हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ५० – भरोसा… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – भरोसा।)

☆ हेमंत साहित्य # ५० ☆

✍ भरोसा… ☆ श्री हेमंत तारे  

बिजली की तार पर

या

पतली सी डगाल पर

सोते,

ऊंघते,

परिन्दे देखकर

लगता है ऐसा

 

कि

नही गिरेंगे वो

कभी भी नींद में

किसी भी तार से

किसी भी डगाल से ।

 

कि

भरोसा है उन्हें

उस पर

जो दिखता तो नही

पर है

यहाँ,

वहाँ,

सर्वत्र ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५९ ⇒ ॥ गणगौर॥ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “॥ गणगौर॥ ।)

?अभी अभी # ९५९ ⇒ आलेख – ॥ गणगौर॥ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

लोग जब मुझसे जन्म तारीख पूछते हैं तो मेरा जवाब होता है 1 अप्रैल लेकिन जब कोई मुझे जन्म तिथि पूछता है तो मुझे गणगौर बोलना पड़ता है। ‌

वैसे व्रत तिथि और वार त्यौहार के बारे में मेरी जानकारी इतनी पुष्ट नहीं है लेकिन फिर भी केवल इतना याद है कि जिस दिन मेरा जन्म हुआ उस दिन गणगौर थी।

संयोग से आज ईद है और गणगौर भी, यानी मेरी जन्म तिथि भी आज ही है। बचपन में केवल मां को मेरा जन्मदिन याद रहता था। जब स्कूल में दाखिला लिया तब जन्म तारीख 1 अप्रैल लिखाई गई बस तब से रेकॉर्ड में 1 अप्रैल ही दर्ज है। अपनी खुशी के लिए आज भी मैं अपना जन्मदिन गणगौर के अवसर पर ही मनाना पसंद करता हूं, क्योंकि गणगौर से मेरी मां और ननिहाल की स्मृति जुड़ी हुई है।।

जन्मदिन के अवसर पर अगर कोई पर्व अथवा उत्सव भी हो तो सोने में सुहागा, एक तरह से हमारा जन्मदिन पूरी दुनिया मनाती है। तिथि और तारीख का यह अंतर हमेशा जन्मदिन को दो तारीखों में बांट देता है। क्या ऐसा कोई उपाय नहीं की हमारी जन्मदिन की तिथि और तारीख एक ही दिन कर दी जाएं।

वैसे दो दो बार पैदा होना, और दो विभिन्न दिनों पर जन्मदिन मनाना भी इतना बुरा नहीं। एक जन्मदिन पारिवारिक खुशी का और एक समाजिक, औपचारिक और व्यावहारिक जगत का। आज घर घर गणगौर की पूजा होती है, व्रत उपवास होते हैं, गुड़ के गुने के साथ साथ ही पकवान, मिष्ठान्न भी बनाए जाते हैं। नवरात्रि का उत्साह इस खुशी को और अधिक महत्वपूर्ण बना देता है।।

आप बधाई दें, अथवा ना दें, आज का दिन मेरे लिए विशेष है, क्योंकि ना फोन पर जन्मदिन की बधाई और ना ही फेसबुक, व्हाट्सएप पर जन्मदिन के शुभकामना संदेश। खुद ही अपना जन्मदिन मनाओ और खुश हो लो, अपने परिवार के बीच ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५९ ☆ लघुकथा – अपने पराये… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “अपने पराये“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५९ ☆

✍ लघुकथा – अपने पराये… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

सुभाष और मनोज बचपन से दोस्त हैं।  हालांकि सुभाष मनोज से तीन चार साल बड़े हैं पर दोस्ती में कोई फ़र्क नहीं । पढाई में भी दो साल का अंतर रह। यह अंतर आखिर तक बना ही रहा क्योंकि पढाई में दोनों एक जैसे थे। पोस्ट ग्रेजुएट होने के बाद सुभाष की पोस्ट ऑफिस में नौकरी लग गई और पोस्टिंग आगरा में हुई। 

सुभाष का विवाह हो गया।  मनोज सुभाष की पत्नी को बड़े आदर के साथ भाभीजी कहा करता।

मनोज ने एम.ए. करते ही  मुंबई में एक कंपनी में मैनेजर के पद पर नौकरी लग गई। दोनों दोस्तों का संपर्क ऑनलाइन बना रहा लेकिन दोनों गृहस्थी के चक्कर में फँसते गए। दोनों के बच्चे भी हुए, उनकी शादी भी हो गई। और उनकी बातचीत में अंतराल बढ़ गया, मिलने जुलने का तो सवाल ही नहीं।

एक दिन मनोज दादर में सब्जी खरीद रहे थे कि उन्हें सुभाष दिखाई दिए।  लेकिन बाल पक गए थे तो विश्वास नहीं हो रहा था। इसलिए वह उनके पास गए और पहचान कर पुकारा, “सुभाष भाई”। सुभाष ने मुड़कर देखा तो मनोज को तुरंत पहचान गए। मनोज ने कहा,”आप मुंबई में, कब और कैसे?” सुभाष ने कहा कि मुझे एक्साइज में डेपुटेशन मिल गया तो मुंबई आ गया। दो साल हो गए। आओ, तुम्हें तुम्हारी भाभी से मिलाता हूँ, वह यहीं एक दूकान में कुछ खरीद रही है।” मनोज ने भाभी पुकारते हुए प्रणाम किया तो उन्होंने चौंक कर देखा, बोली,”मनोज, अरे तुम यहाँ?” सुभाष और मनोज बड़े अरसे के बाद मिलकर बहुत खुश हुए। भाभी ने अपना पता लिखवाते हुए कहा, “दीपावली आ रही है, घर  जरूर आना। और हाँ भोजन हमारे साथ ही करना। मनोज खुशी के मारे “जी हाँ ” ही कह पाए।

दीपावली की जगमगाहट में मनोज अपने परिवार के साथ सुभाष के घर खुशी खुशी पहुंचे। दरवाजा एक युवती ने खोला। मनोज सकपकाये कि कहीं गलत घर में न आ गए हों। वह युवती बोली, “आप मनोज अंकल, मम्मी पापा ने बताया था, मैं उनकी बहू सुप्रिया, आइए अंदर आइए।”  आवाजें सुन कर सुभाष और उनकी पत्नी ड्राइंग रूम में आए। दोनों गले मिले। बहू सुप्रिया बोली, “आप लोग बात कीजिए, मैं पानी पूरी लेकर आती हूँ। आज हमारे यहाँ पानी पूरी का कार्यक्रम है।” सुभाष और उनकी पत्नी तथा मनोज और उनकी पत्नी एक दूसरे का मुंह देखने लगे। भाभी जी ने मनोज को सपरिवार दीपावली के उपलक्ष्य में खाने पर बुलाया था। सुप्रिया की बात सुनकर एकदम गंभीर हो गई। मुंह से बोल नहीं फूटा। भोजन प्रश्न चिह्न बना रहा और अपने पराए दोनों दोनों अवाक् ।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०८ – दिखावा… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दिखावा।)

☆ लघुकथा # १०८ – दिखावा श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

डी जे की धुन पर कुछ लोग नाच गा रहे थे और कुछ लोग कुछ लजीज व्यंजनों का आनंद ले रहे थे।

नवरात्रि का पहला दिन था, पास में माता का पंडाल भी लगा हुआ था। अचानक बहुत सारे लोग उसे पंडाल में आ गए और डांस फ्लोर पर डांस करने वालों की संख्या इतनी बढ़ गई कि ज्यादातर लोग नीचे ही थिरकने लगे। एक तरफ पटाखे चलने लगे।

वहाँ काम करने वाले दो किशोरवय लड़के आपस में बात करने लगे।

एक ने कहा “नए साल के आने पर इतनी खुशी की क्या बात है? मां दुर्गा की मूर्ति स्थापित की है। नया साल हो या नवरात्रि, हमें तो रोज यही साफ सफाई का काम करना है। अच्छा है, हमें काम मिल जाता है।”

दूसरे लड़के  ने जवाब दिया- “बड़ी पार्टी है, इनका शहर में बहुत बड़ा शोरूम है, देर तक काम करेंगे, तो मालिक से कुछ पैसे ज्यादा मांग लेंगे, हमारे लिए तो यही खुशी की बात हो जाएगी।”

तभी अचानक पटाखे की आवाज से पास खड़ी एक बुजुर्ग महिला के हाथ से एक कांच का ग्लास टूट जाता है। डांस करते हुए सभी लोग एक दूसरे के ऊपर गिर जाते हैं कुछ को कांच लग जाते हैं, भाग दौड़ मच जाती है, लोग इधर-उधर भागने लगते हैं।

वे दोनों लड़के कहते हैं चलो मित्र तुम सब्जी उठा लो और मैं पूड़ी यह दोनों बड़े पतीले उठा कर घर चलते हैं पैसे तो नहीं मिलेंगे।

 हम दोनों के परिवार के लोग मिलकर नव वर्ष मनाएंगे।

 घर चलकर आरती करके माँ दुर्गा की आराधना करेंगे।

बड़े लोग ऐसे ही नव वर्ष मनाते हैं इसीलिए यह हुआ है?

दूसरे ने कहा दोस्त ठीक बोल रहे हो सच्चे दिल से मन की प्रार्थना करनी चाहिए दिखावे में यही हाल होता है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०८ ☆ गझल… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०८ ?

☆ गझल… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

 माझ्याच माणसांनी केलाय डाव सारा

मी एकटीच आहे त्यांचा जमाव सारा

*

नाही..नको मला ते साम्राज्य स्थापितांचे

माझा मला असू दे  हा सान गाव सारा

*

आहेत या इथेही  मोकाट बैल काही

गोठ्यात माणसांचा आता निभाव सारा

*

मी कोंडले स्वतःला देवालयात तेव्हा

 देवास वाटले  की त्याचा प्रभाव सारा

*

कल्लोळ अंतरीचा आहे तसाच आहे

केला जगावयाचा आता सराव सारा

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ असा पाऊस पडावा… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ असा पाऊस पडावा… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

आली झुळुक सुखाची

पावसाच्या संकेताची.

गेले सुखावून वृक्ष

आशा चैत्रपालवीची.

*

पावसाच्या निरोपाचा

गेला सुखमयी वारा.

किती दिसांनी मयूराचा

आज फुलला पिसारा.

*

नको बोलवू पक्षांना

साद घालून आकाशी.

अंतर्यामी त्यांचे आहे

नाते गोडगूढ वृक्षांशी.

*

आता फक्त निसर्गाचा

रम्य नजारा साठव.

पावसाच्या आनंदाचा

उस्फूर्त हा उत्सव.

*

सृजनाचा निर्मितीचा नव्या

असा पाऊस पडावा.

निराकार स्वरुपाचा जसा

साक्षात्कारच घडावा.

 

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “यशामागे काही रहस्य वगैरे नसते…” ☆ सुश्री संध्या बेडेकर ☆

सुश्री संध्या बेडेकर

? विविधा ?

☆ “यशामागे काही रहस्य वगैरे नसते…” ☆ सुश्री संध्या बेडेकर ☆

काल खूप दिवसांनी सागर‌ भेटला. मला आवडतो तो मुलगा. खूप positive एकदम शांत. मी त्याला गुरुजीच म्हणते कारण तो माझे मोबाईल चे सर्व doubts शांतपणे clear करतो. नेहमी प्रोत्साहन देतो.

काकू येईल तुम्हाला, असं म्हंटल की माझा पण उत्साह वाढतो.

एका कंपनीचा मालक आहे तो. त्याचे चांगले दिवस खूप कष्टानंतर आले आहेत. स्पष्ट ध्येय, कष्ट, धैर्य, clear thought process व घरच्यांचा सहयोग, हीच यशाची गुरुकिल्ली आहे. हे पुन्हा एकदा सिद्ध झाले.

चांगली लठ्ठ पगाराची नोकरी सोडून स्वतः चा व्यवसाय सुरू करणे, ही धमक आजकाल नवीन मुलांमधे दिसते. त्या प्रवासात येणारे चढ- उतार calculated risk लक्षात घेतलेली असतेच. तरीही सर्व आपण विचार केल्याप्रमाणेच होते असे नसते ना. दुसरे, म्हणजे स्थिरस्थावर व्हायला किती वेळ लागेल?? हे निश्चित नाही. आयुष्याची तरुणाईची महत्वाची वर्षें तीच, कामाची तीच, परिवाराची मजा करायची वेळ पण तीच. म्हणजे संकल्प, त्याग, घरच्यांचे सहकार्य तर हवेच. बरोबर आयुष्याच्या गणिताकडे पण लक्ष द्यायचे आहे. सर्व गोष्टींचा balance सांभाळुन काम करायचे. कुठे थांबायचे ?? कुठे रेघ ओढायची ???हे समजले पाहिजे. व तसे वागताही आले पाहिजे. कुठे लक्ष द्यायचे ??व कुठे दुर्लक्ष करायचे ??हे ही ठरविता आले पाहिजे. पडलो तर उठून उभा राहिन ही धमक व आत्मविश्वास पाहिजे. ‌व अशा वेळेस घरच्यांचा विश्वास व आधार हवाच. .

काही लोकांना सर्व गोष्टींचा व्यवस्थित विचार करून त्यांची क्रमवार मांडणी करता येते. तीच यशाची पहिली पायरी असते असं नाही की ते खूप हुशार असतात. पण त्यांना हे नक्की माहित असतं. केंव्हा काय करायचे.

विचार स्पष्ट असले व स्वतः वर विश्वास असला तरच ते करता येते. दुसरं म्हणजे यश आणि अपयशाकडे बघायचा त्यांचा योग्य दृष्टिकोन असतो. यशाची कारणे व अपयशाचे बरोबर विश्लेषण करता येते त्यांना. अशी माणसे blame game खेळत नाही. सर्व जबाबदारी स्वतः वर घ्यायची हिम्मत ठेवतात. लहान सहान गोष्टींवर लक्ष देत नाही. व घाबरत तर त्याहून नाही. कोणाचे ऐकायचे व कोणाचे नाही हे त्यांना छान जमते.

यशस्वी माणसे खूप चतुर असतात.  ते focussed असतात. शिस्तप्रिय असतात. कोणत्याही कामात मदत लागतेच, तेंव्हा योग्य लोकांची निवड करणे हे महत्त्वाचे, कारण आयुष्याला चांगले वळण मिळायला चांगल्या वेळेची नाही तर चांगल्या माणसांची गरज असते.  

टीम management, योग्य कार्य पध्दती, कर्मचाऱ्यांचे आपापसातील संबंध, थोडक्यात आपल्या टीम ला एक मोठा परिवार समजून ज्याला काम करणे जमते, तो अर्धी लढाई तर तेथेच जिंकतो.

रोज रात्री दुसऱ्या दिवशी चे planning व दिवस संपला की त्याचे विश्लेषण ही सवय असली, तर वेळ वाया जात नाही. व योग्य दिशेने प्रवास होतो. विचारांना योग्य दिशा देता येते. सर्वात सुक्ष्म पण ताकदवर काही असेल‌ तर ते आपले विचार असतात. परिवर्तन आणण्याची अफाट शक्ती असते त्यांच्यात. संधी चालून येत नसते. ती शोधायची असते व मिळताच त्याचे सोने करता आले पाहिजे.

सर्व सामान्य माणसांची परिस्थिती साधारण सारखीच असते. झेप घेण्याची तयारी, मेहनत करण्याची प्रबळ इच्छा असली तर कदाचित वेळ लागेल पण यश नक्कीच. मिळते.  

गीतेतही सांगितले आहेच जर तुम्ही कर्म कराल तर देवाला तुम्हाला द्यावेच लागेल.

आजचा दिवस चांगला जाणार या विचाराने जर दिवसाची सुरवात केली तर कठिण प्रसंगाचा सामना करायचे बळ आपल्या विचारांतच मिळते.

आज सागर बरोबर गप्पा मारताना चर्चेत बऱ्याच गोष्टी कळल्या. ‘ Positivity ‘ खऱ्याखुऱ्या अर्थाने समजली नवीन पिढी बद्दलचा माझा आदर अजूनच वाढला.

नवीन पिढी हुषार आहे. त्यांचे विचार, risk घेण्याची तयारी, आपल्या कामाचे ज्ञान व अभ्यास खरच कौतुकास्पद आहे.

बदलत्या जगाबरोबर धावणे जमते त्यांना. आपला मार्ग ते स्वतः आखतात. अनुभवाने श्रीमंत होतात. अशी मुले रोज नव्याने आयुष्य जगतात.

सागर सारखी मुले सध्या चालू असलेल्या ‘आत्मनिर्भर भारत ‘ या मोहिमेत आपले योगदान देत आहेत.

“जो माणूस कष्टाला लाजत नाही त्याला जगात यशस्वी होण्यापासून कोणी ही थांबवू शकत नाही.”

म्हणतात ना

“यशामागे काही रहस्य वगैरे नसते. प्रचंड कष्ट व योग्य नियोजन आणि अपयशातून जिंकायची वृत्ती त्यातुन हे साध्य करता येते.”

© सुश्री संध्या बेडेकर 

पुणे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अद्वैत… भाग – १ ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? जीवनरंग ?

☆ अद्वैत… भाग – १☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

‘अजून मोह संपत नाहीत?’

शब्दांची जाणीव झाली आणि ग्लानीमध्ये तिच्या डोळ्यावर आलेली झापड अंमळ ओसरल्यासारखी झाली.

‘कोण बोलले हे?’ तिच्या तोंडून शब्दफुटणे तर शक्यच नव्हते; मनातच विचार आला अन् होता होईल तितके डोळे किलकिले करून तिने आजूबाजूला पाहायचा प्रयत्न केला.

तिच्या देखभालीसाठी ठेवलेली रुग्णसेविका खोलीतल्याच दुसऱ्या शेजेवर शांत झोपली होती. तिथे दुसरे कोणी नव्हतेच. मुलगी देखील शेजारच्या खोलीत झोपली असणार! खोलीत अगदीच अंधार नको, थोडातरी उजेड असावा म्हणून लावलेला मिणमिणता दिवा खोलीत जी काही जाग ठेवत होता तेवढीच! बाकी खोली अगदीच सुमसाम होती.

‘मग कोण बोलले हे?’ पुन्हा तिच्या मनातील विचारांनी जीभेपर्यंत जायचा केविलवाणा प्रयत्न केला; पण आता या अवस्थेत तिची सगळीच इंद्रिये काहीही कार्य करण्याच्या पार पलीकडे गेली होती. तो विचार तिच्या मनातल्या मनातच रुंजी घालू लागला.

‘मीच ग; विसरलीस मला?’ आणि तिला जाणवले की हे शब्द नाहीत, विचार आहेत.

‘तू?’ तिच्या विचारांना आता काहीतरी दिशा सापडली; पण दिसत तर काहीच नव्हते. आता तर डोळे किलकिले करणे देखील शक्य होत नव्हते. ‘तुला जाऊन तर…… ’

‘काही वर्षे झाली, असंच ना?’ 

पुन्हा तिच्या अंतर्मनाला जाणीव झाली.

‘हो!’

‘पण मला नाही जाववत तुला सोडून. ’ 

‘कुठे आहेस तू?’ विचार जाणवले आणि त्या बेभान अवस्थेतही ती अंतर्यामी हादरली. ‘मला दिसत कसा नाहीस?’ 

‘दिसेन कसा ग वेडे? मला आता देह कुठे आहे?

‘मग?’ तिच्या मनातील गोंधळ वाढतच होता.

‘अशी गोंधळून जाऊ नकोस; आणि तुझ्या डोळ्यांनी मला पाहायचा निष्फळ प्रयत्नही करू नकोस. तुझ्या समोरच्याच भिंतीवर चार फुट वरती तुझे आज्ञाचक्र केंद्रित कर. ’

‘पण कसे?’ ती आणखीनच बुचकळ्यात पडली. ‘मला तर जागेवर देखील हलता येत नाही. ’

‘तू अजिबात हळू नकोस; अन् ते तुला शक्यही होणार नाही. तू फक्त तुझे लक्ष्य मी सांगितले तिथे केंद्रित कर. ’

आता तिच्या लक्ष्यात आले, हे शब्द नाहीत, विचार आहेत. आपल्या मनातले विचार त्याला समजतायत. म्हणजे हे केवळ विचारसंक्रमण! 

क्षणार्धात तिने आपले ध्यान समोरच्या भिंतीवर लावले; अन् तिला तिथे जाणवले एक केशरी तेजाचे वलय.

‘आता तरी ओळखलंस?’ विचार त्या तेजोवलयापासूनच येत आहेत याची तिला जाणीव झाली.

‘तुला कसं रे विसरेन मी?! तू तर माझं आयुष्य होतास, सर्वस्व होतास – अजूनही आहेस!’ अचानक तिच्या विचारात देखील भावनांचे कढ भरून आले.

‘हो ग राणी, मला कल्पना आहे त्याची, ’ त्या तेजोवालयात किंचीतशी नारिंगी छटा तिला जाणवली. ‘पण आता काही वर्षे झाली………… ‘

‘तरीही अजूनही तूच आहेस माझ्या अंतर्यामी, ’ हळूहळू आपण तरंगतोय असे तिला जाणवायला लागले; अन् क्षणार्धात आपण त्या तेजोवालायाच्या अगदी समीप पोहोचल्याची जाणीव तिला झाली. नकळतच तिने खाटेकडे लक्ष नेले. तिचा देह तिच्या खाटेवर निपचित पडला होता; मोठ्या कष्टाने जी काय श्वासोच्छवासासाठी छातीची हालचाल होत होती तेवढीच! 

अन् तिला जाणवले की आपल्या सूक्ष्म देहाने आपण जडदेहातून बाहेर पडून त्याच्या सूक्ष्म देहाजवळ आलो आहोत. मात्र तिला त्या जडदेहाकडे अधिक वेळ बघवेना. तिने आपले अंतर्चक्षु त्याच्या सूक्ष्मदेहाकडे वळवले.

‘अजून मोहापासून मुक्ती मिळत नाही ना?’ त्याचे विचार पुन्हा तिला जाणवले. ‘जरा तुझ्या देहाकडे पहा; तुझा रजतरज्जू किती क्षीण झालाय पहा. बहुतेक सगळा काळाच पडलाय; जेमतेम एखाददुसराच धागा तग धरून आहे आता. ’

‘कळतय मला ते सगळ; आता किती काळ राहिलंय या देहाचा भोग देव जाणे!’ 

‘पण मोह सुटत नाही ना?!’

‘कसला मोह?’ 

‘या देहाचा, जगण्याचा, मुलांचा, घराचा, सगळ्या सगळ्याचा, ‘ त्याने त्याच्या प्रश्नात अधिक सुस्पष्टता आणली.

‘खर सांगते, विश्वास ठेव माझ्यावर; तू आम्हाला सोडून गेलास तेव्हापासून कशातच मन रमत नाही माझं, ’ तिच्या विचारातील कातरता त्याच्या सूक्ष्मदेहाला जाणवायला लागली. ‘तुझ्या पाठोपाठ खरतर लगेचच मला ही यायचे होते. पण तू काही जबाबदाऱ्या माझ्यावर सोपवून गेला होतास ना; माझ्याकडून मृत्युशय्येवर असतांना वचन घेतले होतेस की त्या जबाबदाऱ्या पूर्ण करेपर्यंत तग धरून राहशील म्हणून. ’

‘काय करणार ग मी तरी? अचानकच काळाने माझा घास घेतला, ’ त्याचे विचार पुनश्च भूतकाळात गेले. ‘मुलाला नोकरी लागायची होती. तरी त्याने माझ्या कडे पाहून लग्न तरी केले. अजून नातवंड घरात यायची होती. मुलीलाही उजवायाचे होते. ही सगळी माझी कर्मे होती. पण काळापुढे कोणाचे काय चालते! मग हे सगळे तुझ्याखेरीज दुसऱ्या कोणाला सांगू शकणार होतो मी हक्काने?’ 

‘कल्पना होती मला साऱ्याची, ’ त्याच्या सूक्ष्म देहाला ग्रासू पाहणारी जांभळट छटा तिला जाणवू लागली. ‘ती सगळी कर्तव्ये मी पूर्ण केली. आता का असा निराश होतोस?’

‘निराश नाही ग, ’ जांभळटपण जाऊन त्याचा सूक्ष्मदेह पुनरपि नारिंगी झाला. ‘घराच्या जबाबदाऱ्यांबरोबरच तू जे काही समाजकार्य करत होतीस त्याने मी अभिमानाने फुलून येत होतो. तू निवृत्त झाली होतीस तरी देखील तुझ्या ज्ञानाचा तू समाजाला अविरत फायदा करून देत होतीस. ’

‘ज्ञान हे देण्यासाठीच असते ना!’ तिच्या विचारात देखील संतृप्तता जाणवत होती. ‘गेली काही वर्षे मला विविध संस्थांच्या बैठकींना जाणे प्रकृतीमुळे जमले नाही; पण त्यांच्या शब्दाचा मान ठेवून मी कॉम्प्यूटरवरून त्यांच्या मिटींग्स मध्ये सहभागी होत होते. पण चार महिन्यांपूर्वी मिटिंग चालू असतांना मी घरातच खुर्चीवरून खाली पडले अन् मग मात्र मी अगदी मनाविरुद्ध त्यातून देखील निवृत्त व्हायचा निर्णयघेतला. ’

‘त्या सगळ्यांना तुझ्या सहकाराची जाणीव अजूनही आहे पण, ’ त्याच्या विचारात देखील तिच्याविषयीचा अभिमान तिला जाणवला; ती मोहरून आली. ‘म्हणून तर तू मृत्युशय्येवर असून देखील ते तुला भेटायला वरचेवर येत असतात. ’

‘ते काम आता मी करू शकत नाही याचे वैषम्य मात्र अजूनही आहे, ’ आपल्या कामावरची श्रद्धा तिच्या तेजोवलयात जाणवली.

‘अखेर प्रत्येकाचा कर्मयोग केव्हातरी संपणारच असतो. भगवान श्रीकृष्ण काय किवा प्रभू रामचंद्र काय; अगदी अलीकडच्या इतिहासातील छत्रपती शिवाजी महाराज काय, त्यांचा कर्मयोग संपल्यावर त्यांना आपापल्या देहाचा निरोप घ्यायला लागलाच ना! संपूर्ण कौरवांना एकट्याने हरविणारा, भगवान शंकरांशी देखील तुल्यबळ युद्ध करणारा अद्वितीय योद्धा अर्जुन त्याचा कर्मयोग संपल्यावर काही गुराख्यांच्याकडून युद्धात हरलाच ना!’ 

‘हो ना! कर्मयोग तर संपलाय, ’ आता तिच्या सूक्ष्मदेहावर अंमळ मरगळ जाणवू लागली. ‘आता असं किती दिवस पडून राहायचंय देव जाणे. ’

‘ते तुझ्यावरच अवलंबून आहे, ’ तो पुन्हा पूर्वपदावर आला. ‘म्हणून तर विचारले अजून मोह सुटत नाही का?’

‘मोह? तो तर केव्हाच संपलाय! केव्हापासून तुझ्याकडे यायला मन आसुसलय. पण काय करणार दिवस तर भरायला हवेत! योग आहेत तोंवर देह सोडून तर चालणार नव्हते, ’ ती आपली बाजू त्याला समजावून सांगू लागली. ‘नाही तर केवळ उरलेले दिवस भरून काढण्यासाठी पुन्हा जन्म घ्यायचा आणि बालवयातच आपल्या मात-पित्याला अपत्यवियोगाचे दुःख देऊन जगाचा निरोप घ्यायचा! म्हणजे पुन्हा पुढच्या जन्माची बेगमी! नाही; या जन्माचे जे भोग आणि योग आहेत ते याच जन्मात भोगून संपवायला हवेत. ’

‘आता तू सर्व कौटुंबिक जबाबदाऱ्यांमधून मोकळी झाली आहेस. सामाजिक जबाबदाऱ्या काय कधीच संपत नाहीत. पण आता तुझ्याच्याने नाही होणार काही, अगदी मनात असले तरी देखील, ’ त्याने तिला परिस्थितीची संमिश्र जाणीव करून दिली. ‘जरा तुझ्या रजतरज्जूकडे पहा; किती खंगलाय तो. ’

तिचे लक्ष पुन्हा एकदा रजतरज्जूकडे गेले आणि ती शहारलीच! जेमतेम एखाददुसरा धागा सोडला तर संपूर्ण रजतरज्जू निस्तेजला होता, काळवंडला होता. तिच्यातून पुन्हा एक मोठा थरकाप उठला. आणि तो थरकाप तिच्या जडदेहापर्यंत पसरला.

अंथरुणावर निपचित पडलेल्या तिच्या देहाला अचानक काय झाले? त्या अशा थरथर का कापत आहेत? 

शेजारीच पहुडलेली रुग्णसेविका हडबडून उठली. रुग्णाकडे नजर टाकल्यावर तिला काही चिन्ह बरी वाटेनात. घाईघाईने तिने रुग्णाच्या मुलीला शेजारच्याच खोलीतून बोलावून आणले. मुलीला देखील आता आपली आई काही क्षणांचीच सोबतीण आहे हे जाणवले. मोठ्या त्वरेने तिने आपल्या भावाला आणि वाहिनीला बोलावले आणि देवघरातील गंगाजलाचा कलश घेऊन ती आपल्या आईपाशी आली.

‘आता देहत्याग करायलाच हवा; नाही सोसवत आता हे जिणे, ’ तिचे विचार त्याच्या सूक्ष्मदेहाला जाणवू लागले. ‘मोह तर केव्हाच सुटलाय; पण तरीही आता शेवटचे कर्तव्य म्हणून गंगाजलाचे दोन घोट तोंडात घेते, एकदाच अखेरचे सगळ्यांकडे चर्मचक्षुंनी नजर टाकते आणि येतेच. ’

मोठ्या कष्टाने रजतरज्जू सांभाळत सांभाळत तिच्या सूक्ष्मदेहाने आपल्या जडदेहात प्रवेश केला. बाजेवरच्या देहातला फरक तिच्या मुलीला देखील जाणवला. इतका वेळ अगदी निपचित पडलेल्या देहात थोडीशी धुगधुगी तिला जाणवू लागली.

‘आई, ’ अगदी हलक्या अस्फुट स्वरात मुलीची हाक तिच्या कानावर आली. ‘तोंड उघडतेस?’

नकळतच तिने आपले दोन्ही ओठ अंमळ विलग केले. मुलीने त्यात ओतलेले गंगाजलाचे थेंब तिच्या तोंडात गेले. तरीही ते थेंब घशातून गिळायचे त्राण काही तिच्यात शिल्लक नव्हते. आता आपल्या या देहाच्याने झाली तर केवळ एखादीच हालचाल होऊ शकेल याची कल्पना तिला आली.

– क्रमशः भाग पहिला 

कवी : © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम. डी. , डी. जी. ओ.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ मन‌ वढाय वढाय… ☆ सुश्री अपर्णा परांजपे ☆

सुश्री अपर्णा परांजपे

 

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☆ ✍️ मन‌ वढाय वढाय☆ सुश्री अपर्णा परांजपे

बहिणाबाईंनी मानवीमन अचूक ओळखलं आहे. मन असंख्य कल्पना सतत करत असतं. मनात विचार येणं नैसर्गिक आहे. त्या विचारांच्या दिशेने कृती केली जाते ऐच्छिक कर्माचे एक वैशिष्ट्य आहे, कर्म करावे वाटते, त्यानुसार कर्म करावेही वाटते पण सहेतुक ! काहीतरी मनात विशिष्ट विचार ठेवूनच कृती केली जाते त्यामुळे त्या कृतीचा परिणाम ही आवश्यक असतो व तो मिळतो ही! प्रश्न असा आहे की आलेला परिणाम मनाला कधी आवडतो कधी आवडत नाही. आवडणारा परिणाम त्या व्यक्तीचा अहंभाव पुष्ट करतो व नावडता परिणाम त्याला दुखावतो. विचार व कर्माची ही शृंखला अव्याहतपणे सुरू असते सोबतच सुख व दुःखही मिळत रहातात. थोडासा जरी विचार केला तर हे सुख असो की दुःख काहीच टिकाऊ नाही. सुखामागे दुःख व दु:खामागे सुख सुरुच असते त्यामुळे समाधान मात्र दूर रहाते. विचार व कृती ही धावपळ घडवतात त्यामुळे समाधान मिळत नाही. मनाचा गुणच संकल्प विकल्पाचा आहे. म्हणूनच बहिणाबाईंनी मनाला ओढाळ म्हंटले आहे. कुठेही न थांबता केलेले विचार व त्यानुसार कृती दमछाक करवतात व व्यक्ती थकून जातो.

सत्याचा शोध घेतल्याशिवाय ही दमछाक थांबणार नाही असे सांगत समर्थ रामदास स्वामींनी मनाचे श्लोक लिहिलेत. ज्यात मनाला आधीच सज्जन संबोधून त्याच्यावर समाधान मिळवण्याची जबाबदारी टाकली. द्वाड म्हणून हेटाळणी न करता सज्जन म्हणून सन्माआन केला व त्या सन्मानाला पात्र होण्यासाठी काय करावे हा समुपदेश केला. ओढाळ मनाला शांत प्रशांत प्रसन्न करण्यासाठी ज्ञान दिले स्वतः चेच!मी कोण आहे हे कळणे प्राथमिकता ठरवली. देव कोण आहे हे सांगत आपलाच विस्तार सांगितला. आपण त्याचे अंश आहोत हे जर जाणवले तर त्याचे गुण अंगिकारणे परम कर्तव्य आहे फक्त त्यामुळेच सुख दुःखाचे हे दुष्टचक्र थांबू शकते अन्यथा पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननी जठरे शयनं ही मालिका सुरूच राहील व आपला मूळ स्वभाव आनंदी आहे हे कळणारच नाही.

मनाचा उपयोग समाधान मिळवण्यासाठी करायचा असेल तर हदयाची विशालता त्याला समजावी लागेल तरच स्वतः ची मर्यादा मन ओळखू शकेल व शाश्वत समाधानासाठी स्वतः चे विचार व त्यानुसार कृती थांबवेल. मनाचा गोंधळ थांबल्याशिवाय हृदयातील शांती मिळणार नाही हे पटले की काम झाले!

मनाचे आणखी एक वैशिष्ट्य आहे त्याला जर एखादी गोष्ट पटली की मग त्याला काहीही करताना त्रास वाटत नाही. वाटणेच तर घात करते किंवा समाधान देते त्यामुळे ओढाळ मनाला तू मर्यादित नसून अमर्याद आहे असे पटले की अमर्यादाची म्हणजेच देवाची तळमळ लागते. अमर्याद कृती त्याच्याकडून विनासायास घडतात त्याही अपेक्षा विरहित व “इदं न मम”म्हणत! 

आधीच सज्जन म्हणून सज्जनासारखी कृती करवून घेणारे स्वामी म्हणूनच समर्थ आहेत.

समर्थ भेटण्यासाठी आपली तशी ओढ आवश्यक आहे. जशी तळमळ असेल तसेच सद्गुरू करवून घेतात यावर ठाम निष्ठा असणे मात्र आपले काम आहे जे मनाद्वारे केले जाते. म्हणून मनावर लक्ष ठेवणे हा समाधानाचा पाया आहे.

भगवंत हृदयस्थ आहे 🙏

© सुश्री अपर्णा परांजपे

कात्रज, पुणे

मो. 9503045495

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ सुख आणि समाधान… ☆ श्री मकरंद पिंपुटकर ☆

श्री मकरंद पिंपुटकर

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☆ सुख आणि समाधान… ☆ श्री मकरंद पिंपुटकर 

ती आणि तो रेल्वेने बडोद्याहून मुंबईला परत चालले होते. त्याने नुकतेच भरूचचे खारे शेंगदाणे विकत घेतले होते, शेंगदाणे खात गप्पा चालू होत्या आणि बोलताबोलता चर्चा “सुख” आणि “समाधान” या विषयाकडे आली.

“दोन्ही एकच आहेत की, ” तो सांगत होता.

ती हळूच हसली, आणि म्हणाली, “नाही, फरक आहे. आज ज्या गोष्टीचे सुख वाटते, उद्या त्याच गोष्टीने दुःख वाटू शकते की.

गेल्या आठवड्यापर्यंत आपल्या शेजारणीला तिच्या ४३ इंची टीव्हीबद्दल अभिमान वाटत होता, असा मोठ्ठा टीव्ही आपल्याकडे असल्यामुळे तिला आपण सुखी आहोत असे वाटत होते. पण तेच काल रमेशभाईंकडचा ५५ इंची टीव्ही पाहिल्यावर तिला दुःख झाले, ” ती सांगत होती.

“सुख – दुःख या अस्थिर कल्पना आहेत, त्या नेहमी तुलनात्मक असतात. सुख हे तात्पुरते असते, आपल्या मनासारखं अमुक अमुक घडलं, की आपल्याला सुख मिळते.

याउलट, समाधान ही आंतरिक भावना आहे, समाधानासाठी आपण बाह्य घटनेवर अवलंबून नसतो. ” ती बोलत होती, पण त्याचे तिच्याकडे लक्षच नव्हते.

मगाशी १२० रुपयाचे शेंगदाणे १०० रुपयाला मिळाल्याबद्दल ते जाम खुश होता, आपल्याला भरुचचे प्रख्यात दाणे स्वस्तात मिळाले ही कल्पना त्याला सुखी करून गेली होती, पण आता तोच शेंगदाणेवाला, तेच शेंगदाणे १०० रुपयांना दोन पाकिटे या दरात विकत होता, आणि आपण मगाशी, घाई करून ते शेंगदाणे १०० रुपयांना घ्यायला नको होते असं आता त्याला वाटत होतं.

सुख आणि समाधान यातला फरक त्याला चांगलाच समजला होता.

© श्री मकरंद पिंपुटकर

चिंचवड

मो ८६९८०५३२१५   

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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