हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 46 ☆ लघुकथा – अंगना में फिर आ जा रे ….. ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी स्त्री  विमर्श  पर आधारित लघुकथा अंगना में फिर आ जा रे……   बेहद भावुक लघुकथा ।  स्त्री / बेटी पर अत्याचार पर घटना घटित होने के पश्चात सभी अपनी अपनी राय रखते हैं किन्तु कोई यह नहीं सोचता कि पीड़िता क्या सोच रही है ?  डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को मानवीय रिश्तों और दृष्टिकोण पर आधारित लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 46 ☆

☆  लघुकथा – अंगना में फिर आ जा रे —-  

सामूहिक बलात्कार की शिकार उस लड़की की साँसें अभी चल रही थीं। हर पल जीवन का मृत्यु से संघर्ष था। ऐसा लगता था कि बार-बार कोमा में जानेवाली वह लड़की शारीरिक तकलीफों से ही नहीं, अपने आहत मन से भी जूझ रही थी। उस पर हुए अत्याचार की कल्पना से मन काँप उठता था। कैसे झेला होगा उसने अपने शरीर पर अमानवीय अत्याचार? अत्याचारी एक नहीं, चार या पाँच? जितनी बार सुना मन पीड़ा से तड़प उठा। सब तरफ चर्चा थी कि वह लड़की बचेगी कि नहीं। शारीरिक हवस ही नहीं अपनी विकृत भावनाओं की पूर्ति कर उन्होंने उस लड़की का शरीर तार-तार कर दिया था। सबकी नजरें टी.वी. पर लगी थीं।  इसी बीच अचानक कोई कह देता– “मर ही जाना चाहिए इस लड़की को। बच भी गई तो कैसे जिएगी इस शरीर के साथ —–?

बहुत तरह के विचार मेरे मन में भी आते थे फिर भी ‘उसे मर जाना चाहिए’ यह वाक्य मुझे छलनी कर देता। लोगों की वाणी में सत्य बोल रहा था, यह मैं जानती थी फिर भी …… ? मेरी कल्पना में बार-बार वह सपना आता था जो उस लड़की ने लोकल ट्रेन में चढ़ने से पहले अपने मित्र के साथ देखा होगा। उत्साहित, प्रफुल्लित, हाथ में हाथ डाले वह घूमी होगी उसके साथ, आनेवाले खतरे से एकदम अनजान, बेखबर।

समाचार-पत्र, न्यूज चैनलों की खबरों से परेशान मैं सोचने लगी कि वह लड़की क्या चाहती है, यह तो कोई सोच ही नहीं रहा। किसी के जीवन-मृत्यु के बारे में निर्णय करनेवाले हम  होते कौन हैं? हमें क्या अधिकार है इस विषय में कुछ भी बोलने का? काश ! वह लड़की कोमा से बाहर आ जाए और माँ से कुछ बोले। अपनी लाड़ली का हाथ पकड़े बैठी माँ भी तो उससे कितना कुछ कहना चाहती होगी?  कितने सपने देखे होंगे उसने अपनी बेटी के लिए? ऐसा लग रहा था बेटी के साथ माँ भी तिल-तिल मर रही है।

तभी खबर आई -लड़की होश में आ गई। होश में आते ही उसने क्षीण आवाज में माँ से कहा— “माँ ! मैं जीना चाहती हूँ। मुझे ठीक होना है, उन लोगों को सजा दिलानी है।” आँसुओं को पोंछते हुए माँ ने बेटी के कमजोर हाथों को सहलाया और भर्राई आवाज में बोली—तू जिएगी बेटी, जरूर जिएगी! माँ की आस बँध रही थी, सिसकते हुए वह गुनगुना रही थी – ओ री चिरैया, नन्हीं-सी चिड़िया ! अंगना में फिर आ जा रे…..।

 

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य ☆ संस्मरण ☆ हिंदी आंदोलन परिवार के पच्चीस वर्ष ☆ श्री संजय भारद्वाज, हिंदी आंदोलन परिवार

श्री संजय भारद्वाज 

 ☆ संस्मरण ☆ हिंदी आंदोलन परिवार के पच्चीस वर्ष ☆ श्री संजय भारद्वाज, हिंदी आंदोलन परिवार ☆

(हिंदी आंदोलन परिवार के स्थापना दिवस पर ई- अभिव्यक्ति परिवार की ओर से हार्दिक शुभकामनाएं)

आज 30 सितंबर 2020….आज ही के दिन 30 सितंबर 1995 को हिंदी आंदोलन परिवार की पहली गोष्ठी हुई थी। मुझे याद है मैं और सुधा जी नियत समय से लगभग डेढ़ घंटे पहले महाराष्ट्र राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के सभागार में पहुँचे थे।

सरस्वती जी का चित्र, हार-फूल, दीप प्रज्ज्वलन का सारा सामान साथ था। जलपान के लिए इडली-चटनी, नमकीन, गुलाब जामुन, पेपर प्लेट, नेपकिन आदि भी साथ थे। सभागार के प्रवेशद्वार के सामने की जगह हमें गोष्ठी के लिए उपयुक्त लगी किंतु वहाँ धूल बहुत अधिक थी। सुधा जी ने झाड़ू थामी और जुट गईं स्वच्छता अभियान में।

सभागार में दरी नहीं थी। बाजीराव रोड पर ‘घर-संसार’ नामक दुकान थी। वे मंडप का सामान, शादी-ब्याह में लगनेवाली वस्तुएँ किराये पर देते थे। मैं वहाँ पहुँचा। दोपहर के भोजन के लिए दुकान बंद थी। बड़ी व्यग्रता से बीता दुकान खुलने तक का समय। बड़े आकार की एक मोटी दरी किराये पर ली। निर्देश यह कि दुकान फलां बजे बंद हो जायेगी, कल सुबह दरी लौटाई तो किराया दोगुना हो जायेगा। दरी में वज़न भी अच्छा-खासा था पर गोष्ठी के आयोजन का जुनून ऐसा कि दरी को कंधे पर लादकर तेजी से सभागार पहुँच गया।

(श्रीमती सुधा संजय भारद्वाज) 

हमारे विवाह को सवा तीन वर्ष बीत चुके थे। सुधा जी इस जुनून से परिचित होने लगी थीं। मेरे सभागार पहुँचने तक वे निर्धारित स्थान को स्वच्छ कर दीप प्रज्ज्वलन की तैयारी कर रही थीं। हमने दरी के दो छोर थामे और मिलकर दरी बिछाई। चार बजने को था। रचनाकार मित्रों को गोष्ठी के लिए चार बजे का समय दिया था। हमने हाथ से पत्र लिखकर लोगों को आमंत्रित किया था। प्रेस विज्ञप्ति बनाई थी जिसे एकाध समाचार पत्र ने संक्षिप्त सूचना के अंतर्गत प्रकाशित किया था।

राष्ट्रभाषा सभा के लक्ष्मी रोड स्थित पुस्तक बिक्री केंद्र और समिति के कार्यालय में बड़े कागज पर हाथ से पोस्टर बनाकर चिपकाया था। उन दिनों मोबाइल तो थे नहीं, टेलीफोन भी हर घर में नहीं होता था। अतः कितने लोग आएँगे, आएँगे भी या नहीं, इसकी कोई जानकारी नहीं थी।

जानकारी भले ही नहीं थी पर “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन्‌’ पर विश्वास था। विश्वास फलीभूत भी हुआ। समय पर मित्र आने लगे। आज के मुकाबले तब लोग समय के अधिक पाबंद थे। लगभग पचहत्तर वर्षीय श्रीकृष्ण केसरी नामक एक सज्जन अपनी धर्मपत्नी के साथ उरली कांचन जैसे दूर के इलाके से आए थे। सर्वश्री/ सुश्री मधु हातेकर, डॉ. निशा ढवले, डॉ. कांति लोधी, राजेंद्र श्रीवास्तव, महेंद्र पंवार, कृष्णकुमार गुप्ता जैसे कुछ उपस्थितों के नाम याद हैं। संभवतः थोड़े समय के लिए समिति के तत्कालीन संचालक डॉ. सच्चिदानंद परलीकर जी भी रुके थे। कुल जमा पंद्रह लोग थे। मज़े की बात ये थी कि यह आंदोलन की पहली और अब तक के इतिहास में अंतिम गोष्ठी थी जिसमें रु. 15/- सहभागिता शुल्क लिया गया था।

इस काव्य गोष्ठी के लिए उस समय तक विशुद्ध नाटककार रहे मेरे जैसे निपट गद्य लिखनेवाले ने ‘पांचाली’ नामक अपने जीवन की दूसरी ( उससे पूर्व ग्यारहवीं में ‘गरीबी’ शीर्षक से एक कविता लिख चुका था।) कविता प्रस्तुत की थी। सुधा जी की “गुमशुदा की तलाश’ कविता याद है। हम दोनों की स्मृति में रह गई डॉ. निशा ढवले की कविता “दरवाज़े।’

संचालन को बहुत सराहना मिली। विनम्रता और ईमानदारी की बात है कि संचालन की कोई विशेष पूर्व तैयारी न तब की थी, न आज करता हूँ। आयोजन सफल रहा।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ कि गत 25 वर्षों में आंदोलन परिवार की 250 से अधिक गोष्ठियाँ और लगभग 50 ई-गोष्ठियाँ हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त लगभग 100 अन्य आयोजन-संगोष्ठी, समाजसेवी उपक्रम और महाविद्यालयीन विद्यार्थियों के लिए प्रकल्प आदि के रूप में हो चुके हैं।

समय के साथ व्यक्ति परिपक्व होता है, चिंतन और कृति में थोड़ी स्थिरता आती है। अन्य मामलों में तो ये लागू हुई पर जाने क्या है कि आंदोलन के लिए जो जुनून तब था, उससे अधिक आज है। “कबिरा खड़ा बाजार में लिये लुकाठी हाथ, जो घर फूँके आपणा चले हमारे साथ।’ इतनी बार घर फूँका कि आग भी थक गई पर हर बार ब्रह्मा ही चिंतित हुए और इस निर्धन दंपति के लिए फिर घर खड़ा कर दिया। अब तो आंदोलन के समर्पित साथियों की इतनी भुजाएँ हो चुकी हैं कि हम सबके सामूहिक जुनून और सामुदायिक कृति से इस परिवार की चर्चा अखिल भारतीय स्तर पर होने लगी है।

अखिल भारतीय से एक बात और याद आई। आयु और पुणे का प्रभाव ऐसा कि पहली गोष्ठी के निमंत्रण पर संस्था का नाम ‘अखिल भारतीय हिंदी आंदोलन’ लिखा था। समय ने सिखाया कि हिंदी में राष्ट्रीय परिवेश अंतर्निहित है। अतः हिंदी आंदोलन पर्याप्त है । अब देश के अनेक भागों से “आप हिंदी आंदोलन वाले संजय भारद्वाज बोल रहे हैं..’ पूछनेवाले फोन आते हैं तो लगता है कि संस्था का काम ही उसका कार्यक्षेत्र तय करता है।

मित्रो! आज 30 सितंबर 2020 को हम 26 वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। हमसे अब और अधिक सकारात्मक क्रियाशीलता की आशा की जाएगी। आइए, बनाए और टिकाए रखें हमारे जुनून को। निरंतर स्मरण रखें हमारे घोषवाक्य “हम हैं इसलिए मैं हूँ’ याने “उबूंटू’ को।

उबूंटू!

©  संजय भारद्वाज 

☆ संस्थापक- अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

 

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन# 65 – हाइबन – जलमहल ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक हाइबन   “जलमहल। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन  # 65 ☆

☆ जलमहल ☆

चित्तौड़गढ़ का किला जितना अद्भुत है उतनी ही अद्भुत पद्मिनी की कहानी है।  कहते हैं कि रानी पद्मिनी अति सुंदर ही थी। जिसकी एक झलक देखने के लिए अलाउद्दीन खिलजी बेताब था।  उस ने सब तरह के यतन किए। तब वह अंततः रानी पद्मिनी को देखने की अनोखी तरकीब के कारण कामयाब हुआ था।

उस तरकीब के अनुसार अलाउद्दीन खिलजी को पद्मिनी रानी के दर्शन कराए गए थे । रानी पद्मिनी की विश्व प्रसिद्ध महल में पद्मिनी रानी बैठी थी । पास के कमल जल तालाब में स्वच्छ पानी भरा था । अलाउद्दीन खिलजी को इसी तालाब के पानी में रानी के प्रतिबिंब  यानी छायाकृति दिखाई गई थी।

यहां के महल की अद्भुत कृतित्व और रानी पद्मिनी के अद्वितीय सौंदर्य ने उस समय अलाउद्दीन खिलजी को अभिभूत कर दिया था।  उस के मन में रानी पद्मिनी को पाने की उत्कट इच्छा जागृत हो गई थी।  जिस की परिणति युद्ध में हुई थी।

——–

जलमहल~

पानी में डोल रहा

कमलदल।

——–

जलमहल~

पानी में लहराता

कमलदल।

~~~~~~

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

20-08-20

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 73 ☆ कैसे करें  साहित्यिक समीक्षा ? ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक विचारणीय आलेख कैसे करें  साहित्यिक समीक्षा ?।  इस विचारणीय आलेख के लिए श्री विवेक रंजन जी  का  हार्दिकआभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 73 ☆

☆ कैसे करें  साहित्यिक समीक्षा ? ☆

लेखन की विभिन्न विधाओ में एक समीक्षा भी है. हर लेखक समीक्षक नही हो सकता. जिस विधा की रचना की समीक्षा की जा रही है, उसकी व्यापक जानकारी तथा उस विधा की स्थापित रचनाओ का अध्ययन ही समीक्षा को स्तरीय बना सकता है.

समीक्षा करने के कई बुनियादी सिद्धांत हैं:

समीक्षा में रचना का गहन विश्लेषण, काम की सामग्री के संदर्भ में तर्क और इसके मुख्य विचार के बारे में संक्षिप्त निष्कर्ष की होना चाहिये.

विश्लेषण की गुणवत्ता समीक्षक के स्तर और क्षमताओं पर निर्भर करती है।

समीक्षक को भावनात्मक रूप से जुड़े बिना अपने विचारों को तर्कसंगत और तार्किक रूप से व्यक्त करना चाहिए. विश्लेषणात्मक सोच समीक्षक को समृद्ध बनाती है.

समीक्षा की जा रही रचना को बिना हृदयंगम किये जल्दबाजी में  लिखी गई सतही समीक्षा न तो रचनाके साथ और न ही रचनाकार के साथ सही न्याय कर सकती है. समीक्षा पढ़कर रचना के गुणधर्म के प्रति प्रारंभिक ज्ञान पाठक को मिलना ही चाहिये, जिससे उसे मूल रचना के प्रति आकर्षण या व्यर्थ होने का भाव जाग सके. यदि समीक्षा पढ़ने के बाद पाठक मूल रचना पढ़ता है और वह मूल रचना को  समीक्षा से  सर्वथा भिन्न पाता है तो स्वाभाविक रूप से समीक्षक से उसका भरोसा उठ जायेगा, अतः समीक्षक पाठक के प्रति भी जबाबदेह होता है. समीक्षक रचना का उभय पक्षीय वकील भी होता है और न्यायाधीश भी.

पुस्तक समीक्षा महत्वपूर्ण आलोचना है और इसका एक उद्देश्य रचनाकार का संक्षिप्त परिचय व रचना का  मूल्यांकन भी है, विशेष रूप से  जिनके बारे में आम पाठक को कुछ भी पता नहीं है.

पुस्तक समीक्षा लिखने में कई सामान्य गलतियाँ हो रही हैं

  • मूल्यांकन में तर्क और उद्धरणों का अभाव
  • कथानक के विश्लेषण का प्रतिस्थापन
  • मुख्य सामग्री की जगह द्वितीयक विवरण ओवरलोड करना
  • पाठ के सौंदर्यशास्त्र की उपेक्षा
  • वैचारिक विशेषताओं पर ध्यान न देना
  • मुंह देखी ठकुर सुहाती करना

रचनात्मक काम का मूल्यांकन करते समय, समीक्षक  को  विषय प्रवर्तन की दृढ़ता और नवीनता पर भी ध्यान देना चाहिए. यह महत्वपूर्ण है कि रचना  समाज के निर्माण व मानवीय मूल्यों और सिद्धांतों के लिये, जो साहित्य की मूलभूत परिभाषा ही है कितनी खरी है.इन बिन्दुओ को केंद्र में रखकर यदि समीक्षा की जावेगी तो हो सकता है कि लेखक सदैव त्वरित रूप से प्रसन्न न हो पर वैचारिक परिपक्वता के साथ वह निश्चित ही समीक्षक के प्रति कृतज्ञ होगा, क्योंकि इस तरह के आकलन से उसे भी अपनी रचना में सुधार के अवसर मिलेंगे. समीक्षक के प्रति पाठक के मन में विश्वास पैदा होगा तथा साहित्य के प्रति समीक्षक सच्चा न्याय कर पायेगा.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 35 ☆ निष्ठा की प्रतिष्ठा ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “निष्ठा की प्रतिष्ठा”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

( 27 सितम्बर 2020 बेटी दिवस के अवसर पर प्राप्त कल्पना चावला सम्मान 2020 के लिए ई- अभिव्यक्ति परिवार की और से हार्दिक बधाई )  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 35 – निष्ठा की प्रतिष्ठा ☆

सम्मान रूपी सागर में समाहित होकर अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए, अपमान रूपी नाव पर सवार होना ही होगा। ये कथन एक मोटिवेशनल स्पीकर ने बड़े जोर- शोर से कहे।

हॉल में बैठे लोगों ने जोरदार तालियों से इस विचार का समर्थन किया। अब चर्चा आगे बढ़ चली। लोगों को प्रश्न पूछने का मौका भी दिया गया।

एक सज्जन ने भावुक होते हुए पूछा ” निष्ठावान लोग हमेशा अकेले क्यों रह जाते हैं। जो लोग लड़ – झगड़ कर अलग होते हैं , वे लोग अपना अस्तित्व तलाश कर कुछ न कुछ हासिल कर लेते हैं। पर निष्ठावान अंत में बेचारा बन कर, लुढ़कती हुई गेंद के समान हो जाता है। जिसे कुछ न कहकर भी बहुत कुछ कह दिया जाता है।”

मुस्कुराते हुए स्पीकर महोदय ने कहा ” सर मैं आपकी पीड़ा को बहुत अच्छे से समझ सकता हूँ। सच कहूँ तो ये मुझे अपनी ही व्यथा दिखायी दे रही है। मैं आज यहाँ पर इसी समस्या से लड़ते हुए ही आ पहुँचा हूँ। ये तो शुभ संकेत है, कि आप अपने दर्द के साथ खड़े होकर उससे निपटने का उपाय ढूँढ़ रहे हैं। जो भी कुछ करता है ,उसे बहुत कुछ मिलता है। बस निष्ठावान बनें  रहिए, कर्म से विमुख व्यक्ति को सिर्फ अपयश ही मिलता है , जबकि कर्मयोगी, वो भी निष्ठावान ; अवश्य ही इतिहास रचता है।

सभी ने तालियाँ बजा कर स्पीकर महोदय की बात का समर्थन किया।

समय के साथ बदलाव तो होता ही है। आवश्यकता ही अविष्कार की जननी होती है। किसी उद्देश्य को पूरा करने हेतु दुश्मन को दोस्त भी बनाना, कोई नई बात नहीं होती। बस प्रतिष्ठा बची रहे, भले ही निष्ठा से कर्तव्य निष्ठा की अपेक्षा करते- करते, हम उसकी उपेक्षा क्यों न कर बैठे, स्पीकर महोदय ने समझाते हुए कहा।

सबने पुनः तालियों के साथ उनका उत्साहवर्द्धन  किया।

पिछलग्गू व्यक्ति का जीवन केवल फिलर के रूप में होता है, उसका स्वयं का कोई वजूद नहीं रहता। अपने सपनों को आप पूरा नहीं करेंगे , तो दूसरों के सपने पूरे करने में ही आपका ये जीवन व्यतीत होगा। जो चलेगा वही बढ़ेगा, निष्ठावान बनने हेतु सतत प्रथम आना होगा। उपयोगी बनें, नया सीखें, समय के अनुसार बदलाव करें।

इसी कथन के साथ स्पीकर महोदय ने अपनी बात पूर्ण की।

सभी लोग एक दूसरे की ओर देखते हुए, आँखों ही आँखों में आज की चर्चा पर सहमति दर्शाते हुए नजर आ रहे थे।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 42 ☆ पाँच दोहे ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  “पाँच दोहे .)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 42 ☆

☆ पाँच दोहे ☆ 

चिंतन वो ही श्रेष्ठ है, करे जगत उद्धार।

खुद को दे विश्वास जो, यही सत्य है सार।।

 

उत्सव मेरा नित्य है, देता नव उपहार।

मन में नव ऊर्जा भरे, करता प्रेम अपार।।

 

संशय-विस्मय मत करो, मन में भरो उमंग।

जीवन तो है बाँसुरी, रहकर सदा अनंग।

 

काम सदा वे ही करें, रहकर आत्म यथेष्ट।

जीवन पुष्पों-सा खिले, हरदम रहें सचेष्ट।।

 

चपल कौमुदी खिल गई, शशि ने किया उजास।

तन-मन आनन्दित हुआ, कण – कण प्रकृति हुलास ।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ तू बांध ना रे झुला … ☆ प्रा. सौ. सुमती पवार

प्रा.सौ. सुमती पवार

☆ कवितेचा उत्सव ☆ तू बांध ना रे झुला … ☆ प्रा. सौ. सुमती पवार ☆

 

प्राजक्ताच्या फुलांनी तू न्हाऊ घाल मला

कदंबाच्या झाडाखाली झुलव तू मला झुला ….

 

झुल्यावर झुलव तू प्रेमाने पाहिन

माझ्या डोळ्यामध्ये मीच तुला झुलविन

डोळ्यातच घर तुझ्या बांधीन रे मला …

कदंबाच्या ….झुला….

 

जाईजुई चाफ्याचे रे बांधू या तोरण

हातामध्ये हात घेऊ गाऊ चल गाणं

प्रेम आपले साजरे सजव तू मला

कदंबाच्या ….झुला….

 

कृष्ण सखा माझा तू रे मी तुझी राधा

झाली पहा तुझी मला पहा प्रेम बाधा

चंद्र सूर्य ते साक्षिला घेऊ चला चला

कदंबाच्या ….झुला…..

 

स्वप्न पाहू सुंदर ते आभाळाचे निळे

जन सारे म्हणतील आपल्याला खुळे

स्वर्ग माझ्या बोटावर सांगू कसे तुला

कदंबाच्या ……झुला….

 

प्रेम रसात डुंबता स्वर्ग हाती येई

केशराच्या शेतात ते घर बांधू नवलाई

वास्तवाच्या जगातून नेई दूर मला

कदंबाच्या झाडाखाली……

झुलव तू मला झुला…..

 

© प्रा.सौ.सुमती पवार ,नाशिक

दि: १५/०८/२०२०, वेळ:रात्री: १०/२५

(९७६३६०५६४२)

svpawar6249@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ प्रेमाचा रंग ☆ डाॅ. मेधा फणसळकर

डाॅ. मेधा फणसळकर

☆ जीवनरंग ☆ प्रेमाचा रंग ☆ डाॅ. मेधा फणसळकर ☆ 

आई, मी तुझीच मुलगी ना?” रियाच्या या प्रश्नाने निशा दचकली. तिने झटकन रियाला जवळ घेतले व विचारले,“का ग बेटा? असे का विचारतेस? तू तर माझे लाडके पिल्लू आहेस.” “शेजारची रिमाकाकू म्हणते की तू आईची खरी मुलगी नाहीस. तुझी आई बघ किती गोरी आहे आणि तू बघ किती काळी ते!” चिमुकल्या डोळ्यातून वाहणारे अश्रू पुसत निशाने रिमाला अधिकच जवळ ओढून घेतले. वास्तविक रियाला तिने अनाथाश्रमातून दत्तक घेतले होते आणि ती जरा मोठी झाली की तिला सर्व सांगणारच होती. पण शेजारच्या रिमाने त्या आधीच त्या बालमनाला घायाळ केले होते. तिला शांतपणे थोपटत निशा म्हणाली,“ बाळा, आपला रंग आपल्या हातात थोडाच असतो?आणि तुला आठवते?  परवा तुला पायाला ठेच लागली आणि रक्त आले होते. तसेच आज भाजी चिरताना माझे बोट कापले. तेव्हा रक्त आले. आपल्या दोघींच्या रक्ताचा रंग लालच होता किनई? मग तू माझी मुलगी कशी नाहीस?” त्या अजाण बालमनाला ते लगेच पटले आणि तिने आईला घट्ट मिठी मारली . निशा मनात म्हणाली,“ आमच्या बाह्यरंगात फरक असेल, पण माझ्या या पिल्लाच्या आणि माझ्या नात्यातील प्रेमाचा रंग नेहमी गहिराच असेल.”

 

©  डाॅ. मेधा फणसळकर

9423019961

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ गरज ☆ सौ.अश्विनी कुलकर्णी

☆ विविधा ☆ गरज ☆ सौ.अश्विनी कुलकर्णी ☆ 

जगण्यासाठी ‘ प्राणवायूची’ गरज! जीवनासाठी ‘जीवनाची’ (पाण्याची) गरज! तसेच उदर भरणासाठी ‘अन्नाचीही’ गरज! लज्जारक्षणासाठी ‘कापडाची’ गरज!

विश्रांतीला ‘रात्रीची’ गरज! नव्या दिवसाच्या सुरुवातीला ‘रवीराजाची’ गरज! एवढ्या मोठ्या ‘संसाराला’ ‘पृथ्वीची’ गरज!

पृथ्वीवरील मानव जात ह्या अस्तित्वासाठी ‘कळात-नकळत सर्व वायू, खनिजे,धातू’ आदींची गरज!

मानवी गरजांसाठी ‘झाडे,पशु,पक्षी ‘ व ‘निसर्गाची’ आदींची हि गरज!

मानव, पशू , पक्षी, जलचर,उभयचर याना वंशवृद्धी साठी ‘प्रजननाची’ गरज!

जन्म दिलेल्या वंशाला कर्तव्य रुपी ‘सांभाळण्याची,घडवण्याची ‘ गरज!

अर्भकाला ‘पान्हयाची’ गरज! ‘वात्सल्याची’ गरज! प्रेमाच्या ‘कुशीची’ व ‘उबेची’ गरज!

कालपरत्वे, ‘शिक्षणाची’ गरज!

हे शिक्षण फक्त पुस्तकीच नव्हे, तर ‘संस्कार, धर्म, नीतिमत्ता, माणुसकी, सामाजिक बांधिलकी, थोर मोठ्यांचा आदर, सर्वांशी नम्रता, प्रेमभाव, सहनशीलता, त्याग वृत्ती, जबाबदारीची जाण, मर्यादा आदीं शिकण्याची गरज! काही वेळेस हे शिक्षण आपोआप मिळत असते–अनुकर्णातून, अनुभवातून। पण एक माणूस म्हणून ह्या सर्व गोष्टी मिळवाण्याची गरज!

नियम व शिस्तीची गरज! मग ती स्वतापूर्ती नसून प्रत्येकाशी संबधीत जोडली जाते!

ह्या सर्व जीवनाचे ‘ रहाट गाडगे! चालवण्यासाठी मुख्यत्वे ‘चलनाची’ गरज!

‘चलन’ मिळवण्यासाठी, ज्ञान, हुशारी, चतुराई, दिवसरात्र धावपळ व कष्टाची गरज!

आपल्याकडचे ज्ञान दुसर्यांना देण्याचीही गरज! शिकण्याबरोबर शिकवण्याचीही गरज!

कचेरीत व इतर कामाच्या ठिकाणी नीटनेटकेपणा, कर्तव्यदक्षता, व्यवहार व शिष्टयाचाराची गरज!

स्वतःच्या आवडी, छंद जोपासणे व त्यातून आनंद मिळवण्याचीही गरज!

मग काहीजण संगीत म्हणतील, ऐकतील, काहीजण काव्य करतील, काही वाद्य वाजवतील, काही चित्रकार होतील,काही जण स्वैर गार झुळूक घेऊनही सुखवतील।  — जीवनाचे अवघड समीकरण सोडवताना , काही turning पॉईंट येतील. त्यावेळी कुठेतरी शांत प्रसन्न संगीत, छंदजोपासणे, समाज कल्याण आवड असणे, व करणे, ह्यातून नव्याने आपण पुन्हा घडत असतो, त्यामुळे हे छंद जोपासणे हि सुद्धा ‘गरजच’!

दैनंदिन जीवनाच्या रेलचालीत, अगदी लहान गोष्टी, वस्तू, माणसे सर्वांची आपल्याला पर्यायाने गरज लागते, भासते।

एकमेकांवर अवलंबून असलेल्या गोष्टी तर ‘गरजे’ शिवाय पूर्ण होऊच शकत नाहीत!

आणि आज प्रत्येक व्यक्ती,नाती,कचेरीत कर्मचारी, कितीही बुद्धिजीवी असुदेत एकमेकांवर, अस्तित्वावर अवलंबून असतो.

सगळं ‘मीच’ करू म्हटलं तर काहीच धड होत नाही. आणि ‘मला कोणाची गरजच नाही’ हे विधान ‘अहं’  पणाने परिपूर्ण असते. हा अहं सोडनेही ‘हितावह’ व गरजेचे असते.

आयुष्यात चालताना पडणे, धडणे, जखम होणे,चटके बसने, हेलकावे खाणे असे विविध  परवानगी आपण विविध कसोट्यातून उतरत असतो, तीही एक ‘गरजच’ त्यातून धडे घेणेही गरजेचे असते ।त्यातून खूप काही शिकत असतो आपण.

मनुष्य योनीत जन्माला येऊन जीवयातील मखमल, हिरवळ टिकवण्यासाठी काही तडजोडी कराव्यात, काही झटकून टाकावे, काही वगळावे, काही स्वीकारावे, मनाला व दुसर्यांना आनंद मिळवा म्हणून कुठलाही राग न ठेवता ‘माफ’ करावे, हि सुद्धा ‘गरज’ क्लेश तुन क्लेश व इतर वृत्ती वाढतात, त्याला वेळीच समजून आळा घालण्याची ‘गरज’.

दुसर्यांचे हित करताना, चिंताताना, आनंद द्यावा व आनंद मिळवावा. हि सुद्धा ‘गरजच’ मारून मुटकून काहीच मिळत नसते, ‘प्रेमानेच प्रेम मिळते’ , ‘प्रेमानेच प्रेम टिकते’ हे प्रेम टिवण्याचीही ‘गरजच’.

© सौ अश्विनी कुलकर्णी

सांगली  (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – विविधा ☆ दानयज्ञ ☆ सौ. वीणा रारावीकर

☆ विविधा ☆ दानयज्ञ ☆ सौ. वीणा रारावीकर ☆ 

अधिक “अश्विन” सुरू झाला आहे. अधिक महिन्यात दानधर्म करावा असे सांगितले जाते. इतकेच नव्हे, तर अधिक महिन्यातील कोणत्या तिथीला काय दान करावे, याचे नियमही असल्याचे सांगितले जाते. या कालावधीत दान केलेल्या एका रुपायाचे पुण्यफळ दसपटीने मिळते, असेही सांगितले जाते.

संस्कृतमधील एक श्लोक सर्वांनाच परिचित आहे.

शतेषु जायते शूरः सहस्त्रेषु च पण्डितः ।

वक्ता दशसहस्त्रेषु दाता भवति वा न वा ॥

शूर माणूस शंभरात एक, पण्डित हजार मध्ये एक, वक्ता दहा हजार मध्ये एक परंतु दाता मिळणे मुश्किल असते.

भारतीय संस्कृती, परंपरा, संस्कार यांमध्ये दानाला अधिक महत्त्व आहे. अगदी रामायण, महाभारत काळापासून दानाचे महत्त्व अधोरेखित झालेले आहे. आजही आपण “दानशूर असावे ते  कर्णासारखे” असेच म्हणत असतो.

दान हे सत्पात्री सुध्दा असले पाहिजे. सत्पात्री दान म्हणजे जे दान आपण देत आहोत ते योग्य व्यक्तीला दिले गेले पाहिजे. जी गोष्ट देत आहोत ती गोष्ट घेण्याची त्याची पात्रता पाहिजे. ज्या वस्तूची ज्या माणसाला गरज आहे, त्याचवेळी ती दिली गेली पाहिजे.

म्हणून दान म्हणजे धन किंवा संपत्ती या स्वरुपातच दिले गेले पाहिजे असे काही नाही. श्रीमंतांकडे देण्यासाठी धनदौलत असेल, तर एखाद्या कलाकाराकडे त्याची कला तर गरीब शिक्षकाकडे त्याचे ज्ञान. रुग्णसेवेला समर्पित डाॅक्टर आणि देशसेवेला अर्पण झालेला सैनिक आपल्या जीवाची आहुती या “दान” यज्ञात करतच असतात. सध्याच्या कोव्हीडच्या महामारीत अनेक लोक आपापल्या परिने दान करत आहेत. एकमेकांना मदत करत आहेत.

आपल्यासारखे सामान्य लोक रक्तदान करतात. मरणोत्तर नेत्रदान करतात. यापेक्षा पुढे जाऊन काही लोक अवयवदान किंवा देहदान करतात. देहदान आपल्याकडे सर्वात प्रथम कोणी केले असेल तर दधीची ऋषींनी. गीतेतील श्लोकाप्रमाणे आत्मा अमर, अविनाशी  असतो.

“नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।

न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः।। ”

आत्म्याचे कोणत्याही शस्त्राने टुकडे करता येत नाहीत. अग्निने तो जळत नाही किंवा पाणी त्याला ओला करू शकत नाही. वायू त्याला शोषून घेऊ शकत नाही. माणसाचा मृत्यू झाला की आत्मा एक शरिर सोडून दुसऱ्या शरिरात प्रवेश करतो. मग हे मृत शरिर सुध्दा कोणाच्यातरी उपयोगी पडलं तर किती चांगली गोष्ट आहे.

आपले लाडके कवीवर्य विं.दा. करंदीकर यांनी दानाचे महत्व सांगणारी कविता लिहिली.

“देणार्‍याने देत जावे

घेणाऱ्याने घेत जावे

घेता घेता एक दिवस

देणार्‍याचे हात घ्यावे”

त्यांनी स्वतःसुध्दा देहदान करून समाजापुढे एक आदर्श घालून दिला आहे. नवीन चांगले डाॅक्टर आपल्याला हवे असतील तर त्यांच्या शिक्षणासाठी आवश्यक अशी ही गोष्ट आहे. तसेच अवयवदान, त्वचादान यांनी आपण एखाद्याचे प्राण वाचवू शकतो.

आपल्याकडे धार्मिक कार्यातदेखील दान करतात. स्वतःच्या लग्नाच्या पत्रिकेत “अवयवदान, नेत्रदान फाॅर्म भरा, हाच तुमचा आहेर” असे एक-दोन लोकांनी छापले होते. आणि त्याप्रमाणे लग्नसमांरभात संध्याकाळी येणाऱ्या मंडळींना फाॅर्म भरण्यासाठी सोय केली केली होती.

अशा दानयज्ञात आपण आपले नेत्रदान, देहदान, अवयवदान याचे फाॅर्म भरून आहुती टाकली, तर याचे पुण्यफळ हजार पटींनी जास्त मिळेल, असे मला वाटते.

 

© सौ. वीणा आशुतोष रारावीकर

लोअर परेल, मुंबई

(ता.क. – माझ्या आई-वडील दोघांचेही २०१२ साली देहदान केले आहे.)

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

Please share your Post !

Shares