हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ किसलय की कलम से # 3 ☆ कोरोना से संदर्भित : वह पीड़ा जिसके हम स्वयं उत्तरदायी हैं ☆ डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

( डॉ विजय तिवारी ‘ किसलय’ जी संस्कारधानी जबलपुर में साहित्य की बहुआयामी विधाओं में सृजनरत हैं । आपकी छंदबद्ध कवितायें, गजलें, नवगीत, छंदमुक्त कवितायें, क्षणिकाएँ, दोहे, कहानियाँ, लघुकथाएँ, समीक्षायें, आलेख, संस्कृति, कला, पर्यटन, इतिहास विषयक सृजन सामग्री यत्र-तंत्र प्रकाशित/प्रसारित होती रहती है। आप साहित्य की लगभग सभी विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी सर्वप्रिय विधा काव्य लेखन है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आप सर्वोत्कृट साहित्यकार ही नहीं अपितु निःस्वार्थ समाजसेवी भी हैं। आज से आप प्रति शुक्रवार साहित्यिक स्तम्भ – किसलय की कलम से आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका मानवीय दृष्टिकोण पर आधारित एक सकारात्मक आलेख  ‘कोरोना से संदर्भित : वह पीड़ा जिसके हम स्वयं उत्तरदायी हैं’।)

☆ किसलय की कलम से # 3 ☆

☆ कोरोना से संदर्भित : वह पीड़ा जिसके हम स्वयं उत्तरदायी हैं ☆

(यह आलेख लॉक डाउन के प्रथम चरण से संदर्भित है किन्तु, इसके तथ्य आज भी विचारणीय हैं जिन्हें आत्मसात करने की आवश्यकता है।) 

लगभग सौ वर्ष पूर्व का भारतीय सामाजिक परिवेश देखें तो हम पाएँगे कि समाज में वर्ण व्यवस्था जीवित तो थी लेकिन शिथिल भी होती जा रही थी। लोग वर्ण से इतर कामकाज और व्यवसाय-धंधे अपनाने लगे थे। धीरे-धीरे रूढ़िवादियाँ और असंगत प्रथाएँ समाप्त हो रहीं थी, वहीं पाश्चात्य की दस्तक से जीवनशैली बदलने लगी थी। जो समाज छुआछूत, ऊँच-नीच अथवा निम्न जातियों से परहेज करता था, उनके भी मायने बदलने लगे थे। लोगों में रहन-सहन, खान-पान और मेलजोल बढ़ने लगा था। यह कितना उचित था, कितना प्रासंगिक था? अथवा कितना आवश्यक था? ये सब वक्त और परिस्थितियों के साथ बदलता रहता है।

पहले स्नान-ध्यान, पूजा-भक्ति, नियम-संयम अथवा जाति-धर्म का बहुत महत्त्व होता था। जहाँ तक मैंने अध्ययन एवं चिंतन किया है, ये सब बातें कपोलकल्पित नहीं थीं। हर व्यवस्था अथवा कार्य के पृष्ठ में एक तर्क, सत्यता, व्यवस्था अथवा सुरक्षा का भाव निश्चित रूप से होता था। स्वस्थ जीवन के इस रहस्य को युगों-युगों से भारतीय जानते हैं। आज भी स्नान, स्वच्छता, शुद्धता, सद्भावना आदि का पहले जैसा ही महत्त्व है। आज बदलते परिवेश और प्रगति की अंधी दौड़ में हमारी दिनचर्या इतनी अनियमित व असुरक्षित हो गई है, जिस पर चिंतन किया जाए तो उसे कोई भी स्वीकार्य नहीं कर पायेगा।

घर में लाया गया खाद्यान्न हो अथवा कोई भी सीलबंद सामग्री, उसकी विश्वसनीयता हमेशा से संदेह के घेरे में रही है, आज के समय में क्या आप बाहर की किसी भी वस्तु या खाद्य पदार्थ घर में लाना चाहेंगे? शायद आज बिल्कुल नहीं, फिर भी हम विवश हैं। राम भरोसे सब कुछ ला रहे हैं और खा भी रहे हैं। वर्तमान में उत्पन्न हुईं ये परिस्थितियाँ हमारी महत्त्वाकांक्षाओं का ही कुपरिणाम है। आज आदमी आदमी के निकट आने से घबरा रहा है। हाथ मिलाने के स्थान पर दूर से नमस्ते करने लगा है। आज सुरक्षा की दृष्टि से दूसरे के हाथों बने भोजन से परहेज करने लगा है। कुछ ही महीने पहले ऐसा लगता था कि इन सबके बिना आदमी जिंदा नहीं रह पाएगा परन्तु अब ऐसा लगने लगा है जैसे नए रूप में ही सही कुछ पुरानी प्रथाएँ पुनर्जीवित हो उठीं हों।

आज ट्रेनें बंद हैं। बाजार बंद हैं। आवश्यक सेवाएँ तक न के बराबर हैं, फिर भी सभी जिंदा हैं। इसका मतलब यही हुआ कि आदमी चाह ले तो सब संभव है। इसी को वक्त का बदलना कहते हैं। आज हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर आदमी अपने घरों को लौट रहे हैं। घर से बाहर निकला मजदूर अपने शहर और गाँव की ओर भाग रहा है। उसके मन में बस एक ही बात है कि जो भी हो, जैसे भी रहेंगे, अपने घर और अपनों के बीच में रहेंगे। इसीलिए कहा गया है कि-

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’

सुख हो अथवा दुख अपनी माटी, अपने लोक और अपनी संस्कृति में आसानी से कट जाते हैं। आज जब आदमी अपने घरों की ओर भाग रहा है, तब उन उद्योगों-धंधों और व्यवसाय का क्या होगा? जहाँ बहुतायत में बाहरी मजदूर व कर्मचारी काम करते थे। उन मजदूरों, छोटे व्यापारियों और कुटीर उद्योगों का क्या होगा, जिनसे लोगों की रोजी-रोटी चलती थी। कुछ ही समय में ऐसे अनेक परिवर्तनों का खामियाजा हमारा समाज भुगतेगा,  जिन पर अभी तक किसी ने सोचा भी नहीं है। बड़े उत्पादों हेतु जब कर्मचारियों की कमी होगी तो उत्पादन और गुणवत्ता पर असर पड़ेगा ही। क्या उत्पाद महँगे नहीं होंगे? जब मजदूरों को मजदूरी नहीं मिलेगी तो क्या उनकी दिनचर्या में फर्क नहीं पड़ेगा? उनकी रोजी रोटी कैसे चलेगी? जब रोजी रोटी नहीं चलेगी तो बेरोजगारी, भूखमरी और अराजकता नहीं फैलेगी?  क्या निम्नवर्गीय बेरोजगार तबका न चाहते हुए भी अनैतिक और उल्टे-सीधे कार्य नहीं करेगा?

यदि समय रहते देश के जागरूक, बड़े उद्योगपति, देश के कर्णधार और प्रशासन देशहित में आगे नहीं आये, समृद्ध लोगों ने उदारता नहीं दिखलाई तो बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, चोरी-डकैती, लूटमार की घटनाएँ बढ़ने में देर नहीं लगेगी। आज कोरोना-कहर ने सारे विश्व को स्तब्ध कर दिया है। कुछ ही महीनों में इस बीमारी के दुष्परिणाम दिखाई देने लगे हैं। अभी पूरा का पूरा निम्न वर्ग अपनी जमापूँजी के सहारे अपनी रोजी-रोटी जैसे-तैसे चला रहा है। जब पूँजी समाप्त हो जाएगी और रोजगार भी नहीं रहेगा, फिर क्या होगा? इसकी कल्पना ही भयावह लगती है।

कुछ लोगों की नासमझी, कुछ विवशताएँ एवं कुछ असावधानियाँ भी कोविड-19 को विकराल बनाने में सहायक हो रही हैं। आज वह चाहे छोटा हो या बड़ा, अनपढ़ हो या पढ़ा-लिखा, धनवान हो या निर्धन, जिस तरह बिजली और आग किसी में फर्क नहीं करती ठीक उसी तरह यह कोरोना किसी के साथ भेदभाव नहीं करता, जो सामने पड़ा उस पर वार करेगा ही। गंभीरता से सोचने पर कहा जा सकता है कि यह वह पीड़ा है जिसके हम स्वयं उत्तरदायी हैं।

अतः हमें स्वयं को, अपने परिवार को, अपने गाँव-शहर को या यूँ कहें कि अपने देश को इस संकट से उबारना है तो हमें प्रशासन व चिकित्सकों के सभी निर्देशों का स्वस्फूर्तभाव से पालन करना होगा। यदि हम सब कृतसंकल्पित होते हैं तो शीघ्र ही हमारी और हमारे देश की परिस्थितियाँ वापस सामान्य होने लगेंगी और एक बार पुनः निर्भय, स्वस्थ और सुखशांतिमय जीवन की शुरुआत हो सकेगी।

 

© डॉ विजय तिवारी ‘किसलय’

पता : ‘विसुलोक‘ 2429, मधुवन कालोनी, उखरी रोड, विवेकानंद वार्ड, जबलपुर – 482002 मध्यप्रदेश, भारत
संपर्क : 9425325353
ईमेल : vijaytiwari5@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज # 49 ☆ भावना के दोहे ☆ डॉ. भावना शुक्ल

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं प्रदत्त शब्दों पर   “भावना के दोहे। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # 49 – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे ☆

होता है आलोक जब,

खिलता पुष्पित पुंज।

कलियों का कलरव बढ़ा,

गूंज उठा है कुंज।

 

करते है हम आचमन,

गंग जमुन का नीर।

ईश अर्चना पूर्ण हो

मन से हटती पीर।

 

आज लोग डरते नहीं,

करने से ही पाप ।

अंतरात्मा दे रही,

उनको ही अभिशाप।।

 

मन की चाबी से भला,

कैसे खोले भेद।

सबके मन में दिख रहे

जाने कितने  छेद।

 

चतुराई की चाल से,

उनसे किया सवाल।

आज आदमी डस रहा,

बनकर जैसे व्याल।

 

© डॉ.भावना शुक्ल

सहसंपादक…प्राची

प्रतीक लॉरेल , C 904, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब  9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ सैनिक ☆ डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी  बेंगलुरु के जैन महाविद्यालय में सह प्राध्यापिका के पद पर कार्यरत हैं एवं  साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में मन्नू भंडारी के कथा साहित्य में मनोवैज्ञानिकता, स्वर्ण मुक्तावली- कविता संग्रह, स्पर्श – कहानी संग्रह, कशिश-कहानी संग्रह विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। इसके अतिरिक्त आपकी एक लम्बी कविता को इंडियन बुक ऑफ़ रिकार्ड्स 2020 में स्थान दिया गया है। आप कई विशिष्ट पुरस्कारों /अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आज ससम्मान  प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता  सैनिक ।  इस बेबाक कविता के लिए डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’ जी की लेखनी को सादर नमन।)  

☆ कविता – सैनिक  ☆ 

निस्वार्थ, निष्कलमश

सेवार्थ तन-मन से

मात्र माँ को बचाना

करने चले साकार सपना

 

न देखा सुख व दर्द

न किसी की भी

व्यथा-कथा ध्येय मात्र

स्वदेश की प्राप्ति

 

कर स्वयं को अर्पित

उठाया शस्त्र

नाश मात्र अरिदल का

आन-बान से लडा वीर

 

युद्धभूमि में न डगमगाये कदम

आँधी न तूफ़ान से डरा वीर

न डरा अरिनाग फूँककार से

चल पडा अंगारों पर

 

दौड़ाये घोड़े रण रंग में’

सुध-बुध खोकर हुआ खूंखार

ललकारते हुए शत्रु को

मात्र कहता रहा

 

तुम्हारी एक मार तो

सह मेरी सहस्त्र मार

तुमने डाली आंख मां की ओर

नहीं तुम बचोगे इंसान

 

अक्षौहिणी का सिपाही

खुली हवा में

लहराते झंडे को देख

मेरा देश, मेरी माँ

 

हिन्दुस्तानी करते  सबसे प्यार,

देश हमारा सबसे न्यारा,

मर मिटेंगे देश की खातिर,

आंखे नोंच लेंगे दुश्मनों की,

 

मर्यादाओं का भान कर,

अभिमान से सर उठाकर,

स्वाभिमान की रक्षा कर,

न किसी को कुचलने देंगे

 

रक्षा करेंगे माँ भारती की,

अंगारों पर चलकर,

कर देंगे अर्पित स्वयं को,

सांसे है धरोहर माँ की,

 

दुश्मनों को दिखायेंगे,

उनकी औकात…

पर्वत से उनको है

टकराना…

 

हम लें चले माँ की सौगात

रास्ता बतलायेंगे उनको,

शेर-सी दहाड सैनिक,

चल पड़ा रणक्षेत्र में

 

कर्ज चुकाने के लिए

त्यागा परिवार को,

छोडा नवेली दुल्हन को,

रणरंग में चला अकेला,

 

सैनिक की एक मात्र पुकार,

दुश्मन को ललकारता,

आज मेरी तलवार या तुम

करेंगे रक्षा माँ भारती की

 

माँ भारती, सोयेंगे तुम्हारे अंचल में

जब तक है साहस भुजबल में

अंचल न छूने देंगे शत्रु को

माँ तुम्हारे ऋणी है हम

 

सिपाही की बुलंद आवाज़

चल पडा निडर होकर

मत कर साहस अरि

मां का आंचल बेदाग करने की

 

बेमतलब की बातें कर,

गुमराह नहीं करते हम,

मां भारती पुकार रही,

सहारा मात्र मांग रही,

 

हे माँ रक्षा करेंगे हम

तुम निश्चिंत होकर सो जाओ,

जाग रहे तुम्हारे बेटे

निज कर्तव्य का पालन करने

 

विवश नहीं हम

विरोचित है हम

कायर नहीं हम

लडेंगे मरने तक

 

आन-बान से रहना है तुझको

जग में न हिम्मत करेगा कोई

तुम्हें छूने से डरेगा हर इन्सान

आज आया चिताह रणभूमि में

 

दुश्मनों को भी भागना पडेगा

ठान लिया है एक सैनिक ने

कटकर मर जायेंगे

रक्षा तुम्हारी करेंगे

 

माथे पर लगाया

लहू का तिलक

भाले को चूमकर,

निकल पडा सैनिक,

 

दुश्मनों के छक्के छुडाने

लड रहा है सैनिक

आखिरी सांस तक

बचाया माँ भारती को

 

आशियाना बर्बाद कर देंगे

नहीं लोगे तुम चैन की साँस

आंचल माँ का थाम

प्यार से धूल को

 

माथे पर लगाकर

अटहरी में मुस्कुराता

चढता बलिवेदी पर

चिर निद्रा में सोता है

 

संपर्क:

डॉ. अनिता एस. कर्पूर ’अनु’

लेखिका, सहप्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, जैन कॉलेज-सीजीएस, वीवी पुरम्‌, वासवी मंदिर रास्ता, बेंगलूरु।

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 40 ☆ जीवन पथ …. ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

 

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है  श्री संतोष नेमा जी  का  एक भावप्रवण रचना “ जीवन पथ …. ”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।) 

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 40 ☆

☆ जीवन पथ .... ☆

 

जीवन के पथ में मिले, तरह तरह के लोग

सीखा हमने भी बहुत, इनसे जग का योग

 

जीवन के हर मोड़ पर, काँटे मिले तमाम

आयेंगी मुश्किल कई, तभी बनेंगे काम

 

अपनी इक्छा शक्ति से, होगा पथ आसान

नहीं मुश्किलों से डरें, चलिए मन में ठान

 

घूम घूम अनजान पथ, उड़ कर चले पतंग

मन भँवरा सा घूमता, जैसे चले मतंग

 

पाता  मंजिल है वही, चलता पथ अविराम

जब हिय में “संतोष’हो, हुए सफल सब काम

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ पर्यावरण दिवस विशेष – आत्मकथा – समाधि का वटवृक्ष ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज आपके “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है  पर्यावरण दिवस पर विशेष रचना – आत्मकथा – समाधि का वटवृक्ष।  

☆ पर्यावरण दिवस विशेष – आत्मकथा समाधि का वटवृक्ष ☆

एक बार मैं देशाटन के उद्देश्य से घर से निकला‌ था‌, और घने जंगलों के रास्ते गुजर रहा था, तभी सहसा उस नीरव वातावरण ‌ से एक तैरती आवाज कानों से टकराई,अरे ओ यायावर मानव !कुछ पल रूक मेरी राम कहानी सुनता जा,और अपने जीवन के कुछ कीमती पल मुझे देता जा, ताकि जब मैं ‌इस‌ जहां से जाऊं तो मेरी अंतरात्मा ‌पर पडा़ बोझ थोडा़ हल्का हो जाय ।

जब मैंने कूतूहल बस  अगल बगल देखा तो मुझे वहीं पास‌ में ही ‌जड़ से कटे पड़ें धरासाई वटवृक्ष से ये आवाज़ ‌फिजां में तैर रही थी,और दयनीय अवस्था में कटा‌ हुआ जमीन पर गिरा पड़ा‌ वटवृक्ष मुझसे आत्मिक संवाद कर अपनी राम कहानी कह उठा था, मैंने जब उसे ध्यान पूर्वक देखा तो पाया कि उसके तन पर मानवीय आत्याचारों‌ की अनेक अमानवीय कहानियां अंकित थी।उसका तना कट‌ कर अलग-अलग पड़ा था । शाखाएं अलग ही कटी पड़ी थी,वह धराशाई हो पड़ा था.

जहां उसके चेहरे पर चिंता एवम् विषाद की लकीरें खिंची पड़ी थी वहीं पर और लोक उपकार न कर पाने की  पीड़ा भी उसके हृदय से झांक रही थी, उसका मन मानवीय अत्याचारों से बोझिल था। उसने अपने जीवन के बीते पलों को अपनी स्मृतियों में सहेजते हुए मुझसे कहा। प्राकृतिक प्रकीर्णन द्वारा पक्षियों के उदरस्थ भोजन से बीज रूप में मेंरा  जन्म एक महात्मा की कुटिया के सामने धरती की कोख से हुआ। धरती की कोख में पड़ा गर्मी सर्दी  सहता पड़ा हुआ था,कि सहसा एक दिन काले काले मेघों से पड़ती ठंडी फुहारों से तृप्त हो मेरे उस बीज से नवांकुर निकल पड़े,इस प्रकार मेरा जन्म हुआ, मेरी कोमल लाल लाल नवजात पत्तियों पर महात्मा जी की नजरें पड़ी तो वे मेरे रूप सौन्दर्य पर रीझ उठे, उन्होंने लोककल्याण की भावना से अभिभूत हो अपनी कुटिया के बाहर सामने ‌ही रोप दिया था मेरे बिरवे को  । वे रोज शाम को पूजन वंदन के लिए अमृतमयी गंगाजल लाते, और पूजन के बाद शेष बचे जल से मेरी जड़ों को सींचते तो उस जल की शीतलता से मेरी आत्मा खिलखिला उठती ।

इस तरह मंथर गति से समय चक्र चलता रहा,उसी के साथ मेरी आकृति तथा छाया विस्तार होता रहा,इसी बीच ना जाने कब और कैसे महात्मा जी को मुझसे पुत्रवत स्नेह हो गया, मुझे पता भी न चला,वे कभी मेरी  जड़ों में खाद पानी डाला करते कभी‌ मिट्टी पाट चबूतरा बनाया करते,जब वे परिश्रम करते करते थक कर निढाल हो मेरी छाया के नीचे बैठ विश्राम करते तो मेरी शीतल छांव‌ से उनके मन को अपार शांति मिलती,और मेरी छाया उनकी सारी पीड़ा  सारा थकान ‌हर लेती, उनके चेहरे पर उपजे आत्मसंतुष्टि के भाव देख मैं भी अपने सत्कर्मो के आत्मगौरव के दर्प से भर उठता,मेरा‌ चेहरा चमक उठता, मेरी शाखाएं झुक झुक अपने धर्म पिता के गले में गलबहियां डालने को व्याकुल हो उठती।

गुजरते वक्त के साथ मेरे विकास का क्षेत्र फल बढ़ता गया, मैं जवान  हो गया था, मैंने हरियाली की चादर तान दी थी अपने धर्मपिता की कुटिया के उपर, तथा पूरे प्रांगण को ढक लिया था अपनी शीतल छांव से,मेरी शीतल‌ छाया का आभास धूप में जलते पथिक को होता तथा पके फल खाते पंछियों के कलरव से गूंज उठता कुटिया प्रांगण, उसे सुनकर मेरा चेहरा अपने सत्कर्मो के आत्मगौरव से भर उठता,और उनके चेहरे काआभामंडल देख मेरा मन मयूर नाच उठता।अब उनकी प्रेरणा से मैं भी लोकोपकार की आत्मानुभूति से संतुष्ट था,उन संत के सानिध्य का मेरी मनोवृत्ति पर बड़ा‌ ही गहरा प्रभाव पड़ा था, मेरी जीवन वृत्ति भी लोकोपकारी हो गई थी.

अब औरों के लिए दुख पीड़ा झेलने में ही मुझे सुखानुभूति होने लगी थी । महात्मा जी ने मेरी छाया के नीचे चबूतरे को ही अपनी साधना स्थली बना लिया था, लोगों का आना जाना तथा सत्संग करना महात्मा जी के दैनिक दिनचर्या का अंग बन गया था । मैंने अपने जीवन काल में महात्मा जी की वाणी तथा सत्संग के प्रभाव से अनेकों लोगों की जीवन वृत्ति बदलते हुए देखा,और एक दिन महात्मा जी को जीवन की पूर्णता प्राप्त कर इस नश्वर संसार से  विदा होते देखा,अब मेरी छाया के नीचे बने  चबूतरे को ही महात्मा जी का समाधि स्थल बना दिया गया, तब से अब तक महात्मा जी के साथ बिताए पलों ‌को अपने स्मृतिकोश में सहेजे लोक कल्याण की आश का दीप जलाये धूप जाड़े तथा बर्षा सहते उस समाधि को घनी छाया से आच्छादित किये बरसों से खड़ा था। मैंने कभी किसी का बुरा नहीं चाहा,मैं कभी पक्षियों का आश्रयस्थल बना तो कभी किसी थके हारे पथिक की शरणस्थली। पर हाय ये मेरी तकदीर!ना जाने क्यूं ये मानव  मूझसे रूठा। मुझे नहीं पता, वो तेजधार कुल्हाड़ी से मेरी शाखाएं काटता रहा था,अपना स्वार्थ सिद्ध करता रहा, मैंने उसे कुछ नहीं कहा,बल्कि मौन हो उस दर्द पीड़ा को सहता रहा हूं, परंतु आज इन बेदर्द इंसानों ने सारी हदें पार कर मेरी जड़े काट मुझे मरने पर बिबस कर दिया,क्यो कि उन्होंने ने वहां मंदिर बनाने का निर्णय लिया है,इस क्रम में उन्होंने पहली बलि मेरी ही ली है।

मैंने सोचा कि जब मैं इस दुनिया से दूर जा ही रहा हूं तो क्यो न अपनी राम कहानी तुम्हें सुनाता चलूं,ताकि मेरे मन का मलाल घुटन पीड़ा कम हो जाय तथा सीने पर पड़ा बोझ हल्का हो जाय।मेरा निवेदन है कि मेरी पीड़ा व्यथा तथा दर्द से समाज को अवगत करा देना ताकि यह मानव समाज और बृक्ष न काटे,इस प्रकार प्रकृति पर्यावरण का संरक्षण का संदेश देते हुए उसकी आंखें छलछला उठी,उसकी जुबां खामोश हो गयी, वह मर चुका था,उस वटवृक्ष  की दशा देख मेरा हृदय चीत्कार कर उठा,और मैं उस धराशाही वटवृक्ष  को निहार रहा था अपलक किंकर्तव्यविमूढ़ असहाय होकर।

 

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य – हरवलाय  मित्र माझा.  . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी एक भावप्रवण कविता  “हरवलाय  मित्र माझा.  . ! ,

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विजय साहित्य ☆

☆ हरवलाय  मित्र माझा.  . ! ☆  

 

हरवलाय  मित्र माझा.  . !

त्याचा, …तिचा, . . .

ह्याचा,  … तुमचा …

जसा आहे ना  . . .

अगदी तसाच आहे . . .

जीवाभावाचा

मित्र माझा. पण .. .

सध्या. . . .  हरवलाय. . .

कुणी म्हणतं सोशल झालाय

कुणी म्हणतं लोकल झालाय.

वाॅटस्अप ,फेसबुक, वेबसाईट

दमलोय आता ,शोध घेऊन

कोण जाणे? कुठे बसलाय जाऊन ?

नाही म्हणायला. . . .  संवाद घडतोय

पण.. .

मेसेज मधुनच बोलतोय

ईमेल मधून भेटतो

सारख बदलतो स्टेटस

स्वतः  कधी , समोर येतच नाही

वाद नाही, . . विवाद  नाही

भांडण, तंटा . . काहीच नाही.

नुसता आपला .. . छापील संवाद

हाय,हॅलो, . . कसा आहेस?

गुडमाॅर्नींग .. . गुडनाईट. ..!

मिसिंग की . . मिस् प्लेस

काय झालंय ,? कळत नाही

पण….

हरवलाय मित्र माझा.

जिवंत, हाडामासाचा,संवेदनशील

विचारी, विवेकी संयमी

तर कधी

भांडखोर, चिडखोर. . .

हळवा , प्रेमळ,

अन  भावविभोर. .

समोर दिसताच धावणारा

गळाभेट घेणारा

मन मोकळे करणारा

हरवलाय मित्र माझा.

अरे,  तुमचा मोबाइल

नवीन दिसतोय

त्याच्यात आहे का हो

साॅफ्टवेअर एखादं

फेसबुक वरच अपडेट,

मिडियाच अपलोड

हार्ट वर्क मधे

डाऊनलोड करणारं

त्याची छबी ,छापील संवाद

चेहर्‍यावरचे हावभाव

काळजामधे उतरवणार

मनामनात रूजणारं

आहे का साॅफ्टवेअर एखाद?

या संगणकीय युगात

मशीन नको . . माणूस हवाय

कुठलीही कळ दाबताच

नव्या विश्वात नेणारा.

फक्त चेहरा बघताच

सारं मन वाचून घेणारा.

मनकवडा मित्र माझा

बघताय ना. ? प्लीज. . .

शोधताय ना.. . खरंच. . .

खरच. . .

हरवलाय मित्र माझा. . . !

(श्री विजय यशवंत सातपुते जी के फेसबुक से साभार)

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Happiness Activity: What determines HAPPINESS? ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Happiness Activity: What determines HAPPINESS? ☆ 

Video Link >>>>

Happiness Activity: What determines HAPPINESS?

CAN YOU MAKE YOURSELF LASTINGLY HAPPIER?

This video provides you answers to these questions based on POSITIVE PSYCHOLOGY – the modern Science of Happiness.

According to Positive Psychologists, the enduring level of happiness that you experience is determined by three factors: your biological set point, the conditions of your life, and the voluntary activities you do.

YES!! You can make yourself lastingly happier by practicing Happiness Activities that have been proven to work by Positive Psychologists.

It is worth striving to get the right relationships between yourself and others, between yourself and your work, and between yourself and something larger than yourself. If you get these relationships right, a sense of purpose and meaning will emerge.

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (19) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

 

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्‌यनादी उभावपि ।

विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्‌ ।।19।।

पुरूष प्रकृति दो अनादि है, गुण विकार प्रतिरूप

जान कि सब होते सदा , प्रकृति से ही उद्भूत ।।19।।

 

भावार्थ :  प्रकृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान।।19।।

 

Know  thou  that  Nature  and  Spirit  are  beginningless;  and  know  also  that  all modifications and qualities are born of Nature.।।19।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 33 ☆ लघुकथा – पंख होते तो उड जाते ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप  ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी एक अतिसुन्दर विचारणीय लघुकथा   “ पंख होते तो उड जाते”। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को इस प्रेरणास्पद  अतिसुन्दर शब्दशिल्प से सुसज्जित लघुकथा को सहजता से रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 33☆

☆  लघुकथा – पंख होते तो उड जाते

लॉन के कोने में  आम का एक घना पेड है. एक दिन पेड के बीचोंबीच एक चिडिया की आवाजाही जरा ज्यादा ही दिखी,  मैंने आम की डाल को हटा कर धीरे से देखा – अरे वाह ! चिडिया रानी घोंसला बना रही हैं, मन खुश हो गया. पक्षियों की चहल – पहल पूरे घर में रौनक ला देती है. चिडिया अपनी छोटी सी चोंच में घास – फूस, धागे का टुकडा तो कभी सुतली लेकर आती. धीरे – धीरे घोंसला बन रहा था , मैं चुपचाप जाकर उसकी बुनावट देखती कुछ पत्तों को धागे और  सुतली से ऐसे जोड दिया था मानों किसी इंसान ने सुईं धागे से सिल दिया हो, कैसी कलाकारी है इन पक्षियों में,  कौन सिखाता है इन्हें ये सब. इंसानों की दुनिया में दर्जनों कोचिंग क्लासेस हैं,जो चाहे सीख लो,  पर ये कैसे सीखते हैं ? नजरें आकाश की ओर उठ गईं.

चिडिया ने कब  घोंसला बना लिया और कब उसमें अंडे आ गए मुझे कुछ पता ही न चला.  एक दिन चूँ – चूँ   की मोहक आवाज ने लॉन को गूँजा दिया. चिडिया रानी अब नन्हें- नन्हें चूजों की माँ थी और अपना दायित्व निभा रही थीं. फुर्र से उडकर जाती और नन्हीं सी चोंच में दाने लाकर चूजों के मुँह में डाल देती. ना जाने कितने चक्कर लगाती थी वह. तीनों बच्चे चोंच  खोले चूँ- चूँ, चीं -चीं करते रहते. इनकी  मीठी आवाजों से आम का पेड  गुलजार  था और मेरा मन भी.

चिडिया रानी अब अपने बच्चॉं को उडना सिखाने लगी थी. वह उडकर पेड की एक  डाल पर बैठती और पीछे पीछे बच्चे भी आ बैठते. फिर पेड से उडकर छत की मुंडेर पर बैठने लगी. बच्चे कुछ उडते,  कुछ फुदकते उसके पीछे आ जाते. और फिर एक दिन  चिडिया ने लंबी उडान भरी, बच्चे उडना सीख गए थे, उनके पंखों में जान आ गई थी,  अब उनकी  अलग दिशाएं थीं, अपने रास्ते.  ना चिडिया लौटी, ना बच्चे. आम के पेड पर घोंसला अब भी वैसा ही था  पक्षियों के जीवन की कहानी कहता हुआ,  बच्चों को जन्म दिया, खिलाया, पिलाया, उडना सिखाया और बस. इंसानों की तरह ना अकेलापन, ना बेबसी, ना कोरोना,  ना रोना .

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

 

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English Literature – Weekly column ☆ Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 40 – Realization…. ☆ Ms. Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

(Ms. Neelam Saxena Chandra ji is a well-known author. She has been honoured with many international/national/ regional level awards. We are extremely thankful to Ms. Neelam ji for permitting us to share her excellent poems with our readers. We will be sharing her poems on every Thursday. Ms. Neelam Saxena Chandra ji is  an Additional Divisional Railway Manager, Indian Railways, Pune Division. Her beloved genre is poetry. Today we present her poem Realization…. .  This poem  is from her book “The Frozen Evenings”.)

☆ Weekly column  Poetic World of Ms. Neelam Saxena Chandra # 39 

☆ Realization…. ☆

Time, like wind,

Often uproots you and throws you

Akin to a muddied yellow leaf

On untrodden paths

Making you feel defenceless!

 

You realize

The futility of your existence,

You fathom out slowly

That you are a zilch,

You don’t even know

Where your future is going to take you!

 

In this state of utter helplessness,

One fine day,

The realization dawns

That though the trail

May be of a muddied yellow leaf,

But you are not actually one;

You have the power

To steer your life’s car

With full force and conviction

And take it to a desired destination

With efforts and sincerity!

 

You insert the key,

You blow the horn,

And then march ahead

Like an enlightened Buddha!

 

© Ms. Neelam Saxena Chandra

(All rights reserved. No part of this document may be reproduced or transmitted in any form or by any means, or stored in any retrieval system of any nature without prior written permission of the author.)

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