योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  Meditation / ध्यान – अभ्यास हेतु निर्देश ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  Meditation / ध्यान – अभ्यास हेतु निर्देश  ☆ 

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Meditation / ध्यान – अभ्यास हेतु निर्देश 

निर्देशों को सुनते जाएं और ध्यान का अभ्यास करें:

आराम से बैठ जाएँ. पीठ सीधी, आखें बंद.
पूरा ध्यान अपनी सांस पर. आती सांस और जाती सांस पर निरंतर ध्यान रहे.
नाक के आसपास साँसों के आवागमन को महसूस करें. अन्दर आती सांस और बाहर जाती सांस के प्रति निरंतर सजग रहें.

अगर सांस लम्बी है तो जानें कि लम्बी है, अगर सांस छोटी है तो जानें कि छोटी है. केवल जानना है. सांस जैसी है, वैसी ही रहने दें. सांस को किसी प्रकार से नियंत्रित करने का प्रयास न करें.
यदि मन भटक जाये, तो अपना ध्यान वापस सांस पर लेकर आयें.

आँखें बंद रखते हुए, अपनी साँसों के प्रति पूर्णतः सजग होकर, अपने पूरे शरीर को मन ही मन देखें.
भीतर सांस लेते हुए, पूरे शरीर को महसूस करें. बाहर सांस छोड़ते हुए, पूरे शरीर को महसूस करें.
भीतर सांस लेते हुए, पूरे शरीर को शांत करें. बाहर सांस छोड़ते हुए. पूरे शरीर को शांत करें.
आती सांस और जाती सांस पर निरंतर ध्यान रहे. पूरा ध्यान पूरी सजगता से लगातार अन्दर आती सांस और बाहर जाती सांस पर.

अपनी संवेदनाओं पर ध्यान दें, संवेदनाओं के प्रति सजग रहें.
भीतर सांस लेते हुए, हर्ष महसूस करें. बाहर सांस छोड़ते हुए हर्ष महसूस करें.
भीतर सांस लेते हुए, सुख का अनुभव करें. बाहर सांस छोड़ते हुए सुख का अनुभव करें.
आती सांस और जाती सांस पर निरंतर ध्यान रहे.

अपनी मानसिक प्रक्रियाओं पर ध्यान दें, मानसिक प्रक्रियाओं के प्रति सजग रहें.
भीतर सांस लेते हुए, मानसिक प्रक्रियाओं के प्रति सजग रहें. बाहर सांस छोड़ते हुए, मानसिक प्रक्रियाओं के प्रति सजग रहें.
भीतर सांस लेते हुए, मानसिक प्रक्रियाओं को शांत करें. बाहर सांस छोड़ते हुए, मानसिक प्रक्रियाओं को शांत करें.
आती सांस और जाती सांस पर निरंतर ध्यान रहे.

अपने मन की ओर ध्यान दें. अपने मन के प्रति सजग रहे.
भीतर सांस लेते हुए, मन के प्रति संवेदनशील रहें. बाहर सांस छोड़ते हुए, मन के प्रति संवेदनशील रहें.
प्रसन्नचित्त होकर भीतर सांस लें, प्रसन्नचित्त होकर बाहर सांस छोडें.
मन को स्थिर करते हुए भीतर सांस लें, मन को स्थिर करते हुए बाहर सांस छोडें.
मन को मुक्त करते हुए सांस लें, मन को मुक्त करते हुए सांस छोडें.
आती सांस और जाती सांस पर निरंतर ध्यान रहे. अन्दर आती सांस और बाहर जाती सांस के प्रति निरंतर सजग रहें.

सभी भौतिक और मानसिक घटनाएँ अस्थायी हैं.
संसार अनित्य है, यह ध्यान करते हुए, भीतर सांस लें और बाहर सांस छोडें.
उदय होना और अस्त हो जाना प्रकृति का नियम है.
जीवन की नश्वरता पर ध्यान करते हुए, भीतर सांस लें और बाहर सांस छोडें.
संसार में दुःख है और दुःख से मुक्ति का मार्ग भी है.
सम-भाव रखते हुए, भीतर सांस लें और बाहर सांस छोडें.
कुशल कर्म संचित करें, अकुशल कर्मों का त्याग करें.
अकुशल कर्मों के त्याग पर ध्यान करते हुए, भीतर सांस लें और बाहर सांस छोडें.
आती सांस और जाती सांस पर निरंतर ध्यान रहे. अन्दर आती सांस और बाहर जाती सांस के प्रति निरंतर सजग रहें.

अंत में, सबके लिए मंगल कामना. सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो. सभी सुखी हों. जल के, थल के और आकाश के सभी प्राणी निर्भय और निर्बैर हों, सभी प्राणी निरापद और निरामय हों. सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो. सभी सुखी हों.
धीरे-धीरे आंखें खोलते हुए, ध्यान से बाहर आयें.

Based on the Anapanasati Sutta

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

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आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – द्वादश अध्याय (16) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

द्वादश अध्याय

(भगवत्‌-प्राप्त पुरुषों के लक्षण)

 

अनपेक्षः शुचिर्दक्ष उदासीनो गतव्यथः।

सर्वारम्भपरित्यागी यो मद्भक्तः स मे प्रियः।।16।।

 

जो पवित्र तत्पर प्रसन्न ,उदासीन अनपेक्ष

फल त्यागी हर कर्म का ,भक्त वो प्रिय सापेक्ष ।।16।।

 

भावार्थ :  जो पुरुष आकांक्षा से रहित, बाहर-भीतर से शुद्ध (गीता अध्याय 13 श्लोक 7 की टिप्पणी में इसका विस्तार देखना चाहिए) चतुर, पक्षपात से रहित और दुःखों से छूटा हुआ है- वह सब आरम्भों का त्यागी मेरा भक्त मुझको प्रिय है।।16।।

 

He who is free from wants, pure, expert, unconcerned, and untroubled, renouncing all undertakings or commencements-he who is (thus) devoted to Me, is dear to Me.।।16।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मातृ दिवस विशेष – माँ ☆ डॉ. मुक्ता

डॉ.  मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी  की मातृ दिवस के अवसर पर विशेष कविता माँ )     

☆ मातृ दिवस विशेष – माँ

मां!

करुणा का सागर

लहराता जिसमें स्नेह अपार

मां रत्नो का आग़ार

बसा जिसकी आंखों में

ममता स्नेह दुलार

प्यारा सा घर संसार

बलिहारी जाता सारा संसार

 

मां!

पूजनीया

ममता का सागर लुटाती

दु:ख में आंसू बहाती

खुशी में नहीं फूली समाती

अपना भाग्य सराहती

 

मां!

प्रेरणादात्री,शक्तिपुंज

हज़ारों तूफान मन में समाए

आंचल में असंख्य ज़ख्म छिपाए

हर पल मुस्काती

सबका पथ प्रदर्शन करती

 

मां!

दया की प्रतिमूर्ति

बच्चों पर

जब दु:ख के बादल मंडराते

अपने भी पराए हो जाते

सुनामी जब जीवन में आता

सीना मां का फट जाता

वह धैर्य बंधाती

सबके मन में आस जगाती

समय कभी ठहरता नहीं

हर पल बदलता रहता

 

मां!

कानों में शहद घोलती

अमृत वर्षा करती

अपने आत्मजों को

अंगुली पकड़ चलना सिखाती

उसकी हर ज़रूरत पूरी करती

आपदा से बचाती

खुशियां उंडेलती

दु:खों को हर लेती

परिवार को एक-सूत्र में बांधती

हर पल आशीष बरसाती

वह प्यारी मां है

 

मां!

दया की प्रतिमूर्ति

जब दु:ख के बादल मंडराते

अपने भी पराए हो जाते

सुनामी जब जीवन में आता

सीना मां का फट जाता

वह धैर्य बंधाती

सबके मन में आस जगाती

समय कभी ठहरता नहीं

हर पल बदलता रहता

 

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत।

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मातृ दिवस विशेष – अथाह मातृत्व के प्रति: तांका गीत ☆ श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

श्रीमति हेमलता मिश्र “मानवी “

(सुप्रसिद्ध, ओजस्वी,वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती हेमलता मिश्रा “मानवी” जी  विगत ३७ वर्षों से साहित्य सेवायेँ प्रदान कर रहीं हैं एवं मंच संचालन, काव्य/नाट्य लेखन तथा आकाशवाणी  एवं दूरदर्शन में  सक्रिय हैं। आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय स्तर पर पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित, कविता कहानी संग्रह निबंध संग्रह नाटक संग्रह प्रकाशित, तीन पुस्तकों का हिंदी में अनुवाद, दो पुस्तकों और एक ग्रंथ का संशोधन कार्य चल रहा है। आज प्रस्तुत है श्रीमती  हेमलता मिश्रा जी  की मातृ दिवस पर विशेष रचना  अथाह मातृत्व के प्रति: तांका गीत। इस अतिसुन्दर रचना के लिए आदरणीया श्रीमती हेमलता जी की लेखनी को नमन। )

 ☆  मातृ दिवस विशेष – अथाह मातृत्व के प्रति: तांका गीत ☆ 

माँ और शिशु

नौ महीने पुराना

नाल का रिश्ता

अबोध शिशु रोया

देखते ही दुनिया!

 

आँचल गंध

भूख तृष्णा खुशबू

वो दुधमुंहा

ना अपना पराया

बस ममत्व साया!

 

उम्र के साथ

छूटे  ममता हाथ

मां नहीं साथ

पय धार से जुड़ी

कोख सदा ही हरी।

 

अमर कोख

रहे प्राणों को थाम

बच्चों की आस

ले मौत से आन

हो अंतिम प्रयाण

 

माँ का कलेजा

हर ठोकर सहे

बच्चों की राह

शूल चुनती रहूँ

माँ के दिल की चाह।।

 

© हेमलता मिश्र “मानवी ” 

नागपुर, महाराष्ट्र

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सामाजिक चेतना – #49 ☆ माँ का वात्सल्य ☆ सुश्री निशा नंदिनी भारतीय

सुश्री निशा नंदिनी भारतीय 

(सुदूर उत्तर -पूर्व  भारत की प्रख्यात  लेखिका/कवियित्री सुश्री निशा नंदिनी जी  के साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना की अगली कड़ी में  प्रस्तुत है मातृ दिवस पर एक समसामयिक विशेष रचना माँ का वात्सल्य ।आप प्रत्येक सोमवार सुश्री  निशा नंदिनी  जी के साहित्य से रूबरू हो सकते हैं।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सामाजिक चेतना  #49 ☆

☆  माँ का वात्सल्य   ☆

माँ तो सिर्फ माँ होती है

हो चाहे पशु-पक्षी की

पथ की ठोकर से बचाकर

रक्षा करती बालक की

हाथ थाम चलती शिशु का

पल-पल साथ निभाती है

थोड़ा-थोड़ा दे कर ज्ञान

जीवन कला सिखाती है।

 

विस्तृत नीले आकाश सी

धरती सी सहनशील होती

टटोल कर बालक के मन को

आँचल की घनी छाँव देती

पीड़ा हरती बालक की

खुशियों का हर पल देती

पिरो न सकें शब्दों में जिसे

माँ ऐसी अनमोल होती।

रचना माँ से सृष्टि की

माँ जननी है विश्व की

अद्भुत है वात्सल्य माँ का

माँ से तुलना नहीं किसी की

बेटी, बहन, पत्नी बनकर

चमकाती अपने चरित्र को

माँ बनकर सर्वस्व अपना

देती अपनी संतान को।

 

© निशा नंदिनी भारतीय 

तिनसुकिया, असम

9435533394

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ पुनर्पाठ – चुप्पियाँ – 5 ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆  पुनर्पाठ – चुप्पियाँ – 5

तुम्हारी चुप्पी मूल्यवान है,

जितना चुप रहते हो

उतना मूल्य बढ़ता है,

वैसे तुम्हारी चुप्पी का मूल्य

कहाँ  तक पहुँचा?

…और बढ़ेगा क्या..?

मैं फिर चुप लगा गया..!

#  घर में रहेंसुरक्षित रहें।

 

©  संजय भारद्वाज, पुणे

( 1.9.18, रात 11:40 बजे)

( *’चुप्पियाँ’* कविता संग्रह से)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शेष कुशल # 2 ☆बहिष्कृत सेब और परितक्त्य केला संवाद ☆ श्री शांतिलाल जैन

श्री शांतिलाल जैन 

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं।

श्री शांतिलाल जैन जी  के  साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक सकारात्मक सार्थक व्यंग्य “बहिष्कृत सेब और परितक्त्य केला संवाद।  इस  साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से हम आप तक उनके सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य साझा करते रहेंगे। हमारा विनम्र अनुरोध है कि श्री शांतिलाल जैन जी के प्रत्येक व्यंग्य  को हिंदी साहित्य की व्यंग्य विधा की गंभीरता  को समझते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल #2 ☆

☆ बहिष्कृत सेब और परितक्त्य केला संवाद

‘हेलो डियर एपल, तुम यहाँ कैसे?’ – कचरे के ढेर पर पड़े केले ने सेब से पूछा.

‘हुआ ये कि एक थे जानकी दादा, उन्होंने किलो भर ख़रीदा. थोड़ी दूर जाकर उनको पता चला कि विक्रेता असलम था तो वे मुझे यहाँ फेंक गये. कहते हैं मैं मुसलमां हो गया हूँ, और आप?’

‘अपन की भी वोई कहानी.’ – केले ने कहा – ‘आबिद भाई ने परचेस तो कर लिया था, मगर घर पहुँचने से पहले उन्हें किसी ने बताया कि वेंडर कैलास था, वो मुझे यहाँ पटक गये. बोला कि मैं हिन्दू हो गया हूँ.’

‘यार कुछ भी कहो, ठौर सही मिला है अपन को. आस-पास थोडा कचरा जरूर है मगर है जगह धर्म निरपेक्ष. सर्वसमावेशी. निरापद. शांत. निर्विवाद.’

‘सही कहा दोस्त, अब तो ये साले इंसान सेब, केले, अंगूर, अनार का भी धरम तय करने लगे. मेरा जन्म तो हिमाचल में दौलतरामजी के बगीचे में हुआ. इस लिहाज से तो मैं पैदाइशी हिन्दू हुआ.’

‘डेफिनेशन बाय बर्थ से चलें तो अपन भी मोमेडन ही हुवे. मेरा प्लेस ऑफ़ बर्थ जलगाँव के अहमद मियां का फार्म है.’

‘दोस्त, मेरी समझ में ये नहीं आ रहा कि हमारा धर्म उगानेवाले से तय होगा कि बेचनेवाले से? प्रकृति ने तो हमें भूख मिटाने के धर्म में दीक्षित करके भेजा था, इसमें हिन्दू-मुसलमान कहाँ से आ गया?’

‘पता नहीं यार, कोई वाट्सअप नाम की चीज़ है आदमियों की दुनिया में, शायद तक तो उसी से हुआ है. बहिष्कार की अपीलें चल रहीं हैं वहाँ. बहरहाल, ये बताओ कि वे अगर तुम्हें खा लेते और उसके बाद उनके नॉलेज में आता तब क्या होता?’

‘अंगुली गले में फंसा के उल्टी करते, फिर तीन बार कुल्ले करके शुद्धि कर लेते.’ ऊssssssक्क. उलटी की आवाज़ की मिमिक्री कर दोनों ने एक साथ ठहाका लगाया. तभी शेष कचरे में से जोर जोर से हंसने आवाज आई. उन्होंने पूछा तुम कौन हो?

‘मैं अधर्म हूँ.’

‘तुम यहाँ क्या कर रहे हो और इतनी जोर-जोर से क्यों हंस रहे हो?’

‘वो जो असलीवाला धर्म है ना वो मुझे बार बार कचरे में डाल जाता हैं. मैं बजरिये भक्तों के धर्म को ही जार जार करने निकल पड़ता हूँ. देखो इस विपत्तिकाल में भी लोग मुझे कम एक दूसरे को ज्यादा निपटा रहे हैं. अपन की चाँदी है तो क्यों नहीं हंसे?….अभी यहाँ हूँ, कुछ देर में वाट्सअप पर रहूँगा, फिर चीखते चैनलों में, फेक न्यूज में, डॉक्टर्ड वीडिओ में, फिर पढ़े-लिखे दिमागों में, हाथ के पत्थरों में, जलते टायरों में, आंसू गैस के गोलों में, रबर की बुलेटों में, फिर…..फिर….’, फिर चुप्पी मार गया अधर्म.

‘माय डियर बनाना, अब हम क्या करेंगे?’

‘चेरिटी करेंगे. जस्ट वेट. पुलिस की नज़र बचाकर आती ही होंगी पन्नी बीननेवाली औरतें, हम उनके खाने के काम आयेंगे.’

‘वो किस धरम की हैं?’

‘जो लोग कचरे में से बीन कर पेट भरते हैं वे धरम-करम के फेर में नहीं पड़ते. समझो कि वे भूख के धरम की हैं. नाक चढ़ाना उनके चोंचले हैं जिनके हाथ में थर्टी थाउजंड का स्मार्ट फ़ोन और दो जीबी डाटा डेली खरीदने का दम है.’

‘तब तो हम हमेशा ही पन्नी बीननेवालियों के काम आया करेंगे.’ – सेब ने खुश होकर कहा.

‘नहीं दोस्त, नहीं हो पायेगा, इंसान की फितरत तुम जानते नहीं. प्लान्स ये हैं कि साईन बोर्ड पर ही लिखवा दें – कैलास हिन्दू केला भंडार, असलम मोमेडन फ्रूट स्टोर्स जैसा कुछ. खाये-पिये अघाये लोगों की फितरतें हैं – ये यहाँ से नहीं खरीदो, वो वहाँ से नहीं खरीदो.’ – केले ने समझाया.

सेब सोच रहा है इससे तो ईडन गार्डन में ही अच्छा था. काश वहीं लटका रह जाता. न तो आदिम आदम को धरम से कोई मतलब रहा था, न हव्वा को. मानव सभ्यता रिवाईंड हो जाये तो मजा आ जाये.

 

© शांतिलाल जैन 

F-13, आइवरी ब्लॉक, प्लेटिनम पार्क, माता मंदिर के पास, टी टी नगर, भोपाल. 462003.

मोबाइल: 9425019837

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ World on the edge / विश्व किनारे पर # 7 ☆ मायका ☆ डॉ निधि जैन

डॉ निधि जैन 

डॉ निधि जैन जी  भारती विद्यापीठ,अभियांत्रिकी महाविद्यालय, पुणे में सहायक प्रोफेसर हैं। आपने शिक्षण को अपना व्यवसाय चुना किन्तु, एक साहित्यकार बनना एक स्वप्न था। आपकी प्रथम पुस्तक कुछ लम्हे  आपकी इसी अभिरुचि की एक परिणीति है। आपने हमारे आग्रह पर हिंदी / अंग्रेजी भाषा में  साप्ताहिक स्तम्भ – World on the edge / विश्व किनारे पर  प्रारम्भ करना स्वीकार किया इसके लिए हार्दिक आभार।  स्तम्भ का शीर्षक संभवतः  World on the edge सुप्रसिद्ध पर्यावरणविद एवं लेखक लेस्टर आर ब्राउन की पुस्तक से प्रेरित है। आज विश्व कई मायनों में किनारे पर है, जैसे पर्यावरण, मानवता, प्राकृतिक/ मानवीय त्रासदी आदि। आपका परिवार, व्यवसाय (अभियांत्रिक विज्ञान में शिक्षण) और साहित्य के मध्य संयोजन अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है  मातृ दिवस पर आपकी एक भावप्रवण विशेष कविता  “मायका”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ World on the edge / विश्व किनारे पर # 7 ☆

☆  मायका ☆

 

मैं फूल तुम्हारे आँगन की, महक सजाए रखना,

जाती हूँ ससुराल, मेरी याद सीने से लगाये रखना।

 

नहीं चाहिए भईया, पैसों का कुछ हिस्सा,

नहीं चाहिए पापा, दान दहेज़ कुछ ऐसा,

नहीं चाहिए माँ, ये साड़ी गहने तुम जैसा,

नहीं चाहिए सखी सहेली, खेल खिलोनों का बड़ा सा बक्सा,

मैं फूल तुम्हारे आँगन की, महक सजाए रखना,

जाती हूँ ससुराल, मेरी याद सीने से लगाये रखना।

 

माँ जब दूर हुई तुमसे, यादों का बक्सा खोला था,

आँसू झर-झर निकले थे, जबकि नया किसी ने कुछ बोला था,

पापा की प्यारी थी, उनके घर में राजकुमारी थी,

भईया साथ खेली थी, उनकी सखी सहेली थी,

ससुराल में मौन यूँ ही खड़ी थी, किसी से कुछ नहीं बोली थी,

मैं फूल तुम्हारे आँगन की, महक सजाए रखना,

जाती हूँ ससुराल, मेरी याद सीने से लगाये रखना।

 

पराई क्यों हूँ, सवाल गूँज रहा था,

हर लम्हा मायके का, अपने आप में समेट रहा था,

याद आते हैं वो दिन, जब कच्ची, पक्की, जली रोटी बेली थी,

खूब चिढ़ाया भईया ने, उनके साथ नया बोली थी,

पापा मंद-मंद मुस्कुराये थे, चूमी मेरी हथेली थी,

माँ की डांट भी अलबेली थी,

मैं फूल तुम्हारे आँगन की, महक सजाए रखना,

जाती हूँ ससुराल, मेरी याद सीने से लगाये रखना।

 

©  डॉ निधि जैन, पुणे

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 46 ☆ मातृ दिवस विशेष – माँ बेचारी ☆ श्री जय प्रकाश पाण्डेय

श्री जय प्रकाश पाण्डेय

(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी   की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके  व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय  एवं  साहित्य में  सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की  अगली कड़ी में  मातृ दिवस के अवसर पर आपकी विशेष रचना माँ बेचारी । आप प्रत्येक सोमवार उनके  साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे ।) 

☆ जय प्रकाश पाण्डेय का सार्थक साहित्य # 46

☆ मातृ दिवस विशेष – माँ बेचारी  ☆ 

 

माँ हर बार

ऐसा ही करती है

 

ऐसा ही सोचती है

मा़यका मन में हैं

किवाड़ की सांकल

वो अमरूद का पेड़

वो अमऊआ की डाली

वो प्यारी प्यारी सहेली

वो अम्मा की लम्बी टेर

बाबू के किताबों के ढ़ेर

पगडंडी की वो पनिहारिन

चुहुलबाज़ी वाली वो नाईन

मुंडेर पर बैठी हुई  गौरैया

हर बार माँ याद करती है

बड़बड़ाती हुई सो जाती है

 

© जय प्रकाश पाण्डेय

416 – एच, जय नगर, आई बी एम आफिस के पास जबलपुर – 482002  मोबाइल 9977318765

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ मातृ दिवस विशेष – माँ की मूर्त ☆ सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

सुश्री दीपिका गहलोत “मुस्कान”

( सुश्री दीपिका गहलोत ” मुस्कान “ जी  मानव संसाधन में वरिष्ठ प्रबंधक हैं। एच आर में कई प्रमाणपत्रों के अतिरिक्त एच. आर.  प्रोफेशनल लीडर ऑफ द ईयर-2017 से सम्मानित । आपने बचपन में ही स्कूली शिक्षा के समय से लिखना प्रारम्भ किया था। आपकी रचनाएँ सकाळ एवं अन्य प्रतिष्ठित समाचार पत्रों / पत्रिकाओं तथा मानव संसाधन की पत्रिकाओं  में  भी समय समय पर प्रकाशित होते रहते हैं। हाल ही में आपकी कविता पुणे के प्रतिष्ठित काव्य संग्रह  “Sahyadri Echoes” में प्रकाशित हुई है। आज प्रस्तुत है  )

☆ मातृ दिवस विशेष – माँ की मूर्त 

अपनी माँ से अलग तो नहीं मैं,

उनके ही आँचल में पनपी हूँ मैं,

सहनशक्ति दया की मूर्ति ,

उनके जैसी धैर्यशीलता चाहती हूँ मैं,

लोग बनाना चाहते हैं इसके-उसके जैसा,

अपने माँ जैसी बनाना चाहती हूँ मैं,

अपनी इच्छाएं त्याग कर जी रही हैं वो,

उनकी ख़्वाहिशें जानना चाहती हूँ मैं,

ममता की हैं वो अनमोल मूर्त ,

उनकी परछाई बनाना चाहती हूँ मैं,

अपने अरमानों को विराम दे कर ,

उनकी आशाएं पूरा करना चाहती हूँ मैं,

अपना जीवन औरों के लिए समर्पित करने वाली,

उनके ही गुण अपनाना चाहती हूँ मैं,

बच्चों की ख़ुशी में अपनी हँसी ढूँढना,

मर्मभेदी इस रूप को सराहना चाहती हूँ मैं,

खुद भूखा रह कर बच्चों को खिलाना ,

इस भावना को नमन करना चाहती हूँ मैं,

उनकी, तमन्नाओं से जो बढ़ गयी हैं दूरियाँ,

सारथी बन उनको पार कराना चाहती हूँ मैं,

अपनी माँ से अलग तो नहीं मैं,

उनके ही आँचल में पनपी हूँ मैं . .

 

© सुश्री दीपिका गहलोत  “मुस्कान ”  

पुणे, महाराष्ट्र

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