हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच – #49 ☆ देह से हूँ ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।

श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली  कड़ी । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # देह से हूँ ☆

समय के प्रवाह के साथ एक प्रश्न मनुष्य के लिए यक्षप्रश्न बन चुका है। यह प्रश्न पूछता है कि जीवन कैसे जिएँ?

इस प्रश्न का अपना-अपना उत्तर पाने का  प्रयास हरेक ने किया। जीवन सापेक्ष है, अत: किसी भी उत्तर को पूरी तरह खारिज़ नहीं किया जा सकता। तथापि एक सत्य यह भी है कि अधिकांश उत्तर भौतिकता तजने या उससे बचने का आह्वान करते दीख पड़ते हैं।

मंथन और विवेचन यहीं से आरम्भ होता है।   स्मार्टफोन या कम्प्युटर के प्रोसेसर में बहुत सारे इनबिल्ट प्रोग्राम्स होते हैं। यह इनबिल्ट उस सिस्टम का प्राण है।  विकृति, प्रकृति और संस्कृति मनुष्य में इसी तरह इनबिल्ट होती हैं। जीवन इनबिल्ट से दूर भागने के लिए नहीं, इनबिल्ट का उपयोग कर सार्थक जीने के लिए है।

मनुष्य पंचेंद्रियों का दास है। इस कथन का दूसरा आयाम है कि मनुष्य पंचेंद्रियों का स्वामी है। मनुष्य पंचतत्व से उपजा है, मनुष्य पंचेंद्रियों के माध्यम से जीवनरस ग्रहण करता है। भ्रमर और रसपान की शृंखला टूटेगी तो जगत का चक्र परिवर्तित हो जाएगा, संभव है कि खंडित हो जाए। कर्म से, श्रम से पलायन किसी प्रश्न का उत्तर नहीं होता। गृहस्थ आश्रम भी उत्तर पाने का एक तपोपथ है। साधु होना अपवाद है, असाधु रहना परम्परा। सब साधु होने लगे तो असाधु होना अपवाद हो जाएगा। तब अपवाद पूजा जाने लगेगा, जीवन उसके इर्द-गिर्द अपना स्थान बनाने लगेगा।

एक कथा सुनाता हूँ। नगरवासियों ने तय किया कि सभी वेश्याओं को नगर से निकाल बाहर किया जाए। निर्णय पर अमल हुआ। वरांगनाओं को जंगल में स्थित एक खंडहर में छोड़ दिया गया। कुछ वर्ष बाद नगर खंडहर हो गया जबकि खंडहर के इर्द-गिर्द नया नगर बस गया।

समाज किसी वर्गविशेष से नहीं बनता। हर वर्ग घटक है समाज का। हर वर्ग अनिवार्य है समाज के लिए। हर वर्ग के बीच संतुलन भी अनिवार्य है समाज के विकास के लिए। इसी भाँति संसार में देह धारण की है तो हर तरह की भौतिकता, काम, क्रोध, लोभ, मोह, सब अंतर्भूत हैं। परिवार और अपने भविष्य के लिए भौतिक साधन जुटाना कर्म है और अनिवार्य कर्तव्य भी।

जुटाने के साथ देने की वृत्ति भी विकसित हो जाए तो भौतिकता भी परमार्थ का कारण और कारक बन सकती है। मनुष्य अपने ‘स्व’ के दायरे में मनुष्यता को ले आए तो  स्वार्थ विस्तार पाकर परमार्थ हो जाता है।

इस तरह का कर्मनिष्ठ परमार्थ, जीवनरस को ग्रहण करता है। जगत के चक्र को हृष्ट-पुष्ट करता है। सृष्टि से सृष्टि को ग्रहण करता है, सृष्टि को सृष्टि ही लौटाता है। सांसारिक प्रपंचों का पारमार्थिक कर्तव्यनिर्वहन उसे प्रश्न के सबसे सटीक उत्तर के निकट ले आता है।

प्रपंच में परमार्थ, असार में सार, संसार में भवसार देख पाना उत्कर्ष है। देह इसका साधन है किंतु देह साध्य नहीं है। गर्भवती के लिए कहा जाता है कि वह उम्मीद से है। मनुष्य को अपने आप से निरंतर कहना चाहिए, ‘देह से हूँ पर देह मात्र नहीं हूँ। ‘ विदेह तो कोई बिरला ही हो सकेगा पर  स्वयं को  देह मात्र मानने को नकार देना, अस्तित्व के बोध का शंखनाद है। इस शंखनाद के कर्ता, कर्म और क्रिया तुम स्वयं हो।

#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

©  संजय भारद्वाज

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 9 ☆ मुक्तिका ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  आपकी भावप्रवण  “ मुक्तिका”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # 9 ☆ 

☆ मुक्तिका ☆ 

 

शब्द पानी हो गए

हो कहानी खो गए

 

आपसे जिस पल मिले

रातरानी हो गए

 

अश्रु आ रूमाल में

प्रिय निशानी हो गए

 

लाल चूनर ओढ़कर

क्या भवानी हो गए?

 

नाम के नाते सभी

अब जबानी हो गए

 

गाँव खुद बेमौत मर

राजधानी हो गए

 

हुए जुमले, वायदे

पानी पानी हो गए

 

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विशाखा की नज़र से # 35 – जरूरत और आदत ☆ श्रीमति विशाखा मुलमुले

श्रीमति विशाखा मुलमुले 

(श्रीमती  विशाखा मुलमुले जी  हिंदी साहित्य  की कविता, गीत एवं लघुकथा विधा की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी रचनाएँ कई प्रतिष्ठित पत्रिकाओं/ई-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती  रहती हैं.  आपकी कविताओं का पंजाबी एवं मराठी में भी अनुवाद हो चुका है। आज प्रस्तुत है  एक भावप्रवण रचना  ‘जरूरत और आदत  । आप प्रत्येक रविवार को श्रीमती विशाखा मुलमुले जी की रचनाएँ  “साप्ताहिक स्तम्भ – विशाखा की नज़र से” में  पढ़  सकते हैं । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # 35 – विशाखा की नज़र से

☆  जरूरत और आदत  ☆

 

हम हरे नही

फिर भी प्रकाशपुंज हमारी जरूरत

एक दूजे की आँखों की चमक

थी हमारी आदत …

 

हम प्यासे तो पानी हमारी जरूरत

पर प्यार में प्यासा बने रहना

थी हमारी आदत ….

 

हम चाहे उलझे , बिखरें , टूटे

हवाओं की सरसरी हमारी जरूरत

संग प्राणों का आयाम साधना

थी हमारी आदत …

 

जलता रहा लोभ , ईर्ष्या , जलन

का अग्निकुंड चहुँओर

जिसकी तपिश की नहीं हमें जरूरत

हम में अहम को भस्म करना

थी हमारी आदत …

 

जरूरतें व्योम सी

थक जाती हैं आँखें तक – तक

समेटे अपने पंखों को

घोसलें में बसर करना

थी हमारी आदत ….

 

© विशाखा मुलमुले  

पुणे, महाराष्ट्र

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English Literature – Poetry ☆ Anonymous litterateur of Social Media# 8 ☆ गुमनाम साहित्यकारों की कालजयी रचनाओं का भावानुवाद ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

(हम कैप्टन प्रवीण रघुवंशी जी द्वारा ई-अभिव्यक्ति के साथ उनकी साहित्यिक और कला कृतियों को साझा करने के लिए उनके बेहद आभारी हैं। आईआईएम अहमदाबाद के पूर्व छात्र कैप्टन प्रवीण जी ने विभिन्न मोर्चों पर अंतरराष्ट्रीय स्तर एवं राष्ट्रीय स्तर पर देश की सेवा की है। वर्तमान में सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार के रूप में कार्यरत हैं साथ ही विभिन्न राष्ट्र स्तरीय परियोजनाओं में शामिल हैं।

स्मरणीय हो कि विगत 9-11 जनवरी  2020 को  आयोजित अंतरराष्ट्रीय  हिंदी सम्मलेन,नई दिल्ली  में  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी  को  “भाषा और अनुवाद पर केंद्रित सत्र “की अध्यक्षता  का अवसर भी प्राप्त हुआ। यह सम्मलेन इंद्रप्रस्थ महिला महाविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम तथा कोलंबिया विश्वविद्यालय, हिंदी उर्दू भाषा के कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित  किया गया था। इस  सम्बन्ध में आप विस्तार से निम्न लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं :

हिंदी साहित्य – आलेख ☆ अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन ☆ कैप्टन प्रवीण रघुवंशी, एन एम्

☆ Anonymous Litterateur of Social Media # 8/सोशल मीडिया के गुमनाम साहित्यकार # 8 ☆ 

आज सोशल मीडिया गुमनाम साहित्यकारों के अतिसुन्दर साहित्य से भरा हुआ है। प्रतिदिन हमें अपने व्हाट्सप्प / फेसबुक / ट्विटर / यूअर कोट्स / इंस्टाग्राम आदि पर हमारे मित्र न जाने कितने गुमनाम साहित्यकारों के साहित्य की विभिन्न विधाओं की ख़ूबसूरत रचनाएँ साझा करते हैं। कई  रचनाओं के साथ मूल साहित्यकार का नाम होता है और अक्सर अधिकतर रचनाओं के साथ में उनके मूल साहित्यकार का नाम ही नहीं होता। कुछ साहित्यकार ऐसी रचनाओं को अपने नाम से प्रकाशित करते हैं जो कि उन साहित्यकारों के श्रम एवं कार्य के साथ अन्याय है। हम ऐसे साहित्यकारों  के श्रम एवं कार्य का सम्मान करते हैं और उनके कार्य को उनका नाम देना चाहते हैं।

सी-डैक के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और एचपीसी ग्रुप में वरिष्ठ सलाहकार तथा हिंदी, संस्कृत, उर्दू एवं अंग्रेजी भाषाओँ में प्रवीण  कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने  ऐसे अनाम साहित्यकारों की  असंख्य रचनाओं  का कठिन परिश्रम कर अंग्रेजी भावानुवाद  किया है। यह एक विशद शोध कार्य है  जिसमें उन्होंने अपनी पूरी ऊर्जा लगा दी है। 

इन्हें हम अपने पाठकों से साझा करने का प्रयास कर रहे हैं । उन्होंने पाठकों एवं उन अनाम साहित्यकारों से अनुरोध किया है कि कृपया सामने आएं और ऐसे अनाम रचनाकारों की रचनाओं को उनका अपना नाम दें। 

कैप्टन  प्रवीण रघुवंशी जी ने भगीरथ परिश्रम किया है और इसके लिए उन्हें साधुवाद। वे इस अनुष्ठान का श्रेय  वे अपने फौजी मित्रों को दे रहे हैं।  जहाँ नौसेना मैडल से सम्मानित कैप्टन प्रवीण रघुवंशी सूत्रधार हैं, वहीं कर्नल हर्ष वर्धन शर्मा, कर्नल अखिल साह, कर्नल दिलीप शर्मा और कर्नल जयंत खड़लीकर के योगदान से यह अनुष्ठान अंकुरित व पल्लवित हो रहा है। ये सभी हमारे देश के तीनों सेनाध्यक्षों के कोर्स मेट हैं। जो ना सिर्फ देश के प्रति समर्पित हैं अपितु स्वयं में उच्च कोटि के लेखक व कवि भी हैं। वे स्वान्तः सुखाय लेखन तो करते ही हैं और साथ में रचनायें भी साझा करते हैं।

☆ गुमनाम साहित्यकार की कालजयी  रचनाओं का अंग्रेजी भावानुवाद ☆

(अनाम साहित्यकारों  के शेर / शायरियां / मुक्तकों का अंग्रेजी भावानुवाद)

 

कौन कहता है कि

दिल सिर्फ सीने में होता है…

तुमको लिखूँ तो

मेरी उँगलियाँ भी धड़कती हैं…

 

 Who says that

 Heart is in chest only

 My fingers also throb

 When I write to you…!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

गर यूँही घर में बैठा रहा

मार डालेगी तनहाइयाँ…

चल चलें मैखाने में जरा

ये फ़ना दिल बहल जायेगा…

 

If I keep staying at home like this

The aloofness is going to  kill me

O’ dear  let’s  just  go to the bar…

This dying heart will come alive!

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

इक किस्सा अधूरे इश्क़ का

आज भी है दरम्यान तेरे मेरे…

हैं मौजूद साहिलों की रेत पे

पैरों के कुछ निशान तेरे मेरे…

 

A tale of inconclusive love still

exists between us, even today…

Few of our footprints are still

Present on the sand of shores…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

मरता तो कोई नही

किसी के प्यार में…

बस यादें कत्ल करती

रहती है किश्तों-किश्तों में…

 

Nobody ever dies in

someone’s  love…

In installments just the

Memories  keep killing you…

❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃ ❃

 

© Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  अन्नदाता किसान ☆ – श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”

श्री सूबेदार पाण्डेय “आत्मानंद”


(आज आपके “साप्ताहिक स्तम्भ -आत्मानंद  साहित्य “ में प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना  –  अन्नदाता किसान 

 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आत्मानंद साहित्य –  अन्नदाता किसान ☆

 

मै‌ किसान ‌अन्नदाता हूं,  देश का भाग्यविधाता हूं।

अपने कठिन परिश्रम से,  मै सबकी भूख मिटाता हूं

 

वर्षा, सर्दी,‌ गर्मी सहकर, सब्जी फल फूल उगाता हूं।

पर लूट‌खसोट के‌ चलते,  मैं भूखा ही‌ सो‌ जाता हूं ।

 

कभी आपदा के चलते, हम सब के सपने चूर  हुए।

कर्जे महंगाई के चलते,  हम मरने पर मजबूर हुए।

 

मेरी मेहनत  का फल , हर समय बिचौलिया खाता है ।

सरकारी ‌राहत का ‌धन, घपलेबाज की जेब में जाता है।

 

बेटी की‌ शादी पढ़ाई की चिंता, हम को खाये जाती‌ है।

रातें आंखों में ही कटती है, नींद न हमको आ पाती है।

 

अपने छप्पर में मैं बैठा, खाली कोठारों को तकता हूं ।

हाथों की लकीरें देख देख, अपनी क़िस्मत पढता‌ हूं ।

 

अंधेरी काली रातों में उठ ,खाली बर्तन टटोलता मैं।

कर्जे खर्चे के पन्ने,  बार बार खोलता पढ़ता हूं मैं।

 

आशा और निराशा ‌से, जब दिल मेरा घबराता है ।

भूतकाल भविष्य बन‌कर, मुझको रोज डराता है।

 

उम्मीदों के दामन में, बस रंगीन नजारे दिखते हैं ।

इन अंधियारी रातों में, बस चांद सितारे दिखते हैं ।

अब सूनी-सूनी आंखों से, उम्मीद की राहें तकता हूं।

खेत की मेढ़ पर बैठा हूं, पगला दीवाना दिखता हूं।

 

मैं नील‌कंठ बन बैठ गया, पीकर‌ के‌ विष का प्याला ।

अपनी व्यथा‌ कहें किससे, है कौन उसे सुनने वाला ।

 

© सुबेदार पांडेय “आत्मानंद”

संपर्क – ग्राम जमसार, सिंधोरा बाज़ार, वाराणसी – 221208

मोबा—6387407266

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मराठी साहित्य – कविता ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या # 12 ☆ स्वप्नपरी ☆ श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे

ई-अभिव्यक्ति में श्री प्रभाकर महादेवराव धोपटे जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्नपाकळ्या को प्रस्तुत करते हुए हमें अपार हर्ष है। आप मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। वेस्टर्न  कोलफ़ील्ड्स लिमिटेड, चंद्रपुर क्षेत्र से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं। अब तक आपकी तीन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें दो काव्य संग्रह एवं एक आलेख संग्रह (अनुभव कथन) प्रकाशित हो चुके हैं। एक विनोदपूर्ण एकांकी प्रकाशनाधीन हैं । कई पुरस्कारों /सम्मानों से पुरस्कृत / सम्मानित हो चुके हैं। आपके समय-समय पर आकाशवाणी से काव्य पाठ तथा वार्ताएं प्रसारित होती रहती हैं। प्रदेश में विभिन्न कवि सम्मेलनों में आपको निमंत्रित कवि के रूप में सम्मान प्राप्त है।  इसके अतिरिक्त आप विदर्भ क्षेत्र की प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं के विभिन्न पदों पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। अभी हाल ही में आपका एक काव्य संग्रह – स्वप्नपाकळ्या, संवेदना प्रकाशन, पुणे से प्रकाशित हुआ है, जिसे अपेक्षा से अधिक प्रतिसाद मिल रहा है। इस साप्ताहिक स्तम्भ का शीर्षक इस काव्य संग्रह  “स्वप्नपाकळ्या” से प्रेरित है ।आज प्रस्तुत है उनकी एक  श्रृंगारिक कविता “स्वप्नपरी“.) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – स्वप्नपाकळ्या # 12 ☆

☆ स्वप्नपरी

 

मंद मंद अती अलगद पाऊल

टाकित आली  न  लगे चाहूल

ये  सुहासिनी ,ये  गं  कामीनी !!

 

आभाळाचा  पडदा  सारुनी

नक्षत्रांच्या   परीधानातुनी

ये गं  यामीनी, ये गं कामीनी !!

 

कल्पवृक्षाच्या झोपाळ्यावर

रत्नांचा  तो  स्वर्गही  सुंदर

ये गं त्यातुनी, ये  गं कामीनी !!

 

रुणझुण रुणझुण संगीत सुमधुर

घडवी  विधाता  तुजला  सुंदर

ये श्रृंगारुनी ,  ये  गं  कामीनी !!

 

©  प्रभाकर महादेवराव धोपटे

मंगलप्रभू,समाधी वार्ड, चंद्रपूर,  पिन कोड 442402 ( महाराष्ट्र ) मो +919822721981

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सूचनाएँ/Information ☆ विश्ववाणी हिंदी संस्थान –  २०  वां  दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान लघुकथा पर्व आयोजित  ☆

सूचनाएँ/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ विश्ववाणी हिंदी संस्थान –  २०  वां  दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान लघुकथा पर्व आयोजित  ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

 

जबलपुर, २३-५-२०२०। विश्ववाणी हिंदी संस्थान अभियान जबलपुर के  २० वे दैनंदिन सारस्वत अनुष्ठान लघुकथा पर्व में देश के विविध राज्यों के २५ लघुकथाकारों ने सहभागिता की। इस महत्वपूर्ण अनुष्ठान की मुखिया समर्पित समाजसेवी, से. नि. प्राध्यापक आशा रिछारिया तथा पाहुना लघुकथा आंदोलन की शिखर हस्ताक्षर कांता रॉय भोपाल के स्वागतोपरान्त इंजी. उदयभानु तिवारी ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।  कोकिलकंठी गायिका मीनाक्षी शर्मा ‘तारिका’ ने आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ द्वारा रचित हिंदी महिमा के दोहों की प्रभावी प्रस्तुति की। विषय प्रवर्तन करते हुए संयोजक आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने मनुष्य के जन्म के पूर्व ही कथा के उद्भव का संकेत देते हुए महाभारत के अभिमन्यु प्रसंग को उठाया। उन्होंने शिशु कथा, बाल कथा, किशोर कथा, पर्व कथा, बोध कथा, लोक कथा, आदि को लघु कथा के विविध प्रकार निरूपित करते हुए मानकों के पिंजरे में रचनाधर्मिता को कैद कर कृत्रिम साहित्य सृजन को दिशाहीन बताया।

वरिष्ठ लघुकथाकार लक्ष्मी शर्मा ने ‘स्टोर रूम’ शीर्षक लघुकथा में वृद्धों को घरों से बाहर किये जाने की समस्या को उठाया। अर्चना मलैया की लघुकथा ‘बोलते पौधे’ में हरीतिमा के प्रति संवेदशीलता प्रदर्शित हुई। छाया त्रिवेदी की लघुकथा ‘पत्तल दोना और कोरोना’ में परिस्थितिजनित व्यवहारिकता को प्रस्तुत किया। संस्कृत, हिंदी और बुंदेली की विदुषी लेखिका डॉ. सुमनलता श्रीवास्तव ने ‘कचौट’ लघुकथा में सामाजिक मर्यादा के नाम पर असंवेदनशील व्यवहार से जीवन भर टीसती कचौट को सामने लाती है और बदलती सामाजिक परिस्थितियों को स्वीकारने का संदेश देती है। ‘प्रश्नचिन्ह’ शीर्षक लघुकथा में डॉ. भावना मिश्र ने व्यक्तिगत हित को वरीयता देने और सामाजिक संबंधों की उपेक्षा से उपजी त्रासदी को शब्दित किया। प्रीती मिश्र  की लघुकथा ‘स्वच्छता’ शीर्षकानुरूप सन्देशवाही लघुकथा है। टीकमगढ़ के लघुकथाकार राजीव् नामदेव ‘राना लिघौरी’ ने ‘बिजनेस’ शीर्षक लघुकथा में भिखारी द्वारा चल करने और उसे उचित ठहरने की मानसिकता को उद्घाटित किया।

डॉ. मुकुल तिवारी ने ‘प्यासे पशु’ शीर्षक लघुकथा में व्यावहारिक बुद्धि के अभावऔर मीना भट्ट की लघुकथा ने जेबकतरी से  उत्पन्न त्रासदी को शब्द दिए। दतिया के प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. अरविन्द श्रीवास्तव ‘असीम’ ने लघुकथा ‘सोच’ में माँ के प्रति लापरवाह बेटे और बेटे के प्रति मोहान्ध माँ को चित्रित किया। इंजी. सुरेंद्र सिंह पवार की लघुकथा ‘नर्मदा मैया की जय विकास कार्यों के प्रति ग्रामीणों के अंध विरोध तथा उनसे लाभ मिलने पर स्वीकारने की मानसिकता को सामने लाती है। विश्वासघाती पति को दो पत्नियों द्वारा दंडित करने पर केंद्रित लघुकथा प्रस्तुत की भारती  नरेश पाराशर ने। ‘स्पेसवासी’ लघुकथा में छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ने लघुकथा ‘स्पेसवासी’ में पारिस्थितिक जटिलता को परिहास में लेकर जिंदादिली से जीने  एक संदेश देती है। इंजी अरुण भटनागर ने कोरोना त्रासदी की नीरसता को पौधों की प्रेम वार्ता के माध्यम से तोड़ते हुए जीवन को पूर्णता से जीन एक संदेश दिया। सपना सराफ की लघुकथा ‘प्रेमकथा’ चित्रपटीय नाटकीयता पूर्ण है। पानीपत से सम्मिलित हुई मंजरी शुक्ल ने ‘सोच’ शीर्षक लघुकथा  में औरों की खुशी में सम्मिलित होकर खुश होने का सुन्दर संदेश दिया। भिंड से आई लघुकथाकार मनोरमा जैन ‘पाखी’ ने छद्म शौक के पाखंड पर प्रहार करती लघुकथा प्रस्तुत की। नक्सलवाद से प्रभावित बस्तर से  सुपरिचित लघुकथाकार रजनी शर्मा ने आदिवासी बोली हल्बी मिश्रित हिंदी में जीवन परिदृश्य प्रस्तुत करते हुए अणुदा लघुकथा  आदिवासियों और वनों के संबंध में बाधक बनते शासन-प्रशासन और विकास कार्यों से उपजी त्रासदी को उद्घाटित करती है। मीनाक्षी शर्मा ‘तारिका’ ने प्रथम लघुकथा प्रस्तुत करते हुए कल की चिंता छोड़कर आज का स्वागत करने का संदेश दिया। सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ने ‘सहोदर’ शीर्षक लघुकथा में घटनाओं के तानेबाने में छिपे संबंधों के कुहासे में सच को तलाशते किशोर की मानसिक समस्या, सवालों को उठाती है। कार्यक्रम की मुखिया से. नि. प्राध्यापिका आशा रिछारिया की लघुकथा ‘असल धर्म’ में कोरोना त्रासदी से भूखे मजदूरों मजदूरों की मदद देने का प्रेरक संदेश देती है। विश्ववाणी हिंदी संसथान के संयोजक-संचालक आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ने लघुकथा मोहन भोग में रोजगार गंवा चुके मजदूरों के पलायन और भुखमरी की समस्या को उठाते हुए उन्हें भोजन करने को भगवन को चढ़ाये मोहन भोग की तरह बताया। दमोह की लघुकथाकार बबीता चौबे ‘शक्ति’ ने अपनी लघुकथा ‘तुम्हारी साथी’लघुकथा में पंचेन्द्रियों से संवाद के माध्यम से नारी विश्वास का संकेतन किया गया। दिल्ली की सफल लघुकथाकार सुषमा शैली की लघुकथा ‘बाल मन’ में आर्थिक अभाव के बावजूद एक बच्चे के मन में दूसरे बच्चे के प्रति उपजी संवेदना उभर कर सामने आई।

अध्यक्षीय संबोधन में  श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता आशा रिछारिया जी  ने विविध भाषा-बोलिओं के समन्वय को श्रेयस्कर बताते हुए लघुकथा में विविध प्रांतों के लघुकथाकारों के सम्मिलित होने पर हर्ष व्यक्त करते हुए कार्यक्रम को सफल निरूपित किया। मुख्य अतिथि कांता राय ने विषय प्रवर्तन में प्रस्तुत किये गए लघुकथा के विकास को सराहते हुए प्रत्येक लघुकथा पर अपनी राय व्यक्त की। अंत में इंजी अरुण भटनागर ने आभार प्रदर्शन किया।

 

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  Buddha#3 – Anapanasati Sutta ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆ BUDDHA –  Anapanasati Sutta  ☆ 

Video Link >>>>

Buddha – Anapanasati Sutta

The meditator, having gone to the forest, to the shade of a tree, or to an empty building, sits down with legs folded crosswise, body held erect, and sets mindfulness to the fore. Always mindful, the meditator breathes in; mindful, the meditator breathes out.

The sixteen contemplations:

FIRST TETRAD (BODY GROUP)

  1. While breathing in long, one knows: “I breathe in long.” While breathing out long, one knows: “I breathe out long.”
  2. While breathing in short, one knows: “I breathe in short.” While breathing out short, one knows: “I breathe out short.”
  3. One trains oneself: “Sensitive to the whole body, I breathe in. Sensitive to the whole body, I breathe out.”
  4. One trains oneself: “Calming the whole body, I breathe in. Calming the whole body, I breathe out.”

SECOND TETRAD (FEELINGS GROUP)

  1. One trains oneself: “Sensitive to rapture, I breathe in. Sensitive to rapture, I breathe out.”
  2. One trains oneself: “Sensitive to pleasure, I breathe in. Sensitive to pleasure, I breathe out.”
  3. One trains oneself: “Sensitive to mental processes, I breathe in. Sensitive to mental processes, I breathe out.”
  4. One trains oneself: “Calming mental processes, I breathe in. Calming mental processes, I breathe out.”

THIRD TETRAD (MIND GROUP)

  1. One trains oneself: “Sensitive to the mind, I breathe in. Sensitive to the mind, I breathe out.”
  2. One trains oneself: “Gladdening the mind, I breathe in. Gladdening the mind, I breathe out.”
  3. One trains oneself: “Steadying the mind, I breathe in. Steadying the mind, I breathe out.”
  4. One trains oneself: “Liberating the mind, I breathe in. Liberating the mind, I breathe out.”

FOURTH TETRAD (WISDOM GROUP)

  1. One trains oneself: “Focusing on impermanence, I breathe in. Focusing on impermanence, I breathe out.”
  2. One trains oneself: “Focusing on fading away, I breathe in. Focusing on fading away, I breathe out.”
  3. One trains oneself: “Focusing on cessation, I breathe in. Focusing on cessation, I breathe out.”
  4. One trains oneself: “Focusing on relinquishment, I breathe in. Focusing on relinquishment, I breathe out.”

(Translated from Pali by Thanissaro Bhikkhu)

BREATH BY BREATH – THE LIBERATING PRACTICE OF INSIGHT MEDITATION – LARRY ROSENBERG WITH DAVID GUY

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – त्रयोदश अध्याय (8) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

त्रयोदश अध्याय

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

 

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्‍कार एव च ।

जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्‌ ।।8।।

 

इन्द्रियों से वैराग्य हो, अहंकार से दूर

जन्म-मृत्यु, जरा, व्याधि,दुख द्वेष खोज भरपूर ।।8।।

 

भावार्थ :  इस लोक और परलोक के सम्पूर्ण भोगों में आसक्ति का अभाव और अहंकार का भी अभाव, जन्म, मृत्यु, जरा और रोग आदि में दुःख और दोषों का बार-बार विचार करना।।8।।

 

Indifference to  the  objects  of  the  senses,  also  absence  of  egoism,  perception  of  (or  reflection on) the evil in birth, death, old age, sickness and pain,।।8।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य ☆ प्रसंग/कविता ☆ प्रसंग- संकट सब पर है / कविता – बेहद उदास रहती है गिलहरी ☆ डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ 

(डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’ पूर्व प्रोफेसर (हिन्दी) क्वाङ्ग्तोंग वैदेशिक अध्ययन विश्वविद्यालय, चीन ।  वर्तमान में संरक्षक ‘दजेयोर्ग अंतर्राष्ट्रीय भाषा सं स्थान’, सूरत. अपने मस्तमौला  स्वभाव एवं बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रसिद्ध। आज प्रस्तुत है डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  की एक विचारणीय प्रसंग “संकट सब पर है एवं कविता  ”बेहद उदास रहती है गिलहरी “।  डॉ गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर ‘ जी  के इस सार्थक एवं समसामयिक  प्रसंग एवं  कविता के लिए उनकी लेखनी को सादर नमन।  ) 

 ☆ संकट सब पर है ☆

पता नहीं क्यों मैं उन महापुरुषों से सहमत नहीं हो पा रहा हूँ जो इस संकट में बहुत कुछ पॉजिटिव खोज ले रहे हैं। वे इससे बहुत खुश हैं कि कोई सड़क हादसा नहीं हुआ।गंगा निर्मल हो गई। काशी के अस्सी घाट पर कोई अंतिम संस्कार नहीं हुआ। हार्ट अटैक कम हो गए और भी बहुत कुछ। जब कोई घर से ही नहीं निकल पा रहा तो अस्पताल कहाँ से और कैसे पहुँचेगा। ज़िंदा कहीं नहीं निकल पा रहा तो मुर्दा कैसे काशी यात्रा पर जाएगा। गंगा जी तो बिना कोरोना के भी निर्मल हो सकती थीं।

कल एक गाय अपने चिल्लाते हुए बछड़े को छोड़ नहीं पा रही थी। कुछ दूर जाकर लौट-लौट कर आकर बार-बार उसे चाट रही थी। यह दृश्य मैं और मेरी धर्मपत्नी अपनी बोलकनी से देख रहे थे।

मैं तो वहाँ से हट गया पर श्रीमती गायत्री शर्मा जी वहीं डटी रहीं। एक माँ का दर्द माँ ही जान सकती है।

उस गाय का बार-बार आना-जाना वह ऐसे देख रही थी कि बहुत संभव है उसे उसके कदम तक याद हो गए हों।

अंतत: बछड़ा खड़ा हो गया और वे दोनों वहाँ से चले गए। लेकिन हम दोनों बहुत देर तक उदास रहे । कुछ मुखर तो बहुत कुछ मौन भाषा में प्राणि जगत पर छाए संकट पर विमर्श करते रहे।

संकट सिर्फ़ मानव पर ही नहीं सब पर है।

इसी प्रसंग में प्रस्तुत है अपनी एक कविता-

 ☆  बेहद उदास रहती है गिलहरी  

बचपन में

तैरने के लिए

लबालब भरा

एक बड़ा -सा तलाव रहता था

हमारे गाँव में

सीप,घोंघे,केकड़े

सिंघाड़े-सा

मुँह निकाले कछुए

मोतियों की आँखें लिए

लपालप उछलती

मछलियाँ भरी रहती थीं

उस तलाव में

गिलहरियाँ ही गिलहरियाँ

थीं हमारी बगिया में

मोरों के केका

कोयलों की कूक से

आबाद थी बगिया

पेड़ कटे तो

गायब हो गईं गिलहरियाँ

न जाने कहाँ उड़ गए

मोर,कोयलें,सुग्गे,कौए,कठफोरवा,नीलकंठ

और,

न जाने कितनी और भी

नाम- बेनाम चिड़ियाँ

एक गिलहरी का जोड़ा बचा था

पिछवाड़े के अमरूद पर

कच्चे अमरूदों,डालियों और पत्तियों तक से

गाढ़ी दोस्ती थी उनकी

तलाव सूखा

साथ में अमरूद

और एक गिलहरी भी

(पता नहीं

इसी गम में

या गिर कर मरी हो वह)

झर कर गिर गई

सूखे पत्ते की मानिंद

बची हुई भी

बस बची भर है

इन दिनों

अमरूद पर

अनुलोम-विलोम नहीं करती

न ही पिछले पैरों पर खड़ी होकर

जायजा लेती है

मुँह नहीं चलाती

मूँछों पर ताव नहीं देती

बमुश्किल दीवारों पर

थकी-थकी-सी

चढ़ती-उतरती

चारों तरफ़ घुंघची-सी आँखों से

कुछ खोजती हुई

बेहद उदास रहती है गिलहरी।

 

©  डॉ. गंगाप्रसाद शर्मा ‘गुणशेखर’

सूरत, गुजरात

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