हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #52 ☆ साक्षात्कार ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ☆

शुभ प्रभात। आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। योग, सनातन संस्कृति द्वारा मानवता को दिया गया सबसे बड़ा उपहार है।

योग का शाब्दिक अर्थ मेल या मिलना है। सूक्ष्म और स्थूल के मेल से देह, मन एवं चेतना को सक्रिय करने तथा सक्रिय रखने का अद्भुत साधन है योग।

यदि योग, ध्यान, प्राणायम करते हैं तो नियमित रखिए। यदि नहीं तो आज से अवश्य आरम्भ कीजिए।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # साक्षात्कार

शाम के घिरते धुँधलके में बालकनी से सड़क की दूसरी ओर का दृश्य निहार रहा हूँ। काफी ऊँचाई पर सुदूर आकाश में दो पंछी पंख फैलाये, धीमी गति से उड़ते दिख रहे हैं। एक धीरे-धीरे नीचे की ओर आ रहा है। नीचे आने की क्रिया में पेड़ के पीछे की ओर जाकर विलुप्त हो गया। संभवत: कोई घोंसला उसकी प्रतीक्षा में है। दूसरा दूर और दूर जा रहा है, निरंतर आकाश की ओर। थोड़े समय बाद आँखों को केवल आकाश दिख रहा है।

जीवन भी कुछ ऐसा ही है। घोंसला मिलना, जगत मिलना। जगत मिलना, जन्म पाना।आकाश में ओझल होना, प्रयाण पर निकलना। प्रयाण पर निकलना, काल के गाल में समाना।

प्रकृति को निहारो, हर क्षण जन्म है। प्रकृति को निहारो, हर क्षण मरण है। प्रकृति है सो पंचमहाभूत हैं। पंचमहाभूत हैं सो जन्म है। प्रकृति है सो पंचतत्वों में विलीन होना है, पंचतत्वों में विलीन होना है सो मरण है। प्रकृति है सो पंचेंद्रियों के माध्यम से जीवनरस का पान है। जीवनरस का पान है सो जीवन का वरदान है। जन्म का पथ है प्रकृति, जीवन का रथ है प्रकृति, मृत्यु का सत्य है प्रकृति।

प्रकृति जन्म, परण, मरण है। जन्म, परण, मरण, जीव की गति का अलग-अलग भेष हैं।जन्म, परण, मरण ब्रह्मा, विष्णु, महेश हैं।

ब्रह्मा, विष्णु, महेश,त्रिदेव हैं। प्रकृति त्रिदेव है। सहजता से त्रिदेव के साक्षात दर्शन कर सकते हो।

साधो! कब करोगे दर्शन?

©  संजय भारद्वाज

संध्या 7:28, 13.6.20

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 13 ☆ मुक्तिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपके मुहावरेदार दोहे. 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 13 ☆ 

☆ मुक्तिका☆ 

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

धीरे-धीरे समय सूत को, कात रहा है बुनकर दिनकर

साँझ सुंदरी राह हेरती कब लाएगा धोती बुनकर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

मैया रजनी की कैयां में, चंदा खेले हुमस-किलककर

तारे साथी धमाचौकड़ी मच रहे हैं हुलस-पुलककर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

बहिन चाँदनी सुने कहानी, धरती दादी कहे लीन हो

पता नहीं कब भोर हो गयी?, टेरे मौसी उषा लपककर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

बहकी-महकी मंद पवन सँग, क्लो मोगरे की श्वेतभित

गौरैया की चहचह सुनकर, गुटरूँगूँ कर रहा कबूतर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

सदा सुहागन रहो असीसे, बरगद बब्बा करतल ध्वनि कर

छोड़न कल पर काम आज का, वरो सफलता जग उठ बढ़ कर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 11 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 11/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 11 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

बस इतना सा असर होगा

हमारी यादों का

कि कभी कभी तुम बिना

बात मुस्कुराओगे…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

The only effect of my

Memories will be that

  Sometimes without any

Reason you will smile…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

काश मिल जाये हमें भी

कोई किसी आईने की तरह

जो हँसे भी साथ साथ

और रोये भी साथ साथ…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

Wish I could also have

 Someone like a mirror

  Who could laugh together

    And  even  cry together …

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

उन्हें  ठहरे…

समुंदर  ने  डुबोया

जिन्हें  तूफ़ाँ  का…

अंदाज़ा  बहुत  था…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

Calm seas…

drowned them only…

Who claimed to have great 

experience of braving the storms

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ सूर्यग्रहण ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार एवं वैज्ञानिक श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  सूर्यग्रहण। )

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☆ सूर्यग्रहण

सिंहिका हिरण्यकशिपु की पुत्री और छाया ग्रह राहु (जो सूर्य और चंद्रमा पर ग्रहण लगाने के लिए जिम्मेदार होता है) की माँ थी। जैसे सिंहिका का पुत्र राहु, सूर्य और चन्द्रमा पर ग्रहण लगा सकता है इसी तरह वह हवा पर ग्रहण लगा सकती थी ।

राहु और केतु राहु हिन्दू ज्योतिष के अनुसार असुर स्वरभानु का कटा हुआ सिर है, जो ग्रहण के समय सूर्य और चंद्रमा का ग्रहण करता है । इसे कलात्मक रूप में बिना धड़ वाले सर्प के रूप में दिखाया जाता है, जो रथ पर आरूढ़ है और रथ आठ श्याम वर्णी घोड़ों द्वारा खींचा जा रहा है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार राहु को नवग्रह में एक स्थान दिया गया है । दिन में राहुकाल नामक मुहूर्त (24 मिनट) की अवधि होती है जो अशुभ मानी जाती है । समुद्र मंथन के समय स्वरभानु नामक एक असुर ने धोखे से दिव्य अमृत की कुछ बूंदें पी ली थीं । सूर्य और चंद्र ने उसे पहचान लिया और मोहिनी अवतार में भगवान विष्णु को बता दिया । इससे पहले कि अमृत उसके गले से नीचे उतरता, विष्णु जी ने उसका गला सुदर्शन चक्र से काट कर अलग कर दिया । परंतु तब तक उसका सिर अमर हो चुका था । यही सिर राहु और धड़ केतु ग्रह बना और राहु सूर्य- चंद्रमा से इसी कारण द्वेष रखता है । इसी द्वेष के चलते वह सूर्य और चंद्र को ग्रहण करने का प्रयास करता है । ग्रहण करने के पश्चात सूर्य राहु से और चंद्र केतु से, उसके कटे गले से निकल आते हैं और मुक्त हो जाते हैं ।

केतु भारतीय ज्योतिष में उतरती लूनर नोड को दिया गया नाम है । केतु एक रूप में स्वरभानु नामक असुर के सिर का धड़ है । यह सिर समुद्र मन्थन के समय मोहिनी अवतार रूपी भगवान विष्णु ने काट दिया था । यह एक छाया ग्रह है । माना जाता है कि इसका मानव जीवन एवं पूरी सृष्टि पर अत्यधिक प्रभाव रहता है । कुछ मनुष्यों के लिये यह ग्रह ख्याति दिलाने में अत्यंत सहायक रहता है । केतु को प्रायः सिर पर कोई रत्न या तारा लिये हुए दिखाया जाता है, जिससे रहस्यमयी प्रकाश निकल रहा होता है । भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु, सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उलटी दिशा में (180 डिग्री पर) स्थित रहते हैं । चूँकिये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है । सूर्य और चंद्र के ब्रह्मांड में अपने-अपने पथ पर चलने के कारण ही राहु और केतु की स्थिति भी साथ-साथ बदलती रहती है । तभी, पूर्णिमा के समय यदि चाँद केतु (अथवा राहू) बिंदु पर भी रहे तो पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्र ग्रहण लगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दुसरे के उलटी दिशा में होते हैं । ये तथ्य इस कथा का जन्मदाता बना कि “वक्र चंद्रमा ग्रसे ना राहू” । अंग्रेज़ी या यूरोपीय विज्ञान में राहू एवं केतु को क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी लूनर नोड कहते हैं । तथ्य यह है कि ग्रहण तब होता है जब सूर्य और चंद्रमा इन बिंदुओं में से एक पर सांप द्वारा सूर्य और चंद्रमा की निगलने की समझ को जन्म देता है । प्राचीन तमिल ज्योतिषीय लिपियों में, केतु को इंद्र के अवतार के रूप में माना जाता था । असुरों के साथ युद्ध के दौरान, इंद्र पराजित हो गया और एक निष्क्रिय रूप और एक सूक्ष्म राज्य केतु के रूप में ले लिया । केतु के रूप में इंद्र अपनी पिछली गलतियों, और असफलताओं को अनुभव करने के बाद भगवान शिव की आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हो गया ।

सूर्य ग्रहण अगर रविवार को हो तो ऐसे रविवार को ‘महाश्वेत-प्रिया’ कहा जाता है  इस रविवार को ‘महाश्वेत’ मंत्र का जाप बहुत फायदेमंद होता है 

भारतीय ज्योतिष के अनुसार राहु और केतु सूर्य एवं चंद्र के परिक्रमा पथों के आपस में काटने के दो बिन्दुओं के द्योतक हैं जो पृथ्वी के सापेक्ष एक दुसरे के उल्टी दिशा में (180 डिग्री पर) स्थित रहते हैं । क्योंकि ये ग्रह कोई खगोलीय पिंड नहीं हैं, इन्हें छाया ग्रह कहा जाता है । सूर्यऔर चंद्र के ब्रह्मांड में अपने- अपने पथ पर चलने के अनुसार ही राहु और केतु की स्थिति भी बदलती रहती है । तभी, पूर्णिमा के समय यदि चाँद राहू (अथवा केतु) बिंदु पर भी रहे तो पृथ्वी की छाया पड़ने से चंद्र ग्रहणलगता है, क्योंकि पूर्णिमा के समय चंद्रमा और सूर्य एक दुसरे के उलटी दिशा में होते हैं । ये तथ्य इस कथा का जन्मदाता बना कि “वक्र चंद्रमा ग्रसे ना राहू”। अंग्रेज़ी या यूरोपीय विज्ञान में राहू एवं केतु को को क्रमशः उत्तरी एवं दक्षिणी लूनर नोड कहते हैं ।

क्या आप सौर ग्रहण के विषय में जानते हैं? जब चंद्रमा सूर्य और पृथ्वी के बीच आता है, पृथ्वी पर सूर्य का कोई प्रकाश नहीं पहुँचता है (यह केवल नए चंद्रमा तिथि या अमावस्या के दिन होता है), इसका अर्थ है कि चंद्र ऊर्जा (मानसिक ऊर्जा) या इड़ा भौतिक ऊर्जा (पिंगला) पर हावी हो कर उसे अवरुद्ध करती है । उस समय शरीर को आराम देना चाहिए और कोई शारीरिक कार्य नहीं करना चाहिए, लेकिन वह समय मानसिक गतिविधियों के लिए उत्तम है । इसी प्रकार चंद्र ग्रहण पर, पृथ्वी (मूलाधार चक्र) सूर्य (पिंगला) और चंद्रमा इड़ा के बीच में होती है, और सूर्य की रोशनी चंद्रमा तक पहुँचने से वंचित रह जाती है । इस समय मन को सूर्य (पिंगला) से प्रकाश नहीं मिलता है और उस समय कोई भारी मानसिक गतिविधि नहीं करनी चाहिए, अन्यथा यह आपके स्वास्थ्य को भी प्रभावित करेगा, और इसके परिणाम भी आपकी इच्छा के अनुसार नहीं जायँगे ।

आशीष ने बाधा डाली, “क्षमा करें महोदय, लेकिन मूलाधार चक्र का स्थान और पिंगला और इड़ा नाड़ी का पथ भी मानव शरीर के अंदर स्थिर हैं । तो मूलाधार चक्र, पिंगला और इड़ा नाड़ी के बीच में है इसका क्या अर्थ हुआ?”

विभीषण ने उत्तर दिया, “हाँ, लेकिन जैसा कि मैंने आपको कई बार बताया है, विभिन्न नाड़ियों में प्राण वायु का प्रवाह निश्चित नहीं है, यहाँ तक कि हमारे शरीर की विभिन्न नाड़ियों के अंदर इसकी तीव्रता भी स्थिर नहीं होती है । मेरे कहने का वो ही अर्थ है अब मैं आपको कुछ और बातें बताऊँगा । इसके अतिरिक्त मैंने आपको अन्य ग्रहों के विषय में भी बताया था, हमारे सौर मंडल के अस्तित्व में सात मुख्य ग्रह माने जाते हैं । चूंकि चेतना उच्च आवृत्ति पर पदार्थ और कंपन से मुक्त हो जाती है, तो आत्मा भुलोक से भुव: लोक, स्वा: लोक, महा लोक, जन लोक, तप लोक और सत्य लोक में जाता हैं । ये लोक हमारे अस्तित्व की स्थिति का अधिक सूक्ष्म क्षेत्रों में प्रगति का प्रतिनिधित्व करते हैं । यह प्रगति हमारे मस्तिष्क की पदार्थ से आजादी और मुक्ति पर निर्भर करती है । जब मन और पदार्थ अलग हो जाते हैं, तो ऊर्जा निकलती है । शरीर के सात चक्र, या सात लोक तामस गुण से राजस गुण से सत्त्विक गुण से शुद्ध चेतना तक हमारी प्रगतिशील चेतना का प्रतिनिधित्व करते हैं ।

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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हिन्दी साहित्य – पत्र ☆ ☆ पितृ दिवस विशेष – बेटी के पत्र पिता के नाम – भावनात्मक आत्मीय पत्र ☆ डॉ मिली भाटिया

डॉ मिली भाटिया 

डॉक्टर मिली के प्रेरणास्रोत उनके पापा श्री दिलीप भाटिया  हैं ! डॉक्टर मिली कहती हैं  उनकी मम्मी  श्यामा भाटिया ईश्वर के घर से उनको आशीर्वाद देकर उनकी उपलब्धि से ख़ुश होंगी।  डॉक्टर मिली की स्ट्रेंक्थ उनके जीवनसाथी श्री आनंद यादव हैं।  डॉक्टर मिली की ख़ुशी है उनकी बेटी लिली यादव ।

डा मिली कहती हें बच्चों को चित्रकला सिखाना उनका मुख्य उद्देश्य है ।  आँखो में आजीवन रहने वाली बीमारी केरटोकोनस के बावजूद बच्चों में चित्रकला से प्रेम करने का एकमात्र उद्देश्य हे डॉक्टर मिली भाटिया आर्टिस्ट का। 

डॉक्टर मिली को 22 डिसेम्बर 2011 को रावतभाटा कला गौरव से और 26 जनवरी 2012 को राजस्थान सरकार और 7 जुलाई 2015 को PhD की डिग्री से सम्मानित किया गया। पितृ दिवस के उपलक्ष में हम डॉ मिली भाटिया जी के बेटी के पत्र पिता के नाम आपसे साझा कर रहे हैं।

☆ पितृ दिवस विशेष – बेटी के पत्र पिता के नाम – भावनात्मक आत्मीय पत्र ☆

☆ एक पिता को एक बेटी का पत्र ☆

आपके ही नाम से जानी जाती हूँ “पापा”

इस से बड़ी शोहरत “मिली” के लिए क्या होगी। आप पिता हैं, पर एक माँ से कम नहीं – “हैपी फ़ादर डे वर्ल्ड के बेस्ट पापा” दुनिया के सबसे अच्छे पापा,

“दादी की प्राणदुलारी हो, मम्मी की राजदुलारी हो,

इकलोती  तुम मेरी बिटिया, तुम सबसे मुझको प्यारी हो“

आज भी जब आपकी लिखी हुई कविताएँ मेरे बचपन की पड़ती हूँ तो आँख भर जाती हैं! मेरे “पापा” इस शब्द में पूरी दुनिया बसती है मेरी! बचपन से ही हमेशा आप मेरे बेस्ट फ़्रेंड, राखी के दिन भाई, स्कूल होमवर्क कराते टाइम टीचर, शाम को ईवनिंग वॉक पर जाते गप्पें मारते वक्त मेरे बेस्ट फ़्रेंड, और जब मम्मी अपनी इकलौती संतान को बी॰ ए॰ फ़र्स्ट ईयर में छोड़ कर ईश्वर के घर गई तब से आप मम्मी का रोल निभाते आ रहे हें पापा! तब 17 साल की टीनऐज़र बेटी को कैसे अकेले सम्भाला होगा आपने! 17 साल हो गये पापा! आपने मुझ पर विश्वास बनाए रखा! गर्व होता है जब दुनिया बोलती है  “मिली” तेरे पापा कितने अच्छे हें! आँखें ख़ुशी से चमक उठतीं हें मेरी! मेरे लिए कितना त्याग किया आपने, दुनिया से लड़े, रिश्तेदारों से लड़े, जब मम्मी हमें छोड़ कर गईं, लोगों ने कहा “मिली” का क्या होगा, नानी ने कहा मिली अनाथ हो गई, तब आप हमेशा से चुप रहने वाले इंसान लड़ लिए अपनी बेटी के लिए की अभी तो मैं  बेठा हूँ, मिली को कोई कुछ नहीं कहेगा! लोग आपको बोलते रहे, दूसरी शादी कर लो, बेटा गोद ले लो, मिली को किसी मासी के घर छोड़ दो, वगैरह वगैरह  पर आपने अपनी बेटी को सम्भाला! आपकी बच्चों के लिए लिखी किताबों से देश भर के लाखों बच्चों के लिए प्रेरणास्त्रोत हें! डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम जी से आप आत्माराम पुरस्कार से सम्मानित हें! परमाणु बिजलीघर में वैज्ञानिक अधिकारी के पद से आप रिटायरमेंट के 12 साल बाद भी बच्चों के लिए सक्रिय हैं।  कई गरीब बेटे-बेटियों की शिक्षा की ज़िम्मेदारी आप निभा रहे हें पापा! आपके जैसा कोई नहीं है पापा! आप इस दुनिया के सबसे अच्छे पापा हैं! आपके होने से में अपने आप को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करती हूँ हमेशा!

बेटी डॉक्टर मिली!

 

☆ पापा चुप रहते हैं ☆

हैपी फ़ादर डे पापा,

आज मुझे मम्मी बने हुए 6 साल 5 महीने पूरे हो गये हैं! ईश्वर से दिन रात एक ही दुआ माँगी थी की मुझे बेटी हो! आपने तो आने से 2 महीने पहले नाम भी रख दिया था ‘लिली”! आप तो यह भी सोचने लग गए थे की बेटा हो गया तो पता नहीं मैं क्या करूँगी? 15 जनवरी 2014 को नर्स ने आपको आ कर कहा की लक्ष्मी आयी है तब मुझसे ज़्यादा ख़ुशी आपको हुई पापा!

बचपन से ही आपसे, मम्मी और दादी से इतना प्यार पाया की कभी कोई कमी महसूस ही नहीं हुई! चार लोगों के इस छोटे से परिवार में प्रेम कूट कूट कर भरा हुआ था!  दादी ने कभी यह नहीं कहा की पोती की बजाय पोता होता!आप और मम्मी तो मुझे पाकर निहाल ही हो गये थे! संस्कार और स्नेह से भरपूर इस घर में हमेशा मुझे सुकून रहा! मैं पूरी तरह से तृप्त रही! इसलिए भगवान से भी खुद के लिए बेटी माँगी!

बचपन से ही आपने पापा के साथ साथ भाई, दोस्त, टीचर सबका रोल निभाया! शाम को आपके आफिस से आने के बाद मैं खिल उठती थी! आपसे पढ़ती, खेलती, आपके साथ घूमने जाती, बातें करती और रक्षाबंधन पर राखी बांधती! आपसे हमेशा अनोखा रिश्ता रहा मेरा! बचपन से ही आपसे गहराई से जुड़ी हुई थी! आपने मुझे बचपन से किताबों से प्रेम करना सिखाया! बचपन में चंपक, बलहँस पढ़ते पढ़ते आज आपकी हर किताब, मैगज़ीन में लेख, कहानियाँ, उपन्यास पढ़ती आ रही हूँ! अब जब आपकी 6 साल की नातिन लिली आपके साथ बैठ कर किताबें पड़ती है, बातें करती है तो मुझे अपना बचपन याद आ जाता हे कि कैसे आपके ऑफ़िस से आने के बाद मैं आपके पीछे पीछे घूमती थी!

बचपन से ही देखा “पापा चुप रहते हैं”! मैंने कभी आपको ऊँची आवाज़ में बोलते नहीं देखा! आपको हमेशा शांत और संतुलित देखा! तेज माइग्रेन(सिरदर्द) में भी आप किसी से कुछ नहीं कहते, खुद ही उठ कर पानी पी लेते! आपको मैंने कभी कुछ इच्छा व्यक्त करते हुए भी नहीं देखा! आपसे दादी और मम्मी कुछ भी पूछते तो आप बस मुस्कुरा देते! इतना सरल कोई कैसे हो सकता है पापा अब सोचती हूँ! कितना कुछ होगा दिल में आपके, उसका थोड़ा सा हिस्सा आपकी लेखनी में पड़ा! दिल को छू लेने वाली कहानियाँ, कविताएँ, लघुकथाएं  आपके मन की गहराई को कुछ हद तक बयान करने लगी! आपकी पहली किताब “कड़वे सच” से मुझे कुछ पता चला की आपने कितना कुछ सहा है! और आपकी दूसरी किताब “छलकता गिलास” से पता चला की आप जो लोगों के जीवन में प्रेम बिखेर रहे हैं उससे उनकी आँखें छलक उठती हैं तो आपके दिल को कितना सुकून मिलता होगा!

मैं 17 साल पहले आपकी 17 साल की बेटी बी॰ ए॰ फ़र्स्ट एयर में “चित्रकला” विषय लेने के लिए मैं आपको और मम्मी को “रावतभाटा” छोड़कर “ उदयपुर” गई! हॉस्टल में 3 महीने ही बीते थे कि आपका फ़ोन आ गया की मम्मी से मिलने आ जाओ! दिल बहुत डर गया था मेरा! मम्मी को ब्रेन हैमरेज हुआ था! कोटा में एडमिट थीं! डॉक्टर आपको जवाब दे चुके थे! पर फिर भी आप स्ट्रोंग बने रहे! मुझे कुछ नहीं बताया! बस यही सोचते रहे कि 17 साल की इकलौती  बेटी को अकेले  कैसे सम्भालेंगे?  अपने दुःख को भूलकर मुझे सम्भालने के बारे में ही सोचते हुए मम्मी की सेवा में लगे रहे! पर ईश्वर को कुछ और ही मंज़ूर था! उन्होंने 7 दिन के अंदर ही 14 नोवेम्बर 2003 को मम्मी को अपने पास बुला लिया! आपने मुझे किस तरह सम्भाला इसको शब्दों में लिखना बहुत कठिन है! आपके त्याग के लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं! आपने वापिस मुझे किसी तरह सम्भाला, हॉस्टल भेजा वापिस व मेरी पी॰एच॰डी॰ तक की शिक्षा पूरी करवाई! खुद अकेले, कभी बाई के हाथों का खाना खा कर, कभी टिफ़िन का तो कभी नमकीन-बिस्कुट खा कर ही काम चला लेते! दादी की ज़िम्मेदारी भी उठाते! आपको अपनो ने भी सहयोग नहीं दिया! तब मुझे यह एहसास हुआ, कि जैसे मैं इकलौती हूँ,आप भी 5 भाई-बहन होते हुए भी इकलौते ही तो हों पापा! हॉस्टल में मम्मी को याद करके जब मैं  टूटने लगती तब आपके पोस्टकार्ड मुझे हिम्मत देते! पूरे हॉस्टल में मैं फ़ेमस हो गई थी कि मिली की तो रोज़ चिट्ठी आती है! एक बार बहुत  परेशान थी तब आपने मुझे एक पत्र लिखा “आधा ख़ाली नहीं,आधा भरा कहो” जो” “अहा ज़िंदगी “ में  2005 में छपा! बी॰ए॰ पूरा होने के बाद में हॉस्टल से घर वापिस आ गई! आपकी प्रेरणा से मैंने छुट्टियों मैं समर कैम्प में छोटे बचों को सिखाना शुरू किया! बच्चों से मुझे खूब प्यार मिलता, तब मैं मम्मी को खोने का ग़म उन पलो में भूल जाती! मुझे ख़ुश देखकर आपको अच्छा लगता! मेरी इच्छा ड्रॉइंग में एम॰ ए॰ करने की थी, पर जब मैं कहने लगी पापा मुझे बाहर जाना पड़ेगा मैं इंग्लिश लिटरेचर में प्राइवेट कर लेती हूँ! पर आप नहीं माने! आपने मुझे जयपुर चित्रकला से एम॰ ए॰ करने भेजा! आपने कहा की अभी की पढ़ाई ज़िंदगी भर काम आएगी! प्राइवेट पढ़ाईं तो बाद में भी कर लेना! सिर्फ़ रोटी बनाने के लिए मैं तुम्हारे सपने टूटने नहीं दूँगा! आप ग्रेट हो पापा! पढ़ाई को लेकर आपने कभी कॉम्प्रॉमायज़ नहीं किया! आप हमेशा से ही बच्चों के लिए प्रेरणास्त्रोत रहें! परमाणु बिजलीघर में वैज्ञानिक अधिकारी होने के साथ साथ आपकी लेखनी भी निखरती गई और 2006 सेप्टेम्बर में आपको राष्ट्र-पति डॉक्टर ए पी जे अब्दुल कलाम जी से केंद्रीय हिन्दी संस्थान दिल्ली की तरफ़ से आत्माराम पुरस्कार मिला!

परमाणु बिजलीघर प्लांट की तरफ़ से आप जब गाँवों में बिजलीघर की जानकारी देने जाते तब आपने देखा की गाँव की बेटियाँ कितनी असक्षम हें! आपने शुरू से ही अपने परिवार वालों, दोस्तों, रिश्तेदारों के लिए तन, मन, धन और खून दें कर खूब सेवा और मदद की पर आपको सार्थकता इन बेटियों के लिए करडीगन, कॉपी, पेन, सरकारी स्कूल में पंखे आदि दे कर ही मिली होगी! आश्चर्य होता है कि आप 58 बार ब्लड डोनेट कर चुके हें! आप तो अभी भी तैयार हें पर आपको सेवानिवृत्त हुए 12 साल हो चुके हें! नेत्रदान, देहदान का फैसला भी आप ले चुके हें!

21 जून 2010 को आपने मुझे अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने दिया और मेरी शादी करवाई! मेरी इस इच्छा का भी मुश्किल से मान रखा कि मेरी शादी के बाद आप अकेले  नहीं रहेंगे, साथ में रहेंगे! आप मेरे जीवनसाथी “आनंद” को मना नहीं कर पाए जब आपका टिकट बुक करवा दिया और आपको अपने साथ लेने के लिए आ गये!

आज भी आप पहले से ज़्यादा सक्रिय हें पापा! हर साल गाँव की बेटियों के लिए अपनी पेन्शन में से 5 प्रतिशत उनकी उच्च शिक्षा के लिए सहायता करते हें! पूरे रावतभाटा के साथ साथ देश में भी बच्चे आपको “दिलीप अंकल” के नाम से जानते हें! आपको देखकर मैंने और आनंद ने भी हर साल गाँव के स्कूल में बच्चों के लिए थोड़ा सा करना शुरू किया है! बहुत सुकून मिलता है इससे पापा!

आपकी प्रेरणा और सहयोग से मैंने 8 मार्च 2011 महिला दिवस पर जयपुर के जवाहर कला केंद्र में “नारी अंतर्मन“ नाम से चित्रकला प्रदर्शनी लगाई उसका प्रोग्राम ई टी वी राजस्थान पर प्रसारित हुआ तो आपको बोहोत ख़ुशी मिली! 19 ऑक्टोबर 2013 को जब मेरी राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में पी॰ एच॰ डी॰ की थीसस जमा हुई तब आपकी आँखे ख़ुशी से भीग गई! आपकी दस साल की तपस्या पूरी हुई उस दिन पापा!

आज आप साहित्य और शिक्षा से गहराई से जुड़े हुए हैं! हर साल उपकार प्रकाशन से आपकी बच्चों के लिए किताब छपती है और देश भर से लाखों बच्चों के फ़ोन आते हैं! तो आपको जीवन में सफल और संतुष्ट पाती हूँ! आपको किसी चीज़ से मोह माया नही हैं! आपका दिल बहुत विशाल और नेक है! इतने ऊँचे पद से रिटायर होने के बाद भी आपका जीवन कितना सादा है पापा! आप इतने सरल हें!

आपने मुझे बचपन से कभी नहीं डाँटा पापा! मेरी हर गलती माफ़ की! मुझे हमेशा प्यार से समझाया! कितनी सहनशक्ति हे आपमें! पर कभी कभी मैं आपको डाँट भी देती हूँ जब लोग आपके सीधेपन का फ़ायदा उठाते हैं! पर फिर भी आप मेरी बात का बुरा नहीं मानते हो और बस मुसकुरा देते हो पापा! ईश्वर को धन्यवाद देती हूँ कि आप आज हमारे साथ हें! आपकी छाँव में मैं अपने आप को सुरक्षित महसूस करती हूँ!’ मेरे साथ साथ आनंद भी आपके कृतज्ञ हैं! आपके संरक्षण में हम तीनों  बहुत सुरक्षित महसूस करते हें पापा! शादी के 10 साल बाद भी हमारा संघर्ष ख़त्म नहीं हुआ है पापा! आनंद ने किसी कारणवश सरकारी नौकरी छोड़ी, मेरी आँखों में भी आजीवन रहने वाली केरटोकोनस डिज़ीज़ से आप अंदर से बहुत दुखी हैं, पर पूरा सहयोग आप ही कर रहे हैं बस पूरी दुनिया में एक! एक आप ही हैं जो इस मुश्किल में हमारे साथ हैं! आप कितना विश्वास करते हें मुझपर! सारी ज़िम्मेदारी आप मुझे मेरी शादी होते ही सौप  चुके हें!

आपकी नातिन लिली भी आपको दिलीप अंकल बोलती है! वो बस अपने नानू जैसी बने यही मेरी इच्छा है पापा! आपके शहद चटाने का थोड़ा भी असर हो जाए तो भी आपकी तरह सफल जीवन जिएगी वो! आपका साथ और आशीर्वाद सदैव मिलता रहे पापा! 6 साल की लिली जब कहती हे की घर में सबसे अच्छे नानाजी हें क्योंकि वो बच्चों को टाइम देते हैं और अपना सारा काम टाइम से कर लेते हैं! आपने संस्कार लिली में अभी से ही देखकर मुझे बहुत  अच्छा लगता हे पापा!

आपको धन्यवाद देने के लिए अब मेरे पास शब्द नहीं हैं पापा! बहुत सारा प्यार! अपने पापा के साथ साथ मम्मी का भी रोल निभाया पापा 17 साल से ! साथ रहकर भी कुछ बातें बोली नहीं जाती इसलिए इस पत्र के माध्यम से दिल की कुछ बातें लिखी हैं आपको! हैपी फादर डे वर्ल्ड के बेस्ट पापा द ग्रेट!

आपकी बेटी

डॉक्टर मिली!

Dr Mili Bhatia Artist

Rawatbhata Rajasthan

Mobile no 9414940513

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पितृ दिवस विशेष – पिता ही कर पाए ☆ सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। एच आर में कई प्रमाणपत्रों के अतिरिक्त एच. आर.  प्रोफेशनल लीडर ऑफ द ईयर-2017 से सम्मानित । आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह  “Sahyadri Echoes” में प्रकाशित हुई है। पितृ दिवस पर आज प्रस्तुत है उनकी विशेष रचना – पिता ही कर पाए )

? पितृ दिवस विशेष – पिता ही कर पाए ?

 

छाव बनकर जो छा जाए ,

पग-पग पर पथ दर्शाए ,

चोट लगे तो दवा बन जाए,

ये तो केवल इक पिता ही कर पाए ,

**

ऊँगली पकड़ जो चलना सिखाये ,

हार कर भी हमसे जो हर्षाए ,

हर दुःख से जो हमको बचाए,

ये तो केवल इक पिता ही कर पाए ,

**

हमारी ख़ुशी में जो खुद मुस्कुराए,

हर तूफ़ां के लिए चट्टान बन जाए,

हर ज़िद्द हमारी सर-आँखोँ से लगाए,

ये तो केवल इक पिता ही कर पाए ,

**

अपनी इच्छाओं को दबा हमारी खुशी परवान चढ़ाए,

इक मुस्कान के लिए हमारी कर जाए सौ उपाए,

हर परिस्तिथि में जो जीने की कला सिखलाए,

ये तो केवल इक पिता ही कर पाए ,

**

सख्त बनकर-बुरा बनकर भी प्यार जताए,

कठोर बनकर अनुशासन में रहना सिखाए,

माँ की तुलना में कम कहलाना अपनाए,

ये तो केवल इक पिता ही कर पाए ,

**

प्यार ना जता कर निष्ठुर कहलाए,

बच्चो की नज़रो में निर्दयी बन जाए,

ऊंचा दर्जा ना पा कर भी प्यार जताए,

ये तो केवल इक पिता ही कर पाए .

 

© सुश्री दीपिका गहलोत  “मुस्कान ”  

पुणे, महाराष्ट्र

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – वो वीर तिरंगे का वारिस था ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज आपके “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण , समसामयिक एवं ओजस्वी रचना  – वो वीर तिरंगे का वारिस था।  

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  वो वीर तिरंगे का वारिस था ☆

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

जलाया होगा खुद का जिस्म बारूद गोलों से,

और फिर अनेकों गोलीयां सीनें पर खाई होगी।

दुश्मन के खून से खेली होगी सीमा पर होली,

इस तरह वतन परस्ती की रस्म निभाई होगी।।1।।

हिम्मत से मारा होगा दुश्मन को सरहद पे,

इस तरह मां की आबरू उसने बचाई होगी।

पहना होगा तिरंगे का कफन हमारी खातिर,

इस तरह अपनी‌ पूंजी वतन पे लुटाई होगी।।2।।

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

घर बार वतन वो छोड़ चला,चमन चहकता छोड़ चला ।

दुश्मन की कमर तोड़ने वह,अंधी मां को घर छोड़ चला।

गलियों में गांव के पला बढ़ा, सबका राज दुलारा था।

अंधी की कोख से पैदा था, उसके जीवन का सहारा था।।1।।

आंखों से देख सकी न उसे, खुशबू  से पहचानती थी।

पदचापों की आहट से, वह अपने लाल को जानती थी।

जब लाल सामने होता तो, उसको छू कर दुलराती थी।

मुख माथा चूम चूम उसका, उसको गले लगाती थी।।2।।

वह पढ़ा लिखा जवान हुआ, सेना का दामन थाम लिया था ।

उस दिन टटोल वर्दी हाथों से,  मां ने उसको सहलाया था।

अब वतन लाज तेरे हाथों, वर्दी  का मतलब बतलाया था।

उसको गले लगा करके,अपनी ममता से नहलाया था।।3।।

 

वतन पे मरने का मकसद ले, सरहद की तरफ बढ़ा था वह।

अपने ही वतन के गद्दारों की,  नजरों में आज चढ़ा था वह।

जम्मू कश्मीर जल रहा था, थे नौजवान बहके बहके।

आगे दुश्मन की गोली थी, पीछे हाथों में पत्थर थे।।4।।

 

वह अभिमन्यु बन चक्रव्यूह में,खड़ा खड़ा बस सोच रहा।

समझाउं उसको या मारूं,  ना समझ पड़ा बस देख रहा।

क्या करें वो कैसे समझाये, कानून के हाथों बंधा हुआ।

सीने में गोली सिर पे पत्थर,खाता फिर भी तना हुआ ।।5।।

पीछे अपनों के पत्थर है, आगे दुश्मन की ‌गोली है।

मेरे शौर्य उठती उंगली है कुछ लोगों की कड़वी  बोली है।

इस तरह खड़ा कुछ सोच रहा, उसको बस समझ नहीं आया।

अपनों से बच गैरों से निपट यह सूत्र काम उसके आया।।6।।

अपनों की मार सही उसने,उफ़ ना किया ना हाथ उठा,

अंतहीन लक्ष्य साथ ले सरहद पे चला वह क़दम बढ़ा।

अपनी तोपों के गोलों से दुश्मन का हौसला तोड़ दिया। ।

पीछे को दुश्मन भाग चलाउनके रुख को वह मोड़ दिया ।।7।।

 

धोखे से बारूद पे पांव पड़े तब उसमें विस्फोट  हुआ।

मरते मरते जय हिन्द बोला सरहद पे उसकी जली चिता।

सरहद पे जिसकी चिता जली वो असली हिंदुस्तानी था।

जो जाति धर्म से ऊपर उठकर मातृभूमि बलिदानी था ।।8।।

कर्मों से इतिहास ‌लिखा इक अंधी मां का बेटा है।

उसने भी अपने सीने में इक हिंदुस्तान ‌समेटा है।

अपनों के नफरत‌ से वह  घायल था बेहाल था।

वो वीर तिरंगे का वारिस था भारत मां का लाल था ।।9 ।।

 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 16 ☆ दिवाना ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है उनकी एक  श्रृंगारिक कविता “दिवाना“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 16 ☆

☆ दिवाना

अगं मी तुझा दिवाना, आता नको बहाना

खुणवूनी दूर जाशी, ये बाहूपाशी ये नां !!

 

तुझी ती मयुरचाल, अन् ते हेलकावे

एका लयीत हलती, कानातली ती बाळे

घायाळ मजशी केले, फेकून नयनबाणा

अगं मी तुझा दिवाना…..!!

 

रसदार ओठ दोन्ही, अन् केस रेशमाचे

गालातली खळी ती, नयनात मोर नाचे

किती वेळ खेळशी गं, हा खेळ जीवघेणा

अगं मी तुझा दिवाना……..!!

 

तू रात्रभर पौर्णिमेची, दुग्धात नाहलेली

तू शुक्रतारका गं, पहाटेस चिंब ओली

तुज संगमरवरीला, बिलगून राहू दे नां

अगं मी तुझा दिवाना……..!!

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – चतुर्दश अध्याय (1) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

चतुर्दश अध्याय

गुणत्रय विभाग योग

(ज्ञान की महिमा और प्रकृति-पुरुष से जगत् की उत्पत्ति)

श्री भगवानुवाच

परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानं मानमुत्तमम् ।

यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ।।1।।

 

श्री भगवान ने कहा-

तुम्हें बताता हॅू पुनः, ज्ञानों का भी ज्ञान

जिसे जानकर सिद्ध मुनि पा जाते निर्वाण।।1।।

 

भावार्थ :  श्री भगवान बोले- ज्ञानों में भी अतिउत्तम उस परम ज्ञान को मैं फिर कहूँगा, जिसको जानकर सब मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गए हैं।।1।।

 

I will again declare (to thee) that supreme knowledge, the best of all knowledge, having known which all the sages have gone to the supreme perfection after this life.।।1।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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English Literature – Poetry (भावानुवाद) ☆ आ गए तुम ?/Is that you? – सुश्री निधि सक्सेना ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

Captain Pravin Raghuvanshi ji  is not only proficient in Hindi and English, but also has a strong presence in Urdu and Sanskrit.   We present an English Version of renoknowned author  Ms. Nidhi Saxena ji’s  Classical Poetry आ गए तुम ? with title  “Is that you?”   We extend our heartiest thanks to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for this beautiful translation.)

त्रुटि  सुधार: इंटरनेट पर यह सुप्रसिद्ध कविता कई नामों से चल रही है। उसी क्रम में हमने इसे परम आदरणीया स्व. महाश्वेता देवी जी के नाम से प्रकाशित कर दिया था। बाद में हमें प्रबुद्ध पाठक मित्रों द्वारा ज्ञात हुआ कि यह रचना सुश्री निधि सक्सेना जी की है जिसे हम ससम्मान प्रकाशित कर रहे हैं एवं इस अज्ञातवाश हुई त्रुटि के लिए हम हार्दिक खेद प्रकट करते हैं। हम आदरणीया सुश्री निधि सक्सेना जी की ऐसी ही उत्कृष्ट रचनाएँ भविष्य में प्रकाशित करने का प्रयास करेंगे। 

आपसे अनुरोध है कि आप इस रचना को हिंदी और अंग्रेज़ी में आत्मसात करें। इस कविता को अपने प्रबुद्ध मित्र पाठकों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें और उनकी प्रतिक्रिया से  इस कविता केअनुवादक कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी को अवश्य अवगत कराएँ.

सुश्री निधि सक्सेना जी की मूल कविता  – आ गए तुम ? ☆

आ गए तुम,

द्वार खुला है अंदर आओ…!

पर तनिक ठहरो,

ड्योढ़ी पर पड़े पाएदान पर

अपना अहं झाड़ आना…!

 

मधुमालती लिपटी हुई है मुंडेर से,

अपनी नाराज़गी वहीं

उँडेल आना…!

 

तुलसी के क्यारे में,

मन की चटकन चढ़ा आना…!

 

अपनी व्यस्तताएँ,

बाहर खूँटी पर ही टाँग आना।

जूतों संग हर नकारात्मकता

उतार आना…!

 

बाहर किलोलते बच्चों से

थोड़ी शरारत माँग लाना…!

 

वो गुलाब के गमले में मुस्कान लगी है,

तोड़ कर पहन आना…!

 

लाओ अपनी उलझनें

मुझे थमा दो,

तुम्हारी थकान पर

मनुहारों का पंखा झुला दूँ…!

 

देखो शाम बिछाई है मैंने,

सूरज क्षितिज पर बाँधा है,

लाली छिड़की है नभ पर…!

 

प्रेम और विश्वास की मद्धम आँच पर

चाय चढ़ाई है,

घूँट घूँट पीना,

 

सुनो, इतना मुश्किल भी नहीं है जीना…!

 

महाश्वेता देवी

❃❃❃❃❃❃❃❃❃❃

☆ Is that you? ☆

 

Is that you?

Come on in,

the door is open.

 

Just hold on!

There is a  doormat

lying outside the door,

Please drop

your ego there!

 

Madhu Malti creeper

is wrapped

around the parapet,

Pour all your

heartburns on it!

 

Offer the grudges

of your mind

Outside,

In the basil-bed!

 

Please hang

all your preoccupations

On the peg

outside!

 

Kindly remove

all your negativity

along with your shoes

at the door!

 

Bring a little mischief

from the naughty children

playing  out there!

 

With the rose,

are grown the smiles,

Pluck

and garland yourself!

 

Look!

I’ve laid out the evening,

Tied the sun

on the horizon,

Sprayed the carnation

on the sky!

 

Making the tea

on the slow flame of

love and faith,

Savour it, sip by sip!

 

Listen friend,

Ever pondered,

Even, life is not

so difficult to live!

 

© Captain (IN) Pravin Raghuanshi, NM (Retd),

Pune

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