हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 72 ☆ राजभाषा विशेष – भाषायें  अनुपूरक होती हैंं  ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  राजभाषा माह के अंतर्गत एक विशेष आलेख  भाषायें  अनुपूरक होती हैंं ।  इस विचारणीय समसामयिक आलेख के लिए श्री विवेक रंजन जी  का  हार्दिकआभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 72 ☆

☆ राजभाषा विशेष – भाषायें  अनुपूरक होती हैंं ☆

चरित्र प्रमाण पत्र का अपना महत्व होता है, स्कूल से निकलते समय हमारे  मा

 

 

 

संविधान सभा में देवनागरी में लिखी जाने वाली हिन्दी को राजभाषा का दर्जा दिया गया है. स्वाधीनता आन्दोलन के सहभागी रहे हमारे नेता जिनके प्रयासो से हिन्दी को राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया  आखिर क्यो चाहते थे कि हिन्दी  केन्‍द्र और प्रान्तों के बीच संवाद की भाषा बने? स्पष्ट है कि वे एक लोकतांत्रिक राष्ट्र का सपना देख रहे थे जिसमें जनता की भागीदारी सुनिश्चित करनी थी. उन मनीषियो ने एक ऐसे नागरिक की कल्पना थी जो बौद्धिक दृष्टि से तत्कालीन राजकीय  संपर्क भाषा अंग्रेजी का पिछलग्‍गू नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर हो.  यही स्वराज अर्थात अपने ऊपर अपना ही शासन की अवधारणा की संकल्पना  भी थी.  इस कल्पना में आज भी वही शक्ति है.  इसमें आज भी वही राष्ट्रीयता का आकर्षण है.

आजादी के बाद से आज तक अगर एक नजर डालें तो हमें दिखता है कि भारत की जनसँख्या का एक बड़ा हिस्सा इस बीच हिन्दी, उर्दू, मराठी, गुजराती, कन्नड़, तमिल, तेलगू आदि भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही साक्षर हुआ है. आजादी के समय 100 में 12 लोग साक्षर थे,  आज साक्षरता का स्तर बहुत बढ़ा है.  इस बीच भारत की आबादी भी बहुत अधिक बढ़ी है,अर्थात आज ऐसे लोगों की संख्या बहुत अधिक है जो हिन्दी में पढ़ना-लिखना जानते हैं.

हिन्दी आज ३० से अधिक देशो में ८० करोड़ लोगो की भाषा  है.विश्व हिन्दी सम्मेलन सरकारी रूप से आयोजित होने वाला हिन्दी पर केंद्रित  महत्वपूर्ण आयोजन है.  यह सम्मेलन प्रत्येक तीसरे वर्ष आयोजित किया जाता है। इस वर्ष यह आयोजन मारीशस में आयोजित हो रहा है.वैश्विक स्तर पर भारत की इस प्रमुख भाषा के प्रति जागरुकता पैदा करने, समय-समय पर हिन्दी की विकास यात्रा का मूल्यांकन करने, हिन्दी साहित्य के प्रति सरोकारों को मजबूत करने, लेखक-पाठक का रिश्ता प्रगाढ़ करने व जीवन के विवि‍ध क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 1975 से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की श्रृंखला आरंभ हुई है । हिन्दी को वैश्विक सम्मान दिलाने की  परिकल्पना को पूरा करने की दिशा में विश्वहिन्दी सम्मेलनो की भूमिका निर्विवाद है.

सम्मेलन में विश्व भर से हि्दी अनुरागी भाग लेते हैं. जिनमें गैर हिन्दी मातृ भाषी ‘हिन्दी विद्वान’ भी शामिल होते हैं। 1975 में नागपुर में पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सहयोग से  संपन्न हुआ था,  जिसमें विनोबा जी ने हिन्दी को विश्व स्तर पर प्रतिष्ठित किये जाने हेतु संदेश भेजा था. उसके बाद मॉरीशस, ट्रिनिदाद एवं टोबैको, लंदन, सूरीनाम में ऐसे सम्मेलन हुए।  इनमें से कम से कम चार सम्मेलनों में संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप स्थान दिलाये जाने संबंधी प्रस्ताव पारित भी हुए.

यह सम्मेलन प्रवासी भारतीयों के ‍लिए बेहद भावनात्मक आयोजन होता है. क्योंकि ‍भारत से बाहर रहकर हिन्दी के प्रचार-प्रसार में वे जिस समर्पण और स्नेह से भूमिका निभाते हैं उसकी मान्यता और प्रतिसाद भी उन्हें इसी सम्मेलन में मिलता है. निर्विवाद रूप से देश से बाहर और देश में भी हम सब को एकता के सूत्र में जोड़ने में हिन्दी की व्यापक भूमिका है. अनेक हिन्दी प्रेमियो के द्वारा निजी व्यय व व्यक्तिगत प्रयासो से विश्व हिन्दी सम्मेलन जैसे सरकारी आयोजनो के साथ ही समानान्तर प्रयास भी किये जा रहे हैं.  स्वंयसेवी आधार पर हिंदी-संस्कृति का प्रचार-प्रसार, भाषायी सौहार्द्रता तथा सामूहिक रूप से सांस्कृतिक अध्ययन-पर्यटन सहित एक दूसरे से अपरिचित सृजनरत रचनाकारों के मध्य परस्पर रचनात्मक तादात्म्य के लिए अवसर उपलब्ध कराना भी ऐसे आयोजनो का उद्देश्य है. इस तरह के प्रयास  समर्पित हिन्दी प्रेमियो का एक यज्ञ हैं. विश्व हिन्दी सम्मेलनो की प्रासंगिकता हिन्दी को विश्व  स्तर पर प्रतिष्ठित करने में है.प्रायः ऐसे सम्मेलनो में हिस्सेदारी और सहभागिता प्रश्न चिन्ह के घेरे में रहती है क्योकि लेखक, रचनाकार, साहित्यकार होने के कोई मापदण्ड निर्धारित नही किये जा सकते. सत्ता पर काबिज लोग अपने लोगो को हिन्दी के ऐसे पवित्र यझ्ञ के माध्यम से उपकृत करने से नही चूकते.यही हाल हिन्दी को लेकर सरकारी सम्मानो और पुरस्कारो का भी रहता है. वास्तविक रचनाधर्मी अनेक बार स्वयं को ठगा हुआ महसूस करता है. अस्तु.

शहरों, छोटे कस्बों तथा ग्रामीण क्षेत्रों में भी आज मोबाइल के माध्यम से इन्टरनेट का उपयोग बढ़ता जा रहा है. ऐसे में इस नये संपर्क माध्यम को हिन्दी सक्षम बनाना, हिन्दी में तकनीकी, भाषाई, सांस्कृतिक जानकारियां इंटरनेट पर सुलभ करवाने के व्यापक प्रयास आवश्यक हैं. सरल हिंदी के माध्यम से विद्यार्थियों, शिक्षकों, व्यापारियों एवं जन सामान्य हेतु  व्यापार के नए आयाम खोज रहे हर एक हिंदी भाषी भारतीय का न सिर्फ ज्ञान वर्धन बल्कि एक सफल भविष्य-वर्धन अति आवश्यक है. विकसित एवं विकासशील राष्ट्रों में ऐसे कई उदाहरण हैं जहाँ व्यापारियों ने एक छोटी सी सोच को बड़ा व्यापार बनाया है. भाषा का इसमें बड़ा योगदान रहा है. चिंतन मनन हिन्दी के अनुकरण प्रयोग को बढ़ावा देने, विचारों को जागृत करना ही विश्व हिन्दी सम्मेलनो, हिन्दी दिवस के आयोजनो का मूल उद्देश्य  है.

प्रायः जब भी हिन्दी की बात होती है तो इसे अंग्रेजी से तुलनात्मक रूप से देखते हुये क्षेत्रीय भाषाओ की प्रतिद्वंदी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है. यह धारणा नितांत गलत है. आपने कभी भी हाकी और फुटबाल में, क्रिकेट और लान टेनिस में या किन्ही भी खेलो में परस्पर प्रतिद्वंदिता नही देखी होगी. सारे खेल सदैव परस्पर अनुपूरक होते हैं, वे शारीरिक सौष्ठव के संसाधन होते हैं, ठीक इसी तरह भाषायें अभिव्यक्ति का माध्यम होती हैं, वे संस्कृति की संवाहक होती हैं वे परस्पर अनुपूरक होती हैंं प्रतिद्वंदी तो बिल्कुल नही यह तथ्य हमें समझने और समझाने की आवश्यकता है. इसी उदार समझ से ही हिन्दी को राष्ट्र भाषा का वास्तविक दर्जा मिल सकता है.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 34 ☆ नाले पर ताला ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक अतिसुन्दर रचना “नाले पर ताला”। इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 34 – नाले पर ताला ☆

बरसाती उफान आते ही नालों की पूछ परख बढ़ जाती है। तेज बारिश में सड़कें  अपना अस्तित्व मिटा नाले में समाहित होकर, नाले के पानी को घर  तक पहुँचा देतीं हैं। सच कहूँ तो अच्छी बारिश होने का मतलब है, शहर का जलमग्न होना। जितना बड़ा शहर उतनी ही बड़ी उसके जलमग्न होने की खबर।

पहली बारिश में ही जन जीवन अस्त- व्यस्त हो, नगर निगम द्वारा किये गए; सफाई के कार्यों की पोल खोल कर रख देता है। सड़क पर चल रहे वाहन वहीं थम जाते हैं। और तो और सड़कों पर नाव चलने की खबरें भी टीवी पर दिखाई जाती है। इतने खर्चे से नालों का निर्माण होता है। सफाई होती है, शहर का विकास व  सारे घर नगर निगम की अनुमति से ही बनते हैं, फिर भी जल निकासी की सुचारू व्यवस्था नहीं दिखती।

कारण साफ है कि सबको अपनी – अपनी जेब भरने से फुर्सत मिले तब तो सारे कार्यों को करें। नालों की चौड़ाई अतिक्रमण का शिकार हो रही है,और गहराई कचरे का। बहुत से लोग इसे डस्टबीन की तरह प्रयोग कर सारा कचरा इसमें ही फेंकते हैं।

जब हल्ला मचता है, तो नेता जी सहित नगर निगम के कर्मचारी आकर सर्वे करते हैं, और मुआवजा देने की बात कह कर आगे बढ़ जाते हैं। आनन- फानन में सभी लोग अपने नुकसान की पूर्ति हेतु, आधार कार्ड व बैंक पासबुक की फ़ोटो कापी जमा कर देते हैं।

वर्ष में तीन- चार बार तो बाढ़ पीड़ितों की चर्चा; अखबारों की सुर्खियाँ बनतीं हैं। सचित्र,लोगों के दुख दर्द, का व्योरा प्रकाशित होता है। नालों पर बनें हुए घर, दुकान व अन्य अतिक्रमण की भी फोटो छपती है। लोगों को जमीन की इतनी भूख होती है, कि वे जल निकासी कैसे होगी इसका भी ध्यान नहीं देते। जहाँ जी चाहा वैसा बदलाव अपने आशियानें में कर देते हैं। नाला तो मानो सबकी बपौती है, इस पर  कोई दुकान, कोई अपनी बाउंडरी बाल या कुछ नहीं तो सब्जियाँ ही उगाने लगता है। ऐसा लगता है, कि सारे कार्य इसी जमीन पर होने हैं।

सारे लोग जागते ही तभी हैं, जब आपदा सिर पर सवार हो जाती है, कुछ दिन रोना- धोना करके, पुनः अपने ढर्रे पा आ जाते हैं।

खैर डूबने – उतराने  का खेल तो इसी तरह चलता ही रहेगा, आखिरकार यही तो सबसे बड़ा गवाह बनता है, कि इस शहर में, प्रदेश में,  सूखा नहीं रहा है। जम कर बारिश हुई है, जिससे फसल भरपूर होगी। और हर किसान मुस्कायेगा।

 

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन# 64 – हाइबन – तोरणद्वार ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है एक हाइबन   “तोरणद्वार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी के हाइबन  # 64 ☆

☆ तोरणद्वार ☆

खोर ग्राम स्थित बिरला सीमेंट फैक्ट्री तहसील-जावद, जिला- नीमच के पास0 ग्रेनाइट पत्थर पर नक्काशीदार यह तोरणद्वार का एक महत्वपूर्ण स्थान है। इसका महत्व देखते हुए इसे पुरातत्व महत्व का स्थान घोषित किया गया है । मगर इस तरुणद्वार पर स्थापित शिलालेख पर 11वीं शताब्दी के संग्रहणीय इमारत का उल्लेख मिलता है।

सीमेंट फैक्ट्री के नजदीक स्थित्व यह खूबसूरत स्थान नक्काशीदार नंदी और तोरणस्तंभ की बारीक कारीगरी देखने लायक है । अरावली श्रंखला के नजदीक बसे इस स्थान के बारे में कहा जाता है कि प्राचीन समय में यहां से चित्तौड़गढ़ किले तक जमीन में एक गुप्त रास्ता जाता था । इस रास्ते  से होकर राजा महाराजा, जासूस और उनकी सेनाएं गुप्त रूप से आतीजाती थी।

नीमच से चित्तौड़ या उदयपुर रास्ते में जाते समय राजस्थान सीमा से 8 किलोमीटर उत्तर में स्थित यह स्थान और बिरला फैक्ट्री के नजदीक स्थित है।  जहां पर यत्रतत्र नक्काशीदार पत्थर बिखरे पड़े हैं जो किसी विशेष कहानी को अपनी भाषा में बयान करते नजर आते हैं।

तोरणद्वार~

सेल्फी लेते फिसली

नवब्याहता।

~~~~~~~~~~~

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

21-08-20

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 41 ☆ संकल्प मन में ठान ले ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक नवगीत  “संकल्प मन में ठान ले .)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 41 ☆

☆ संकल्प मन में ठान ले  ☆ 

 

जिंदगी हर पल परीक्षा ले रही है मान ले।

आत्मा तो अंश है भगवान का यह जान ले।।

 

यह जरूरी है नहीं  मिल जाए सब आसानी से।

लक्ष्य पाने के लिए संकल्प मन में ठान ले।।

 

चाहता है, तू अगर जीना खुशी के साथ में।

वक्त कुछ अपने लिए भी कीमती पहचान ले।।

 

दुःख देता है न कोई और ना  ही सुख तुम्हें।

कर्म का प्रतिफल सुनिश्चित है यही संज्ञान ले।।

 

शोर कोलाहल अहम अभिमान भटकाता सदा।

मुक्ति पाना है अगर तो मुक्ति के अरमान ले।।

 

मिट नहीं सकती कभी हस्ती अगर प्रभु साथ हैं।

चक्र सो जा छोड़ चिंता और चादर तान ले।।

 

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पाऊले चालती चालती ☆ श्रीमती सुधा भोगले

☆ कवितेचा उत्सव ☆ पाऊले चालती चालती ☆ श्रीमती सुधा भोगले ☆ 

 

पाऊले चालती चालती अध्यात्माची वाट

साधकाच्या मानसात चैतन्याची झाली पहाट || ध्रु ||

पूज्य गुरूंनी लावला सत्संगाचा लळा

इथे येतो दिव्यत्वाचा प्रत्ययही वेगळा || १ ||

फुलती इथे हरीभक्तिचे हिरवागार मळे

 गुरुच्या सहवासाने जीवा-शिवाची भेट कळे || २ ||

प्रभूचरणाशी समर्पणाने अहंकार लोपला

कैवल्याचे दर्शन होता आत्मा पावन झाला || ३ ||

अध्यात्माच्या वाटेवरचा गिरविला ओनामा

ब्रम्हपदी पोहचू आम्ही कां मोक्ष धामा || ४ ||

पाऊले चालती चालती अध्यात्माची वाट

साधकाच्या मानसात चैतन्याची झाली पहाट || ध्रु ||

© श्रीमती सुधा भोगले 

९७६४५३९३४९ / ९३०९८९८९१९

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ आजीचे डोळे ☆ डाॅ. मेधा फणसळकर

डाॅ. मेधा फणसळकर

☆ जीवनरंग ☆ आजीचे डोळे ☆ डाॅ. मेधा फणसळकर ☆ 

“धनू, तुला माहितीये, आज आपला चाफा कसा बहरला आहे तो? हिरव्या पानांमधून डोकावणारा तो पिवळा गुलाम कसा घमघमाट पसरवतो आहे बघ! आणि गुलाबी रंगाची ही बोगनवेल आपल्या घरावर हात-पाय ताणून मस्त पहुडली आहे.  ज्याच्यावर तू उभी आहेस ना ती मऊ हिरवळ बघ, कशी आपल्या पोपटी हातांनी तुला गुदगुल्या करतीये. आपल्या घराला कसला रंग दिला आहे माहितीये? आकाशासारखा निळा- आकाशी!” दादूचा हात पकडून धनू घरभर फिरत होती आणि दादू तिला उत्साहाने सगळे दाखवत होता.

आठ दिवसांपूर्वीच जन्मांध असणाऱ्या धनूला नवीन डोळे बसवले होते. देवाघरी जाताना तिच्याच आजीने तिच्यासाठी दान केलेले! इतके दिवस फक्त काळा अंधारच समोर असणारी धनू आजीच्या डोळ्यांनी सप्तरंगांची उधळण बघताना हरखून गेली होती.

 

©  डाॅ. मेधा फणसळकर

9423019961

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ जन्मकुंडली आणि विवाहयोग ☆ श्री उद्धव भयवाळ

श्री उद्धव भयवाळ

☆ विविधा ☆ जन्मकुंडली आणि विवाहयोग ☆ श्री उद्धव भयवाळ  ☆ 

ज्योतिषशास्त्राचा अभ्यासक या नात्याने “जन्मकुंडली आणि विवाहयोग” यासंबंधीची माहिती मी खाली देत आहे.

कोणत्याही युवा व्यक्तीच्या जीवनात विवाहसंस्कार हा सर्व संस्कारात श्रेष्ठ आणि आवश्यक असतो. वैवाहिक जीवनाची सफलता पतीपत्नीच्या एकमेकांवरील विश्वासावर आणि वचनबद्धतेवर अवलंबून असते. प्रत्येकाला आपले वैवाहिक जीवन सुखी, समाधानी, समृद्ध आणि सफल असावेसे वाटते आणि त्यात गैर काहीच नाही. भावी जोडीदारासोबत आपले वैवाहिक जीवन कसे असेल याची प्रत्येकाने विवाहापूर्वीच दोघांच्या कुंडलीद्वारे माहिती करून घेतली तर वैवाहिक जीवन नक्कीच सफल होईल. आजच्या आधुनिक तंत्रज्ञानाच्या युगातसुद्धा ज्योतिषशास्त्राकडे दुर्लक्ष करून चालणार नाही. याद्वारे व्यक्तीच्या सुखद, सुसंस्कृत आणि सफल वैवाहिक जीवनाच्या शक्यतांचे आकलन होते. जेणेकरून भावी जीवनाविषयीचा अंदाज बांधता येतो.

खरे तर ज्योतिषीय दृष्टीकोनाचा अंगीकार करूनच आपल्या वैवाहिक जीवनात प्रेम, सौहार्द, संस्कार आणि संवेदनशीलता निर्माण होण्याची आशा आपण करू शकतो.

प्रत्येक व्यक्तीच्या जीवनास प्रभावित करणाऱ्या  ग्रहांची दिशा आणि दशा यावरूनच विवाहयोग जुळून येतील किंवा नाही हे समजू शकते. जन्म तिथि, जन्म वेळ आणि जन्म स्थान यावर आधारित कुंडलीचे गुणमेलन करूनच वैवाहिक जीवनातील सफलतेविषयी माहिती मिळते.

पुष्कळदा असे पहावयास मिळते की, एखादी मुलगी सर्वगुणसंपन्न असूनसुद्धा तिचा विवाह जमण्यात खूप अडथळे येतात किंवा विवाहास विलंब होतो किंवा अनुरूप जीवनसाथी मिळत नाही. काही लोक तर असे पहावयास मिळतात की त्यांच्या करिअरमध्ये ते खूप यशस्वी असले तरी वैवाहिक जीवनात मात्र असफल होतात किंवा त्याच्या जीवनात लवकरच वैवाहिक संबंध तोडण्याची वेळ येते. पुष्कळदा करीअरच्या बाबतीत यशोशिखरावर पोचलेल्या लोकांनासुद्धा अविवाहित राहण्याची पाळी येते.  अशा वेळी वैदिक ज्योतिषानुसार बनलेल्या कुंडलीतील सकारात्मक प्रभाव असणाऱ्या ग्रहांची गतिशीलता ओळखून नकारात्मक प्रभाव असणाऱ्या ग्रहांचा दोष दूर करणे भाग पडते.

ज्योतिष शास्त्रानुसार उत्तमविवाहयोगासाठी कुंडलीच्या दुसऱ्या, पाचव्या, सातव्या, आठव्या आणि बाराव्या घरातील ग्रहांच्या स्थितीवर ध्यान द्यावे लागते. यामध्ये विशेषत: मंगळ, शनी, सूर्य, राहू आणि  केतु या ग्रहांच्या स्थितीचा अभ्यास करावा लागतो. या आधारावरच विवाहासाठीची योग्य वेळ ठरवणे सोपे जाते. कारण विवाहाचे योग तर पंचांगात अनेकदा दिसतात. पण प्रत्यक्ष विवाह केव्हा होईल हे पाहणे महत्त्वाचे असते. पुरुषासाठी विवाहाचा कारक ग्रह शुक्र आहे तर स्त्रीसाठी गुरू हा कारक ग्रह आहे. हे कारक ग्रहच दुसऱ्या ग्रहांच्या प्रभावाखाली येऊन विवाहासाठी अनुकूल किंवा प्रतिकूल स्थिती निर्माण करतात.

स्त्रीच्या कुंडलीतील आठवे स्थान तिच्या भाग्याचे निदर्शक आहे तर स्त्री आणि पुरुष या दोघांच्या कुंडलीतील बारावे स्थान सुखद वैवाहिक जीवनाचे अर्थात यौनसंबंधाचे निदर्शक आहे. यानुसारच पतीपत्नीच्या मनात एकमेकांविषयीचे आकर्षण निर्माण करणारी भावना जागृत होते.

कुणीही व्यक्ती स्वत:च्या कुंडलीतील सातव्या स्थानावरील ग्रहस्थिती पाहून आपला आयुष्याचा जोडीदार कसा असेल आणि आपले वैवाहिक जीवन कसे राहिल याचा अंदाज घेऊ शकते. सातव्या स्थानाचा कारक ग्रह शुक्र आहे. पण या स्थानात शनि बलवान असेल आणि गुरू कमजोर असेल तर उत्तम विवाहयोगसुद्धा प्रभावित होऊन अनिष्ट फळे मिळू शकतात. सातव्या स्थानात रवी असल्यास घटस्फोटाची स्थिती निर्माण होऊ शकते. जर सातव्या स्थानात मंगळ असेल तर मांगलिक योग बनतो. मंगळाची कुंडली किंवा मांगलिक योग म्हणजे काय तर कुंडलीमधील प्रथम स्थानी, चतुर्थ स्थानी, सप्तम स्थानी, अष्टम स्थानी किंवा द्वादश स्थानी म्हणजेच बाराव्या घरात मंगळ असल्यास तो मंगळ सदोष असतो आणि ती मंगळाची कुंडली समजली जाते. या स्थानातील मंगळामुळे विवाहास विलंब होणे, वैवाहिक जीवनात जोडीदारासोबत कलह किंवा घटस्फोट होण्याइतकी स्थिती बिघडणे असे प्रकार घडू शकतात. ज्या व्यक्तीची कुंडली मंगळाची आहे, त्या व्यक्तीचा विवाह साधारणपणे वयाच्या २७, २९, ३१, ३३, ३५ किंवा ३७ व्या वर्षी होण्याची शक्यता असते.

पण कुंडलीत प्रथमदर्शनी सदोष दिसणारा मंगळ विशिष्ट ग्रहस्थितीमध्ये निर्बली होतो आणि ती कुंडली मंगळाची गणली जात नाही. हेसुद्धा लक्षपूर्वक पाहणे जरुरीचे ठरते. मंगळाची कुंडली असलेल्या व्यक्तीस मांगलिक योग असलेलाच जोडीदार पाहिजे असे मात्र नाही. जोडीदाराच्या कुंडलीत सदोष मंगळ नसला तरी विशिष्ट ग्रहस्थिती असेल तर ती कुंडली मंगळाच्या कुंडलीशी जमते. याव्यतिरिक्त सातव्या स्थानावर बुध निर्बली होऊन जातो. पती आणि पत्नी या दोघांच्या कुंडलीत सातव्या स्थानी जर राहू किंवा केतू असेल तर विवाहानंतर वर्षभरातच घटस्फोटासारखी स्थिती उत्पन्न होते. सातव्या स्थानातील राहूच्या उपस्थितीमुळे जीवनसाथीपासून विभक्त होण्याची इच्छा किंवा विरक्तीचे भाव निर्माण होतात आणि दोघांमधील दुरावा वाढत जातो. त्याचप्रमाणे तिथे केतू असल्यास पतीपत्नी आयुष्यभर अलग अलग राहण्यासाठी विवश होतात. अशा स्थितीमध्ये दोघांमधील वैचारिक मतभेदही खूप वाढत जातात. वास्तविक काही धार्मिक विधी करून अनिष्ट ग्रहांची तीव्रता कमी करण्यासाठी उपाय योजता येतात हेही तेवढेच खरे.

कुंडलीमध्ये सातव्या स्थानाचा स्वामी जर सातव्या स्थानातच असेल तर अशी व्यक्ती सफल वैवाहिक जीवन व्यतीत करते. त्या व्यक्तीच्या उन्नतीमध्ये कुठलीही बाधा येत नाही. तसेच पतीपत्नीचे संबंध अगदी मधुर बनलेले असतात. याचप्रकारे कुंडलीतील सातव्या घरात जर शुक्र असेल तर अशा व्यक्तीच्या विवाहाचा योग लवकर येतो.

विवाहास विलंब होण्याचे मुख्य कारण म्हणजे कुंडलीत मंगळ षष्ठस्थानी असणे. विवाहासाठी गुणमेलन करण्याआधी स्त्रीच्या कुंडलीत गुरू आणि पुरुषाच्या कुंडलीत रवि यांची स्थिती पाहणे गरजेचे आहे. याशिवाय सुखी आणि समृद्ध वैवाहिक जीवनाचे विश्लेषण करण्यासाठी चतुर्थ स्थानाचे अध्ययन केले जाते. अर्थात विवाहाचा संपूर्ण निर्णय हा कुंडलीतील सातव्या स्थानाव्यतिरिक्त चौथ्या, पाचव्या आणि अकराव्या स्थानातील ग्रहांच्या स्थितीवर घेतला जातो.

© श्री उद्धव भयवाळ

१९, शांतीनाथ हाऊसिंग सोसायटी, गादिया विहार रोड, शहानूरवाडी, औरंगाबाद -४३१००९

मोबाईल: ८८८८९२५४८८ / ९४२११९४८५९

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ सावली  ☆ श्री तुकाराम दादा पाटील 

श्री तुकाराम दादा पाटील

☆ विविधा ☆ सावली  ☆ श्री तुकाराम दादा पाटील ☆ 

सावली शब्द जिव्हाळ्याचा मायेचा, ममतेचा. मनाला सुखावणारा. आपुलकीन जवळ घेणारा. आधार देणारा. आत्मियतेचा. त्याच्या उच्चारानेच काळीज पाघळून जातं. सगळ्याना सलगीचा वाटतो तो. पण….

सावलीच अस्तित्व मात्र परावलंबी. जोवर प्रकाश आहे तोवरच तिची संगतसोबत. प्रकाश संपलाकी ती कुठे गायब होते कळत नाही. कोण करत तिला लंपास.कुठे होते गडप. मनाच हे कोडं काही सूटतच नही.

ऊन्हात ती हवी हवीशी वाटते. पायात घुटमळते. पाठसोडत नाही. माणसान माणसाची सावली सारखी सोबत करावी अस म्हणतात.

खर आहे ते? पण मग अंधारात ती सोबत सोडून जाते कुठं आणि का? तिचं परावलंबीत्व हेच एकमेव कारण असाव. मग महत्व प्रकाशाच की सावलीच. हा ही एक प्रश्न. निरूत्तरीत. किती विश्वास असतो सावलीवर माणसाचा प्रकाश असताना. तिच्याच आधारान मिळते श्रमिकाना विश्रांती. पण प्रकाशाच वेड घेवून धावणारांचा ती गतीरोधक होते. थांब. घे विश्रांती म्हणते. का करते ती आस? खरतर प्रकाशाच तिच अतूट नात. पण दोघांची तोंड विरूद्ध दिशेला. प्रकाश पूर्वेला तेंव्हा ही पश्चिमेला. प्रकाश माथ्यावर तेव्हा ही पायातळी. प्रकाश पश्चिमे ला ही पूर्व गामिनी. प्रकाश संपला की ही गायब. गंमतच आहे मोठी!

थोडा विचार केला. आणखी एक यक्ष प्रश्न समोर उभा. ती सावली. तो प्रकाश. परस्पराना आकर्षित करणारी ही दोन टोक. इथे ही परस्पर विरूद्ध का. या दोन विभिन्न लिंगानी तर विश्व निर्माणाच काम केलय. एकत्र येवून संसार थाटला. उच्च कोटीचे संस्कार निर्माण केले. पुढच्या पिढ्यातून ते संक्रमित केले. समृद्धी वाढवली. त्या सोबत आली सुखलोलूपता. हे झाल ते एकरूपतेन.  मग या दोघातच हा विरोध का. विरोध तर कुठं टोकाचा आहे. बघा ना  दोघेही एकाच वेळी निघून जातात.माणसाला तिमिराच्या डोहात लोटून. त्या वेळी ते दोघे कोठे असतात बर. घ्या. पुन्हा एक नवाप्रश्न. आपण विचार करत जाऊ तितक बधिर होत जाऊ.परमेश्वरान जे निर्माण केलय ते शिरोधार्य मानू आणि गप्प  बसू. नाहीतर दुसर काय करू शकतो आपण?

ठेविले अनंते तैसेची रहावे. पण प्रकाश आणि सावली दोन्ही ही हवीतच आपल्याला. प्रगतिला आणि  विश्रांतीला.

 

©  श्री तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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अध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – सप्तदशोऽध्याय: अध्याय (25) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

अध्याय १७

(आहार, यज्ञ, तप और दान के पृथक-पृथक भेद)

(ॐ तत्सत्‌के प्रयोग की व्याख्या)

तदित्यनभिसन्दाय फलं यज्ञतपःक्रियाः।

दानक्रियाश्चविविधाः क्रियन्ते मोक्षकाङ्क्षिभिः।।25।।

मोक्ष कांक्षी जन सभी ‘‘तत‘‘ का करते उपयोग

यज्ञ, क्रिया, तप आदि कर, तजते हैं सब भोग ।।25।।

 

भावार्थ :  तत्‌अर्थात्‌’तत्‌’ नाम से कहे जाने वाले परमात्मा का ही यह सब है- इस भाव से फल को न चाहकर नाना प्रकार के यज्ञ, तपरूप क्रियाएँ तथा दानरूप क्रियाएँ कल्याण की इच्छा वाले पुरुषों द्वारा की जाती हैं।।25।।

Uttering Tat, without aiming at the fruits, are the acts of sacrifice and austerity and the various acts of gift performed by the seekers of liberation.।।25।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १, शिला कुंज, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

vivek1959@yahoo.co.in मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # 63 – आशाओं के द्वार खुलेंगे .. ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(अग्रज  एवं वरिष्ठ साहित्यकार  श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी  जीवन से जुड़ी घटनाओं और स्मृतियों को इतनी सहजता से  लिख देते हैं कि ऐसा लगता ही नहीं है कि हम उनका साहित्य पढ़ रहे हैं। अपितु यह लगता है कि सब कुछ चलचित्र की भांति देख सुन रहे हैं।  आप प्रत्येक बुधवार को श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’जी की रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज के साप्ताहिक स्तम्भ  “तन्मय साहित्य ”  में  प्रस्तुत है आपकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण रचना आशाओं के द्वार खुलेंगे…… । )

☆  साप्ताहिक स्तम्भ – तन्मय साहित्य  # 63 ☆

☆ आशाओं के द्वार खुलेंगे ….  ☆  

 

सिकुड़े सिमटे पेट

पड़े रोटी के लाले

दुर्बल देह मलीन

पैर में अनगिन छाले

मन में है उम्मीद

कभी कुछ तो बदलेगा

इस बीहड़ में कब तक खुद को रहे संभाले।।

 

सूरज के संग उठें

रात तक करें मजूरी

घर आकर सुस्ताते

बीड़ी जलाते सोचें,

क्यों रहती है भूख

हमारी रोज अधूरी,

कौन छीन लेता है अपने हक के रोज निवाले।।

 

अखबारों में

अंतिम व्यक्ति की तस्वीरें

बहलाते मंसूबे

स्वप्न मनभावन लगते

और देखता फिर

हाथों की घिसी लकीरें

क्या अपनी काली रातों में होंगे कभी उजाले।।

 

अपना मन बहलाव

एक लोटा अरु थाली

इन्हें बजा जब

पेट पकड़कर गीत सुनाते

बहती मिश्रित धार

बजे सुख-दुख की ताली।

आशाओं के द्वार खुलेंगे, कब बंधुआ ताले।।

 

रोज रात में

पड़े पड़े गिनते हैं तारे

जितना घना अंधेरा

उतनी चमक तेज है

क्या मावस के बाद

पुनम के योग हमारे

बदलेंगे कब ये दिन और छटेंगे बादल काले।।

 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश

मो. 9893266014

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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