हिन्दी साहित्य – कविता ☆ संवेदना के वातायन ☆ –डा. मुक्ता

डा. मुक्ता

☆ संवेदना के वातायन ☆  

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं  माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। एक माँ के जज़्बातों को एक माँ ही महसूस कर सकती हैं। डॉ मुक्ता जी  की परिकल्पना में निहित माँ -बेटे के स्नेहिल  सम्बन्धों  और माँ के वात्सल्यमयी  अपेक्षाओं को इससे बेहतर लिपिबद्ध करना असंभव है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को नमन ।)

 

काश!

काश! वह  समझ पाता

मां के जज़्बातों को

अहसासों को

मन में बसे प्यार के

अथाह सागर को

उसकी दुआओं को

शुभाशीषों को

वह पल-पल उसकी राह तकती

देर से  लौटने तक जगती

उस की सलामती की दुआ करती

क्योंकि वह उसकी

ज़िन्दगी है, धड़कन है।

 

और वह कितनी

आसानी से कह देता है

‘क्यों जगती रहती हो…

सो जाया करो

व्यर्थ परेशान होती हो’

कहकर पल्ला झाड़ लेता है

और मां क्षुब्ध हो

कर उठती है चीत्कार।

 

‘क्या कमी रह गई

उसकी परवरिश में

क्यों नहीं दे पाई वह

उसे सुसंस्कार

क्यों ज़माने की

चकाचौंध को देख

उस ओर बढ़ गये

उसके नापाक़ कदम’

 

उसकी हर इच्छा पर

बलिहारी जाने वाली मां

अब उसे अवगुणों की खान

नज़र आने लगी

क्योंकि बड़ा हो गया है वह

रुतबा है उसका समाज में

लगता है भूल गया है

वह सलीका ज़िन्दगी का

तज मान-मर्यादा

छोटे-बड़े का अंतर

वह ख़ुद को ख़ुदा मानने लगा है

नहीं झलकता अब उसके नेत्रों से

स्नेह-सम्मान व अपनत्व भाव—

और वह सबको

एक लाठी से हांकने लगा है।

 

© डा. मुक्ता

पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी,  #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com

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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ? गुलमोहर ? – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

 

? गुलमोहर ?

 

(सुश्री ज्योति हसबनीस जी का पुष्पों एवं प्रकृति के प्रति अपार स्नेह की साक्षी है यह सामयिक कविता। गुलमोहर,  ग्रीष्म ऋतु, पक्षी, पेड़ और पथ; कुछ भी तो नहीं छूटा।  इसके पूर्व हमने सुश्री ज्योति जी की कदंब के फूल पर एक कविता प्रकाशित की थी जिसे पाठको का अपार स्नेह प्राप्त हुआ था। )

 

ऐन ग्रीष्मातील वैशाख वणवा,

तप्त ऊन्हातील दग्ध जाणीवा ।

ओसाड निर्जन रस्ते सारे ,

घरट्यात व्याकुळ पक्षी बिचारे ।

 

अशाच उजाड वळणावरती ,

केशरी छत्र उभारून धरतीवरती ,

होरपळ मिरवीत अंगावरती ,

गुलमोहर उभा निःशब्द एकांती।

 

 

केशर तांबडी पखरण याची ,

करी भलावण सकल पक्ष्यांची ।

गर्द ,विस्तृत छाया त्याची ,

करी शीतल काया पांथस्थांची ।

 

छायेत केशरी या छत्राच्या ,

फुलती मनोरम  प्रीतीचे मळे ,

संगतीत तांबट फुलांच्या ,

रंगून जाती जीव खुळे ।

 

बघूनी दिमाख गुलमोहराचा ,

वैशाख वणवा विझून जाई ।

ऐन ग्रीष्मातील रुबाब त्याचा ,

प्रीतीची मोहोर ऊमटवून जाई ।

 

©  सौ. ज्योति हसबनीस

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (50) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

द्वितीय अध्याय

साँख्य योग

( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )

(कर्मयोग का विषय)

कर्मजं बुद्धियुक्ता हि फलं त्यक्त्वा मनीषिणः ।

जन्मबन्धविनिर्मुक्ताः पदं गच्छन्त्यनामयम्‌।।51।।

कर्म बुद्धि रख दृढव्रती देते फल रूचि त्याग

जन्म बंध से मुक्त हो पाते पद निर्वाण।।51।।

 

भावार्थ :   क्योंकि समबुद्धि से युक्त ज्ञानीजन कर्मों से उत्पन्न होने वाले फल को त्यागकर जन्मरूप बंधन से मुक्त हो निर्विकार परम पद को प्राप्त हो जाते हैं।।51।।

 

The wise, possessed of knowledge, having abandoned the fruits of their actions, and being freed from the fetters of birth, go to the place which is beyond all evil. ।।51।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ Buddha: The Ultimate Happiness Guru ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.)

Buddha: The Ultimate Happiness Guru

The  Greatest Blessings

Generally, it is believed that the Buddha was a pessimist who preached misery. Nothing can be farther from the truth.

Buddha had great compassion for all beings. He saw their misery, felt deep empathy, explored the causes, and discovered a way out.

Not only that. He gave us a valuable guide for deep and lasting happiness.

The building blocks of an authentically happy life are outlined in the Discourse on Blessings – Maha-mangala Sutta – thus:

  •  Not to associate with the foolish, but to associate with the wise; and to honor those who are worthy of honor
  • To reside in a suitable locality, to have done meritorious actions in the past and to set oneself in the right course 
  • To have much learning, to be skillful in handicraft, well-trained in discipline, and to be of good speech 
  • To support mother and father, to cherish wife and children, and to be engaged in peaceful occupation
  • To be generous in giving, to be righteous in conduct, to help one’s relatives, and to be blameless in action
  • To loathe more evil and abstain from it, to refrain from intoxicants, and to be steadfast in virtue
  • To be respectful, humble, contented and grateful; and to listen to the Dhamma on due occasions 
  • To be patient and obedient, to associate with monks and to have religious discussions on due occasions
  • Self-restraint, a holy and chaste life, the perception of the Noble Truths and the realisation of Nibbana
  • A mind unruffled by the vagaries of fortune, from sorrow freed, from defilements cleansed, from fear liberated

 

These are the greatest Blessings.

Buddha closes the discourse with the words, “Those who thus abide, ever remain invincible, in happiness established. These are the greatest blessings.”

There is no doubt whatsoever that the Buddha is the Ultimate Happiness Guru!

Jagat Singh Bisht

Founder: LifeSkills

Seminars, Workshops & Retreats on Happiness, Laughter Yoga & Positive Psychology.
Speak to us on +91 73899 38255
lifeskills.happiness@gmail.com

 

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ एक छोटी भूल ☆ – डॉ कुन्दन सिंह परिहार

डॉ कुन्दन सिंह परिहार

☆ एक छोटी भूल ☆

(प्रस्तुत है  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  की एक विचारोत्तेजक लघुकथा। )

 

हम एक शिविर में थे। शिविर बस्ती से दूर प्रकृति के अंचल में, वन विभाग की एक इमारत में लगा था। इमारत के अगल-बगल और सामने दूर  तक ऊँचे पेड़ थे। खूब छाया रहती थी।रात भर पेड़ हवा से सरसराते रहते।

उस सबेरे हम चार लोग इमारत के पास टीले पर बैठे थे। दूर दूर तक पेड़ ही पेड़ थे और हरयाली। उनके बीच से बल खाती काली सड़क। कहीं कहीं इक्के दुक्के कच्चे घर। कुछ दूर पुलियाँ बन रही थीं। वहाँ कुछ हरकत दिखायी पड़ रही थी। शायद कोई इमारत बनाने की तैयारी थी।

पटेल की सिगरेट ख़त्म हो गयी थी। उसे तलब लगी थी। करीब एक फर्लांग दूर सड़क के किनारे दूकान थी,  लेकिन पटेल अलसा रहा था।

तभी पास से एक पंद्रह सोलह साल का लड़का निकला। पुरानी, गंदी, आधी बाँह की कमीज़ और पट्टेदार अंडरवियर।

पटेल ने उसे बुलाया। पचास का नोट दिया, कहा, ‘ज़रा एक सिगरेट का पैकेट ले आओ।’

लड़का बोला, ‘साहब, मुझे काम पर पहुँचना है।देर हो जाएगी।’

पटेल बोला, ‘अरे, नहीं होगी देर। दौड़ के ले आओ।’

लड़का नोट लेकर चला गया। हम वहीं बैठे गप लड़ाते रहे।

थोड़ी देर में लड़का लौटा।उसने पटेल को पैकेट और बाकी पैसे दिये।पटेल ने पैसे जेब में डाल लिये और पैकेट खोलने लगा।

लड़का एक क्षण खामोश रहा। फिर बोला, ‘साहब, दूकान पर ठेकेदार मिल गया था। हमें वहाँ देखकर नाराज हो गया। बोला अब काम पर आने की जरूरत नहीं है। यहीं आराम करो।’

पटेल ने ओठों में सिगरेट दबाये, माथा सिकोड़कर पूछा, ‘तो?’

लड़का बोला, ‘हमारी आज की मजूरी चली गयी, साहब।’

पटेल अपना असमंजस छिपाने के लिए माचिस जलाकर सिगरेट सुलगाने लगा।

आधे मिनट हम सब खामोश बैठे रहे। फिर पटेल उठ कर खड़ा हो गया, बोला, ‘चलो,नाश्ते का वक्त हो गया।’

हम सब उस लड़के से आँखें चुराते धीरे धीरे इमारत की तरफ बढ़ने लगे।

लड़का वहीं खड़ा हमें देखता रहा। इमारत में घुसने से पहले हमने घूम कर देखा। वह हमारी तरफ देखता वहीं खड़ा था।

 

© कुन्दन सिंह परिहार
जबलपुर (म. प्र.)

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मराठी साहित्य – मराठी कविता – ? पळस ? – सुश्री ज्योति हसबनीस

सुश्री ज्योति हसबनीस

 

? पळस ?

 

अग्नीशिखा ही भुईवरची

निसर्गाने सफाईने रोवली

रेखीव रचना किमयागाराची

आसमंत चितारून गेली

 

केशरी लावण्याचा

दिमाख ऐन बहरातला

मखमली सौंदर्याचा

रूबाब निळ्या छत्रातला

 

पेटती मशाल ही रानातली

की रंगभूल ही मनातली

प्रणयातूर ऊर्मि जणू ही

उत्सुक तप्त श्वासांतली

 

धगधगता अंगार क्रोधाचा

जणू आसमंती झेपावला

विखार अंतरीचा

जणू अणूरेणूतून पेटला

 

जणू निखारे अस्तनीचे

बाळगले विधात्याने

आणि छत्र निळाईचे

केले बहाल ममत्वाने

 

वाटेवरचा पळस

खुप काही सांगून गेला

ईश्वरी अगाधतेचा

अमीट ठसा उमटवून गेला

 

©  सौ. ज्योति हसबनीस

 

 

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आध्यात्म/Spiritual – श्रीमद् भगवत गीता – पद्यानुवाद – द्वितीय अध्याय (50) प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

श्रीमद् भगवत गीता

पद्यानुवाद – प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

द्वितीय अध्याय

साँख्य योग

( अर्जुन की कायरता के विषय में श्री कृष्णार्जुन-संवाद )

(कर्मयोग का विषय)

 

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते ।

तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्‌ ।।50।।

बुद्धिमान शुभ-अशुभ से रहता कोसों दूर

अतः युद्ध कर योग है कर्मो से भरपूर।।50।।

 

भावार्थ :   समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इसी लोक में त्याग देता है अर्थात उनसे मुक्त हो जाता है। इससे तू समत्व रूप योग में लग जा, यह समत्व रूप योग ही कर्मों में कुशलता है अर्थात कर्मबंध से छूटने का उपाय है।।50।।

 

Endowed with wisdom (evenness of mind), one casts off in this life both good and evil deeds; therefore, devote thyself to Yoga; Yoga is skill in action. ।।50।।

 

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ 

ए १ ,विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर

vivek1959@yahoo.co.in

मो ७०००३७५७९८

(हम प्रतिदिन इस ग्रंथ से एक मूल श्लोक के साथ श्लोक का हिन्दी अनुवाद जो कृति का मूल है के साथ ही गद्य में अर्थ व अंग्रेजी भाष्य भी प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।)

 

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योग-साधना LifeSkills/जीवन कौशल ☆ The Happiness Formula ☆ Shri Jagat Singh Bisht

Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator and Speaker.)

Happiness Activities​

Lesson 5 

As we know by now, 50% of happiness is in our genes, 10% depends on the circumstances of life and the rest 40% can be cultivated by us by taking up activities, intentionally and voluntarily, that bring joy and happiness.

These intentional activities we call Happiness Activities.

You can find activities that fit your interests, your values and your needs.

Let us classify and list a few activities to make it clear:

Everyone needs to spare time regularly for at least one activity to take care of the body, mind and soul. It may be aerobics, yoga, meditation, walking, or any of the physical exercises.

Stress is the major concern in modern life. One needs to learn how to cope with stress, trauma, and hardships of life.

Finding flow and living in the present is the surest path to authentic happiness. You can choose a happiness activity that helps you enhance flow experience.

You can enrich your life by developing positive relationships and by broadening social connections.

Committing to your goals and a committed goal pursuit leads to accomplishments, thus enhancing your happiness quotient.

You may want to enhance your positive emotions about the past by practicing gratitude or your positive emotions about the future by practicing optimism.

We will be taking up some proven happiness activities from each of these sections in our subsequent lessons.

Jagat Singh Bisht

Founder: LifeSkills

Seminars, Workshops & Retreats on Happiness, Laughter Yoga & Positive Psychology.
Speak to us on +91 73899 38255
lifeskills.happiness@gmail.com

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ई-अभिव्यक्ति: संवाद-26 – डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव – (साहित्यकार को सीमाओं में मत बांधे)

डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव 

अतिथि संपादक – ई-अभिव्यक्ति:  संवाद–26 

(कल आपने डॉ मुक्ता जी के मनोभावों को ई-अभिव्यक्ति: संवाद-25 में अतिथि संपादक के रूप में आत्मसात किया। इसी कड़ी में मैं डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी का हृदय से आभारी हूँ। उन्होने मेरा आग्रह स्वीकार कर आज के अंक के लिए अतिथि संपादक के रूप में अपने उद्गार प्रकट किए।डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव जी ने  ई-अभिव्यक्ति:  संवाद–22  के संदर्भ में अपनी बेबाक राय रखी। यह सत्य है कि साहित्यकार को सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। साहित्यकार भौतिक जीवन के अतिरिक्त अपने रचना संसार में भी जीता है। अपने आसपास के चरित्रों या काल्पनिक चरित्रों के साथ सम्पूर्ण संवेदनशीलता के साथ। डॉ प्रेम कृष्ण जी का  हार्दिक आभार।)

? साहित्यकार को सीमाओं में मत बांधे ?

इसमें कोई संदेह नहीं कि साहित्यकार के पीछे उसका अपना भी कोई इतिहास, घटना/दुर्घटना अथवा ऐसा कोई तथ्य रहता है जो साहित्यकार में  भावुकता एवं संवेदनाएं ही नहीं उत्पन्न करता है, बल्कि उसे नेपथ्य में प्रोत्साहित अथवा उद्वेलित भी करता है, जिसके परिणाम स्वरूप वह रचना को कलमबद्ध कर पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास करता है। इसीलिए कहा गया है “वियोगी होगा पहला कवि आह से उपजा होगा गान”। परन्तु यह  आवश्यक नहीं है कि उसकी सभी रचनाएँ उसकी आत्मबीती घटनाओं से ही प्रेरित हों।

कवि की कविता सिर्फ उसकी आप बीती और उसकी आत्माभिव्यक्ति ही नहीं होती बल्कि उसके आसपास के अन्य व्यक्तियों के साथ जो कुछ घट रहा होता है, वह उसे भी अपनी संवेदना से महसूस ही नहीं करता है बल्कि अभिव्यक्त करने का प्रयास भी करता है। प्रणयबद्ध पक्षी युगल के प्रातः काल नदी किनारे आखेटक द्वारा तीरबद्ध करने पर उन पक्षियों की पीड़ा के रूप में आदिकवि वाल्मीकि के मुंह से जो अनुभूतियाँ एवं उद्गार सर्व प्रथम साहित्य के असीम अनंत संसार को प्राप्त हुए वह कविता ही तो थी।

जब तक साहित्यकार, चाहे किसी भी विधा में क्यों न हो, अपने हृदय में दबे हुए उद्गार कलमबद्ध कर के पाठकों तक नहीं पहुंचा देता, वह छटपटाता रहता है । गर्भ में पल रहे बच्चे की मनोभावनाओं की कल्पना इतनी सहज एवं आसान नहीं है पर असंभव भी नहीं।  स्त्री कवियित्रि ही उन मनोभावों को किसी पुरुष कवि की परिकल्पना से अधिक सहज स्वरूप दे सकती है क्योंकि वह गर्भ में नौ महीने शिशु को पालती है। ऐसा भी नहीं है क्योंकि पुरूष भी शिशु को नौ महीने पिता के रूप में अपने मन मस्तिष्क में पालता है और अनुभूतियाँ एवं संवेदनाएं शरीर से पहले और शरीर से अधिक मन और मस्तिष्क में उपजती हैं । तभी तो नर और नारी में कामकेलि के पूर्व हृदय में प्रेम उत्पन्न होना आवश्यक है। प्रेम विहीन कामक्रिया तो एक शारीरिक भूख है जो मनुष्य को पशुओं के समकक्ष लाकर खड़ा कर देती है जो हमारे मनुष्य होने पर प्रश्न चिन्ह खड़ा करती है।

ऐसा भी नहीं है कि पुरुष साहित्यकार नारी की भावनाओं का चित्रण जितना नारी साहित्यकार कर सकती है उतना नहीं कर सकता है और नारी साहित्यकार पुरूषों की भावनाओं का चित्रण उतना बखूबी नहीं कर सकता है जितना कि पुरुष साहित्यकार। प्रेमचंद, शरतचंद, रवीन्द्र नाथ टैगोर, विमल मित्र ने अपने साहित्य में नारी भावनाओं का चित्रण पूर्ण संवेदना के साथ बखूबी किया है। इसी प्रकार नारी साहित्यकारों ने भी पुरुषों की भावनाओं का चित्रण भली-भांति किया है। जब साहित्यकार अपने पात्रों का चित्रण करता है तो वह स्वयं को भूल जाता है और अपने द्वारा सर्जित पात्रों की जिंदगी जीता है और उसके पात्र की अनुभूतियाँ एवं संवेदनाएं उसमें पूर्णतया आत्मसात हो जातीं हैं। साहित्यकार की व्यष्टि से समष्टि और समष्टि से इष्ट तक की यात्रा तभी पूर्ण होती है जब वह पुरुष होकर नारी और नारी हो कर पुरूष की भावनाओं एवं संवेदनाओं को महसूस कर अभिव्यक्त कर सकते हैं। इतना ही नहीं प्रेम चंद जैसे साहित्यकारों ने तो पशुओं की भी अनुभूतियों, भावनाओं एवं संवेदनाओं का चित्रण बडी़ ही मार्मिकता से किया है – उनके द्वारा कथ्य दो बैलों की जोड़ी कहानी इस का सटीक उदाहरण है। कृशनचंदर द्वारा सर्जित एक गधे की आत्मकथा भी ऐसा ही एक ज्वलंत उदाहरण है। इसीलिये तो कहा गया है “जहां न पहुंचे रवि वहां पहुंचे कवि”। आवश्यकता है तो केवल इस बात की कि साहित्यकार अपने उत्तरदायित्वों को पूरी ईमानदारी से निभाएं क्योंकि साहित्य समाज का सिर्फ दर्पण ही नहीं होता है बल्कि समाज का मार्गदर्शन भी करता है।

इति।

डॉ प्रेम कृष्ण श्रीवास्तव 

(अतिथि संपादक- ई-अभिव्यक्ति)

20 अप्रैल 2019

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English Literature – Poetry – ☆ To Meera ☆– Ms Neelam Saxena Chandra

Ms Neelam Saxena Chandra

☆ To Meera ☆

( Ms. Neelam Saxena Chandra’ji succeeded to break illusion of Meera of so called Kaliyug.  If one can understand, it is a great message for woman.  Always pray almighty God Krishna but, don’t wait for him to solve your problems. Only you have to solve your problems. The great poem with great message for everyone.) 

Wake up Meera!

If someone sends you a basket

With cobra

And names it as a basket of flowers,

It won’t turn into a Krishna’s idol,

A cobra it shall remain!

 

Wake up Meera!

If you are delivered a cup of poison

Stating that it is nectar,

Even if you offer it to Krishna,

Poison it shall remain

And you shall die!

 

Wake up Meera!

If you jump in a river,

There shall be no Krishna

To make you float;

And drowning shall be your destiny!

 

Wake up Meera!

Learn to survive on your own!

Miracles don’t happen,

And no one comes to save anyone-

Seeing this ruthless, frigid and unsentimental world,

Even the Krishnas have disappeared;

You have to learn to swim

And cross oceans of life!

 

© Ms Neelam Saxena Chandra, Pune 

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