हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #51 ☆ लॉकडाउन  ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # लॉकडाउन ☆

ढाई महीने हो गए। लॉकडाउन चल रहा है। घर से बाहर ही नहीं निकले। किसी परिचित या अपरिचित से आमने-सामने बैठकर बतियाए नहीं। न कहीं आना, न कहीं जाना। कोई हाट-बाज़ार नहीं। होटल, सिनेमा, पार्टी नहीं। शादी, ब्याह नहीं। यहाँ तक कि मंदिर भी नहीं।. ..पचास साल की ज़िंदगी बीत गई।  कभी इस तरह का वक्त नहीं भोगा। यह भी कोई जीवन है? लगता है जैसे पागल हो जाऊँगा।

बात तो सही कह रहे हो तुम।…सुनो, एक बात बताना। घर में कोई बुज़ुर्ग है? याद करो, कितने महीने या साल हो गए उन्हें घर से बाहर निकले? किसी परिचित या अपरिचित से आमने-सामने बैठकर बतियाए? न कहीं आना, न कहीं जाना। कोई हाट-बाज़ार नहीं। होटल, सिनेमा, पार्टी नहीं। शादी, ब्याह नहीं। यहाँ तक कि मंदिर भी नहीं।…. उन्हें भी लगता होगा कि  यह भी कोई जीवन है? उन्हें भी लगता होगा जैसे पागल ही हो जाएँगे।

…लेकिन उनकी उम्र हो गई है। जाने की बेला है।… तुम्हें कैसे पता कि उनके जाने की बेला है। हो सकता है कि उनके पास पाँच साल बचे हों और तुम्हारे पास केवल दो साल।…बड़ी उम्र में शारीरिक गतिविधियों की कुछ सीमाएँ हो सकती हैं पर इनके चलते मृत्यु से पहले कोई जीना छोड़ दे क्या?

वे अनंत समय से लॉकडाउन में हैं। उन्हें ले जाओ बाहर, जीने दो उन्हें।…सुनो, यह चैरिटी नहीं है, तुम्हारा प्राकृतिक कर्तव्य है। उनके प्रति दृष्टिकोण बदलो। उनके लिए न सही, अपने स्वार्थ के लिए बदलो।

जीवनचक्र हरेक को धूप, छाँव, बारिश सब दिखाता है। स्मरण रहे, घात लगाकर बैठा जीवन का यह लॉकडाउन धीरे-धीरे  तुम्हारी ओर भी बढ़ रहा है।

©  संजय भारद्वाज

प्रात: 4:35 बजे, 6.6.2020

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथा – मेहनत की पूंजी ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी” जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की  एक सार्थक एवं  हृदयस्पर्शी लघुकथा मेहनत की पूंजी। इस अतिसुन्दर रचना के लिए आदरणीया श्रीमती हेमलता जी की लेखनी को नमन। )

 ☆  मेहनत की पूंजी ☆ 

पाँच बरस पहले जब सहर गया था जुगनू कंपनी में नौकरी करने— तब झोंपड़ी की तरह दिखने वाला मगर मजबूत घर – – घर के सामने लगभग एक एकर का बाड़ा – – बाडे़ में चारों ओर घेरते सीताफल निबू संतरा के फलदार वृक्ष आँगन के बीचों-बीच तुलसी मैया का चौरा और आँगन द्वारे से कुछ ही दूर गाँव का चौबारा पीपल की घनी छाया वाला – – ये सब छोड़ कर गया था। – – – – और सबसे ज्यादा अम्मा बाबूजी की गूंजती आवाज में सुबह सबेरे से  रामायण की दोहा, चौपाई, सोरठा, छंद और शाम को ढोलक की धमधम और झांझ की छनक छन के साथ आल्हा की रागिनी—बड़ी कठिनाई से भुला पाया था यह स्वर्गिक आनंद।

दस बाय दस की कुठरिया में बीते आजाद जिनगी की बँधी नौकरी के पांच साल और  हासिल रहा आज अम्मा बाबूजी की राख और ये उजडा़ चमन।

कुआं भीतर धस चुका था। बबूल की झाड़ियां बेसरम के झाड़ और झरबेरी पूरे परिसर को लील चुकी थी। दो तीन दिनों की हाड़तोड़ मेहनत के बाद कुंआं कुछ उपर आया और पानी हाथ को लगा।

बस दोनों आदमी औरत को तो प्राण मिल गये मनो। खोदते चले खोदते चले और एक समय घुटना घुटना पानी आ गया।

दो दिन से डबल रोटी और चाह पर जी रहे परिवार की चाह जी उठी।

अचानक घर की कुंडी बजी। द्वार पर बड़ी बखरी के कारिंदे खड़े थे। उनके हाथ में एक कागज था जिस पर कुछ लिखा था और नीचे बाबूजी का अंगूठा और नाम लिखा था। पढा कि यह घर बाड़ा कुआं सबकुछ बखरी के मालिकों के पास गिरवी पड़ा है– 20000/- रूपयों में! एक क्षण के लिए अँधेरा छा गया आँख के नीचे लेकिन सहर के वासी हो चुके दोनों मानस – – – छिपा लिए अपने टूटे दिल का हाल और वादा कर लिया उनसे कि छःमाह में पूरा पईसा चुका देंगे

और दूसरे दिन के सूरज ने देखा कि चार मेहनतकश हाथ और कांँधे हल से जुते हैं और चार नन्हीं हथेलियाँ थोड़ी-थोड़ी देर में उन्हे पानी और गुड खिला रही हैं।

कोरोना के कारण बदली उस परिस्थिति में  आज बस उफनता वर्तमान और चमकता भविष्य ही उस मेहनती परिवार का सहारा है जो अपने ही घर में मजदूरी करके भी आशाओं के आशीष की राह पर चल पड़े हैं मेहनत की पूंजी के सहारे।

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 10 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 10/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 10 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

दिल ना चाहे फिर भी यारो 

मिलते जुलते रहा करो…

करो शिकायत गुस्से में ही

कुछ ना कुछ तो कहा करो…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 Heart may not desire still 

Friends keep on meeting

Complain even in anger only

But at least say something…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 खामोशियां बोल देती है

ज़िनकी बातें नहीं होती..

दोस्ती उनकी भी क़ायम है

ज़िनकी मुलाक़ातें नहीं होती…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 Silence converses with them 

who don’t talk to each other…

Friendship flourishes of those too,  

Who don’t even get to meet…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 बेदाग़ रख महफूज़ रख

मैली न कर तू ज़िन्दगी…

मिलती नहीं इँसान को…

किरदार की चादर नईं…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 Keep it spotless, keep it secure

Your life don’t you ever stain

For man does not receive again

A fresh mask for his character

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ 

क्या कहना उनका जो हवाओं में 

सलीक़े से  ख़ुशबू घोल देते हैं 

फ़िज़ाएँ मुश्कबार हो जाती हैं   

फ़क़त जिनके खयाल से…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 12 ☆ मुहावरेदार दोहे☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपके मुहावरेदार दोहे. 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 12 ☆ 

☆ मुहावरेदार दोहे☆ 

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

पाँव जमकर बढ़ ‘सलिल’, तभी रहेगी खैर

पाँव फिसलते ही हँसे, वे जो पाले बैर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

बहुत बड़ा सौभाग्य है, होना भारी पाँव

बहुत बड़ा दुर्भाग्य है होना भारी पाँव

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

पाँव पूजना भूलकर, फिकरे कसते लोग

पाँव तोड़ने से मिटे, मन की कालिख रोग

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

पाँव गए जब शहर में, सर पर रही न छाँव

सूनी अमराई हुई, अश्रु बहाता गाँव

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

जो पैरों पर खड़ा है, मन रहा है खैर

धरा न पैरों तले तो, अपने करते बैर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

सम्हल न पैरों-तले से, खिसके ‘सलिल’ जमीन

तीसमार खाँ हबी हुए, जमीं गँवाकर दीन

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

टाँग अड़ाते ये रहे, दिया सियासत नाम

टाँग मारते वे रहे, दोनों है बदनाम

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टाँग फँसा हर काम में, पछताते हैं लोग

एक पूर्ण करते अगर, व्यर्थ न होता सोग

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बिन कारण लातें न सह, सर चढ़ती है धूल

लात मार पाषाण पर, आप कर रहे भूल

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

चरण कमल कब रखे सके, हैं धरती पर पैर?

पैर पड़े जिसके वही, लतियाते कह गैर

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

धूल बिमाई पैर का, नाता पक्का जान

चरण कमल की कब हुई, इनसे कह पहचान?

 ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य – वर्षा ऋतु ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज आपके “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना  – वर्षा ऋतु ।  

दो शब्द रचना कार के—-वर्षा  ऋतु का ‌आना, बूंदों का बरसना, इस धरा के‌ साथ-साथ उस पर रहने वाले समस्त जीव जगत के तन मन को भिगो जाती है। जब धूप से जलती धरती के सीने पर बरखा की‌ फुहारें पड़ती है तो ये धरा हरियाली की चादर ओढ़े रंग रंगीले परिधानों से सजी दुल्हन जैसी अपने ही निखरे रूप यौवन पर मुग्ध हो उठती है, किसान कृषि कार्यों में मगन हो जाता है। बोये गये बीजों के नवांकुरों की कोंपले, दादुर मोर पपीहे की  बोली की तान  अनायास ही जीवन में उमंग, उत्साह, उल्लास का वातावरण सृजित कर देते हैं। इन सब के बीच कजरी आल्हा के धुनों पर मानव मन थिरक उठता है, तो वहीं कहीं पर किसी बिरहिणी का मन अपने पिया की याद में आकुल हो उठता है।  यह रचना आनंद और पीड़ा के इन्ही पलों का चित्रण करती है।

——— सूबेदार पाण्डेय 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  वर्षा ऋतु 

बरखा ऋतु आई उमड़ घुमड़,

बदरा लाई कारें कारें।

तन उल्लसित है मन‌ पुलकित है,

खुशियां  छाई द्वारे द्वारे ।

तन भींगा मन भी भींगा,

भींगी धरती भींगा अंबर।

झर झर झरती बूंदों से,

धरती ने ओढ़ा धानी चूनर ।।१।।

 

वो आती अपार जलराशि ले,

धरती की प्यास बुझाने को।

नदियों संग ताल पोखरों की ,

मानों गागर भर जाने को ।

जब काले मेघा देख मयूरे,

अपना नृत्य दिखाते हैं ।

जल भरते ताल पोखरों में,

दादुर झिंगुर टर्राते हैं ।।२।।

 

पुरवा चलती  जब सनन सनन ,

घहराते बादल घनन घनन ।

गर्मी से मिलती है निजात,

चलती है शीतल सुखद पवन।

घहराते मेघों के उर में,

जब स्वर्ण रेखा खिंच जाती है।

चंचल नटखट बच्ची की तरह,

वह अगले पल छुप जाती है।।३।।

 

कभी आकर पास मचलती है,

कभी दूर दिखाई देती है।

अपना हाथ पकड़ने का,

आमंत्रण मानों देती है।

वह खेल खेलती लुका छुपी का,

दिखती चंचल बाला सी है।

घहराती है नभमंडल में,

धरती पर आती ज्वाला सी है।।४।।

 

कभी दौड़ती तीर्यक तीर्यक ,(टेढे़ मेढ़े)

दिखती है बलखाती सी।

कभी घूमती लहराती,

नर्तकी की नाच दिखाती सी।

कभी कड़कती घन मंडल में,

मन हृदय चीर जाती है।

कभी बज्र का रुप पकड़,

सब तहस नहस  कर जाती है।।५।।

 

जब बरखा ऋतु आती है

त्योहारों के मौसम लाती है।

बालिका वधू संग सब सखियां,

गीत खुशी के गाती है ।

बाग बगीचों अमराई में,

डालों पर झूले पड़ते हैं ।

ढोल नगाड़े बजते हैं,

त्योहारों के मेले सजते हैं। ।६।।

 

कजरी के गीतों से वधुएं,

कजरी तीज मनाती हैं।

जब बरखा ऋतु आती है,

बिरहिणी में बिरह जगाती हैं ।

कोयल पपीहे की बोली,

जिया में हूक उठाती है  ।

चौपालों में उठती आल्हा की धुन,

तन मन में  जोश जगाती हैं    ।।७।।

 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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हिन्दी / मराठी साहित्य – कविता ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर की मराठी कविता ‘तेव्हा’ एवं हिन्दी भावानुवाद ‘तब’ ☆ श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

( श्री भगवान् वैद्य ‘ प्रखर ‘ जी  हिंदी एवं मराठी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपका संक्षिप्त परिचय ही आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचायक है।

संक्षिप्त परिचय : 4 व्यंग्य संग्रह, 3 कहानी संग्रह, 2 कविता संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, मराठी से हिन्दी में 6 पुस्तकों तथा 30 कहानियाँ, कुछ लेख, कविताओं का अनुवाद प्रकाशित। हिन्दी की राष्ट्रीय-स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में विविध विधाओं की 1000 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से छह नाटक तथा अनेक रचनाएँ प्रसारित
पुरस्कार-सम्मान : भारत सरकार द्वारा ‘हिंदीतर-भाषी हिन्दी लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार’, महाराष्ट्र राजी हिन्दी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा कहानी संग्रहों पर 2 बार ‘मूषी प्रेमचंद पुरस्कार’, काव्य-संग्रह के लिए ‘संत नामदेव पुरस्कार’ अनुवाद के लिए ‘मामा वारेरकर पुरस्कार’, डॉ राम मनोहर त्रिपाठी फ़ेलोशिप। किताबघर, नई दिल्ली द्वारा लघुकथा के लिए अखिल भारतीय ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान 2018’

हम आज प्रस्तुत कर रहे हैं श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ जी द्वारा सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  की एक भावप्रवण अप्रतिम मराठी कविता ‘तेव्हा’ काअतिसुन्दर हिंदी भावानुवाद ‘तब’ 

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  

आज प्रस्तुत है  सर्वप्रथम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी की  मूल मराठी कविता  ‘तेव्हा ‘ तत्पश्चात श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ जी  द्वारा हिंदी भावानुवाद ‘तब ‘ 

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☆ तेव्हा

किती रिक्त एकाकी

असते मी

तुला भेटते

तेव्हा.

माझा सारा पदर

पसरते

झोळी म्हणून

पण, तू तर

माझ्यापेक्षाही

कंगाल निघालास

माझ्या पदराला जडवलेले

संकेतांचे मणी

स्वप्नांच्या चमचमत्या

टिकल्या

आशा-आकांक्षांचे मोती

तू अलगद उचललेस

तू घेतलंस सारंच

तुला हवं ते

आणि  दिलंस भिरकावून

माझ्या फाटक्या पदरात

एक नि:संग झपातलेपण.

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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☆ तब 

कितनी रिक्त

एकाकी होती हूं मैं

तुमसे मिलती हूं तब !

 

अपना समूचा आंचल

फैलाती हूं

झोली के रूप में

 

पर तुम तो

मुझसे भी कंगाल निकले !

मेरे आंचल में जड़े

संकेतों के मणिं

सपनों की दमकती बिंदियां

आशा-आकांक्षाओं के मोतीं

तुमने  सहज उठा लिये…

 

तुमने ले लिया सबकुछ

जो तुम्हें चाहिये

और उछाल दी

एक निर्लज्ज आसक्ति

मेरे विदीर्ण आंचल की ओर ।

 

© श्री भगवान् वैद्य ‘प्रखर’ 

30 गुरुछाया कॉलोनी, साईं नगर अमरावती – 444 607

मोबाइल 9422856767

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 15 ☆ मी तुझ्याच साठी आली ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है उनकी एक  भावप्रवण कविता “मी तुझ्याच साठी आली“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 15 ☆

☆ मी तुझ्याच साठी आली

गाली खळी तुझ्या ती, हसुनी मला म्हणाली

रे धुंद प्रेमवेड्या, मी तुझ्याच साठी आली!!

 

क्षितिजावरील लाली, केशरसुगंध ल्याली

गुलबक्षी पाकळ्यातुनी, गालावरी निमाली

स्पर्शातली मखमाली, लाजुन मला म्हणाली

रे धुंद प्रेमवेड्या, मी तुझ्याच साठी आली!!

 

त्या अथांग सागरातील, जणू स्निग्ध तरल लहरी

तू सुकेशिनी अशी गं, निशिगंधयुक्त कस्तुरी

केसात माळलेली, वेणी मला म्हणाली

रे धुंद प्रेमवेड्या, मी तुझ्याच साठी आली!!

 

ते अधर विलग होती, जणू पाकळ्या कळीच्या

तो गंध चंदनाचा, शब्दात सावलीच्या

काळी विशाल नयने, लाजून मला म्हणाली

रे धुंद प्रेमवेड्या, मी तुझ्याच साठी आली!!

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (28) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

 

समं पश्यन्हि सर्वत्र समवस्थितमीश्वरम्‌ ।

न हिनस्त्यात्मनात्मानं ततो याति परां गतिम्‌ ।।28।।

जो लखता है सबो में ,परमेश्र्वर का रूप

वह आत्मा को देखता, पाता सद्गति खूब ।।28।।

 

भावार्थ :  क्योंकि जो पुरुष सबमें समभाव से स्थित परमेश्वर को समान देखता हुआ अपने द्वारा अपने को नष्ट नहीं करता, इससे वह परम गति को प्राप्त होता है।।28।।

 

Because he who sees the same Lord dwelling equally everywhere does not destroy the Self by the self, he goes to the highest goal.।।28।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा – स्टिकर ☆ श्री कमलेश भारतीय

श्री कमलेश भारतीय

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

आज प्रस्तुत है लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा दर्शाती सुप्रसिद्ध लघुकथाओं में से एक सर्वश्रेठ लघुकथा –  स्टिकर।  हम आपके साथ भविष्य में भी श्री कमलेश भारतीय जी की सर्वोत्कृष्ट रचनाएँ आपसे साझा करते रहेंगे। कृपया आत्मसात करें।

☆ लघुकथाओं में राजनीति का चेहरा : स्टिकर  

एक पार्टी के लोग मुझसे चंदा मांगने आए । उनके भले चेहरों को देखकर मैं इंकार न कर सका । चलते चलते वे अपनी पार्टी का स्टिकर भी ड्राइंगरूम में लगा गये । मैं विचारों से सहमत न होते हुए भी लोकलज्जावश चुप रह गया ।

अब जो भी आता, पहले मुझको, फिर स्टिकर को घूरने लगता । घुमा फिरा कर पूछ ही लेता कि क्या मैं फलां पार्टी का सदस्य हूं । मैं इंकार में सिर हिला देता । अगला सवाल फिर होता, यदि सदस्य नहीं तो क्या इस पार्टी के हमदर्द हो ? मैं मासूम सा इंकार फिर कर देता । फिर तो जैसे तोप का मुंह मेरी ओर हो जाता ।

मोटी सी बात कही जाती- जब सदस्य नहीं, हमदर्द नहीं, तो फिर चंदा किसलिए ?

अब मेरा माथा ठनका । यह मामूली सा स्टिकर मेरी जान का जंजाल बन गया । बात ठीक भी लगने लगी । यदि किसी पार्टी का स्टिकर मेरे ड्राइंगरूम में लगेगा तो मेरे ही विचारों का प्रतिरूप माना जायेगा । मैं मामूली से स्टिकर को अपना मुखौटा क्यों बनने दूं ? किसी की विचारधारा को मैं क्यों ढोता फिरूं ?

एक फैसले के तहत मैने चाकू लेकर स्टिकर को काट दिया और मुक्ति की सांस ली

 

©  कमलेश भारतीय

1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ वह लिखता रहा…. ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ वह लिखता रहा….☆

 

‘सुनो, रेकॉर्डतोड़ लाइक्स मिलें, इसके लिए क्या लिखा जाना चाहिए?’
……वह लिखता रहा।

‘अश्लील और विवादास्पद लिखकर चर्चित होने का फॉर्मूला कॉमन हो चुका। रातोंरात (बद)नाम होने के लिए क्या लिखना चाहिए?’
…..वह लिखता रहा।

‘अमां क्लासिक और स्तरीय लेखन से किसीका पेट भरा है आज तक? तुम तो यह बताओ कि पुरस्कार पाने के लिए क्या लिखना चाहिए?’
…..वह लिखता रहा।

‘चलो छोड़ो, पुरस्कार न सही, यही बता दो कि कोई सूखा सम्मान पाने की जुगत के लिए क्या लिखना चाहिए?’
…..वह लिखता रहा।

वह लिखता रहा हर साँस के साथ, वह लिखता रहा हर उच्छवास के साथ। उसने न लाइक्स के लिए लिखा, न चर्चित होने के लिए लिखा। कलम न पुरस्कार के लिए उठी, न सम्मान की जुगत में झुकी। उसने न धर्म के लिए लिखा, न अर्थ के लिए, न काम के लिए, न मोक्ष के लिए।

उसका लिखना, उसका जीना था। उसका जीना, उसका लिखना था। वह जीता रहा, वह लिखता रहा..!

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(रात्रि 11.17 बजे, 29 मई 2019)

( लघुकथासंग्रह  *मोक्ष और अन्य लघुकथाएँ* से )

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

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