हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ ≈ मॉरिशस से ≈ गद्य भँवर # ११६ – नामालूम कारागाह… – ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

श्री रामदेव धुरंधर

(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव  जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– नामालूम कारागाह…” ।

~ मॉरिशस से ~

☆ कथा कहानी  ☆ गद्य भँवर # ११६ — नामालूम कारागाह — ☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆

(गद्य – भँवर : मेरा एक अभिनव गद्यात्मक प्रयोग)

(150 शब्द – सीमा’ के आधार पर ‘गद्य भँवर’ का लेखन मेरा एक श्रमसाध्य प्रयोग है। अभी जो रचना मैं लिख रहा हूँ यह उसी की अगली कड़ी है। हो सकता है इसे उलझा सा मान कर सन्देहास्पद कहा जाना शुरु हो जाए। पर मैं तो यह मानने में तटस्थ रहूँगा लिखा तो मैंने अर्थ के लिए ही है।)

विद्वान सिल्वानो को सूर्योदय के वक्त अनुभूति हुई संसार का सब से बड़ा ज्ञान कहीं कारागाह में बंद है। अपनी इस अनुभूति ने तो उसे बहुत उद्वेलित किया। न हुआ तो भी हुआ सा हुआ, उसे लोगों को चिट्ठियाँ लिख कर पूछना पड़ा क्या किसी को उस कारागाह का पता मालूम है? उसी दिन सूर्यास्त के वक्त सिल्वानो की अनुभूति हुई उसके पास दुनिया भर से चिट्ठियाँ आई हैं जिनमें लिखा हुआ है संसार का सब से बड़ा ज्ञान कहीं कारागाह में बंद है। क्या तुम्हें वह कारागाह मालूम है?

 © श्री रामदेव धुरंधर

संपर्क : रायल रोड, कारोलीन बेल एर, रिविएर सेचे, मोरिशस फोन : +230 5753 7057   ईमेल : rdhoorundhur@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३४९ – कलयुग केवल नाम अधारा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३४९ कलयुग केवल नाम अधारा… ?

राम नाम अवलंब बिनु परमारथ की आस।

बरसत वारिद बूँद गहि चाहत चढ़न अकास।।

श्री राम का नाम परमार्थ अर्थात धर्म, अर्थ, काम मोक्ष प्रदान करता है। उनके नाम के बिना भवसागर से पार होने की कल्पना कुछ ऐसी ही है, जैसे कोई बारिश की बूँदों के सहारे आकाश में जाना चाहता हो। अर्थ स्पष्ट है, श्री राम का नाम तारणहार है।

श्री राम के नाम को, उनकी अतुल्य जीवनयात्रा को घर-घर और जन-जन तक जनभाषा में पहुँचानेवाले ग्रंथ का नाम है, रामचरितमानस।  कौशल्या हितकारी राम से रणकर्कश श्री राम  की कथा है रामचरितमानस, राजा राम से लोकनायक श्री राम होने की गाथा है रामचरितमानस। रामचरितमानस श्रीराम के व्यक्तित्व और कृतित्व की अशेष यात्रा है। रामचरितमानस में को अवधी भाषा में लिखा गया है।

गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अमर कृति का लेखन विक्रम संवत 1631 तदनुसार  ईस्वी सन 1574 को  मंगलवार श्री रामनवमी के दिन आरंभ किया था। यह लेखन 2 वर्ष 7 महीने और 26 दिन चला। विक्रम संवत 1633 अर्थात ईस्वी सन 1576 को श्री राम विवाह के दिन यह संपन्न हुआ।

रामचरितमानस में कुल सात खंड / अध्याय हैं, बालकांड, अयोध्याकांड, अरण्यकांड, किष्किन्धाकांड, सुन्दरकांड, लंकाकांड और उत्तरकांड।

मानस में संस्कृत और प्राकृत के कुल मिलाकर 18 छंदों में सृजन हुआ है। रामचरितमानस में कुल 10902 पद हैं। इनमें 9388 चौपाई हैं। मानस में 1172 दोहा हैं। इसमें 87 सोरठा हैं। इस महाकाव्य में 208 छंद हैं जिनमें हरिगीतिका, त्रिभंगी, तोमर, चौपैया सम्मिलित हैं। इस कालजयी ग्रंथ में 47 श्लोक हैं। इन श्लोकों में शार्दूलविक्रीडित, अनुष्टुप, प्रमाणिका, वंशस्थ, उपजाति, मालिनी, वसंततिलका, रथोद्धता, भुजंगप्रयात, तोटक, स्रग्धरा हैं।

यद्यपि स्थूल रूप से देखें तो रामचरितमानस,  रामकथा है, तथापि सूक्ष्म अवलोकन-अध्ययन  करें तो पाएँगे कि इसके अक्षर-अक्षर में जीवनमूल्य और नीतिमत्ता साक्षात दृष्टिगोचर होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि श्री राम का जीवनवृत्त ही ऐसा है। संभवत: यही कारण था, जिसने राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से लिखवाया,

राम, तुम्हारा चरित स्वयं ही काव्य है।

कोई कवि बन जाय, सहज संभाव्य है।।

रामचरितमानस ने श्री राम को एक अनन्य व्यक्तित्व के रूप में स्थापित किया। राम मर्यादापुरुषोत्तम हैं, लोकहितकारी हैं।राम एकमेवाद्वितीय हैं।

रामचरितमानस पढ़ना अर्थात सदाचार, नीतिमत्ता और जीवन के आदर्श पढ़ना। विशेषकर उत्तरभारत में तो मानस के दोहे और चौपाइयाँ, लोकोक्तियों के समान चलन में हैं।

अवधी में होने के कारण रामचरितमानस सार्वजनीन हुआ, जन-जन की जिह्वा का गान बना। जिस तरह बालक को दादी, नानी कहानी सुनाती हैं, कुछ उसी तरह हर आयुसमूह के लिए दादी, नानी की लोककथा बना रामचरितमानस। यही कारण है कि गोस्वामी तुलसीदास रचित मानस का पारायण आगे चलकर परम्परा बना।

वस्तुत: संसार रूपी सागर में हर मनुष्य एक घड़ा है, एक घट है। इस घट में रावण का निवास है पर श्रीराम का भी वास है। मनुष्य से अपेक्षित है कि वह भीतर के  श्रीराम का जागरण और अंतर्भूत रावण का मर्दन करे।अपने अवगुणों का दहन, और रामत्व का जागरण  ही रामचरितमानस का सच्चा पारायण है।

‘रामत्व’ की अनुकम्पा गोस्वामी तुलसीदास को प्राप्त हुई थी। तभी श्रीरामचरितमानस में आपने लिखा,

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।

बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥

अर्थात जगत में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर मैं उन सबके चरणकमलों की सदा दोनों हाथ जोड़कर वन्दना करता हूँ।

गोस्वामी जी के कविरूप का ध्रुवतारा है रामचरितमानस। कहा गया है,

कलयुग केवल नाम अधारा।

सुमिर सुमिर नर उतरहिं पारा।

कलयुग में केवल श्री राम का नाम एक आधार है। उनके सुमिरन मात्र से, केवल उनके स्मरण से मनुष्य भवसागर पार हो जाता है।

श्री राम के चरित के माध्यम से जीवन की ज्ञात, अज्ञात स्थितियों को जानने, समझने और हल की दिशा पर प्रकाश डालने का माध्यम है रामचरितमानस। कालजयी साहित्य का सार्वकालिक उदाहरण है रामचरितमानस।

श्रावण शुक्ल सप्तमी को गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती थी। विश्व को रामचरितमानस जैसा अनन्य महाकाव्य  देनेवाले गोस्वामी जी को नमन।

 

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Articles ☆ The Accidental Cook and the Birth of Chikki Halwa 🤩 ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of HappinessHe served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🌌 The Accidental Cook and the Birth of Chikki Halwa 🤩

I have never tried my hand at cooking. In fact, my culinary achievements begin and end with tea. I can make tea with reasonable confidence, provided nobody asks me to explain the process scientifically.

But life, as Mark Twain might have observed, is full of surprises—and occasionally of kitchen emergencies.

The other day, I ordered some chikki online. When it arrived, I opened the packet with the anticipation of a man about to enjoy a perfectly respectable piece of childhood nostalgia. Alas! The monsoon had been at work. The chikki had become moist and lost its crispness. It was no longer quite chikki; it was a victim of the weather.

Most people would have sighed and abandoned it.

I saw what everyone was seeing—but thought something else.

Why not turn this moist chikki into something delicious?

That was the moment an accidental cook was born.

I entered the kitchen with the quiet confidence of a scientist whose experiment had not yet gone wrong.

I poured some ghee into a kadhai, lit the flame and added a few teaspoons of sooji. A little cardamom powder followed. I stirred the mixture patiently until the sooji turned golden and the kitchen began to smell suspiciously like a place where someone actually knew how to cook.

Meanwhile, I crushed the unfortunate chikki and soaked it in warm milk. Once suitably softened, I tipped the whole thing into the kadhai.

There was stirring.

There was cooking.

There was concentration.

There may even have been a moment when I looked like a professional chef.

I kept cooking until the mixture began leaving the edges of the kadhai. I added another little dash of cardamom powder and, lo and behold—

Chikki Halwa was born!

Not planned. Not inherited from a grandmother. Not downloaded from YouTube.

Entirely accidental.

I served my creation to the family and a few neighbours with the unmistakable pride of a man presenting his first invention to the world. I made sure everyone knew that this was my maiden venture into the noble profession of cooking.

They ate it.

They smiled.

They praised it.

They even asked for more.

Now comes the only unresolved scientific question in this entire experiment:

Did they genuinely love the Chikki Halwa—or were they merely trying not to discourage the newly discovered cook?

I shall never know.

But I have learnt something important.

Sometimes creativity begins when things don’t turn out the way they were supposed to.

A moist chikki may look like a culinary failure to one person. To another, it may simply be an invitation from the universe:

“Come on, chef. Do something with this.”

And so, after all these years, I finally cooked.

Accidentally.

And, quite accidentally, I discovered that every kitchen has a little bit of creativity waiting to happen. 😄

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२७ – निमंत्रण पत्र का वज़न – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – निमंत्रण पत्र का वज़न।)  

☆  चुभते तीर # १२७ – व्यंग्य  – निमंत्रण पत्र का वज़न ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

दुबे जी का मानना था कि दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं, एक वो जो शादी में खाना खाने जाते हैं, और दूसरे वो जो खाना खाने के बाद पनीर के टुकड़ों का नाप लेकर शादी का बजट तय करते हैं। दुबे जी दूसरी श्रेणी के सिरमौर थे। उनके लिए मोहल्ले में आने वाला हर शादी का कार्ड सिर्फ एक निमंत्रण नहीं, बल्कि एक वित्तीय चुनौती होता था।

इस बार उनके हाथ में लाल और सुनहरे रंग का एक बहुत ही भारी लिफ़ाफ़ा आया था। यह कार्ड मोहल्ले के सबसे अमीर व्यापारी सेठ धनीराम के बेटे की शादी का था। लिफ़ाफ़ा इतना भारी था कि दुबे जी ने उसे हाथ में तौलते हुए अपनी पत्नी से कहा, “सुनती हो, कार्ड का वज़न कम से कम आधा किलो है। इसमें ज़रूर कोई काजू की बर्फी या सूखे मेवे का डिब्बा छिपा होगा।”

पत्नी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, “ज्यादा उम्मीद मत लगाइए, आजकल लोग बाहर से बहुत चमक-धमक दिखाते हैं और अंदर सिर्फ एक पन्ना निकलता है।”

लेकिन दुबे जी का दिल मानने को तैयार नहीं था। उन्होंने लिफ़ाफ़े पर लगी सुनहरी सील को ऐसे खोलना शुरू किया जैसे कोई पुरातत्वविद किसी प्राचीन खजाने का ताला खोल रहा हो। लिफ़ाफ़ा खुला, तो अंदर से रेशमी कपड़े में लिपटा एक बहुत ही सुंदर डिब्बा निकला। दुबे जी की आंखों में चमक आ गई। उन्होंने डिब्बे का ढक्कन हटाया। अंदर एक बड़ा सा पत्थर का टुकड़ा रखा हुआ था, जिस पर सोने के अक्षरों में शादी की तारीख और न्यौते का संदेश तराशा गया था।

दुबे जी का मुंह खुला का खुला रह गया। “पत्थर? कार्ड की जगह पत्थर?” वे लगभग चिल्लाए।

अगले तीन दिनों तक पूरे मोहल्ले में इस पत्थर वाले कार्ड की ही चर्चा थी। कोई इसे सेठ जी की रईसी कह रहा था, तो कोई इसे पैसों की बर्बादी। दुबे जी की ईगो को चोट पहुंची थी। वे समझ नहीं पा रहे थे कि इस पत्थर के बदले शादी में शगुन का लिफ़ाफ़ा कितने का दिया जाए। अगर पचास रुपये दो, तो पत्थर का अपमान था, और अगर पाँच सौ दो, तो दुबे जी के बजट का कत्ल था।

शादी की रात दुबे जी सज-धजकर पहुंचे। वे सीधे गिफ्ट काउंटर पर गए जहाँ सेठ जी खुद खड़े होकर मेहमानों का स्वागत कर रहे थे। दुबे जी ने बड़े ही नाटकीय अंदाज़ में अपना शगुन का लिफ़ाफ़ा निकाला और सेठ जी को थमा दिया।

सेठ जी ने लिफ़ाफ़ा पकड़ा, लेकिन उसकी ढीली बनावट देखकर मुस्कुराए और चुटकी लेते हुए बोले, “दुबे जी, हमारा कार्ड तो बहुत भारी था, पर आपका लिफ़ाफ़ा हवा में उड़ता हुआ महसूस हो रहा है!”

दुबे जी ने एक पल का विराम लिया, अपनी मूंछों पर ताव दिया और बोले, “सेठ जी, आपने जो पत्थर भेजा था, वो कार्ड नहीं बल्कि हमारे जैसे पड़ोसियों के लिए एक सबक था। आपने उस पर तारीख लिखकर हमें याद दिलाया कि रिश्ते पत्थर की लकीर होते हैं। इसलिए लिफ़ाफ़े में पैसे नहीं, बल्कि आपके नाम हमारी उस पुश्तैनी ज़मीन का अनापत्ति पत्र (NOC) है जिसका केस हमारे बीच तीन साल से कोर्ट में चल रहा था। आज से वो ज़मीन आपकी!”

सेठ जी की आंखें छलक आईं। उन्होंने दुबे जी को गले लगा लिया। वहां मौजूद सभी मेहमान और रिश्तेदार इस अनोखे उपहार पर ज़ोर-ज़ोर से तालियां बजाने लगे। दुबे जी ने मुस्कुराकर प्लेट उठाई और सबसे महंगे काउंटर की तरफ बढ़ गए, मन ही मन सोचते हुए कि कोर्ट की फीस से तो यह सौदा कहीं सस्ता पड़ा!

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २९० – एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।। ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९० \ ☆

☆ एक साथ देश की कुशल सदा मनाइए।। ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

ज़िंदगी स्वतंत्रता है सत्य मत भुलाइए

.

शीश कटे, लोग लुटे तब मिली स्वतंत्रता

सरफ़रोश नहीं हटे तब मिली स्वतंत्रता

याद करें फख्र से, न फर्ज भूल जाइए  

ज़िंदगी स्वतंत्रता है नित्य गुनगुनाइए

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

.

गोद सूनी हो गई, न आह होंठ ने करी

चाक-चाक दिल हुआ, न माँग फिर कभी भरी

सीखिए सबक, न अश्रु आँख से बहाइए

काम आएँ देश के, न देश बेच खाइए 

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

.

राजनीति राज की, न काज की तनिक रही

लोक नीति लोभ नीति, शोक नीति हो रही

अपनी वंश बेल को काक्रोच मत बनाइए

अदालतों में न्याय का मजाक मत उडाइए

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

.

बेचना-खरीदना न जीत सत्य की कभी

संसदों में बैठ कर न बात करें दोमुही

नीर-क्षीर कभी कहीं, हो रहा दिखाइए

दीन-हीन को गले, अभी यहीं लगाइए

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

.

जात-धर्म में न बाँट, काट-छाँट मत करें

मंदिरों में भक्ति हो, बजार-हाट मत करें 

तीर्थ में न मद्य की नदी कभी बहाइए

किसान को, मजूर को, हुजूर मत रुलाइए

एक साथ, उठा माथ देश गीत गाइए

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१५.८.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७४ ⇒ सौन्दर्य बोध ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सौन्दर्य बोध।)

?अभी अभी # १०७४ ⇒ आलेख – सौन्दर्य बोध ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

ASTHETIC SENSE

जब भी सुंदरता की बात होती है, चंदन सा बदन, चंचल चितवन, से आगे बात ही नहीं बढ़ती। नारी सौंदर्य की मूरत है, बस यही बोध पर्याप्त है। सारे कवि और शायर भी घूम फिरकर यही कहना चाहते हैं लेकिन सौंदर्य का एक कला पक्ष भी होता है, जो कहीं ना कहीं उसे व्यक्ति परक नहीं, वस्तुपरक बनाता है। वस्तु के इस कलात्मक पक्ष को ही asthetic sense, यानी सौंदर्य बोध का नाम दिया गया है।

कला, सौंदर्य और सुरुचि का नाम ही सौंदर्य बोध है। जब हम किसी ऐसे घर में प्रवेश करते हैं, जहाँ सब कुछ व्यवस्थित, ठिकाने पर हो, घर की हर वस्तु आपको आकर्षित करती हो, जिसमें घर में रहने वाले का व्यवहार और पहनावा भी शामिल हो, चलने का तरीका, बोलने का तरीका, हँसने से लेकर खाते समय मुंह चलाने तक का तरीका आकर्षित करता हो, तो आप कह सकते हैं कि उस व्यक्ति में एस्थेटिक सेंस यानी सौंदर्य बोध है।।

आप सौंदर्य को सभ्यता और संस्कृति से अलग नहीं कर सकते। जिसे हम तहज़ीब, manner अथवा एटिकेट कहते हैं, उसकी तह में बोलने अथवा बात करने का लहजा भी मायने रखता है। किसी का सुरुचिपूर्ण व्यवहार यानी polished behaviour आपको कभी कभी कृत्रिम भी लगे, लेकिन जो लोग इसमें ढल जाते हैं, उनकी सहजता और सरलता उनके व्यक्तित्व में चार चांद लगा देती है।

आप मुझे अच्छे लगने लगे ! सौंदर्य बोध का इससे अच्छा उदाहरण और कोई नहीं हो सकता। यहाँ अनुभूति का स्तर, देह से बहुत ऊपर उठ गया है, जिसमें अगर एक अबोध बच्चे की खुशी भी शामिल है तो एक आत्मा का दूसरी आत्मा के प्रति अपनापन, जो कहीं कहीं परमात्मा के करीब है। क्योंकि जो वाकई अच्छा है, वही सत्य है, शिव है और सुंदर है।।

आपको भगवान मंदिर में नहीं मिलेंगे, इंसानों में ही मिलेंगे। खेत, खलिहानों, बाग बगीचों, हरी भरी वादियों, पहाड़ों और झरनों में ही उस विराट की प्रतीति ही सौंदर्य बोध है। संगीत, ध्यान, कला, नृत्य और अध्यात्म उसके विभिन्न अवयव हैं। यह गीता का वह ज्ञान है, कर्म की कुशलता जिसका पहला अध्याय है, तो निष्काम कर्म अंतिम।

अमीरी गरीबी से ऊपर, सुख दुःख के बीच, सरलता, सहजता, निष्पाप मन, निर्विकार चेष्टा, मानव मात्र के प्रति शुभ संकल्प का भाव, प्राणी मात्र के कल्याण की भावना और प्रकृति और पर्यावरण से प्रतीति ही सौंदर्य बोध है। अंदर और बाहर से व्यवस्थित होना ही व्यवस्था है। प्रकृति में जहाँ भी सौंदर्य है, वह व्यवस्थित और अनुशासित है। पक्षियों का उड़ना, शाम को अपने घर लौटना, फूल का खिलना, भौंरों का गुनगुनाना, नदियों का बहना, सभी इस व्यवस्था के अंग हैं, इसीलिए उनमें सौंदर्य बोध है। हमें कोई दूसरी दुनिया नहीं बसानी। इसी को व्यवस्थित करना है। हमारी दृष्टि बदलने से समष्टि बदल जाती है। दृष्टि में ही सौंदर्य बोध है। जब सृष्टि इतनी सुंदर है, तो इसका रचयिता कितना सुंदर होगा।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (24 अगस्त से 30 अगस्त) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (24 अगस्त से 30 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। कविवर श्रेष्ठ श्री कुमार विश्वास जी के द्वारा रचित भजन की एक लाइन है “राम राजा भी हैं और तपस्वी भी हैं”। यह पंक्ति श्री रामचंद्र जी के पूरे व्यक्तित्व को चित्रित करती हैं। भजन शब्द का अर्थ होता है किसी को बार-बार याद करना और अगर आप नियमानुसार भजन करेंगे तो मृत्यु के उपरांत रघुवर पुर अर्थात बैकुंठ या अयोध्या पहुंचेंगे और वहां पर आपको हरि भक्त कहा जाएगा। श्री राम जी के व्यक्तित्व में ही श्री हनुमान जी पूरी तरह से समाहित है। श्री हनुमान जी को पाने का एक अच्छा तरीका है श्री हनुमान चालीसा का भजन और श्री हनुमान चालीसा की आज की चौपाई है

अन्त काल रघुबर पुर जाई |

जहाँ जन्म हरि-भक्त कहाई ||

इस चौपाई के संपुट पाठ करने से हनुमत कृपा प्राप्त होती है। यह सभी दुखों का नाश करती है और आपका बुढ़ापा और परलोक दोनो सुधारती है।

नाशे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 24 अगस्त से 30 अगस्त 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु राशिफल के पहले मैं आपको इस सप्ताह में ग्रहों के गोचर के बारे में पूरी जानकारी दूंगा। इस सप्ताह शुक्र कन्या राशि में, सूर्य और बुध सिंह राशि में, मंगल मिथुन राशि में, गुरु कर्क राशि में, शनि वक्री होकर मीन राशि में तथा राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। आईये अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। भाग्य से मदद मिलेगी। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। आपके संतान को विभिन्न क्षेत्रों में सफलता प्राप्त होगी। अगर आप बीमार चल रहे हैं तो आपके स्वास्थ्य में निरंतर सुधार होगा। अधिकारी और कर्मचारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। व्यापारियों के लिए सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख सफलता दायक है। 30 तारीख को आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव की आराधना करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

भाई बहनों के साथ आपके संबंध ठीक-ठाक रहेंगे। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। आपके संतान के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। भाग्य से मदद मिलने की संभावना थोड़ा कम है। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। विद्यार्थियों की पढ़ाई ठीक चलेगी। माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख सफलता प्राप्त करने के लिए उचित है। 24 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है। ‌

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके धन लाभ में वृद्धि होगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। दुर्घटनाओं से आप इस सप्ताह बचेंगे। भाई बहनों के साथ आपका संबंध ठीक रहेगा। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति सचेत रहना चाहिए। कई लोग आपकी प्रतिष्ठा के हनन के लिए सक्रिय रहेंगे। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 30 तारीख कार्यों को करने के लिए उपयोगी है। 25, 26 और 27 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की बनी रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन होने का अच्छा योग है। थोड़े से प्रयास में अधिक धन की प्राप्ति होगी। कचहरी के कार्यों के प्रति सतर्क रहें। अगर आप सावधान नहीं रहेंगे तो आपको नुकसान होगा। भाग्य से थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव हो सकता है। आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। माताजी और पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। प्रेम संबंध में वृद्धि संभव है। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 की दोपहर तक का समय कार्यों को करने के लिए मददगार है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें और शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के सामने बैठकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

सिंह राशि

इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास अच्छा रहेगा। व्यापार में वृद्धि होगी। कार्यों को करने में आपकी दिलचस्पी बढ़ेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा तनाव हो सकता है। धन आने का योग है। खर्चों में वृद्धि संभव है। इस वर्ष आपके यहां शादी ब्याह या जमीन की खरीदी या ऐसा कोई अन्य कार्य हो सकता है जिसमें काफी मात्रा में धन व्यय हो। इस सप्ताह आपके लिए 27 की दोपहर के बाद से लेकर 28 और 29 तारीख कार्यों को करने में के लिए लाभप्रद है। 25, 26 और 27 की दोपहर तक तथा 30 अगस्त का समय कार्यों को करने के लिए कम उचित है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

कन्या राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह अच्छा रह सकता है। विवाह के प्रस्ताव आएंगे। पुराने संबंधों में वृद्धि होगी। नए संबंध भी बन सकते हैं। धन आने का सुंदर योग है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। सफलता मिल सकती है। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए इस सप्ताह आपके लिए 24 और 30 अगस्त विभिन्न प्रकार से फल दायक हैं 27 28 और 29 तारीख को आपको होशियार रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वचन करें सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आएगा। धन आने की मात्रा आपके द्वारा किए जा रहे कर्म पर निर्भर होगी। अगर आप योजनाबद्ध ढंग से अधिक मेहनत करेंगे तो अधिक धन आएगा। परंतु अगर आप मेहनत नहीं करेंगे तो अल्प मात्रा में धन की प्राप्ति हुई होगी। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए भी यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। आपको अपने संतान से इस सप्ताह सहयोग नहीं मिल पाएगा। भाग्य से भी आपको कम मदद मिलेगी अर्थात आप जितना मेहनत करेंगे उतना ही आपको प्राप्ति होगी। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख परिणाम दायक है। 30 अगस्त को आपको सजग रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

कर्मचारी और अधिकारियों के लिए सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। व्यापारियों के व्यापार में वृद्धि हो सकती है। अगर आप सरकारी ठेके लेते हैं तो आपको इस सप्ताह उसमें काफी लाभ हो सकता है। धन लाभ होने की पूर्ण संभावना है। भाग्य से भी आपको मदद मिलेगी। भाई बहनों के साथ तनाव हो सकता है। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपको दुर्घटनाओं से सतर्क रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपके लिए 27, 28 और 29 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपको भाग्य से मदद मिलेगी। थोड़े से प्रयासों से भी आपको अधिक मात्रा में सफलता मिलेगी। अर्थात सफलता की मात्रा प्रयास से अधिक रहेगी। कर्मचारी एवं अधिकारियों को इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। पिताजी और जीवनसाथी के स्वास्थ्य के प्रति आपको थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। भाई बहनों के साथ इस सप्ताह आपके संबंध थोड़ा दूरी के हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 30 अगस्त लाभप्रद हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

आपके जीवनसाथी के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको जीवन के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपके माता-पिता जी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है, परंतु उसके लिए आपको अत्यंत सावधानी पूर्वक कार्य करना होगा। इस सप्ताह आपको अपने भाग्य से मदद नहीं मिल पाएगी। आपको अपने कर्म पर ही विश्वास करना होगा। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़ा सामान्य नहीं रह पाएंगे। इस सप्ताह आपके लिए 25, 26 और 27 तारीख विभिन्न कार्यों को करने के लिए उचित है। 24 तारीख को आपको होशियार रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

यह सप्ताह आपके जीवनसाथी के लिए उत्तम है। व्यापारियों के व्यापार में वृद्धि होगी। आपके जीवनसाथी को कार्य के हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होगी। अगर आपके पेट में कोई पुराना रोग है तो वह भी इस सप्ताह दूर हो सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त नहीं होगा। छात्रों की पढ़ाई में रुकावट आ सकती है। परीक्षाओं में उनका असफलता प्राप्त हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। मामूली धन प्राप्त होने का योग है। इस सप्ताह आपके लिए 27 के दोपहर से लेकर 28 और 29 तारीख कार्यों को करने के लिए परिणाम मूलक है। 25, 26 और 27 की दोपहर तक आपको सावधान रहकर अपने कार्यों का निष्पादन करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्य क्षेत्र में सफलता प्राप्त हो सकती है। आपको अपने प्रयासों से अपने शत्रुओं पर सफलता प्राप्त हो जायेगी। मानसिक तनाव थोड़ा बढ़ सकता है, परंतु आप उस पर कंट्रोल कर लेंगे। यह सप्ताह आपके संतान के लिए भी ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। आपको इस सप्ताह अपने प्रतिष्ठा के प्रति सतर्क रहना चाहिए। आपके दुश्मन इस बात का पूरा प्रयास कर सकते हैं कि वे आपकी प्रतिष्ठा को गिरायें। थोड़े मात्रा में धन आने की संभावना है। इस सप्ताह आपके लिए 24 और 30 तारीख प्रभावशाली हैं। 27, 28 और 29 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पाऊस ☆ संगीता कुलकर्णी ☆

संगीता कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ पाऊस ☆ सुश्री संगीता कुलकर्णी ☆

नभाच्या अथांग नीलपटलावर

काळ्या मेघांनी स्वप्नांची शाई

सांडली क्षितिजाच्या शांत ओठांवर

पावसाची पहिली कविता उमटली

एकेक थेंब अलगद उतरला

आकाशाचे अश्रू नव्हते

धरतीच्या विरहाला लाभलेले

प्रेमाचे निःशब्द उत्तर होते

मातीच्या गंधात मिसळून गेली

ऋतूंची अनामिक कहाणी

झाडांच्या पानोपानी दाटली

हिरवाईची नवी चांदणी

नदीच्या लाटांनी गुणगुणले

मेघांच्या अंतरीचे गूज

वाऱ्याने उलगडून दाखविले

निसर्गाच्या मनातील सूक्ष्म सूज

पाऊस म्हणजे केवळ जलधारा नव्हे

तो सृष्टीच्या हृदयाचा स्पंदनस्वर आहे

कोरड्या आयुष्याच्या वाळवंटात

उमलणाऱ्या आशेचा अंकुर आहे

थेंबांच्या चिरंतन लयीमध्ये

जीवनाचे तत्त्व दडलेले असते

झिजून विरघळून वाहत राहण्यातच

खरे अस्तित्व फुललेले असते…

©  संगीता कुलकर्णी 

लेखिका /कवयित्री

ठाणे

9870451020

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ फुलपाखरे… कवी : श्रीशैल चौगुले – रसग्रहण : अविनाश शिंदे ☆ प्रस्तुती – श्रीशैल चौगुले ☆

श्रीशैल चौगुले

? काव्यानंद ?

☆ फुलपाखरे… कवी : श्रीशैल चौगुले – रसग्रहण : अविनाश शिंदे ☆ प्रस्तुती – श्रीशैल चौगुले ☆

फुलपाखरे

इवली पिवळी फुलपाखरे

पिवळ्याशा दगडफुलांवर

सुंदर बागडती ईथे-तिथे

वारा ओला झेलीत दलांवर.

 *

पाती गवताची दवात मस्त

कधी वनात भ्रमण अनेक

ओहोळकाठी माळरानी कधी

मोहित मना फसवी अनेक.

 *

स्पर्श होता भिरभिरती भारी

रंग हाताला लावून उडती

पुन्हा बेभान पाठलाग त्यांचा

गवसणेचा हेतु ना घडती.

 *

भाव अंतरी असेच जीवनी

स्वप्नांच्या हृदयी फुलपाखरे

एकही न मनासारखे यश

रंग स्मृतींचे ते हरे-भरे.

 श्रीशैल चौगुले.

 श्रीशैल चौगुले यांची ‘फुलपाखरे’ ही कविता अत्यंत निसर्गरम्य, संवेदनशील आणि मानवी भावनांची सखोल उकल करणारी एक अप्रतिम रचना आहे.

कवितेच्या पहिल्याच कडव्यात पिवळ्या दगडफुलांवर बागडणारी पिवळी फुलपाखरे आणि ओला वारा झेलणारी त्यांची नाजूक पंखे यांचे अतिशय जीवंत आणि दृश्यमान चित्र उभे राहते. शब्दांमधून निसर्गाचा ताजेपणा स्पष्टपणे जाणवतो.

‘ओहोळकाठी’, ‘माळरानात’, ‘दवात मस्त गवताची पाती’ यांसारख्या शब्दांमुळे कवितेला एक निसर्गदत्त सौंदर्य प्राप्त झाले आहे. फुलपाखरांचा मागोवा घेताना मनाची होणारी मोहिनी आणि भ्रमंती कवीने खूप सुंदर टिपली आहे.

फुलपाखराला स्पर्श करताच ते हाताला रंग लावून भिरभिरत उडून जाणे आणि त्याच्या मागे बेभान होऊन धावणे… हा बालपणीचा किंवा मानवी स्वभावाचा नित्याचा अनुभव कवीने अतिशय साध्या पण प्रभावी शब्दांत मांडला आहे.

कवितेचा शेवट या रचनेला एका वेगळ्याच उंचीवर घेऊन जातो. केवळ निसर्गाचे वर्णन न राहता, कवीने फुलपाखरांची तुलना माणसाच्या ‘स्वप्नांशी’ आणि ‘इच्छांशी’ केली आहे. आयुष्यात मनासारखे यश पकडू पाहताना ते फुलपाखरासारखे निसटून जाते, पण हातात किंवा आठवणींत मात्र त्याचे ‘रंग’ कायम राहतात, हा तत्त्वज्ञानाचा धागा अतिशय अर्थपूर्ण व भावुक करणारा आहे.

थोडक्यात सांगायचे तर –

ही कविता बाह्य निसर्गाच्या सौंदर्यातून मानवी आयुष्यातील स्वप्न आणि सत्याचा सुंदर मेळ घालते. कवीची कल्पकता, लयबद्धता आणि भावोत्कटता कौतुकास्पद आहे.

 

रसास्वाद: अविनाश शिंदे

प्रस्तुती: श्रीशैल चौगुले

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ शतक महोत्सवी अ. भा. मराठी साहित्य संमेलनाच्या निमित्ताने… ☆ प्रा.डॉ.सतीश शिरसाठ ☆

प्रा.डॉ.सतीश शिरसाठ

?  विविधा ?

☆ शतक महोत्सवी अ. भा. मराठी साहित्य संमेलनाच्या निमित्ताने… ☆ प्रा.डॉ.सतीश शिरसाठ ☆

९ ऑगस्ट २०२६.

शतकमहोत्सवी अ.भा.मराठी साहित्य संमेलनानिमित्ताने

(हे मनोगत  सर्व मराठी भाषेवर प्रेम करणाऱ्या सर्वांसाठी असून ते कुणाच्याही विरोधी नाही).

 ———

पुण्यात, शंभरावे अखिल भारतीय पातळीवरचे मराठी साहित्य संमेलन जानेवारी २०२७मध्ये संपन्न होत आहे.

 २०२४ मध्ये केंद्र शासनाकडून मराठीला अभिजात भाषेचा दर्जा प्राप्त मिळाल्यानंतर, मराठीची सध्याची स्थिती आणि उज्वल इतिहासाची चर्चा करण्यासाठीचे हे मोठे व्यासपीठ असणार आहे.  

अभिजात भाषेचा दर्जा मिळाल्यानंतर, या भाषेच्या विकासाची चर्चा सगळीकडं झडत असताना, इथं मी काही विचार मांडू इच्छितो.

प्राचीनता, समृध्द साहित्यिक वारसा आणि अद्वितीय सांस्कृतिक महत्व, अशा निकषांवर मराठीचे महत्व राष्ट्रीय पातळीवर या निर्णयाने मान्य केले आहे.

या चांगल्या निर्णयाने, केंद्राकडून मराठी भाषेच्या विकासासाठी भरीव आर्थिक मदत मिळणार आहे.यातून काही शैक्षणिक पदे निर्माण होतील अशी आशा वाटते.

यातून  मराठी भाषेचा सखोल अभ्यास, संशोधन  होऊ शकेल ह्या बाबी नक्कीच आनंददायक आहेत.

पण या सकारात्मक बाबींनी हुरळून जाण्याची गरज नाही.

मराठी भाषेचा विकास व्हावा, अशी इच्छा बाळगणाऱ्या सर्वसामान्य  माणसाच्या भूमिकेतून काही मुद्दे स्पष्ट करतो.

व.पु.काळे एका ठिकाणी म्हणतात तसं, ‘स्काय इज द लिमिट’ असं  वाक्य  प्रचलित असलं तरी,प्रत्येकानं आपापलं आकाशाचा आवाका  ओळखला पाहिजे, निश्चित केला पाहिजे.

सर्वसामान्य माणसाला या परिस्थितीत काय करणं शक्य होईल?

१) अगदी प्राथमिक शाळेपासून विद्यापीठापर्यंत ज्या अनेक संस्था आहेत, त्या शैक्षणिकदृष्ट्या महत्त्वाची केंद्रं आहेत; जिथं सळसळत्या तरूणाईने भारलेले तरूण असतात.अशा केंद्रांतून वक्तृत्व, वादविवाद, चर्चासत्रे, निबंध अशासारख्या, तेथील  तरूणांना  सहभागी करून घेणारे लोकप्रिय उपक्रम/ स्पर्धांचे आयोजन करून, या तरुणाईच्या माध्यमातून मराठीवर सतत चर्चा घडवून आणता येईल.

अध्ययन आणि अध्यापन यांचे माध्यम हे मराठीतूनच करण्याचा आग्रह धरला जावा.या दृष्टीने संबंधित अभ्यासमंडळांनी अभ्यासक्रम/पूरक साहित्य हे  सुलभ मराठीत तयार करण्याचा प्रयत्न करावा.

२) समाजात आर्थिक उलाढाली होणाऱ्या  संस्था (उदा.बॅंका, सहकारी पतपेढ्या इ .),न्यायालये,विविध शासकीय,अशासकीय,निमशासकीय संस्था या नियमितपणे लोकांच्या जीवनाशी संबंधित असतात.

त्यांच्यातून  लोकांना मदत आणि माहिती घेऊन लाभ घेण्याच्या दृष्टीने,त्यांच्यातील   व्यवहार सोप्या, सुटसुटीत मराठीत होणे गरजेचे आहे.अनेक संस्थांचे तसे मराठीत व्यवहार चालतात. मात्र,’त्याची उपयुक्तता आणि लोकांना त्यात काही अडचणी वाटत नाही का? त्यात  सातत्याने  बदल’ करता येईल का? ‘यावर नेहमी स्थानिक लाभधारक लोकांकडून फिडबॅक घेणे आवश्यक आहे.

३) ‘बारा मैलावर भाषा बदलते ‘असं म्हणतात.

ठिकठिकाणच्या भौगोलिक,सामाजिक आणि सांस्कृतिक परिस्थितीतीनुसार विविध ठिकाणच्या बोलीभाषा बोलल्या जातात आणि बदलतातही.

या बोलीभाषा लोकांच्या संवादाचे जसे माध्यम असतात, तसेच ते   संबंधित संस्कृतीचे प्रतिकही असतात.

भाषा ही काळानुसारही बदलते.बोलीभाषेची वैशिष्ट्ये,सामाजिक  व्यवहारात त्यांचे स्थान, त्यांच्या प्रसारासाठी ज्ञात आणि अज्ञात व्यक्तिं/ संस्थांनी केलेले योगदान याचेही  विविध स्तरांवर संशोधन झाले पाहिजे.

आपल्याकडे संशोधनालाही काही चौकटी असतात. त्यामुळे  सर्वसामान्य माणसाला त्याची भिती आणि पर्यायाने तिटकारा येतो आणि तो संशोधनापासून बाजूला रहातो.समाजातील प्रश्नांची उकल करण्याचे  आणि

काही चमकदार बाबी शोधण्याचे ते उत्तम साधन असते, असा दृढ विश्वास त्याच्या मनात निर्माण झाला तर, संशोधन ही त्याची आवड आणि छंद होईल. मराठी साहित्य विकासात त्याचा उपयोग करून घेता येईल.

आपल्याकडे छपाईचे तंत्र विकसित होत असताना, इथं पुण्यातल्या पेशव्यांची सत्ता होती. म्हणून त वापरतात ती मराठी  भाषा ही ‘प्रमाण मराठी’ समजली  जाऊ लागली. तरीपण इतर बोलीभाषा (उदा. मालवणी,अहिराणी इ.)

याही मराठीचे वैभव आहेत.  

आज इंग्रजी ही जगातील सर्वात जास्त बोलली जाणारी भाषा समजली जाते.मला वाटतं की, याचं एक कारण म्हणजे जगातील अनेक भागांत राज्य करताना, इंग्रजांनी ती सगळीकडे नेली .पण इंग्रजीत अनेक  स्थानिक  शब्दांचा आंतर्भाव आहे.आपल्याकडील ‘ट्रॅफिक जॅम’ हा शब्दही त्यापैकी एक असावा.

आजच्या सोशल मिडियाच्या  काळात मराठी बोलताना, इतर भाषांची त्यात सरमिसळ झाली म्हणून ती अशुद्ध झाली किंवा तिच्यावर आक्रमण झाले असं समजणं चूक आहे.

जोवर मराठी माणूस  जिवंत आहे,तोवर मराठीही 

भिती नाही हेच खरं.

मराठीला अभिजात दर्जा मिळाल्यानंतर नवी दिल्लीत झालेल्या अखिल भारतीय साहित्य संमेलनानिमित्त मी एक कविता लिहिली होती.तिची आठवण येते ;

‘देशाच्या शीर्षनगरी

साहित्य संमेलन होताना,

संसदेच्या कोर्टात

न्याय मिळाल्याचा आनंद ओसंडून वहाताना,

उधळा गुलाल

होऊन बेभान,

ठेवा फक्त एक भान;

अमृताच्या पैजा जिंकणारी,

चामुंडराये करवियलेली

ही श्रीमंत भाषा

सरकारी हापिसातून झिरपू द्या,

इथल्या माणसांची तहान त्याने भागू द्या;

कोर्टातून, बॅंकांतून

आणि शाळा काॅलेजांतून ती खेळू द्या,

रडणा-यांचे डोळे

पुसणारे

ते हसरे फूल होऊ  द्या!’

मराठी वापरा,मराठी वाढवा  आणि मराठी वाचवा…

या निमित्ताने अजून दोन बाबींचा उल्लेख करणं मला आवडेल.

१) महाराष्ट्रातील लोकजीवनाच्या  विद्यापीठाचे अनभिषिक्त निरक्षर कुलगुरू असा ज्याचा  गौरव केला जातो,त्या पूज्य गाडगेबाबांच्या  कीर्तनाचे वर्णन करताना एका अभ्यासक सांगत होते की,एखाद्या गावातील बाबांचे कीर्तन हा एक अवर्णनीय सोहळा असे.कुठेतरी पटांगणावर कंदिलाच्या किंवा पेट्रोमॅक्सच्या उजेडात बाबांच्या कीर्तनाला त्या गावच्या आजूबाजूलाच्या परिसरातील हजारो माणसं उपस्थित असत.अगदी मध्यरात्रीपर्यंत चाललेल्या या कीर्तनात, तेव्हा खेड्यात लाईट असणं अशक्य.आणि म्हणून माईकही बहुतेक  वेळा नसायचा. पण कीर्तनात मधूनमधून  बाबा दोन्ही हात वर करून ‘गोपाला,गोपाला देवनकीनंदन गोपाला’ असं पालुपद  म्हणत;  तेव्हा तिथं हजर असलेली ती सर्व माणसंही मोठ्यांदा ते म्हणत. कीर्तनाच्या  शेवटी बसलेल्या माणसांना विचारलं की,’इतक्या दुरून तुम्हाला बाबांचं कीर्तन ऐकायला येत नसेल तरी तुम्ही का येता?’

यावर त्यांचं उत्तर विलक्षण होतं.उत्तर होतं,”आम्ही गाडगेबाबांचं कीर्तन पहायला येतो”. कीर्तन ऐकता येतं हे आजपर्यंत आपण ऐकत आलो आहोत. पण कीर्तन पहाणं जो केवळ वाक्प्रचार नव्हता; तर ते आपलेपणाचं नातं सांगणारा जिव्हाळा होता.मराठी भाषेला नवीन वाक्प्रचार होता.

माझ्या माहितील  एक कुटुंब सुट्टीत सिंहगडावर  गेलं होतं.

सिंहगड;तिथं डोंगर, झाडी  होतीच.

पायवाटही काहीशी ओबडधोबड होती.

गडावरून पायी उतरताना त्या कुटुंबातील छोटी मुलगी अचानक ओरडली,” आई,किंचोळा”.तिनं एक कीटक पाहिला होता.मात्र पाहिलेला किटक तिच्या शब्दांत किंचोळा होता.

माझ्यामते  तरी तो नवीन शब्द असेल. अशी अनेक उदाहरणं आहेत की,जेथे सर्वसामान्य माणूस व्यवहारात नकळत नवनवीन शब्द/वाक्ये किंवा वाक्प्रचार निर्माण करतो.मला वाटतं यातून भाषा समृद्ध होत  जाते. 

अनेक शिक्षणसंस्थांतून, मराठी भाषेवर संशोधन सुरू आहे.त्यांनी अशा नवीन शब्दांना संकलित केलं तर हा चांगला उपक्रम असेल,

२) आणखी एक विचार.अर्थात अनेकजण ते बोलतातही. त्याचा पुनरूच्चार करतो इतकंच.

 मराठी भाषेवर प्रेम असणाऱ्यांनी नियमित नव्हे तर जमेल तसं काही कुटुंबांशी बोलावं आणि एकतरी मराठी पुस्तक विकत घेऊन ते वाचावं असा सल्ला द्यावा. त्यांनी

जमल्यास, त्यावर इतरांशी बोलावं.अगदी कुणाला शक्य नसेल तर, आपण जिथं काम करतो तिथं तरी फावल्या वेळात मराठी पुस्तकांवर चर्चा करता येईल.किंवा सोशल मिडीयावरूनही यावर इतर उहापोह करता येईल.मराठी  न बोलल्या  जाणाऱ्या  कुटूंबात याची गरज काय? असा मुद्दा उपस्थित होईलही.अशा ठिकाणी  त्यांचं म्हणणं   शांतपणे ऐकून, जगण्याच्या व्यवहारात  मराठी वापरणं ही गरज आहे,हे त्यांना पटवून देऊन, त्यांच्या  आवडीच्या  विषयांतील  लहान लहान  पुस्तकं  सुचवता येतील. अर्थात अशी सूचना करताना,कोणतीही राजकीय किंवा सांप्रदायिक विचारसरणीचा प्रचार करू  नये हे पथ्य  कसोशीने  पाळावे.

काही मराठी भाषेतील  समूहांवर  याविषयी उत्तम उपक्रम सतत सूरू असतात.हे नक्कीच आनंददायक आणि अनुकरणीय आहेत. त्याच्या पटी वाढवल्या जाव्यात.

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© प्रा.डाॅ.सतीश शिरसाठ

सेवानिवृत्त प्राध्यापक आणि म.फुले अध्यासनाचे माजी समन्वयक,

सावित्रीबाई फुले पुणे विद्यापीठ,

ईमेल- sks.satish@gmail.com मो व वाटसॅप नं. – ९९७५४३५१५२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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