हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ दिगंबर ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ दिगंबर  ☆

रुधिर से भी

तीव्र उठती है

अंतर्वेदना की धार,

इस धार में छुपा

दिगंबर संसार…!

 

©  संजय भारद्वाज 

प्रात: 10.26 बजे 26.10.20200

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 20 ☆ वैश्वीकरण के साथ बढ़ता भाषाई घालमेल ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत /अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। अब आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सार्थक एवं विचारणीय आलेख “वैश्वीकरण के साथ बढ़ता भाषाई घालमेल)

☆ किसलय की कलम से # 20  ☆

☆ वैश्वीकरण के साथ बढ़ता भाषाई घालमेल ☆

भारतीय समाज वैश्वीकरण के बढ़ते प्रभाव के साथ बिलकुल नई दिशा में बढ़ता दिखाई दे रहा है। आधुनिक तकनीकि पारम्परिक संसाधनों को पीछे छोड़ द्रुतगति से विकास में सहयोगी बन रही है। युवाओं की सोच सीमित दायरों से ऊपर उठकर व्यापक होती जा रही है। अब इन्हें अन्तरराष्ट्रीय सीमाएँ दो शहरी सीमाओं से ज्यादा नहीं लगतीं। यह बदलाव स्वयमेव और सहज होता जा रहा है और इसे आत्मसात भी किया जा रहा है, परन्तु यह भी सत्य है कि आधुनिक परिवेश में पली-बढ़ी पीढ़ी का यह बदलाव वयोवृद्ध एवं देसी विचारक सहजता से नहीं स्वीकारेंगे। आज का युवा किसी क्लिष्टता में नहीं, बल्कि सहज, सरल और त्वरित परिणाम में विश्वास रखता है। इन युवाओं के हिसाब से पहनावा, खानपान, मेलजोल या भाषा सभी सरल और सहज होना चाहिए। जाति-सम्प्रदाय की दीवारें ढहाकर, देशीय सीमाएँ लाँघकर भाषाई संकीर्णता से परे आज के महिला-पुरुष लैंगिक भेदभाव भूलते जा रहे हैं। आज जब हम अपने इर्द-गिर्द नजर दौड़ाते हैं तो सबसे ज्यादा बदलाव हमारी बोली और भाषा में परिलक्षित होता है। हमारी अभिव्यक्ति का तरीका अब किसी एक भाषाई सीमा में संकुचित न रहकर व्यापक और स्वच्छन्द हो चला है। क्षेत्रीय बोलियाँ या भाषाएँ हों अथवा हिन्दी या फिर वैश्विक भाषा अंग्रेजी ; आवश्यकतानुसार सभी के बहुसंख्य शब्द परस्पर मिलते जा रहे हैं। आज व्याकरण, भाषाई शुद्धता के बजाय आसानी से ग्राह्य मिश्रित भाषा को सहज स्वीकृति मिल चुकी है। अब हम हिन्दी-अंग्रेजी अथवा प्रादेशिक भाषाओं के प्रचार-प्रसार की बात करें तो यह कहना प्रासंगिक होगा कि जनमानस को हाथ पकड़कर सिखाने के दिन लद चुके हैं। खासतौर पर हमारे युवा जानते हैं कि उन्हें क्या सीखना है और क्या नहीं। जो ज्यादा उपयोगी, ज्यादा सरल और सर्वग्राही हो, वह उतना अधिक प्रचलन में होता है। आज हम अपने आसपास देखें तो विरले ही भाषानिष्ठ शिक्षक, साहित्यकार अथवा सचेतक मिल पाएँगे, जिन्हें ऐसी भाषा से परहेज होगा । सामाजिक समर्थन और प्रोत्साहन के फलितार्थ ऐसे मिश्रित भाषाई दिशा-निर्देश स्वयमेव निर्मित हो गए हैं, जिनका पालन करना मीडिया की बाध्यता कही जा सकती है। कल यदि यही समाज इसका विरोध करेगा, तो निश्चित रूप से मीडिया भी इनके साथ होगा । जनमानस के रुझान को ध्यान में रखकर ही ये संचार माध्यम अपनी जगह बनाने में सक्षम हो पाते हैं। अब ऐसी स्थिति में यहाँ एक ऐसा वर्ग भी है, जो इस भाषाई मिश्रण अथवा तथाकथित अशुद्ध भाषा के लिए मीडिया को दोषी ठहराता है। हमारी समझ से उनकी यह एकांगी सोच केवल मीडिया की उपयोगिता पर सवाल उठाना ही कही जाएगी। जनमानस पर कुछ भी मनमर्जी से नहीं थोपा जा सकता। मीडिया वही उपलब्ध करा रहा है, जो आप, हम और आज का युवा चाहता है। वैश्वीकरण के बढ़ते प्रभाव के बीच हम यह न भूलें कि मूलभूत विकास के मुद्दों को छोड़कर अपनी ढपली-अपना राग अलापना हमारे सर्वांगीण विकास में बाधक बन सकता है।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 66 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं   “भावना के दोहे । ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 66 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

संकल्पों की साधना,

देती है विश्वास।

शांत भाव की कामना,

हृदय  जगाती आस।

 

रचते रचते रच गये,

मेरे मन के गीत

मन की सारी वेदना,

मन का है संगीत।

 

अंतर्मन की वेदना,

 समझ सका है कौन।

जीवन में जो खास है,

वही आज है मौन।

 

कोरोना के काल में,

घर-घर कारावास।

है स्वतंत्र तन-मन-लगन

देखो सबके पास ।।

 

स्वप्न हवाई हो रहे,

चितवन भरे उड़ान।

मन उमंग में बावरा,

हर पल से अनजान।।

 

गौतम जिनका नाम है,

कहलाए वे बुद्ध।

गूढ़ ज्ञान के पारखी,

करते नमन प्रबुद्ध।।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एहसास… ☆ श्री जयेश वर्मा

श्री जयेश वर्मा

(ई-अभिव्यक्ति में सुविख्यात साहित्यकार श्री जयेश कुमार वर्मा जी का हार्दिक स्वागत है। आप बैंक ऑफ़ बरोडा (देना बैंक) से वरिष्ठ प्रबंधक पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। हम अपने पाठकों से आपकी सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ समय समय पर साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक  अतिसुन्दर भावप्रवण कविता एहसास…  ।)

☆ कविता  ☆ एहसास… ☆

अब….जब भी…..

तुम्हारे, वजूद के,

इर्द गिर्द….

अपने एहसासों का,

ताना बाना बुनता हूँ,  मैं,

तो लगता है ये,

तुम्हारा, होना, ही,

मायने हैं…मेरी.जिंदगी के..,

सोचा भी नहीँ….

कभी,देखा भी नहीँ,

अपने में ही मशरूफ़ रहा,

एक, सरसरी तौर पर,

जीता रहा,

तुम्हारे…..साथ…साथ,

यूँ, ही गुजरता, वक़्त, गुजर गया,

अब जब हैं, नहीँ…खत्म सी हैं,

मेरी जरूरतें,

जब, वक्त ही वक़्त है मेरे पास,

देखा है तुम्हें, करीब से, इतने दिनों बाद,

समय ने खेंच दी हैं, तुम्हारे चेहरे पर,

कुछ लकीरें, यहां वहां,

छीन नहीं पाया है, अब भी,

आँखों की वो जीवंत चमक,

अधर धरे अब भी मुस्कान,

अब, सोचता हूँ,

कैसे, निभा लिए तुमने,

दायित्व इतने सारे, कि,

घोंसले में, अब हम तुम ही हैं,

एक दूजे को देखते, मुस्काते, समझाते,

कि, एक दूजे बिन अब, नहीं गुजारा,

बना रहे यूँ ही साथ हमारा…

 

©  जयेश वर्मा

संपर्क :  94 इंद्रपुरी कॉलोनी, ग्वारीघाट रोड, जबलपुर (मध्यप्रदेश)
वर्तमान में – खराड़ी,  पुणे (महाराष्ट्र)
मो 7746001236

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ सोनसळी झाले रान ☆ सौ. राधिका भांडारकर

 ☆  कवितेचा उत्सव ☆ सोनसळी झाले रान ☆ सौ. राधिका भांडारकर ☆ 

(अष्टाक्षरी काव्य प्रकार)

फुले रान मदनाचे…

कस्तुरीचा गंध तुझा

कमरेचा बाक छान

हसताच गाली खळी

सोनसळी होते रान………

 

स्पर्श होता  मखमली

करवंदी जाळीतून

ओथंबले  दवबिंदु

सोनसळी झाली  धून…..

 

नुपुरांच्या  रूणझुणी

कमनीय   कटी कळी

नयनात येता धुंदी

रान झाले सोनसळी….

 

चंद्र किरणांचा सडा

चांदण्यांचे मुक्त गान

अधरात तुझ्या पीता

सोनसळी झाले रान………

 

तुझ्यातला श्वास माझा

केवड्याचा गंध माळी

मुक्त झाला एक लोंढा

रान झाले सोनसळी…….

 

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेखर साहित्य # 12 – नित्य तू जवळी रहा ……….  ☆ श्री शेखर किसनराव पालखे

श्री शेखर किसनराव पालखे

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेखर साहित्य # 12 ☆

☆ नित्य तू जवळी रहा ………. ☆

सोबतीला तू हवा, दुसरे काही नको

नित्य तू जवळी रहा,  मागणे दुजे नको !

 

याच त्या सुखी क्षणांचा, लागला  खे आहे लळा

दिसणे तुझे, असणे तुझे, आणखी काही नको !

 

लिहून मी ठेविलें, माझ्याच या भाळी तुला

पर्व हे सुरु जाहलें, वाढो त्याची कळा !

 

सात्त्विकता ही तुझी, आणखी देशील का

रंगले मी तुझ्यात, तू ही माझ्यात रंगशील का?

 

गगनाहुनी ऊंच हा आनंद माझा वेगळा,

सात्त्विकच्या रूपाने आयुष्य येई फळा !

 

© शेखर किसनराव पालखे 

पुणे

17/05/20

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ श्री सूक्त – एक ‘अर्थ ‘पूर्ण  प्रार्थना ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆ विविधा ☆ श्री सूक्तएक ‘अर्थ ‘पूर्ण  प्रार्थना ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆ 

कुठल्याही देवी- पूजनाच्यावेळी आवर्जून श्रीसूक्त म्हटलं जातं. देवी-स्तुतीव्यतिरिक्त श्रीसूक्तात काय आहे याची माहिती मिळाल्यावर, ती साररूपात इतरांनाही सांगावी असं मनापासून वाटलं.

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष हे चार पुरुषार्थ आहेत, त्यापैकी धर्म हा सर्वश्रेष्ठ पुरुषार्थ आहे. अर्थ आणि काम हे जीवनाच्या भौतिक विकासासाठी आवश्यकच आहेत,पण त्यांच्या मुळाशी धर्म असावाच लागतो. श्रीसूक्तात अशा धर्माधिष्ठित लक्ष्मीला आवाहन केलेले आहे. अर्थ म्हणजे धन धर्ममार्गाने प्राप्त केले तर कधीच सोडून जात नाही, हा विश्वास यात आहे. ही लक्ष्मी कशी यावी, कायमस्वरुपी कशी रहावी, आणि आयुष्यातल्या सर्व सुखांचा मर्यादशील उपभोग घेण्यासाठी कशी जपावी, यासाठी केलेली सुंदर प्रार्थना म्हणजे श्रीसूक्त.

श्रीसूक्त हे एक व्यापक ‘अर्थ’ शास्त्र आहे. अर्थ, अर्थात धन आयुष्यात महत्त्वाचे असतेच. म्हणूनच ‘धनलक्ष्मी’ ही संपत्तीची देवता असे म्हणतात. इथे संपत्ती म्हणजे फक्त पैसा अभिप्रेत नाही. उत्तम गुण, उत्तम आरोग्य, उत्तम अन्न, उत्तम ज्ञान, उत्तम मित्र, ही सुद्धा मौल्यवान संपत्ती आहे जी यथायोग्य मिळाली तरच आयुष्य सुखी-समाधानी होते आणि आत्मिक विकासाची वाटही सापडू शकते. उपभोग-दान-विलय या धनाच्या तीन अवस्था आहेत.

लक्ष्मी मातृस्वरूप आहे असे मानले आहे, म्हणूनही तिची पूजा केली जाते. मिळवलेली सर्व प्रकारची माते-समान पवित्र संपत्ती कायम-स्वरुपी आपल्या घरी रहावी, ती प्रसाद समजून स्वीकारावी, हा फार मोठा हेतू लक्ष्मी-प्रार्थनेमागे आहे.

श्रीसूक्तात अग्नीला प्रार्थना केली आहे की, ‘त्या तेजस्वी लक्ष्मीला तू माझ्या घरी घेऊन ये. ती कधीही परत जाऊ नये. आणि ती वाजत गाजत येऊ दे ‘….. गर्भितार्थ असा की, ही धनरूपी लक्ष्मी पवित्र, स्वकष्टार्जित आणि चोख असावी. ती लपवावी लागू नये. ती उजळ माथ्याने घरात विसावली तरच मनःशांती आणि समाधान लाभते. तिला ‘आर्द्रा’ असेही म्हटलेले आहे. समुद्रपुत्री आणि विष्णूपत्नी म्हणून ती क्षीर-सागरात तर रहातेच. शिवाय तिच्यात वात्सल्याचा, भावनांचा ओलावा आहे, म्हणून ती अंतर्बाह्य ‘आर्द्रा’ आहे, जिच्या सोबत जीवन सुसह्य आणि आनंदमय होऊ शकतं.

धनाला अशी लक्ष्मी मानल्यामुळे, सर्वांनीच याप्रमाणे चोख व्यवहार केला, तर समाजजीवनही अत्यंत आनंदमय आणि समाधानी राहील हाच अप्रत्यक्ष संदेश श्रीसूक्तातून दिलेला आहे.

यात धनलक्ष्मीला  आवाहन केलेले आहे की ….’देवांनीही तुझा आश्रय मागावा इतकी तू उदार आहेस. तुझ्या-मुळेच आमचं दारिद्र्य नष्ट होईल‘…… अर्थात ‘दारिद्र्य फक्त पैशाचे नसते. ते बुद्धीचे,विचारांचे आणि भावनांचेही असते. तेही नष्ट व्हावे आणि माणसाचे व्यक्तिमत्व संपन्न व्हावे‘. दारिद्र्य म्हणजे ‘अलक्ष्मी‘. हिचे वर्णनही यात केलेले आहे…..’अनेक प्रकारच्या तहान-भुकेमुळे मलीन झालेली, जगभर मोठ्या प्रमाणात वास करणारी, आणि अतिदुःखदायक अशी लक्ष्मीची मोठी बहीण‘…..ती घराबाहेर गेली तरच क्लेशकारक दारिद्र्य सर्वतोपरी नाहीसे होऊ शकते, जे एका माणसासाठीच नाही, तर एका राष्ट्रासाठीही आवश्यक आहे. तरच श्रीमंती आणि गरिबी यात जगभर दिसणारी प्रचंड दरी सांधण्याची शक्यता आहे.

श्रीसूक्तात पुढे म्हटले आहे की, या तेजस्वी लक्ष्मीने तपश्चर्या केली त्यातून बेलाचे झाड निर्माण झाले. त्याचे त्रिदल पान म्हणजे सत्व- रज- तम या त्रीगुणांचे, त्रिविध तापांचे, बाल्य- तारुण्य- वार्धक्य या तीन अवस्थांचे, आणि कर्म- अकर्म- विकर्म या कर्मत्रयांचे प्रतीक आहे. हे त्रिदल ईश्वरचरणी समर्पित करायला लक्ष्मी शिकवते, आणि स्वतः अर्थलक्ष्मी, ज्ञान- लक्ष्मी आणि आत्मलक्ष्मी, या त्रिविध रूपात उपासकाकडे रहाते.

श्रीसूक्तात अशीही प्रार्थना आहे की….. “या समृद्धी संपन्न राष्ट्रात मी जन्म घेतलेला आहे. त्यामुळे कुबेराने मलाही ‘चिंतामणी’ देऊन समृध्द करावे. माझी कीर्तीही वाढावी. माझ्या राष्ट्राची थोर परंपरा, समृध्द संस्कृती आणखी उज्ज्वल होण्यासाठी माझाही हातभार लागावा. “म्हणूनच वाटते की श्रीसूक्त ही राष्ट्र -प्रार्थनाही आहे……..’आसेतू हिमाचल पसरलेल्या या संपन्न राष्ट्राचा प्रतिनिधी असणारा मी, लक्ष्मीचा वरद-हस्त लाभलेला समृध्द नागरिक असावा ‘…… अशी ही मनोमन प्रार्थना आहे.

शेवटी आशिर्वाद मागितला आहे……..” उपासकांच्या मनाला कामक्रोधादी सहा रिपूंचा वाराही लागू नये. आणि त्यांच्यावर या पवित्र लक्ष्मीचा वरदहस्त सदैव रहावा. ”

…… श्री लक्ष्मी नमो नमः…….

© सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

९८२२८४६७६२.

माहिती सहाय्य: सौ शुभदा मुळे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ माळी पौर्णिमा – भाग १ ☆ डॉ. मंजुषा देशपांडे

☆ विविधा ☆ माळी पौर्णिमा – भाग १ ☆ डॉ. मंजुषा देशपांडे 

कोजागिरी पौर्णिमेला विदर्भ आणि मध्यप्रदेशातील काही आदिवासी भागात माळी पौर्णिमा म्हणतात.  यावेळी पावसाळी पीक तयार झालेले असते.

नवरात्र ते कोजागिरीचा हा काळ सुगीचा हंगाम साजरा करण्याचा आणि रब्बी हंगामासाठी बियाणे निवडण्याचा आणि तयार करण्याचा असतो.  लोकांच्या घरी आनंद असतो आणि कामाची धांदलही असते.

दस-यापासून कोजागिरीपर्यन्त झाबुआ जिल्ह्यातील आदिवासी पाड्यात शंकर आणि पार्वती रात्री वस्तीला येतात अशी समजूत आहे.  त्यांच्यासाठी अंगणात ऊसाची, धानाची किंवा  ज्वारीची मंडपी तयार करतात.  त्या मंडपात  मऊ गवताची बिछायत घातलेली असते.  गवताची उशी,  लोड,  तक्के केलेले असतात,  काही घरी झूलाही बनवलेला असतो. त्यामध्ये शंकर पार्वती,  गणपती, कार्तिकेय, नंदी असा सर्व परिवार बनवलेला असतो.  एक भाग शेण आणि चार भाग माती हे प्रमाण घेऊन हा परिवार तयार केला जातो.

या मंडपी रोज नाना प्रकारच्या फळा फूलांनी सजवतात.  विशेष म्हणजे त्या मंडपीवर छोट्या छोट्या पणत्याही मांडलेल्या असतात.  त्या पणत्यांना दिवणाल म्हणतात. दस-यापासून पौर्णिमेपर्यन्त रोजच त्या सूर्योदयाच्या वेळी  ताज्या ताज्या बनवल्या जातात.

दस-याच्या म्हणजे पहिल्या   दिवशी 5, त्यानंतरच्या प्रत्येक दिवशी कमीत कमी 4 दिवणाल.. असे पौर्णिमेपर्यन्त करतात.  नवसाच्या असल्या तर जास्तीही बनवतात. त्या दिवसभर वाळवून रात्री त्यात दिवे लावून आरास करतात.  त्यासाठी करंजीचे तेल वर्षभर साठवलेले असते.

अगदी 2000 साली सुध्दा तिथल्या कितीतरी पाड्यात वीज घेतलेली नव्हती पण माळी मंडपी आणि त्यावरच्या दिव्यांची आरास मात्र प्रत्येक घरात सजलेली असे.

घरातली आणि शेजारची  सर्वजण त्याच्यासमोर बसून गातात आणि फेर धरतात.  ही गाणी साधारण भूलाबाईच्या गाण्यासारखीच असतात.

मंडपीचा रोजचा नैवेद्य  म्हणजे रोटया आणि भाजी. ही भाजी मुख्यतः पालेभाजी किंवा कंदभाजी,  पण ही पाचही दिवस वेगळया ठिकाणावरून गोळा करुन आणायची असते.  म्हणजे कधी अंगणात उगवलेली,  शेतातली,  पाण्यातली,  रानातली, अशा प्रकारची.

कोजागिरी पौर्णिमेच्या दिवशी संध्याकाळी,  आपापल्या घरच्या मंडपी घेऊन सर्व लहानथोर जवळपास असलेल्या नदीकाठच्या देवळात  जमतात.

तिथे सगळे जण मिळून स्वैपाक करतात.  स्वैपाक म्हणजे भात, आमट, बरा म्हणजे डाळीचे वडे,  मक्याच्या रोट्या,  गोड पदार्थ  म्हणजे कणकेचा लचका. लचका म्हणजे गव्हाची रवाळ कणिक दळून ती भरपूर तूपात खमंग भाजतात आणि घोटून घोटून अगदी मऊ थुलथुलीत शिरा करतात.

बायका आणि मुली रानफूलांच्या माळांनी सजलेल्या असतात. लहान मुले गणपती आणि कार्तिकेयाच्या रुपात असतात.   एखादे नवसाचे मूल नंदीसारखेही सजवलेले असते.  मोठी म्हणजे टिनेजर मूले भूतगण बनतात.  सगळीकडे नुसती धमाल असते.

फूलांची  आकर्षक सजावट केलेल्या मंडपी मध्यभागी ठेवून त्याच्या वर सर्व दिवे लावतात.   उरलेले दिवे मंडपींच्या भोवतीने वर्तुळाकार 2-3 ओळीत लावलेले असतात.

सर्वप्रथम शंकर पार्वतीला त्यावर्षीच्या पाऊस पाणी आणि शेतातल्या पिकांबद्दल निवेदन केले जाते.  त्या वर्षभरात समाजात घडलेल्या चांगल्या वाईट गोष्टी  देवाला सांगितल्या जातात.

त्यानंतर जमलेल्या स्त्रिया आणि पुरूष .. यांच्या गटांमध्ये एकमेकांवर कुरघोडी करत गाणी म्हटली जातात.  ही गाणी खूपच गंमतीदार असतात,  त्यामध्ये शंकर पार्वतीच्या भांडणाच्या आणि रुसण्याच्या आणि  चंद्र,  गंगा,  गणपती आणि कार्तिकेयाच्या यांच्या खोड्यांच्या… अशा कथा असतात.

त्यातली एक कथा तर मला फारच आवडली.

(ही कथा उद्याच्या भागात वाचूया)

क्रमशः ….

©  डॉ. मंजुषा देशपांडे

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ अन्न हे पूर्णब्रह्म ☆ सुश्री प्रज्ञा मिरासदार

☆ विविधा ☆  ? अन्न हे पूर्णब्रह्म  ?☆ सुश्री प्रज्ञा मिरासदार 

अन्नाद्भवन्ति भूतानि, पर्जन्यादन्नसम्भव: |

यज्ञाद्भवन्ति पर्जन्य: यज्ञ: कर्मसमुद्भव: ||

अर्थ- सर्व प्राणिमात्र अन्नापासून उत्पन्न होतात.पावसामुळे अन्ननिर्मिती होते, यज्ञामुळे पाऊस पडतो तर यज्ञ हे आपल्या विहित कर्मांचे फळ आहे.भगवद्गीतेमध्ये भगवंतांनीच अन्नाचे महत्त्व सांगून ठेवले आहे. आपल्या रोजच्या व्यवहारात मनावर जे वेगवेगळ्या प्रकारचे संस्कार होत असतात, अनेक घटक त्यासाठी कारणीभूत ठरतात त्यातला मुख्य. घटक म्हणजे आपण खातो ते अन्न होय.

माणूस जशा प्रकारचे अन्न खातो ,ज्या परिस्थितीत खातो, ज्या मनस्थितीत खातो त्या त्याप्रमाणे त्याच्या मनाची जडणघडण होत जाते.म्हणून नेहमी प्रसन्न मनाने जेवावे. म्हणून आपल्याकडे पूर्वापार पद्धत आहे की पाट, रांगोळी, उदबत्ती वगैरे थाट करून पंगत बसविली जायची. हल्ली टेबल डेकोरेशन असते. ही वातावरणनिर्मिती मन प्रसन्न ठेवते.

जेवण नेहमी सात्त्विक, षड्रसयुक्त ,ज्याला आपण चौरस आहार म्हणतो,असे असावे. रोजच्या स्वयंपाकातून आपल्याला हे षड्रस मिळतात. मीठ, लिंबू चटणी कोशिंबीर लोणचे भाज्या, डाळ,भात, चपाती,फळे, क्वचित प्रसंगी एक गोड पदार्थ हा आहार योग्य चौरस आहार या सदरात मोडतो.

एखाद्या ऋतूत जे पिकते ते त्याचवेळी खाणे इष्ट ठरते. उदा- आंबा, कैरी वगैरे. भारतामध्ये प्रांतांनुसार खाण्याच्या सवयी ,पद्धती यात बदल झालेला दिसतो.तो तेथील हवामानानुसार योग्य आहे. तसेच अन्न शिजवताना शिजविणाऱ्याच्या मनस्थितीचा परिणामही जेवणावर होतो. म्हणून स्वयंपाक नेहमी प्रसन्न मनाने करावा. एकदा एका माणसाला खानावळीत जेवावे लागले. रोज रात्री त्याला खून केल्याची , झाल्याची तत्सम स्वप्ने पडत. काही दिवसांनी त्याला कळले की तुरूंगातून सुटका झालेला एक खुनी कैदी तिथे जेवण बनवतो.अशा अर्थाची एक कथा गुरूचरित्र ग्रंथात आहे.म्हणून असे सांगितले जाते की घरच्या कर्त्या पुरूषाने नेहमी आपल्या आईच्या, बायकोच्या नाही तर स्वत:च्या हातचेच अन्न खावे.

सात्त्विक आहार नेहमी घ्यावा. हे गीतेत आणि ज्ञानेश्वरीत सांगितले आहे.अन्नाचे सात्त्विक, राजस, तामस असे तीन प्रकार विशद केले आहेत. मूळचे सुरस, ताजे, नीट शिजलेले, स्वादिष्ट, शरीरास हितावह,सहज पचणारे ते सात्त्विक अन्न. त्याने आरोग्य उत्तम राहते. राजस अन्न म्हणजे कोरडे, तिखट, जळजळीत, अति गरम, जास्त शिजलेले असे अन्न.ते पचते पण हितावह नसते. तर तामस अन्न हे आंबलेले, शिळे, उष्टे, अर्धवट शिजलेले करपट, रसहीन असते. माणूस जे खाईल तशी त्याची वृत्ती सात्त्विक, राजस, तामस  बनते.

अन्न खूप खाऊ नये. भुकेपेक्षा दोन घास कमी खावेत. तसेच उपाशीपोटी राहू नये. अति खाऊ नये.योग्य तेवढेच खावे. अति खाणारा,उपाशी राहणारा, शांत झोप न घेणारा यांना योगप्राप्ती होत नाही असे भगवंतांनीच सांगितले आहे. म्हणून योग्य, सात्त्विक आहार अन्न हे पूर्णब्रह्म आहे असे समजून उमजूनच खावे. नकळतसुद्धा अन्नाचा अपमान करू नये. जेवताना भांडू नये. शत्रूसुद्धा जेवत असेल तर त्याला सुखाने जेऊ द्यावे. तसेच एखाद्याच्या तोंडचा घास काढून घेऊ नये.

अन्न शिजवताना , जेवणापूर्वी देवाचे नाव घ्यावे. स्वयंपाकापूर्वी स्त्रियांनी अन्नपूर्णा स्तोत्र म्हणावे.  जेवताना मन शांत ठेवावे. सावकाश जेवावे.

अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनाम् देहमाश्रित:|

प्राणापानसमायुक्त: पचाम्यन्नं चतुर्विधम् ||

असेही भगवंतांनी सांगितले आहे. सर्व अन्नाचे पचन वैश्वानर करतो. प्रत्यक्ष भगवंत  वैश्वानर बनून मनुष्याच्या देहात वसतो.  म्हणून नेहमी जीवनसत्त्व युक्त, आपल्याला योग्य उष्मांक देणारे अन्न खावे. शरीराचे पोषण उदरभरण, याबरोबरच मनाचेही पोषण करणारे अन्न  माणसाने खाणे आवश्यक आहे.

© सुश्री प्रज्ञा परशुराम मिरासदार

A-1, 603, अक्षर एलेमेंटा, पोदार स्कूलजवळ, व्हिजन वन मॉल जवळ, ताथवडे, पुणे – ४११०३३

मोबा. 9657878331

 ≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ जीवन गाणे – 5 ☆ सौ. अंजली गोखले

☆ मनमंजुषेतून ☆  जीवन गाणे – भाग 5 ☆ सौ. अंजली गोखले ☆

संशोधनामध्ये असे आढळून आले आहे की मोठ्या कंपन्यांमध्ये वरिष्ठ आणि जबाबदारीच्या पदांसाठी साठीच्या पुढच्या मंडळींना प्राधान्य देतात.  कारण त्यांच्यामध्ये काम करण्याची क्षमता जबरदस्त असते.  त्यांचे कौटुंबिक पाश बऱ्यापैकी झालेले असतात, काम करण्याची इच्छाशक्ती असते, क्षमतेमध्ये ते कमी पडत नाहीत. अमेरिकेमध्ये संशोधन करून प्रयोगांती असे सिद्ध केले आहे की माणसाचे सर्वात कार्यक्षम वय 60 ते 70 आहे. आहे की नाही आश्चर्यकारक!त्यांच्यामध्ये सत्तरी पर्यंतच्या लोकांचा नंबर काम करण्याच्या बाबतीत पहिला. त्यानंतर सत्तर ते ऐंशी वयाचे लोक व्यवस्थित कार्यक्षम!त्यानंतर चा नंबर लागतो 50 ते 60 वयाचा. विशेष म्हणजे नोबेल पदक विजेत्यांचे सरासरी आयुर्मान 62 वर्षे दिसून आले आहे. अमेरिकेतल्या मोठाल्या शंभर चर्चेस मध्ये काम करणाऱ्या धर्मोपदेशक यांचे वय तपासले असता बहात्तर वर्षापर्यंत हे लोक व्यवस्थित काम करू शकतात असे आढळून आले. पोपचेसरासरी वय 76 दिसून आले. यावरून एवढाच निष्कर्ष निघू शकतो की परमेश्वर यांनी हे जे शरीर बहाल केले आहे, त्याची सर्वात चांगल्यात चांगली वर्षे कोणती म्हणाले तर साठी पासून सत्तरी पर्यंत!या वयामध्ये आयुष्यातले चांगले तुम्ही मिळवु शकता.

यावरून आपण हे नक्की समजून घेतले पाहिजे ही सगळ्या ज्येष्ठ नागरिकांनो, वाढत्या वयाची चिंता करू नका, योग्य नियोजन करून कार्यरत रहा, अच्छा ही बना, आनंदात रहा. मग संध्याछाया का बर  भिववतील ?याच वयामध्ये आयुष्याचा खरा अर्थ समजलेला असतो, दिशा तर आता ठरलेलीच असते, त्यामुळे मागे अजिबात न वळून बघता पुढे पुढे चालत रहा. या वाटेवर काही झाडे उन्मळून पडणारच, आधारचे हात कमी होणारच, शरीराला_ मनाला वेदना या होणारच.  पण या सर्वांवर मात करून जीवन गाणे गात राहिले पाहिजे.  आकाशातील ढग, पाऊस बरसून आपले पूर्ण आयुष्य रिते करतो, नद्या सतत वहाततेच पाणी किनाऱ्याला देत राहतात, सागर त्याच पाण्याची वाफ करून पुन्हा ढगांना पाणी भरण्याची संधी देतो. झाडे आपले पूर्ण आयुष्य दुसऱ्यांसाठी वेचतात, गोड गोड फळे माझी म्हणून त्यांना खाताना आपण कधी पाहतो का?ही सगळी रंगीत सुवासिक फुले माझेच आहेत असे ते कधी म्हणतात का?दुःखाने टाहो फोडताना, अपयशाने खचून जाताना रडत रडत जीवन जगणारी झाडे आपण कधी पाहतो का?मग या सुंदर अश्या निसर्गाकडून आपण हेच शिकूया आणि आपल्याबरोबर इतरांचे आयुष्य ही आनंदी बनवूया. बालपण तरुणपण वृद्धावस्था आपल्याला मिळालेली वरदा नं आहेत.  त्या त्या वयात, त्या त्या क्षणात, त्यांचा आनंद मिळवू या मग कुठल्याही वयामध्ये आपल्या ओठी याच येतील

“जीवनात ही घडी

© सौ. अंजली गोखले

मो ८४८२९३९०११

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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