हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६५ – आलेख ☆ ~ धरती की वेदना ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६५ ☆

☆ आलेख ☆ ~ धरती की वेदना ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(भीषण त्रासदी के कारक )

आसमान से उतर रहे देवताओं को देखकर धरती माँ चिल्लाई,

नहीं नही…भाई अभी इसकी जरूरत नहीं है l अभी मुझ पर उतना अत्याचार नहीं है जितना कहा जा रहा है l अभी भी मै अनेकानेक, नेक इंसानों को लोंगो की मदद करते देख रही हूँ। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है l बस पीड़ा एक बात की है कि क्या सड़क, क्या बाजार, क्या स्कूल, क्या अस्पताल सब धक्कम – रेल हो रही है,

 मैं हिलती जा रही हूँ

मै बुरी तरह से काँप रही हूँ

आने वाले खतरे को भाँप रही हूँ

कॉलोनी में गाड़ियों का रेला, रेल बनता जा रहा है। मोहल्ले की लड़ाई, किचन बर्तन से उतरकर, गाड़ियों की पार्किंग तक चली आयी है। रोडवेज की एक बस निकली नहीं कि दूसरी भर जा रही है। जहाँ देखो भीड़ ही भीड़।

राशन की लाइन में भीड़,

मॉल- वाटर पार्क में भींड,

ऑफिस दफ्तरों की भींड,

रोडवेज रेलवे स्टेशनो में भींड,

शेर सपाटा-तीर्थ यात्रा करने वालों की भीड़

टूरिस्ट हैं या तथाकथित तीर्थ यात्रियों

मै नही जानता लेकिन लगी हुई है भीड़,

भीड़ ही भीड़, भीड़ इतनी कि मैं खुद अपनी नीड ढूढ़ रही हूँ। रोज बा रोज नए-नए अस्पतालों के खुलने के बावजूद भी अस्पतालों में भीड़ ही भीड़ है। ओ.पी.डी. से ओ.टी. तक की भीड़, एक्स रे -अल्ट्रासाउंड सेंटर की भीड़, पैथोलॉजी में खून निकलवाने वालों की भीड़, अस्पताल के अगल बगल खून चूसने वाले दलालों की भीड़।

इतना ही नहीं टूरिज्म की आड़ में सभी जा रहे हैं झुंड के झुंड पहाड़ों पर। वहाँ भी अब शांति नहीं, क्योंकि ये सारे पदयात्री नहीं।

गाड़ी, घोड़ा, मोटर बग्गी सब कुछ लेकर जाना है। इन लोगों के सुख सुविधा में कोई कमी न हो, वोट बैंक बरकरार रहे इसलिए विकास की आड़ में, काटते चले जा रहे हैं पहाड़ों को। बना रहे हैं रोज एक से एक बड़ी सड़के। मेरे पहाड़ों को तोड़ने के लिए जब आती है इनकी भारी भरकम मशीने, तब शांत पहाड़ चिघाड़ उठते हैं। रोने लगती है उनकी आत्माएं। काट -काट कर गिरा देते हैं देवदार और चीड़ के वृक्षो को। ये वृक्ष जो कि जकड़े रहते हैं अपनी जड़ों से इन पहाड़ों को। पहाड़ों पर पहुंचकर बनाते हैं आलीशान होटल। पहुँच जाती है ढेर सारी गाड़ियाँ। इनके धुओं से बढ़ जाता है यहाँ का टेंपरेचर। टूट के गिर पड़ते हैं, विशाल और विशाल ग्लेशियर। टूट जाती है प्रकृति की बनाई हुई झील की दीवारें और बहता हुआ निकल पड़ता है जानलेवा शैलाब। तब होती केदारनाथ और नेपाल जैसी भीषण त्रासदी

मारी जाती है ढेर सारी मानवता। अनाथ हो जाते हैं छोटे-छोटे बच्चे, बेसहारा हो जाते हैं बुजुर्ग माँ बाप।

यह सब देखकर मैं हिल उठती हूँ। फूट फूट कर रोती हूँ। आखिर मै करूँ तो क्या करूँ, ये तो मानते नहीं है।

पर यह सब होता ही भी है इन्हीं के कारण। इन लोगों ने तो एकदम हलचल बचा कर रख दी है। क्या धरती क्या आसमान, सब जगह भीड़ बेकाबू है, इनकी मनमानी जारी है। एक दिन आसमान भी मुझे रो कर कह रहा था कि तेरे बेटों ने यहां भी गंदगी बचा कर रख दी है। ढेर सारे रॉकेट, ढेर सारे उपग्रह क्या बोलते हैं, सैटेलाइट.. मेरे स्वच्छ शांत नीले आँगन में छोड़ रखा है l मैं बिलख रही हूँ। वायुयानों की तो बात ही छोड़ो, ये लाखों फतिंगो की तरह से इधर से उधर फुदक कर रहे हैं l इन्होने मेरा जीवन हराम कर दिया है।

हे देवगण ! मैं सिर्फ अपने बच्चों को बड़े प्यार से अपने गोद में पालना चाहती हूँ, और पालती भी हूँ। लेकिन इनके लिए शेष कार्य तो आप लोग ही करते हो l आप में से कोई धन के देवता हो, कोई ऐश्वर्या और यश के देवता हो, कोई जल के देवता हो, कोई ऊर्जा के देवता हो, कोई बुद्धि विवेक के देवता हो तो बस इतनी दया करो इन्हें इन्हे धन -दौलत सबकुछ दो पर बुद्धि विवेक कुछ ज्यादा ही दो, कि मेरे संकट में पड़े प्राण बच सके।

है देवगण ! मेरी पीड़ा के दो बड़े मूल कारण है, जो मुझे पीड़ित कर रहे हैं, मैं इसी विषय पर सोचती रहती हूं और आपसे कहती हूँ..

आप लोग मेरे इन पुत्रों से कहो कि-

‌ये लोग बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण रखें।

‌प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण करें।

अगर ये लोग आपकी बात मानकर ऐसा करते हैं तब जाकर मेरी खुशी वापस लौटेगी.

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – झुर्रियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – झुर्रियाँ? ?

देखता, समझता, पढ़ता हूँ

दहलीज़ तक आ पहुँची झुर्रियाँ,

घर के किसी रैक पर

कभी सलीके से धरी,

कभी तितर-बितर पड़ी

तो कभी फटे टुकड़ों में सिमटी,

बासी अख़बार की तरह उपेक्षित झुर्रियाँ..,

गुमान में जीते

नये अख़बारों को पता ही नहीं

कि ख़बरें अमूमन वही रहती हैं,

बस संदर्भ ताज़ा होते हैं और

तारीख़ें बदलती रहती हैं,

और हाँ, दिन, हर दिन ढलता है,

हर दिन नया अख़बार भी निकलता है!

?

© संजय भारद्वाज   

प्रात: 8:33 बजे, 24.8.2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग – ४६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – पग-पग नर्मदा यात्रा – भाग- ४६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

7.पग-पग नर्मदा यात्रा

नर्मदा परिक्रमा:दूसरा चरण

पिपरहा से सतधारा 14 नवम्बर 2019

पिपरहा में नर्मदा का एक रेतीला किनारा है। आश्रम व्यवस्था बहुत अच्छी है रात को स्वामी जी के सेवक ने स्वादिष्ट खिचड़ी खिलाई। रास्ते में गन्ने और तुअर की खड़ी फ़सल के अलावा कुछ न दिखता था। गुड़ की चरखी सक्रिय होने लगीं। तीन बड़े कड़ाह लाइन से बनाए, उनके नीचे आग जलाने हेतु ख़ाली जगह आगे तक चली गई है, आख़िर में धुँआ निकलने की चिमनी है जिनसे धुँआ निकल रहा था। पूरे भारत में करेली मंडी का गुड़ मशहूर है। गुड़ की दो और मंडी श्रीधाम और नरसिंहपुर में चालु हो गईं हैं। मंडी में किसान का गुड़ तीस-पेंतीस रुपए किलो बिकता है वह लोगों तक पहुँचते-पहुँचते सौ रुपए किलो हो जाता है। एक सहयात्री मुंशीलाल भाई  ने एक किलो गुड़ और एक किलो तुअर दाल ख़रीदी, दूसरे जगमोहन भाई ने बीज रहित हल्के हरे रंग के भटे लेकर पिट्ठु बेग में रख लिए।

रास्ते में बहुत से परिक्रमा वासी मिले वे सब के सब कहार, ढीमर, नाई, विश्वकर्मा या पिछड़े वर्ग के थे। कोई भी ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रि, ठाकुर यहाँ तक कि कोई लोधी परिक्रमा शुरू करता या यात्रा करता नहीं मिला। परिक्रमा किसी मन्नत या जन्नत की कामना से की जाती है इसलिए नर्मदा के प्रति अगाध आस्था उनका अवलंबन होता है, उनकी  प्रेरणा होती है। वे लट्ठा कपड़े की दो आधी लुंग्गी, दो आधी बाँह के कुर्ते के साथ उसी कपड़े से सिला दो तरफ़ा लटकन झोला काँधे पर लटकाते हैं, जिसमें दो शीशियों में नर्मदा जल और पूजा का सामान रखा रहता है। एक लोटा और गिलास होना ज़रूरी होता है। हाथ में एक छड़ी जिसे वे सुखनाथ कहते हैं उनका आभूषण है। कई नंगे पैर, कुछ चप्पल और कुछ प्लास्टिक जूते पहने मिले।

नर्मदा की छाती को छलनी करते रेत माफ़िया के कारिंदे दिखे उनसे बातें करने पर रेत माफ़िया कारोबार समझ आया। बीच नदी से रेत निकालने वाले को 250 रुपए, नाव से डंपर में भरने वाले को 200 रुपए मिलते हैं।  एक डंपर के माफ़िया किंग को बाज़ार से 5000 रुपए मिलते हैं। 450 की लागत में 350 का डीज़ल जोड़ लें तो 4200 रुपयों का लाभ एक डंपर पर होता है। ऐसे पाँच फेरों पर 21000 रोज़ाना का धंधा है। पकड़े जाने का कोई डर नहीं क्योंकि पूरा काम दूसरों से कराया जाता है। यदि कारिंदे पकड़े भी गए तो पुलिस, प्रशासन, नेता विधायक किसी को गवाह नहीं बनने देते, कोई अड़ा तो उसकी लाश नर्मदा जी की भेंट चढ़ जाती है, अब प्रेस के लोग भी सक्रिय भागीदार हैं। इस महान देशभक्ति पूर्ण राष्ट्रवाद में दोनों राजनैतिक दलों के नेताओं और कार्यकर्ताओं में आपसी समझ से मिलीभगत विकसित होकर एक तंत्र का रूप ले चुकी है। नेता, पुलिस, अधिकारी, मिडिया इन सभी के परिजन, चंगु-मंगू सरकारी ठेकेदार या बिल्डर-कालोनाइजर्स, इन सभी को मुफ्त के भाव की रेत-गिट्टी-पत्थर-लकड़ी-जमीन मिलती है। इन दबंगों पर हाथ डालने की हिम्मत कौन करे, जो करे वो पिटे, मंत्री का दर्जा प्राप्त कम्प्यूटर बाबा भी नाकाम हैं। छोटी नदियों की बर्बादी के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। चम्बल इलाके में ठाकुर मूंछ पर ताव देकर चम्बल में उत्खनन कर रहे हैं, सालों से रोकने की घोषणाएं हो रही हैं लेकिन होता कुछ नहीं, जो रोकने की हिमाकत करता है उस पर ट्राली चढ़ा दी जाती है। कई पुलिस, सरकारी अधिकारी जान गँवा चुके हैं। सभी नदियों की यही दुर्दशा है। स्वार्थ में अंधे लोग धरती माँ की छाती का सारा दूध निचोड़ कर उसे मरने के लिए छोड़ देंगे। स्थिति वाकई भयावह हैl गर्मियों में जगह जगह नर्मदा जी का प्रवाह रुक जाता है।  बरगी डेम से अमावस्या/पूर्णिमा पर स्नान के लिए पानी छोड़ा जाता हैl अत्यधिक उत्खनन के कारण नर्मदा जी की जल धारण क्षमता कम हो गई है। सहायक नदियों का बारिश के बाद सूख जाना, जंगल की अत्यधिक कटाई जैसे कारक इसके लिए प्रमुख रूप से जिम्मेदार है।

शेर नदी अब तक नरसिंघपुर करकबेल के बीच ट्रेन से घरघराते हुए देखी थी जो लखनादौन के दक्षिणी पूर्वी जंगल में बटका से निकलती है हर्रई जागीर का घेर लगाकर नर्मदा से मिलने नीचे भागती है। रातीकटार गाँव के निकट नर्मदा में मिलती है। उसे नज़दीक से देखा, शेर नदी को नाव से पार किया। जहाँ मिलन होता है वहाँ ऐसा लगा मानो नर्मदा भी उत्तरी तट से दौड़कर शेर को गले लगाने भागती आई है, प्रेम की गहराई का नाप नहीं होता। नर्मदा-शेर मिलन स्थल का संगम बहुत गहरा था। वहाँ से बरमान राजमार्ग पुल दिखने लगा तो यात्रियों में ऊर्जा का संचार होकर क़दम तेज़ हो गए और बारह किलोमीटर की रुकरूक कर यात्रा पाँच घंटों में पूरी करके तीन बजे सतधारा पहुँच गए। जब सारे साथी नहाकर पूजा कर रहे थे, मन-मस्तिष्क में कुछ ऐसे  विचार उभर आए।

हमारा धर्म हमें समग्रता में प्रकृति के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना सिखाता है। वैदिक सभ्यता हमें प्रकृति के चर यथा पृथ्वी, अग्नि, अरुण, वरुण, आकाश और इंद्रियों के रूप में हमारे शरीर में मौजूद इन तत्वों के स्वामी मन स्वरुप इंद्र के प्रति यज्ञों से “तेरा तुझको अर्पण” करना सिखाता है। उपनिषद हमें आत्मा-परमात्मा से मिलाकर आध्यात्मिकता की रहस्यमयी दुनिया की दार्शनिक सैर कराते हैं। षठ दर्शन के निचोड़ स्वरुप वेदान्त दर्शन के आधार पर रचे पुराण जन साधारण को यज्ञों की कठिन दुरुह प्रक्रिया से हटाकर और आध्यात्मिकता की तर्क-वितर्क सघनता से बचाकर आश्चर्य जनक क़िस्से कहानियों के माध्यम से कर्म-अकर्म, धर्म-अधर्म, जन्म-पुनर्जन्म और निष्काम कर्म का अभ्यास कराते हुए वेदों के अरुण, वरुण, अग्नि, पृथ्वी, पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों और नदियों की पूजा का पाठ पढ़ाते हैं। इसीलिए नर्मदा को देवी मानकर पूजना प्रकृति के प्रसाद जल तत्व जो 70% परिमाण में हमारे शरीर में जीवन की नैया खेता है, के प्रति कृतज्ञता प्रकट करना है। वेदों में वर्णित प्रकृति याने प्रथम-कृति के स्वामी रुद्र पुराणों में शिव हो गए हैं। नर्मदा का हरेक कंकड़ शंकर की तरह पूजनीय हो गया। लोकआस्था के पक्ष में इससे बड़ा कौन सा तर्क हो सकता है। नर्मदा के प्रति पूज्य भावना जीवन के प्रति आस्था की प्रतीक है। हिंदू धर्म कृतज्ञता पर टिका है, कृतघ्नता पर नहीं।  सेमेटिक धर्म के अहमन्य कृतघ्न लोगों ने प्रकृति चरों की उपेक्षा से अपने देशों को सुलगते रेगिस्तान बना लिए हैं, भारत अभी भी सुजलाम-सुफलाम है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

संस्थापक सम्पादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४३ – कविता – राखी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “राखी“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ४३ ?

? कविता – राखी… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

रिश्तों की मनभावन तरंग राखियाँ

सावन की पावन उमंग राखियाँ

=2=

लाई है बहना शुभ रिश्तों की डोरी

सजती कलाइयों पे नवरंग राखियाँ

=3=

संकट में जब बहन हो चमत्कार देखिए

बन जाया करती केशरी बजरंग राखियाँ

=4=

बंधन साहस का,जब भी बाँधती बहना

लड़ती हैं फ़िर सरहद पर जंग राखियाँ

=5=

अनमोल अनोखा है ‘ राजेश ‘ये रिश्ता

मधुरिम उत्सव की ये मृदंग राखियाँ

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१७ ☆ मुक्तक – ।।राखी।।रक्षासूत्र।।रक्षाबंधन।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१७ ☆

☆ मुक्तक ।।राखी।।रक्षासूत्र।।रक्षाबंधन।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

=1=

नहीं  खंडित हो कभी   भी, यह भाई बहन का प्यार।

विस्तार तो है अनंत इसका, महिमा भी   अपरम्पार।।

स्नेह – प्रेम का बंधन यह है, नहीं केवल    रक्षासूत्र।

बस एक धागे में पिरो  दिया, वचनबद्धता का संसार।।

=2=

भाई  बहन  के  प्रेम – स्नेह, का प्रतीक है रक्षाबंधन।

एक सूत्र  की   ताकत  का, यह यकीन है रक्षाबंधन।।

सदियों से यही एक  विश्वास, चलता  चला  आया है।

इसी अटूट बंधन की  ही एक, लकीर  है  रक्षाबंधन।।

=3=

एक धागा है राखी पर  बांधा, प्यार अपरम्पार    है।

एक सूत्र में भरा हुआ  वचनों, का  पूरा  संसार  है।।

प्रेम- स्नेह लगाव  का  गर्व  है, यह पर्व रक्षा बंधन।

भाई करता बहन की   सुरक्षा, हर बार लगातार है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १३० -सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर।)  

☆  चुभते तीर # १३० – व्यंग्य  – सोसायटी का जिम और मिश्रा जी की कमर ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

ग्रीन पार्क सोसायटी में नया जिम खुलना किसी साधारण घटना की तरह नहीं था। यह उस मोहल्ले के मध्यवर्गीय सपनों के पंख लगने जैसा था, जहाँ लोग शक्कर की बोरी उठाने में कमर पकड़ लेते थे, लेकिन मुफ़्त के ट्रॉयल के नाम पर पहाड़ चढ़ने को तैयार रहते थे। जिम के उद्घाटन के दिन सोसायटी के सबसे बुजुर्ग और भारी-भरकम सदस्य मिश्रा जी भी टी-शर्ट पहनकर पहुँचे। उनका मुख्य उद्देश्य सेहत बनाना नहीं, बल्कि गुप्ता जी को यह दिखाना था कि साठ की उम्र में भी उनके डोले किसी से कम नहीं हैं।

जिम के ट्रेनर रोहन ने सबको कसरत के नियम समझाने शुरू किए। मिश्रा जी ने ट्रेडमिल पर नज़र दौड़ाई और बोले, “रोहन बेटा, यह मशीन तो मेरे घर के पंखे से भी धीमी चलती है। इसे ज़रा पूरी रफ्तार पर चलाओ।”

रोहन ने मना किया, लेकिन मिश्रा जी की ज़िद्द के आगे किसकी चली है। उन्होंने मशीन पर पैर रखा और रफ्तार बढ़ते ही उनकी टांगें इस तरह भागने लगीं जैसे दफ़्तर में छुट्टी का सायरन बजते ही कर्मचारी घर की तरफ भागते हैं। दो मिनट में मिश्रा जी के माथे से पसीने की धारा ऐसे बही जैसे पहली बारिश में छज्जे से पानी टपकता है।

अचानक ट्रेडमिल से एक कड़क की आवाज़ आई। मिश्रा जी ने पेट पकड़ लिया और ज़मीन पर बैठ गए। पूरा जिम सन्नाटे में डूब गया। लोग भागे-भागे आए। गुप्ता जी ने चुटकी लेते हुए कहा, “कहा था मिश्रा जी, उम्र के हिसाब से चला करो, अब बैठो दो महीने बिस्तर पर।”

मिश्रा जी का चेहरा पीला पड़ चुका था। वे कुछ बोल नहीं पा रहे थे, बस अपनी जेब की तरफ इशारा कर रहे थे। सबको लगा कि मिश्रा जी को दिल का दौरा पड़ा है या कमर की हड्डी खिसक गई है। तुरंत एम्बुलेंस को फोन घुमाया गया। पूरी सोसायटी जमा हो गई। गुप्ता जी मन ही मन अपनी जीत का जश्न मनाने लगे कि अब कम से कम छह महीने मिश्रा जी पार्क में टहलने नहीं आएंगे।

तभी मिश्रा जी ने बहुत मुश्किल से अपनी जेब से अपना हाथ निकाला। उनके हाथ में एक मुड़ा हुआ कागज़ और बीस रुपये का नोट था। उन्होंने हांफते हुए ट्रेनर रोहन को कागज़ थमाया। रोहन ने कागज़ खोलकर पढ़ा, उसमें लिखा था, “ट्रेडमिल के नीचे मेरा तीन साल पुराना छुपाया हुआ बीस का नोट गिर गया था, वही उठाने के चक्कर में पैर फिसल गया। एम्बुलेंस रद्द करो, मुझे सिर्फ एक कड़क चाय पिलाओ।”

सारे लोग हैरान होकर एक-दूसरे का मुंह देखने लगे। गुप्ता जी का मुंह खुला का खुला रह गया। मिश्रा जी तुरंत खड़े हुए, अपनी टी-शर्ट सीधी की और मुस्कुराकर बोले, “सेहत तो बनती रहेगी, लेकिन अपने खून-पसीने की कमाई का बीस रुपया गंवाना हमारी डिक्शनरी में नहीं लिखा।”

पूरे जिम में ठहाके गूंज उठे और सबने मिश्रा जी की इस बेमिसाल फुर्ती और कंजूसी के मेल पर ज़ोरदार तालियां बजाईं।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८० ⇒ वचन, एकवचन बहुवचन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य- “वचन, एकवचन बहुवचन।)

?अभी अभी # १०८० ⇒ व्यंग्य – वचन, एकवचन बहुवचन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

वचन तो वचन होता है, जब किसी को दिया तब वह वचन होता है, किसी महापुरुष ने दिया हुआ वचन भी वचन ही होता है लेकिन यही वचन जब किसी महात्मा के मुख से प्रकट होता है, तो यह प्रवचन हो जाता है। हिंदी व्याकरण में यही एकवचन, बहुवचन भी हो जाता है।

जिस घर में सास और अकेली बहू होती हैं, वहां भी अक्सर प्रवचन तो सास का ही होता है और बहू वचनबद्ध होती है लेकिन जब बहुओं का बहुमत हो जाता है और सास अकेली पड़ जाती है तब बहुओं के वचन सास के प्रवचन पर भारी पड़ जाते हैं।।

हिंदी और अंग्रेजी व्याकरण में काल और वचन को लेकर बड़ी समानता है। हमारी तरह उनके भी तीन ही काल होते हैं। हमारा भूत, उनका past है और हमारा वर्तमान उनका present. जो हमारा भविष्य है, वही उनका future है। वे भी हमारी तरह ही एकवचन यानी singular number और बहुवचन यानी plural number में विश्वास करते हैं। जब कि हमारी देव भाषा संस्कृत का व्याकरण थोड़ा अलग और उन्नत है।

संस्कृत में दो नहीं तीन वचन होते हैं। रामायण के महाराज दशरथ के तीन वचन अलग हैं। यहां संस्कृत में एकवचन और बहुवचन के साथ द्वि वचन भी है। राम: रामौ रामा: प्रथमा।।

जीवन व्याकरण नहीं। व्याकरण दोष भाषा की विकृति है और व्यक्ति दोष चरित्र की विकृति। जब आज का इंसान अपने वचन के प्रति ही सजग और ईमानदार नहीं तो एकवचन और बहुवचन के प्रति कैसे रह सकता है।

हम अपनी आजकल की भाषा में अंग्रेजी शब्दों का धड़ल्ले से प्रयोग कर रहे हैं। कैसे कैसे एकवचन, बहुवचन हो जाते हैं, हमें कुछ भान ही नहीं रहता। लगता है, सरलीकरण से हम सिम्प्लीकरण के रास्ते पर चल निकले हैं। लेबरों की समस्या कोई नई नहीं। रेलवे स्टेशनों की भीड़ का हमारे पास कोई विकल्प नहीं। कारों, ट्रकों और टू व्हीलरों ने ट्रैफिक को जाम कर रखा है।।

मोबाइलों और कंप्यूटरों की दुनिया ने इंसान से उसकी असली जिंदगी छीन ली है। टाकीजों की फिल्में लोग आजकल टेलीविजनों में देखने लगे हैं। लेडिसों और जेंट्सों का पहनावा भी एक जैसा ही होने लगा है। लव मैरिजों की तो जैसे बाढ़ ही लगी हुई है।

वचन तो वचन, कैसे कैसे बहुवचन ! जब से डिजिटलीकरण हुआ है, बैंकों के कस्टमरों में कमी हुई है, पैसों का लेनदेन एटीएमों और पेटीएमों से ही होने लग गया है। महंगाई की मार के कारण लोग मल्टीस्टोरियों में टू BHK और वन BHK के फ्लैटों में रहने लगे हैं। सरकारी स्कूलों के होते हुए महंगे कॉन्वेंट स्कूलों की ओर भाग रहे हैं। जॉब्स का पता नहीं, कॉलेजों में भीड़ बढ़ती जा रही है। बस एक वचन अच्छे दिनों का, सभी टेंशनों को दूर कर देता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ कथा कहानी ☆

☆ लघुकथा – राखी का दीप ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

भैया तुम  कितनी देर में आओगे?”

“आता हूँ जरा बिजी हूं।”

भैया बहुत देर हो गई, अब तो आ जाओ।”

ट्रिन ट्रिन——“

“——–“

ट्रिन ट्रिन——–“

“———-“

अरे तुम क्यों परेशान हो रही हो? तुम्हारा मिनिस्टर भाई विधवा आश्रम की महिलाओं से राखी बँधवाने में व्यस्त होगा न?” पति ने भाई को राखी बाँधने के लिए व्याकुल हो रही अपनी पत्नी से कहा, जो बार-बार भाई को फोन कर रही थी।

दरअसल बात यह है कि हम दोनों साल भर के अंतर वाले बहन-भाई हैं। साथ ही खेल-कूदकर बड़े हुए हैं। चूँकि भाई शुरू में छात्र राजनीति में रहा। कालेज का प्रेसीडेंट रहा, फिर छात्र संगठनों में शामिल होकर पार्टी पोलिटिक्स में चला गया।—और फिर विधायक बनकर मिनिस्टर बन गया, पर भैया ने मुझे वचन दिया था कि चाहे कुछ भी हो जाए, कैसे भी हालात हों, वह मुझसे राखी बँधवाने मेरे पास पहुँच ही जाएँगे। इसीलिए मैं उनका इंतजार कर रही हूँ।”

हाँ तुम्हारा कहना ठीक है पर आज तुम्हारे मिनिस्टर भाई के नगर में अनेक कार्यक्रम हैं,पता नहीं उन्हें किन-किन से राखी बँधवानी है, तो ऐसे में उन्हें यह याद होगा ही नहीं कि उन्हें अपनी सगी छोटी बहन से भी राखी बँधवानी है। पति ने कहा।

नहीं ऐसा नहीं हो सकता, मेरा भाई जरुर आएगा।” बहन ने पूरे भरोसे के साथ कहा।

अच्छा,तुम राखी की थाली सजाकर तैयार कर लो। मैं पता करके और मंत्री जी को लेकर आता हूँ,आखिर शाम हो गई तुम कब तक भूखी रहकर भाई को राखी बाँधने का रास्ता देखोगी?”

तभी टीवी पर न्यूज आती है-हमारे नगर में पधारे समाज कल्याण मंत्री दिन भर विधवा आश्रम,अनाथ आश्रम व लाडली बहनों से राखी बँधवाने के बाद स्थानीय कार्यक्रमों से निवृत्त होने के बाद वापस राजधानी लौट गए हैं।”

 यह न्यूज सुनकर सजी हुई राखी की थाली विलाप करती नजर आई,और जलाया गया दीप एक बार फिर बुझ गया था।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ये अच्छाई ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

☆ कविता ☆

☆ ये अच्छाई ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

सब कुछ छोडा

हमने धीरे धीरे,

पर कमबख्त ये

ये अच्छाई न छूटी हमसे…

 

जमाने ने,

खूब ताने मारे

रूलाया भी खूब

गलत हम न थे फिर भी,

क्यों की ये अच्छाई….

 

आपसे,

दिल से प्यार

किया था हमने

गैर के बाहों में थी आप

पर न टोका हमने

क्यों की अच्छाई…

 

एक बार पूछती

उसे चाहती हूँ मैं

बीच आपके न आता

तासीर है संस्कारो का

क्यों की अच्छाई…

(तासीर = प्रभाव)

 

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पाऊस… + संपादकीय निवेदन – सौ. दीप्ती कुलकर्णी – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ. दीप्ती कुलकर्णी

💐 अ भि नं द न 💐

गाडगीळ मॅनेजमेंट, सांगली आयोजित मराठी काव्य लेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती दीप्ती कुलकर्णी यांच्या काव्य रचनेस उत्तेजनार्थ पुरस्कार मिळाला आहे. ई अभिव्यक्ती मराठी तर्फे श्रीमती दीप्ती कुलकर्णी यांचे मनःपूर्वक अभिनंदन आणि पुढील वाटचालीसाठी शुभेच्छा 💐🖊️

पुरस्कार प्राप्त कविता आज प्रकाशित करत आहोत.

 संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

पुरस्कार प्राप्त कविता

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “पाऊस” ☆ दीप्ती कुलकर्णी ☆

 पाऊस आला, पाऊस आला, घेऊन मृदगंधाला

ग्रीष्मातील त्या उष्ण धरेचा, कणकण संतोषला

जलधारांनी बरसत आलाथेंबातुनी प्रगटला

बळीराजाही पेरायालाशिवारात गुंतला ||||

 *

इंद्रधनुचा मोहक पट तोआकाशी उमटला

बालचमुसह सर्वांसाठीआनंददायी बनला

जलाशयांचा, तरुवेलींचाजीवनदाता ठरला

चिंबही भिजल्या सृष्टीचा तो, सखा जणू भासला ||||

 *

धरतीनेही हिरवा शालुअंगभरी ल्यायला

गवतफुलांचा, फळाफुलांचा, सुगंध साकारला

मातीतुनी या नवकोंबांचाहर्ष दिसू लागला

तनामनाने चाहुल घेताआसमंती विहरला ||||

 *

चातकासही थेंबा घेऊनी, जन्म नवा लाभला

रिमझिम येता जलधारांचा, नाद ही झंकारला

पाऊस आला, पाऊस आला, मोद असा जाहला

नव आशांचा, नव स्वप्नांचा, झुला जणू झुलला ||||

© दीप्ती कुलकर्णी

कोल्हापूर

भ्र. ९५५२४४८४६१

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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