हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 9 – दादा साहब फाल्के….3 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : दादा साहब फाल्के…. पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 9 ☆ 

☆ हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : दादा साहब फाल्के….3 ☆ 

जब विवाद बहुत बढ़ गया तो कम्पनी ने फ़िल्म निर्माण का ज़िम्मा उनके साथ पहली फ़िल्म से जुड़े साथियों मामा शिंदे, अन्ना सालुंखे, गजानन साने, त्र्यम्बक बी तेलंग, दत्तात्रेय तेलंग और नाथ तेलंग को सौपने का निर्णय किया। उन सब के द्वारा ज़िम्मेदारी लेने पर फाल्के को क्षतिपूर्ति भुगतान नहीं करना होगा। फाल्के ने बहुत दुखी मन से कम्पनी और बम्बई छोड़कर काशी प्रवास का निर्णय किया और सबकुछ त्याग कर सपरिवार काशी चले गए। उन्होंने पूरी कहानी नवयुग नामक अख़बार में प्रकाशित करवाई।

वे काशी में पुराने मित्र नारायण हरी आपटे से मिलकर घुमंतू नाटक संस्था “किर्लोसकर नाटक मंडली” से जुड़ गए जिसमें शंकर बापू जी मजूमदार, मनहर बर्वे और गणपत राव बर्वे कार्यरत थे। उन्होंने तात्कालिक नाट्य स्थिति पर व्यंग करते हुए मराठी में रंगभूमि नाटक लिखा। तभी बाल गंगाधर तिलक और पुराने साथी जी. एस. खपार्डे कांग्रेसी अधिवेशन में भाग लेने आए, उन्हें नाटक सुनाया तो उन्होंने आर्यन सिनेमा पूना में नाटक का मंचन शुरू करवाया  जो एक साल चला। नाटक का मंचन बम्बई के बलिवला थिएटर में 1922 में हुआ, उसके बाद नासिक में मंचित हुआ। उसके बाद फाल्के काशी में जम गए।

उन्होंने जमशेद जी के मदन थिएटर के लिए फ़िल्म बनाने का प्रस्ताव सहित अनेकों प्रस्ताव ठुकरा दिए तब संदेश अख़बार के सम्पादक अच्युत कोलहाटकर ने उनसे निर्णय बदल कर फ़िल्मी दुनिया में फिरसे आकर फ़िल्म बनाने का सुझाव दिया जिसके उत्तर में फाल्के ने पत्र में लिखा कि “फ़िल्मों के लिए फाल्के मर चुका है।” अच्युत कोलहाटकर ने वह पत्र संदेश अख़बार में छाप दिया, जिसके जवाब में सैंकड़ों की संख्या में पाठकों के पत्र आए, वे भी उन्होंने अख़बार में छापे और सारे अख़बार फाल्के को भेज दिए।

फाल्के तुरंत नासिक आ गए तब पूना की पुरानी हिंदुस्तान सिनेमा कम्पनी के साथियों वामन आपटे और बापू साहेब पाठक ने उनको बतौर फ़िल्म निर्माण मुखिया का पद 1,000 रुपया मासिक पर निमंत्रित किया जिसे उन्होंने मंज़ूर कर लिया। उन्होंने 1922 से 1929 तक कुछ फ़िल्मे बनाईं लेकिन नहीं चलीं उनका वेतन 1,000 से 500 और फिर 250 मासिक कर दिया गया। उन्होंने फाल्के डायमंड कम्पनी के बैनर तले बम्बई में माया शंकर भट्ट से 50,000 रुपयों की सहायता से सेतुबंधन फ़िल्म बनाना शुरू किया जिसकी शूटिंग हम्पी, चेन्नई और रत्नागिरी में हुई। धन की कमी से फ़िल्म रुक गई। वामन आपटे ने फाल्के डायमंड कम्पनी को हिंदुस्तान सिनेमा कम्पनी में विलय की शर्त पर फ़िल्म दो साल में पूरी करवाई। वह फाल्के की अंतिम फ़िल्म के पहले की फ़िल्म थी। वह पहली बोलती फ़िल्म 14 मार्च 1931 को प्रदर्शित हुई तब आलमआरा के निर्देशक अर्देशिर ईरानी ने उसे 40,000 खर्चे पर हिंदी में डब करवाकर प्रदर्शित करवाया।

कोल्हापुर रियासत के महाराजा रामराम-III ने दिसंबर 1934 में फाल्के को कोल्हापुर सिनटोन के लिए फ़िल्म बनाने हेतु आमंत्रित किया, फाल्के ने पहले मना कर दिया दोबारा आमंत्रण 1,500 स्क्रिप्ट लिखने और 500 मासिक खर्चे पर मंज़ूर कर लिया।

उपन्यासकार नारायण आपटे ने कहानी और स्क्रिप्ट लिखने में सहयोग किया और विश्वनाथ जाधव ने संगीत देकर “गंगा अवतरण” फ़िल्म 2,50,000 रुपयों की लागत से दो साल के समय में 1937 में बनकर तैयार हुई। वह फाल्के द्वारा बनाई गई एकमात्र सवाक् याने बोलने वाली फ़िल्म थी।

समय के साथ फ़िल्म तकनीक, निर्देशन, संगीत, गायन और कथानक के उतार चढ़ाव में बड़े परिवर्तन हो  चुके थे। फाल्के जिनसे तादात्म्य नहीं बिठा पाए क्योंकि वे काशी जाकर फ़िल्म की मुख्य धारा से कट चुके थे। 16 फ़रवरी 1944 को जन्मस्थान नासिक में उनका निधन हो गया।

उनकी अन्य फ़िल्मों की सूची इस प्रकार है।

लंका दहन (१९१७),श्री कृष्ण जन्म (१९१८), कलिया मर्दन (१९१९), बुद्धदेव (१९२३), भक्त प्रहलाद (१९२६)

भक्त सुदामा (१९२७), रूक्मिणी हरण (१९२७)

रुक्मांगदा मोहिनी (१९२७), द्रौपदी वस्त्रहरण (१९२७)

हनुमान जन्म (१९२७), नल दमयंती (१९२७)

परशुराम (१९२८), श्रीकृष्ण शिष्टई (१९२८)

काचा देवयानी (१९२९), चन्द्रहास (१९२९)

मालती माधव (१९२९), मालविकाग्निमित्र (१९२९)

वसंत सेना (१९२९), संत मीराबाई (१९२९)

कबीर कमल (१९३०), सेतु बंधन (१९३२)

गंगावतरण (१९३७)- दादा साहब फाल्के द्वारा निर्देशित पहली बोलती फिल्म है।

कोल्हापुर नरेश के आग्रह पर 1937 में दादासाहब ने अपनी पहली और अंतिम सवाक फिल्म “गंगावतरण” बनाई। दादासाहब ने कुल 125 फिल्मों का निर्माण किया। 16 फ़रवरी 1944 को 74 वर्ष की अवस्था में पवित्र तीर्थस्थली नासिक में भारतीय चलचित्र-जगत का यह अनुपम सूर्य सदा के लिए अस्त हो गया। भारत सरकार उनकी स्मृति में प्रतिवर्ष चलचित्र-जगत के किसी विशिष्ट व्यक्ति को ‘दादा साहब फालके पुरस्कार’ प्रदान करती है।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ विकल्प ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ विकल्प 

यात्रा में संचित

होते जाते हैं शून्य,

कभी छोटे, कभी विशाल,

कभी स्मित, कभी विकराल..,

विकल्प लागू होते हैं

सिक्के के दो पहलू होते हैं-

सारे शून्य मिलकर

ब्लैकहोल हो जाएँ

और गड़प जाएँ अस्तित्व

या मथे जा सकें

सभी निर्वात एकसाथ

पाये गर्भाधान नव कल्पित,

स्मरण रहे-

शून्य मथने से ही

उमगा था ब्रह्मांड

और सिरजा था

ब्रह्मा का अस्तित्व,

आदि या इति

स्रष्टा या सृष्टि

अपना निर्णय, अपने हाथ

अपना अस्तित्व, अपने साथ,

समझ रहे हो न मनुज..!

©  संजय भारद्वाज, पुणे

writersanjay@gmail.com

( प्रात: 8.44 बजे, 12 जून 2019)

#हरेक के भीतर बसे ब्रह्मा को नमन। आपका दिन सार्थक हो।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – लघुकथा ☆ इंतजार ☆ श्री अशोक कुमार धमेंनियाँ ‘अशोक’

श्री अशोक कुमार धमेंनियाँ  ‘अशोक’

ई- अभिव्यक्ति में  श्री अशोक कुमार धमेंनियाँ  ‘अशोक’जी का हार्दिक स्वागत है।साहित्य की सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर। प्रकाशन – 4 पुस्तकें प्रकाशित 2 पुस्तकें प्रकाशनाधीन 3 सांझा प्रकाशन। विभिन्न मासिक साहित्यिक पत्रिकाओं में लघु कथाएं, कविता, कहानी, व्यंग्य, यात्रा वृतांत आदि प्रकाशित होते रहते हैं । कवि सम्मेलनों, चैनलों, नियमित गोष्ठियों में कविता आदि  का पाठन तथा काव्य  कृतियों पर समीक्षा लेखन। कई सामाजिक कार्यक्रमों में सहभागिता। भोपाल की प्राचीनतम साहित्यिक संस्था ‘कला मंदिर’ के उपाध्यक्ष। प्रादेशिक / राष्ट्रीय स्तर के पुरस्कारों / अलंकरणों  से  पुरस्कृत /अलंकृत। आज प्रस्तुत है आपकी एक समसामयिक विषय पर आधारित लघुकथा ‘इंतजार ‘। वर्णित घटना एवं पात्र काल्पनिक हैं किन्तु ,भावनाएं वास्तविक। कृपया आत्मसात करें और भारतीय सेना का मनोबल बढ़ाएं।  )

☆ लघुकथा  – इंतजार ☆

बलवान घाटी में युद्ध छिड़ गया। चीन और भारत की सेनाएं आमने-सामने आ गई ।

“आज एक भी चीनी मुझसे बचकर न जा सकेगा। माँ कसम , यदि मेरी माँ ने मुझे दूध पिलाया है तो आज ये चीनी देखेंगे कि भारत माँ की छाती पर पैर रखने का क्या अंजाम होता है ।” –पहाडसिंह ने रायफल के साथ घसिटते  और आगे बढ़ते हुए अपने साथी दलेल सिंह से कहा ।

“अरे यार , कल ही तुम कह रहे थे  कि तेरी शादी पक्की हो गई है । अवकाश लेकर शादी करने के लिए घर जाना है । तू पीछे हट , इन चीनी चमगादड़ों को मैं देखता हूं। तेरा घर में सब इंतजार कर रहे होंगे। इसलिए भारत मां की कसम आज मैं वो जौहर दिखाना चाहता हूं कि चीनी कभी भी इस मोर्चे पर आने से घबरायेंगे । यदि आज मैं अपने रक्त से भारत मां का टीका कर सका तो अपना जीवन और देह धन्य समझूंगा ।– दलेल सिंह ने कहा।

“ऐसा नहीं हो सकता । मेरी शादी होगी तो बारात में तुझे भी चलना होगा।  यदि यहां भारत मां की सेवा करते मृत्यु का वरण करना पड़ा तो मैं भी साथ रहूंगा । लेकिन- यह दोस्ती हम नहीं छोड़ेंगे ……..।”

फायर होने में कुछ तेजी  आ  गयी।

” धायँ….  धायँ…..। दलेल , वह गए दो”

और यह ले , दलेल ने गोलियों की बौछार कर दी।

” पहाड़ , सभी मारे गए साले । एक भी चीनी नहीं दिख रहा है”।

इसी बीच पीछे से एक गोली पहाड़ सिंह की पीठ पर लगी ।

“अरे दलेल , चीनियों ने पीठ पर गोली मार दी । यह साले पीछे से आ गए हैं ।”

पहाड़सिंह गोली खाकर मूर्छित अवस्था में लुड़ककर पहाड़ के किनारे सैकड़ों फिट गहरी नदी में गिरने लगा । तभी दलेल ने एक हाथ से पहाड़ सिंह का हाथ पकड़ लिया और दूसरे हाथ से पीछे से गोली चला रहे चीनियों को भूँजना  शुरू कर दिया।

” पहाड़ , यह देख ……एक ……दो …..  और ….पांच। पूरे पाँच मारे गये।”

“अरे मार दिया सालों ने । पहाड़ , मैं भी तुम्हारे  साथ आ रहा हूं । हम दोनों मृत्यु का वरण एक साथ करेंगे। अफसोस मैं वादा पूरा न कर सका । तेरी मां और वह लड़की जिससे तेरी शादी होने वाली थी , उनके इंतजार का क्या होगा?

 

© अशोक कुमार धमेंनियाँ  ‘अशोक’

भोपाल म प्र

मो0-9893494226

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एकता ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण एवं सार्थक कविता एकता।  इस बेबाक कविता के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सादर नमन।)  

☆ कविता – एकता ☆ 

दंगा हो रहा शहर में

लहू के प्यासे हुए लोग

लगाई आग चंद सियासतखोरोंने

जल गए घर अनेक

हुए कत्ल अनेक

न इंसान बचा न इंसानियत

हो रही हत्या आम इन्सान की

एक चिंगारी ने बृहद आकार लिया

आग बनकर ले चली इन्सान को

भाई-भाई पर जान न्यौछावर करते

धरती मां पर मर मिटते साथ-साथ

आज भडक उठी आग दुश्मनी की

फैल रही दंगे की आग

इन्सान बना भस्मासुर

खत्म कर रहा अपनों को

काट रहा गला दोस्त का

खत्म हो चली उसकी आत्मा

खेल रहा लहू से

खून कर अट्टहास कर रहा वह

इस बार खेलेंगे खून की होली

लहू की हो रही बारिश

न तो उगी फसल, न सब्जी

इन्सान पी रहा लहू इंसान का

सब हुए मांसाहारी

फैली दहशत समाज में

धर्म और सियासत के कारण किए खून

जिजीविषा की चाह में

हुआ हलाक  हर इंसान

जल गई अनेक दुकानें

हुआ ऐलाने जंग अपनों से

हुआ नरसंहार रो रहा आसमां

बह गई खून की नदियां

कौन हो तुम की पुकार

हिन्दू, मुसलमान, सिखम ईसाई

बंट गया इंसान स्वयं

दरिंदे बन गये इंसान

मारकर बच्चो को भी

बने ब्रह्म हत्या के भागी

फैला जाति-धर्म का जहर

कहर मचा है संसार में

दोस्त-दुश्मन की पहचान

भुलाकर कर रहा कत्ल

खुले आम आदम

मार दिया सबको

न बचा कोई भी

किस पर करेगा राज?

हो गया वीरान समाज

रोने के लिए भी न बचा

क्या सही क्या गलत

न समझ आ रहा है

जानवर से भी बदतर

इंसान हुआ पागल

आदमखोर इंसान

खा रहा,

अनाज नहीं खून

दोस्त को मारकर

दुनिया हुई बदहाल

रौंदकर अपनों को

पैरों तले कुचलकर

अत्याचार किए अनेक

भूखी शोषित जनता पर

असहाय अनजान जनता पर

समय बन गया काल

हो रहा मृत्यु का तांडव

बना आदमखोर आदमी

धज्जियां उड गई देश की

आदमी ने खत्म कर दी

जडे खुद की ही

नेस्तानाबूद कर

क्या पाना चाहा?

मात्र क्रौंच चीख

न समझ पाया सियासती खेल

चंद सियासतदारों का…

कर्फ्यू लगा शहर में

ठहरते हुए वक्त में

लगा रुक गया है

जीवन समाप्त हुआ

दंगा भी टल गया ।

वो चिंगारी आज भी

धधक रही इन्सान में

कब फिर से लेगी वह

आग का रुप नहीं पता

आ्दमी में समाया डर

समझ इन्सान…समझ

मन से डर को भगाकर

अल्लाह कहो या ईश्वर

गुरुद्वारे जाओ या मंदिर

चर्च जाओ या फिर मस्जिद

मिलेंगे तुम्हें एक ही ईश्वर

परवरदिगार के नाम अलग

कई रुपों में आया खुदा

बुराई को खत्म करने

लगाए नारे एकता के

अगर हम एक हुए

न टिकेगा दुश्मन

हमारे सामने

हम मात्र कठपुतलियाँ

ईश्वर के हाथों की

न कि चंद सियासतदारों की

समझना है इंसान

सब है हमारे बंधु

फिर क्यों कर रहे हो?

दंगल हर जगह पर

क्यों दोहरा रहे हो

महाभारत ?

क्यों हर गली में है द्रौपदी?

क्यों मांग रही सहारा?

घर- घर में क्यों बसी

कैकेयी और मंथरा ?

अपने फायदे के लिए

मत कर हत्या अनुज-मनुज की

रहना हमें  मिलजुलकर

हम  एक माँ की संतान

क्यों कर रहे हो फर्क?

लहू सबका एक

आवाज़ सबकी एक

मत कर खंडित माँ को

माँ के हज़ार टुकडे

धर्म या जाति के नाम पर

मत बाँट माँ को

मत कर अहंकार

मत कर युद्ध अपनोंसे

गीता का सूत्र अनोखा

मत ले दुहाई कृष्ण की

मत बन पापी इंसान

जन्म लेता विरला आदमी

सुंदर रचना है ब्रह्मा की

नष्ट मत कर इंसान को

खुदा की देन है  इंसान

 

©  डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

लेखिका, सहप्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, जैन कॉलेज-सीजीएस, वीवी पुरम्‌, वासवी मंदिर रास्ता, बेंगलूरु।

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 48 – आयुर्वेद और अमृत तत्व ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  आयुर्वेद और अमृत तत्व। )

Amazon Link – Purn Vinashak

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 48 ☆

☆ आयुर्वेद और अमृत तत्व

आयुर्वेद हमारे शरीर, मस्तिष्क और प्रकृति को समझने में सहायता कर सकता है, और प्रकृति के स्वरूप को पहचानने में सक्षम है ताकि हम उस प्रकृति के स्वरूप को हमारे शरीर के भीतर भी देख सके ।

प्रकृति के तीन गुण हमारे मस्तिष्क को नियंत्रित करते हैं; हमारे शरीर की संरचना और आस-पास की प्रकृति के लिए पाँच तत्व जिम्मेदार हैं और छह स्वाद शरीर और मस्तिष्क  के बीच संबंध को नियंत्रित करते हैं । हम छह चक्र, तीन गुण, पाँच तत्व, छः स्वाद, और दस इंद्रियों की अभिव्यक्ति है । ये 24 असीमित आत्मा को सीमित या शरीर और मस्तिष्क से बंधे हुए हैं ।

हमें अपने शरीर और मस्तिष्क को प्रकृति के साथ समक्रमिक करने के लिए तीन नियमों का पालन करना होगा । सबसे पहले हमारे शरीर और मस्तिष्क को पर्यावरण, मौसम और आसपास के वातावरण इत्यादि के ताल के साथ ताल मिलाना है । दूसरा आसपास के साथ संरेखण है; और तीसरा बाहरी प्रकृति की हमारे शरीर की आंतरिक प्रकृति के साथ ध्रुवीयता है ।

अब मैं आपको आयुर्वेदिक दोषों के विषय में बताऊँगा । पहला कफ है जो वास्तव में पृथ्वी और जल तत्वों का संयोजन है । यह शरीर की स्थिरता और स्नेहन, ऊतक और शरीर के अपशिष्ट को नियंत्रित करता है । कफ सेल की संरचना को भी नियंत्रित करता हैं और स्रावों और पाचन अंगों को संरक्षित करने वाली चिकनाई को भी नियंत्रित करता हैं । मस्तिष्क में कफ एक समय में एक विचार को समझने के लिए मस्तिष्क के लिए आवश्यक स्थिरता प्रदान करता है । कफ की प्रकृति तेलीय, ठंडी, भारी, स्थिर, घनी और चिकनी है ।

दूसरा दोष पित्त है जो वास्तव में पानी और अग्नि तत्वों का संयोजन है । यह शरीर के संतुलन और संभावित ऊर्जा के संतुलन को नियंत्रित करता है । सभी पित्त की प्रक्रियाओं में पाचन शामिल है । इसके अतरिक्त पित्त कोशिकाओं के कार्यों के लिए ऊर्जा प्रदान करने के लिए पोषक तत्वों का पाचन करता है । मस्तिष्क में पित्त नए सूचना को संसाधित करता है और निष्कर्ष निकालता है । पित्त की प्रकृति तेलीय, गर्म, हल्की, तीव्र, तरल आदि है ।

तीसरे दोष के विषय में केवल कुछ लोग जानते हैं, यह अग्नि और वायु तत्वों का संयोजन है । यह विभिन्न अंगों की सतह के साथ शरीर की ऊर्जा के आंदोलन के लिए ज़िम्मेदार होता है ।

चौथा दोष वात है जो वायु और आकाश तत्वों का संयोजन है । यह शरीर में गतिशील ऊर्जा का सिद्धांत है, मुख्य रूप से तंत्रिका तंत्र से संबंधित है और सभी शरीर की गतिविधियों को नियंत्रित करता है । यह पोषक तत्वों को कोशिकाओं में अंदर एवं अपशिष्ट को बाहर ले जाता है । यह भोजन को निगलने और चबाने के लिए भी जिम्मेदार है । मस्तिष्क में यह नयी सूचनाओं की तुलना में स्मृति से व्यापक सूचना पुनर्प्राप्त करता है । इसकी प्रकृति शुष्क, ठंडा, हल्का, अनियमित और गतिशील है ।

पाँचवे दोष के विषय में महान ऋषियों को छोड़कर और कोई नहीं जानता है यह आकाश और छठा चक्र के तत्व महत या ब्रह्मंडीय बुद्धि का सयोजन होता है यह आध्यात्मिक प्रथाओं की इच्छाओं और भावनाओं के लिए जिम्मेदार है ।

अब अगर हम शरीर में देखते हैं, तो दो प्रकार की क्रियाओं से एक बीमारी उत्पन्न हो सकती है । पहली एक दूसरे के साथ दोषों के असंतुलन से होती है जैसे कि कभी-कभी वात बढ़ता है और कफ और पित्त कम हो जाते हैं, और इसी तरह अन्य दोषों के लिए ।  दूसरी, दोषों की आंतरिक संरचना से, जैसे कि कफ दोष, जो पृथ्वी और जल का संयोजन है- यदि पृथ्वी का तत्व बढ़ता है और जल कम हो जाता है, तो यह गुर्दे में पत्थरी की तरह की बीमारी पैदा कर सकता है, इसी तरह यदि विपरीत हो अर्थात पृथ्वी तत्व कम हो जाये और जल तत्व बढ़ जाये तो अन्य विपरीत समस्याएँ हो सकती है, और इसी तरह अन्य दोषों के लिए ।

इस परिदृश्य के अनुसार शरीर और मस्तिष्क की कुल संभावित बीमारियों की संख्या 45 है और शेष इन 45 बीमारियों की ही उप श्रेणियाँ हैं ।

अगर हम अपने स्वाद कलियों के छह स्वाद देखें । मीठा स्वाद पृथ्वी और जल तत्वों का संयोजन है, खट्टा पृथ्वी और अग्नि तत्वों का संयोजन है, नमकीन स्वाद जल और अग्नि तत्वों का संयोजन है, तीखा स्वाद अग्नि और वायु तत्वों का संयोजन है कड़वा वायु और आकाश तत्वों का संयोजन है और कसैला वायु और पृथ्वी तत्वों का संयोजन है ।

क्या आप प्रकृति को नियंत्रित करने के स्तर पर आत्मनिर्भर बनाने के विषय में जानते हैं, सृजन का पूरा अनुक्रम है । भोजन से रस बनता है । रस से रक्त, रक्त से माँस बनता है । माँस से मैदा, मैदा से हड्डिया बनती है और हड्डियों से मज्जा धातु जिसे शरीर का सार कहते हैं जब इसे शरीर में बनाए रखा जाता है तो यह सघन होकर रोशनी उत्पन्न करता है । जो ओजस होता है तपस्या के द्वारा ओजास को तप में परिवर्तित किया जाता है, और तप से व्यक्ति सिद्ध या प्रकृति का नियंत्रक बन जाता है ।

मैंने पहले ही बताया है कि हम जो ठोस भोजन खाते हैं वह तीन भागों में विभाजित होता है सकल या स्थूल अपशिष्ट या मल के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है, मध्यम माँस का निर्माण करता है, और सूक्ष्म भाग मन बन जाता है ।

इसी प्रकार हम जिस तरल को पीते हैं वह तीन भागों में विभाजित होता है स्थूल भाग मूत्र के रूप में अपशिष्ट होता है, मध्यम रक्त बन जाता है, और सूक्ष्म प्राण बन जाता है ।

इसी तरह ‘तेज’ या चिकनाई जो हम खाते हैं तीन भागों में विभाजित हो जाता है सकल या स्थूल से हड्डी बनती है, मध्यम से मज्जा, और सूक्ष्म हमारी जुबान या बोलने की शक्ति बन जाती हैं ।

 

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

Please share your Post !

Shares

English Literature – Article – ☆ Struggle for Happiness ☆– Shri Divyanshu Shekhar

Shri Divyanshu Shekhar 

 

(Young author Shri Divyanshu Shekhar writes poems, stories, plays and scripts in Hindi and English. His first collection of poems  “Zindagi – ek chalchitra” was published in May 2017 and first English Novel “Too Close – Too Far” in December 2018. Today we present his article “Be Mental but don’t be Judgmental. The article is a thorough study and  research work done by young author Mr Divyanshu on the contemporary incidents. )  

☆ Be Mental but don’t be Judgmental☆

The suicidal death news of a great actor Sushant Singh Rajput jolted all of us. It is still hard to believe but unfortunately, it happened. He was a well-known celebrity and his death got limelight and suddenly we all started talking about “Mental Health”. But it’s not a new topic, it is just an ignored topic in our society. According to World Health Organisation (WHO), each year approximately one million people die by suicide worldwide every year, of these 135,000 are residents of India. Globally mortality rate is of one death every 40 seconds but there are lots of unreported and hidden cases that will exacerbate our count estimation problem. It is predicted that by 2020 the rate of death will increase to one every 20 seconds which is really scary.

But why things are getting worse?

Why talking about Mental health is still a taboo in our society? Why Brain is not treated like other body parts? Why visiting a Psychiatrist doesn’t create such empathy like other medical issues? Why showing off is more important than actual ground reality? Why people are giving up on struggle and becoming obsessed with results? Why our expectations are becoming so calculative and materialistic?

Why showing off happiness is more important than being happy? Why expressing true emotions and sharing feelings become so difficult? Why we are living various characters parallel? And there are lots of other questions too and we have to work on that. We can’t deny the fact that our continued ignorance of this topic is responsible for the current situation. Now it’s time to talk, listen, understand, and act otherwise we will go through lots of unbearable losses.

First, we have to understand what is Mental health?

Mental health refers to our emotional and psychological well-being. Having good mental health helps us lead a relatively happy and healthy life. It helps us demonstrate resilience and the ability to cope in the face of life’s adversities. Mental health can affect daily living, relationships, and physical health.

Strong mental health isn’t just the absence of mental health problems. Being mentally or emotionally healthy is much more than being free of depression, anxiety, or other psychological issues. Rather than the absence of mental illness, mental health refers to the presence of positive characteristics. Our mental health can be influenced by a variety of factors, including life events or even our genetics.

When we talk about health then we should also talk about related illnesses.

Mental illness, also called mental health disorders, refers to a wide range of mental health conditions – disorders that affect your mood, thinking, and behavior. Examples of mental illness include depression, anxiety disorders, schizophrenia, eating disorders, and addictive behaviors. We have to understand that anyone can suffer from mental or emotional health problems and over a lifetime most of us will. Everyone has some risk of developing a mental health disorder, no matter their age, sex, income, or ethnicity. Social and financial circumstances, biological factors, and lifestyle choices can all shape a person’s mental health.

Now let’s take a look at some statistics which might give you goosebumps.

One in four people in the world gets affected by mental or neurological disorders at some point in their lives. Around 450 million people currently suffer from such conditions, placing mental disorders among the leading causes of ill-health and disability worldwide. Half of all mental disorders begin by age 14 and three-quarters by age 24. The worst part, that up to 90 percent of suicide deaths result from underlying mental and substance use disorders.

Yet despite how common mental health problems are, many of us make no effort to improve our situation. We don’t want to struggle, we ignore the emotional messages that tell us something is wrong and try it out by distracting ourselves or self-medicating with alcohol, drugs, or self-destructive behaviors. We bottle up our problems in the hope that others won’t notice. We hope that our situation will eventually improve on its own or we simply give up.

Treatments are available, but nearly two-thirds of people with a known mental disorder never seek help from a health professional. Stigma, discrimination, and neglect prevent care and treatment from reaching people with mental disorders, says the World Health Organization (WHO). Where there is neglect, there is little or no understanding. Where there is no understanding, there is neglect.

But why people try to hide these problems? Actually, they are scared of sharing mental problems because our society has wrong and judgmental views towards mental illness. They feel a lack of confidence and faith to share their true emotions and feelings. But we need to be honest and loyal to ourselves. Until we won’t love and consider ourselves as our priority, no-one else will. I think we shouldn’t feel guilty for being mentally ill, we should feel guilty for being judgmental.

Everyone has their own perspectives and struggle stories. Right and Wrong are manipulative words because their definitions vary from person to person and according to the scenarios. So, we should not impose our set of beliefs on others. Instead, we should make ourselves worthy of someone’s faith and to understand their concerns. Healthy communications and kind actions make the mind and problems light and we should work on that. Our collaborative and positive efforts will overcome these problems.

Now, what should be the correct treatment for the diagnosed people?

As I said earlier first we need to understand and treat this illness like other medical problems. It means these problems should be recognized and then patients should go for the right treatment.

One important point we need to understand that treatment for mental health disorders is not one size fits all, and it does not offer a cure. Instead, treatment aims to reduce symptoms, address underlying causes, and make the condition manageable. You and your doctor will work together to find a plan. It may be a combination of treatments because some people have better results with a multi-angle approach. The most common mental health treatments are Medications and Psychotherapy.

Now the question is when it might happen with anyone at any stage of life. So how can we boost our mental health or I can say what can we do for better mental immunity?

Mental illness is not a personal failure. This huge burden of mental, behavioral, and substance use disorders, in our society, calls for the immediate attention of political leaders, policymakers, health professionals, opinion-makers, and people at large. Most significantly, mental health should be given higher priority in the developmental agenda. All policies and programs in health and all related sectors of welfare, education, employment and other programs should include and integrate mental health agenda in their policies, plans, and programs.

And as an individual, we should find purpose and meaning in life. Everyone derives meaning and purpose in different ways that involve benefiting others, as well as themselves. We may think of it as a way to feel needed, feel good about ourselves, a purpose that drives us on, or simply a reason to get out of bed in the morning. In biological terms, finding meaning and purpose is essential to brain health as it can help generate new cells and create new neural pathways in the brain. It can also strengthen our immune system, alleviate pain, relieve stress, and keep us motivated to pursue the other steps to improve mental and emotional health.

Obviously, “Responsibility” is a great word which keeps us going even sometimes without our full intentions but we have to keep balance in our life. Take care of yourself and your loved ones and do some crazy things, which makes you happy. Enjoy the moments at the fullest and release the pressure from your mind and heart. We can never find peace of mind until we listen to our hearts. “Happiness” is the most lovable word in this World. Everyone has a desire to be happy but deep inside we all know that in this running world emptiness is winning the race with happiness. But why?

Freedom is the secret of happiness but we are in a race that is decided by others and according to their expectations and perceptions. We are trying to live and show a standard that is set by someone else.

The day we will understand that success and happiness have no specific standards. The day we will start living life like a journey, not like a destination, most of the problems will be automatically resolved.

But remember one thing happiness is not something ready-made we have to earn it. Struggling is essential to happiness because of the lessons learned and how certain aspects of it serves its purpose. Without a little struggle throughout life, we would have never known better choices and we would never have found true happiness.

But we don’t have to feel bad. There are practices we can adopt to elevate our mood, become more resilient, and enjoy life more. But just as it requires effort to build and maintain physical health, so it is with mental health. We have to work harder these days to ensure strong mental health, simply because there are so many ways that life takes a toll on our emotional well-being and we have to face all those situations wisely and bravely.

© Divyanshu Shekhar

Kolkata (West Bengal)

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कविता ☆ केल्याने होतं आहे रे # 38 – वसुंधरा ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है।  आज प्रस्तुत है श्रीमती उर्मिला जी की  वर्षा ऋतू पर आधारित रचना  “वसुंधरा ”।  उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ केल्याने होतं आहे रे # 38 ☆

☆ वसुंधरा ☆ 
 

आला पाऊस आला पाऊस !

जलधारांच्या माळा घेऊन !!

 

भिजली धरणी जलधारांनी !

हरित तृणांचे लेणे लेऊनी !!

 

सजली जणू नववधू लाजरी !

हिरवा रेशमी शालू लेऊनी !

दिसते किती छान गोजिरी !!

 

ढगाआडुनी सखा डोकवी !

दिसते कशी मज सखी साजणी !

 

पाहुनी ही सुंदरा वसुंधरा !

सखा झाला कावरा बावरा !!

सखा झाला कावरा बावरा!!

 

©️®️उर्मिला इंगळे

सातारा

दिनांक:१७-६-२०

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कपिल साहित्य – सु…शांत ☆ श्री कपिल साहेबराव इंदवे

श्री कपिल साहेबराव इंदवे 

(युवा एवं उत्कृष्ठ कथाकार, कवि, लेखक श्री कपिल साहेबराव इंदवे जी का एक अपना अलग स्थान है. आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशनधीन है. एक युवा लेखक  के रुप  में आप विविध सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने के अतिरिक्त समय समय पर सामाजिक समस्याओं पर भी अपने स्वतंत्र मत रखने से पीछे नहीं हटते.  आज प्रस्तुत है स्व सुशांत सिंह राजपूत जी की स्मृति में युवा लेखक श्री कपिल जी के ह्रदय के उदगार उनके आलेख  सु…शांत के माधयम से।) 

 ☆ कपिल साहित्य – सु…शांत ☆

बातमी हादरावून सोडणारी होती. काही काम नसल्याने दुपारी झोपलो होतो. जाग आली तेव्हा सवयीने मोबाईल घेतला. मोबाईल डेटा ऑन करून व्हाटसअॅप सुरू केले. सकाळपासून सूरू न केल्याने  एकशे दहांवर समूह व वयक्तीक मॅसेज येऊन पडले होते.

असो. एकेक समूहातून शक्य तेवढे मॅसेज वाचायला सुरुवात केली. एका न्यूज चॅनलचा स्क्रीन शाॅट होता.  ज्यात स्पष्ट लिहीलं होतं. कि ‘अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत याची गळफास घेऊन आत्महत्या’ खरं तर विश्वास बसला नाही. कारण अफवा पसरवणारे एडिटींग काही अशा प्रकारे करतात की बघणा-याला विश्वास करावाच लागतो. म्हणून ती न्यूज अफवा म्हणुन दुर्लक्षित केली.

यु-ट्यूब वर जाऊन एका न्यूज चॅनलची लाइव वेबसाईट ओपन केली. तेव्हा बातमी खरी होती. ते एकून धक्काच बसला. ‘एम.एस. धोनीची’ शूटिंग सुरू असतांना शूटिंग दरम्यान औरंगाबादला त्याला पाहिलं होतं. नंतर अनेक चित्रपट, शो मध्ये पाहीलं. त्याच्या चेह-यावरची स्माईल अशी काही होती की बघणारा कितीही तणावात असला तरी त्याला तणावातून बाहेर काढण्याची क्षमता त्यात होती. आणि अभिनय तर कौतुकास पात्र होताच.

आपल्या अभिनयाची छाप प्रेक्षकांच्या मनावर पाडणारा हा हरहुन्नरी अभिनेत्याला असा कोणता तणाव होता. की त्यातून त्याला जगण्याचा मार्गच सापडू नये. त्यानंतर बाॅलीवूड मधली काही बडी मंडळीवर त्याला डावलल्याने तो डिप्रेशन मध्ये गेला आणि त्यातून त्याने हे पाऊल उचलले असे मिडियात येऊ लागले. ते काही असेल ती कारणे पोलिस शोधणारच. पण बातमी हैराण करणारी होतीच. कारण एक चांगला कलाकार आपण गमावला होता.

काही इतरही मॅसेज वाचले. ज्यात लिहीलं होतं की 2020 हे सालंच मनहूस आहे. एक तर कोरोना महामारीने अख्या जगाला  वैताग आणला असतांना ॠषी कपूर, इरफान खान, वाजिद आणि इतरही काही बाॅलीवूड मधील कलाकार सोडून गेली आणा त्यात सुशांत ही शांत झाला. त्यांचही म्हणनं योग्यच आहे. पण कोणत्या गोष्टींवर कीती आणि कोणती दोषण द्यावीत. हे किती योग्य आहे.

काळाने आपल्या विशिष्ट वेळेवर अनेक महान व्यक्तींना परत बोलावले आहे. या आधीही खुप वेळा मानव जातीला घातक अशा परिस्थिती अवनीवर आले आहेत. त्यात काही अशा होत्या की ज्यांनी त्यावेळची मानवी संस्कृतीच नष्ट करण्याचे काम केलंय.

पण जे झालं ते कधीही समर्थनास पात्र  नाही. भलेही कोरोनाने जगभरात थैमान घातले असले तरी ताणतणावांना एवढे कधीही प्रभावी होऊ देऊ नये की त्याने आपल्याकडून आपली जगण्याची उमेदच हिरावून घेईल.

तसं पाहिलं तर निसर्ग विशिष्ट काळानंतर दिलेले श्वास परत घेणारच आहे. पण जोपर्यंत ते आहेत तोपर्यंत भरभरून जगायला शिकायला हवे. जगात अगणित लोक आली आणि गेली. त्यातून काही मोजकीच लोकं इतिहासाच्या पानांवर सापडतात. बाकीची लोकं आली तशीच गेली. प्रत्येकाला प्रत्येक इच्छित गोष्ट मिळत नाही. म्हणून हा अट्टाहास सोडायला हवा आणि आहे त्यात खूश राहण्याचा प्रयत्न करायला हवा. असो.

बाॅलीवूडच्या  या हरहुन्नरी अभिनेत्यांला भावपुर्ण श्रद्धांजली

 

 © कपिल साहेबराव इंदवे

मा. मोहीदा त श ता. शहादा, जि. नंदुरबार, मो  9168471113

Please share your Post !

Shares

आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (34) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

 

क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।

भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्‌।।34।।

 

क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ की ,जिन्हें सही पहचान

प्रकृति बधंनो से उन्हें ,मुक्ति का मालुम ज्ञान ।।34।।

भावार्थ :  इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही ‘उनके भेद को जानना’ है) तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं।।34।।

 

They who, through the eye of knowledge, perceive the distinction between the Field and its Knower, and also the liberation from the Nature of being, they go to the Supreme.।।34।।

 

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः॥13॥

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 52 ☆ आत्मविश्वास – अनमोल धरोहर ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख आत्मविश्वास – अनमोल धरोहर।  यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 52 ☆

☆ आत्मविश्वास – अनमोल धरोहर

‘यदि दूसरे आपकी सहायता करने को इंकार कर देते हैं, मैं उनका आभार व्यक्त करता हूं, क्योंकि न कहने के कारण मैं इसे करने में समर्थ हो पाया। इसलिए आत्मविश्वास कीजिए; यही आपको उत्साहित करेगा,’ आइंस्टीन के उपरोक्त कथन में विरोधाभास है। यदि कोई आपकी सहायता करने से इंकार कर देता है, तो अक्सर मानव उसे अपना शत्रु समझने लग जाता है। यदि हम इसके दूसरे पक्ष पर दृष्टिपात करें, तो यह इंकार हमें ऊर्जस्वित करता है; हमारे अंतर्मन में आत्मविश्वास जाग्रत कर उत्साहित करता है और हमें अपनी आंतरिक शक्तियों का अहसास दिलाता है, जिसके बल पर हम उसे क्रियान्वित करने में सफल हो जाते हैं। सो ! हमें उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए, जो हमें बीच मंझधार छोड़ कर चल देते हैं। सत्य ही तो है, जब तक इंसान गहरे जल में छलांग नहीं लगाता, वह तैरना कैसे सीख सकता है? उसकी स्थिति तो कबीरदास के नायक की भांति ‘मैं बपुरौ बूड़न डरा,रहा किनारे बैठ’ जैसी होगी।

सो! यह मत कहो कि ‘मैं नहीं कर सकता’, क्योंकि आप अनंत हैं। आप कुछ भी कर सकते हैं।’ स्वामी विवेकानंद जी की यह उक्ति मानव में अदम्य साहस संचरित करती है, उत्साहित करती है कि आप में अनंत शक्तियां संचित हैं; आप कुछ भी कर सकते हैं। हमारे गुरु-जन, आध्यात्मिक वेद-शास्त्र व उनके ज्ञाता विद्वत्तजन हमें अंतर्मन में निहित अलौकिक शक्तियों से रू-ब-रू कराते हैं और हम उन असंभव कार्यों को भी सहजता-पूर्वक कर गुज़रते हैं। इसके लिए मौन का अभ्यास आवश्यक है, क्योंकि यह साधक को अंतर्मुखी बनाता है; जो उसे ध्यान की गहराइयों में ले जाने में सहायक सिद्ध होता है। महर्षि रमण, महात्मा बुद्ध, भगवान महावीर वर्द्धमान आदि ने भी मौन साधना द्वारा ईश्वर का साक्षात्कार किया।

मौन रूपी वृक्ष पर शांति के फल लगते हैं अर्थात् मौन से हमारे अंतर्मन में अलौकिक शक्तियां जाग्रत होती हैं और जीवन में सकारात्मकता दस्तक देती है। वास्तव में मौन जीवन का सर्वाधिक गहरा संवाद है। सो! मानव को शब्दों का चयन सावधानीपूर्वक करना चाहिए, क्योंकि यह महाभारत जैसे महायुद्ध के जनक भी हो सकते हैं।

स्वामी योगानंद जी के शब्दों में ‘यह हमारा छोटा-सा मुख एक तोप के समान है और शब्द बारूद के समान हैं– जो सब कुछ नष्ट कर देते हैं। सो! व्यर्थ व अनावश्यक मत बोलो और तब तक मत बोलो; जब तक तुम्हें यह न लगे कि तुम्हारे शब्द कुछ अच्छा कहने जा रहे हैं।’ इसलिए मौन मानव की वह मन: स्थिति है, जहां पहुंच कर तमाम झंझावात शांत हो जाते हैं और मानव को विभिन्न मनोविकारों चिंता, तनाव, आतुरता व अवसाद से मुक्ति प्राप्त हो जाती है। इसलिए स्वामी योगानंद जी मानव-समाज को अपनी अमूल्य शक्ति व समय को निरंतर व्यर्थ के वार्तालाप में बर्बाद न करने का संदेश देते हैं; वहीं भोजन व कार्य करते समय भी मौन रहने की महत्ता पर प्रकाश डालते हैं।

सो! जब आपके हृदय की भाव-लहरियां शांत होती हैं, उस स्थिति में आपको अच्छे विकल्प सूझते हैं; आप में आत्मविश्वास का भाव जाग्रत होता है और आप उन लोगों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हैं; जिनके कारण आप उस असंभव कार्य को अंजाम देने में समर्थ हो सके। परंतु इस समस्त प्रक्रिया में तथाकथित अनुकूल परिस्थितियों व आपकी सकारात्मक सोच का भी अभूतपूर्व योगदान होता है। इसलिए ‘मैं कर सकता हूं’ को जीवन का मूल-मंत्र बनाइए और आजीवन निराशा को अपने हृदय में प्रवेश न पाने दीजिए। इसमें दोस्त, किताबें, रास्ता व सोच अहम् भूमिका निभाते हैं। यदि वे ठीक हैं, तो आपके लिए सहायक सिद्ध होते हैं; यदि वे ग़लत हैं, तो गुमराह कर पथ-भ्रष्ट कर देते हैं और उस अंधकूप में धकेल देते हैं; जहां से मानव कभी बाहर आने की कल्पना भी नहीं पाता। इसलिए सदैव अच्छे दोस्त बनाइए; अच्छी किताबें पढ़िए; सकारात्मक सोच रखिए और सही राह का चुनाव कीजिए… राग-द्वेष व स्व-पर का त्याग कर, ‘सर्वे भवंतु सुखीनाम्’ की स्वस्ति कामना कीजिए, क्योंकि जैसा आप दूसरों के लिए करते हैं, वही लौट कर आपके पास आता है। सो ! संसार में स्वयं पर विश्वास रखिए और सदैव अच्छे कर्म कीजिए, क्योंकि वे आपकी अनमोल धरोहर होते हैं; जो आपको जीते-जी मुक्ति की राह पर चलने को प्रेरित ही नहीं करते; आवागमन के चक्र से मुक्त करा देते हैं।

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

Please share your Post !

Shares