(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
हनुमान साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है प्रो. अरुण कुमार भगत जी द्वारा लिखित “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०२ ☆
☆ “संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक…” – लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक ..’संपादन-कला: सिद्धांत से व्यवहार तक’
लेखक :प्रो. अरुण कुमार भगत (सदस्य , बिहार लोक सेवा आयोग, पटना)
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन , नयी
दिल्ली
मूल्य : 325 रु, पृष्ठ 160
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
वाणी प्रकाशन से प्रकाशित प्रो. अरुण कुमार भगत की यह पुस्तक पत्रकारिता के उस ‘नेपथ्य’ को सामने लाती है, जिसके बिना सूचना महज एक कच्चा माल है। आठ प्रमुख अध्यायों में विस्तृत विषय वस्तु को बिंदुवार व्याख्या कर लेखक ने संपादन को एक यांत्रिक कार्य के बजाय एक बौद्धिक और सृजनात्मक शिल्प के रूप में स्थापित किया है।
\संपादन की परिकल्पना और कला (पृष्ठ 11-40), के पहले अध्याय में लेखक ने पुस्तक की शुरुआत ‘संपादन की अवधारणा’ से की है। यहाँ संपादन को केवल त्रुटि-शोधन नहीं, बल्कि एक ‘दृष्टि’ के रूप में परिभाषित किया गया है। ‘संपादन के सोपान’ और ‘तकनीक’ वाले अध्याय यह स्पष्ट करते हैं कि एक संपादक को किन मानसिक चरणों से गुजरना पड़ता है। संपादन के महत्व को रेखांकित करते हुए पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए एक स्तरीय संदर्भ है ।
संपादन के सिद्धांत (पृष्ठ 41-54) अध्याय पुस्तक का दार्शनिक आधार है। यहाँ ‘पाठ्य-सामग्री के चयन’, ‘गठन’ और ‘प्रस्तुति’ के सिद्धांतों पर लेखक ने अनुभूत विस्तृत चर्चा की है। लेखक ने कतिपय अनुभवी संपादकों के सिद्धांतों को जोड़कर इस खंड को ऐतिहासिक संदर्भ भी प्रदान किया है, जो शोधार्थियों के लिए मूल्यवान सामग्री है। संपादकीय विभाग का ढाँचागत स्वरूप (पृष्ठ 55-74) गहन अध्ययन योग्य है। एक उत्कृष्ट समाचार पत्र या पत्रिका के पीछे की संगठनात्मक शक्ति इस आलेख में स्पष्ट होती है ।संपादकीय कक्ष (Newsroom) की कार्य-प्रणाली और संरचना को बारीकी से समझाया गया है। यह व्यवहारिक ज्ञान उन नवागत पत्रकारों के लिए महत्वपूर्ण है जो मीडिया संस्थानों की आंतरिक कार्य-संस्कृति को समझ कर कुछ नवाचार करना चाहते हैं।
मेरा मानना है कि शीर्षक किसी भी किताब या लेख का वह प्रवेश द्वार होता है जो अपने लालित्य से पाठक को आकर्षित करने की क्षमता रखता है। लेखन का शिल्प और सौंदर्य (पृष्ठ 75-97)
शीर्षक (Headline) में यही तथ्य बौद्धिक विवेचना के आधार पर बताया गया है। प्रो. भगत ने शीर्षक के प्रकार, उसकी विशेषताओं और ‘प्रभावी शीर्षक लेखन की तकनीक’ पर जो प्रकाश डाला है, वह लेखक के स्वयं के व्यापक अनुभव का प्रमाण है। यहाँ शिल्प और सौंदर्य का सामंजस्य संपादन को एक ललित कला की श्रेणी में खड़ा कर देता है।
संपादन का शिल्प-विधान और शैली-पुस्तिका (पृष्ठ 98-108) संपादन में ‘शैली’ (Style Book) का क्या महत्व है, इस पर लेखक ने विशेष बल दिया है। भाषा-शैली की एकरूपता और शुद्धता ही किसी प्रकाशन की पहचान बनाती है। यह खंड भाषाई अनुशासन के प्रति लेखक की आदर्श प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
संपादन-प्रक्रिया, विलोम पिरामिड से चित्र-संपादन तक (पृष्ठ 109-140) अध्याय सबसे अधिक तथ्यात्मक और क्रियात्मक है। इसमें ‘आमुख (Lead) की बनावट’, ‘विलोम पिरामिड शैली’ (Inverted Pyramid) और ‘समाचार का पुनर्गठन’ जैसे गंभीर विषयों पर नवाचारी चर्चा की गई है। साथ ही, ‘चित्र-संपादन’ का समावेश यह बताता है कि विजुअल मीडिया के दौर में एक संपादक की आँखें कितनी पैनी होनी चाहिए।
मुझे स्मरण है कि मेरा एक व्यंग्य ‘कबीर से एक आत्म साक्षात्कार ‘ एक राष्ट्रीय पत्र में छपा था, लेख में, जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है, कुछ भी ऐसा नहीं है जो किसी की कोई भावना आहत करे , पर लेख के साथ प्रकाशित व्यंग्य चित्र के चलते एक वर्ग को लगा कि उनकी भावना आहत हुई, और उन्होंने प्रतिवाद दर्ज किया था। अतः संपादन में व्यापक समझ और दूरंदेशी वांछित होती है।
आज सोशल मीडिया के स्वसम्पादन वाला इंस्टा युग है। इधर लिखा उधर दुनिया भर में गया । जब तक एक खबर पर भरोसा करो , उसका खंडन आ जाता है। खबरों का ट्रंप कार्ड संपादक के पास ही होता है, अतः उसे सब कुछ ठीक तरीके से फैक्ट चेक के बाद ही जारी करने का साहस रखना चाहिए। इस दृष्टि कोण से यह किताब अध्ययन मनन और सीखने , पढ़ते , गुनते रहने वाली सामग्री का विशद कलेवर समेटे हुए है।
मेरी समझ में असंपादित न्यूज की हड़बड़ी के चलते ही आगरा समिट विफल हो गई थी। अतः संपादन का महत्व निर्विवाद है।
पुस्तक में पृष्ठ-सज्जा और अभिकल्प (पृष्ठ 141-160) पर पूरा अध्याय है।
पुस्तक का समापन ‘पृष्ठ-सज्जा’ (Page Layout) के संतुलन और सौंदर्यबोध के साथ होता है।
एक संपादक को केवल शब्दों का ही नहीं, बल्कि रिक्त स्थान और विजुअल बैलेंस का भी ज्ञान होना चाहिए, यह इस खंड का मुख्य संदेश है। प्रकाशन रीडर्स फ्रेंडली होना चाहिए। छोटे अक्षरों में बेतहाशा पठनीय सामग्री उड़ेल देना उचित नहीं होता।
यह पुस्तक संपादन का संपूर्ण कोश है।
प्रो. अरुण कुमार भगत ने संपादन-कला के हर सूक्ष्म तंतु को स्पर्श कर उसे सरल शब्दों में विस्तार पूर्वक समझाया है। अध्यायों का प्रवाह ‘सिद्धांत’ से शुरू होकर ‘प्रस्तुति’ के अंतिम पड़ाव तक जाता है। ‘सूचना विस्फोट’ के इस दौर में, जहाँ विश्वसनीयता का संकट है, यह पुस्तक संपादकीय शुचिता और बौद्धिक प्रखरता का मार्ग प्रशस्त करती है।
पत्रकारिता जगत से जुड़े हर छोटे बड़े के लिए यह पुस्तक एक मार्गदर्शिका है । किताब संपादन की जटिलताओं को समझकर उसे एक सार्थक सामाजिक सरोकार में बदलने की कला में पारंगत बनाती है।
पुस्तक अमेजन पर सुलभ है। संदर्भ हेतु अपने स्टडी सेल्फ में रखने की अनुशंसा अपने पाठकों को करता हूं।
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २१९ – गूँजा है आकाश धरा में, फिर से वंदेमातरम… ☆
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है मातृ दिवस पर विशेष “कहाँ हो माँ? ”।)
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १७६ ☆ देश-परदेश – माँ के नाम का बाज़ार सज चुका है ☆ श्री राकेश कुमार ☆
पिछले कुछ दिनों से चारों दिशाओं में “मदर्स डे” (मातृ दिवस) की चर्चा हो रही हैं। विगत एक दशक से मदर्स डे शब्द सुनना आरंभ किया है।
बचपन से बुढ़ापे की दहलीज तक का जीवन तो बिना मदर्स डे मनाए ही व्यतीत हो गया था। अब जीवन की अंतिम पायदान पर ये सब देखने/ सुनने को मिल रहा है।
बाज़ार सज चुके है, पश्चिम में खुशियां मानने का आरंभ कार्ड भेज का शुभकामनाएं प्रेषित करने से होता हैं। नाना प्रकार के उपहार मां के लिए उपलब्ध कराए जाते हैं। ऑनलाइन व्यापार के चतुर खिलाड़ी भी इस रेस में अग्रणी रहते है।
“कुछ मीठा हो जाए” के नाम से ज़हर परोसने वाले भी सक्रिय हो जाते हैं। बाज़ार को भुनाने में सबसे आगे रहते है। आज भुने हुए चने की दुकान मुश्किल से मिलती है, लेकिन चॉकलेट/ केक हर दुकान पर मिल जाता है। किसी भी दिन, कभी भी, कुछ भी हो केक काट कर खुशियां मनाया जाना अब हमारे समाज में भी एक रिवाज़ बन चुका है।
हमारी संस्कृति जहां मां अपने पूरे जीवन में बच्चों को सभी तरह की खुशियां ही नहीं देती वरन उनके सब कष्ट/दुःख का निवारण भी करती है। उसको वर्ष में एक दिन का सम्मान देना कदापि न्यायोचित नहीं हो सकता है।
प्रतिदिन प्रातः काल मां के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की हमारी परंपरा अब विलुप्तता की कगार पर है। एक दिन मां को भगवान बना देने से मातृत्व ऋण कभी भी चुकाया नहीं जा सकता हैं। इसलिए अपनी संस्कृति का अनुपालन कर जब मौका मिले मां से आशीर्वाद प्राप्त करते रहें।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हमारा आदर्श समाज…“।)
अभी अभी # ९८८ ⇒ आलेख – हमारा आदर्श समाज श्री प्रदीप शर्मा
किसे पता था कि व्यावहारिक जीवन से आदर्श शब्द अचानक पलायन कर शब्दकोश में दुबककर बैठ जाएगा और उसके दर्शन केवल गीताप्रेस गोरखपुर की आदर्श नारी और आदर्श बालक जैसी पुस्तकों में ही संभव हो पाएँगे।
हमने बचपन में आदर्शों को ऐसे ही ढोया है जैसे आज की पीढ़ी कथित रूप से भ्रष्टाचार और आतंकवाद को ढो रही है। अगर मैं यह कहूँ कि उस ज़माने में लोग आदर्श ही ओढ़ते और आदर्श ही बिछाते थे, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।।
आज के समय की नर्सरी और kg 1 kg 2 तब कच्ची और पक्की पहली और अ-खण्ड, ब-खण्ड कहलाती थी। रोते हुए बच्चों को पकड़-पकड़कर स्कूल भेजा जाता था। हमारी पहली नर्सरी का नाम भी आदर्श बाल मंदिर ही था। एक आदर्श खंडहरनुमा ढाँचा स्कूल कहलाता था, जो समय के साथ विवादित ढाँचे के पहले ही ढह गया। आदर्शों का टिका रहना इतना आसान भी नहीं होता।
हमारे आदर्श शिक्षक, आजीवन नैतिकता और ईमानदारी की प्रतिमूर्ति ही रहे। कई चेले शक्कर निकल गए, लेकिन गुरु गुड़ ही रह गए। उनकी ईमानदारी गूँगे का गुड़ थी, जो होते हुए भी, आँखों से नज़र नहीं आती थी। आज केवल उनके स्मरण मात्र से ही आँखें नम हो जाती हैं।।
गाइड और ट्यूशन जैसे शब्द शिक्षा में प्रचलित नहीं थे। शिक्षा के क्षेत्र में आदर्श शिशु विहार, आदर्श कन्या विद्यालय
और आदर्श महाविद्यालय, शिक्षा के आदर्श केंद्र थे। हम आदर्श नगर में ही रहते थे और एक आदर्श को-ऑपरेटिव सोसाइटी में ग़बन भी हमारे ही सामने हुआ था।
आदर्श का इतना बोलबाला था कि आदर्श पुस्तक भंडार, आदर्श किराना स्टोर तो ठीक, रहने के लिए आदर्श लॉज और खाने के लिए आदर्श भोजनालय तक उपलब्ध था।।
बीच में आदर्श से थोड़ी राहत मिली ज़रूर, जब अंग्रेज़ी ने सर उठाया। फिर दौर चला आइडियल कॉफ़ी हाउस और आइडियल पैथोलॉजी का।
शिक्षा का आरंभ भी आइडियल प्रिपप्रेटरी स्कूल से होने लगा। लेकिन आइडियल शब्द आदर्श का विकल्प नहीं बन पाया।
नैतिकता, ईमानदारी और आदर्श को आप अलग अलग नहीं कर सकते। पुस्तकों के ज्ञान ने हमेशा सच बोलने को बाध्य कर दिया। झूठ बोलने से पाप लगता है, यह डर, कई बार झूठ बोलने के बाद जाता रहा। पाप के डर से नहीं, पकड़े जाने के डर से कभी चोरी करने की हिम्मत नहीं हुई और हम शरीफ बनकर रह गए।
नैतिकता साहस का काम है। जिनमें दुस्साहस होता है, वे आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी को ताक में रख देते हैं ! जब सम्पन्न, सुखी और इज़्ज़तदार बन जाते हैं, तब टोपी और कोट की तरह आदर्श और नैतिकता ओढ़कर समाज में प्रकट हो जाते हैं। समाज उन्हें चिंतक, विचारक और समाज सुधारक जैसे विशेषणों से अलंकृत एवं पुरस्कृत करता है। उनके सम्मान में फलाने आदर्श पुरुष के नाम से अभिनंदन ग्रंथ का विमोचन होता है।
सफलता के रास्ते में आदर्श, नैतिकता और ईमानदारी बड़े बड़े स्पीड ब्रेकर हैं। जो इनमें उलझकर पिछड़ गया, वह समय से पिछड़ गया। आगे बढ़ने वाले कब ऐसे अवरोधक से घबराते हैं। वे समय के साथ चलते हैं, और अपनी मंज़िल पर पहुँच ही जाते हैं। समय के साथ चलना ही समझदारी है।।
क्या आपने इतना उन्नत समाज पहले कभी देखा है ? चुनाव घोषित होते ही आदर्श आचार संहिता भी लागू हो गई है। इतने आदर्श चुनाव 70 साल में पहले कभी नहीं हुए। हिंसा, बूथ पर कब्ज़ा और बोगस वोटिंग से पूरी तरह छुटकारा। अब आप अपने आदर्श उम्मीदवार को बिना भय और लालच के मत दे सकते हैं। इससे अधिक आदर्श वातावरण की तो शायद आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
अब हम विकासशील देश नहीं रहे। पूरी तरह विकसित हो गए हैं। क्यों न बरसों से ताक में रखा ईमानदारी का तावीज़ पुनः गले में पहन लिया जाए। यह हमारी बेईमानी और भ्रष्टाचार से रखवाली तो करेगा ही, हमें एक आदर्श समाज की स्थापना में मदद भी करेगा।।
परमार्थात काय करावे हे तर महत्त्वाचे आहेच पण काय करु नये हे अधिक महत्त्वाचे आहे !!
उदा जप करणे उत्तमच पण एकवेळ जप नाही जमला तर इतकं बिघडणार नाही पण न सांगितलेली गोष्ट केली तर फार नुकसान होतं
परमार्थात ‘विधिनिषेध’ (काय करावे आणि काय करू नये) याला अत्यंत महत्त्व आहे. अनेकदा आपण काय करावे (उदा. जप, तप, पूजा) यात इतके गुंततो की काय टाळावे याकडे दुर्लक्ष होते.
१. ‘न करणे’ हे ‘करण्या’पेक्षा कठीण असते
परमार्थात साधना करणे म्हणजे काहीतरी ‘मिळवणे’ नसून स्वतःमधील दोष ‘कमी करणे’ असते.
उदाहरण: दिवसातून एक तास जप करणे सोपे आहे, पण उरलेले २३ तास कोणाची निंदा न करणे, कोणावर न रागावणे किंवा असत्य न बोलणे हे जास्त कठीण आहे.
जर आपण जपाची बादली भरत असू, पण ‘निंदा’ किंवा ‘अहंकार’ नावाच्या छिद्रातून ती रिकामी होत असेल, तर त्या साधनेचा उपयोग शून्य होतो.
२. आज्ञापालन: हे सर्वात मोठे नुकसान
“न सांगितलेली गोष्ट करणे” हे साधनेत घातक ठरू शकते. याचे मुख्य कारण म्हणजे अहंकार.
जेव्हा साधक स्वतःच्या बुद्धीने “मला हे जास्त चांगलं वाटतं” म्हणून गुरुंनी न सांगितलेली गोष्ट करतो, तेव्हा त्याचा ‘मी’ बळावतो.
परमार्थात साध्या कृतीपेक्षा त्यामागील समर्पण महत्त्वाचे असते. जप चुकला तर तो अनावधानाने झालेला प्रमाद असू शकतो, पण मनाप्रमाणे वागणे हा जाणुनबुजून केलेला स्वैराचार असतो.
३. साधनेतील ‘छिद्रे’ बुजवणे आवश्यक
संत तुकाराम महाराज म्हणतात, “काय थोर झाले तीर्थाचे दर्शन । जरि नाही मन शुद्ध झाले ॥”
जर एखादा माणूस खूप दानधर्म करतोय, पण घरातल्या माणसांना त्रास देतोय, तर त्या दानाला काही अर्थ उरत नाही.
परमार्थात ‘काय करू नये’ याची यादी (जसे की: परनिंदा, मत्सर, क्रोध, दंभ) पाळल्यास अंतःकरण लवकर शुद्ध होते. शुद्ध अंतःकरणात मग थोडा केलेला जपही लवकर फळाला येतो.
४. पथ्य आणि औषध
परमार्थ हा एखाद्या आजारावरील उपचारासारखा आहे. औषध (जप/साधना) घेणे जितके गरजेचे आहे, त्यापेक्षा जास्त महत्त्व ‘पथ्य’ (काय करू नये) पाळण्याला असते.
जर रुग्ण औषध घेतोय पण पथ्य पाळत नसेल, तर औषध लागू पडत नाही.
त्याचप्रमाणे, साधनेचे औषध तेव्हाच काम करते जेव्हा आपण कुसंगती, विषयांची ओढ आणि नकारात्मक विचारांचे पथ्य पाळतो.
थोडक्यात सांगायचे तर, ‘साधना’ ही शिडी आहे, तर ‘संयम’ हा तिचा आधार आहे. डबके कितीही मोठे असले तरी त्याला छिद्र असेल तर ते कधीच भरणार नाही. म्हणून दोषांचा त्याग (काय करू नये) हे साधनेचा पाया मजबूत करण्याचे काम करते.
“केल्याने होत आहे रे आधी केलेची पाहिजे” या उक्तीसोबतच “काय सोसावे आणि काय टाळावे” याचे भान असणे हाच खरा शहाणपणा आहे.
परमार्थात ‘काय करू नये’ या विषयाला पुष्टी देणारा एक अत्यंत प्रसिद्ध आणि सार्थ संस्कृत श्लोक ‘श्रीमद्भगवद्गीते’ मध्ये येतो. हा श्लोक साधनेतील सर्वात मोठ्या अडथळ्यांना (म्हणजेच काय टाळावे याला) अधोरेखित करतो:
मुख्य श्लोक
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः ।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत ॥
(भगवद्गीता – १६. २१)
या श्लोकाचा शब्दशः अर्थ असा आहे की:
“काम (वासना), क्रोध (राग) आणि लोभ (हाव) हे नरकाचे तीन प्रकारचे दरवाजे आहेत, जे आत्म्याचा नाश करणारे आहेत; म्हणून या तिन्हींचा त्याग करावा (हे करू नये).“
या श्लोकाचे तुमच्या विचारांशी असलेले नाते खालील मुद्द्यांवरून स्पष्ट होईल:
आत्म्याचा नाश: येथे ‘नाश’ म्हणजे मृत्यू नव्हे, तर साधकाच्या प्रगतीचा पूर्णतः थांबणे. तुम्ही कितीही जप केला, तरी जर तुम्ही काम-क्रोध-लोभाच्या आहारी जात असाल, तर तुमची सर्व साधना व्यर्थ जाते.
‘हे करू नये’ याचे महत्त्व: भगवंतांनी येथे “हे करा” म्हणण्याऐवजी “हे टाळा” (त्यजेत) यावर जास्त भर दिला आहे. कारण जोपर्यंत या तीन गोष्टी मनात आहेत, तोपर्यंत केलेली कोणतीही साधना फळ देणार नाही.
पायाभूत नियम: परमार्थात जप-तप ही वरची मजली आहे, पण काम-क्रोध-लोभाचा त्याग हा पाया आहे. पायाच नसेल तर मजला कोसळणारच.
आणखी एक पूरक सुभाषित (पथ्याबाबत)
परमार्थात ‘काय करू नये’ हे पथ्यासारखे असते. त्या संदर्भात हे सुभाषित खूप प्रसिद्ध आहे:
विना पथ्यं कदर्यस्य किं पथ्यौषधसेवनैः ।
सपथ्यस्य कदर्यस्य किं पथ्यौषधसेवनैः ॥
अर्थ: जर एखादा रुग्ण ‘पथ्य’ (काय खाऊ नये) पाळत नसेल, तर त्याला औषध देऊन काय उपयोग? (कारण औषध लागू होणार नाही). आणि जर रुग्ण ‘पथ्य’ व्यवस्थित पाळत असेल, तर त्याला औषधाचीही फारशी गरज उरत नाही (कारण तो आपोआपच बरा होईल).
परमार्थात लागू पडताना:
पथ्य = काय करू नये (उदा. निंदा, मत्सर, आज्ञाभंग).
औषध = काय करावे (उदा. जप, पूजा).
जर आपण ‘काय करू नये’ हे पाळले नाही, तर जपाचे औषध लागू होत नाही.
परमार्थातील ‘निषेध’ (काय करू नये) आणि ‘पथ्य’ या विषयावर संत ज्ञानेश्वर महाराज ज्ञानेश्वरीत अतिशय सुंदर भाष्य करतात. विशेषतः सोळाव्या अध्यायात, जिथे दैवी आणि आसुरी संपत्तीचे वर्णन आहे, तिथे ते एका ओवीतून हा विचार मांडतात:
संत ज्ञानेश्वरांची ओवी (अध्याय १६)
विधी निषिद्ध सांडूनि। जे वर्तती स्वेच्छाचारिणी।
ते न पावती गा दोन्ही। इहपर लोक॥
अर्थ: जे लोक शास्त्राने सांगितलेले ‘विधी’ (काय करावे) आणि ‘निषिद्ध’ (काय करू नये) या दोन्ही मर्यादा सोडून केवळ आपल्या मनाप्रमाणे (स्वेच्छेने) वागतात, त्यांना इहलोक (या जगातील सुख) आणि परलोक (परमार्थातील गती) यांपैकी काहीही प्राप्त होत नाही.
विवेचन (ज्ञानेश्वरीच्या प्रकाशात)
ज्ञानेश्वर महाराज येथे ‘मनासारखे वागणे’ (स्वेच्छाचार) हा साधनेतील सर्वात मोठा अडथळा मानतात. तुमच्या मूळ विचाराला पुष्टी देणारे काही महत्त्वाचे मुद्दे:
मर्यादेचे महत्त्व: जसा समुद्र आपली मर्यादा सोडत नाही म्हणून तो टिकून आहे, तसाच साधक जेव्हा ‘काय करू नये’ याची मर्यादा पाळतो, तेव्हाच त्याची साधना सुरक्षित राहते.
आज्ञाभंग हीच मोठी हानी: तुम्ही म्हटल्याप्रमाणे, “न सांगितलेली गोष्ट करणे” म्हणजे गुरूंनी किंवा शास्त्रांनी आखून दिलेली रेषा ओलांडणे होय. माउली म्हणतात की, अशी व्यक्ती कितीही जप करत असली, तरी ती विस्कटलेल्या घरासारखी असते; तिथे लक्ष्मी (दैवी गुण) वास करत नाही.
शुद्ध अंतःकरण: जेव्हा आपण निषिद्ध गोष्टी टाळतो (उदा. निंदा, दंभ, अहंकार), तेव्हाच अंतःकरण आरशासारखे स्वच्छ होते. त्या स्वच्छ आरशात मग ईश्वराचे रूप चटकन दिसते. उलट, आरसाच मळलेला असेल (म्हणजेच आपण चुकीच्या गोष्टी करत असू), तर कितीही प्रकाशाचा (साधनेचा) झोत टाकला तरी प्रतिबिंब दिसणार नाही.
संत तुकाराम महाराजांचा दृष्टिकोन
तुकोबा एका अभंगात म्हणतात:
“भले तरी देऊ कासेची लंगोटी । नाठाळाच्या माथी हाणू काठी ॥”
येथे ‘नाठाळ’ म्हणजे केवळ बाहेरची व्यक्ती नव्हे, तर आपल्या मनातील ‘अयोग्य विचार’ होय. तुकोबा सांगतात की, जो विचारांनी शुद्ध नाही, त्याने कितीही बाह्य उपचार केले तरी ते व्यर्थ आहेत.
सारांश
तुमचा मूळ विचार की “जप नाही जमला तरी चालेल, पण चुकीची गोष्ट करू नये”, हेच संतांनाही अभिप्रेत आहे. कारण ‘साधना’ ही शिडी आहे, पण ‘सदाचार’ ही ती शिडी ज्या भिंतीला लावली आहे, ती भिंत आहे. भिंतच कच्ची असेल, तर शिडी कितीही उंच असली तरी उपयोग काय?
परमार्थात ‘काय करू नये’ हे ‘काय करावे’ पेक्षा का महत्त्वाचे आहे, हे स्पष्ट करण्यासाठी एक अत्यंत चपखल आणि जुना ‘दुधाच्या घागरीचा’ दृष्टांत दिला जातो.
दृष्टांत: दुधाची घागर आणि विषाचा थेंब
एका भक्ताने खूप कष्ट करून, पहाटे उठून गाईचे धारोष्ण आणि शुद्ध दूध एका मोठ्या घागरीत जमा केले. ते दूध त्याने अत्यंत श्रद्धेने ईश्वराला अर्पण करण्यासाठी किंवा त्याचे दही-तूप करण्यासाठी स्वच्छ करून ठेवले होते. हे दूध म्हणजे तुमची ‘साधना’ (जप, तप, वाचन) आहे.
पण, त्याच वेळी त्या घागरीत एका विषाच्या सुईचे टोक किंवा सापाच्या विषाचा एक छोटासा थेंब पडला.
आता विचार करा:
१. दूध कितीही शुद्ध असले, तरी ते आता पिण्यायोग्य राहिले का? नाही.
२. त्या दुधाची चव बिघडली नसेल, रंगही बदलला नसेल, पण त्यातील तो एक ‘निषिद्ध’ थेंब (विषाचा अंश) संपूर्ण दुधाला घातक ठरला.
विवेचन:
दूध जमा करणे = विधी (जप, ध्यान, कीर्तन करणे).
विषाचा थेंब = निषिद्ध (अहंकार, परनिंदा, किंवा गुरूंनी ‘नको’ म्हटलेली गोष्ट करणे).
जर आपण दिवसभर जप केला (दूध जमा केले), पण मनात एखाद्याबद्दल मत्सर ठेवला किंवा कोणाचा तरी अपमान केला (विषाचा थेंब), तर आपली सर्व साधना त्या एका कृतीने ‘विषारी’ किंवा निष्फळ होते.
दुसरा छोटा दृष्टांत: ‘छिद्र असलेल्या नावेचा’
समजा तुम्हाला नदी पार करायची आहे. तुमच्याकडे एक सुंदर नाव आहे आणि तुम्ही जोरात वल्हवत आहात. वल्हवणे ही तुमची ‘साधना’ आहे. पण जर त्या नावेला तळाशी एक छोटेसे छिद्र असेल, तर तुम्ही कितीही जोरात वल्हवले तरी ती नाव पैलतीराला पोहोचणार नाही; उलट ती मध्येच बुडेल.
येथे वल्हवणे (काय करावे) महत्त्वाचे आहेच, पण त्यापेक्षा छिद्र बुजवणे (काय करू नये / दोष टाळणे) हे अधिक महत्त्वाचे आहे. छिद्र असेल तर तुमचे सर्व श्रम वाया जातात.
तुमच्या विषयासाठी निष्कर्ष:
“न सांगितलेली गोष्ट” करणे म्हणजे त्या नावेला मुद्दाम छिद्र पाडण्यासारखे आहे. जप राहिला तर प्रगती थांबेल, पण चुकीची गोष्ट केली तर अधोगती सुरू होते. म्हणूनच परमार्थात ‘साधनेच्या वेगा’पेक्षा ‘दोषांचा त्याग’ याला संत जास्त महत्त्व देतात.
असा हा अत्यंत महत्त्वाचा विचार करणे त्यावरच चिंतन व कृती करण्याचा निश्चय करणे आपले कर्तव्य आहे जर रामरायाची कृपा हवी असेल तर!