मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ पंडित संजीव अभ्यंकर ☆ श्री प्रसाद जोग

☆ मनमंजुषेतून ☆ पंडित संजीव अभ्यंकर ☆ श्री प्रसाद जोग ☆

पंडित संजीव अभ्यंकर

वाढदिवस / जन्म : ५ ऑक्टोबर १९६९

त्यांना घरातच गुरु हजर होता. त्यांची आई शोभा अभ्यंकर यांनी त्यांना प्राथमिक  सांगीतिक  धडे दिले. पं. गंगाधरबुवा पिंपळखरे यांनी  संजीव अभ्यंकर याना  मार्गदर्शन केले. हिराबाई बडोदेकर आणि वसंतराव देशपांडे यांनी त्यांना जसराजांकडे शिकायला पाठविण्याची शिफारस केली. जसराजांचे शिष्यत्व स्वीकारल्यानंतर त्यांची दिनचर्या पूर्णत: बदलली.

गुरु शिष्य परंपरेप्रमाणे शिक्षण घेण्यासाठी गुरूच्या घरातील वेगळा दिनक्रम सुरु झाला. आपले आपण उठून शिष्यांनी रियाजाच्या खोलीत रियाज सुरू करावा, अशी गुरुजींची   शिकवण होती. त्यांच्या घराच्या गच्चीत रियाजाची छोटी खोली होती. तिथे जाऊन गायला बसायचे, त्यांना मनात येईल तेव्हा जसराज यायचे आणि शिकवायचे. त्यांनी शिकवलेले सकाळ, दुपार, संध्याकाळ असे तीन वेळा गायचे असा नियम होता. त्या त्या वेळचे राग म्हणायचे. रोज तेव्हा चार ते साडेचार तास गायन व्हायचे. त्यावेळी गळा तयार करायचा होता त्यामुळे सगळे राग गळ्यावर चढवायचा रियाज असायचा.

गुरु-शिष्य परंपरेनुसार त्यांचे शिक्षण चालू असताना,पं. जसराजांच्याबरोबर भारतभर दौरे, संगीत मैफिलींमध्ये त्यांना साथ-संगत आणि त्याचवेळी हिंदुस्तानी संगीतातील अभिजात स्वरांचे धडे, अशा नानाविध मार्गांनी त्यांची सांगीतिक प्रगती झाली . अकराव्या वर्षी संगीताची पहिली मैफल गाजविणार्‍या संजीव अभ्यंकरांनी त्यानंतर देशभरातील विविध महोत्सवांमध्ये आपल्या गायकीची छाप पाडली.

देशभरातील प्रख्यात संगीत महोत्सव आणि परदेशातील अमेरिका, कॅनडा, ऑस्ट्रेलिया, आफ्रिका या भागांतही  पं.संजीव अभ्यंकरांची गायकी  पोचली आहे. अभिजात शास्त्रीय संगीताबरोबर पार्श्वगायन, भावसंगीत आणि भक्तिसंगीताच्या प्रांतांतही त्यांनी स्वतःची छाप  उमटवली. हिंदी-मराठी भजने आणि बंदिशींच्या माध्यमातून  देशभरातील संगीतरसिकांच्या घरांत त्यांचे नाव पोचले आहे. स्वतःच्या काही बंदिशी रचून त्यांनी स्वतंत्र ओळख निर्माण केली आहे.

महाराष्ट्र शासनाने समर्थ रामदास स्वामी लिखित “दासबोध “पं.संजीव अभ्यंकरांच्या कडून गाऊन घेतला आहे व तो शासनाच्या अधिकृत संकेतस्थळावर उपलब्ध आहे व तो विनाशुल्क डाउन लोड करता येतो.

‘माचिस’, ‘निदान’, ‘दिल पे मत ले यार’ अशा चित्रपटांसाठी त्यांनी पार्श्वगायन केले आहे. ‘गॉडमदर’ चित्रपटातील गाण्यासाठी त्यांना राष्ट्रीय पुरस्काराने सन्मानित करण्यात आले आहे. पं. जसराज जीवनगौरव पुरस्कार, सूररत्‍न यांसारख्या अनेक पुरस्कारांनी त्यांना सन्मानित करण्यात आले आहे. मध्य प्रदेश शासनाने ‘कुमार गंधर्व पुरस्कार’ देऊन त्यांना गौरवले आहे.ऑल इंडिया रेडिओ ने १९९० साली त्यांना उत्कृष्ठ पार्श्वगायकाचा पुरस्कार दिला होता.

थोड्या  दिवसांपूर्वी आयॊध्येला राममंदिराच्या उभारणीच्या भूमिपूजनाचा कार्यक्रम झाला आणि जगभरातली सर्वाना ध्यान लागलें रामाचें त्या प्रित्यर्थ पंडित संजीवजीं नी गायलेला अभंग

ध्यान लागलें रामाचें । दुःख हरलें जन्माचें

राम पदांबुजावरी । वृत्ति गुंतली मधुकरी

रामवदनमयंकीं । चक्षुचकोर जाले सुखी

तनुमेघश्याम मेळे । चित्तचातक निवाले

कीर्तिसुगंधतरुवरी । कुजे कोकिळा वैखरी

रामीरामदासस्वामी । प्रगटले अंतर्यामीं

यूट्यूब लिंक >>>  ध्यान लागलें रामाचें

पंडित संजीव अभ्यंकरांना  वाढदिवसाच्या खूप खूप शुभेच्छा .

 

© श्री प्रसाद जोग

सांगली.

९४२२०४११५०

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – अष्टदशोऽध्याय: अध्याय (8) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय 18  

(सन्यास   योग)

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन ।

सङ्‍गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः ।।9।।

निर्धारित सब कर्म तो पार्थ कार्य रूचि साथ

फल इच्छा को त्याग कर करना ही है त्याग ।।9।।

भावार्थ :  हे अर्जुन! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भाव से आसक्ति और फल का त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है।।9।।

Whatever obligatory  action  is  done,  O  Arjuna,  merely  because  it  ought  to  be  done, abandoning attachment and also the desire for reward, that renunciation is regarded as Sattwic!।।9।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ लेखनी सुमित्र की – दोहे ☆ डॉ राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

डॉ राजकुमार तिवारी ‘सुमित्र’

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी  हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं आपके अप्रतिम दोहे । )

  ✍  लेखनी सुमित्र की – दोहे  ✍

दोपहर सी है जिंदगी ,गोधूलि है पास।

 याद बावली हो गई, चंद्रकिरन की आस।।

क्या होगा यदि ले लिया ,यादों ने वनवास ।

जीवन बाबा भारती, एक आस विश्वास ।।

एक जिल्द सी ज़िंदगी ,अनगिन है अध्याय।

बहुमत में आरोप है ,कहां मिलेगा न्याय।।

खोकर ही पाया तुम्हें ,कैसा अजब विधान।

चुप्पी साधे संतजन, चुप साधे विज्ञान।।

लो अनंग में हो गया, यानी हुआ विदेह।

चमत्कार अनुभव किया, छूकर तेरी देह।

© डॉ राजकुमार “सुमित्र”

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # 18 – नदी हमारे गाँव  ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा ,पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित । 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है।  आज पस्तुत है आपका अभिनव गीत  “नदी हमारे गाँव । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 18– ।। अभिनव गीत ।।

☆ नदी हमारे गाँव 

 

नदी हमारे गाँव

वेदना में डूबी रहती

पानी सूख गया फिर भी

आँसू से है बहती

 

इसकी आँखों में सचेत सा

था भविष्य उजला

जो बहने की प्रखर भूमिका

से था बस बहला

 

रेत पत्थरों में विनम्र हो

सदा बही है वह

और अभी भी ना जाने

कितने गम है सहती

 

सारा तन छिल गया

सूखते पानी का अपना

किन्तु उमीदों में पलता

वह ना डूबा सपना

 

नदी, नदी है अपना दुख

ढोती बहती जाती

अन्तर्मन की यह पीड़ा

खुद से भी ना कहती

 

पूछ रहा था पानी का

रिश्ता परसों सूरज

तुम्हें बहुत बहना है जब

क्यों छोड़ चुकी धीरज

 

बहना और सूख जाना

तो लक्षण  पानी के

एक यही पीड़ा क्यों

तुमको लगी यहाँ महती

 

© राघवेन्द्र तिवारी

26-06-2020

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ आँख ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )

☆ संजय दृष्टि  ☆ आँख

1)

देखती हैं वर्तमान,

बुनती हैं भविष्य,

जीती हैं अतीत,

त्रिकाल होती हैं आँखें…!

2)

देखती हैं वर्तमान,

बुनती हैं भविष्य,

जीती हैं अतीत,

निराकार काल

आकार में ढलता है,

आँख के साँचे में

उतरता है…!

 

दृष्टि स्पष्ट और स्वच्छ रहे। शुभ दिन।

©  संजय भारद्वाज 

12.21 रात्रि,  2.10.2020

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेष कुशल # 12 ☆ व्यंग्य ☆ गैंग रेप : शर्म का नहीं सियासत का विषय है ☆ श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन 

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक  समसामयिक विषय पर व्यंग्य  “गैंग रेप : शर्म का नहीं सियासत का विषय है। इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से हम आपसे उनके सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य साझा करने का प्रयास करते रहते हैं । श्री शांतिलाल जैन जी के व्यंग्य में वर्णित सारी घटनाएं और सभी पात्र काल्पनिक होते हैं ।यदि किसी व्यक्ति से इसकी समानता होती है, तो उसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा। हमारा विनम्र अनुरोध है कि श्री शांतिलाल जैन जी के प्रत्येक व्यंग्य  को हिंदी साहित्य की व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल # 12 ☆

☆ व्यंग्य – गैंग रेप : शर्म का नहीं सियासत का विषय है 

अब यह तो पता नहीं कि ये सरकारों के सुशासन का ही परिणाम है या नारी सशक्तीकरण आंदोलनों की सफलता, मगर जो भी हो, एक अच्छी बात यह है कि बलात्कार करना आसान सा अपराध नहीं रह गया है. इतना तो हो ही गया है कि अकेले रेप करने की हिम्मत अब कम ही लोग कर पाते हैं. सामूहिक रूप से गैंग बना कर करना पड़ता है. एक से भले दो, दो से भले चार. पैन इंडिया – नोयडा, बैतूल, बेटमा, जयपुर, बलरामपुर, मुंबई, कोलकत्ता, चंडीगढ़. नई सभ्यता, नये समाज का नया नार्म है – गैंग रेप. नया चलन, नई फैशन. एक आरोपी से मैंने पूछा – “गैंग कैसे बनाते हैं आप ? मेरा मतलब है मिनिमम कितने आदमी रखते हैं ?”

“चार तो होना ही चाहिये. चार में, कम से कम, एक दो लड़के सांसदो के, विधायकों के, पार्षदों के, सरपंच के भांजे, भतीजे रख लेते हैं. मंत्रीजी का लड़का हो तो सोने में सुहागा.”

“टाइमिंग का भी ध्यान रखना पड़ता होगा आपको ?”

“बिल्कुल. हमसे कुछ केसेस में टाइमिंग की ही मिस्टेक हुई. जब संसद का सत्र चल रहा हो, विधान सभा चल रही हो या किसी सूबे में चुनाव नजदीक हों, तब नहीं करना चाहिये. मामला ज्यादा तूल पकड़ लेता है. समूची बहस पीड़िता से हट कर इस बात पर आ टिकती है कि उसकी जाति-समाज के वोट कितने प्रतिशत हैं ? पीड़िता दलित है कि महादलित ? दलित है तो जाटव है कि गैर जाटव ? रेप से सूबे की सरकार पर क्या असर पड़ेगा ? सोशल इंजिनियरिंग दरक गयी तो सूबेदार फिर से सत्ता में आ पायेगा कि नहीं ? सामूहिक बलात्कार कैसे सूबे की सरकार के लिए कैसे राजनीतिक चुनौती बन सकता है ? रेप हमारे लिये एक प्रोजेक्ट है तो सियासतदानों के लिये सुपर-प्रोजेक्ट. इसीलिये सोचते हैं आगे से इस पीरियड में ‘नो-गैंगरेप-डेज’ डिक्लेयर कर देंगे.”

“गैंगरेप में बड़ी बाधा क्या है ?”

“मीडिया से परेशानी है. शहरों में, शहरों के आसपास मीडिया हाइपर-एक्टिव है. हमारे छोटे-छोटे प्रोजेक्ट्स भी हाइप का शिकार हो जाते हैं. इसीलिये हमें दूर गांवो में अन्दर जाना पड़ता है. शिकार नाबालिग हो, आदिवासी हो, गरीब हो, ठेठ गांव के पास बाजरे जुआर के खेत में हो तो केसेस लाइट में नहीं आ पाते. जो पीड़िताएँ दिल्ली नहीं ले जाईं जाती उनके केस में बवाल इतना नहीं कटता.”

“रेप कर चुकने के बाद खर्चा तो लगता होगा ना.”

“ओह वेरी मच. बाद में ही ज्यादा लगता है. लीगल एक्सपेंसेस  भारी पड़ते हैं. अस्पताल, पोस्ट-मार्टम, पुलिस, वकील, गवाह, कोर्ट- कचहरी,  मुंशी,  मोहर्रिर. सब जगह पैसा तो लगता ही है, फीस कम रिश्वतें ज्यादा. मीडिया जितना ज्यादा कवर करता है पैसा उतना ज्यादा लगता है. लेकिन, जैसा मैंने आपको बताया कि व्यापारी, उद्योगपति, अफसर, किसी बड़े बल्लम का बेटा साथ में हो तो फिनांस मैनेज हो जाता है.”

“कभी शर्म लगती है आपको ?”

“हमारी छोड़िये सर, किसे लगती है अब ? सियासत की दुनियां में हम शर्म के विषय नहीं रह गये है.”

“तब भी अपराधी कहाने से डर तो लगता होगा ?”

“किसने कहा हम अपराधी हैं. हम या तो ठाकुर हैं या ब्राह्मण हैं या दलित हैं या महादलित हैं. जाति अपराध पर भारी पड़ती है सर. पॉवर पोजीशन में अपनी जाति का आदमी बैठा हो तो नंगा नाच सकते हैं आप. कोई टेंशन नहीं है.”

“पुलिस वालों को नहीं रखते हैं टीम में ?”

“नहीं, वे अपनी खुद की गैंग बनाकर थाने में ही कर लेते हैं. हमारे साथ नहीं आते.”

“आगे की योजना क्या है ?”

वे सिर्फ मुस्कराये और थैंक्यू कह कर चले गये. जल्दी में हैं. गैंग के बाकी सदस्य इंतज़ार कर रहे होंगे उनका, एक दो प्रोजेक्ट्स प्लान कर लिये हैं उन्होंने. आखिर दुनिया की आधी आबादी उनके लिये एक शिकार है और जीवनावधि छोटी. कब पूरे होंगे उनके सारे प्रोजेक्ट्स!!!

 

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

(ई-अभिव्यक्ति किसी व्यंग्य /रचना की वैधानिक जिम्मेदारी नही लेता। लेखकीय स्वतंत्रता के अंतर्गत प्रस्तुत।)

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 64 ☆ लघुकथा – विसर्जन ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी  की एक सार्थक लघुकथा – विसर्जन । ) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 64

☆ लघुकथा – विसर्जन ☆ 

एक बार कबूतरों के झुंड से एक कबूतर को निकाल दिया गया, तो उस कबूतर ने एक तखत में कब्जा कर प्रवचन देने प्रारंभ कर दिए,श्रोता जुड़ते गए… अच्छा विचार विमर्श होता रहता।

जीवन में अनुशासन और मर्यादा की खूब बातें होती, फिर प्रवचन देने का काम बारी बारी से दो और कबूतर करने लगे। बढ़िया चलने लगा, तखत से नये नये प्रयोग होने लगे, और ढेर सारे कबूतर श्रोता बनके जुड़ने लगे, अनुशासन बनाए रखने की तालीम होती रहती,नये नये विषयों पर शानदार प्रवचनों से श्रोता कबूतरों को नयी दृष्टि मिलने लगी, विसंगतियों और विद्रूपताओं पर ध्यान जाने लगा।

एक कबूतरी पता नहीं कहां से आई, और सबके रोशनदान से घुसकर गुटरगू करने लगी, सबको खूब मज़ा आने लगा, प्रवचन देने वाले पहले कबूतर का ध्यान भंग हो गया, कबूतर अचानक संभावनाएं तलाशने लगा, कबूतरी महात्वाकांक्षी और अहंकारी थी, आत्ममुग्धता में अनुशासन और मर्यादा भूल जाती थी।

एक दिन प्रवचन चालू होने वाले थे तखत में प्रवचन करने वाले दोनों कबूतर बैठ चुके थे ,क्रोध में चूर कबूतरी तखत के चारों ओर उड़ने लगी, प्रवचन चालू होने के पहले बहसें होने लगीं, श्रोता कबूतरों ने कहा ये तो महा अपकुशन हो गया, शुद्ध तखत के चारों तरफ अशुद्ध कबूतरी को चक्कर नहीं लगाना था। फिर उसी रात को ऐसी आंधी आयी कि जमा जमाया तखत उड़ गया। सारे कबूतर उड़ गए, दो दिन बाद किसी ने बताया कि भीषण आंधी से तखत उड़ कर टूट गया था इसीलिए उसका विसर्जन कर दिया गया।

 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765
≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ निधि की कलम से # 21 ☆ महात्मा गांधी ☆ डॉ निधि जैन

डॉ निधि जैन 

डॉ निधि जैन जी  भारती विद्यापीठ,अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पुणे में सहायक प्रोफेसर हैं। आपने शिक्षण को अपना व्यवसाय चुना किन्तु, एक साहित्यकार बनना एक स्वप्न था। आपकी प्रथम पुस्तक कुछ लम्हे  आपकी इसी अभिरुचि की एक परिणीति है। आपका परिवार, व्यवसाय (अभियांत्रिक विज्ञान में शिक्षण) और साहित्य के मध्य संयोजन अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है  आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण कविता  “महात्मा गांधी”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆निधि की कलम से # 21 ☆ 

☆ महात्मा गांधी

 

हर आत्मा की जान, मेरे कंठ से कैसे करूँ उनका गुणगान,

मेरे शब्द छोटे, बात बड़ी, महात्मा जिनका नाम।

 

आजादी का रास्ता दिखला, कर खुद को कुर्बान,

साबरमती का संत, बापू जिनका नाम,

सत्य अहिंसा का पाठ पढ़ाया, कर खुद को कुर्बान,

युगों युगों तक सदा रहेगा, अमर जिनका नाम,

हर आत्मा की जान, मेरे कंठ से कैसे करूँ उनका गुणगान,

मेरे शब्द छोटे, बात बड़ी, महात्मा जिनका नाम।

 

कद में छोटे, बात बड़ी करते, कर्म जिनका महान,

खादी, चरखा, सत्याग्रह जिनकी पहचान,

आँखों की ऐनक और खादी जिनकी जान,

जात-पात की तोड़ दी जंजीरे, वैसे बापू महान,

हर आत्मा की जान, मेरे कंठ से कैसे करूँ उनका गुणगान,

मेरे शब्द छोटे, बात बड़ी, महात्मा जिनका नाम।

 

आओ इस दिवस पर एक हो जाएँ हम,

अपने आप को अपने आप से ऊपर उठाएँ हम,

कॉलेज की भूमि को स्वच्छ बनाएँ हम,

एक नया इतिहास रचाएँ हम,

हर आत्मा की जान, मेरे कंठ से कैसे करूँ उनका गुणगान,

मेरे शब्द छोटे, बात बड़ी, महात्मा जिनका नाम।

 

©  डॉ निधि जैन,

पुणे

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी #11 ☆ तितलियाँ ☆ श्री श्याम खापर्डे

श्री श्याम खापर्डे 

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं । सेवारत साहित्यकारों के साथ अक्सर यही होता है, मन लिखने का होता है और कार्य का दबाव सर चढ़ कर बोलता है।  सेवानिवृत्ति के बाद ऐसा लगता हैऔर यह होना भी चाहिए । सेवा में रह कर जिन क्षणों का उपयोग  स्वयं एवं अपने परिवार के लिए नहीं कर पाए उन्हें जी भर कर सेवानिवृत्ति के बाद करना चाहिए। आखिर मैं भी तो वही कर रहा हूँ। आज से हम प्रत्येक सोमवार आपका साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी प्रारम्भ कर रहे हैं। आज प्रस्तुत है एक समसामयिक भावप्रवण रचना “लाॅकडाऊन”।  श्री श्याम खापर्डे जी ने  इस कविता के माध्यम से लॉकडाउन की वर्तमान एवं सामाजिक व्याख्या की है जो विचारणीय है।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # 10 ☆ 

☆ तितलियाँ ☆ 

 

आसमान में उड़ती

ये रंग बिरंगी तितलियाँ

रंगीन परों से रंग बिखेरती

रंग बिरंगी तितलियाँ

हर किसी का मन लुभाती

रंग बिरंगी तितलियाँ

आँखों को कितना सुहाती

रंग बिरंगी तितलियाँ

लाल, गुलाबी, सफेद,काली

भूरी बैंगनी,हरी, पीली

नारंगी, सुनहरी, नीली

कुछ चाँदी सी चमकती

ये मनभावन तितलियाँ

ये फूलों पर मंडराती

उनपर परागकण लुटाती

कलियों को फूल बनाती

ये परोपकारी तितलियाँ

भ्रमरों के संग खेलती रहती

पर सदा उनसे बचकर रहती

ये भोली भाली तितलियाँ

ईश्वर बुरी नजर से

इन को  बचाये

तितलियों पर कोई

आँच ना  आये

वाटिका की जान है

श्रृंगार है, शान है

सदा यूं ही उड़ती जाये

आसमान में पर फैलायें

रंगों सी झिलमिलाती

छोटी बड़ी तितलियां

 

© श्याम खापर्डे 

03/10/2020

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़)

मो  9425592588

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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सूचना/Information ☆ अभिप्राय ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ वाचकांचे अभिप्राय 

सौ. गौरी गाडेकर यांची मध्यम वर्ग ही कविता ?? मध्यम  वर्गाचे जिवंत चित्र   डोळ्यासमोर उभे राहिले .

इ-अभिव्यक्ती मुळे कवी/कवियित्री ,लेखक/लेखिका चे नवीन  विचार कळतात. मनाला सध्याच्या lockdown च्या कंटाळलेल्या  मनाला चांगलाच विरंगुळा होतो.

E-abhivyakti संस्थेचे आणि त्या साठी निरपेक्ष परिश्रम घेणा-यांचे  मनापासून आभार ?????

 

100%✅?? गोष्ट आमच्या सारख्या retirement कडे आलेल्या staffची अशीच सुरुवातीला घुसमट झाली खरी पण जिद्दीने शिकून घेतले. तरलो

  – सौ. शशी नाईक-नाडकर्णी

 

आभार 

सम्पादक मंडळ (मराठी) 

श्रीमती उज्ज्वला केळकर 

Email- kelkar1234@gmail.com WhatsApp – 9403310170

श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

Email –  soorpandit@gmail.com) WhatsApp – 9421225491

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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