हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # २६ – कविता – धर्म-कर्म… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “धर्म-कर्म“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २६ ?

? कविता – धर्म-कर्म… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

अब न कैन्सिल हो पायेगी

रिटर्न टिकट कन्फर्म है प्यारे

यात्रा का आनन्द उठा लो,

लाइफ का ये मर्म है प्यारे

=2=

दौड़-धूप ऋण गुणा-भाग में

सपने जोड़ – घटाना है

उठा-पटक अप-डाउन तब भी

फ़र्ज़ तेरा सत्कर्म है प्यारे

=3=

इक दिन मिट्टी हो जाना,जीवन का यही तराना है

कभी हवा का शीतल झोंका,कभी जेठ-सा गर्म है प्यारे

=4=

लेखा-जोखा ले सबको,भवसागर पार उतरना है

परहित की पतवार से नैया,खेने में क्या शर्म है प्यारे

=5=

है ज़मीर मूलधन तेरा और क़िरदार तेरी पूँजी

‘राजेश’ मानवता से बढ़कर,नहीं कोई भी धर्म है प्यारे

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९९ ☆ गीत – ।। संकटमोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९९ ☆

☆ गीत ।। संकटमोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

संकटमोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है

संकट मोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है।

प्रभु श्री राम जी के सेवक का नाम हर कारज करता है।।

**

आज हनुमान जयंती पर सब कर रहे हैं पूजा – अर्चन।

सुंदर कांड हनुमान चालीसा का पाठ कर रहा जन-जन।।

हर मंगल शनिवार को उनका प्रसाद हर झोली भरता है।

संकट मोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है।।

**

अतुल बलशाली हनुमान जी ने लंका में आग लगाई।

कोई भी उन जैसा राम भक्त नहीं हो सकता है भाई।।

अंजनीपुत्र मारुतिनंदन संजीवनीबूटी पर्वत ला धरता है।

संकट मोचक हनुमान का स्मरण हर दुःख हरता है।।

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९६२ ⇒ रिश्ते और डोर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रिश्ते और डोर।)

?अभी अभी # ९६२ ⇒ आलेख – रिश्ते और डोर  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

बचपन में हम मुंह से गुब्बारे फुलाते थे, इधर हमारा मुंह फूलता, उधर गुब्बारा फूलता। फूलने और फुलाने की भी एक सीमा होती है, जल्द से हमारा मुंह हटाते, गुब्बारे का मुंह मोड़ मोड़ कर बंद करते, और उसके मुंह पर एक धागा बांध देते। उसे वॉलीबॉल की तरह हवा में उछालते, लेकिन वह बेचारा हवा में टिक ही नहीं पाता। रिश्ते हवा में ऐसे ही नहीं टिकते।

कुछ गुब्बारे गैस के होते थे, वे हवा में भी उड़ते थे, बिना डोर के उड़ते थे। आसमान भी छूने की कोशिश करते, लेकिन हवा निकलते ही, उनकी उड़ान भी हवा हो जाती।।

फिर हमने आकाश में पतंग भी उड़ाई, जब तक डोर हमारे हाथ में रही, पतंग भी हवा में आसमान छूती रही। इधर डोर टूटी, उधर पतंग जमीन पर आ गिरी। बिना डोर के, हमने एक पंछी को आसमान छूते देखा है लेकिन कभी किसी पतंग को बिना डोर के आसमान में उड़ते नहीं देखा।

हमारे रिश्ते भी तो गुब्बारे जैसे ही हैं, थोड़ा प्रेम से मुंह लगाया, और रिश्ता खुशी के मारे फूलने, उछलने कूदने लगता है। कहीं रंग बिरंगी रिश्तों की पतंग आसमान छू रही है, और हम सिर्फ डोर संभाले हुए हैं। रिश्ते हवा में हो, बड़े सुंदर लगते हैं, अगर हवा प्रतिकूल हुई, डोर कमजोर हुई, रिश्ते औंधे मुंह जमीन पर आ गिरते हैं।।

आजकल हमने रिश्तों को गुब्बारों की तरह फुलाना सीख लिया है। बच्चों का जन्मदिन हो, मंगल प्रसंग हो, शिलान्यास, उद्घाटन, लोकार्पण, शादी की सालगिरह और अमृत महोत्सव, हार फूल के साथ गुब्बारों के प्रवेश द्वार, वातावरण को और अधिक रम्य और आकर्षक बना देते हैं। बस गुब्बारों का मुंह बंद हो, वे मुस्कुराहट बिखेरना जानते हैं।

आजकल हमारे रिश्तों की डोर किसके हाथ में है, हमें ही पता नहीं। लगता है आज के रिश्ते भी रिमोट से ही चल रहे हैं। रिमोट से रिश्ते कंट्रोल ही नहीं होते, ऑफ/ऑन भी हो जाते हैं।।

पहले रिश्ते करीबी होते थे, हवा में नहीं होते थे। आप उन्हें छूकर, महसूस कर सकते थे। हमने रिश्तों को बहुत टटोलकर, सहेजकर रखा था कभी। आज रिश्ते, समय की तरह हाथों से फिसलते चले जा रहे हैं, और हम लाचार, असहाय, बस हाथ मलते जा रहे हैं।

पहले, हर रिश्ते पर हमारी नजर रहती थी। पानी के बीच भले ही लकीर खिंच जाए, रिश्तों के बीच लकीर खींचना कहां इतना आसान था। आज उन रिश्तों को किसी की नज़र लग गई है।।

कहां कहां जा बसे हैं आज, कभी हर पल साथ रहने वाले रिश्ते। जिन रिश्तों को हमने आज तक यादों में संजोया है, सपने भले ही रंगीन देखे हों, तब तो तस्वीरें भी श्वेत श्याम ही होती थी। आज दूर के रिश्ते रंगीन कैमरा कैद कर लेता है। गजब की मेमोरी है उसकी, उसका भी अपना मेमोरी कार्ड है।

हमारी मेमोरी आज तक फुल नहीं हुई, सभी यादें, तस्वीरें जीवंत कैद हैं। आज सबके हाथों में कैमरा है और मेमोरी फुल है। कोई चिंता नहीं, पैन ड्राइव है न।।

तस्वीरों के साथ साथ, आप चाहें तो रिश्ते भी डिलीट कर दें। कच्चे धागों के रिश्ते अधिक मजबूत होते थे आज के डिजिटल रिश्तों की तुलना में। यह राखी भी अब ई – राखी हो गई।

दर से दर, डोअर टू डोअर से हमारे रिश्तों की डोर आज बस गुब्बारा बनकर रह गई है। आज फुलाया, कल मुरझाया।

एक सुई की नोक ही काफी है इस रिश्ते की हवा निकालने के लिए।।

बच्चे समझदार हैं। गुब्बारे से खेल भी लेते हैं और उसे फोड़ना भी उनका खेल ही होता है। अभी उनकी उम्र गुब्बारों की उम्र है और हमारी उम्र, एक गुब्बारे जितनी। हमें अभी गुब्बारों से प्यार है, रिश्तों से प्यार है। बिना डोर के भी हम सहेज रहे हैं, प्रेम के रिश्ते, कुछ फूले हुए गुब्बारे, कुछ गुलदस्ते प्यारे प्यारे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६२ ☆ कविता – गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६२

☆ गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

सादी संस्कृति गाँव की एक सरल संसार

बिना दिखावे के जहाँ दिखता हर परिवार ।

लोगों में सच्चाई है आपस में है प्यार

परम्पराओं से पगा संबंध हर व्यवहार।

*

छोटी अटपट बात में हो चाहे तकरार

पर घर का हर व्यक्ति हर घर का रिश्तेदार ।

सबको है सबकी फिकर सब हैं एक समान

परख-पूँछ है, नेह है, भले न हो पहचान।

 *

बड़े सबेरे जागते, सोते होते रात

शाम समय चौपाल में मिलते करते बात ।

 *

हर एक के है झोपड़ी, आँगन, बाड़ी, खेत

जिनमें कटती जिंदगी, पशु-हल – फसल समेत ।

 *

शहर गाँव से भिन्न हैं. रीति-नीति विपरीत

यहाँ कोई अपना नहीं, नहीं किसी से प्रीति ।

 *

शहरों में फुरसत किसे ? हरेक हर समय व्यस्त

घर के द्वारे बन्द नित, सब अपने में मस्त ।

 *

लोगों की आजीविका सर्विस या व्यापार

पड़ोसियों की खबर हित पढ़ते हैं अखबार ।

 *

बिन आँगन के घर बने, चढ़े एक पै एक

मंजिल छूते गगन को पातें खड़ी अनेक ।

 *

भीड़-भाड़ भारी सदा बड़े बड़े बाजार

आने जाने के लिये, हों गाड़ी या कार ।

 *

औपचारिक व्यवहार सब शब्दों का संसार

मन में धन की चाह है केवल धन से प्यार ।

 *

गाँव तरसते शहर को, शहर चाहते गाँव

चमक दमक तो बहुत है, शांति न सुख की छाँव ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “आरसा” ☆ सुश्री शीला पतकी ☆

सुश्री शीला पतकी 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “आरसा” ☆ सुश्री शीला पतकी 

आरसा नसे कुणाचा नव्हता कधीच भाट

 जे सत्य तेच सांगे दावी उगा न थाट

 परी जत्रेत पाहिले मी तो वेगळेच दावी

अन पहावयास त्यातगर्दी अफाट होई

 *

सत्य जाणून सुद्धा हौस खोटे पहाणे

काय माणसाना म्हणावे वेडे म्हणू कि शहाणे

 *

अलिकडेच माणसाना सवयी अशाच जडल्या

सत्यास पाठ मात्र आभास ह्रदयास भिडला

© सुश्री शीला पतकी

माजी मुख्याध्यापिका सेवासदन प्रशाला सोलापूर 

मो 8805850279

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – क्षण सृजनाचा ☆ धटिंगण… (कविता) ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

☆ क्षण सृजनाचा ☆

☆ धटिंगण … (कविता) ☆ सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे 

परवा आणि काल राज्यात अनेक ठिकाणी प्रचंड पाऊस सुरू असल्याच्या बातम्या सतत ऐकू येत होत्या … अनेक ठिकाणी पडत असलेल्या मुसळधार पावसाचे .. कुठे कुठे पडत असलेल्या गारांचे व्हिडीओज व्हाट्सअप वर आणि टी व्ही वरच्या बातम्यांमध्ये सतत बघायला मिळत होते. आमच्या गावातही दुपारभर स्वच्छ असलेलं आकाश दुपारनंतर झाकोळायला लागलं होतं… आणि ते सगळं वातावरण पाहून पावासाच्याही आधी मनात शब्दांची टपटप सुरू झाली … गारा वेचाव्यात तसे घाईघाईने ते शब्द वेचतांना अचानक कागदावर तशीच घाईघाईने उतरली एक कविता .. .. .. ..

☆ धटिंगण … ☆

निळ्याशार त्या आकाशात

अवचित आला ढग काळा

एकटं न येता, सोबतीला 

आणला सगळा गोतावळा .. .. ..

*

पाहून त्याला घाबरले

सगळे ढग पांढरे पांढरे

निवांत मुक्त बागडणारे

क्षणात झाले कावरेबावरे .. .. .. 

*

इथे तिथे जागा शोधून

बसले सगळे लपून

मग आभाळाची निळाईही

बसली मागे दडून .. .. ..

*

यजमान गायब झाले सगळे

पाहुणे काळे चिडले

सैरभैर होऊन आभाळभर

शोधत त्यांना राहिले .. .. ..

*

संताप झाला .. संयम संपला

अन गर्जना सुरु झाल्या

शीर कपाळी तडतडे तशा

विजा तडतडू लागल्या .. .. ..

*

संतापाचे अश्रू अनावर

भान विसरून कोसळले

धटिंगणाने धरेला उगीच

धो धो झोडपून काढले .. .. .. 

©  सुश्री मंजुषा सुनीत मुळे

९८२२८४६७६२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ भगिनी निवेदिता ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

? विविधा ?

☆ भगिनी निवेदिता ☆ शालिनी जोशी

भगिनी निवेदिता

 जी स्वतःचा उल्लेख ‘ रामकृष्ण- विवेकानंद यांची निवेदिता’ असा करत असे, ती स्वामी विवेकानंदांची मानस कन्या म्हणजे मार्गारेट एलिझाबेथ नोबल. यांचा जन्म २८ ऑक्टोबर १८६७ रोजी उत्तर आयर्लंड मध्ये झाला. वडील सॅम्युएल आणि आई मेरी यांचे हे पहिले अपत्य. कुटुंब धार्मिक, सात्विक व सुशील होते. मेरी नोबेलने इतर अनेक धर्मशील स्त्रियांप्रमाणे मनात प्रार्थना केली होती, ‘ ईश्वरा, माझं बाळ सुखरूप जन्माला आलं तर तुला अर्पण करीन’. ती प्रतिज्ञा खरी ठरली. मार्गारेटने आपले जीवन भारतीय समाजाच्या सेवेसाठी अर्पण केले. आपले सद्गुरु विवेकानंद यांचे कडून निवेदिता म्हणजे ‘जीवन समर्पित केले आहे अशी’ हे अभिधान प्राप्त केले.

 मार्गारेट यांचे प्राथमिक शिक्षण मँचेस्टर येथे झाले. वडिलांच्या निधनानंतर लंडन येथे शिक्षिका म्हणून काम करू लागल्या. हसतहसत बालशिक्षण या शिक्षण पद्धतीचा सखोल अभ्यास करून १८९२ मध्ये नव्या शिक्षण पद्धतीने शिक्षण देणारी शाळा सुरू केली. १८९४ मध्ये क्रांतिकारकानी स्थापन केलेल्या सिनफेन या पक्षाचे सदस्यत्व स्विकारले. १८९३ च्या सर्वधर्म परिषदेनंतर विवेकानंदांच्या विचारांचा प्रभाव त्यांच्यावर पडला. १८९६ मध्ये लंडन येथे विवेकानंदांची व्याख्याने त्यांनी ऐकली. त्यांना सद्गुरु मिळाले. स्वामी विवेकानंदांच्या कार्यात भाग घेण्यासाठी १८९८ मध्ये निवेदिता भारतात आल्या.

 भारतात त्या कलकत्ता येथे राहिल्या. हिंदू चालीरीती परंपरा समजावून घेतल्या. रामकृष्ण परमहंसांच्या पत्नी शारदादेवी यांची भेट घेतली. हिंदू धर्म स्वीकारला. हिंदुस्थान हेच कार्यक्षेत्र निश्चित केले. १८९८ मध्ये ब्रह्मवादीनी व्रताची दीक्षा घेतली. इंग्लंडकडून भारताला मिळालेली अमोल देणगी, असा विवेकानंद निवेदिताचा उल्लेख करत. हिंदू पुराणांचा व ग्रंथांचा अभ्यास निवेदिताने केला. विवेकानंदांच्या बरोबर सर्वत्र त्या जात. १८९८ मध्ये आलेल्या प्लेगच्या साथीत स्वामीजी व इतर शिष्यांबरोबर रोगग्रस्तांची सेवा त्यांनी केली. स्वच्छता केली व त्याचे महत्त्व लोकांना पटवून दिले. वेदांतील निष्काम कर्मयोग आचरणात आणला. बंगालच्या दुष्काळात लोकांना मदत केली. बालिका विद्यालय सुरू केले. त्याचे उद्घाटन शारदा देवीनी केले. बालविवाहित व अनाथ स्त्रियांना स्वावलंबी बनवण्यासाठी घरगुती उद्योगांबरोबर आणि भूगोल, इतिहास, गणित हे विषय शिकवले. जेणेकरून स्त्रिया सर्व अंगानी कर्तबगार व्हाव्या. बालिका विद्यालयातील तीन मुलींची संख्या ३० झाली. स्त्रियांचे प्रश्न सोडवण्यासाठी मातृमंदिराची स्थापना केली. व्याख्याने, लेखन करून सत् मार्गाने मिळवलेला पैसा या कार्यात खर्च केला. मी हिंदू आणि सर्व स्त्रिया माझ्या मुली हा त्यांचा भाव होता. गरजवंताला मदत हे ध्येय होते. त्यामुळे लोकांच्या मनात विश्वास निर्माण झाला. त्या सर्वांच्या भगिनी झाल्या.

 स्वातंत्र्य चळवळीतही त्यानी सहभाग घेतला. हे रामकृष्ण मिशनच्या विचाराविरुद्ध होते म्हणून काही काळ ते काम थांबवले. लेखन, भाषण द्वारे स्वदेशी चळवळीत सक्रिय भाग घेतला. स्वामी विवेकानंद यांच्या निधनानंतर त्यांचा कसोटीचा काय होता. पण हाती घेतलेले काम सुरू ठेवण्याचा त्यांनी निश्चय केला. बंगालच्या विभाजनाला इंग्रजांना निषेध केला. अशीही अद्वितीय प्रतिभावंत स्त्री विवेकानंदांच्या परिश्रमाने भारतीयत्वात पूर्ण विलीन झाली. मी विवेकानंदांची मानसकन्या जोपर्यंत जिवंत आहे तोपर्यंत त्यांची विस्मृती लोकांना होऊ देणार नाही. असा पण त्यांनी केला होता. निवेदितांचे जहाल विचार, ब्रिटिश सरकार विरुद्धच्या हालचाली, युवकांच्या मनात स्वातंत्र्याबद्दल आस निर्माण करणे या कार्यामुळे ब्रिटिश गुप्तहेरांची पाळत त्यांच्यावरती राहू लागली होती. युवकांसमोर आपल्या राष्ट्राचे चिन्ह असावे या भावनेने वज्राचे चिन्ह असलेला ध्वज तयार केला. तरुणांनी परदेशी जाऊन प्रशिक्षण घ्यावे ही कल्पना मांडली व अमलात आणली. परदेशातील क्रांतिकारी चळवळीची ग्रंथसंपदा भारतीय तरुणांना मिळवून दिली. जगदीशचंद्र बसू (वनस्पती शास्त्रज्ञ), रवींद्रनाथ टागोर, त्यांचे बंधू अवनीन्द्रनाथ, अरविंद घोष, बंगाली इतिहासतज्ञ रमेशचंद्र दत्त या सर्वांशी त्यांचे संबंध चांगले होते. त्यांनी बरेच ग्रंथ व लेख लिहिले. हिंदू संस्कृती आणि समाज पद्धती याविषयीचा त्यांचा ग्रंथ गाजला.

 १३ ऑक्टोबर १९११ रोजी त्यांनी इहलोकाचा प्रवास संपवला. त्यांचे अखेरचे वाक्य होते, ‘ मी आता चालले तरी भारतात ध्येयसूर्याचा उदय मी पाहिनच पाहिन. ‘ त्यांचे कार्य आणि शेवटचे वाक्य युवकांना प्रेरणादायी असेच आहे.

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “अ न मोल…” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? जीवनरंग ?

☆ “अ न मोल…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

रात्री नऊच्या सुमारास फोन वाजला. पलीकडून आवाज “साहेब, नमस्कार”

“नमस्कार!! कोण? ”

“मी अनमोल, आपला जुना परिचित, स्मरणात आहे का? ”

“आहे तर, वा वा, बऱ्याच दिवसांनी.. ”

“आपली तीव्रतेनं आठवण आली म्हणून फोन केला. रागावू नका. ”

“अजिबात नाही. उलट आठवणीनं फोन केल्याबद्दल छान वाटलं”

“आपलं आरोग्य कसंयं”

“उत्तम, तुझं”

“चांगलयं. नियतीनं संधी दिली तर भेट होईल. धन्यवाद!! शुभ रात्री” एवढं बोलून फोन कट. थोडं विचित्र वाटलं पण अनमोल असाच आहे.

त्याची पहिली भेट आठवली. खूप महिन्यांपूर्वी आमच्या कंपनीत सिक्युरिटी गार्ड म्हणून भरती झाला. गोल चेहरा, बारीक कापलेले केस, शिडशिडीत बांधा, उंचापूरा, लांब नाक, मोठाले डोळे आणि किंचित हसरा चेहरा असलेल्या अनमोलला भेटल्यावर काही विशेष वाटलं नाही पण जेव्हा त्यानं बोलायला सुरवात केली तेव्हा वेगळेपण जाणवलं. तो बोलीभाषेत न बोलता पुस्तकी बोलायचा. काम नीट करण्याविषयी सांगितल्यावर ताबडतोब विनम्रपणे नमस्कार करत तो म्हणाला“आपणास तक्रार करण्याची संधी मिळणार नाही याची पुरेपूर आणि शक्य ती काळजी घेईन. फक्त लोभ असू द्या. यथाशक्ती उत्तम प्रयत्न करीन. ” खरं सांगायचं तर मला त्याचं वागणं आणि बोलणं नाटकी वाटलं.

“गुड, ऑल द बेस्ट” मी शेकहँडसाठी हात पुढे केल्यावर नमस्कार करत म्हणाला “धन्यवाद”.

अनमोलचं व्यक्तिमत्व, वागणं, काम आणि बोलणं यात प्रचंड विरोधाभास होता. केवळ वाचलेले जड जड मराठी शब्द तो बोलताना सर्रास वापरायचा आणि तेच ऐकायला विचित्र वाटत होतं. इंग्रजी शब्द मात्र कटाक्षानं टाळायचा. कुणी ‘गुड मॉर्निंग’ म्हटलं की ‘आपला दिवस सुखकर जावो”असा प्रतिसाद द्यायचा. जरा हटके बोलण्यामुळं साहजिकच कंपनीत अनमोल चर्चेचा आणि चेष्टेचा विषय झाला. अनेकजण मुद्दाम त्याच्याशी बोलून मजा घ्यायचे. हे कळत असूनही अनमोलनं बोलण्याची पद्धत बदलली नाही. वरिष्ठ अधिकाऱ्यांसमोर अतिसौजन्यानं वागणारा अनमोल कामाच्या बाबतीत एकदम ढिला. कायम मोबाइल नाहीतर वाचत बसलेला. कामाकडे फारसं लक्ष नसल्यानं वारंवार चुका व्हायला लागल्या तेव्हा पुन्हा पुन्हा समज दिली परंतु काही फरक पडला नाही म्हणून सिक्युरिटी मॅनेजरला कळवल्यावर दुसऱ्याच दिवशी अनमोल भेटायला आला. “खूप व्यस्त तर नाही ना. काहीसं बोलायचं होतं”

“आता नको. उद्या बोलू. महत्वाचं काम चालूयं”

“व्यत्यया बद्दल क्षमा असावी. माझ्याकडून कामात कुचराई झाली. अक्षम्य चुका झाल्या म्हणून तुम्ही दबाव टाकलात”

“कसला दबाव? काहीही काय बोलतोयेस. ”

“आमच्या व्यवस्थापकांनी सांगितलं की तुम्ही नाराज आहात. ”

“तुझ्या कामात सुधारणा हवी एवढंच सांगितलं. दबाव बिबाव काही नाही. बाबा रे, चुकीचे शब्द वापरू नकोस. फार वेगळे अर्थ निघतात. असलं काही बोलण्यापेक्षा कामाकडे लक्ष दे. नाहीतर… ”मी पुढचं मुद्दामच बोललो नाही.

“जसा आपला आदेश, मनपूर्वक आभार आणि धन्यवाद”

“एक मिनिट, फक्त काम नीट कर एवढंच सांगितलंय. आदेश वगैरे काही दिलेला नाही. कळलं”माझा आवाज वाढला तेव्हा अनमोलचा चेहरा पडला. नमस्कार करून निघून गेला. मी कामात हरवलो.

 

संध्याकाळी घरी जाताना कळलं की दुपारीच अनमोल नोकरी सोडून गेला. धक्काच बसला. अनमोल असं काही वागेल असं अजिबात वाटलं नव्हतं. एकदम नोकरी सोडण्याइतकं काहीच घडलं नव्हतं. फोन केला पण त्यानं उचलला नाही. पुन्हा प्रयत्न केला तेव्हा फोन स्वीच ऑफ. त्यानं आपल्यामुळे नोकरी सोडली याचं वाईट वाटलं. भेटून समजावं असं वाटलं पण प्रयत्न करूनही भेट झाली नाही तेव्हा मीदेखील नाद सोडला. दोन महिन्यानंतर एका पुस्तक प्रदर्शनात अचानक अनमोल भेटला.

“अरे, भल्या माणसा, तुला किती फोन केले पण एकदाही उत्तर दिलं नाहीस. इतका रागावलास. ” 

“मी व्यर्थ कशाला रागवेल. घरच्यांचा अतीव आग्रह, दबाव आणि चांगला पगार म्हणून ते काम स्वीकारलं. इच्छेविरुद्ध काम म्हणजे मनाला जाच. आता पुस्तकांच्या दुकानात काम करतोय. हे आमचंच प्रदर्शन आहे. इथं पगार कमी असला तरी काम आवडीचं आहे. माझ्यासाठी ते जास्त महत्वाचं. ”

“तू कामावर परत ये. मॅनेजरशी बोलतो”

“आपण दाखविलेल्या आपुलकीबद्दल धन्यवाद!! मला जीवनाचा मार्ग सापडलायं. ”

“म्हणजे”

“कायम पुस्तकांच्या सानिध्ध्यात रहायचं म्हणून या दुकानात काम करतोय. खजिन्याची चावी हातात आलीय असं समजा. वेगवेगळी पुस्तकं पहायला, हाताळायला, वाचायला मिळतात आणि पगारसुद्धा मिळतो सुख म्हणजे अजून काय असतं. ”

“नाहीतरी तुला वाचनाची आवड आहेच. ”

“आवड नाही वेड म्हणा. ”

“ते कसं”

“वडिलांची कृपा!! मजुरी करणारे वडील चौथीपर्यंत शिकले. इच्छा असूनही पुढं शिकता आलं नाही पण त्यांना वाचायचा नाद. रोज पेपर विकत घेऊन वाचायचे. वडिलांना पाहून मलाही वाचनाचा नाद लागला. माझी आवड समजल्यावर वडील रद्दीतून जुनी पुस्तकं आणून द्यायचे. कोणताही विषय वर्ज्य नव्हता. वाचत गेलो. त्यांच्या अपेक्षा होत्या पण माझं अभ्यासात फार डोकं चाललं नाही. कसाबसा दहावी पास झालो. आमच्याकडं पिढीजात गरीबी, आजूबाजूची परिस्थिती भयावह. भांडणं, मारामाऱ्या, शिव्या हे नित्याचच. परिस्थितीत फार सुधारणा झाली नसली तरी वाचनामुळं माझ्यात लक्षणीय बदल झाला. विचार सुधारले आणि बोलणं तर मी ठरवून बदललं अर्थातच त्यासाठी वाचनाचा खूप फायदा झाला. ”

“अच्छा म्हणजे मुद्दाम तू… ”

“म्हणून तर दखल घेतली जाते. गर्दीत आपलं अस्तित्व दाखवायचं असेल तर वेगळेपणा पाहिजेच”

“हुशारेस, फार पुढे जाशील” 

“आपल्यासारख्यांचा आशीर्वाद आहे म्हटल्यावर काळजी नाही. पुन्हा नक्की भेटू यात. पुस्तकं जरूर घ्या. तुम्हांला विशेष सवलत द्यायला मालकांना आग्रह करतो. धन्यवाद!! ”अनमोलच्या चेहऱ्यावरून आनंद ओसंडत होता. निरोप घेऊन तो आपल्या कामाला गेला.

“बाबा, इज ही नॉर्मल”माझ्या मुलानं विचारलं.

“हंड्रेड पर्सेंट”

“मग असं का बोलत होते. ”अनमोलविषयी सविस्तर सांगितल्यावर मुलगा म्हणाला. “लकी मॅन”

“ काम तर सगळेच करतात. पैसे, प्रतिष्ठा मिळवतात. आवड मनाच्या खोल कप्प्यात बंद करून भलतंच काम करत राहतात. अनमोलच्या स्टाईल मध्ये बोलायचं तर आवडीचं कामच उदरनिर्वाहाचं साधन असणं यासारखे परमसुख नाही. प्रत्येकाच्या नशिबात हे नसतं. त्याबाबतीत हा खरंच सुदैवी. नावाप्रमाणेच अ न मोल.

 

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ ‘पडद्यामागची माणसं…’ ☆ सौ राधिका -माजगावकर- पंडित ☆

सौ राधिका -माजगावकर- पंडित

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☆ ‘पडद्यामागची माणसं…’ ☆ सौ राधिका -माजगावकर- पंडित

माझ्या मुलाने चि. प्रसादने माझ्यासाठी मोठ्ठा खजिना म्हणजे, मोबाईल मला दिला आणि व्हाट्सअप तर्फे खूप ओळखी होऊन तो मोबाईल आता जग्नमित्र झाला आहे’ अनेक मान्यवरांच्या ओळखी झाल्या – – ज्योतसे ज्योत जगाके चलो l प्रेम की गंगा बहाते चलो l – – तशा ओळखी वाढून अनेक पडद्यामागच्या कलाकारांची ओळख झाली आणि धुळ्याचे अशोक भाऊ सोनार यांची ओळख वाढली.

धुळ्याच्या पेट्रोल पंपावर ते काम करतात. नोकरीची उंची महत्वाची नसते तर विचारांची उंचीचं श्रेष्ठ ठरते. आमच्या प्रत्यक्ष ओळखी झाल्या नव्हत्या. पण तंत्रज्ञानाच्या करामतीमुळे व्हाट्सअप तर्फे ओळख झाली ती अशी की आमच्या कथा सामायिक झाल्या की पहिला फोन अशोक भाऊंचाच येतो. ते सांगतात पेट्रोल पंपावर काम करतांना मधल्या वेळेत मोबाईल उघडून मी अगदी अधाशासारखा तुम्हां लेखकांच्या कथा वाचतो आणि ताबडतोब लेखकांना कथा आवडल्याचा फोन करतो. लेखी उत्तर देण्याइतका मी सज्ञान नसलो तरी तोंडी कौतुक अभिप्राय द्यायला मी पुढे सरसावतो. ” 

मेघ:श्याम सोनवणे सरांचा कथा सामायिक करण्याचा उत्साह, उपक्रम प्रशंसनीय आहे अनेक कथांना न्याय देताना त्यांना लेखकांना वेळ द्यावा लागतो. माझ्या कथेलाही त्यांच्या प्रकृती अस्वाथ्यामुळे त्यांना वेळ द्यावा लागला. अशोक भाऊनी त्यांना लगेच फोन केला, “अहो सर पंडित मॅडमच्या कथा पाठवा की लवकर, म्हणजे मला त्यांना फोन करता येईल. “

… फारसे शिक्षण नसतांनाही त्यांची साहित्याची ‘जाण’, वाचनाची उडी उंच आहे. एखादा वक्ता काय बोलेलं इतकी त्यांची लेखकांना प्रतिक्रिया देण्याची पद्धत अवाक करणारी असते. पहिलं गिऱ्हाईक वाटेला लावून दुसरं गिऱ्हाईक येईपर्यंत ते मधल्या वेळात मिळेल ती कथा अगदी भुकेल्या माणसासारखी वाचतात. ते म्हणाले, “माझी साहित्याची भुक बकासुरासारखी आहे ” 

मी हसून प्रश्न विचारला, ” अशोक भाऊ इतकी तल्लख बुद्धी, इतकं संभाषणचातुर्य तुम्ही शिकलात कुठे? ” त्यावर त्यांचं परखड उत्तर आलं, ” अहो मॅडम कुठलं शिक्षण आणि कुठलं काय! शिक्षण घ्यायला शाळेत जावं लागतं ना? मी शाळेतच गेलो नाही तर कोणते गुरुजी मला वरच्या वर्गात चढवणार? गरीबीनी आणि रिकाम्या पोटाने मला वर्गात बसू दिले नाही. कारण दिवसभर नुसत्या चहाच्या पाण्यावर राहणं सोपं आहे का? तुम्हीच सांगा मला, “

मी नवलाईने विचारलं “हो पण मग, तुमचं इतके वाचन, साहित्यिक भाषा, जनरल नॉलेज शाळेत न जाता तुम्ही कसं काय मिळवलत? ” 

 “काय सांगू मॅडम भुकेने पोटात लचके तोडल्यासारखं वाटायचं. मग मास्तरांचं शिकवण म्हणजे माझ्या बुद्धी पलीकडचं काम व्हायचं. कशातच लक्ष लागायचं नाही मग एक दिवस गुरुजींच्या पायाला हात लावून शाळेकडे पाठ फिरवून मी घरचा रस्ता धरला घरी आल्यावर आईने मला चांगलंच धोपटलं. आणि माझी ‘शाळा’ घेतली. असाच उनाडक्या मारत फिरत असताना त्या मायने मला मारतच घरी आणलं. आणि म्हणाली, ” मी भाकर करतीया तर बैस इथे, हे घे बालभारतीचे पुस्तक आणि वाचं. ” – – 

– “अग पण माय! मला कुठे वाचता येतया? “शाळला जात नाहीस गावभर भटकतोस कसं येईल तुला वाचता? ते काय नाय आज पासून तू घरीच शिकायचंस कसं वाचता येत नाही ते बघतेचं मी” मायने मला फटकारले… “ अग पण! अग पण! “ मी अडखळलो. मला म्हणायचं होतं “तुला तरी कुठे येते य वाचता? आणखी मला तिला म्हणायचं होतं, माय भाकरीचा खरपूस वास नाकात शिरतोय, आणि पोटात भुकेचा डोंब उसळलाय ग बाई! आधी भाकर तरी दे” – – हे मनांत म्हणताना, माझी नजर पुन्हा पुन्हा तव्यावरच्या भाकरीकडे वळत होती. मायच्या ते लक्षात आलं. क्षणभर ती कळवळली. पण लगेच कठोर होऊन ती कडाडली, ”हा धडा वाच. धड्याचे नाव आहे खरा दागिना ‘ “ 

“अगं पण! “पुन्हा मी तुणतुणं वाजवलं, तर चित्र माझ्यापुढे नाचवत ती म्हणाली “हे चित्र बघ आणि त्याच्यावरून काय दिसतं ते पाहून वाक्य तयार कर. हळूहळू असं वाचायला पण शिकशील. ”

– – आणि काय सांगू मॅडम! माझ्या आईचे शब्द खरे ठरले. चित्र बघून वाक्य जोडत मी वाचायला शिकलो. आमचं खोपट म्हणजे माझी शाळा झाली, आणि त्या शाळेतली माझी गुरु झाली होती माझी माय. ” 

– – तो धडा अशोकभाऊंच्या मनात कायम कोरला गेला. एक श्रीमंत उंची कपडे घातलेला दागिन्यांनी मढलेला किडकिडीत मुलगा, तर दुसरा हुशार धष्टपुष्ट, आरोग्यपूर्ण मुलगा दोघांच्या तुलनेत मास्तरांच्या परीक्षेत खरा दागिना म्हणजे शिक्षणात आणि आरोग्यात दुसरा मुलगा उत्तीर्ण झाला. अशोक भाऊंच्या मनात बिंबलेला तो धडा अगदी खोलवर रुजला आहे.

परिस्थितीमुळे खूप नाही शिकता आलं तरी साहित्याच्या मेळाव्यात ते अग्रगण्य आहेत त्यांच्या ओळखी त्यांचा लोकसंग्रह, वाचनाची धडपड आणि प्रतिक्रिया देण्याचा उत्साह अमाप आहे. वेळात वेळ काढून छोटी मोठी कथा वाचली की ते लेखकांचा नंबर अभिप्राय देण्यासाठी तत्परतेने फिरवतात. कधी कधी माझी कथा सामायिक झाल्याचं माझ्या आधी त्यांनाच कळतं. आणि त्यांचा लगेच फोन येतो, “राधिका पंडीत मॅडम आज तुमची कथा आली आहे बरं का! मी वाचलीय आवडली मला. म्हणून तर तुम्हाला लगेच फोन लावलाय”.

बालभारती दिन नुकताच साजरा झाला. आणि मला आठवले ते अशोक भाऊ, आणि त्यांची माऊली. तेव्हां मुखपृष्ठावरचं चित्र बघून ती म्हणाली असेल, “बघ हे चित्र! आणि म्हण मी ह्या मुलांसारखा वाचायला शिकणार आहे. ”.. आणि खरोखरच माऊलीच्या इच्छेप्रमाणे अशोकभाऊनी आपला वाचनाचा व्यासंग वाढवला.

… आता साठीतल्या अशोक भाऊंचा वाचन हा छन्दचं झाला आहे. धुळ्याच्या पेट्रोल पंपावर तुम्ही गेलात ना, की तुम्हाला पुस्तकात डोकं खुपसलेले वाचनात गढलेले अशोकभाऊ नक्कीच भेटतील. त्यांना एखादं छोटसं पुस्तक तुम्ही भेट द्या ते जाम खुश होतील. आयुष्याच्या प्रवासात अशी कितीतरी माणसं येतात आणि एक आपला आगळा वेगळा असा ठसा उमटवतात. त्यापैकीच एक आहेत अशोकभाऊ सोनार..

© सौ राधिका -माजगावकर- पंडित

पुणे – 51  

मो. 8451027554

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “समृद्ध खजिना…” ☆ डॉ. धनंजय देशपांडे ☆

डॉ. धनंजय देशपांडे

? मनमंजुषेतून ?

☆ “समृद्ध खजिना …” ☆ डॉ. धनंजय देशपांडे 

२५ मार्च – वपु काळे यांची जयंती.. त्यानिमित्ताने सहज भूतकाळात गेलो. त्यांच्याशी माझी मैत्री अखेरपर्यंत होती. ९० च्या दशकात पत्रसंवाद हेच साधन होते आणि मी माझ्या आवडत्या लोकांना पत्राद्वारे संपर्क करून स्नेहबंध जुळून येत गेले. नारायण सुर्वे, शिरीष काणेकर, पुल तसेच वपु ही!

मात्र वपुशी असलेली मैत्री हा माझा खऱ्या अर्थाने समृद्ध खजिना!

 

माझ्याकडे नवीन काही घडलं की मी आवर्जून त्यांना कळवायचो. तेही त्या प्रत्येक पत्राला नक्की उत्तर द्यायचे! तसेच त्यांच्याकडे नवीन काही घडलं की ते आवर्जून मला कळवायचे. असा पत्र संवाद सुमारे २५ वर्ष सुरु होता. त्यांची एक एक पत्र म्हणजे जणू साहित्यिक मेजवानीच…

 

नंतर प्रत्यक्ष भेटीचे योग येत गेले. पुण्यात कुठं त्यांचा कार्यक्रम असला की हमखास आधी मला कळवून “भेटूया” असं म्हणायचे. टिळक स्मारकाच्या ग्रीन रुममध्ये अशा कैक गप्पांच्या मैफिली रंगलेल्या!!

त्यांची केवळ पत्रच वाचनीय असायची असं नाही तर त्या पत्राचे एन्व्हलप पण तितकेच प्रत्येकवेळी वाचनीय आणि देखणे असायचे.

वाचकांची आलेली पत्रे आणि त्याला त्यांनी दिलेली उत्तरे याचेच त्यांनी दोन भागात पुस्तक काढले! प्लेजर बॉक्स या नावाने!

आणि दोन्ही भागात माझं एक एक पत्र आणि त्यांनी दिलेलं उत्तर छापलं आहे! हे किती आनंदाचे!

 

त्यांच्या पत्रसंवादाचा एक अफलातून नमुना सोबत पहा.

माझं लग्न झालं त्यावेळी मी त्यांना ते कळवून सोबत आमच्या जोडीचा फोटो पाठवला. मी माझ्या लेटरहेडवर ते पत्र पाठवलेलं. ते पाहून त्यांनी त्यांच्यासाठी पण छान एखाद डिझाईन करून द्याल का मला? असं विचारलं!! हे किती भाग्य. अर्थात नंतर मी त्यांना ते डिझाईन करून दिले जे नंतर शेवट्पर्यंत वापरत होते.

तर माझ्या लग्नाबद्दल त्यांनी पाठवलेलं पत्र आणि त्याचे इन्व्हलप… दोन्ही पहा… यावरून त्यांच्या अफाट सृजनशीलतेचा कल्पना येते!

*

वपुंची अशी पत्र हा माझा समृद्ध खजिना!

वपु ऑल टाइम तुम्ही ग्रेट आहात!

विनम्र अभिवादन!

© डॉ. धनंजय देशपांडे (dd)

(सायबर सिक्युरिटी तज्ञ, चित्रकार, लेखक, समुपदेशक, निवेदक)

मो न. ९४२२३०४३४४ 

1) Global Cyber Crime Helpline National Award winner

2) Digital Hero of the year National Award winner

3) HOD: Cyber Awareness Foundation, Maharashtra State

4) Mentor: Pune University (SPPU), CANADA and UK

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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