हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ गांधी चर्चा # 28 – बापू के संस्मरण-2 आटा पीसना तो अच्छा है ☆ श्री अरुण कुमार डनायक

श्री अरुण कुमार डनायक

(श्री अरुण कुमार डनायक जी  महात्मा गांधी जी के विचारों केअध्येता हैं. आप का जन्म दमोह जिले के हटा में 15 फरवरी 1958 को हुआ. सागर  विश्वविद्यालय से रसायन शास्त्र में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त करने के उपरान्त वे भारतीय स्टेट बैंक में 1980 में भर्ती हुए. बैंक की सेवा से सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृति पश्चात वे  सामाजिक सरोकारों से जुड़ गए और अनेक रचनात्मक गतिविधियों से संलग्न है. गांधी के विचारों के अध्येता श्री अरुण डनायक वर्तमान में गांधी दर्शन को जन जन तक पहुँचानेके लिए कभी नर्मदा यात्रा पर निकल पड़ते हैं तो कभी विद्यालयों में छात्रों के बीच पहुँच जाते है. 

आदरणीय श्री अरुण डनायक जी  ने  गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  02.10.2020 तक प्रत्येक सप्ताह गाँधी विचार  एवं दर्शन विषयों से सम्बंधित अपनी रचनाओं को हमारे पाठकों से साझा करने के हमारे आग्रह को स्वीकार कर हमें अनुग्रहित किया है.  लेख में वर्णित विचार  श्री अरुण जी के  व्यक्तिगत विचार हैं।  ई-अभिव्यक्ति  के प्रबुद्ध पाठकों से आग्रह है कि पूज्य बापू के इस गांधी-चर्चा आलेख शृंखला को सकारात्मक  दृष्टिकोण से लें.  हमारा पूर्ण प्रयास है कि- आप उनकी रचनाएँ  प्रत्येक बुधवार  को आत्मसात कर सकें। आज प्रस्तुत है “बापू के संस्मरण – आटा पीसना तो अच्छा है”)

☆ गांधीजी के 150 जन्मोत्सव पर  विशेष ☆

☆ गांधी चर्चा # 28 – बापू के संस्मरण – 2 आटा पीसना तो अच्छा है ☆ 

गांधीजी ने जब दक्षिण अफ्रीका में आश्रम खोला था, तब उनके पास जो कुछ भी अपना था, सब दे दिया था । स्वदेश लौटे तो कुछ भी साथ नहीं लाये, सबका वहीं ट्रस्ट बना दिया और ऐसा प्रबन्ध कर दिया कि उसका उपयोग सार्वजनिक कार्य के लिए होता रहे।  भारत लौटने पर पैतृक सम्पत्ति का प्रश्न सामने आया, पोरबन्दर और राजकोट में उनके घर थे उनमें गांधी-वंश के दूसरे लोग रहते थे । उन सबको बुलाकर गांधीजी ने कहा, “पैतृक सम्पत्ति में मेरा जो कुछ भी हिस्सा है, उसे मैं आपके लिए छोड़ता हूँ” वह केवल कहकर ही नहीं रह गये, लिखा-पढ़ी करवाने के बाद अपने चारों पुत्रों के हस्ताक्षर भी उन कागजों पर करवा दिये इस प्रकार वे कानूनी हो गये । गांधीजी की एक बहन भी थीं उनका नाम रलियातबहन था, लेकिन सब उनको गोकीबहन कहकर पुकारते थे । उनके परिवार में कोई भी नहीं था ।  प्रश्न उठा कि उनका खर्च कैसे चले ? अपने निजी काम के लिए गांधीजी किसी से कुछ नहीं मांगते थे, फिर भी उन्होंने अपने पुराने मित्र डाँ प्राणजीवनदास मेहता से कहा कि वह गोकीबहन को दस रुपये मासिक भेज दिया करें।  भाग्य की विडम्बना देखिये! कुछ दिन बाद गोकीबहन की लड़की भी विधवा हो गई और माँ के साथ आकर रहने लगी । उस समय बहन ने गांधीजी को लिखा, “अब मेरा खर्च बढ़ गया है उसे पूरा करने के लिये हमें पड़ोसियों का अनाज पीसना पड़ता हैं” ।  गांधीजी ने उत्तर दिया,”आटा पीसना बहुत अच्छा है दोनों का स्वास्थ्य ठीक रहेगा हम भी आश्रम में आटा पीसते हैं ।  तुम्हारा जब जी चाहे, तुम दोनों आश्रम में आ सकती हो और जितनी जन-सेवा कर सको, उतना करने का तुम्हें अधिकार है जैसे हम रहते हैं,वैसे ही तुम भी रहोगी मैं घर पर कुछ नहीं भेज सकता और न अपने मित्रों से ही कह सकता हूँ”।

 

©  श्री अरुण कुमार डनायक

42, रायल पाम, ग्रीन हाइट्स, त्रिलंगा, भोपाल- 39

(श्री अरुण कुमार डनायक, भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं  एवं  गांधीवादी विचारधारा से प्रेरित हैं। )

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 25 ☆ कृष्णा के दोहे ☆ श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि‘

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’  

श्रीमती कृष्णा राजपूत ‘भूमि’ जी  एक आदर्श शिक्षिका के साथ ही साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे गीत, नवगीत, कहानी, कविता, बालगीत, बाल कहानियाँ, हायकू,  हास्य-व्यंग्य, बुन्देली गीत कविता, लोक गीत आदि की सशक्त हस्ताक्षर हैं। विभिन्न पुरस्कारों / सम्मानों से पुरस्कृत एवं अलंकृत हैं तथा आपकी रचनाएँ आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित होती रहती हैं। आज प्रस्तुत है   कृष्णा के दोहे इस अतिसुन्दर रचना के लिए श्रीमती कृष्णा जी बधाई की पात्र हैं।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कृष्णा साहित्य # 25 ☆

☆ कृष्णा के दोहे  ☆

 

चितवन

कान्हा से टकरा गई, वह अलबेली नार।

अधर पंखुरी से खिले, चितवन प्रीति – कटार।।

 

अनुवाद

बहु भाषाओं में हुआ, रामायण – अनुवाद

कभी अहिंदी क्षेत्र भी, करते नहीं विवाद।।

 

अनुबंध

अधर गुलाबी खिल उठे, साँस धौंकनी लाज।

अनुरागी अनुबंध की, पाती पढ़कर आज।।

 

चकोर

चाहत हुई चकोर – सी, चाँद तके दिन रैन

गीतों के गुंजार से, कंठ न पाता चैन।।

 

चाँदनी

रात अमावस जप रही, कृष्ण – कृष्ण अविराम।

पूरण मासी चाँदनी, भजती राधेश्याम।।

 

© श्रीमती कृष्णा राजपूत  ‘भूमि ‘

अग्रवाल कालोनी, गढ़ा रोड, जबलपुर -482002 मध्यप्रदेश

Please share your Post !

Shares

योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆  Meditation / ध्यान – आओ, बुद्ध की भांति ध्यान करें! ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

☆  आओ, बुद्ध की भांति ध्यान करें! ☆ 

Video Link >>>>

वीडियो – आओ, बुद्ध की भांति ध्यान करें!

आराम से बैठ जाएँ. पीठ सीधी, आखें बंद.

पूरा ध्यान अपनी सांस पर. आती सांस और जाती सांस पर निरंतर ध्यान रहे.
नाक के आसपास साँसों के आवागमन को महसूस करें. अन्दर आती सांस और बाहर जाती सांस के प्रति निरंतर सजग रहें.
अगर सांस लम्बी है तो जानें कि लम्बी है, अगर सांस छोटी है तो जानें कि छोटी है. केवल जानना है. सांस जैसी है, वैसी ही रहने दें. सांस को किसी प्रकार से नियंत्रित करने का प्रयास न करें.
यदि मन भटक जाये, तो अपना ध्यान वापस सांस पर लेकर आयें.
आँखें बंद रखते हुए, अपनी साँसों के प्रति पूर्णतः सजग होकर, अपने पूरे शरीर को मन ही मन देखें.
भीतर सांस लेते हुए, पूरे शरीर को महसूस करें. बाहर सांस छोड़ते हुए, पूरे शरीर को महसूस करें.
भीतर सांस लेते हुए, पूरे शरीर को शांत करें. बाहर सांस छोड़ते हुए. पूरे शरीर को शांत करें.
आती सांस और जाती सांस पर निरंतर ध्यान रहे. पूरा ध्यान पूरी सजगता से लगातार अन्दर आती सांस और बाहर जाती सांस पर.
अपनी संवेदनाओं पर ध्यान दें, संवेदनाओं के प्रति सजग रहें.
सच्चे मन से, शुद्ध मन से सबके लिए मंगल कामना करें. सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो. सभी सुखी हों. जल के, थल के और आकाश के सभी प्राणी निर्भय और निर्बैर हों, सभी प्राणी निरापद और निरामय हों. सबका मंगल हो, सबका कल्याण हो. सभी सुखी हों.
धीरे-धीरे आंखें खोलते हुए, ध्यान से बाहर आ जायें.

ध्यान के नियमित अभ्यास के लिए, इस विडियो को सुनते हुए प्रतिदिन ध्यान किया जा सकता है.
आपका जीवन ध्यानमय हो, आनंदमय हो, मंगलमय हो!

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and trainings.

Please feel free to call/WhatsApp us at +917389938255 or email lifeskills.happiness@gmail.com if you wish to attend our program or would like to arrange one at your end.

Jagat Singh Bisht : Founder: LifeSkills

Master Teacher: Happiness & Well-Being; Laughter Yoga Master Trainer
Past: Corporate Trainer with a Fortune 500 company & Laughter Professor at the Laughter Yoga University.
Areas of specialization: Behavioural Science, Positive Psychology, Meditation, Five Tibetans, Yoga Nidra, Spirituality, and Laughter Yoga.

Radhika Bisht ; Founder : LifeSkills  
Yoga Teacher; Laughter Yoga Master Trainer

Please share your Post !

Shares

आध्यत्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता ☆ पद्यानुवाद – द्वादश अध्याय (17) ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

हिंदी पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

द्वादश अध्याय

(भगवत्‌-प्राप्त पुरुषों के लक्षण)

 

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्‍क्षति।

शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः।।17।।

जिसे न हर्ष न शोक है ,जिसे न द्वेष न काम

शुभ औ” अशुभ से मुक्त जो ,भक्त वो प्रिय निष्काम ।।17।।

 

भावार्थ :  जो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है तथा जो शुभ और अशुभ सम्पूर्ण कर्मों का त्यागी है- वह भक्तियुक्त पुरुष मुझको प्रिय है।।17।।

 

He who neither rejoices, nor hates, nor grieves, nor desires, renouncing good and evil, and who is full of devotion, is dear to Me.।।17।।

 

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 4 ☆ व्यंग्य – स्वर्ग के द्वार पर करोना टेस्ट ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का  एक  समसामयिक सार्थक व्यंग्य  “स्वर्ग के द्वार पर करोना टेस्ट।  दान महात्मय पर रचित  अकल्पनीय रचना । कोरोना का खौफ इस तरह बैठता जा रहा है कि स्वप्न  में  भी कोरोना और सामाजिक परिवेश के चित्र दिखाई देने लगे हैं। फिर स्वप्न को स्वप्न की ही दृष्टि से देखना चाहिए, जाति, धर्म और राजनीति की दृष्टि से  कदापि नहीं। श्री विवेक जी  की लेखनी को इस अतिसुन्दर व्यंग्य के लिए नमन । )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक साहित्य # 47 ☆ 

☆ व्यंग्य – स्वर्ग के द्वार पर करोना टेस्ट 

दानं वीरस्य भूषणम्.गुरूजी ने उन्हें जीवन मंत्र समझाया  था कि ये सारे करेंसी नोट तो यहीं रह जाते हैं, ऊपर तो केवल दान, दया,मदद की कोमल भावना के नोट ही चलते हैं.इस भाव को उन्होने जीवन में अपना लिया था और इस दृष्टि से निश्चित ही वे बड़े पुण्यात्मा थे.  उन्होने सबकी सदैव हर संभव मदद की थी. प्रधान मंत्री सहायता कोष की ढ़ेर सारी रसीदें उनके पास सुरक्षित हैं. १९७१ के भारत पाकिस्तान युद्ध का मौका रहा हो, कहीं भूकम्प आया रहा हो या बाढ़ की विपत्ति से देश प्रभावित हुआ हो, अकाल पड़ा रहा हो या आगजनी की विपदा आई हो,उनसे जितना बन पड़ा मुक्त हृदय से उन्होने सहयोग किया. पहले चैक से राशि भेजते थे, फिर ड्राफ्ट का जमाना आया, सीधे खाते में राशि जमा करने का मौका आया और अब तो घर बैठे नेट बैंकिंग से या मोबाईल एप के जरिये ही मदद पहुंचाने की  सुविधायें दी जाने लगी हैं. कुछ निजी संस्थानो को उनके इस भामाशाही नेचर का ज्ञान जाने कैसे हो जाता है ? शायद वे सहायता कोष के डाटा बेस में सेंध लगा लेते हैं, क्योंकि उनके पास कोकिल कंठी युवा लडकियो के स्वर में उन संस्थाओ को भी दान देने की प्रार्थना के फोन आने लगते हैं. वे यथा संभव उन्हें भी निराश नही करते. मतलब उन्होने स्वयं की ऐसी दानी प्रोफाईल बना ली थी कि चित्रगुप्त जी को स्वर्ग में उनकी सीट आरक्षण में कहीं कोई अंदेशा न हो.

चीन से कोरोना क्या आया वैश्विक महामारी फैल गई, इससे पहले कि वे इस पेंडेमिक राहत कोष में किसी तरह का कोई दान धर्म कर पाते इस पावन धरा पर उनका जीवन काल पूरा हो गया. लाकडाउन के चलते सड़कें, गलियां,शहर सब वैसे ही वीरान थे, बिना ट्रेफिक में फंसे मिस्टर एम राज अर्थात यमराज आ धमके. उन्होंने प्रसन्न मन, धरा को त्याग वासांसी जीर्णानी यथा विहाय को ध्यान रख नश्वर शरीर त्याग गोलोक गमन किया.अपने दान धर्म पर उन्हें भरोसा था,  मन ही मन उन्होने सोचा चलो अब स्वर्ग में अप्सराओ के नृत्य, गंधर्वो का संगीत सुनने का समय आ गया है. लेकिन यह क्या जैसे ही वे स्वर्ग के द्वार पर पहुंचे उनको द्वार पाल ने रोक लिया. उन्हें लगा यार गलती हो गई मैं दान की संभाल कर रखी रसीदें तो ला  ही नहीं पाया. उन्होने स्वयं को कोसा अरे कम से कम उनकी स्कैन कापी डिजिटल लाकर में डाल ली होतीं तो आज काम आतीं. फिर उन्हें ध्यान आया कि हां इनकम टैक्स रिटर्न में तो हर बार रसीदें लगाईं थी और एट्टी जी में उसकी छूट भी ली थी, मतलब सारे दान के डिटेल्स रिकवर करने के चांसेज हैं. वे द्वार पाल को कोने में ले जाकर अपने टैक्स रिटर्न्स निकलवाने के लिये पैन नम्बर बताना चाहते थे, जो उन्हें जगह जगह लिखते हुये मुखाग्र याद हो गया था. किन्तु वे ऐसा कुछ करते इससे पहले ही उन्होने देखा कि द्वार पर एक सुंदर नर्स और एक डाक्टर भी थे, जो लोगों के माथे पर पिस्तौल सा यंत्र ताने लोगों का तापमान ले रहे थे, नर्स गले से स्वाब, नाक से नेजल एस्पिरिट निकाल रही है, और सारी पुण्यात्माओ को बेवजह २१ दिनो के क्वेरेंटीन में स्वर्ग से बाहर बनाये गये टेंट के कैम्प में भेजा जा रहा था. उन्हें कुछ गुस्सा भी आया कैसे भगवान हैं जो चाइना के कोरोना से जीत नही पाये हैं. किंतु जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिये का ध्यान कर उन्होने सब्र से काम लिया और सारे सेंपल देकर लाइन से क्वेरेंटीन कैंम्प की ओर बढ़ चले. वहां पहले से ही कुछ जमाती पलंग पर जमे दिखे, पूछा तो पता हुआ कि कब्रिस्तान फुल चल रहे थे इसलिये हूरों की वेटिंग के लिये कुछ इंटर रिलीजन एग्रीमेंट हुआ है जिसके चलते इस केम्प में सीट्स खाली होने से इन लोगों को यहां रखा गया था. वे पलंग पर लेट ही रहे थे कि एक कर्कश आवाज आई कब तक लेटे रहियेगा, उठिये चाय बनाइये, आज आपकी बारी है. गहरी तंद्रा टूट गई. पत्नी चाय बनाने का आदेश दे रही थी, रामदीन की छुट्टी कर दी थी उन्होंने और बारी बारी से पति पत्नी किचन का जिम्मा संभाल रहे थे. उन्होंने चाय का पानी चढ़ाते हुये तय किया आज पी एम केयर फंड में ग्यारह हजार डाल देंगे, आखिर परलोक भी तो सुधारना है.

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ बोधि ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆  बोधि 

काँक्रीट की धरती में

दीवार के कोनों और

पाइपों के नीचे

पानी-माटी के

नितांत अभाव में

फूटती हैं कोंपले

पीपल और बरगद की,

विसंगति और

विपरीतता

बोधि संभावना की

अनिवार्य शर्त होती हैं।

# कृपया घर में रहें, सुरक्षित रहें।

©  संजय भारद्वाज, पुणे

(संध्या 5: 56 बजे, 11 अक्टूबर 2016)

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार  सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय  संपादक– हम लोग  पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स 

मोबाइल– 9890122603

writersanjay@gmail.com

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 48☆ शौकिनांचे शहर☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना  एक काव्य  संसार है । आप  मराठी एवं  हिन्दी दोनों भाषाओं की विभिन्न साहित्यिक विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आज साप्ताहिक स्तम्भ  –अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती  शृंखला  की अगली  कड़ी में प्रस्तुत है एक अत्यंत भावप्रवण कविता  “शौकिनांचे शहर।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 48 ☆

☆ शौकिनांचे शहर ☆

कधी गाव होते नगर आज झाले

वहात्या नदीवर कहर आज झाले

 

इथे रोज जन्मास येतात रस्ते

किती वृक्ष येथे अमर आज झाले

 

इथे काल होती वने टेकड्याही

तिथे शौकिनांचे शहर आज झाले

 

कधी भ्रष्ट म्हणुनी तुरुंगात गेले

पुन्हा मुळपदावर हजर आज झाले

 

दुकानात मंदी मला हे कळेना

पुढारी कशाने गबर आज झाले

 

नको ना बखेडा जरी मी म्हणालो

तुझा हट्ट होता समर आज झाले

 

अशोकास मुक्ती कशाने मिळाली

तिचे मोकळे हे अधर आज झाले

 

© अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

Please share your Post !

Shares

मराठी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ उत्सव कवितेचा # 3 – त्यावेळी ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं एवं 6 उपन्यास, 6 लघुकथा संग्रह 14 कथा संग्रह एवं 6 तत्वज्ञान पर प्रकाशित हो चुकी हैं।  हम श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी के हृदय से आभारी हैं कि उन्होने साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा के माध्यम से अपनी रचनाएँ साझा करने की सहमति प्रदान की है।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण अप्रतिम कविता ‘त्यावेळी ’ । साथ ही इस कविता का वरिष्ठ मराठी एवं हिंदी साहित्यकार  श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ जी  द्वारा हिंदी अतिसुन्दर भावानुवाद उस समय’ भी आज के ही अंक में प्रकाशित कर रहे हैं ।

आप प्रत्येक मंगलवार को श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – उत्सव कवितेचा – # 3 ☆ 

☆ कविता – त्यावेळी   

 

त्यावेळी

वाटलं होतं

आपण

एकमेकांना

अगदी अनुरुप

जसं

दोन देह

एक मन

दोन श्वास

एक जीवन

पण

पुलाखालून

थोडं पाणी

वाहून गेलं

आणि लक्षात आलं

आपले

फुलण्याचे ऋतू वेगळे.

तसेच पानगळीचेही.

आता आपण कुरवाळतो

स्वतंत्रपणे

पाखरांच्या स्मृती

आपल्या बहरानंतरच्या

आणि वाट पाहतो

नव्या बहराची

आपल्या पनगळीनंतरच्या.

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – कविता ☆ उस समय ☆ श्री भगवान् वैद्य ‘प्रखर’

श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’

( श्री भगवान् वैद्य ‘ प्रखर ‘ जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है। आप हिंदी एवं मराठी भाषा के वरिष्ठ साहित्यकार एवं साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपका संक्षिप्त परिचय ही आपके व्यक्तित्व एवं कृतित्व का परिचायक है।

संक्षिप्त परिचय : 4 व्यंग्य संग्रह, 3 कहानी संग्रह, 2 कविता संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, मराठी से हिन्दी में 6 पुस्तकों तथा 30 कहानियाँ, कुछ लेख, कविताओं का अनुवाद प्रकाशित। हिन्दी की राष्ट्रीय-स्तर की पत्र-पत्रिकाओं में विविध विधाओं की 1000 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित। आकाशवाणी से छह नाटक तथा अनेक रचनाएँ प्रसारित
पुरस्कार-सम्मान : भारत सरकार द्वारा ‘हिंदीतर-भाषी हिन्दी लेखक राष्ट्रीय पुरस्कार’, महाराष्ट्र राजी हिन्दी साहित्य अकादमी, मुंबई द्वारा कहानी संग्रहों पर 2 बार ‘मूषी प्रेमचंद पुरस्कार’, काव्य-संग्रह के लिए ‘संत नामदेव पुरस्कार’ अनुवाद के लिए ‘मामा वारेरकर पुरस्कार’, डॉ राम मनोहर त्रिपाठी फ़ेलोशिप। किताबघर, नई दिल्ली द्वारा लघुकथा के लिए अखिल भारतीय ‘आर्य स्मृति साहित्य सम्मान 2018’

हम आज प्रस्तुत कर रहे हैं श्री भगवान वैद्य ‘प्रखर’ जी  द्वारा सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  की एक भावप्रवण  अप्रतिम मराठी कविता त्यावेळी’ का  अतिसुन्दर हिंदी भावानुवाद ‘उस समय ’  जिसे हम आज के ही अंक में  ही प्रकाशित कर रहे हैं।

☆ उस समय  ☆

 

उस समय लगा था

हम दोनों

एक दूसरे के लिए ही है

जैसे दो देह

एक मन

दो सांस

एक जीवन

पर

पुल के नीचे से

कुछ पानी बह गया

तब ध्यान में आया

अपने खिलने के मौसम भिन्न भिन्न है

और पतझड़ के भी

 

अब हम स्वतंत्र होकर सहला रहे हैं

पंछियों की स्मृतियां

बहार गुजर जाने के बाद की

और बाट जोह रहे है

अपने पतझड़ के बाद आनेवाली

नयी बहार की

 

श्री भगवान् वैद्य ‘प्रखर’ 

30 गुरुछाया कॉलोनी, साईं नगर अमरावती – 444 607

मोबाइल 8971063051

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # 46 – कविता – ममता के सागर से निकली ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। । साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी  एक अप्रतिम कविता   “ममता के सागर से निकली।  अप्रतिम कविता , स्त्री के माँ  का स्वरुप  और अद्भुत शब्दशिल्प। इस सर्वोत्कृष्ट  कविता के लिए श्रीमती सिद्धेश्वरी जी को हार्दिक बधाई।

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 46 ☆

☆ कविता   – ममता के सागर से निकली

 

ममता के सागर से निकली

लेकर जीवन अमृत धार

कर सिंचित अपने तन से

किया नव सृष्टि का संचार

 

भावना की डोरी में बंधी

प्यार के सपने संजोए हुए

पाजेब चुनर सिंदूर चूड़ियां

धारण कर श्रंगार किए

दीप जलाती तुलसी चौरा

सुख शांति का लेकर भार

 

ममता के सागर से निकली

लेकर जीवन अमृत धार

 

कोख रखा नव महीनों तक

समय बिताई पल छिन संवार

बिसरा गई सारे कष्टों को

शिशु दिया जब  जन्म साकार

बनकर ममता  की  जननी

जीवन मिला उसको एक बार

 

ममता के सागर से निकली

लेकर जीवन अमृत धार

 

शब्दों में मां को उतारू कैसे

जीवन जहां से प्रारंभ हुआ

उन पर क्या मैं गीत लिखूं

उल्लासित  मन हुआ महुआ

रीति-रिवाजों को सिखलाती

मां का निर्मल छलकता प्यार

 

ममता के सागर से निकली

लेकर जीवन अमृत धार

 

नवल इतिहास सजाने चली

मानवता की प्रतिमूरत है

देवो को भी वश में कर ले

मां में शक्ति समाहित हैं

भीगे हुए नयनों में भी समाए

मधुर मधुर सुर सरगम तार

 

ममता के सागर से निकली

लेकर जीवन अमृत धार

 

कर  सिंचित अपने तन से

किया नव सृष्टि का संचार

 

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

Please share your Post !

Shares