(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जीद्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शक्ति, सरलता और नई चेतना का पर्व…”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – कविता # २८३ ☆शक्ति, सरलता और नई चेतना का पर्व… ☆
नवरात्रि की महाअष्टमी, माँ शक्ति की आराधना का वह पावन क्षण है, जब श्रद्धा केवल शब्द नहीं रहती, बल्कि जीवन का आधार बन जाती है। यह दिन हमें बाहरी पूजा के साथ-साथ अपने अंतर्मन में भी एक दीप जलाने की प्रेरणा देता है।
“शक्ति स्वरूपा माँ जगदम्बे” महागौरी इसी निष्कलुष भक्ति का सजीव चित्र प्रस्तुत करतीं हैं, जहाँ कोई जटिल विधि-विधान नहीं, केवल सच्चे हृदय की पुकार है—
“पूजन अर्चन कुछ नहिं जानू,
जानू तो बस प्यार…”
इन सरल शब्दों में छिपा भाव आज की पीढ़ी के लिए एक गहरा संदेश है। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में जहाँ सब कुछ पाने की होड़ है, वहाँ यह भक्ति हमें ठहरना और अपने भीतर झाँकना सिखाती है। यह याद दिलाती है कि सच्ची शक्ति बाहरी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि मन की शांति, संतुलन और करुणा में निहित है।
महाअष्टमी केवल देवी पूजन का दिन नहीं, बल्कि आत्मचिंतन का भी अवसर है। आज जब प्रकृति हमें संतुलन बनाए रखने का संकेत दे रही है, तब “ग्रीन सोच” को अपनाना भी हमारी जिम्मेदारी बन जाती है।
जैसे हम माँ के चरणों में पुष्प अर्पित करते हैं, वैसे ही धरती माँ के प्रति भी कृतज्ञता प्रकट करें—एक पौधा लगाकर, जल और पर्यावरण की रक्षा करके।
यह पर्व हमें सिखाता है कि भक्ति का वास्तविक स्वरूप केवल मंदिरों तक सीमित नहीं, बल्कि हमारे व्यवहार, हमारी सोच और हमारे कर्मों में झलकना चाहिए।
महाअष्टमी पर यही संकल्प हो—
हम अपने भीतर की शक्ति को पहचानें, उसे सकारात्मक दिशा दें, और एक ऐसे भविष्य का निर्माण करें जहाँ भक्ति, प्रकृति और मानवता साथ-साथ आगे बढ़ें।
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक ज्ञानवर्धक आलेख – “बब्बर शेर ब्रिटिश साम्राज्य के राजचिन्ह का रूपक” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४०७ ☆
आलेख – साहित्य का ‘सम्मान’ बनाम ‘गुणवत्ता’ की कसौटी श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
सोशल मीडिया के इस दौर में स्थिति यह है कि लेखक बाद में पैदा होता है, सम्मानों की ‘फ़ेहरिस्त’ पहले तैयार हो जाती है। हर दूसरा व्यक्ति किसी न किसी ‘अकादमी’ या ‘फाउंडेशन’ का अंतरराष्ट्रीय अध्यक्ष है और एक दूसरे को ‘शताब्दी रत्न’ घोषित कर चुका है। ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या ये चमचमाती ट्राफियां और शॉल, रचना की साहित्यिक गुणवत्ता की गारंटी हैं?
साहित्यिक गुणवत्ता किसी प्रयोगशाला में मापी जाने वाली वस्तु नहीं है, बल्कि यह समय की कसौटी पर कसी जाने वाली निरंतरता तथा लेखन की पाठकीय पसंद , एवं उसकी उपयोगिता है। लेकिन वर्तमान समय में ‘साहित्यिक गुणवत्ता’ और ‘पुरस्कार’ के बीच का संबंध कुछ वैसा ही हो गया है जैसा राजनीति और नैतिकता का होता है, दोनों साथ दिखते जरूर हैं, पर होते बहुत दूर हैं।
आज लेखक की लेखनी से ज्यादा उसकी ‘लॉबिंग’ महत्वपूर्ण हो गई है। गुणवत्ता घर की खिड़की से झांकती रह जाती है और ‘जुगाड़’ दरवाजे से अंदर आकर मुख्य अतिथि की कुर्सी संभाल लेता है।
ऐसा हर छोटे बड़े पुरस्कार तथा सम्मान में देखने मिल रहा है। सम्मान मिलते ही लेखक को लगने लगता है कि वह अब आलोचना से ऊपर है। यही आत्म-मुग्धता गुणवत्ता के क्षरण का सबसे बड़ा कारण बनती है।
इतिहास गवाह है कि प्रेमचंद को जीते-जी कोई बड़ा सरकारी सम्मान नहीं मिला, पर आज उनके बिना साहित्य अधूरा है। दूसरी ओर, ऐसे सैंकड़ों ‘पुरस्कार प्राप्त’ लेखक हैं जिनकी किताबें आज कबाड़ के भाव भी कोई नहीं पढ़ना चाहता।
साहित्यिक गुणवत्ता का अंतर्संबंध पुरस्कारों से केवल तब ही सार्थक है, जब पुरस्कार ‘सृजन’ का परिणाम हो, न कि ‘अभियान’ का। जब किसी योग्य रचना को सम्मानित किया जाता है, तो सम्मान की गरिमा बढ़ती है, रचना की नहीं।
ऐसे पुरस्कार में विवाद नहीं होते । रचना तो अपनी गुणवत्ता के कारण पहले ही कालजयी हो चुकी होती है।
समकालीन विडंबना इसके विपरीत इसलिए है, क्योंकि गुण धर्मियों की उपेक्षा कर लॉबी जनित राजनैतिक प्रभाव से पुरस्कार तय हो रहे हैं।
आज के दौर में ‘सम्मान वापसी’ से लेकर ‘सम्मान पाने की होड़’ तक, साहित्य का बाजारवाद हावी है। गुणवत्ता कहीं हाशिए पर खड़ी इस बात का इंतज़ार कर रही है कि काश कोई पाठक बिना किसी ‘प्रशस्ति पत्र’ को देखे किताब के पन्ने पलटे।”सच तो यह है कि असली पुरस्कार पाठक की वह आँखें हैं, जो आधी रात को आपकी किताब पढ़ते हुए नम हो जाती हैं। बाकी सब तो ड्राइंग रूम की धूल झाड़ने वाली निर्जीव वस्तुएं हैं।”
पुरस्कार और गुणवत्ता का अंतर्संबंध तब तक ही पवित्र है जब तक चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और रचना में ईमानदारी है। यदि पुरस्कार केवल ‘रेवड़ियां’ बनकर बंटेंगे, तो वे गुणवत्ता को निखारने के बजाय उसे दफन करने का काम करेंगे। साहित्य को पदकों की नहीं, बल्कि उस ‘दृष्टि’ की जरूरत है जो समाज के अंधेरों को चीर सके।
Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!
🌼 PROSTATE HEALTH IN SENIOR MEN – A SIMPLE GUIDE 🌼
Dear friends, as we grow older, taking care of our body becomes even more important. One common issue in men above 50 is related to the prostate gland. Let us understand it calmly and clearly.
🔍 What is the Prostate?
The prostate is a small gland in men, located below the bladder. It helps in the reproductive system. With age, it often becomes enlarged.
⚠️ What Causes Prostate Problems?
The most common cause is ageing. As men grow older:
* Hormonal changes take place
* The prostate slowly enlarges (called BPH – benign enlargement)
Other contributing factors:
* Family history
* Lack of physical activity
* Obesity
* Poor diet
👉 Important: Not all senior men develop serious problems. Many live their entire lives with only mild symptoms or none at all.
📊 How Common is It?
* Around 50% of men above 60 have some prostate enlargement
* By age 80, it may affect up to 80–90% of men
* However, prostate cancer is much less common
* Only about 10–15% of men may develop prostate cancer in their lifetime
* Among those tested, many cancers are slow-growing and not life-threatening
🚫 Myth or Reality: Does Sexual Activity Prevent Prostate Problems?
👉 Reality (with clarity):
Some studies suggest that regular ejaculation may slightly reduce the risk of prostate cancer.
👉 But here is the truth:
❌ It is NOT a guaranteed protection
❌ It is NOT a medical treatment or prevention method
❌ Many men with normal sexual activity still develop prostate issues
✔️ So, this idea is often overstated and should not be relied upon as prevention.
⚕️ Why Does Prostate Cancer Develop?
In some men, prostate cells start growing abnormally due to:
* Age-related genetic changes
* Hormonal influence (especially testosterone)
* Family history
👉 Most prostate cancers grow very slowly, which is why early detection and monitoring are effective.
🛡️ Prevention & Care – What Can You Do?
🌿 Healthy Lifestyle
* Walk daily 🚶♂️ (30–40 minutes)
* Maintain healthy weight
* Eat more fruits & vegetables 🥦🍎
* Reduce red meat and fried foods
* Drink enough water 💧
* Avoid smoking and excess alcohol
🧘♂️ Simple Habits
* Do not hold urine for long
* Empty bladder properly
* Practise light yoga and breathing exercises
💊 Medical Care
* Regular check-up after age 50 (earlier if family history)
* PSA blood test, if advised by doctor
* Medicines are available to control enlargement
* Surgery is needed only in some cases
👉 Early consultation = Better outcomes
😊 Common Symptoms to Watch (Not to Panic!)
* Frequent urination, especially at night
* Weak urine flow
* Difficulty starting urination
* Feeling of incomplete emptying
👉 These are usually due to benign enlargement, not cancer.
🌸 Final Thought
Most prostate problems are manageable, slow, and non-dangerous when detected early. With a balanced lifestyle and timely medical advice, one can live a healthy and comfortable life.
📢 This information is based on established medical 😭science. Please share it with friends and family so that more people can benefit from correct awareness.
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – मिशन विसर्जन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ८७ – व्यंग्य – मिशन विसर्जन ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
अरे भैया राम-राम! क्या बताएँ, हमारे मोहल्ले के झुनझुनवाला जी का जो यूरेका-यूरेका है न, वो आर्किमिडीज वाला कम और बॉर्डर वाला सर्जिकल स्ट्राइक ज्यादा लगता है। आर्किमिडीज ने तो टब में बैठ के सिद्धांत खोजा था, पर हमारे झुनझुनवाला जी जब बाथरूम से मुस्कुराते हुए, हवा में मुक्का लहरा के निकलते हैं, तो समझ लो आज उन्होंने गुरुत्वाकर्षण को पटखनी दे दी है। मोहल्ले में सन्नाटा ऐसा रहता है जैसे वर्ल्ड कप के फाइनल में आखिरी गेंद पर छह रन चाहिए हों और स्ट्राइक पर खुद झुनझुनवाला जी का पेट खड़ा हो। सस्पेंस तो देखिए, कबाड़ी भाई हाथ में सिगरेट का बंडल और कड़क चाय की प्याली लेकर ऐसे टहलते हैं जैसे किसी सुसाइड मिशन पे जा रहे हों। बोले— “अरे लल्लन भैया, जब तक ई कैफीन की मिसाइल अंदर जाके धमाका नहीं करती, तब तक नीचे का गेटवे ऑफ इंडिया खुलता ही नहीं है!” उनके पेट को भी रिश्वत चाहिए, बिना ‘पेमेंट’ के वहां का ट्रैफिक सिग्नल लाल ही रहता है। अजीब स्थिति हैं भाई, कोई नाभि के पास सरसों का तेल रगड़ रहा है, तो कोई कहता है कि जब तक हम मोहल्ले के उस काले कुत्ते को दो बार जोर से डांट न लें, तब तक विसर्जन का भाव ही नहीं जागता।
हमारे हेडमास्टर चौरसिया जी का पेट तो भाई साहब एकदम उसूलों वाला है। जब तक दैनिक जागरण का संपादकीय पढ़ के दो-चार भ्रष्ट नेताओं को मन ही मन सस्पेंड न कर दें, तब तक कुदरत अपनी फाइल आगे नहीं बढ़ाती। चौरसिया जी का एडिटर जब तक खुश नहीं होता, तब तक वो एक इंच नहीं हिलते। वहीं दूसरी तरफ, खन्ना जी बाथरूम में जाकर किशोर कुमार के दर्द भरे नगमे गाते हैं। उन्हें लगता है कि मेरे नैना सावन-भादो गाने से अंदर की खुश्की सावन में बदल जाएगी। संगीत का ऐसा प्रेशर-कुकर उपयोग आपने पहले कभी नहीं देखा होगा। उधर एडवोकेट साहब हैं, जो टॉयलेट की सीट पर बैठकर सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले और दलीलें पढ़ते हैं। उनका मानना है कि जब तक दिमाग पर लीगल प्रेशर नहीं पड़ता, तब तक कुदरत अपना फाइनल जजमेंट नहीं सुनाती। कोई सुबह-सुबह बायीं आंख मींचकर दायीं नाक से ऐसी लंबी सांस खींचता है जैसे सारा ब्रह्मांड अंदर भर लेगा, उसका दावा है कि इससे इंजन रिवर्स गियर से सीधा टॉप गियर में आ जाता है।
बात यहीं खत्म नहीं होती, हमारे मोहल्ले में तो केमिकल लोचा के उस्तादों की फौज है। चुलबुली चाची का लॉजिक है कि जब तक पेट को आधा चम्मच हींग और काला नमक का हैंड ग्रेनेड न दिया जाए, तब तक मोर्चा नहीं खुलेगा। कोई त्रिफला चूर्ण को ऐसे फांक रहा है जैसे वो अमृत हो, तो कोई रात भर भिगोई हुई इक्कीस किशमिश को सुबह ऐसे घूरता है जैसे पुराने उधार की वसूली करनी हो। एक महाशय तो दीवार के सहारे पैर ऊपर करके शीर्षासन में अपनी किस्मत ढूंढ रहे हैं, तो कोई धनुरासन में ऐसा तना है कि बस अभी तीर छूटने ही वाला है। कुछ लोग तो और भी हाई-टेक हैं, वो बाथरूम में पावर बैंक और ईयरफोन लेकर जाते हैं क्योंकि उनका कहना है कि संदीप माहेश्वरी का मोटिवेशनल पॉडकास्ट सुनने से ध्यान भटकता है और पेट को परफॉर्म करने की क्रिएटिव आजादी मिलती है। उधर मास्टर जी पुराने स्कूल के रजिस्टर खोलकर बैठ जाते हैं क्योंकि अनुपस्थित छात्रों की एब्सेंट लिस्ट देखने से पेट का पुराना स्टॉक भी प्रेजेंट हो जाता है।
जुगाड़ नंबर पच्चीस से आगे बढ़िए तो इमेजिनेशन के उस्ताद मिलते हैं। कुछ लोग आंखें बंद करके सावन की झड़ी या बहते हुए नलों की कल्पना करते हैं, इस उम्मीद में कि शायद अंदर भी लिक्विडिटी बढ़ जाए। एक प्रजाति ऐसी है जो पुराने ट्रांजिस्टर की तरह पेट के दायीं तरफ हल्के हाथ से ट्यूनिंग करती है कि शायद कोई फ्रीक्वेंसी मैच हो जाए। हमारे ताऊ जी तो कहते हैं— “बेटा, जब तक हम पड़ोसी की नई कार को देख के थोड़ा जल न लें, तब तक हमारा हाजमा दुरुस्त नहीं होता।” अब बताइए, ईर्ष्या का कब्ज से क्या रिश्ता? लेकिन यहां तो भावनाओं का गठबंधन चल रहा है। कोई पैर के नीचे स्टूल दबाकर बैठा है, तो कोई दीवार पर छिपकलियों के युद्ध का लाइव टेलीकास्ट देख रहा है। कोई सुबह-सुबह तांबे के लोटे का बासी पानी ऐसे पीता है जैसे वो गंगाजल हो, तो कोई बाथरूम की दीवार पर अपनी मुट्ठियां मार रहा है कि शायद शारीरिक कंपन से कुछ काम बन जाए।
अगली श्रेणी उन तेल मालिशिया लोगों की है जो नाभि में चमेली का तेल डाल के लेटे रहते हैं जैसे पेट नहीं, कोई बेशकीमती विंटेज कार का इंजन हो। एक भाई साहब तो ऐसे हैं जो सुबह-सुबह बासी मुंह अपनी पुरानी प्रेमिका की फोटो देखते हैं, उनका कहना है कि पुरानी यादों का दबाव पेट के दबाव को सक्रिय कर देता है। कुछ लोग तो बाथरूम के अंदर मल्टी-टास्किंग के चैम्पियन होते हैं—वहां बैठकर वो बच्चों का होमवर्क भी चेक कर लेते हैं और घर का पूरा बजट भी बना डालते हैं। उन्हें लगता है कि दिमागी बोझ बढ़ने से गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत ज्यादा मजबूती से काम करेगा। कोई गरम दूध में दो चम्मच शुद्ध देसी घी ऐसे मिलाता है जैसे रॉकेट में लिक्विड फ्यूल डाल रहा हो। चेहरे पर ऐसी गंभीरता जैसे नासा का कोई सैटेलाइट ऑर्बिट में सेट करने जा रहे हों। सस्पेंस ये है कि अगर आज घी ने काम नहीं किया, तो मास्टर जी स्कूल नहीं, सीधे सीधे डिप्रेशन में चले जाएंगे।
हमारे मोहल्ले के पंडित जी कहते हैं कि जब तक सुबह उठकर सूर्य देव को जल न चढ़ाओ और अच्युतम केशवम का जाप न करो, तब तक आंतरिक शांति नहीं मिलती। वहीं पास के दुबे जी का बेटा सुबह-सुबह खाली पेट कच्चा लहसुन ऐसे चबाता है जैसे वो कोई विदेशी च्युइंगम हो, पूरा घर उसकी गंध से बेहोश हो जाता है पर उसका आगमन नहीं होता। कुछ लोग तो रात को सोते समय पैरों के तलवों में विक्स लगाते हैं, उन्हें लगता है कि ठंडक नीचे से ऊपर की तरफ प्रेशर बनाएगी। एक महाशय तो ऐसे हैं जो सुबह-सुबह अपनी घड़ी के अलार्म को पांच-पांच मिनट पर सेट करते हैं, उनका मानना है कि समय की टिक-टिक पेट को याद दिलाती है कि अब उसकी शिफ्ट शुरू हो चुकी है। कोई सुबह उठकर छत पर जाकर कौओं को रोटी खिलाता है, इस उम्मीद में कि शायद दान-पुण्य से कुदरत का दिल पिघल जाए और फाइल आगे बढ़ जाए।
कुछ लोग तो बाथरूम में बैठकर पुरानी डायरियां पढ़ते हैं जिनमें उन्होंने लोगों से लेने वाले उधार की लिस्ट बनाई होती है। जैसे ही उन्हें याद आता है कि फलाने ने उनके पांच सौ रुपये नहीं दिए, वैसे ही गुस्से के मारे पेट में हलचल शुरू हो जाती है। एक भाई साहब तो ऐसे हैं जो सुबह उठकर सबसे पहले अपनी सासू मां को फोन लगाते हैं, उनका दावा है कि सासू मां की तीखी आवाज सुनते ही अंदर का सारा तंत्र डिफेंस मोड में आकर विसर्जन की प्रक्रिया तेज कर देता है। कोई दीवार पर टंगी छिपकली को घूरता है, तो कोई फर्श की टाइल्स के डिजाइन गिनने लगता है। कुछ लोग तो बाथरूम के नल की टिप-टिप आवाज के साथ अपनी धड़कनें मिलाते हैं। एक सज्जन तो ऐसे हैं जो टॉयलेट सीट पर बैठकर स्टॉक मार्केट का उतार-चढ़ाव देखते हैं, जैसे ही सेंसेक्स गिरता है, उनका प्रेशर बढ़ जाता है।
पराकाष्ठा तो तब होती है जब झुनझुनवाला जी अंदर होते हैं और बाहर पूरी पंचायत बैठी होती है। वहां चर्चा चलती है कि आज क्या नया पैंतरा अपनाया गया होगा? क्या आज उन्होंने एलोवेरा का जूस पिया है? या क्या आज उन्होंने रात को सोते समय त्रिफला की जगह कामोद चूर्ण का भारी डोज लिया है? कोई कहता है कि झुनझुनवाला जी आज सुबह-सुबह अग्निसार क्रिया कर रहे थे, जिसमें पेट को ऐसे हिलाते हैं जैसे मिक्सर ग्राइंडर चल रहा हो। दूसरा कहता है कि नहीं भाई, आज उन्होंने नीम की पत्तियां चबाई हैं। मोहल्ले का माहौल ऐसा है जैसे किसी वैज्ञानिक प्रयोग का सफल परीक्षण होने वाला हो। हर कोई अपनी-अपनी थ्योरी दे रहा है, पर असली हकीकत तो सिर्फ उस बंद दरवाजे के पीछे छिपी है। वहां सन्नाटा ऐसा है कि अगर अंदर कोई सुई भी गिर जाए, तो बाहर चौरसिया जी को सुनाई दे जाए।
तभी अचानक, एक जोरदार धमाका हुआ! नहीं भैया, कोई सिलेंडर नहीं फटा और न ही भूकंप आया। वो तो झुनझुनवाला जी के बाथरूम का दरवाजा धड़धड़ाते हुए खुला। मोहल्ले वाले जो साँसें रोके खड़े थे, एकदम सीधे हो गए। लेकिन ये क्या? झुनझुनवाला जी के चेहरे पर वो यूरेका वाली विजयी मुस्कान नहीं थी। उनके कंधे झुके हुए थे, चेहरा पीला पड़ चुका था और वो लड़खड़ाते हुए सीधे सोफे पर आकर ढह गए। हम सब भागे— “क्या हुआ झुनझुनवाला जी? आज तो आपने सैकड़ों जुगाड़ लगाए थे! घी, तेल, हींग, सिगरेट, अखबार, शीर्षासन, रील्स… कुछ तो काम आया होगा? क्या आज भी सन्नाटा ही पसरा रहा?” झुनझुनवाला जी ने एक ठंडी आह भरी, अपनी सूजी हुई आँखों से हमारी तरफ देखा और कांपते हाथों से अपना मोबाइल हमारी तरफ बढ़ा दिया। स्क्रीन पर उनकी पत्नी का व्हाट्सएप मैसेज खुला था जो उन्होंने ठीक दो मिनट पहले बाथरूम के अंदर पढ़ा था।
झुनझुनवाला जी बोले— “अरे लल्लन भैया, सारे जुगाड़ फेल हो गए! विज्ञान, योग, तंत्र-मंत्र और चूर्ण… सबने हाथ खड़े कर दिए थे। लेकिन जैसे ही मैंने मैसेज पढ़ा कि ‘अजी सुनते हो, मेरा भाई (साला) अपने चार बच्चों और पत्नी के साथ पूरे एक महीने के लिए हमारे घर रहने आ रहा है और स्टेशन पहुँच चुका है’… भाई साहब, कसम गंगा मैया की, उस ‘खौफ’ के मारे पेट ने वो ‘सरेंडर’ किया है कि सारा कब्ज पल भर में काफूर हो गया! सारा कचरा ऐसा बाहर निकला जैसे तिहाड़ जेल का गेट टूट गया हो। असली जुगाड़ तो ‘साले का आगमन’ है भैया, बाकी सब मोह-माया है! जब मौत सामने खड़ी हो और बीवी का मायका घर आ रहा हो, तो कुदरत क्या, खुद विधाता को भी रास्ता देना पड़ता है!”
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “उम्मीद की भैंस…“।)
अभी अभी # ९५४ ⇒ आलेख – उम्मीद की भैंस श्री प्रदीप शर्मा
मुझे भैंस से विशेष लगाव है, और अधिकतर मैं इसी का दूध पीता चला आया हूं क्योंकि इसका दूध गाढ़ा और मलाईदार होता है। गाय का दूध अधिक पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है, यह जानते हुए भी शायद मेरी अक्ल घास चरने चली जाती है, जो मैं अधिक मलाई और स्वाद के चक्कर में भैंस के दूध को ही अधिक पसंद करता हूं।
बचपन में मैंने भी बहुत गाय का दूध पीया है। सुबह स्विमिंग पूल में तैरने जाना और वापसी में एक ग्वाले के यहां पीतल के बड़े ग्लास में शुद्ध गाय के इंस्टंट यानी ताजे कच्चे दूध का सेवन करना और अपनी सेहत बनाना।।
आज भी केवल दो ही दूध तो आम है, गाय का और भैंस का। होता है बकरी का दूध भी, जिसे गांधीजी पीते थे। जो लोग बकरी पालते हैं, वे बकरी का तो दूध पी जाते हैं और बकरा बेच खाते हैं। बकरा खाने से बकरा बेच खाना उनके लिए अधिक आय का साधन भी हो सकता है।
भैंस की तरह बकरी भी उम्मीद से होती है। वह भी खैर मनाती होगी कि बकरी ही जने। अगर बकरी हुई तो दूध देगी और अगर बकरा हुआ तो वह बलि का बकरा ही कहलाएगा। अगर बकरी का भी उम्मीद के वक्त भ्रूण परीक्षण हो, तो वह भी मेमना गिरा देना ही पसंद करेगी। मुर्गी दूध नहीं अंडे देती है और अगर उम्मीद से हुई तो मुर्गा भी दे सकती है। आज तक किसी उम्मीद की मुर्गी ने सोने के अंडे नहीं दिए, खाने के ही दिए हैं।।
उम्मीद पर दुनिया जीती है। भैंस ही उम्मीद से नहीं होती, गाय भी उम्मीद से होती है। वह भी या तो बछिया जनेगी अथवा बछड़ा। दान की बछिया के दांत नहीं गिने जाते, यानी यहां भी बछड़े का दान नहीं होता, बछिया देख किसकी बांछें नहीं खिलेंगी। रोज जब भी शिव जी को जल चढ़ाएं तो नंदी महाराज को नहीं भूलें, लेकिन अगर उम्मीद की भैंस पाड़ा जन दे, तो नाउम्मीद ना हों, समझें एक और नंदी ने अवतार लिया है।
प्राणी मात्र की सेवा से पुण्य मिलता है, लेकिन ईश्वर गवाह है, गौ सेवा की तो बात ही निराली है। गाय भैंस पालने के लिए तो आपको डेयरी खोलनी होगी, स्टार्ट अप में इसका भी प्रावधान है। आप चाहें तो देश में फिर से घी दूध की नदियां बहा सकते हैं। उम्मीद पर ही तो दुनिया कायम है। कुक्कुट पालन भी एनिमल हस्बेंड्री का ही एक प्रकार है। सेवा की सेवा, और मेवा ही मेवा।।
भैंस में भले ही अक्ल ना हो, वह चारा खाती हो, लेकिन जिनकी अक्ल भैंस चरने नहीं जाती, वे ही भैंस का चारा खा सकते हैं। आम के आम और गुठलियों के दाम। चारा बेचने से चारा खाने में अधिक समझदारी है। यानी भैंस का दूध भी डकारा और चारा भी खा गए। मेरे भाई, फिर गोबर को क्यूं छोड़ दिया।
अन्य पशुओं की तुलना में भैंस अधिक शांत प्राणी है, क्योंकि मन की शांति के लिए ये कहीं हिमालय नहीं जाती, बस चुपके से पानी में चली जाती है। आप भी पानी में पड़े रहो, देखिए कितनी शांति मिलती है। हर भैंस पालक की भी यही उम्मीद होती है कि उसकी भैंस अधिक दूध दे, और जब भी जने, तो बस पाड़ी ही जने, पाड़ा ना जने।।
(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
– हिंदी आंदोलन परिवार का वार्षिक सम्मान समारोह सम्पन्न – ☆ साभार – श्री संजय भारद्वाज –
हिंदी आंदोलन परिवार का वार्षिक सम्मान समारोह शनि. दि.21 मार्च 2026 को सम्पन्न हुआ। विश्व कविता दिवस के परिप्रेक्ष्य में इसी समारोह में संस्था की 314वीं साहित्यिक गोष्ठी भी हुई। यह संस्था की होली विशेष गोष्ठी थी। संस्था के सदस्य विगत तीन दशकों से होली गोष्ठी में फूलों से होली खेलते हैं।
इस आयोजन में दूरदर्शन के भूतपूर्व कार्यक्रम अधिकारी डॉ. अश्विनी कुमार को भाषा एवं संगीत के क्षेत्र में उनके महती योगदान के लिए ‘हिंदीभूषण’ सम्मान से अलंकृत किया गया।
श्रीमती अमीता शाह को समाजसेवा एवं डॉ पुष्पा गुजराथी को साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘हिंदीश्री’ सम्मान से अलंकृत किया गया।
श्री संजय भारद्वाज
कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ शिक्षाविद एवं लोकसाहित्य मर्मज्ञ प्रा. महेंद्र ठाकुरदास ने की। अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में उन्होंने कहा कि विश्व की रचना ही कविता से हुई है। जिस दिन पहली कविता जन्मी, उसी दिन विश्व भी जन्मा। अपने भीतर के रूप को देखने और प्रकट करने के लिए मनुष्य साहित्य और कला की प्रस्तुति करता है। जब तलवारें टूट जाती हैं, तब साहित्य सीमाओं की रक्षा करता है।
डॉ अश्विनी कुमार ने कहा कि मैंने आज तक जो भी किया, कभी उसका आकलन नहीं किया किंतु ललक बहुत है कि अपना श्रेष्ठतम दे सकूंँ। हिंदी आंदोलन परिवार से अपने वर्षों पुराने संबंधों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इस परिवार से जो जुड़ता है, कभी विलग नहीं होता है।
श्रीमती अमीता शाह ने कहा कि समाज के प्रति कुछ सकारात्मक करने के विचार ने मुझे सामाजिक कार्यों से जोड़ा। प्रकृति में आप जो देते हैं, वही पाते हैं, समाज से सम्मान पाना संभवतः ऐसी ही क्रिया- प्रतिक्रिया का उदाहरण है।
डॉ. पुष्पा गुजराथी ने कहा कि जब वह कैंसर से जूझ रही थीं, भारद्वाज युगल संजीवनी बनकर उनके साथ खड़ा रहा, उन्हें सृजन के लिए प्रेरित करता रहा। यह आत्महंता के क्षणों में मेरे हाथों में कलम थमाकर एक सूरज को प्रशस्त करने जैसा था।
अपनी प्रस्तावना में हिंआंप के अध्यक्ष संजय भारद्वाज ने संस्था की अब तक की यात्रा की संक्षिप्त जानकारी दी। उन्होंने बताया कि संस्था को सांसद डॉ. मेधा कुलकर्णी, डॉ. विजय भटकर, डॉ. विश्वनाथ कराड, डॉ. दामोदर खडसे जैसी विभूतियों को सम्मानित करने का अवसर मिला है।
आयोजन में उपस्थित प्रमुख रचनाकारों एवं अतिथियों में मेजर सरजूप्रसाद, वीनु जमुआर, आराधना कुमार, डॉ. अनिता जठार , दीप्ति सिंह, नेहा म्हस्के, डॉ ज्योति कृष्ण,श्री कृष्ण चंद्र मिश्रा, डॉ मंजु चोपड़ा, मनमोहन चड्ढा, आदर्शिनी श्रीवास्तव, अभय श्रीवास्तव,अवनीश कुमार, रीतिका कुमार, नरेंद्र कौर छाबड़ा,वेदस्मृति ‘कृती’, अभिषेक पाण्डेय, जिज्ञासा ठाकुरदास, मिश्रा परिवार आदि सम्मिलित थे।
समारोह का संचालन श्रीमती गौतमी चतुर्वेदी पांडेय ने किया। श्री सुधीर कुमार मिश्रा ने गोष्ठी का प्रायोजन किया।
उल्लेखनीय है कि हिंदी आंदोलन परिवार विगत 31 वर्षों से भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में अखंड कार्यरत है।
साभार – श्री संजय भारद्वाज, अध्यक्ष, हिंदी आंदोलन परिवार
≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
☆ राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी 2026, मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी,भोपाल का आयोजन ☆ साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆
बाल साहित्य की बहुरंगी धारा: 20+ नई कृतियों का भव्य विमोचन
राष्ट्रीय बाल साहित्य संगोष्ठी 2026 का आयोजन मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी, भोपाल द्वारा एन.आई.टी.टी.टी.आर. (श्यामला हिल्स), भोपाल में 13-14 मार्च 2026 को दो दिवसीय भव्य रूप में संपन्न हुआ। यह संगोष्ठी भारत के प्रथम बाल साहित्य सृजन पीठ के निदेशक, ‘देवपुत्र’ बाल मासिक के पूर्व संपादक तथा बाल साहित्य के पुरोधा कीर्तिशेष श्रद्धेय कृष्ण कुमार अष्ठाना जी की स्मृति को समर्पित थी।
आदरणीय डॉ. विकास दवे (मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक) के आदेशानुसार और मार्गदर्शन में आयोजित इस संगोष्ठी में देशभर से बाल साहित्यकार, शोधार्थी, शिक्षक और बाल-साहित्य प्रेमी सम्मिलित हुए। संगोष्ठी के दौरान कुल 10 सत्रों में क्रमवार पुस्तक विमोचन का विशेष आयोजन किया गया, जिसमें 11 रचनाकारों की 20 से अधिक नई कृतियाँ बच्चों के समक्ष प्रस्तुत की गईं।
ये कृतियाँ बाल साहित्य की विविध विधाओं—कविता, कहानी, बालगीत, पत्र-लेखन, व्यंग्य, संस्कृति-आधारित गद्य—को समेटती हैं। ये पुस्तकें बच्चों के मनोरंजन, ज्ञानवर्धन, मूल्य-शिक्षा, राष्ट्रप्रेम, पर्यावरण चेतना तथा सांस्कृतिक जड़ों से गहरा जुड़ाव पैदा करने में महत्वपूर्ण योगदान देंगी। विमोचन समारोह ने बाल साहित्य की समृद्धि को नई ऊर्जा प्रदान की तथा रचनाकारों को पाठकों से जोड़ने का सशक्त माध्यम बना।
विमोचित प्रमुख कृतियाँ का विवरण निम्न अनुसार है –
सर्वप्रथम डॉ. मीनाक्षी दुबे, भोपाल की पाती लेखन विद्या की पुस्तक— नौनिहालों के: पाती वीर सपूतों की, का विमोचन किया गया। इस पाती संग्रह की पुस्तक की प्रत्येक रचना बच्चों को संबोधित करते हुए काल्पनिक पत्र के रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे बच्चे महान विभूतियों जैसे भगत सिंह के साहस, रानी लक्ष्मीबाई की निर्भयता आदि को व्यक्तिगत रूप से निकट महसूस करें। पुस्तक में राष्ट्रप्रेम, साहस, सत्य, त्याग और अनुशासन के मूल्यों को हृदयंगम करने का उद्देश्य है, ताकि प्रत्येक बच्चा बेहतर नागरिक बनने की प्रेरणा प्राप्त करे।
दूसरे सत्र में किशोर श्रीवास्तव, ग्रेटर नोएडा, उ.प्र. की पुस्तकों का विमोचन किया गया। लेखक की अब तक लगभग 15 बाल पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। ये बाल कलाकारों पर लघु फिल्में बनाते हैं। इस सत्र में इनकी तीन पुस्तकें का विमोचन किया गया। पहली – विश्वास की रक्षा (चित्रमय 7 कहानियाँ, 48 पृष्ठ), घर, परिवार और रिश्तों की प्रेरक बाल कहानियाँ और दूसरी – मेहनत का फल (चित्रमय 4 कहानियाँ, 32 पृष्ठ)— पारिवारिक एवं सामाजिक प्रेरक कहानियाँ संकलित की गई हैं। सभी कहानियाँ पूर्व में लोटपोट, नंदन, बाल किलकारी, बच्चों का देश, दैनिक जागरण, दैनिक सन्मार्ग, बालवाणी आदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। एक तीसरी पुस्तक- खुशियों की वापसी, जिसमें चित्रमय 5 कहानियाँ, 32 पृष्ठ हैं जिसमें राजा-महाराजा युग की शिक्षाप्रद कहानियाँ सम्मिलित की गई है का विमोचन हुआ।
तीसरे सत्र में डॉ. भैरूँलाल गर्ग, भीलवाड़ा, राजस्थान; संपादक- बालवाटिका की पुस्तक — चलो चलें नानी के गाँव (बालकाव्य संग्रह) का विमोचन किया गया। यह बहुरंगी पुस्तक (40 पृष्ठ) में 20 कविताएँ हैं, जो बालक एवं किशोरों के परिवेश, ऋतु, पर्व, पर्यावरण, प्रकृति और मनोरंजन से जुड़ी हैं। चयन-संपादन एवं भूमिका डॉ. प्रकाश मनु जी की है, जो कविताओं की गुणवत्ता को और निखारती है।
चौथा विमोचन श्रीमती समीक्षा तैलंग, ग्वालियर/पुणे, की पुस्तक, जो व्यंग्य विधा पर आधारित है जिसका नाम — बेड़ा गर्क है, का विमोचन किया गया। इस व्यंग्य निबंध में समाज की विसंगतियों पर व्यंग्य व प्रहार किया गया है। वरिष्ठ समालोचक सुभाष चंदर जी के अनुसार, नये विषय, ट्रीटमेंट और शिल्प से यह पुस्तक अंदर तक झकझोर देगी।
अगले सत्र में पांचवा विमोचन शिवम सिंह, कानपुर देहात के गीतकार की बाल गीत पुस्तक — नन्हे मुन्ने गीत का विमोचन किया गया। यह उनकी पहली प्रकाशित कृति है जो 2023 में प्रकाशित हुई थीं। जिसका विमोचन अब हुआ। इसमें संगृहीत शिशुगीत की सहजता से सरल भावनाओं, जिज्ञासा और कल्पना को छूते हैं, जो छोटे बच्चों के लिए आदर्श है।
अगला विमोचन, सत्र के समापन में डॉ. सुधा गुप्ता ‘अमृता’, कटनी, म.प्र. की दो पुस्तकें का किया गया। इसमें उनकी पहली पुस्तक – बुंदेली संस्कृति के रंग, जिसकी विधा: गद्य है। यह मध्यप्रदेश की आंचलिक बोलियों में बाल गीत एवं खेल गीत, लोक संस्कृति से परिचय करती है। मध्य प्रदेश आदिवासी लोक भाषा विभाग, भोपाल द्वारा प्रकाशित की गई है। पुस्तक आंचलिकता से भरपूर है, जो साहित्य को समृद्ध करती है। उनकी दूसरी पुस्तक जो कल विधा पर आधारित है- छई छपाक छपर छपर, जिसमें 22 बाल कविताएं संग्रहित है। जो बच्चों को छह ऋतुओं से रूबरू करवाती हैं ।
अगली पुस्तक सुषमा सिंह, दिल्ली की पहली पुस्तक— नन्हा पाखी और दूसरी पुस्तक – कच्चा पापड़ हैं। इसमें छन्द मुक्त बाल कविताएँ सम्मिलित की गई है। ये कविताएँ बच्चों की कल्पना, भावनाओं और दैनिक जीवन की छोटी-छोटी खुशियों को पंख लगा कर कल्पना को उड़ान देती हैं। यह सरल भाषा में गहन संदेश देती हैं। वही माधुरी व्यास “नवपमा”, इंदौर के कविता संग्रह— अनुभति, का विमोचन किया गया। इसमें 64 नई कविताओं का संकलन किया गया है। जिसमें आत्मानुभूति से उपजी प्रबल भावपक्ष की रचनाएँ सम्मिलित हैं। मानवीय संवेदना, वेदना, रिश्तों में प्रेम, यादें, प्रकृति, मौसम और पर्यावरण जैसे विषय सम्मिलित हैं, जो पाठक को गहराई से छूते हैं।
प्रसिद्ध बाल साहित्यकार डॉ. मंजरी शुक्ला के कहानी संग्रह — उड़ चले जादुई बर्तन, का विमोचन किया गया है। इसमें जादुई और मनोरंजक कहानी, जिसमें उड़ने वाले जादुई बर्तन, अन्न के सम्मान की शिक्षा देते हैं। भोजन बर्बादी रोकने और अन्न की महत्ता समझाने का संदेश—बच्चे पढ़ने के बाद अन्न के प्रति संवेदनशील बनाते हैं।
सुप्रसिद्ध साहित्यकार नीलम राकेश, लखनऊ, के बाल कहानी संग्रह की पुस्तक – सतरंगी दुनिया, जिसमें नौ प्रेरक कहानियाँ, जो बच्चों के लिए चुनिंदा विषयों पर आधारित हैं, का विमोचन किया गया। इनकी दूसरी पुस्तक – The Rainbow World — जिसका अंग्रेजी अनुवाद डॉ. राकेश चंद्रा द्वारा किया गया है, का विमोचन किया गया।
प्रोफेसर प्रभा पंत, हल्द्वानी, उत्तराखण्ड किसी परिचय की मोहताज नहीं है कि बाल साहित्य की 8 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं । उनकी तीन पुस्तकें , जिसमें पहली – मुझको सूरज बनना है, (कविता संग्रह) जिसमें प्रेरणा और ऊर्जा से भरपूर कविताएँ सम्मिलित हैं। दूसरी पुस्तक – डिबिया में बंद चींटी (कहानी संग्रह) — जिसमें छोटी-छोटी घटनाओं से बड़े सबक सिखाती कहानियाँ संकलित है। तीसरी पुस्तक – मेरी प्रिय बाल कहानियाँ— जिसमें उनकी चयनित प्रिय कहानियों का संग्रह है। का विमोचन किया गया।
डॉ अशोक व्यास जी के निबंध, जिसका नाम, “स्वप्न भंग का अनवरत सिलसिला”, का लोकार्पण किया गया। इसी के अंत में नीमच से प्रकाशित- राष्ट्र समर्पण, मासिक पत्रिका विमोचन किया गया जो पिछले 21 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रहा है। जिसके संपादक शारदा संजय शर्मा है।
यह विमोचन बाल साहित्य की बहुरंगी विविधता को दर्शाता है तथा बच्चों के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण योगदान देगा। डॉ. विकास दवे जी के मार्गदर्शन में यह आयोजन बाल साहित्य के उत्थान का एक ऐतिहासिक पड़ाव सिद्ध हुआ।
सभी रचनाकारों को हार्दिक बधाई एवं उनके भावी सृजन के लिए शुभकामनाएँ!
——–
साभार – श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”
25/03/2026
संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226