेगा।”
अवधेश देखने में उत्साही और तेजस्वी मालूम देता था । कांग्रेस का कार्यकर्ता भी था । उसने कहा “ठीक है । आप मुझे काम दीजिये । मैं करने के लिए तैयार हूँ ।” गांधीजी ने सोचा, इस युवक को काम मिलना ही चाहिए और काम के बदले में खाना भी मिलना चाहिए । समाज और राज्य दोनों का यह दायित्व है । राज्य जो आज है वह पराया है, लेकिन समाज तो अपना है । वह भी इस ओर ध्यान देता, परन्तु मेरे पास आकर जो आदमी काम मांगता है उसे मैं ना नहीं कर सकता । उन्होंने उस युवक से कहा,”अच्छा, अवधेश, तुम यहाँ पर काम करो. मैं तुमको खाना दूँगा। जब तुम्हारे पास किराये के लायक पैसे हो जायें तब अपने घर जाना ।” अवधेश ने गांधीजी की बात स्वीकार कर ली और वह वहाँ रहकर काम करने लगा ।
( श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू, हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर रचना लिख देना । श्रीमती कृष्णा जी की लेखनी को इस अतिसुन्दर रचना के लिए नमन । )
( श्री प्रह्लाद नारायण माथुर जी अजमेर राजस्थान के निवासी हैं तथा ओरिएंटल इंश्योरेंस कंपनी से उप प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। आपकी दो पुस्तकें सफर रिश्तों का तथा मृग तृष्णा काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुकी हैं तथा दो पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य । आज से प्रस्तुत है आपका साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा जिसे आप प्रति बुधवार आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता मेरे शब्द।)
Amazon India(paperback and Kindle) Link: >>> मृग तृष्णा
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – मृग तृष्णा # 10 – मेरे शब्द☆
आज जिन्दा हूँ तो कोई याद करता नहीं,
कल मेरी तस्वीर टंगी देखकर लोग रोने लगेंगे ||
माहौल बहुत गमगीन हो जाएगा,
जब मेरे बचपन की यादों में लोग मुझे ढूँढने लगेंगे ||
कल जब लोग मुझे अपने बीच नहीं पाएंगे,
यकीन कीजिए मेरे शब्द उनकी आंखे नम कर देंगे ||
जब चला जाऊँगा लौट कर फिर ना आऊँगा,
मेरी कविताओं में लोग मुझे नम आँखों से ढूँढने लगेंगे ||
जो लोग मुझे कभी कोसते नहीं थकते,
मेरी कविताओं में मेरा किरदार ढूँढने लगेंगे ||
मैं कल जब निःशब्द हो जाऊँगा ,
लोग मेरी किताब के पन्ने पलट कर मुझे ढूँढने लगेंगे ||
जब निशब्द हो जाऊँ परेशान ना होना,
मुझे किताबों में देख लेना, मैं हर शब्द में मिल जाऊँगा ||
ढूँढतेरहोगे मुझे यादों के झरोखों में,
किताब के किसी मुड़े हुए पन्ने में तुम्हें मिल जाऊँगा ||
(आज प्रस्तुत है सुश्री प्रभा सोनवणे जी के साप्ताहिक स्तम्भ “कवितेच्या प्रदेशात” में स्त्री विमर्श पर एक अतिसुन्दर काव्यात्मक अभिव्यक्ति सुपर माॅम। आज माँ के कार्यों का दायरा एवं दायित्व समय के साथ बढ़ गया है जिसकी सुश्री प्रभा जी ने अत्यंत सुन्दर विवेचना की है। मुझे पूर्ण विश्वास है कि आप निश्चित ही प्रत्येक बुधवार सुश्री प्रभा जी की रचना की प्रतीक्षा करते होंगे. आप प्रत्येक बुधवार को सुश्री प्रभा जी के उत्कृष्ट साहित्य को साप्ताहिक स्तम्भ – “कवितेच्या प्रदेशात” पढ़ सकते हैं।)
सर्व तयारी करून आम्ही पार्टीसाठी निघण्याच्या बेतात होतो. स्वयंपाकघराची खिडकी बंद करायला गेले, तेवढ्यात एक झुरळ उडतउडत आत शिरलं.
झाडू घेऊन मी त्याला झोडपलं. मेलं ते. ते मेल्याची खात्री करून घेतल्यावर त्याला कागदात बांधून पुडी करताकरता माझ्या मनात आलं, ‘बिचारं घरात शिरलं, तेव्हा त्याला कल्पनाही नसेल की दोन मिनिटात मृत्यू त्याच्यावर झडप घालणार आहे. शेवटी त्यालाही स्वतःच्या जीवाची किंमत असणारच ना !मला अधिकार आहे का त्याचा जीव घेण्याचा?’ मला अशा वेळी नेहमी वाटतं, तसंच खूप अपराधी वाटलं. पण माझाही नाईलाज होता. मी त्याला ‘सॉरी ‘म्हणून पुडी कचऱ्याच्या डब्यात टाकली.
पार्टीत यांनी, नुकतीच बदली होऊन आलेल्या एका सहकाऱ्याशी माझी ओळख करून दिली. तेवढ्यात यांना कोणीतरी हाक मारली, म्हणून हे तिकडे गेले.
त्याचा पहिला प्रश्न :”तुमी नॉनव्हेज खाता का?” त्याने सगळं सोडून हे विचारणं, तेही ओळख झाल्याझाल्या, मला विचित्र वाटलं.
पण मी त्याला उत्तर दिलं. माझं ‘नाही ‘हे उत्तर ऐकताच त्याला एवढा प्रचंड आनंद झाला की त्याने मला, दुसऱ्या जिवंत प्राण्याला खाणं किती क्रूरपणाचं, किती अमानुष आहे वगैरे लेक्चर द्यायला सुरुवात केली.
“अहो, पण नॉनव्हेज खाणारे लोक काय जिवंत प्राण्याला उचलून थोडंच तोंडात टाकतात?”
पण तो ऐकून घ्यायलाच तयार नव्हता.
“आम्ही लोग ना मॅडम, जमीनच्या खाली उगलेल्या भाज्यापण नाय खाते. म्हणजे बटाटा, रतालू…. काय हाय? तेच्याबरोबर जमीनच्या आतले किडे येएल ना? ”
“पण त्या भाज्या तर आपण धुऊन घेतो ना? मग किडे पोटात कसे जाणार? ”
“पण पानीमध्ये ते मरून जाएल ना? ”
“आणि मला एक सांगा सर, जमिनीच्या वर उगवणाऱ्या भाज्या खाता तुम्ही? ”
“हो. ”
“पण मग त्यांच्यात पण जीव असतोच ना? सजीवच असतात त्या. भाज्या, फळं….. ”
“नाय म्हंजे… तेंच्यातला जीव दिसून येत नाय ना. किडे कसे हलतात!”
मग त्याने एकदम त्याच्या हायर ऍथॉरिटीला संभाषणात खेचलं.
“आमचे स्वामी हाय ना, ” इथे त्याने हात जोडून नमस्कारही केला, “ते चालताना पायामधे चप्पल, शूज कायपण नाय घालते. कारण तेच्याखाली किडे येएल, तर ते मरेल ना!”
तेवढ्यात पुन्हा स्टार्टर्स आले. याने त्याला सतरा प्रश्न विचारून त्यातल्या एका पदार्थाचे तीन -चार तुकडे घेऊन चवीने खाल्ले.
आजूबाजूचे सगळे पापकर्म करताहेत आणि याच्या चेहऱ्याभोवती मात्र तेजोवलय आलंय, असा मला भास झाला.
“मी तुम्हाला एक विचारू, सर? ”
“विचारा ना, मॅडम. ”
“म्हणजे गैरसमज करून घेऊ नका. ”
“नाय. बोला. ”
“तुम्ही तुमच्या घरात पेस्ट कंट्रोल करून घेता? “माझ्या डोक्यात मघासपासून वळवळणारा किडा या निमित्ताने बाहेर पडला.
“पेsस्ट कंsट्रोल? ”
“हो. पेस्टकंट्रोल.तुम्ही घरात करून घेता? ”
“पेस्टकंट्रोssल….” त्याने आवंढा गिळला आणि मग उत्तर दिलं, “पेस्ट कंट्रोल……. करतो ना. ते तर करायलाच लागतो. दुनियादारी हाय ना !”
माझ्या चेहऱ्यावरचे खट्याळ भाव बघितले आणि “बॉसला तर अजून भेटलाच नाय, “असं काहीतरी पुटपुटत त्याने तिथून काढता पाय घेतला.
व्यवसाय : स्टेट बॅंक ऑफ इंडिया मधून अधिकारी म्हणून निवृत्त
छंद : वाचन, संगीत ऐकणे, ललित लेखन व कविता करणे. “अंतर्नाद” हा कविता संग्रह प्रकाशित. आत्तापर्यंत १० इंग्लिश व एका हिंदी पुस्तकाचा मराठी अनुवाद केला आहे (मेहता पब्लिशिंग हाउस आणि अजब प्रकाशन).
☆ विविधा: सकारात्मकता – एक अभेद्य तटबंदी – सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे☆
परवा सहजच मनात असा एक विचार आला की, आपल्या वैयक्तिक आयुष्यात आणि सामाजिक जीवनातही बऱ्याच गोष्टी, बरेच विचार, एखादी मोठी लाट यावी तसे येतात, काही काळ त्यात आपण भिजतो, आणि मग ती लाट नकळतच आपोआप ओसरून जाते. एखाद्या फॅशनची लाट आलीये म्हणतात ना तसेच. वैचारिक लाटा तर अनेक प्रकारच्या असतात. जागतिक किंवा राष्ट्रीय परिस्थितीनुसार सतत वेगाने उफाळणाऱ्या, पण तितक्याच वेगाने अनिश्चिततेच्या किनाऱ्यावर आपटून विरून जाणाऱ्या लाटांची तर गणती करणेच अशक्य आहे. माणसाच्या वैयक्तिक जीवनातही, प्रत्येकाच्या भौतिक परिस्थितीनुसार, स्वभावानुसार, त्याच्या मानसिक आरोग्य कसे आहे त्यानुसार, शब्दशः असंख्य विचारांची मनात अशी सतत भरती- ओहोटी चालू असते, ज्याचा अनुभव प्रत्येकच माणूस क्वचित जाणतेपणाने आणि बहुतांशी अजाणतेपणी घेतच असतो. आणि बरेचदा या अशा लाटांचा माणसाला आनंद होण्याऐवजी त्रासच जास्त होत असतो हे सांगण्यासाठी स्वतःचे उदाहरण पुरेसे असते.
एकदा कुठेतरी मी असे एक वाक्य वाचले होते की, मनातले विचार नकारात्मक असोत की सकारात्मक, पण या दोन्ही प्रकारच्या विचारांचा माणसाच्या संपूर्ण आयुष्यावर प्रचंड प्रभाव, किंवा दबाव म्हणुयात, पडत असतो. आणि अर्थातच सकारात्मक विचारांचा प्रभावही सकारात्मक च असतो, ज्यातून सुख – शांती- समाधान यांचा अनुभव आयुष्यभर कळत नकळत पण आवर्जून येत रहातो. मनात असे ठरवून, विचार करून, विचार आणता येत असतात का? असा प्रश्न पडणे अगदी स्वाभाविक आहे. आणि मला तरी या प्रश्नाचे उत्तर ‘ हो ‘ असेच द्यावेसे वाटते. सकारात्मक विचार किती मोलाचे आणि महत्वाचे असतात हे खूप पूर्वीपासून अनेक विचारवंत, तत्वज्ञ, आणि जाणकार लोक सांगत आलेलेच आहेत. पण असे विचार आणि त्यांचे महत्त्व अगदी सर्वसामान्य माणसापर्यंत, त्याच्या जाणिवेच्या पातळीपर्यंत, झिरपत जाऊन तिथे कायमचे मुरलेले राहण्याची आत्यंतिक आणि कालातीत गरज आहे असे मला निःसंशयपणे म्हणावेसे वाटते.
पण मग मनात बहुसंख्येने येणारे नकारात्मक विचार, सकारात्मक कसे होऊ शकतील, हा प्रश्नही तितक्याच स्वाभाविकपणे पडणारा आहे. त्यासाठीच इथे आणखी काही सांगावेसे वाटते आहे. आपण कसा विचार करतो, यावर आपले संपूर्ण आयुष्य कसे असेल हे अवलंबून आहे, ही गोष्ट सर्वप्रथम, प्राधान्याने समजून घ्यायला हवी, आणि मान्य करायला हवी. हेही मान्य करायला हवे की नकारात्मक विचारांच्या सतत सांनिध्यात राहिले तर आपोआपच उदास पणा, भय, दुःख, या भावनांना खत पाणी मिळत राहते आणि नकळतच नैराश्याच्या वाटेवर पावले पडायला लागतात. खरे तर स्वतः कडे, स्वतःच्या विचार प्रक्रियेकडे त्रयस्थपणे आणि सजगपणे पाहिले तर ही गोष्ट सहजपणे लक्षात येण्यासारखी आहे. पण सामान्यतः तसे पाहिले जात नाही, कारण ‘ माझे काही चुकते आहे ‘ हेच मुळात मान्य न करण्याचा मानवी स्वभाव असतो. पण एक अधिक एक म्हणजे दोनच, हे जसे आपण निःशंकपणे आणि सहजपणे मान्य करतो, अगदी तसेच हेही मान्य करायचे की सकारात्मक विचार आपली शक्ती, आपला आत्मविश्वास आणि आपले मनोबल निःसंशय वाढवतात. आणि मग स्वतःच्याच मनाशी जणू युद्ध करून, नकारात्मक विचारांची जागा सकारात्मक विचारांना देता येऊ शकते. आणि केवळ आपला दृष्टिकोन बदलून हे युद्ध जिंकता येते. याचे एक सर्वश्रुत उदाहरण आहे ते शास्त्रज्ञ थॉमस अल्वा एडिसन यांचे. विजेच्या दिव्याचा शोध लावण्यासाठी अथक प्रयोग करत असताना हजाराव्या प्रयोगात त्यांना यश मिळाले. आधीच्या फसलेल्या ९९९ प्रयत्नांबद्दल ते म्हणायचे की ‘ ते प्रयोग फसले असे मी मानतच नाही. उलट, कोणत्या कोणत्या मार्गाने विजेचा दिवा लागू शकत नाही हे मी ९९९ वेळा सिद्ध करून दाखविले आहे‘. .. याला म्हणतात सकारात्मक दृष्टिकोन. या बाबतीत पाण्याने अर्ध्या भरलेल्या ग्लासचे जे उदाहरण दिले जाते, ते तर समजायला आणि पचनी पडायला अगदीच सोप्पे आहे. ग्लास पाण्याने अर्धा का होईना पण भरलेला आहे यात समाधान मानायचे की अर्धा रिकामा आहे याचे दुःख करत हताश निराश व्हायचे हे ठरविणे खरे तर कुणासाठीही अजिबातच अवघड नाही. पण त्यासाठी क्षणभर विचार मात्र करावा लागतो. आणि असा विचार करण्याची मनाला सवयच लावून घेण्याचा निश्चय एकदा का मनापासून केला की मग सगळ्याच गोष्टी सोप्या होऊन जातात. मन आपोआप प्रसन्न रहाते, मनाची आणि शरीराची ही ऊर्जा वाढते, कामाचा उत्साह आणि गतीही वाढते. आणि अर्थातच आत्मविश्वास ही वाढतो.
एखादी वाईट घटना घडली, तर त्याहीपेक्षा वाईट काहीतरी घडू शकले असते, पण तसे घडलेले नाही, यात समाधान मानता आले तर घडलेली वाईट घटना सुसह्य वाटू लागते, आणि हा फक्त सकारात्मक विचारसरणीचा परिणाम असतो. अपयश ही यशाची पहिली पायरी आहे असे म्हटले जाते, आणि दृष्टिकोन सकारात्मक असेल तर ते सिद्धही करता येते याची अनेक उदाहरणे डोळसपणे पाहिले तर आपल्याच अवती भोवती दिसतात.
म्हणूनच जगातल्या प्रत्येक माणसाने अन्न वस्त्र निवारा याप्रमाणेच ही आणखी एक गोष्टही अत्यंत मूलभत गरजेची मानली पाहिजे की, अनिर्बंध नकारात्मक विचार आणि त्यामुळे निर्माण होणारा नकारात्मक दृष्टिकोन यांना, अत्यंत जागरूकपणे आणि निश्चयपूर्वक स्वतःच्या मनात अजिबातच थारा द्यायचा नाही. स्वतःचे विचार आणि दृष्टिकोन ही सतत सकारात्मकच राहील याची जाणीवपूर्वक दक्षता घ्यायची. मग नक्कीच लक्षात येईल की सकारात्मक विचार ही , कितीही जोराने उफाळून आल्यावरही शेवटी वास्तवाच्या किनाऱ्यावर फुटून, क्षणात विखरून जाणारी विचारांची लाट नसतेच. तर ती असते एक अभेद्य तटबंदी ……. सतत प्रचंड उसळणाऱ्या, भयभीत करणाऱ्या, केव्हाही अक्राळ विक्राळ रूप धारण करून मनाला अक्षरशः हतबल करून टाकणाऱ्या सगळ्याच लहान मोठ्या नकारात्मक विचारांच्या क्रूर लाटांना, आपल्या पायाशी स्वतःचे अस्तित्वच विसरून पराभव पत्करायला भाग पाडणारी, निग्रहपूर्वक मनाला घातलेली अभेद्य तटबंदी.