हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ नुक्कड़ नाटक – जल है तो कल है – 4 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ नुक्कड़ नाटक – जल है तो कल है – 4 ☆

(प्रसिद्ध पत्रिका ‘नवनीत ‘के जून 2020 के अंक में श्री संजय भारद्वाज जी के नुक्कड़ नाटक जल है तो कल है का प्रकाशन इस नाटक के विषय वस्तु की गंभीरता प्रदर्शित करता है। ई- अभिव्यक्ति ऐसे मानवीय दृष्टिकोण के अभियान को आगे बढ़ाने के लिए कटिबद्ध है। हम इस लम्बे नाटक को कुछ श्रृंखलाओं में प्रकाशित कर रहे हैं। आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया इसकी विषय वस्तु को गंभीरता से आत्मसात करें ।)

(लगभग 10 पात्रों का समूह। समूह के प्रतिभागी अलग-अलग समय, अलग-अलग भूमिकाएँ निभाएंगे। इन्हें क्रमांक 1,  क्रमांक 2 और इसी क्रम में आगे संबोधित किया गया है। सुविधा की दृष्टि से 1, 2, 3… लिखा है।)

जल है तो कल है – भाग 4 से आगे …

समवेत- बहता पानी रुकने लगा…सड़ने लगा… मछलियाँ और जलचर मरने लगे…आदमी का जीवन थमने लगा…दूषित जल से आदमी बीमार पड़ने लगा।

(कुछ पात्रों द्वारा समवेत वाक्यों को मूक अभिनय द्वारा दर्शाया जाएगा।)

3- तन की बीमारी जल्दी ठीक हो सकती है, मन के इलाज में समय लगता है।

4- लालच और लापरवाही के रोगी आदमी ने अमूल्य पानी का मूल्य समझा ही नहीं।

5- पानी प्राकृतिक संसाधन है, इसे तैयार नहीं किया जा सकता।

6- इसे रिसाइकिल करना होता है।

7- जल के स्रोतों को रिचार्ज करना होता है।

8- धरती का तीन-चौथाई हिस्सा पानी से घिरा है।

9- पर उपलब्ध पानी का केवल एक प्रतिशत उपयोग के योग्य है।

10- इस एक प्रतिशत पर मनुष्य के अलावा वनस्पति, पशु, सिंचाई, उद्योग भी निर्भर हैं।

1- बारिश के माध्यम से प्रकृति का उपहार देती है।

2-पानी का समुचित संरक्षण हम नहीं कर पाते।

3- पानी का समुचित संचयन हम नहीं कर पाते।

4- बारिश का अधिकांश पानी नदी, नालों से होकर खारे समुद्र में जा मिलता है।

5- अच्छी बरसात के लिए चाहिए पहाड़ और जंगल।

6- आदमी ने काट दिए जंगल।

7- बादल रुकना बंद हो गए।

8- आदमी ने पाट दिए पहाड़।

9- बादल बरसना बंद हो गए।

10- आदमी ने सुखा डाले ताल तलैया।

1- बादल भी सूख गया भैया।

2- आदमी की लापरवाही बढ़ती गई।

3- बरसात लगातार घटती गई।

 

समवेत- आदमी ने काट दिए जंगल…बादल रुकना बंद हो गए…आदमी ने पाट दिए पहाड़… बादल बरसना बंद हो गए…आदमी ने सुखा डाले ताल तलैया…बादल भी सूख गया भैया …आदमी की लापरवाही बढ़ती गई… बरसात लगातार घटती गई…।

(समवेत वाक्यों पर कुछ पात्रों द्वारा मूक अभिनय किया जाएगा।)

4- घरों में पाइपलाइन से आने लगा पानी।

5- पानी के प्राकृतिक स्रोत उपेक्षा के शिकार हो चले।

6- जनसंख्या का विस्फोट बढ़ता गया।

7- भूजल का स्तर घटता गया।

8- कभी चक्र बनाया है..?

9- एक भी बिंदु ना हो तो चक खंडित हो जाता है।

10- आदमी ने जगह-जगह खंडित कर दिया जलचक्र।

समवेत- एक भी बिंदु ना हो तो चक्र खंडित हो जाता है…आदमी ने जगह-जगह खंडित कर दिया जलचक्र।

(उपरोक्त वाक्यों को कुछ पात्र मूक अभिनय से दर्शाएँगे।)

समवेत-

घटता जल, संकट में आज-संकट में कल। घटता जल, संकट में आज-संकट में कल।

10- याद रहे, जल है तो कल है।

समवेत- जल है तो कल है…जल है तो कल है।

क्रमशः  —— 5

(यह नुक्कड़ नाटक संकल्पना, शब्द, कथ्य, शैली और समग्र रूप में संजय भारद्वाज का मौलिक सृजन है। इस पर संजय भारद्वाज का सर्वाधिकार है। समग्र/आंशिक/ छोटे से छोटे भाग के प्रकाशन/ पुनर्प्रकाशन/किसी शब्द/ वाक्य/कथन या शैली में परिवर्तन, संकल्पना या शैली की नकल, नाटक के मंचन, किसी भी स्वरूप में अभिव्यक्ति के लिए नाटककार की लिखित अनुमति अनिवार्य है।)

(नोट– घनन घनन घिर घिर आए बदरा,  गीत श्री जावेद अख्तर ने लिखा है।) 

©  संजय भारद्वाज, पुणे
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 
मोबाइल– 9890122603

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English Literature – Poetry ☆ The Ultimate Truth… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(We are extremely thankful to Captain Pravin Raghuvanshi Ji for sharing his literary and artworks with e-abhivyakti.  An alumnus of IIM Ahmedabad, Capt. Pravin has served the country at national as well international level in various fronts. Presently, working as Senior Advisor, C-DAC in Artificial Intelligence and HPC Group; and involved in various national-level projects.

Today, we present a poetry depicting the ultimate truth of life, written by Captain Pravin Raghuwanshi ji in loving memory of his mother. Yes, it is true the ultimate destination of all human beings is Panchtatva that connotes the five elements i.e. Ether (Akash), Wind (Vayu), Fire (Agni), Water (Jal) and Earth (Prithvi).  We are emotionally with Captain Pravin Raghuwanshi ji at this moment of grief by praying almighty that may his mother’s  soul rest in peace. 

☆  The Ultimate Truth… ☆

(We dedicate today’s issue of e-abhivyakti in honour of respected mother Late Durga Singh Raghuvanshi ji.)

 

In midst of crowd of

Some royal paths

Some golden lanes,

Few roads of luxurious opulence

Many avenues of extravagance,’

Numerous gleaming pathways of possessions,

There remains a solitary

narrow dusty track

As a sentinel of aspirations of soil

Keeping alive the potential of

grass to grow, again and again

I’ve always listened to my heart

Each time, at every crossroad

I chose the dusty trail…

 

O’ laughers of my lonely journey!

O’ choosers of luxurious paths!

One day, you’ll have to return to me

Like bird flying high returning

to earth, to perch in its nest…

No matter, however high you fly,

No matter, however much you amass…

 

No matter, however much you

indulge in limitless luxuries,

Mingling of your perishable body in the mother earth,

And, the grass abode being your final shelter

Is the ultimate truth…!

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 11 ☆ मुक्तिका/हिंदी ग़ज़ल ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी मुक्तिका/हिंदी ग़ज़ल

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 11 ☆ 

☆ मुक्तिका/हिंदी ग़ज़ल☆ 

 

किस सा किस्सा?, कहे कहानी

गल्प- गप्प हँस कर मनमानी

 

कथ्य कथा है जी भर बाँचो

सुन, कह, समझे बुद्धि सयानी

 

बोध करा दे सत्य-असत का

बोध-कथा जो कहती नानी

 

देते पर उपदेश, न करते

आप आचरण पंडित-ज्ञानी

 

लाल बुझक्कड़ बूझ, न बूझें

कभी पहेली, पर ज़िद ठानी

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिन्दी साहित्य ☆ एक अनोखे व्यक्तित्व की स्वामिनी… परम पूज्यनीय माता जी स्वर्गीय दुर्गा सिंह रघुवंशी ☆

☆ एक अनोखे व्यक्तित्व की स्वामिनी… ☆

(आज का अंक  ई – अभिव्यक्ति परिवार के परम आदरणीय सदस्य वरिष्ठ साहित्यकार एवं हिंदी, संस्कृत, अंग्रेजी एवं उर्दू के विद्वान अग्रज कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी की परम पूज्यनीय माता जी स्वर्गीय  दुर्गा सिंह पत्नी स्व० डा० शिवमूरत सिंह जी निवासिनी ग्राम व पोस्ट कैथी वाराणसी को समर्पित है।) 

आज हमारे बीच नहीं रही वह मातृत्व सत्ता जो हमें हर बार मिलने पर ममतामयी स्नेह के बंधन में बांधती नजर आती थी।

जिनके हृदय में दुखी तथा पीड़ित जनों के लिए अपार स्नेह, सेवा भाव, तथा अपने दरवाजे पर हर आगंतुकों के लिए आतिथ्य धर्म का निर्वहन ही जिनकी दैनिक दिनचर्या का अंग थी।

उम्रदराज होने पर भी उमंग तथा उत्साह की प्रतिमूर्ति थी, जिनके भीतर नेतृत्व क्षमता कूट-कूट कर भरी थी दुबले-पतले शरीर पर  भी उम्र का प्रभाव अथवा आलस्य का नामोनिशान नहीं, समय के प्रति पाबंदी, सब मिलाकर एक ऐसी शख्सियत की संरचना जो लोगों को संम्मोहित कर देती थी।

उनका हम लोगों के बीच से अचानक चले जाना जहां हम सभी को अचंभित कर गया, वहीं परिवार जनों  को हतप्रभ, तथा स्तब्ध कर देने वाला रहा, हम जब कभी  भी उस राह से गुजरेंगे तब  कदाचित हमारे नेत्र उन्हें अवश्य ढूंढेंगे।

वे हमारी स्मृति पर हमेशा विराजमान रहेंगी, जाते जाते वे  अपने पीछे एक भरा पूरा परिवार छोड़ गई है जिसमें पुत्र नवीन सिंह,आईएफएस,  पुत्र कैप्टन प्रवीण सिंह रघुवंशी, NM, भारतीय नौसेना तथा पुत्रियाँ पुत्र वधुएं समेत परिवार जनों की लंबी श्रृंखला जो उनके सुखी पारिवारिक जीवन की कहानी कहती हैं।  आपने गीता तथा रामायण के भाष्य को अपने दैनिक आचरण में जिया था।

हम ऐसे व्यक्तित्व की स्वामिनी दुर्गा मइया को शत् शत् नमन अश्रुपूरित श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए ईश्वर से कामना करते  कि पंचतत्व में विलीन मरणधर्मा पुण्य शरीरा  की  मृतक आत्मा को शांति प्रदान करें तथा परिवार जनों को दुख सहने की असीम शक्ति दे।।।

सादर नमन। अश्रुपूर्ण  विनम्र श्रद्धांजलि ।

ॐ शांतिः शांतिः शांतिः !!

 

श्री सूबेदार पाण्डेय, वाराणसी,   हेमन्त बावनकर, पुणे एवं समस्त ई -अभिव्यक्ति साहित्यिक  परिवार

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हिंदी साहित्य – फिल्म/रंगमंच ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग के कलाकार # 7 – दादा साहब फाल्के….1 ☆ श्री सुरेश पटवा

सुरेश पटवा 

 

 

 

 

 

((श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं।  अभी हाल ही में नोशन प्रेस द्वारा आपकी पुस्तक नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास)  प्रकाशित हुई है। इसके पूर्व आपकी तीन पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी एवं पंचमढ़ी की कहानी को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है।  आजकल वे  हिंदी फिल्मों के स्वर्णिम युग  की फिल्मों एवं कलाकारों पर शोधपूर्ण पुस्तक लिख रहे हैं जो निश्चित ही भविष्य में एक महत्वपूर्ण दस्तावेज साबित होगा। हमारे आग्रह पर उन्होंने  साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्मोंके स्वर्णिम युग के कलाकार  के माध्यम से उन कलाकारों की जानकारी हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा  करना स्वीकार किया है  जो आज भी सिनेमा के रुपहले परदे पर हमारा मनोरंजन कर रहे हैं । आज प्रस्तुत है  हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : दादा साहब फाल्के….1 पर आलेख ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – हिंदी फिल्म के स्वर्णिम युग के कलाकार # 7 ☆ 

☆ हिंदी फ़िल्मों के स्वर्णयुग के अभिनेता : दादा साहब फाल्के….1 ☆ 

धुंडिराज गोविन्द फाल्के उपाख्य दादासाहब फाल्के (30 अप्रेल 1870-16 फ़रवरी 1944) वह महापुरुष हैं जिन्हें भारतीय फिल्म उद्योग का ‘पितामह’ कहा जाता है। वे प्रथम पीढ़ी के फिल्म निर्देशक, निर्माता, पटकथा लेखक थे।

दादासाहब फाल्के का पूरा नाम धुंडीराज गोविन्द फाल्के है, उनका जन्म महाराष्ट्र के नाशिक शहर से लगभग 25 किमी की दूरी पर स्थित ज्योतिर्लिंग की नगरी त्र्यंबकेश्वर में हुआ था। इनके पिता गोविंद सदाशिव फड़के मुम्बई के एलफिंस्तन कालेज में संस्कृत के प्रकांड पंडित और प्राध्यापक थे। इस कारण दादासाहब की शिक्षा-दीक्षा मुम्बई में ही हुई लेकिन हिंदू शास्त्रों की शिक्षा उन्हें त्र्यंबकेश्वर मंदिर में मिली थी  जिसका प्रभाव पौराणिक फ़िल्मों के निर्माण में परिलक्षित हुआ। उन्होंने ईस्टर के अवसर पर ‘ईसामसीह’ पर बनी एक फिल्म “The Life of Christ” देखी जिसे फ़्रांस के ऐलिस गाई-ब्लचे ने बनाई थी। फिल्म देखने के दौरान ही फाल्के ने निर्णय कर लिया कि उनकी जिंदगी का मकसद फिल्मकार बनाना है। उन्हें लगा कि रामायण-महाभारत जैसे महाकाव्यों और पुराणों से फिल्मों के लिए अच्छी कहानियां मिलेंगी।

चलचित्र देखते समय दादासाहब के मस्तिष्क में प्रभु कृष्ण, राम, समर्थ गुरु रामदास, शिवाजी, संत तुकाराम इत्यादि महान विभूतियाँ छा रही थीं। उन्होंने सोचा कि चलचित्र के माध्यम से भारतीय महान विभूतियों के चरित्र को क्यों न चित्रित किया जाए। उन्होंने इस चलचित्र को कई बार देखा और फिर क्या, उनके हृदय में चलचित्र-निर्माण का अंकुर फूट पड़ा। उनके पास सभी तरह का हुनर था। वह नए-नए प्रयोग करते थे। अतः प्रशिक्षण का लाभ उठाकर और अपनी स्वभावगत प्रकृति के अनुरूप वे प्रथम भारतीय चलचित्र बनाने का असंभव कार्य करनेवाले पहले व्यक्ति बने।

दादा साहब फाल्के, सर जे. जे. स्कूल ऑफ आर्ट से 1885 में प्रशिक्षित सृजनशील कलाकार थे। वह मंच के अनुभवी अभिनेता और शौकिया जादूगर थे। कला भवन बड़ौदा से फोटोग्राफी का एक पाठ्यक्रम भी किया था। उन्होंने फोटो केमिकल प्रिंटिंग की प्रक्रिया में भी प्रयोग किये थे। वे 1886 में बड़े भाई शिवराम पंत के साथ महाराजा सयाजी राव गायकवाड़ कला भवन से पेंटिंग कोर्स करने बड़ौदा चले गए। वहीं से प्रिंटिंग, फ़ोटग्राफ़िक तकनीक और स्टूडीओ आर्किटेक्चर का कोर्स करके 1893 में बम्बई वापस पहुँच गए।

वे 1893 में मुंबई तो आ गए लेकिन जीविका का साधन नहीं जमा तो 1895 में गोधरा में फ़ोटो स्टूडीओ खोला वहाँ कारोबार नहीं जमा और 1900 में प्लेग महामारी में उन्होंने पत्नी और बच्चे को खो दिया। उन्होंने किर्लोसकर नाटक मंडली की माल्किन गिरिजा देवी से दूसरा विवाह किया और विवाह उपरांत उनका नाम सरस्वती रखा गया। 1901 में उन्होंने एक जर्मन से जादूगरी ट्रिक सीखकर रोज़ी कमाने लगे साथ में प्रिंटिंग और पर्दों का कारोबार किया। 1903 में सर्वे आफ इंडिया में नौकर हो  गए। 1906 में त्यागपत्र देकर लोनावाला में  फाल्के एंग्रेविंग एंड प्रिंटिंग वर्क्स नाम से आर.जी. भण्डारकर की साझेदारी से प्रिंटिंग प्रेस डाला। साझेदारी में झगड़े के कारण प्रिंटिंग प्रेस बंद हो  गई तो पुनः बम्बई का रुख़ किया।

उस समय इनकी उम्र 40 वर्ष की थी कारोबार में हुई हानि से उनका स्वभाव चिड़िचड़ा हो गया था।

उन्होंने 5 पौंड में एक सस्ता कैमरा खरीदा और शहर के सभी सिनेमाघरों में जाकर फिल्मों का अध्ययन और विश्लेषण किया। फिर दिन में 20 घंटे लगकर प्रयोग किये। ऐसे उन्माद से काम करने का प्रभाव उनकी सेहत पर पड़ा। उनकी एक आंख जाती रही। उस समय उनकी पत्नी सरस्वती बाई ने उनका साथ दिया। सामाजिक निष्कासन और सामाजिक गुस्से को चुनौती देते हुए उन्होंने अपने जेवर गिरवी रख दिये, 40 साल बाद यही काम सत्यजित राय की पत्नी ने उनकी पहली फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ बनाने के लिए किया था। अपनी पत्नी की जीवन बीमा पॉलिसी गिरवी रखकर, ऊंची ब्याज दर पर ऋण प्राप्त किया। उनके मित्र ही उनके पहले आलोचक थे। अतः अपनी कार्यकुशलता को सिद्ध करने के लिए उन्होंने एक बर्तन में मटर बोई। फिर इसके बढ़ने की प्रक्रिया को एक समय में कई फ्रेम खींचकर साधारण कैमरे से उतारा। इसके लिए उन्होंने टाइमैप्स फोटोग्राफी की तकनीक इस्तेमाल की। फ़िल्म को “अंकुर ची बाढ़” नाम से आसपास के लोगों को दिखायी। नारायण राव देवहारे नामक व्यक्ति फ़िल्म के लिए धन लगाने को तैयार हो गया।

उनमें चलचित्र-निर्माण की ललक इतनी बढ़ गई कि उन्होंने चलचित्र-निर्माण संबंधी कई पत्र-पत्रिकाओं का अध्ययन किया और कैमरा लेकर चित्र खींचना भी शुरु कर दिया। जब दादासाहब ने चलचित्र-निर्माण में अपना ठोस कदम रखा तो इन्हें बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जैसे-तैसे कुछ पैसों की व्यवस्था कर चलचित्र-निर्माण संबंधी उपकरणों को खरीदने के लिए दादासाहब लंदन पहुँचे। वे वहाँ बाइस्कोप सिने साप्ताहिक के संपादक की मदद से कुछ चलचित्र-निर्माण संबंधी उपकरण खरीदे और  वापस मुम्बई आ गए। उन्होने दादर में अपना स्टूडियो बनाया और फालके फिल्म के नाम से अपनी संस्था स्थापित की। वे फ़िल्म निर्माण की पूरी प्रक्रिया समझने हेतु फरवरी 1912 में, फिल्म प्रोडक्शन में एक क्रैश-कोर्स करने के लिए इंग्लैण्ड गए और एक सप्ताह तक सेसिल हेपवर्थ के अधीन काम सीखा। कैबाउर्न ने विलियमसन कैमरा, एक फिल्म परफोरेटर, प्रोसेसिंग और प्रिंटिंग मशीन जैसे यंत्रों तथा कच्चा माल का चुनाव करने में उनकी मदद की तब जाकर 1913 में उनके अनथक प्रयासों से भारत की पहली फ़िल्म ‘राजा हरिशचंद्र’ बनी।  चूंकि उस दौर में उनके सामने कोई और मानक नहीं थे, अतः सब कामचलाऊ व्यवस्था उन्हें स्वयं करनी पड़ी। अभिनय करना सिखाना पड़ा, दृश्य  व संवाद लिखने पड़े, फोटोग्राफी करनी पड़ी और फिल्म प्रोजेक्शन के काम भी करने पड़े। महिला कलाकार उपलब्ध न होने के कारण वेश्या चरित्र को छोड़कर उनकी सभी नायिकाएं पुरुष कलाकार थे। इस चलचित्र (फिल्म) के निर्माता, लेखक, इत्यादि सबकुछ दादासाहब ही थे। इस फिल्म में काम करने के लिए कोई स्त्री तैयार नहीं हुई अतः लाचार होकर तारामती की भूमिका के लिए एक पुरुष पात्र ही चुना गया। उन्होंने खुद स्क्रिप्ट लिखी और कलाकारों के लिए इंदूप्रकाश अख़बार में कलाकारों हेतु विज्ञापन दिया। दत्तात्रेय दामोदर दाबके ने राजा हरीशचंद्र, अन्ना सालुंखे ने तारामती और फाल्के के भतीजे ने रोहिताश्व की भूमिका निभाई। कैमरामैन त्र्यम्बक बी तेलंग थे।

 

© श्री सुरेश पटवा

भोपाल, मध्य प्रदेश

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 14 ☆ गुलाबी ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है उनकी एक  भावप्रवण कविता “गुलाबी“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 14 ☆

☆ गुलाबी

 

गुलाबी चेह-यावरी गुलाबी, छटा दिसते मज अशी

अंबरातुनी फुले बरसली, तुझ्या तनुवर जशी

 

हि-यातुनी किरणे फाकावी, तसे तुझे ते स्मीत

त्या किरणांनी प्रीत बहरली, जगावेगळी रीत

 

तुझ्या तनुची झाक गुलाबी,ओठांची तव फाक गुलाबी

श्वासासोबत अवतीभवती, सुगंधही दरवळे

 

फूलपाकळ्या अशा विखुरल्या, जणू फूलपाखरे

साडीवर तव येऊनी बसल्या, खोटे की हे खरे

 

मनातला हा गुलाब आता, विसावला बघ तिथे

मृदू कठोरचा संगम होई ,गुलाबी गाभा जिथे

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विडंबन कविता – दिवस ‘सेल’चे ☆ सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। कई पुरस्कारों/अलंकारों से पुरस्कृत/अलंकृत सुश्री मीनाक्षी सरदेसाई जी का जीवन परिचय उनके ही शब्दों में – “नियतकालिके, मासिके यामध्ये कथा, ललित, कविता, बालसाहित्य  प्रकाशित. आकाशवाणीमध्ये कथाकथन, नभोनाट्ये , बालनाट्ये सादर. मराठी प्रकाशित साहित्य – कथा संग्रह — ५, ललित — ७, कादंबरी – २. बालसाहित्य – कथा संग्रह – १६,  नाटिका – २, कादंबरी – ३, कविता संग्रह – २, अनुवाद- हिंदी चार पुस्तकांचे मराठी अनुवाद. पुरस्कार/सन्मान – राज्यपुरस्कारासह एकूण अकरा पुरस्कार.)

आज प्रस्तुत है वरिष्ठ कवी स्व ग ह पाटील जी की उत्कृष्ट कविता लेझीम पर आधारित आपकी एक विडंबन कविता – दिवस ‘सेल’चे हम भविष्य में भी आपकी सुन्दर रचनाओं की अपेक्षा करते हैं।

 

☆ लेझीम ☆

(जुने श्रेष्ठ, कवी  कै. ग.ह. पाटील यांची उत्कृष्ट कविता.)

दिवस  सुगीचे  सुरू जाहले।

ओला चारा बैल माजले।

शेतकरी मन प्रसन्न झाले

खळखळ, छुमछुम,डुमडुम, पटडुम

लेझिम  चाले जोरात ।।

 

☆ विडंबन कविता— दिवस ‘सेल’चे ☆

 

दिवस सेलचे सुरु जाहले ।

जिकडेतिकडे बोर्ड झळकले ।

बायांचे मन प्रसन्न झाले ।

पटकन, झटकन, भर्कन, सर्कन

विक्री होतसे  जोरात  ।।

न ऊ  वाजता शटर उघडती

गाद्यागिरद्या  स्वच्छ करती

सुंदर साड्या बाहेर टांगती

इकडून, तिकडून, नटून, थटून

सेल्स गर्ल्स  येती  झोकात  ।।

नाश्ता, सैपाक, धुंदीत उर्कून

‘त्या’च्या कडुनी रक्कम उकळून

फोन वरुनी  मैत्रीणी  जमवून

भरभर,तरतर, लवकर, गरगर

फिरति सख्या बाजारात  ।।

इथे  ‘हकोबा ‘तिथे ‘बांधणी’

गर्भ रेशमी किंवा ‘चिकणी’

साड्यांची राणी हि पैठणी

सुळुसुळु,झुळुझुळु, हळूहळू, भुळभुळु

ढीग संपतो तासात  ।।

विटकी,फाटकी  कुठे कुठे

घरि आल्यानंतर कळते ।

कपाट जरि भरभरुन वाहते ।

भुलवी,झुलवी, खुळावतो हा

सेल अखेरी महागात  ।।

© मीनाक्षी सरदेसाई

‘अनुबंध’, कृष्णा हास्पिटलजवळ, पत्रकार नगर, सांगली.४१६४१६.

मोबाईल  नंबर   9561582372

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Happiness Activity: Creating your happiness ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ Happiness Activity: Creating your happiness ☆ 

Video Link >>>>

Happiness Activity: Creating your happiness

THIS EXERCISE WILL HELP YOU INCREASE JOY, HAPPINESS AND LIFE SATISFACTION

What determines happiness?

50% of our happiness is determined by genetically determined set point. 10% depends on our life circumstances. The remaining 40% is under our voluntary control – how we think and what we do.

The real keys to happiness:

Positive emotion, Engagement, Relationships, Meaning and Accomplishment.

Positive emotion:

Positive emotion can be about the past, the present, or the future. The positive emotions about the future include optimism, hope, faith and trust. Those about the present include joy, ecstasy, calm, zest, ebullience, pleasure, and (most importantly) flow; these emotions are what most people usually mean when they casually – but much too narrowly – talk about “happiness”. The positive emotions about the past include satisfaction, contentment, fulfilment, pride, and serenity.

These three senses of emotion are different and are not tightly linked. It is possible to be proud and satisfied about the past, but to be sour in the present and pessimistic about the future. It is desirable to be happy in all the three senses – satisfaction about the past, optimism about the future and happiness in the future. You can move your emotions in a positive direction by learning about the three kinds of happiness (past, present, future).

CREATING YOUR HAPPINESS

HAPPINESS ACTIVITY: THE GRATITUDE VISIT

POSITIVE PSYCHOLOGY EXERCISES THAT WORK

The Gratitude Visit exercise:

Close your eyes. Call up the face of one important person from your past who has made a major positive difference in your life and to whom you have never fully expressed your thanks. Got a face?

Write a testimonial just long enough to cover one laminated page. Take your time composing this.

Invite that person to your home, or travel to that person’s home. It is important that you do this face to face, not just in writing or on the phone. Do not tell the person the purpose of the visit in advance; a simple “I just want to see you” will suffice.

When all settles down, read your testimonial slowly, with expression, and with eye contact. Then let the other person react unhurriedly. Reminisce together about the concrete events that make this person so important to you.

Dr Martin Seligman/ AUTHENTIC HAPPINESS

CULTIVATE AN ATTITUDE OF GRATITUDE TO BE HAPPIER IN LIFE

Gratitude can make your life happier and more satisfying. This exercise helps you increase joy, happiness and life satisfaction.

Sonja Lyubomirsky, author of The How of Happiness, says that the expression of gratitude is a kind of meta strategy for achieving happiness. Grateful thinking promotes the savouring of positive life experiences. Gratitude can help people cope with stress and trauma. It helps build social bonds. The practice of gratitude is incompatible with negative emotions and may actually diminish or deter such feelings as anger, bitterness and greed.

Cultivate an attitude of gratitude to be happier in life!

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (21) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌ ।

कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ।।21।।

प्रकृति से उपजे गुणों का ,करता पुरूष है भोग

यही गुणों के संग से , जनम-मरण का रोग ।।21।।

भावार्थ :  प्रकृति में (प्रकृति शब्द का अर्थ गीता अध्याय 7 श्लोक 14 में कही हुई भगवान की त्रिगुणमयी माया समझना चाहिए) स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है। (सत्त्वगुण के संग से देवयोनि में एवं रजोगुण के संग से मनुष्य योनि में और तमो गुण के संग से पशु आदि नीच योनियों में जन्म होता है।)॥21॥

 

The soul seated in Nature experiences the qualities born of Nature; attachment to the qualities is the cause of his birth in good and evil wombs.।।21।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ पर्यावरण दिवस विशेष – धरती प्यारी मां ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं।  साप्ताहिक स्तम्भ  “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक  साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। पर्यावरण दिवस के अवसर पर आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की एक रचना  धरती प्यारी मां।  यह डॉ मुक्ता जी के  पर्यावरण के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण कविता के लिए सादर नमन।  कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें। )     

☆ पर्यावरण दिवस विशेष – धरती प्यारी मां

 

धरती हमारी स्वर्ग से सुंदर

नव-निधियों की खान मां

सहनशीलता का पाठ पढ़ाती

मिलजुल कर रहना सिखाती मां

अपरिमित सौंदर्य का सागर

अन्नपूर्णा, हमारी प्यारी मां

जन्मदात्री,सबका बोझ उठाती

पल-पल दुलराती,सहलाती मां

विपत्ति की घड़ी में धैर्य बंधाती

प्यार से सीने से लगाती मां

कैसे बयान करूं उसकी महिमा

शब्दों का मैं अभाव पाती मां

मानव की बढ़ती लिप्सा देख

रात भर वह आंसू बहाती मां

सरेआम शील-हरण के हादसे

उसके अंतर्मन को कचोटते मां

अपहरण, फ़िरौती के किस्से

मर्म को भेदते,आहत करते मां

पाप,अनाचार बढ़ रहा बेतहाशा

विद्रोह करना चाहती घायल मां

मत लो उस के धैर्य की परीक्षा

सृष्टि को हिलाकर रख देगी मां

 

आओ! वृक्ष लगा कर धरा को

स्वच्छ बनाएं,हरित-क्रांति लाएं

प्लास्टिक का हम त्याग करें

स्वदेशी को जीवन में अपनाएं

जल बिन नहीं जीवन संभव

बूंद-बूंद बचाने की मुहिम चलाएं

वायु-प्रदूषण बना सांसों का दुश्मन

नदियों का जल भी विषैला हुआ

प्रकृति का आराधन-पूजन करें

सर्वेभवंतु सुखीनाम् के गीत गाएं

 

पर्यावरण की रक्षा हित हम सब

मानसिक प्रदूषण को भगाएं मां

दुष्प्रवृत्तियां स्वत: मिट जाएंगी

ज़िंदगी को उत्सव-सम मनाएं मां

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

22.4.20….4.30 p.m

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