हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ सुशांत स्मृति सन्दर्भ – मैं वहां आ रहा …. ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। आज प्रस्तुत है  स्व सुशांत सिंह राजपूत जी की स्मृति में लिखी गई भावप्रवण कविता “ मैं वहां आ रहा …. । युवा पीढ़ी के चर्चित चेहरे ने कल अंतिम सांस ली । कारण कुछ भी रहा हो किन्तु , अंतिम निर्णय कदापि सकारात्मक नहीं था। जब जीवन में इतना संघर्ष किया तो जीवन से संघर्ष में क्यों हार गए ? विनम्र श्रद्धांजलि !)

☆ सुशांत स्मृति सन्दर्भ – मैं वहां आ रहा …. ☆ 

दम घुटता कसी हवाओं से

ज़हरीली फ़िज़ाओं से

एक फंदा सा लहराता

सजीली लताओं से

 

मेरे देश में प्यार

कम हो रहा

हर दिल में

ग़म रो रहा

 

तू कहाँ है माँ

कुच रुचता नहीं

चले जा रहे सब

कोई रुकता नहीं

 

मुझसे रहा जाता नहीं

मैं कहाँ जा रहा

मुझसे सहा जाता नहीं

मैं वहाँ आ रहा

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ स्व सुशांत स्मृति सन्दर्भ  – कुछ तो किया करो ☆ श्री दिवयांशु शेखर

श्री दिव्यांशु शेखर 

(युवा साहित्यकार श्री दिव्यांशु शेखर जी ने बिहार के सुपौल में अपनी प्रारम्भिक शिक्षा पूर्ण की।  आप  मैकेनिकल इंजीनियरिंग में स्नातक हैं। जब आप ग्यारहवीं कक्षा में थे, तब से  ही आपने साहित्य सृजन प्रारम्भ कर दिया था। आपका प्रथम काव्य संग्रह “जिंदगी – एक चलचित्र” मई 2017 में प्रकाशित हुआ एवं प्रथम अङ्ग्रेज़ी उपन्यास  “Too Close – Too Far” दिसंबर 2018 में प्रकाशित हुआ। ये पुस्तकें सभी प्रमुख ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर उपलब्ध हैं। आज प्रस्तुत है  स्व सुशांत सिंह राजपूत जी की स्मृति में लिखी गई भावप्रवण कविता “ स्व सुशांत स्मृति सन्दर्भ  – कुछ तो किया करो ”। युवा पीढ़ी के चर्चित चेहरे ने कल अंतिम सांस ली । कारण कुछ भी रहा हो किन्तु , अंतिम निर्णय कदापि सकारात्मक नहीं था। जब जीवन में इतना संघर्ष किया तो जीवन से संघर्ष में क्यों हार गए ? विनम्र श्रद्धांजलि !)

☆ स्व सुशांत स्मृति सन्दर्भ  – कुछ तो किया करो से 

कुछ सुन लिया करो, कुछ बोल लिया करो,

कभी दिल के बंद फाटक को खोल लिया करो,

 

लोग क्या सोचेंगें इस बेकार सी सोच में,

अपनी अनमोल ज़िन्दगी को यूँ ही ना तोल लिया करो।

 

अलग दिखने और दिखाने कि चाहत में,

ज़िन्दगी में बेवज़ह ज़हर ना घोल लिया करो,

 

तुम्हारे ना होने से कुछ रुकेगा नहीं, लेकिन तुम्हारी जगह कोई ले भी नहीं सकता,

बहुत ख़ास है तुम्हारी ज़िन्दगी कुछ ख़ास लोगों के लिये, अतः खुद से दुश्मनी ना मोल लिया करो।

 

तुम जो ये पढ़ रहे हो ना, हाँ! तुम ही, ख्याल रखना और विश्वासपात्र बनना,

अपना अगर कोई दुःख में हो, तो ना आमंत्रण का इंतज़ार और ना ही मखौल किया करो,

 

जब सुनाने आये कोई राज़ दिल का, तो दिल से सुनना और प्रयास करना,

कुछ दर्द है उसके मुस्कान में, कभी उसके ना बोलने पर भी उसे टटोल लिया करो।

 

©  दिव्यांशु  शेखर

कोलकाता

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 52 ☆ परसाई जी के जीवन का अन्तिम इन्टरव्यू – – व्यंग्य का सौदागर ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  उनके द्वारा स्व हरिशंकर परसाईं जी के जीवन के अंतिम इंटरव्यू का अंश।  श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी ने  27 वर्ष पूर्व स्व  परसाईं जी का एक लम्बा साक्षात्कार लिया था। यह साक्षात्कार उनके जीवन का अंतिम साक्षात्कार मन जाता है। आप प्रत्येक सोमवार ई-अभिव्यिक्ति में श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के सौजन्य से उस लम्बे साक्षात्कार के अंशों को आत्मसात कर सकेंगे।) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 52

☆ परसाई जी के जीवन का अन्तिम इन्टरव्यू – – – – – व्यंग्य का सौदागर  ☆ 

जय प्रकाश पाण्डेय–

बहुत पहले आपने कहीं कहा था कि ” मैं व्यंग्य का सौदागर हूं”  यह बात आपने किस संदर्भ में एवं किस आशय से कही थी ?
हरिशंकर परसाई-
यह निर्विवाद था, मैंने सरकारी नौकरी छोड़ी और पूरी तरह से अपना समय लेखन को दिया और स्वतंत्र लेखक हो गया।मेरी जीविका लेखन से चलती थी, मैं लिखता रहा हूं व्यंग्य।तब तो और भी लिखता था इसलिए मैंने कहा कि व्यंग्य जो है मेरा रोज़गार है।
जय प्रकाश पाण्डेय –
अनेक महत्वपूर्ण आलोचकों के मतानुसार व्यंग्य किसी भी भाषा, समाज या समय के श्रेष्ठ लेखन का अनिवार्य गुण है जबकि एक वर्ग ऐसे लोगों का भी है जिनका मानना है कि चूंकि व्यंग्य लेखन में जीवन की संपूर्णता में चित्रित करने की क्षमता नहीं होती अत: श्रेष्ठतम व्यंग्य लेखन भी महान साहित्य की श्रेणी में परिगणित नहीं हो सकता। इस संबंध में आप क्या कहना चाहेंगे ?
हरिशंकर परसाई –
सम्पूर्ण जीवन से क्या अर्थ है, सम्पूर्ण सामाजिक जीवन तो किसी महाकाव्य या किसी एक उपन्यास तक में भी नहीं आ सकता है। कई उपन्यास हों तो शायद आ भी जावे या भी पूरा न आ पाये। जीवनी उपन्यास हो तो किसी एक व्यक्ति के जीवन, नायक के जीवन का सम्पूर्ण चित्र आ जाता है। मैंने जो व्यंग्य लिखे हैं सिलसिलेवार नहीं, खण्ड खण्ड लिखा है, निबंध, कहानी, लघु उपन्यास, कालम इत्यादि और इन सब में समाज का एक तरह से सर्वेक्षण हो गया है, एक पूरे समाज का सर्वेक्षण कर लेना भी मेरा ख्याल है कि उस समाज को एक टोटलिटी में संपूर्णता से व्यंग्य के द्वारा चित्रित करना ही है, जैसे रवीन्द्रनाथ ने कोई महाकाव्य नहीं लिखा लेकिन उनकी फुटकर कविताओं में लगभग वह सभी आ गया जो किसी एक महाकाव्य में आता है, ऐसा मेरा ख्याल है और ऐसा ही मेरे लेखन में है। तो ये दावा तो नहीं कर सकता, दास्ताएवस्की कर सकते हैं न बालजाक कर सकते हैं कि उनकी रचना में संपूर्ण जीवन आ गया है पर बहुत अधिक अंशों तक आ गया है। ये हम मान लेते हैं। मैंने सम्पूर्ण जीवन में लिखने के लिए कोई उपन्यास दो-चार – छह नहीं लिखे। मैंने खण्ड – खण्ड में जीवन को जहां जैसा देखा, उसको वैसा चित्रित किया,उस पर वैसा व्यंग्य किया। अब कालम के द्वारा समसामयिक घटनाओं पर वैसा कर रहा हूं। इस प्रकार समाज का पूरा सर्वेक्षण मेरे लेखन में आ जाता है, लेकिन मैं ये दावा नहीं कर सकता हूं कि जीवन की सम्पूर्णता या सामाजिक जीवन की सम्पूर्णता मेरे लेखन में आ गई है, वो नहीं आई है, और इतना पर्याप्त नहीं है।

……………………………..क्रमशः….

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेष कुशल # 7 ☆ सजन रे झूठ ही बोलो” ☆ श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन 

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक  व्यंग्य “सजन रे झूठ ही बोलो”।  इस  साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से हम आपसे उनके सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य साझा करने का प्रयास करते रहते हैं । श्री शांतिलाल जैन जी के व्यंग्य में वर्णित सारी घटनाएं और सभी पात्र काल्पनिक होते हैं ।यदि किसी व्यक्ति से इसकी समानता होती है, तो उसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा। हमारा विनम्र अनुरोध है कि श्री शांतिलाल जैन जी के प्रत्येक व्यंग्य  को हिंदी साहित्य की व्यंग्य विधा की गंभीरता  को समझते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल # 7 ☆

☆ सजन रे झूठ ही बोलो”

‘सजन रे झूठ मत बोलो…..वहाँ पैदल ही जाना है.’

अपन तो इससे असहमत हैं.

सजन झूठ क्यों नहीं बोले, बताईये भला ? सजन राजनीति में है. झूठ बोले बिना वहाँ उसका काम चल पाया है कभी. कुर्सी, पद, पोजीशन, पॉवर उसका एक मात्र ख़ुदा है और पैदल चलकर तो उस तक पहुँचा नहीं जा सकता ना. गीतकार ने बिना कुछ देखे ही लिख दिया – न हाथी है न घोड़ा है. श्रीमान ज़रा आकर देखिये तो, हाथी घोड़े अब उसकी रैलियों में निकलते हैं. पैदल तो वो तब था जब उसने राजनीति में अपना पहला कदम रखा था. उधार की बाईक पर झूठ का सहारा लेकर चढ़ा, फिर एम्बेसेडर, मारुती एट-हंड्रेड से बोलेरो और वातानुकूलित रेल से होता हुआ, चार्टर्ड प्लेन से वो तो अपने ख़ुदा तक कब का पहुँच चुका, और आप हैं कि गाना गाते ही रह गये. जो उसने 1966 में शैलेन्द्र के लिखे इस गीत पर भरोसा किया होता तो या तो गुलफाम की तरह मारा गया होता या अभी भी हीरामन की तरह कहीं बैलगाड़ी हांक रहा होता. इसीलिये वो गीतों, कविताओं, रचनाओं, बुद्धिजीवियों के झांसे में नहीं पड़ता. अलबत्ता, उन कलाकारों को जरूर साधकर रखता है जो उसके झूठ को भी सच बना कर गानों के एल्बम जारी कर सकें.

झूठ भी कितने मासूम!! रोजगार बढ़ायेगा. महंगाई कम करेगा. सबको बिजली, पानी, सड़क मिलेगी. सबके लिये सुलभ शिक्षा, स्वास्थ्य और लोक परिवहन. भ्रष्टाचार ढूंढे नहीं मिलेगा. मिनिमम गवर्नमेंट, मेक्सीमम गवर्नेंस की गारंटी. जितने मासूम झूठ हैं उससे ज्यादा मासूम उस पर भरोसा करने वाले. वो विकास का चाँद लाकर सजनिया के जूड़े में सजाने का वादा करता है. इन झूठों पर पैदल उसे नहीं जाना पड़ता, जो यकीन करते हैं – पैदल तो उनको जाना पड़ता है. वो जितनी नफ़ासत से झूठ बोलता है, ‘वी सपोर्ट अवर सजन’ उसके लिये उतना ही अधिक ट्रेंड करता है. गौर से देखिये श्रीमान, ‘सत्य के प्रयोग’ जैसी आत्मकथा के लेखक की समाधि पर, हाथों में श्रद्धा के पुष्प लेकर, वो परिक्रमा लगा रहा है. इस मासूमियत पर कौन ना मर जाये, या ख़ुदा !

सर्फ़ एक्सेल में दाग और राजनीति में झूठ अच्छे हैं. दोनों मुनाफ़ा दिलाते हैं. वो एक झूठा नारा सा गढ़ता है और करोड़ों सजनियाँ उसकी छाप का बटन दबा कर उसे उसके ख़ुदा तक पहुंचा देती हैं. वो मुफलिस सजनियों से सपोर्ट पाता है, रईसों की दौलत में इज़ाफा करने वाली पॉलिसी बनाता है. सजनियों को पता होता है कि वे छली जा रहीं हैं, मगर तब भी अभिभूत रहती हैं.  ‘सजनवा बैरी हो गये हमार’. अब बैरी हो गये हैं तो क्या सपोर्ट करना बंद दें ? कभी कभी कांस्टीट्यूएन्सी में वे गाती हुई निकल पड़ती हैं – साजन साजन पुकारूँ गलियों में. मगर क्या करें, सजन बेवफ़ा बिजी है भोपाल, जयपुर, लखनऊ, पटना या दिल्ली में. पाँच साल बाद ही आ सकेंगे. वहाँ भी वे अकेले नहीं हैं. उनके साथ झूठे खबरची हैं, झूठी ख़बरें हैं, झूठे वीडियो हैं, डॉक्टर्ड फोटो हैं, मनगढ़ंत कहानियाँ हैं, झूठ का एक पूरा सेल है, झूठे हलफ़नामे हैं, घुमावदार बयान हैं, झांसेदार आंकड़े हैं, झूठ की आकाशगंगा में विचरते बेहया सितारे हैं.

वैसे इतना आसान भी नहीं है झूठ बोल पाना. कलर चेंज करना पड़ता है, झूठ सफ़ेद कर लिया जाये तो गले उतारने में आसानी रहती है. ये ऐरे-खैरों के बस का काम नहीं है. प्रजातंत्र के मंदिर के फ्लोर पर मेज ठोक-ठोक के बोलना पड़ता है. ली हुई शपथ भूलनी पड़ती है तब जाकर हिम्मत जुटा पता है बेवफा सजन.

बहरहाल, अब कब वापस आ रहे हैं सजन ? बताया ना अभी, पांच साल बाद, कुछ नये नारे, लुभावने जुमले, मीठे झूठ, फ़रेबी वादों के साथ आपका वोट चुराने आयेंगे वे. डेमोक्रेसी इतनी आसाँ नहीं है श्रीमान, इक झूठ का दरिया है. जो जितने गहरे में डूबा वो उतना ही शीर्ष पर पहुंचा है. तो झूठ क्यों नहीं बोले, बताईये भला ?

© शांतिलाल जैन 

F-13, आइवरी ब्लॉक, प्लेटिनम पार्क, माता मंदिर के पास, टी टी नगर, भोपाल. 462003.

मोबाइल: 9425019837

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हिन्दी साहित्य- लघुकथा ☆ सफेद भेड़ें काली भेड़ें ☆ डॉ. कुंवर प्रेमिल

डॉ कुंवर प्रेमिल

(डॉ कुंवर प्रेमिल जी  जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में लगातार लेखन का अनुभव हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। वरिष्ठतम नागरिकों ने उम्र के इस पड़ाव पर आने तक जीवन की कई  सामाजिक समस्याओं /महामारियों से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है,जो कदाचित उनकी रचनाओं में झलकता है। आज प्रस्तुत है  उनकी एक सार्थक लघुकथा  “सफेद भेड़ें काली भेड़ें ”। )

☆ लघुकथा – सफेद भेड़ें काली भेड़ें ☆  

रातों रात सबकी सब भेड़ें काली हो गई . जहां भी जातीं वही प्रतीत होता कि काली अंधारी रात कंबल ओढ़ कर आगे खड़ी है.

एक बूढ़ी भेड़ से रहा नहीं गया. उसने एक काली भेड़ को बुलाकर पूछा- “क्यूंरी छोरियों यह क्या गजब हुआ? सफेद झक चांदनी सी तुम सब सफेद भेड़ें रातों रात काली कलूटी बनकर क्यों घूम रही हो भला?”

काली भेड़ बोली- “दादा अम्मां, जब सभी काले धंधो मैं निर्लिप्त हो बाकी बची हुईं को भी समय रहते चेत जाना चाहिए. जितनी वजन दारी होगी, भविष्य मैं उतनी ही चलेगी. सफेद बूढ़ी भेड़  बोली- “तू ठीक कहती है छोरी. मै भी आज सफ़ेद से काली भेड़ बन जाऊँगी. मैं  तो जैसे बिल्कुल अकेले ही पड़ गई थी. हाँ नहीं तो….. ”

आज की तारीख में वह सफेद भेड़ भी अपना रंग -रूप बदलने मेकअप रूम चली गई थी.

© डॉ कुँवर प्रेमिल

एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ निधि की कलम से # 12 ☆ मुस्कुराना ☆ डॉ निधि जैन

डॉ निधि जैन 

डॉ निधि जैन जी  भारती विद्यापीठ,अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पुणे में सहायक प्रोफेसर हैं। आपने शिक्षण को अपना व्यवसाय चुना किन्तु, एक साहित्यकार बनना एक स्वप्न था। आपकी प्रथम पुस्तक कुछ लम्हे  आपकी इसी अभिरुचि की एक परिणीति है। आपका परिवार, व्यवसाय (अभियांत्रिक विज्ञान में शिक्षण) और साहित्य के मध्य संयोजन अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता  “मुस्कुराना”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆निधि की कलम से # 12 ☆ 

☆ मुस्कुराना  ☆

 

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना,

ना सोचना किसने दिल दुखाया, सबको माफ कर देना।

 

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना,

हर बाग में फूल और कांटे भी हैं, फूल चुन लेना।

 

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना,

रास्ते आड़े तिरछे और सीधे भी हैं, सीधे चुन लेना।

 

प्यार  में  तकरार में, प्यार को चुन लेना,

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना।

 

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना,

दोस्त अच्छे और बुरे भी हैं, हर सफर में अच्छे चुन लेना।

 

जब कालिमा और रोशनी राह में मिल जाएगी, रोशनी चुन लेना,

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना।

मैं रूठूँ, बात पे अड़ जाऊँ, तुम मना लेना,

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना।

 

मैं चुप हूँ और गम में डूब जाऊँ, तुम चुप्पी तोड़ देना,

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना।

 

बात छोटी हो और दिल पे लगा जाऊँ, तुम हाथ बढ़ा लेना,

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना।

 

जब दरार खाई बन जाये, तो तुम खाई भर देना,

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना।

 

ज़िंदगी यूँ ही कट जाएगी, जब मूँद लू आँखें तो यादों में समेत लेना,

जरा सा मुस्कुरा देना, हर गम को भुला देना।

 

©  डॉ निधि जैन, पुणे

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 4 ☆ माझ्या आईचे गुणवर्णन..☆ कवी राज शास्त्री

कवी राज शास्त्री

(कवी राज शास्त्री जी (महंत कवी मुकुंदराज शास्त्री जी) का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप मराठी साहित्य की आलेख/निबंध एवं कविता विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। मराठी साहित्य, संस्कृत शास्त्री एवं वास्तुशास्त्र में विधिवत शिक्षण प्राप्त करने के उपरांत आप महानुभाव पंथ से विधिवत सन्यास ग्रहण कर आध्यात्मिक एवं समाज सेवा में समर्पित हैं। विगत दिनों आपका मराठी काव्य संग्रह “हे शब्द अंतरीचे” प्रकाशित हुआ है। ई-अभिव्यक्ति इसी शीर्षक से आपकी रचनाओं का साप्ताहिक स्तम्भ आज से प्रारम्भ कर रहा है। आज प्रस्तुत है उनकी भावप्रवण कविता “माझ्या आईचे गुणवर्णन.. ”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हे शब्द अंतरीचे # 4 ☆ 

☆ माझ्या आईचे गुणवर्णन.. ☆

माझ्या आईचे गुणवर्णन

मी कसे ते करावे

शब्दात कसे तोलावे.. ०१

 

माझ्या आईचे गुणवर्णन

शब्दातीत आहे आई

बहुगुणी प्रेमळ माई..०२

 

माझ्या आईचे गुणवर्णन

असह्य वेदना तिला झाल्या

न मी पहिल्या, न अनुभवल्या..०३

 

माझ्या आईचे गुणवर्णन

आई प्रेमाचा निर्झर

आई सौख्याचा सागर..०४

 

माझ्या आईचे गुणवर्णन

कोणते कोणते दाखले द्यावे

ऋणातून कैसे मुक्त व्हावे..०५

 

माझ्या आईचे गुणवर्णन

पवित्र तुळस अंगणातली

मंदिरात समई तेवली..०६

 

माझ्या आईचे गुणवर्णन

मजला न करवे आता

देवा नंतर, तीच खरी माता ..०७

 

© कवी म.मुकुंदराज शास्त्री उपाख्य कवी राज शास्त्री.

श्री पंचकृष्ण आश्रम चिंचभुवन,

वर्धा रोड नागपूर,(440005)

मोबाईल ~9405403117, ~8390345500

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मराठी साहित्य – कविता ☆ — कामवाली — ☆ सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। कई पुरस्कारों/अलंकारों से पुरस्कृत/अलंकृत सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी का जीवन परिचय उनके ही शब्दों में – “नियतकालिके, मासिके यामध्ये कथा, ललित, कविता, बालसाहित्य  प्रकाशित. आकाशवाणीमध्ये कथाकथन, नभोनाट्ये , बालनाट्ये सादर. मराठी प्रकाशित साहित्य – कथा संग्रह — ५, ललित — ७, कादंबरी – २. बालसाहित्य – कथा संग्रह – १६,  नाटिका – २, कादंबरी – ३, कविता संग्रह – २, अनुवाद- हिंदी चार पुस्तकांचे मराठी अनुवाद. पुरस्कार/सन्मान – राज्यपुरस्कारासह एकूण अकरा पुरस्कार.)

आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता —–कामवाली —– . हम भविष्य में भी आपकी सुन्दर रचनाओं की अपेक्षा करते हैं।

☆ —–कामवाली —– ☆

 

कामवाली आहे मी, कडाडती  वीज आहे  !

घर मालकिणीनो,एक गार्हानं गानार आहे !!

 

आमच्यामुळे नोकरी तुमची,

तीस,चाळीस हजारांची

त्यातले तीन चार मला दिलेत

तरच मी टिकनार आहे. एक गार्हान  —

 

सिक सांगून ‘लीव्ह ‘काढता

घरातूनच ‘शी एल ‘कळवता

मी जवा खरीच  फनफनते

पगारी  खाडा करनारच आहे. एक  गार्हान  —-

 

ग्यास, दूध,पेट्रोल वाढल

तुम्हाला गाडी परवडेना ?

आमाला सादी  कापडं चोपडं

चटनी भाकरी बी मिळना.

म्हागाईचा  कहर आहे एक गार्हान—

 

तुमचा फंड बिंड, पेन्शन,

आमाला हलकं राशन

ते आनायला बी पैसा नाही.

बचत? छे! उरतच नाही.

उधार, उचल मागनारच आहे. एक गार्हान–

 

ज्याला, त्याला मानसं लाऊन

तुमचा संसार नीटनेटका

पोराना म्हागड शिक्षन

फारेनचा  खोर्याने पैका.

माजबी पोरग साळत जातय

त्याला मी इंजिनिअर करनार आहे

फाटक्याला ठिगळ लावनार आहे।

म्हनूनच  ह्ये गार्हान गाते आहे.।।।

 

© मीनाक्षी सरदेसाई

‘अनुबंध’, कृष्णा हास्पिटलजवळ, पत्रकार नगर, सांगली.४१६४१६.

मोबाईल  नंबर   9561582372, 8806955070

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (29) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

 

प्रकृत्यैव च कर्माणि क्रियमाणानि सर्वशः ।

यः पश्यति तथात्मानमकर्तारं स पश्यति ॥

 

प्रकृति ही करती सदा ,काम सभी सम्पन्न

जो न ऐसा देखता , वह है बुद्धि विपन्न।।29।।

 

भावार्थ :  और जो पुरुष सम्पूर्ण कर्मों को सब प्रकार से प्रकृति द्वारा ही किए जाते हुए देखता है और आत्मा को अकर्ता देखता है, वही यथार्थ देखता है॥29॥

 

He sees, who sees that all actions are performed by Nature alone and that the Self is actionless.

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 54 ☆ व्यंग्य – हमारी आँख की कंकरी- भेड़ाघाट ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

(आपसे यह  साझा करते हुए हमें अत्यंत प्रसन्नता है कि  वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे  आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं। आज  प्रस्तुत है  एक बेहतरीन व्यंग्य  ‘हमारी आँख की कंकरी- भेड़ाघाट’। यह  व्यंग्य विनम्रतापूर्वक  उन सब की  ओर से है जो दर्शनीय स्थल वाले शहरों में रहते हैं। अब इसे लिख दिया तो लिख दिया – ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आये। ऐसे अतिसुन्दर व्यंग्य के लिए डॉ परिहार जी की  लेखनी को  सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 54 ☆

☆ व्यंग्य – हमारी आँख की कंकरी- भेड़ाघाट ☆

शुरू शुरू में भेड़ाघाट देखा तो तबियत बाग-बाग हो गयी। बड़ा रमणीक स्थान लगा। दो चार बार और देखा। फिर हुआ यह कि हमारी शादी हो गयी और हम जबलपुर में सद्गृहस्थ के रूप में स्थापित हो गये। फिर जबलपुर के बाहर से हमारे परिचित भेड़ाघाट देखने आने लगे और हमारे पास रुकने लगे। तब हमें महसूस हुआ कि वस्तुतः भेड़ाघाट उतना सुन्दर नहीं है जितना हम समझते थे। भेड़ाघाट के दर्शनार्थियों की संख्या बढ़ने के साथ उसका सौन्दर्य हमारी नज़र में निरन्तर गिरता रहा है। और अब तो यह हाल है कि कभी भेड़ाघाट जाते हैं तो ताज्जुब होता है कि इस ऊबड़खाबड़ जगह में लोगों को भला क्या सौन्दर्य नज़र आता है। मेरे खयाल से यह अनुभूति उन सभी लोगों को होती होगी जो दर्शनीय स्थानों में रहते हैं।

घर में जब कोई अतिथि आते हैं तो नाश्ते के बाद वे मुँह पोंछकर पूछते हैं, ‘हाँ भाई, जबलपुर में कौन कौन सी दर्शनीय जगहें हैं?’और मेरा कलेजा नीचे को सरक जाता है। यह भेड़ाघाट इतना प्रसिद्ध हो चुका है कि अगर मैं दाँत निकालकर कहूँ, ‘अरे भाई, जबलपुर में दर्शनीय स्थल कहाँ?’ तो पक्का लबाड़िया साबित हो जाऊँगा।

और फिर मुहल्ले के कुछ महानुभाव मेरी  चलने भी कहाँ देते हैं। मुहल्ले के दुबे जी, पांडे जी या चौबे जी मेरे अतिथि को सड़क पर रोक कर परिचय प्राप्त करते हैं। फिर कहते हैं, ‘यहाँ तक आये हैं तो भेड़ाघाट ज़रूर देखिएगा, नहीं तो घर जाकर क्या बतलाइएगा?’ मेरा मन होता है कि पांडे जी से कहूँ कि महाराज,वे घर जाकर जो कुछ भी बतायें, लेकिन मैं उनके जाने के बाद आपको ज़रूर कुछ बताऊँगा। और मैंने कई बार ऐसे उत्साही लोगों की खबर भी ली है, लेकिन सवाल यह है कि संसार में किस किस मुँह पर ढक्कन लगाऊँ?

मैं कई लोगों को भेड़ाघाट के प्रभाव के विरुद्ध संघर्ष करते और हारते देखता हूँ। एक मित्र के घर पहुँचता हूँ तो वहाँ अतिथि देवता विराजमान हैं। स्वल्पाहार के बाद वे मित्र से पूछते हैं, ‘हाँ,तो आज दिन का क्या प्रोग्राम है?’ मित्र महोदय दाँत भींचकर उत्तर देते हैं, ‘आज तो भोजन के बाद छः घंटे निद्रा ली जाए। ‘ अतिथि देव सिर हिलाकर हँसते हैं, कहते हैं, ‘उड़ो मत। मैं भेड़ाघाट देखे बिना नहीं मानूँगा। ‘ मित्र भी हँसता है, लेकिन उसकी हँसी देखकर मुझे रोना आता है।

भेड़ाघाट ने जबलपुर वालों की खटिया वैसे ही खड़ी कर रखी है जैसे ताजमहल ने आगरा वालों की खाट खड़ी कर रखी है। नगर निगम वालों ने हमारी मुसीबत लंबी करने के लिए भेड़ाघाट में नौका-विहार की व्यवस्था कर दी है। उस दिन राय साहब रोने लगे। बोले, ‘भैया, कल मेहमानों को भेड़ाघाट ले गया था। डेढ़ हजार रुपया समझो नर्मदा जी में डूब गया। अब खजुराहो देखने की जिद कर रहे हैं। बहकाने की कोशिश कर रहा हूँ, लेकिन सफलता की आशा कम है। ‘ उन्होंने ऐसी निश्वास छोड़ी कि मेरी कमीज़ थरथरा गयी।

अब पछताता हूँ कि कहाँ दर्शनीय स्थल वाली नगरी में फँस गया। मैं तो भारत सरकार से गुज़ारिश करना चाहता हूँ कि भेड़ाघाट को कहीं दिल्ली के पास स्थानांतरित कर दिया जाए ताकि जबलपुर वालों का यह ‘तीरे नीमकश’ निकल जाए  और शहर को राहत का अहसास हो। हम सरकार बहादुर के बेहद मशकूर होंगे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

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