मराठी साहित्य – सूर संगत ☆ सूर संगीत – राग यमन ☆ सुश्री अरुणा मेल्हेरकर

☆ सूर संगत ☆ सूर संगीत – राग यमन ☆ सुश्री अरुणा मेल्हेरकर ☆ 

संगीतापासून दूर रहाणारा अपवादात्मकच कोणी असू शकतो,कारण~~

 

सूर म्हणजे जिव्हाळा

सुख शांतीचा हिंदोळा

 

सुरांतच असते भक्ति

सूर देतात मनास शक्ति

 

सा सर्वांचा सोबती

रे कधी विरह कधी शांती

 

ग ने होतो भावनाविष्कार

म अति कर्ण मधूर

 

प असते विश्रान्ती

धने येते संगीतसागरास भरती

 

नि नाजूक कोमलांगी ललना

सप्तसूर देती आल्हादच जीवना

 

सुरांच्या या प्रकृतीवर हिंदुस्तानी /कर्नाटकी राग संगीत आधारलेले आहे.

सा रे ग म प ध नी ह्या एका सप्तकाच्या २२ श्रुति आहेत. साच्या ४, रेच्या ३, गच्या २, मच्या ४, पच्या ४,धच्या ३, निच्या २. अशा या २२ श्रुति.

हेच सुरांतील नाद होत. ह्या २२ नादांतून शुद्ध व विकृत अशी स्वर निर्मिती शास्रकारांनी केली आणि आजतागायत हे शास्र सर्वमान्य आहे.

अशारीतिने ७ शुद्ध आणि कोमल रे ग ध नि व तीव्र म हे ५ विकृत स्वर, अशा एकूण १२ स्वरांवर संपूर्ण जगतात संगीत विराजमान आहे.

वेदकालापासून संगीत हे शास्र मानलेले आहे. सामवेद हा संगीत विषयावरील वेद आहे. भरतमुनींनी त्यांच्या नाट्यशास्रांत संगीताविषयीचे नियम सांगितले आहेत. २०/२१ व्या शतकांत राग संगीत थोडे थोडे बदलत गेले असले तरी मुख्य पाया अढळच आहे. पं.कुमार गंधर्व, संगीत मार्तंड जसराजजी यांच्यासारख्या कलावंतांनी अनेक नवीन रागांची नीर्मिती केली असली तरी आजही संगीताच्या नवशिक्या विद्यार्थ्यांस यमन,भूप,भैरव काफी हेच पारंपारिक राग प्रथम शिकविले जातात.

या लेखमालेत एका रागाची ओळख करून द्यावयाची आहे म्हणून मी माझा आत्यंतिक आवडीचा प्रारंभिक राग यमनची निवड केली आहे.

यमन हा संपूर्ण राग आहे.म्हणजे या रागांत सा ते नि ह्या सातही स्वरांचा समावेश आहे. यांतील मध्यम(म) मात्र तीव्र आहे. म्हणून हा कल्याण थाटांतील राग.

सा रे ग म (तीव्र)प ध नी सां~आरोह

सां नी ध प म(तीव्र) ग रे सा~अवरोह

नि(मंद्र)रे ग रे सा, प,म(तीव्र) ग, रे, सा~पकड

म्हणजे रागाचे स्वरूप दाखविणारा स्वर समूह.

ग(गंधार),नि(निषाद) अनुक्रमे वादी व संवादी स्वर.

हा राग प्रामुख्याने रात्रीच्या प्रथम प्रहरी गायला/वाजविला जातो.

असे म्हणतात की हा राग चांगला घोटला गेल्यानंतर बाकीचे इतर राग शिकणे सोपे जाते.

येरी आली पियाबिन, तोरी रे बासुरिया, मोरी गगरी ना भरन दे, अवगुण न कीजिये गुनिसन

या पारंंपारिक बंदिशी आजही गायल्या जातात, त्या कर्णमधूरही वाटतात. गायक आपल्या कुवतीनुसार रागांत रंग भरत असतो व रागाचे नवनवे पैलू श्रोत्यांस उलगडून दाखवित असतो.

राग संगीताची हीच तर खासियत आहे.कोणत्याही नियमांचे उल्लंघन न करतां त्याला आपले गानचातूर्य दाखवून रसिकांचे मन जिंकायचे असते.

नाट्यसंगीत हा राग संगीताशी निगडीत उपशास्रीय गायन प्रकार आहे. बाल गंधर्वांनी अजरामर केलेल्या नाट्यपदांची गोडी केवळ अवीट आहे. स्वयंवरातील नाथ हा माझा मोही खला, मानापमानांतील नयने लाजवित,कुलवधू नाटकांतील क्षण आला भाग्याचा,सौभद्रातील राधाधर मधुमिलिंद जयजय, किंवा अगदी अलिकडचे देवाघरचे ज्ञात कुणाला ही पदे यमन,यमन कल्याण रागांतीलच आहेत.

आपले सर्वांचे लाडके गायक/संगीत दिग्दर्शक कै.सुधीर फडके उर्फ बाबूजी यांची तर बहुतांशी गाणी यमन रागांत अथवा त्यावर आधारित आढळतात. समाधी साधन हा तुकारामाचा अभंग आणि का रे दुरावा हे भावगीत, दोन्ही यमन मध्येच परंतु संगीत रचना करतांना त्या त्या काव्यातील भावनाविष्कारानुसार बाबूजींनी स्वरसमूहांचे नियोजन केल्यामुळे एकाच रागातील दोन गाणी कानाला वेगळी वाटतात.

हे त्यांचे चातूर्य आहे. हीच सुरांची जादू आहे.यमनमधील एक तीव्र म ही सगळी करामत करतो.

या रागाचा अभ्यास करतांना असे लक्षांत येते की भक्ती आणि शांत रसाबरोबर श्रृंगार रसालाही हा राग पोषक आहे.

ज्यांना संगीताची जाण नाही परंतु खूप आवड आहे त्यांना हा लेख वाचून यमन राग ऐकतांना त्याचा अधिक आनंद मिळेल अशी आशा वाटते.

 

©  सुश्री अरूणा मुल्हेरकर

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (32) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

(कर्मों के होने में सांख्यसिद्धांत का कथन)

(तीनों गुणों के अनुसार ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुख के पृथक-पृथक भेद)

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता।

सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी॥

 

जो अज्ञानी अधर्म को ,भी कहते हैं धर्म

वह है तामस बुद्धि जो ,करती उलटा अर्थ।।32।।

 

भावार्थ :  हे अर्जुन! जो तमोगुण से घिरी हुई बुद्धि अधर्म को भी ‘यह धर्म है’ ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य संपूर्ण पदार्थों को भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्धि तामसी है॥32॥

  1. That which,  enveloped  in  darkness,  views  Adharma  as  Dharma  and  all  things

perverted-that intellect, O Arjuna, is called Tamasic!

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सुरभि तुम्हारी यादों की ☆ डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया

डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया

( ई – अभिव्यक्ति में डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया जी का हार्दिक स्वागत है। बहुमुखी प्रतिभा के धनी डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया जी ने चिकित्सा सेवाओं के अतिरिक्त साहित्यिक सेवाओं में विशिष्ट योगदान दिया है। अब तक आपकी नौ काव्य  कृतियां  प्रकाशित हो चुकी हैं एवं तीन  प्रकाशनाधीन हैं। चिकित्सा एवं साहित्य के क्षेत्र में कई विशिष्ट पदों पर सुशोभित तथा  शताधिक पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया जी  से हम अपने प्रबुद्ध पाठकों के लिए उनके साहित्य की अपेक्षा करते हैं। आज प्रस्तुत है उनका एक अतिसुन्दर भावप्रवण गीत  सुरभि तुम्हारी यादों की । )

☆ सुरभि तुम्हारी यादों की ☆

इक किरण नेह की इस मन के, आँगन में सदा चमकती है।

इक सुरभि तुम्हारी यादों की, तन-मन में सदा महकती है।।

 

यह विरह मिला जबसे हमको, तब से हम और अधीर हुये।

हो गयीं कामनाएँ जोगन, सब सपने संत कबीर हुये।

यह पीर हमारी गूँगी सी, मन ही मन सदा सिसकती है।।

 

ये गीत प्रेम की पूजा के, अभिशापित रोली चन्दन हैं।

मन के मंदिर की चौखट पर, ये अनदेखे से वंदन हैं।

यह चोट नहीं दिखती लेकिन, रह-रह कर सदा कसकती है।।

 

इक प्रश्न सहज अपनेपन का, रिश्तों की क्या परिभाषा है।

जो नाम मिला तो सफल हुये, बाकी संत्रास निराशा है।

इक सौन चिरैया पीड़ा की, बेमौसम सदा चहकती है।।

 

मिल सकता नही कहीं पर भी, जो मन के भीतर नही मिला।

जीवन के पनघट पर मन को, चाहत का रीता कलश मिला।

इक प्यास आग सी बनकर के, अधरों पर सदा दहकती है।।

 

इक किरण नेह की इस मन के, आँगन में सदा चमकती है।

इक सुरभि तुम्हारी यादों की, तन-मन में सदा महकती है।।

 

© डॉ श्याम मनोहर सीरोठिया

“श्री रघु गंगा” सदन,  जिया माँ पुरम फेस 2,  मेडिकल कालेज रोड सागर (म. प्र.)470002

मोबाईल:  9425635686,  8319605362

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ विसंगति ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ विसंगति

आनंद बाँटने का

मुझ पर

अभियोग चला,

पीड़ा बेचने वाले ने

मेरा मुकदमा सुना।

©  संजय भारद्वाज 

दोपहर 12:19 बजे, 26.10.20

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य #78 ☆ कविता – अनुस्वार ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी की एक भावप्रवण कविता अनुस्वार  ।  इस विचारणीय  कविता  के लिए श्री विवेक रंजन जी  का  हार्दिकआभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 78 ☆

☆ कविता अनुस्वार ☆

चंचला हो

नाक से उच्चारी जाती

मेरी नाक ही तो

हो तुम .

माथे पर सजी तुम्हारी

बिंदी बना देती है

तुम्हें धीर गंभीर .

पंचाक्षरो के

नियमों में बंधी

मेरी गंगा हो तुम

अनुस्वार सी .

लगाकर तुममें डुबकी

पवित्रता का बोध

होता है मुझे .

और

मैं उत्श्रंखल

मूँछ मरोड़ू

ताँक झाँक करता

नाक से कम

ज्यादा मुँह से

बकबक

बोला जाने वाला

ढ़ीठ अनुनासिक सा.

हंसिनी हो तुम

मैं हँसी में

उड़ा दिया गया

काँव काँव करता

कौए सा .

पर तुमने ही

माँ बनकर

मुझे दी है

पुरुषत्व की पूर्णता .

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 69 – कारण ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक लघुकथा  “ कारण। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 69 ☆

☆ कारण ☆

 “लाइए मैडम ! और क्या करना है ?” सीमा ने ऑनलाइन पढ़ाई का शिक्षा रजिस्टर पूरा करते हुए पूछा तो अनीता ने कहा, “अब घर चलते हैं । आज का काम हो गया है।”

इस पर सीमा मुँह बना कर बोली, ” घर !  वहाँ  चल कर क्या करेंगे? यही स्कूल में बैठते हैं दो-तीन घंटे।”

“मगर, कोरोना की वजह से स्कूल बंद  है !” अनीता ने कहा, ”  यहां बैठ कर भी क्या करेंगे ?”

“दुखसुख की बातें करेंगे । और क्या ?”  सीमा बोली, ” बच्चों को कुछ सिखाना होगा तो वह सिखाएंगे । मोबाइल पर कुछ देखेंगे ।”

“मगर मुझे तो घर पर बहुत काम है,”  अनीता ने कहा, ” वैसे भी ‘हमारा घर हमारा विद्यालय’ का आज का सारा काम हो चुका है।  मगर सीमा तैयार नहीं हुई, ” नहीं यार। मैं पांच बजे तक ही यही रुकुँगी।”

अनीता को गाड़ी चलाना नहीं आता था। मजबूरी में उसे गांव के स्कूल में रुकना पड़ा। तब उसने कुरेद कुरेद कर सीमा से पूछा, “तुम्हें घर जाने की इच्छा क्यों नहीं होती ?  जब कि  तुम बहुत अच्छा काम करती हो ?” अनीता ने कहा।

उस की प्यार भरी बातें सुनकर सीमा की आँख से आँसू निकल गए, “घर जा कर सास की जली कटी बातें सुनने से अच्छा है यहाँ सुकून के दो चार घंटे बिता लिए जाए,” कह कर सीमा ने प्रसन्नता की लम्बी साँस खींची और मोबाइल देखने लगी।

~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

22-08-20

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) म प्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 39 ☆ सॉरी का चलन ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “सॉरी का चलन ”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 39 – सॉरी का चलन ☆

कुछ लोगों को ये शब्द इतना पसंद आता है, कि वे कामचोरी करने के बाद इसका प्रयोग यत्र-तत्र करते नजर आ जाते हैं। उम्मीदों की गठरी थामकर जब कोई चल पड़ता है, तो सबसे पहले इसी शब्द से उसका पाला पड़ता है। जिसकी ओर भी उम्मीद की नज़र से देखो वो अपना पल्ला झाड़कर,आगे बढ़ जाता है। अब क्या किया जाए कार्य तो निर्धारित समय पर करना ही है, सो बढ़ते चलो, जो मेहनती है, वो अवश्य ही अपने उदेश्य में सफल होगा ।

क्षमा कीजिए का स्थान सॉरी शब्द ने तेजी के साथ हड़प लिया है। सनातन काल से ही क्षमा को वीरों का अस्त्र व आभूषण कहा जाता रहा है। इसका प्रयोग कमजोर लोग नहीं कर पाते हैं, वे क्रोधाग्नि में आजीवन जलकर रह सकते हैं किंतु अपना हृदय विशाल कर किसी को माफ नहीं कर सकते। जैन धर्म में तो क्षमा पर्व का आयोजन किया जाता है। जिसमें वे एक दूसरे से हाथों को जोड़कर अपनी जानी – अनजानी गलतियों के प्रति प्रायश्चित करते हुए दिखते हैं।

अच्छा ही है, अपनी पुरानी भूलों को भूलकर आगे बढ़ना ही तो सफल जिंदगी का पहला उसूल होता  है। पापों को धोने की परंपरा तो अनादिकाल से चली आ रही है। पवित्र नदियों में डुबकी लगाकर हम यही तो करते चले आ रहे हैं।

क्षमा की बात हो और महात्मा गांधी जी का नाम न आये ये तो बिल्कुल उचित नहीं है। जिनका मन सच्चा होता है वे किसी के प्रति भी कोई दुराग्रह नहीं रखते हैं। हो सकता है किसी व्यस्तता के चलते आज उन्होंने सॉरी कहा हो पर जैसे ही अच्छे दिनों की दस्तक होगी अवश्य ही हाँ कहेंगे, “अरे भई मेरी ओर भी निहारा कीजिए, हम भी लाइन में खड़े होकर कब से दस्तक दे रहे हैं।”

समय पर समय का साथ भले ही छूट जाए पर ये शब्द कभी नहीं छूटना चाहिए। आज वो सॉरी कह रहे हैं कल  सफ़लता हासिल करने के बाद आप भी इसे बोल सकते हैं। जिस तरह ब्रह्मांड में ऊर्जा घूमती रहती है, कभी नष्ट नहीं होती, ठीक वैसे ही ये शब्द  व्यक्ति, स्थान, भाव, उदेश्य को बदलता हुआ इस मुख से उस मुख तक चहलकदमी करता रहता है। लोगों को तो अब इसका अभ्यास हो चुका है। बात- बात पर सॉरी कहा औरआगे बढ़ चले।

बस कहते – सुनते हुए आगे बढ़ते रहें यही हम सबका मुख्य लक्ष्य होना चाहिए।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 46 ☆ राष्ट्र अस्मिता ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  “राष्ट्र अस्मिता .)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 46 ☆

☆ राष्ट्र अस्मिता  ☆ 

भारतवासी भूल न जाना

राष्ट्र अस्मिता के हमले

घायल ये इतिहास पड़ा है

बन्द करो घातक जुमले।।

 

ऊँच- नीच और भेदभाव में

लुटे-पिटे हो तुम सारे

गलती पर गलती करते हो

जागो- जागो अब प्यारे

भूल न जाना क्रूर सिकंदर

भूल न जाना गजनी को

भूल न जाना तुगलक, गौरी

भूल न जाना मदनी को

 

ऐक्य बनाकर चलो सँभलकर

याद करो घाती पिछले।।

 

बाबर को तुम भूल न जाना

उसके रौरव जुल्मों को

मंदिर ढाए, बुर्ज बनाए

देखो सारे उल्मों को

भूल ना जाना नादिरशाह के

खूनी  रक्तापातों को

जुल्म न भूलें औरँगजेबी

शाहजहाँ की घातों को

 

अकबर के भी जुल्म न भूलो

फिर बन जाओगे पुतले।।

 

आसफ खां को भूल न जाना

मत भूलो शाह सूरी को

नहीं बाजबा खान को भूलो

मत भूलो अजमूरी को

देश को लूटा सब मुगलों ने

जमकर ही विनाश किया

अहंकार और जातिवाद ने

भारत सत्यानास किया

 

माटी की सब लाज बचाओ

याद करो कैसे कुचले।।

 

भूल न जाना तुम गोरों को

कैसे कत्लेआम किए

भाई- भाई खूब लड़ाए

सत्ता अपने नाम किए

भूल न जाना डलहौजी को

जिसने गोली प्रहार किए

नहीं भूलना डायर को भी

मानव नरसंहार किए

 

निर्दोषों का खून न भूलें

भूलों से भी ना पिघले।।

 

लूटा जमकर सभी खजाना

देश मेरा कंगाल किया

छोटे से इंग्लैंड ने खुद को

जमकर मालामाल किया

देश बाँटकर, लूटपाट कर

वैभव अपना बढ़ा लिया

मैकाले शिक्षा पद्धति से

नया बवंडर खड़ा किया

 

काले अंग्रेजो जागो

करो न नहले पर दहले।।

 

आजादी के बाद देखता

भारत की तस्वीर को

क्या सपने थे बलिदानी के

भूल गए सब पीर को

स्वारथ में सब लीन हो गए

छोड़ें अपने तीर को

श्रद्धांजलियाँ अर्पित कर दो

अनगिन भगत सुवीर को

 

भूल न जाओ शहादतों को

कुछ बन जाओ तुम उजले।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ आंदण ☆ श्री प्रकाश लावंड

☆ कवितेचा उत्सव ☆ आंदण ☆ श्री प्रकाश लावंड ☆ 

काढू नको उणेदुणे

नको अनावर त्रागा

पाल इथलं उठलं

शोध दुसरी जागा

 

एक हात सुटता

का तुझा जीव कुढे ?

तुला आधार द्यायला

दहा हात येतील पुढे

 

टाक गाडून इथेच

इथल्या आठवणी

फेक चावऱ्या वहाणा

चाल गड्या अनवाणी

 

तुझ्या दुखऱ्या पावलांना

जडो मखमली कोंदण

विधात्याने दिलीय तुला

सारी पृथ्वीच आंदण

 

© श्री प्रकाश लावंड

करमाळा जि.सोलापूर.

मोबा 9021497977

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ बोध कथा – धूर्त मंत्रिपुत्र ☆ अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी

☆ जीवनरंग ☆ बोध कथा – धूर्त मंत्रिपुत्र ☆ अनुवाद – अरुंधती अजित कुळकर्णी ☆ 

||कथासरिता||

(मूळ –‘कथाशतकम्’  संस्कृत कथासंग्रह)

? बोध कथा?

कथा ४. धूर्त मंत्रिपुत्र

अयोध्या नगरीत एक राजा होता. त्याला फुलांचे भयंकर वेड होते. त्याने त्याला आवडणाऱ्या विविध प्रकारच्या फुलांचे एक ‘पुष्पउद्यान’ तयार करून घेतले होते. तो आपलं विश्रांतीचा काळ त्या पुष्पोद्यानातच घावलीत असे व भरपूर आनंद उपभोगीत असे.

राजाचा एक मंत्री होता. त्याचा एक पुत्र दररोज त्या उद्यानात जाऊन फुले चोरीत असे. त्यामुळे त्या उद्यानातील बरीचशी फुले नष्ट झाली होती. हे लक्षात येताच राजाने माळ्याला बोलावून “माझ्या उद्यानात उमललेली फुले कोणीतरी चोरून नेत आहे. तेव्हा तू पहारा ठेवून त्या चोराला पकडून आण” असा आदेश दिला. आदेशानुसार माळ्याने जागता पहारा ठेवला. तेव्हा मंत्रिपुत्र फुले तोडतोय हे पाहून त्याला तत्काळ फुलांसह पकडून पालखीत बसवून नगरीत नेले.

त्यावेळी तो मंत्री नगरद्वाराजवळच होता. त्याला पाहून माळी म्हणाला, “तुझा हा पुत्र पुष्पोद्द्यानात फुले चोरत होता. त्याला आम्ही राजाजवळ नेत आहोत. तेव्हा याला राजगृही जाऊन सोडविण्याचा प्रयत्न करू नकोस.” हे ऐकून मंत्री त्याच्याकडे बघून “जर जगायचं असेल तर तोंड आहे. तुम्ही जा” असे मोठ्याने बोलला.

मंत्र्याचे हे शब्द ऐकून व त्याचा अभिप्राय लक्षात घेऊन मंत्रिपुत्राने स्वतःजवळ असलेली सगळी फुले खाऊन टाकली. नंतर राजाजवळ गेल्यावर राजाने “तू फुले का तोडलीस?” असे विचारताच मंत्रिपुत्र म्हणाला, “महाराज, मी आपले उद्यान बघण्यासाठी गेलो होतो. तिथे फुले तोडण्यासाठी नाही. मला ह्या माळ्याने अन्यायाने व जबरदस्तीने पकडले आहे.”

मंत्रिपुत्राजवळ फुले मिळाली नाहीत. तेव्हा माळ्याने मंत्रिपुत्राला अन्यायाने व जबरदस्तीनेच पकडले आहे असे निश्चित ठरवून राजाने माळ्यालाच दंड केला व मंत्रिपुत्राला सोडून दिले.

तात्पर्य – बुद्धिमान लोक ओढवणाऱ्या संकटाचा विचारपूर्वक सामना करतात.

 

अनुवाद – © अरुंधती अजित कुळकर्णी

कथासरिता उपक्रम साहित्य कट्टा,संयोजन- डॉ. नयना कासखेडीकर

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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