हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ पर्यावरण दिवस विशेष – पर्यावरण दिवस की दस्तक ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

प्रिय मित्रों,

श्री संजय भारद्वाज जी के नुक्कड़ नाटक जल है तो कल है  की श्रृंखलाबद्ध कड़ियों की अगली कड़ी का प्रकाशन कल से यथावत जारी रहेगा। पर्यावरण दिवस की महत्ता को देखते हुए इस लघु आलेख को आपसे साझा न कर पाना कदाचित अपने आप में अन्याय होगा।  

☆ संजय दृष्टि  ☆ पर्यावरण दिवस की दस्तक ☆

(मित्रो!  पर्यावरण दिवस 5 जून 2020 के अवसर पर अपना एक  लघु आलेख साझा कर रहा हूँ। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित इस आलेख को आप सबका भरपूर नेह मिला है।)

लौटती यात्रा पर हूँ। वैसे ये भी भ्रम है, यात्रा लौटती कहाँ है? लौटता है आदमी..और आदमी भी लौट पाता है क्या, ज्यों का त्यों, वैसे का वैसा! खैर सुबह जिस दिशा में यात्रा की थी, अब यू टर्न लेकर वहाँ से घर की ओर चल पड़ा हूँ। देख रहा हूँ रेल की पटरियों और महामार्ग के समानांतर खड़े खेत, खेतों को पाटकर बनाई गई माटी की सड़कें। इन सड़कों पर मुंबई और पुणे जैसे महानगरों और कतिपय मध्यम नगरों से इंवेस्टमेंट के लिए ‘आउटर’ में जगह तलाशते लोग निजी और किराये के वाहनों में घूम रहे हैं। ‘धरती के एजेंटों’ की चाँदी है। बुलडोजर और जे.सी.बी की घरघराहट के बीच खड़े हैं आतंकित पेड़। रोजाना अपने साथियों का कत्लेआम खुली आँखों से देखने को अभिशप्त पेड़। सुबह पड़ी हल्की फुहारें भी इनके चेहरे पर किसी प्रकार का कोई स्मित नहीं ला पातीं। सुनते हैं जिन स्थानों पर साँप का मांस खाया जाता है, वहाँ मनुष्य का आभास होते ही साँप भाग खड़ा होता है। पेड़ की विवशता कि भाग नहीं सकता सो खड़ा रहता है, जिन्हें छाँव, फूल-फल, लकड़ियाँ दी, उन्हीं के हाथों कटने के लिए।

मृत्यु की पूर्व सूचना आदमी को जड़ कर देती है। वह कुछ भी करना नहीं चाहता, कर ही नहीं पाता। मनुष्य के विपरीत कटनेवाला पेड़ अंतिम क्षण तक प्राणवायु, छाँव और फल दे रहा होता है। डालियाँ छाँटी या काटी जा रही होती हैं तब भी शेष डालियों पर नवसृजन करने के प्रयास में होता है पेड़।

हमारे पूर्वज पेड़ लगाते थे और धरती में श्रम इन्वेस्ट करते थे। हम पेड़ काटते हैं और धरती को माँ कहने के फरेब के बीच शर्म बेचकर ज़मीन की फरोख्त करते हैं। मुझे तो खरीदार, विक्रेता, मध्यस्थ सभी ‘एजेंट’ ही नज़र आते हैं। धरती को खरीदते-बेचते एजेंट। विकास के नाम पर देश जैसे ‘एजेंट हब’ हो गया है!

मन में विचार उठता है कि मनुष्य का विकास और प्रकृति का विनाश पूरक कैसे हो सकते हैं? प्राणवायु देनेवाले पेड़ों के प्राण हरती ‘शेखचिल्ली वृत्ति’ मनुष्य के बढ़ते बुद्ध्यांक (आई.क्यू) के आँकड़ों को हास्यास्पद सिद्ध कर रही है। धूप से बचाती छाँव का विनाश कर एअरकंडिशन के ज़रिए कार्बन उत्सर्जन को बढ़ावा देकर ओज़ोन लेयर में भी छेद कर चुके आदमी  को देखकर विश्व के पागलखाने एक साथ मिलकर अट्टहास कर रहे हैं। ‘विलेज’ को ‘ग्लोबल विलेज’ का सपना बेचनेवाले ‘प्रोटेक्टिव यूरोप’ की आज की तस्वीर और भारत की अस्सी के दशक तक की तस्वीरें लगभग समान हैं। इन तस्वीरों में पेड़ हैं, खेत हैं, हरियाली है, पानी के स्रोत हैं, गाँव हैं। हमारे पास अब सूखे ताल हैं, निरपनिया तलैया हैं, जल के स्रोतों को पाटकर मौत की नींव पर खड़े भवन हैं, गुमशुदा खेत-हरियाली  हैं, चारे के अभाव में मरते पशु और चारे को पैसे में बदलकर चरते मनुष्य हैं।

माना जाता है कि मनुष्य, प्रकृति की प्रिय संतान है। माँ की आँख में सदा संतान का प्रतिबिम्ब दिखता है। अभागी माँ अब संतान की पुतलियों में अपनी हत्या के दृश्य पाकर हताश है।

और हाँ, पर्यावरण दिवस भी दस्तक दे रहा है। हम सब एक सुर में सरकार, नेता, बिल्डर, अधिकारी, निष्क्रिय नागरिकों को कोसेंगे। कागज़ पर लम्बे, चौड़े भाषण लिखे जाएँगे, टाइप होंगे और उसके प्रिंट लिए जाएँगे। प्रिंट कमांड देते समय स्क्रीन पर भले पर शब्द उभरें-‘ सेव इन्वायरमेंट। प्रिंट दिस ऑनली इफ नेसेसरी,’ हम प्रिंट निकालेंगे ही। संभव होगा तो कुछ लोगों खास तौर पर मीडिया को देने के लिए इसकी अधिक प्रतियाँ निकालेंगे।

कब तक चलेगा हम सबका ये पाखंड? घड़ा लबालब हो चुका है। इससे पहले कि प्रकृति केदारनाथ के ट्रेलर को लार्ज स्केल सिनेमा में बदले, हमें अपने भीतर बसे नेता, बिल्डर, भ्रष्ट अधिकारी तथा निष्क्रिय नागरिक से छुटकारा पाना होगा।

चलिए इस बार पर्यावरण दिवस पर सेमिनार, चर्चा वगैरह के साथ बेलचा, फावड़ा, कुदाल भी उठाएँ, कुछ पेड़ लगाएँ, कुछ पेड़ बचाएँ। जागरूक हों, जागृति करें। यों निरी लिखत-पढ़त और बौद्धिक जुगाली से भी क्या हासिल होगा?

©  संजय भारद्वाज, पुणे

( 30 मई 2017 को  मुंबई से पुणे लौटते हुए लिखी पोस्ट। )

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ बंजारा लोक गीतों का सांस्कृतिक अध्ययन ☆ डॉ प्रतिभा मुदलियार

डॉ प्रतिभा मुदलियार 

(डॉ प्रतिभा मुदलियार जी का अध्यापन के क्षेत्र में 25 वर्षों का अनुभव है । वर्तमान में प्रो एवं अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय। पूर्व में  हांकुक युनिर्वसिटी ऑफ फोरन स्टडिज, साउथ कोरिया में वर्ष 2005 से 2008 तक अतिथि हिंदी प्रोफेसर के रूप में कार्यरत। कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत।  इसके पूर्व कि मुझसे कुछ छूट जाए आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया डॉ प्रतिभा मुदलियार जी की साहित्यिक यात्रा की जानकारी के लिए निम्न लिंक पर क्लिक करें –

जीवन परिचय – डॉ प्रतिभा मुदलियार

आज प्रस्तुत है डॉ प्रतिभा जी का बंजारा लोक गीतों के सांस्कृतिक अध्ययन पर एक शोधपरक आलेख बंजारा लोक गीतों का सांस्कृतिक अध्ययन। यह आलेख आपको बंजारों के लोकगीतों के माध्यम से उनके जन-जीवन के महत्वपूर्ण पहलुओं से भी अवगत कराने का प्रयास करेगा। हम भविष्य में आपसे ऐसे ही सकारात्मक साहित्य कि अपेक्षा करते हैं। इस अतिसुन्दर आलेख के लिए आपकी लेखनी को सादर नमन। )

☆ बंजारा लोक गीतों का सांस्कृतिक अध्ययन ☆

भारत देश में कई सारी लोकसंस्कृतियाँ हैं। लोक संस्कृति को लोग साधारणतया ग्रामीण संस्कृति का पर्याय मानते हैं। जबकि यह उन सभी लोगों की संस्कृति है जो किसी समुदाय का हिस्सा है, जिनकी अपनी कुछ मान्यताएं तथा परंपराएं हैं। बंजारा संस्कृति भी भारत की एक महत्वपूर्ण संस्कृति है और जिसकी अपनी एक भाषा तो है किंतु न तो उसकी अपनी कोई लिपि है और ना ही कोई उसका अपना कोई व्याकरण। फिर भी इनके गीत और कथाएं आज भी मौखिक रूप में जीवित है। इनकी संस्कृति में समय के साथ कुछ बदलाव तो आते रहे हैं किंतु इनके लोकगीतों में कभी ठहराव नहीं आया है। वे किसी नदी की धारा के समान निरंतर प्रवाहमान रहे हैं, जिसमें उसकी अपनी एक सुगंध भी होती है। उनके गीतों से उनकी संस्कृति की छवियाँ साकार होती रही है।

बंजारा वह व्यक्ति है, जो बैलों पर अनाज लादकर बेचने के लिए एक स्थान से दूसरे स्थान जाता है।  इन बंजारों का कोई ठौर ठिकाना नहीं होता ना ही कोई घर द्वार। अपना पूरा जीवन वे यायावार, घुम्मकड्ड बनकर रह जाते हैं। इनका किसी स्थान विशेष से कोई लगाव नहीं होता। सदियों से यह समाज देश के दूर दराज इलाकों में निडर होकर यात्राएँ करता रहता है।

बंजारों का मूल लगभग सभी इतिहासकारों ने राजस्थान को ही माना है।  बंजारा समाज भारत के प्रत्येक प्रांत में अनेक नामों से जाना जाता है, जैसे महाराष्ट्र में बंजारा, कर्नाटक में लमाणी, आंध्र में लंबाडा, पंजाब में बाजीगर, उत्तर प्रदेश में नायक । अनादि काल से यह समाज व्यापार करता रहा था। तब से इस जाति को वाणिज्यकार के नाम से संबोधित किया जाता है। वाणिज्य शब्द को हिंदी में वणज कहा जाता है तथा बनज से ही बनजारा शब्द की व्युत्पत्ति हुई है। बणजारा शब्द मुक्त जीवन के प्रतीक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है, आप को हिंदी गीत की वह  पंक्तियाँ तो याद ही होगी,

ईक बणजारा गाये, जीवन के गीत सुनाये

हम सब जीनेवालों को जीने की राह सिखाए।

कर्नाटक की कई जातियों में बंजारा प्रमुख हैं। रंगीन आकर्षक पहनावे और गहनों से अलंकृत इन बंजारा स्त्री पुरूषों में उनकी संस्कृति प्रतिबिंबित होती है। उत्तर भारत के राजस्थान मूल के ये लोग भारत के कोने कोने में फैले हुए हैं और समूचे भारत में इन्हें बंजारा के नाम से पहचाना जाता है। इनकी विशिष्ट वेशभूषा, भाषा, संस्कृति, रहन सहन आदि में अधिक समानता है।

जिस प्रकार किसी भी शुभ कार्य के प्रारंभ में मंगलाचरण होता है, भगवान से प्रार्थना की जाती है वैसे ही बंजारों में प्रार्थना की जाती है। इसके लिए भी एक गीत है,

ये पणि जे पणि

गंगा पणि सरसती

निरंकार तू हर जे बोलो।

उपर्युक्त प्रार्थना के अनुसार गंगा सरस्वती का परिसर ही बंजारा संस्कृति का मूल बस्ती स्थान है। बंजारा समाज में नारियों को भी ‘हरपळी’ कहा जाता है। ‘हरपळी’ का बंजारा बोली में अर्थ- हडप्पा की रहनेवाली। इस संदर्भ में यह गीत दिखाई देता है।–

मारा हरपळी याडी

मारी हरपळी बाई

मार हरपळ नायकन

बंजारा संस्कृति में ज्यादातर लोग गाय-बैलों का ही व्यापार करते थे। जिस कारण बंजारा समाज को ‘गोर समाज’ भी कहा जाता है। हडप्पा संस्कृति के लोग भी खेती, व्यापार करते थे। इससे स्पष्ट होता है कि, बंजारा जाति यह सिंधु संस्कृति तथा हडप्पा संस्कृति के काल की रही है। सिंधु संस्कृति की बहुत सारी मान्यताएँ बंजारा संस्कृति में दिखाई देती हैं।

एक सर्वे के अनुसार कर्नाटक में बंजारों की जनसंख्या 44,72.000 है और इनको परिशिष्ट जातियों में वर्गीकृत किया गया है। बेलगाँव डिविजन में जिसमें बागलकोट, वेलगाव, विजापुर, धारवाड, गदग, हावेरी और उत्तर कन्नड इलाको में इनकी संख्या रगभग 14 से 15  लाख  तक मानी गयी है। इनकी बस्तियाँ शहर से दूर होने के कारण शिक्षा, बिजली, सडक, जल आदि सुविधाएं इन तक  बहुत कम पहुँचती हैं। ये लोग अपने अपने तांडों में रहने के कारण भी इन्होंने अपनी भाषा और संस्कृति  को सुरक्षित रखा है।  ये लोग अपनी भाषा को गोरबोली, बंजाराभाषा या लमाणी भाषा कहते हैं।  कर्नाटक में इनकी भाषा पर मराठी और कन्नड का प्रभाव विशेष रूप से दिखाई देता है।  इस भाषा की अपनी कोई लिपि तो नहीं है। किंतु देवनागरी लिपि का प्रयोग आज उनके साहित्य के लिखित रूप के लिए किया जा रहा है।

इनका साहित्य विशाल और वैविध्यपूर्ण है। बंजारा लोगों को कर्नाटक में लम्बानि या लमाणि के नाम से जाना जाता है। इनके कबिलों को तांडा कहा जाता है। ये स्वयं को राजपुतों के वंशज मानते हैं और हिंदु धर्म का ही परिपालन करते हैं। अतः विशिष्ट अनुष्ठानों, तीज, त्योहारों में इनकी जुँबा पर अपने आप कुछ विशेष गीत आने लगते हैं। इनमें जन्म से लेकर मृत्यु तक विभिन्न अवसरों पर गीत गाए जाते हैं।  इनको संस्कार गीत कहा जाता है। ये उनके जीवन का अभिन्न अंग है। ये गीत लिपिबद्ध नहीं है। इनमें जो गीत गाए जाते हैं उनके कुछ विशिष्ट नाम भी हैं जैसे एकळपोयेर या वदाओं ( पुत्र जन्म से संबंधित), वळंग (मुंडन के समय का गीत), धुंड गीत ( होली के समय सुखमय जीवन की कामना का गीत), इसके अलावा देवी देवताओं से मिन्नत मांगने के लिए भी गीत गाए जाते हैं, इनमें तुलजा भवानी. सीतलामाता  प्रमुख हैं। विवाह के समय मंगलगीत, प्रेमगीत, छेडछाड गीत, ढावलों तथा हवेली आदि गीत भी गाए जाते हैं।  दूसरी  ओर कटाई, बुआई करते समय, चक्की पीसते समय आदि विभिन्न अवसरों पर भी गीत गाए जाते हैं।

इनके गीतों में मुग्धता, भोलापन, मादकता, मधुरता तो है ही साथ ही जीवन के प्रति आस्था भी है।  लय, ताल इनके गीतों की विशेषता है। ये गीत मौखिक होने के कारण इनका लिखित रूप नहीं मिलता और पीढि दर पीढि एक मूँह से दूसरे मूँह तक पहुँचते समय इनमें काफी परिवर्तन भी हो जाता है। इनके गीतों में व्याकरण का ध्यान नहीं रखा जाता।  इन गीतों का किसी व्यक्ति के नाम से गीत का कोई पेटेंट नहीं होता। लोग बस यह मौखिक परंपरा बनाए रखते हैं। बंजारों के गीत लिखित रूप में संकलित नहीं है। वह संगोष्ठियों, शोध कार्य आदि के कारण कुछ संकलित रूप में हमारे सामने आ रहे हैं। इन गीतों के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग कर लिखित रूप दिया जाता है। महाराष्ट्र में मराठी के प्रभाव से हिंदी प्रदेश में हिंदी के प्रभाव से यह संकलित किए जा रहे हैं। इसलिए यह अल्पज्ञात है जिसे लिखित रूप में सामने लाया जा रहा है।

बंजारा लोक साहित्य में लोकगीत शीर्ष पर हैं। सर्वप्रिय भी है। इन लोकगीतों में एकजीवन पद्धति है, संस्कार है, संस्कृति है और जीवन दर्शन भी है। इन लोकगीतों में तीज-त्योहार, जन्म मृत्यु, सुख-दुख, प्रकृति- परिश्रम, नीति-भक्ति आदि से संबंधित भाव विचार मिलते हैं। इन गीतों में अभिव्यक्त संस्कृति का अध्ययन यहाँ प्रस्तुत है।

संस्कार गीत बंजारों में विशेष महत्व के हैं। जन्म, नामकरण, मुंडन, विवाह और मृत्यु आदि से संबंधित संस्कार बंजारा समुदाय में परंपरागत रूप से आचरण में लाए जाते हैं और ऐसे समय कुछ संस्कार गीत भी गाए जाते हैं। इनमें एक जो महत्वपूर्ण गीत है जिसे एकळपोयु गीद कहा जाता है। यह गीत पुत्रजन्म के अवसर पर गाया जाता है। बंजारों के परिवार में पुत्र का जन्म किसी उत्सव से कम नहीं होता है। इस पुत्र को सेवाभाया कहा जाता है। पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं,

‘सेवाभाया जलमों येघर दूयों वजाळो/ भगवान जलमों येघर हूयो वजाळो।

याडि बापूरि आसिस ये बेटा जलमों ये/ देवू, धरमूरि आसिस ये बेटा जलमो ये।

आचि आचि घडी ये सूरज्या जलमों ये/ छटीमातार आसिस ये याडी घडी ये।

चांदा सूरजोरी उमर ये बेटान आसिस ये। माँ-बापेरि रे छडिवेन रिसतू/

सेवाभायार आसिस तोनरे बेटा/ भगवानेर आसिस तोनरे बेटा’।[1]

यह एक प्रकार का प्रार्थना गीत है जिससे बच्चे को भगवान का आशीर्वाद प्राप्त हो सकें। इस गीत में  बच्चा बडा होकर अपने माता पिता तथा समाज के रक्षक बनने की प्रार्थना की जाती है। इसमें आनेवाले प्रतीक, रूपक तथा लय आदि अर्थपूर्ण होते हैं। इन गीतों के माध्यम से बंजारों का अभिव्यक्ति सौंदर्य तथा उनकी कल्पनाशीलता को देखा जा सकता है। पुत्र जन्म पर होनेवाली खुशी इतनी है कि उनको लगता है जैसे सारा घर सूर्य के प्रकाश से भर गया है। इस गीत में वजाळो, बापूरि, आचि आचि घडी,  आसिस ये शब्द हिंदी और मराठी से प्रभावित है। उजालो – वजाळो, अच्छि- आचि, घडी- क्षण, आसिस- आशिष।

उनका एक अन्य गीत ‘दळना धोकायेरो’ कहलाता है। जिसमें बंजारा लोग जन्म के बाद ‘छठी मता’ की आराधना करते हैं। उसके बाद बच्चे को पालने में डालने की रस्म की जाती है जिसे ‘छोरान तोटलाम घोलेरो’ का कहा जाता है। इस गीत की कुछ पंक्तियाँ द्रष्टव्य है

वेमाता हासती हासती आयेस।/ रोती रोती जायेस।।

लेपो, लावण लेन पर जायेस। /सुवो सुतळी लेन आयेस।।

वेमाता हालन फूलन रकाडेस / सण ढेरो लेन आयेस

वेमाता सुई दोरा लेन पर जा लेन जायेस / सण सुतळी सुवो लेन आयेस।

इस गीत में स्त्री वेमाता अर्थात प्रसुता से हंसते हँसते घर आने को तथा रोते रोते जाने को कह रही है। इस गीत में लेपो -लावण तथा सुई-धागा शब्दों का प्रयोग बहुत ही उल्लेखनीय है। लेपो लावण बंजारा स्त्रियों के लहंगे  को कहते हैं। सुई धागा लमाणी महिलाओं के जीवन से जुडा अहम हिस्सा है।  इस गीत की यह पंक्तियाँ कि हँसते आना और रोते जाना भी विशेष उल्लेखनीय है जिसका अर्थ है यदि लडकी का जन्म हो तो तुम यहाँ से रोते जाना और पुत्र का जन्म हो तो हँसते आना। ‘बंजारों में भी बेटी का जन्म भी संभवतः बोझ माना जाता रहा होगा जैसा की अन्य समुदायों में भी है’।[2] कारण बेटी के जन्म पर पिता को उसकी शादी ब्याह की चिंता रहती है।

‘छोरोम धुंडेरो’ नामक एक और रस्म है जिसमें बच्चे का नामकरण किया जाता है। ‘बाळलट्टा काढेरो’ नामक संस्कार मुंडन संस्कार है।

विवाह संस्कार में प्रत्येक अवसर पर इनके यहाँ गीत है। जिसमें सगाई से लेकर विवाह संपन्न होने तक के विविघ विधि विधान हैं, जिसपर उनके गीत हैं और इन गीतों में उनकी संस्कृति भी झलकती है। इन गीतों में उनके भाव भी है और पारंपरिक नृत्य भी। इनके विदाई के अवसर पर जो गीत गाए जाते हैं उसमें दुल्हन के मनोभाव अभिव्यक्त होते हैं। वह अपने माता, पिता, भाई, सखियाँ तथा तांडा के नायकों से संबोधित करते हुए अपने मन के भाव व्यक्त करती है और पराए घर जाने का दुख व्यक्त करती है। कितुं इस गीत की जो सबसे बडी सांस्कृतिक विशेषता यह  है कि दुल्हन हवेली से, गाय, बैल, बकरी से संबोधित करती है और उनसे बिछुडन का दर्द उसके गीतों में झलकता है, द्रष्टव्य है,

हवेली ये आँ हियाँ..

तोती छुटो धोळो घन/ मोतो छुटो मारे जे

बापुरो बंगला आँ हियाँ…

वेसु  तो सो कांसेरी वाळ न लाग

काडी काडी कर सासी  ये माया जोडी

xxx

ये हवेली ये आँ हियाँ…

दूध,घी ये रो कालवा चलायेस

अन धनेरी कमी नवेस पाणी पावसेरी

कमी न वेस

ये हवेली ये आँ हियाँ…

गुरु र आसिस देस ये

ये हवेली आँ हियाँ

यह एक बहुत ही लंबा गीत है। किंतु इसमें मैंने उन्हीं पंक्तियों को लिया है जिसमें मुझे बंजारा संस्कृति की कुछ भिन्न विशेषता नज़र आयी।  दुल्हन अपनी विदाई के समय हवेली के प्रति हित की कामना करती है कि यहाँ जिस नगर में मेरे पिता की हवेली है वहाँ दूध घी की नदियाँ बहे, वहाँ अन्न. धन और पानी की  कभी कमी ना आए और इन पर गुरु का आशिष बना रहें। इसमें ‘पानी की कमी कभी ना हो’ इसमें जो विशिष्ट गर्भितार्थ है। बंजारो का निवास स्थान प्रमुखता से राजस्थान है, जो रगिस्तानी इलाका है। जहाँ पानी की कमी होती है। रेगिस्तान में बदरी का घिर आना और पानी का गिरना आहोभाग्य होता है। दुल्हन की चाहत है कि उसके पिता की नगरी में कभी पानी की कमी ना हो।

मनुष्य जीवन का अंतिम पडाव मृत्यु इस अवसर पर भी एक गीत उपलब्ध हैं। यह गीत शोक गीत है।  किंतु इनमें एक जो उल्लेखनीय है वह यह कि तांडा के नायक अंतिम संबोधिन, वह कहता है,

सामळो भाईयो

गोरमाटी मा एत कावत छ

जिवतेन बाटी

मूयेन माटी

इ जग रूढी छ करन म

रोवामत सासो करोमत

करन केरोचू भाईयों।। [3]

तांडा नायक सभी को संबोधित कर कहता है कि हम सब जानते हैं कि बंजारों में एक कहावत है कि जीवित को बाटी  (रोटी) मृतक को मिट्टी। यह तो संसार का दस्तुर ही है, इसलिए रोना नहीं है।

बंजारों में जीवन के विभिन्न अवसरों पर किए जानेवाले विधिविधानों के अवसरों पर जो गीत गाए जाते हैं उनसे एक बात निश्चित रूप से ज्ञात होती है कि  इन गीतों में  जहाँ खुशी है, उपदेश है वहीं शोक  भी है। वहीं दूसरी ओर कलात्मकता की दृष्टि से इन गीतों में ताल और लय के साथ गीतात्मकता है।  पहाडी नदी सा उबड खाबडपन है किंतु उसका अपना प्राकृतिक सौंदर्य भी है जो अपनी सहजता से सबको आकर्षित करती है।

संस्कार गीतों के अलावा बंजारों के धार्मिक गीत भी होते हैं।  इन गीतों में प्रार्थना, स्तुति, भजन तथा उपदेशपरक गीतों का समावेश होता है। ये लोग प्रकृति पूजक होने के कारण वे प्रकृति को ही अपना ईश्वर मानते हैं और सर्वप्रथम प्रकृति की स्तुति करते हैं। उसके बाद बंजारा लोग संत सेवालाल, तुळजाभवानी, मरिमाया, जगदंबा आदि के प्रति अपना भक्तिभाव व्यक्त करते हैं।  देवी के प्रति उनकी भक्ति भावना उल्लेखनीय है।  इस संदर्भ में डॉ. वी. सी रामकोटी ने कहा है कि, बंजारा मुख्य रूप से देवी के उपासक हैं। विभिन्न प्रांतों में बसे हुए बंजारें मेराना माडी (देवी) की पूजा करते हैं। कुछ देवियाँ तांडे में पूजी जाती है और कुछ देवियाँ जंगलों में या खेतखलिहानों में पूजी जाती है। ये लोग देवी ( माउली) को व्यक्तिगत रूप से पूजते हैं और सार्वजनिक रूप से भी।[4] इनके धार्मिक लोक गीतों में मानवता, बंधुता, लोक कल्याण, समता आदि को विशेष महत्व दिया गया है। इनकी लोक कल्याण की भावना मुझे अथिक भा गयी, जिसमें वे सेवालाल के प्रति अपने  को समर्पित करते है और सकल जीवों के प्रति ‘सेन साई वेस’ (सबको सुखी रखना) की मंगल कामना करते है। जिसमें जीव जन्तुओं के साथ संपूर्ण मनुष्य जाति का समावेश है। गीत के प्रारंभ में ये लोग तुळजा भवानी से अपनी चूक भूल माफ करने की प्रार्थना करते हैं और सबको सुखी रखने की प्रार्थना करते हैं। अंत में कहते हैं,

जिन्दगीर नैया पार लगायेस

अन ई – पूजा तारे देवळेम मंजूर करलेस याडी।

सा…ई… वेस.. याडी साहेबानी।

बंजारा समाज में तीज त्योहारों के समय भी खूब गीत गाए जाते हैं।  इनके महत्वपूर्ण त्योहार है, दीवाली, दशहरा, होली और गणगौर। दीवाली और होली ये प्रमुख त्योहार है। हिंदुओं की तरह ये भी इन दोनों त्योहारों का उत्साह के साथ मनाते हैं। बंजारे दीवाली को दवाळी या काली अमावस कहते  हैं। इस दिन वे बकरे की बलि देते है। दिवाली होली के संबंध में इनका लोक गीत है,

होळी- दवाळी दोई भनेडी

होळी को मांग छळहाक बोकडो

दवाळी तो मांग झगमग दिवळो

होळी आती ते, गेरियान बेटा गे जाती

दवाळी आती तो बळदान सक दे जाती।

बंजारों  में श्रृगार, देशभक्ति, श्रम  तथा प्रकृतिपरक अन्य गीत भी हैं।  जिसमें शब्द  का स्वाभाविक सौदर्य है। गीतात्मकता के साथ भाव सौंदर्य भी है।

इन सारे लोकिगीतों में अभिव्यक्त संस्कारों का जीवन में बडा महत्व है। मानव इन संस्कारों के द्वारा जन्मजात अपवित्रताओं से छुटकारा पाकर सच्चे मनुष्यत्व को प्राप्त करता है। संस्कारों के विधान के पीछे यही दृष्टिकोण लोकगीतों में समाहित है। लोकगीतों में लोकमानस की सहज अभिव्यक्ति होती है। लोकगीतों के पीछे सामाजिक परंपरा होती है। मानवीय मूल्य और सम्मान का भाव छिपा रहता है। इसप्रकार हम देखते हैं कि लोकगीत की भावसंगती सूपर्ण लोक की मंगलकामना के रूप में उद्भाषित नजर आती है।

इनके लोकगीतों का अध्ययन करते समय एक बात विशेष रूप से ध्यान में आयी वह यह है कि इनकी भाषा में कई सारे शब्द मराठी, पंजाबी और हिंदी से प्रभावित है।  जिस क्षेत्र में रहते हैं उस भाषा का प्रभाव इनकी भाषा पर हो जाता है। कई शब्द क्षेत्रिय भाषा से प्रभावित हो जाते है और उनका प्रयोग भी अनायास उनकी भाषा में होने लगता है। उसीप्रकार वाक्यसंरचना भी प्रभावित हो जाती है। जैसे उदाहरण को लिए ऊपर एख संस्कार का उल्लेख किया छोरोम तोटलाम घालेरो। जहाँ तक मुझे लगता है तोटलाम और घालेरो दोनों शब्दों पर मराठी भाषा का प्रभाव है। मराठी में झुले के लिए लोकभाषा में ‘तोटला’ कहा जाता है और ‘डालना’ (क्रिया)  के लिए ‘घालणे’  (क्रिया) शब्द का प्रयोग किया जाता है।

बंजारों मे केवल गीत भी नहीं है उनकी लोकथाएं भी हैं। ये लोकगीत तथा लोककथाएँ मौखिक ही रही हैं। उनकी अपनी कोई लिपि नहीं है ना ही कोई व्याकरण। कुछ लोगों ने इनके मौखिक साहित्य का अध्ययन किया है और उनको लिपिबद्ध करने का प्रयास कर रहे हैं।  इनमें कर्नाटक में एक नाम विशेष हैं और वह है प्रो.  हेगप्पा लमाणी और दूसरे है डॉ. गुलाब राठोड जिन्होंने इस लिपिबद्ध किया है। मुझे लगता है, बंजारों का  जो मौखिक साहित्य इतनी मात्रा में उपलब्ध है उनका प्रतिलेखन देवनागरी लिपि में कर उसको सुरक्षित करने की आवश्यकता है। जिससे अध्ययन के, शोध के कई आयाम खुल सकते हैं। केवल इतना ही नहीं बल्कि इस भाषा के प्रलेखन से हमें इस समुदाय के सांस्कृतिक, सामाजिक स्वरूप को भी परिचय हो जाएगा। भारत जैसे बहुभाषाभाषी तथा बहुस संस्कृति देश में ऐसी अल्पज्ञात भाषाओं को सुरक्षित करना आवश्यक है।

 

©  डॉ प्रतिभा मुदलियार

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, हिंदी अध्ययन विभाग, मैसूर विश्वविद्यालय, मानसगंगोत्री, मैसूर 570006

दूरभाषः कार्यालय 0821-419619 निवास- 0821- 2415498, मोबाईल- 09844119370, ईमेल:    mudliar_pratibha@yahoo.co.in

 

❃❃❃❃❃❃❃❃❃❃

[1] बंजारा लोकगीत – ड़ा. गुलाब राठोड – पृ -21 लेखनी प्रकाशन, नई दिल्ली

[2]  The art and literature of Banjara’s – A socio- cultural study. Dhansing B Nayak – Page -17

[3]  बंजारा लोकगीत – डॉ गुलाब राठोड –लेखनी, नई दिल्ली –पृ 71

[4] बंजारा लोकगीत  डॉ, वी. रामकोटी – पृ -84

 

संदर्भ ग्रंथ

  • बंजारा लोकगीत – डॉ गुलाब राठोड
  • बंजारा लोकगीत – डॉ. वी.टी रामकोटी
  • The art and literature of Banjara’s – A socio- cultural study. Dhansing B Nayak

 

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हिन्दी साहित्य – सस्वर बुंदेली गीत ☆ बुंदेली फागें – आचार्य भगवत दुबे ☆ स्वरांकन एवं प्रस्तुति श्री जय प्रकाश पाण्डेय

आचार्य भगवत दुबे

(आज प्रस्तुत है हिंदी साहित्य जगत के पितामह  गुरुवार परम आदरणीय आचार्य भगवत दुबे जी  की  बुंदेली फागें ”। हम आचार्य भगवत दुबे जी के हार्दिक आभारी हैं जिन्होंने अपनी अमृतवाणी के माध्यम से बुंदेली भाषा में  बुंदेली फागें आपसे साझा करने हेतु प्रेषित किया है। इस कार्य के लिए हमें श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी का सहयोग मिला है,  जिन्होंने उनकी बुंदेली फागें अपने  मोबाईल में  स्वरांकित कर हमें प्रेषित किया है।  – हेमन्त बावनकर )    

आप आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विस्तृत आलेख निम्न लिंक पर पढ़ सकते हैं :

हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆ – हेमन्त बावनकर

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर तीन पी एच डी ( चौथी पी एच डी पर कार्य चल रहा है) तथा दो एम फिल  किए गए हैं। डॉ राज कुमार तिवारी ‘सुमित्र’ जी के साथ रुस यात्रा के दौरान आपकी अध्यक्षता में एक पुस्तकालय का लोकार्पण एवं आपके कर कमलों द्वारा कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रदान किए गए। आपकी पर्यावरण विषय पर कविता ‘कर लो पर्यावरण सुधार’ को तमिलनाडू के शिक्षा पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। प्राथमिक कक्षा की मधुर हिन्दी पाठमाला में प्रकाशित आचार्य जी की कविता में छात्रों को सीखने-समझने के लिए शब्दार्थ दिए गए हैं।

श्री जय प्रकाश पाण्डेय जी के ही शब्दों में  
संस्कारधानी के ख्यातिलब्ध महाकवि आचार्य भगवत दुबे जी अस्सी पार होने के बाद भी सक्रियता के साथ निरन्तर साहित्य सेवा में लगे रहते हैं । अभी तक उनकी पचास से ज्यादा पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी है। बचपन से ही उनका सानिध्य मिला है।
उन्होंने बुंदेली फागें टेप कर ई-अभिव्यक्ति पत्रिका में प्रकाशित करने हेतु  प्रेषित किया है।
आप परम आदरणीय आचार्य भगवत दुबे जी की बुंदेली फागें उनके चित्र अथवा लिंक पर क्लिक कर उनके ही स्वर में सुन सकते हैं। आपसे अनुरोध है कि आप सुनें एवं अपने मित्रों से अवश्य साझा करें:

आचार्य भगवत दुबे 

शिवार्थ रेसिडेंसी, जसूजा सिटी, पो गढ़ा, जबलपुर ( म प्र) –  482003

मो 9691784464

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आशीष साहित्य # 46 – कला ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार

(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब  प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे  उनके स्थायी स्तम्भ  “आशीष साहित्य”में  उनकी पुस्तक  पूर्ण विनाशक के महत्वपूर्ण अध्याय।  इस कड़ी में आज प्रस्तुत है  एक महत्वपूर्ण  एवं  ज्ञानवर्धक आलेख  “ कला । )

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☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ आशीष साहित्य # 46 ☆

☆ कला  

जैसा कि मैंने आपको बताया था, कला का अर्थ कुछ विशेष गुणवत्ता है कई कलाओं के विशेष गुणों का समुच्चय ही किसी व्यक्ति को पूर्ण बनता है ।

भगवान कृष्ण के पास 16 कलाएँ और भगवान राम के पास 12 कलाएँ थी । इसका अर्थ कदापि यह नहीं है कि भगवान राम भगवान कृष्ण से किसी तरह से कम थे । किन्तु दोनों अलग-अलग राजवंशों में पैदा हुए थे और जिस जिस वंश में उनका जन्म हुआ था उनमे उस वंश की सभी कलाएँ उपस्थित थी । भगवान कृष्ण चंद्र वंश के थे और चंद्रमा की 16 कलाएँ होती हैं, इसलिए भगवान कृष्ण चंद्र की 16 कलाओं से युक्त थे । मैंने आपको चंद्रमा की 16 कलाएँ और उनकी 16 देवियों के विषय में बताया था ।

भगवान राम सूर्य वंश में जन्मे थे, और उनमे सूर्य की सभी 12 कलाएँ उपस्थित थी ना की चंद्रमा की 16 कलाएँ । और सूर्य की इन 12 कलाओं के देवता पुरुष हैं, न कि चंद्रमा की तरह उसकी 16 कलाओं की देवियाँ । सूर्य के ये 12 कला देवता 12 आदित्य हैं । उनके नाम एक शास्त्र से दूसरे में भिन्न हो सकते हैं, लेकिन वे 12 महीनों का प्रतिनिधित्व करते हैं, और उनकी अलग-अलग विशेषताएं होती हैं, और पर्यावरण पर भी उनका अलग अलग प्रभाव पड़ता हैं जैसे चंद्रमा की विभिन्न तिथियों की भिन्न भिन्न देवियाँ होती है और उनका हर रात्रि हमारे मस्तिष्क और प्रकृति पर अलग अलग प्रभाव पड़ता हैं ।

तो आप समझते हैं कि सूर्य पुरुष ऊर्जा या शारीरिक ऊर्जा को दर्शाता है, इसलिए सूर्य की कलाओं के देवता पुरुष है और चंद्रमा स्त्री ऊर्जा या मानसिक ऊर्जा को दर्शाती है तो उसकी कलाओं की देवी स्त्री रूप है ।

यही कारण है कि भगवान राम ने रावण को भौतिक शक्ति से पराजित किया और भगवान कृष्ण ने मानसिक शक्तियों का उपयोग करके पांडवों की सहायता करके कौरवों का अंत किया । ना केवल सूर्य और चंद्रमा बल्कि अग्नि की भी कलाएँ होती हैं । अग्नि की दस कलाएँ होती हैं और वे धुमरा, अर्चि, ऊष्मा, ज्वालिन्यै, विस्फुलिंगिनैयी, सुसारी, सुरुपा, कपिला, हव्यवाह एवं काव्यवाह हैं ।

क्या आप जानते हैं कि भगवान विष्णु का कौन सा अवतार है जो अग्नि की सभी दस कलाओं से युक्त था ?

वह भगवान नरसिंह है।

© आशीष कुमार 

नई दिल्ली

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मराठी साहित्य – कविता ☆ केल्याने होतं आहे रे # 36 –वटपौर्णिमा व जागतिक पर्यावरण दिवस – वृक्षवल्लरी लावु चला या ☆ – श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे

(वरिष्ठ  मराठी साहित्यकार श्रीमति उर्मिला उद्धवराव इंगळे जी का धार्मिक एवं आध्यात्मिक पृष्ठभूमि से संबंध रखने के कारण आपके साहित्य में धार्मिक एवं आध्यात्मिक संस्कारों की झलक देखने को मिलती है. इसके अतिरिक्त  ग्राम्य परिवेश में रहते हुए पर्यावरण  उनका एक महत्वपूर्ण अभिरुचि का विषय है। दिनांक ५-६-२० वटपौर्णिमा व जागतिक पर्यावरण दिवस के अवसर पर आज प्रस्तुत है श्रीमती उर्मिला जी की रचना  “ वृक्षवल्लरी लावु चला या”।  उनकी मनोभावनाएं आने वाली पीढ़ियों के लिए अनुकरणीय है।  ऐसे सामाजिक / धार्मिक /पारिवारिक साहित्य की रचना करने वाली श्रीमती उर्मिला जी की लेखनी को सादर नमन। )

☆ केल्याने होतं आहे रे # 36 ☆

☘️ ? ☘️ वृक्षवल्लरी लावु चला या ☘️ ? ☘️  ☆ 
दिनांक ५-६-२० वटपौर्णिमा व जागतिक पर्यावरण दिवस

 

माझ्या वृक्षवल्लरी लावु चला या कवितेतील पहिले कडवे :-

 

चला चला रे चला चला..

वृक्षवल्लरी लावु चला……!!धृ.!!

 

वटवृक्षाची आगळीच शान !

हिरव्या हिरव्या पानांत बुंदके लाल छान !

वटपौर्णिमेला ह्यालाच मान !

आधारवड हा पांतंस्थांचा ,पक्षीगणांचा !

रक्षण त्यांचे करु चलाऽऽ….

चला चला रे चला चला………

 

©️®️उर्मिला इंगळे

सातारा

दिनांक: 05 -06-20.

!!श्रीकृष्णार्पणमस्तु!!

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मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 39 ☆ गावाचेच घेतो नाव ☆ सौ. सुजाता काळे

सौ. सुजाता काळे

(सौ. सुजाता काळे जी  मराठी एवं हिन्दी की काव्य एवं गद्य विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। वे महाराष्ट्र के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल कोहरे के आँचल – पंचगनी से ताल्लुक रखती हैं।  उनके साहित्य में मानवीय संवेदनाओं के साथ प्रकृतिक सौन्दर्य की छवि स्पष्ट दिखाई देती है। आज प्रस्तुत है  सौ. सुजाता काळे जी  द्वारा  रचित एक अतिसुन्दर भावप्रवण  कविता  गावाचेच घेतो नाव। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कोहरे के आँचल से # 39 ☆

गावाचेच घेतो नाव  

अधुन मधुन वळतो मी

बघण्या माझा गाव

वडाच्या पारंब्यावर

झोक्याची झुकलेली मान

 

रहाटाच्या दोरीचे वळ

तळहातावर अजून

सरपण काढताना

उठलेले व्रण ठासून

 

रोज चोळून घासतो

हातावरचा डाग

आईने फेकून मारलेल्या

जळत्या लाकडाचा डाग

 

निखारा तो धगधगतो

गाव सोडला तरीही

कोरभर भाकरीसाठी

आई वडिलांची गरीबी

 

ही गरीबी दूर करण्या

गेलो सोडून मी गाव पण

माझी ओळख सांगण्या

गावाचेच घेतो नाव .

 

© सुजाता काळे

पंचगनी, महाराष्ट्र, मोबाईल 9975577684

sujata.kale23@gmail.com

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Happiness Activity: Recipe for happiness  ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Happiness Activity: Recipe for happiness ☆ 

Video Link >>>>

Happiness Activity: Recipe for happiness

When asked for his recipe for happiness, Sigmund Freud gave a very short and sensible answer: “Work and love.”

Studies on flow have demonstrated repeatedly that more than anything else, the quality of life depends on two factors: how we experience work, and our relations with other people.

Engagement, or flow, is one of the strongest pillars around which Positive Psychology is built. Here, one is fully in the present, immersed in something worthwhile.

Flow is a state of joy, creativity and total involvement, in which problems seem to disappear and there is an exhilarating feeling of transcendence.

According to Mihaly Csikszentmihalyi, flow is what we feel when we are fully alive, involved with what we do, and in harmony with the environment around us.

It is something that happens most easily when we sing, dance, do sports – but it can happen when we work, read a good book, or have a good conversation.

When asked for his recipe for happiness, Sigmund Freud gave a very short and sensible answer: “Work and love.”

Most people spend the largest part of their lives working and interacting with others, especially with members of their families. Therefore, it is crucial that one can learn to transform job into flow-producing activities, and to think of making relations with parents, spouses, children, and friends more enjoyable.

Studies on flow have demonstrated repeatedly that more than anything else, the quality of life depends on two factors: how we experience work, and our relations with other people.

It is true that if one finds flow in work, and in relations with other people, one is well on the way toward improving the quality of life as a whole.

We each have the potential to experience flow, whether at work, at play or in our relationships.

One thing I can say for sure – flow brings true happiness! The experience becomes its own reward.

– Mihaly Csikszentmihalyi / Flow

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (20) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

 

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते ।

पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ।।20।।

 

प्रकृति ही है अनिवार्यतः, कार्य कारण का हेतु

और पुरूष सब सुख दुखों, के भोगो का हेतु ।।20।।

 

भावार्थ :  कार्य (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम ‘कार्य’ है) और करण (बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्‌, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा- इन 13 का नाम ‘करण’ है) को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है।।20।।

 

In the production of the effect and the cause, Nature (matter) is said to be the cause; in the experience of pleasure and pain, the soul is said to be the cause.।।20।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # 50 ☆ रिश्ते नहीं रिसते ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी का  एक अत्यंत विचारणीय आलेख रिश्ते नहीं रिसते।  यह आलेख  रिसते हुए रिश्तों  पर एक शोधपरक आलेख है।  टूटते – बिखरते रिश्तों के कारणों का  यह दस्तावेज सिर्फ कारण की विवेचना ही नहीं करता अपितु उन्हें संजोने के उपाय भी बताता है। इस आलेख के कई महत्वपूर्ण कथन हमें विचार करने के लिए उद्वेलित करते हैं। यह डॉ मुक्ता जी के  जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 49 ☆

☆ रिश्ते नहीं रिसते

इक्कीसवीं सदी में संबंध व रिश्तों की परिभाषा बदल गई है। कोई संबंध पावन रहा नहीं; न ही रही  उसकी अहमियत व मर्यादा। रिश्ते आजकल दरक़ रहे हैं– उस इमारत की भांति, जो खंडहर के रूप में खड़ी तो दिखाई पड़ती है, परंतु उसके गिरने का अंदेशा सदा बना रहता है। यही दशा है– आज के संबंधों की। संबंध अर्थात् सम+बंध, समान रूप से बंधा हुआ अर्थात् दोनों पक्ष के लोग उसकी महत्ता को समान रूप से समझें व स्वीकारें। परंतु आजकल तो संबंध स्वार्थ पर आधारित हैं। वैसे तो कोई हैलो- हाय करना भी पसंद नहीं करता। इसमें दोष हमारी सोच व तीव्रता से जन्मती-पनपती आकांक्षाओं का है; जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जा रही हैं और मानव उनकी पूर्ति हेतु जी-जान से स्वयं अपने जीवन को खपा देता है। उस स्थिति में उसे न दिन की परवाह रहती है; न ही रात की। वह तो प्रतिस्पर्द्धा के चलते; दूसरे को पछाड़ आगे बढ़ने के लिए विभिन्न हथकंडे अपनाता है। इस परिस्थिति में वह रिश्ते-नातों को भुला कर: दोस्ती को दांव पर लगा, निरंतर उन्नति के पथ पर अग्रसर होता रहता है और अपने आत्मजों व प्रियजनों से बहुत दूर निकल जाता है…सांसारिक चकाचौंध में वह सबको भुला बैठता है। उसे दिखायी पड़ता है–केवल-मात्र अपना स्वार्थ-सिक्त लक्ष्य; जो पुच्छल तारे की भांति उसके विनाश का कारण बनता है। इस स्थिति में उसके पास पीछे मुड़कर देखने का समय भी नहीं होता।

‘रिश्तों की माला जब टूटती है, तो दोबारा जोड़ने से छोटी हो जाती है, क्योंकि कुछ जज़्बात के मोती बिखर जाते हैं।’ यह कथन कोटिश: सत्य है–इसलिए उन्हें बहुत प्यार व सावधानी से सहेजने व संजोने की दरक़ार है। ‘सावधानी हटी, दुर्घटना घटी।’ सो! रिश्ते कांच की भांति नाज़ुक होते हैं; किसी भी पल दरक़ जाते हैं और रिश्तों में आयी दरार कहीं खाई न बन जाए; उसका ख्याल रखना अत्यंत आवश्यक है। एक फिल्म की ये पंक्तियां, ‘चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों’ व ‘ताल्लुक बोझ बन जाए, तो उसको तोड़ना अच्छा’ इन्हीं भावों को परिपुष्ट करती हैं। हृदय में संशय, संदेह, अविश्वास से अति-विषाक्त हो जाने से पूर्व अजनबी बन जाना बुद्धिमत्ता का प्रतीक है, ताकि संबंधों को पुन: स्थापित करने की संभावना बनी रहे। इसी संदर्भ में मेरे मनो-मस्तिष्क में दस्तक दे रही हैं वे पंक्तियां, ‘दुश्मनी इतनी करो कि पुन: दोस्त बनने की संभावना शेष बनी रहे।’ सो! संभावना जीवन में अपना अहम् दायित्व निभाती है और वह सदैव बनी रहनी चाहिए। रहीम जी का दोहा ‘रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय/ जोरे से पुनि न जुरै, जुरै गांठ परि जाइ’ भी यही संदेश देता है… जैसे धागे के टूटने पर, वह दोबारा जो नहीं जुड़ पाता; उसमें गांठ पड़ना अवश्यंभावी है। उसी प्रकार रिश्तों में भी शक़, आशंका, संशय व ग़लतफ़हमी ऐसी दरारें उत्पन्न कर देते हैं; जिन्हें पाटना अत्यंत दुष्कर होता है।

परंतु आजकल माधुर्यपूर्ण रिश्ते तो गुज़रे ज़माने की बात हो गए हैं। संबंध-सरोकार शेष बचे ही नहीं। हर रिश्ते में अजनबीपन का अहसास व्याप्त है। रिश्ता चाहे पति-पत्नी का हो या भाई-भाई का हो; पिता- पुत्र का हो या मां बेटी का– सब एकांत की त्रासदी झेल रहे हैं; यहां तक कि बच्चे भी अकेलेपन से जूझ रहे हैं। पति-पत्नी में स्नेह, प्रेम, त्याग व समर्पण के अभाव होने का ख़ामियाज़ा सबसे अधिक बच्चे भुगत रहे हैं तथा उनके हृदय में अनगिनत प्रश्न ग़ाहे-बेग़ाहे कुनमुनाते हैं और वे अपने माता-पिता को कटघरे में खड़ा कर देते हैं, जिसे सुन वे स्तब्ध रह जाते हैं। ‘यदि उनके पास उनके पालन-पोषण करने का समय ही नहीं था, तो उन्होंने उन्हें जन्म ही क्यों दिया?’

अक्सर माता-पिता बच्चों को खिलौने व सुख- सुविधाएं प्रदान कर, अपने दायित्वों की इति-श्री समझ लेते हैं; परंतु बच्चों को उनकी दरक़ार नहीं होती, बल्कि उन्हें तो माता-पिता के प्यार-दुलार व सान्निध्य-साहचर्य की आवश्यकता होती है; जिसके अभाव में उन मासूमों के हृदय में आक्रोश की स्थिति पनपने लगती है– जिसका परिणाम हमें बच्चों के नशे के आदी होने व अपराध जगत् की ओर प्रवृत्त होने के रूप में दिखने को मिलता है। इस स्थिति में उनका सर्वांगीण विकास कैसे संभव हो सकता है? मोबाइल, टी•वी• व मीडिया से उनका जुड़ाव व सर्वाधिक प्रतिभागिता सर्वत्र झलकती है; जो उनके जीवन का हिस्सा बन जाती है, जिसके परिणाम- स्वरूप वे मानसिक रोगी बन जाते हैं।

आजकल अहंनिष्ठता के कारण माता-पिता में अलगाव की स्थिति पनप रही है, जिसके कारण सिंगल-पेरेंट का प्रचलन तेज़ी से बढ़ रहा है। सो! बच्चों को माता का स्नेह-दुलार व पिता का सुरक्षा- दायरा नसीब नहीं हो पाता और वे कुंठा-ग्रस्त हो जाते हैं। उनके जीवन से आस्था व विश्वास के भाव नदारद हो जाते हैं और जीवन के प्रति उनका नज़रिया अथवा दृष्टिकोण सदैव नकारात्मक रहता है। सब्र, संतोष, करुणा, सहानुभूति, त्याग व  सहनशीलता से उनका दूर का नाता भी नहीं रहता। वे उसके श्रेय-प्रेय व शुभ-अशुभ पक्षों की ओर ग़ौर नहीं फ़रमाते; न ही निर्णय लेने व उसे कार्यान्वित करने में समय लगाते हैं; जिसका परिणाम हमें उनके प्रतिदिन फ़िरौती, अपहरण, लूटपाट, दुष्कर्म आदि के हादसों में लिप्त होने के रूप में दिखाई पड़ता है।

आज की युवा-पीढ़ी चार्वाक दर्शन से प्रभावित है तथा हर क्षण का तुरंत उपभोग कर लेना चाहती है। वे अगले पल अर्थात् कल व भविष्य की प्रतीक्षा नहीं करते। सो! युवावस्था में पदार्पण करने से पूर्व ही वे मासूम बच्चियों की अस्मत लूटने, एकतरफ़ा प्यार में तेज़ाब फेंकने व सरे-आम गोलियां चलाने से गुरेज़ नहीं करते। दुष्कर्म करने के पश्चात् उसकी दर्दनाक हत्या कर देना भी आजकल सामान्य सी घटना स्वीकारी जाती है, क्योंकि वे अपनी सुरक्षा-हेतु कोई भी सबूत छोड़ना नहीं चाहते। इस स्थिति में बहन, बेटी व मां के संबंध की सार्थकता उनकी दृष्टि में कहां महत्व रखती है? पहले पत्नी को छोड़कर हर महिला को मां, बहन, बेटी के रूप में मान्यता प्रदान की जाती थी और उनके आत्म-सम्मान पर आंच आने की स्थिति में; वे अपने प्राणों की बाज़ी तक लगा देने को तत्पर रहते थे। परंतु आजकल तो दुधमुंही मासूम बच्चियां भी अपने माता-पिता के आंचल तले महफूज़ नहीं हैं… गिद्ध नज़रें हर-पल उनके चारों ओर मंडराती दिखाई पड़ती हैं।

चलिए! प्रकाश डालते हैं– पति-पत्नी के विवाहेतर संबंधों पर– पति-पत्नी और वो अर्थात् पर-स्त्री-गमन आज के समाज का फैशन हो गया है। ‘लिव-इन’ व ‘मी-टू’ के दुष्परिणाम तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष हैं, जिसके कारण परिवार टूट रहे हैं। वैसे पैसा भी रिश्तों में दरार उत्पन्न करने में अहम् भूमिका अदा करता है। भाई-भाई, भाई-बहन, पिता-पुत्र व मां-बेटी के पावन संबंध भी दांव पर लगे रहते हैं।अक्सर वे एक-दूसरे की जान लेने पर सदैव आमादा रहते हैं। संतान द्वारा माता-पिता की हत्या के किस्से सामान्य हो गये हैं। पहले संयुक्त परिवार-प्रथा का प्रचलन था। एक कमाता था, दस खाते थे। परंतु आजकल हर इंसान अधिकाधिक धन कमाने में व्यस्त है, परंतु स्थिति सर्वथा भिन्न है। परिवार पति-पत्नी व बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं और संवादहीनता के कारण  पनप रही संवेदनशून्यता की स्थिति के परिणाम-स्वरूप रिश्तों में ग्रहण लग गया है …माता- पिता को वृद्धाश्रमों में शरण लेनी पड़ रही है। वे कमरे के बंद दरवाज़ों व शून्य छत की ओर ताकते; उन आत्मजों की प्रतीक्षा में रत रहते हैं; जिनके लौटने की संभावना नगण्य होती है। अक्सर बच्चों के विदेश-गमन के पश्चात् वे जीवन में अकेले जूझते व संघर्ष करते रहते हैं; जिसका परिणाम दस माह पश्चात् एक फ्लैट में महिला का कंकाल प्राप्त होना है। यह आधुनिक समाज के सभी वर्ग के लोगों को कटघरे में खड़ा कर प्रश्न करता है– ‘क्या बच्चों का माता-पिता के प्रति कोई दायित्व नहीं है?’

वैसे इस अप्रत्याशित व भयावह स्थिति के लिए अपराधी केवल बच्चे नहीं; उनके माता-पिता भी हैं, जो उनके विदेश में होने पर फ़ख्र महसूस करते हैं। परंतु जब बच्चे वहां से लौट कर नहीं आते, तो उनकी जान पर बन आती है। सो! मैं अमुक घटना पर आपकी तवज्जो चाहूंगी; जिसे सुनकर आपके पांव तले से ज़मीन खिसक जाएगी। चंद दिन पहले पिता ने अपने बेटे को उसकी मां की गंभीर बीमारी के बारे में सूचित करते हुए कहा कि वह उसे बहुत याद करती है। एक बार आकर वह उसे मिल जाए। परंतु वह नहीं आया। इतना ही नहीं– उसका अपने भाई से यह आग्रह करना कि भविष्य में मां के निधन पर वह चला जाए और पिता के निधन पर वह चला जाएगा। क्या यह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा नहीं है?

आजकल तो लहू का रंग लाल ही नहीं रहा; श्वेत हो गया है। संवेदना-सरोवर सूख चुके हैं। अब उनमें कोई हलचल नहीं रही। संवाद संबंधों की जीवन- रेखा हैं। जब आप बात करना बंद कर देते हैं; अमूल्य संबंध खोने लगते हैं। उन्हें जीवित रखने के लिए आवश्यकता है– विवाद से बचने की और संबंधों को शाश्वत बनाए रखने की…जिसकी शर्त है, झुकना; सहन करना व प्रसन्नता से खुद पराजय स्वीकार कर, दूसरों को विजयी बनाने की बलवती इच्छा होना। सच्चे संबंध जीवन की वास्तविक पूंजी व धरोहर होते हैं, जो विषम परिस्थितियों में भी सहायक सिद्ध होते हैं। इनसे निबाह करने के लिए मानव को अहम् का त्याग करना अनिवार्य होता है, अन्यथा उसी के बोझ से वे टूट जाते हैं। ‘तूफ़ान में किश्तियों का बचना तो संभव है, परंतु अहं से हस्तियों का डूबना अनिवार्य है, निश्चित है।’

सो! आजकल सब संबंध दिखावे के हैं, जो मात्र छलावा हैं। वास्तव में हर शख्स भीतर से अकेला है। यही है, जिंदगी की कशमकश; जिससे जूझता हुआ इंसान आवागमन के चक्र से मुक्ति नहीं प्राप्त कर सकता, बल्कि उसे आजीवन सुनामी की आशंका बनी रहती है। वह हर पल इसी आशंका में जीता है कि वे रिश्ते किसी पल भी दरक़ सकते हैं, क्योंकि अविश्वास, संदेह व शंका रूपी दीमक उसे खोखला कर चुकी होती है और वे संबंध नासूर बन आजीवन रिसते रहते हैं। परंतु फिर भी एक आशा; एक उम्मीद अवश्य बनी रहती है।

आइए! पारस्परिक मनोमालिन्य को तज, सहज रूप से जीवन जीएं व अहं का त्याग कर मंगल-कामना करें और ईर्ष्या-द्वेष व स्व-पर से ऊपर उठें। संसार में जो सत्य है; वह सुंदर व कल्याणकारी है। सो! सत्य को सदैव संजो कर रखना व विषम परिस्थितियों में सम बने रहना श्रेयस्कर है।। क्रोध मानव का सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि वह पल-भर में सब रिश्तों में सेंध लगाकर, उन्हें नष्ट कर देता है। सो! दूसरों की भावनाओं का सदैव सम्मान करें व  उनसे वैसा व्यवहार करें; जिसकी अपेक्षा हम उनसे करते हैं। पहले लोग भावुक होते थे; भावना में बह कर रिश्ते निभाते थे। फिर लोग प्रैक्टिकल हुए–भावना का कोई स्थान नहीं रहा; रिश्तों से फायदा उठाने लगे और अब प्रोफेशनल हो गए हैं और वही रिश्ते निभाने लगे हैं; जिनसे अपने स्वार्थ साधे जा सकें। ‘रिश्ते नम्रता से निभाए जा सकते हैं; छल-कपट से तो केवल महाभारत रची जा सकती है।’ इसलिए बुरा मत मानिए–अगर लोग आपको ज़रूरत के समय याद करते हैं, बल्कि गर्व कीजिए, क्योंकि मोमबत्ती की याद तभी आती है; जब अंधेरा होता है। सो! रिश्तों की गहराई को अनुभव कीजिए-समझिए। सहृदय बनिये और स्नेह-सौहार्द बनाए रखिए। रिश्तों में प्रतिदान की अपेक्षा मत रखिए; केवल देना सीखिए अर्थात् समर्पण व त्याग की महत्ता व अहमियत स्वीकारिए, ताकि रिश्ते स्वस्थ बने रहें और उनमें ताज़गी बरकरार रहे। रिश्ते रिसते न रहें। रिश्तों का अहसास बना रहे और वे जीवन को आंदोलित करते रहें; जिससे जीवन-बगिया महकती रहे; लहलहाती रहे और वहां चिर-वसंत का वास हो… मलय वायु के झोंके सभी दिशाओं को आलोड़ित व अलौकिक आनंद से सराबोर करते रहें– यही अनमोल रिश्तों की सार्थकता है।

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ नुक्कड़ नाटक – जल है तो कल है – 3 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ नुक्कड़ नाटक – जल है तो कल है – 3 ☆

(प्रसिद्ध पत्रिका ‘नवनीत ‘के जून 2020 के अंक में श्री संजय भारद्वाज जी के नुक्कड़ नाटक जल है तो कल है का प्रकाशन इस नाटक के विषय वस्तु की गंभीरता प्रदर्शित करता है। ई- अभिव्यक्ति ऐसे मानवीय दृष्टिकोण के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए कटिबद्ध है। हम इस लम्बे नाटक को कुछ श्रृंखलाओं में प्रकाशित कर रहे हैं। आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया इसकी विषय वस्तु को गंभीरता से आत्मसात करें ।)

(लगभग 10 पात्रों का समूह। समूह के प्रतिभागी अलग-अलग समय, अलग-अलग भूमिकाएँ निभाएंगे। इन्हें क्रमांक 1,  क्रमांक 2 और इसी क्रम में आगे संबोधित किया गया है। सुविधा की दृष्टि से 1, 2, 3… लिखा है।)

जल है तो कल है – भाग 3 से आगे …

8- फिर हुआ बिजली का आविष्कार।

9- बिजली ने आदमी का जीवन ही बदल दिया।

10- बिजली से घरों में लट्टू जलने लगे।

1- फिर धरती से पानी खींचने वाली मोटर बनी और बिजली से चलाई जाने लगी।

2- पानी से बनी बिजली।

3- बिजली ने चलाई मोटर।

4- मोटर और पंप से शुरू हुआ बोरवेल।

5- धरती के गर्भ में उतरकर बोरवेल टटोलने लगा पानी।

6- हजारों लीटर पानी धरती से बाहर लाया जाने लगा।

7- आदमी बौरा गया।

8- आदमी खींचने लगा पानी।

9- आदमी फेंकने लगा।

10- पानी बेचने लगा पानी।

समवेत- आदमी खींचने लगा पानी…आदमी फेंकने लगा पानी…आदमी बेचने लगा पानी। ( कुछ पात्र खींचने, फेंकने, बेचने को मूक अभिनय द्वारा दर्शाएँगे।)

1- आदमी का लालच बढ़ा।

2- पहले जिसके पास जो उपलब्ध था, उससे उसका गुजारा हो जाता था। समाज में बार्टर पद्धति चलन में थी।

3- बार्टर याने क्या?

4- याने वस्तु विनिमय, अदल-बदल या प्रतिदान।

5- किसी के पास बाजरा था, किसी के पास चावल।

6- थोड़ा बाजरा देकर पहला चावल ले लेता। थोड़े चावल से दूसरा बाजरा पा जाता।

7- प्रकृति की सोच के केंद्र में आदमी था। आदमी की सोच के केंद्र में पैसा पैर जमाने लगा।

8- पहले परती खेती थी। आधा खेत जोता जाता, आधा परती या बिना उपयोग के रखा जाता।

9- अगले साल परती वाला भाग जोता जाता, दूसरा खाली रखा जाता।

10- अब दोनों भाग जोते जाने लगे।

1- आदमी की लिप्सा और बढ़ी।

2- पहले खाद के लिए वह गोबर इस्तेमाल करता था। सूखे पत्ते इस्तेमाल करता था।

3- टहनियाँ उपयोग में लाता था प्राकृतिक अपशिष्ट उपयोग में लाता था।

4- अब वह धरती की कोख में उतारने लगा जहर।

5- जहर घातक रासायनिक खाद का।

6- इस जहर से मिट्टी में रहने वाले कीड़े-मकोड़े मरने लगे।

7- इस जहर से मरने लगे फसल के लिए लाभदायक केंचुए और बैक्टीरिया।

समवेत- वह धरती की कोख में उतारने लगा जहर… जहर घातक रासायनिक खाद का… इस जहर से मिट्टी में रहने वाले कीड़े-मकोड़े मरने लगे…इस जहर से फसल के लिए लाभदायी केंचुए और बैक्टीरिया मरने लगे। (कुछ कुछ पात्र इन वाक्यों पर मूक अभिनय करेंगे।)

8- घातक रसायन भूजल में मिलने लगा।

9- पानी दूषित होने लगा।

10- आदमी तब भी न संभला, न रुका।

1- पहले उद्योग कुटीर थे।

2- पहले उद्योग पर्यावरण स्नेही थे।

3-  कलपुर्जे हाथ से बनाए जाते थे।

4- कलपुर्जे हाथ से चलाए जाते थे।

5- अब मशीनें कलपुर्जे बनाने लगीं।

6- अब बिजली कलपुर्जे चलाने लगी।

7-  औद्योगिक अपशिष्ट बड़ी मात्रा में निकलने लगा।

8- लालची आदमी कोई प्रक्रिया किए बिना इसे सीधे नदियों में बहने लगा।

9-  बहता पानी रुकने लगा, सड़ने लगा।

10- मछलियाँ  और जलचर मरने लगे।

1-  आदमी का जीवन थमने लगा।

2-  दूषित जल से आदमी बीमार पड़ने लगा।

समवेत- बहता पानी रुकने लगा…सड़ने लगा… मछलियाँ और जलचर मरने लगे…आदमी का जीवन थमने लगा…दूषित जल से आदमी बीमार पड़ने लगा।

 

क्रमशः  —— 4

(यह नुक्कड़ नाटक संकल्पना, शब्द, कथ्य, शैली और समग्र रूप में संजय भारद्वाज का मौलिक सृजन है। इस पर संजय भारद्वाज का सर्वाधिकार है। समग्र/आंशिक/ छोटे से छोटे भाग के प्रकाशन/ पुनर्प्रकाशन/किसी शब्द/ वाक्य/कथन या शैली में परिवर्तन, संकल्पना या शैली की नकल, नाटक के मंचन, किसी भी स्वरूप में अभिव्यक्ति के लिए नाटककार की लिखित अनुमति अनिवार्य है।)

(नोट– घनन घनन घिर घिर आए बदरा,  गीत श्री जावेद अख्तर ने लिखा है।)

©  संजय भारद्वाज, पुणे

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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