(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत। भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत।
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चुगली पुलिया…“।)
अभी अभी # ९७३ ⇒ आलेख – चुगली पुलिया श्री प्रदीप शर्मा
ताल तो भोपाल का, बाकी सब तलैया है। आजकल बड़े बड़े फ्लाई ओवर बन रहे हैं, जब संसाधनों की कमी थी, नदियों पर पुल बनाए जाते थे और छोटे छोटे नालों पर बरसात के मौसम में आने जाने के लिए छोटा पुल बनाया जाता था।
हमारे शहर में आज भी कृष्णपुरा पुल है जो कभी सबसे बड़ा पुल कहलाता था। रामबाग और कृष्णापुरे के बीच, आज भी एक पुल है, जिसे बीच वाला पुल कहते थे। घर से स्कूल हम इसी पुल से जाते थे। दिन में तो ठीक, रात में इस पुल से गुजरने में डर लगता था। जब यह पुल बना होगा, किसी ने पुल की फर्शी पर ॐ लिख रखा था। चलते वक्त हमें ध्यान रखना पड़ता था, कहीं इस पर पांव न पड़ जाए। पुल के खत्म होने के पहले, एक पिलर से सटा हुआ, कुछ कटा हुआ, एक शब्द लिखा था कग्। रोज पुल पार करते वक्त ध्यान इसी पर रहता था, ॐ आ गया, अब कग् आएगा।।
पुल को अंग्रेजी में ब्रिज कहते है। मेरे शहर में मेरे देखते देखते, कितने ब्रिज बन गए। मुझे अच्छी तरह याद है, आज तिलक पथ पर कहां लोखंडे ब्रिज है, वहां कभी एक छोटी सी पुलिया थी। इस पार से उस पार जाने के लिए खतरों के खिलाड़ी की तरह, संभल संभल उतरे पारा वाला मामला था। हम बच्चे लोगों का तो कई बार पांव भी फिसल जाता था। पानी ज़्यादा नहीं होता था। एक तो mud स्नान और बाद में घर पर पहले तबीयत से पूजा, तत्पश्चात ठंडे पानी से स्नान।।
सारे पुल ब्रिज हुए अब ! ब्रिज तो हावड़ा का, बाकी सब culvert यानी पुलिया है। आज हमारे शहर में नदी तो एक ही है, जिसका सौंदर्यीकरण चल रहा है, लेकिन पुलियाओं की कोई कमी नहीं। बरसाती पानी के निकास के लिए नालों पर पुलिया बनाई जाती थी। नाले तो बंद हो जाते थी, पुलिया मशहूर हो जाती थी।
आज शहर में जगह जगह कई पुलियाएं हैं। किसी को तीन पुलिया कहते हैं, तो किसी को गमला पुलिया। सुबह की सैर पर जाने वाले स्वास्थ्य के प्रति जागरूक नागरिकों के लिए, ये पुलियाएं सुस्ताने के काम आती हैं। सुबह की सैर अकेले नहीं की जाती। चार पांच लोगों का ग्रुप हो, तो समय भी कट जाता है, और थकान भी महसूस नहीं होती। राजनीति, शेयर मार्केट, फिल्म और अफवाहों के अलावा और भी कई मसले होते हैं, जिन पर इन पुलियाओं पर विस्तृत चर्चा होती है।
कुछ पुलियाएं जो मंदिर के करीब स्थित हैं, शाम की आरती के बाद मोहल्ले की महिलाओं के लिए सुरक्षित होती हैं। वहां सड़क के दोनों ओर, आमने सामने एक एक पुलिया है जिसका नाम किसी ने निंदा पुलिया और चुगली पुलिया रख दिया है। निंदा और चुगली में भी अंतर होता है। निंदा तो किसी की भी की जा सकती है, लेकिन चुगली तो अपनों की ही हो सकती है।।
ऐसा माना जाता है कि निंदा खुले आम की जाती है लेकिन चुगली किसी से छुपाकर की जाती है। मैया मोहे दाऊ बहुत खिजायो, यह चुगली नहीं तो और क्या है।।
सास को बहू की निन्दा करने का जन्मसिद्ध अधिकार है, इसलिए वह खुले आम निंदा पुलिया पर किसी भी बहू की निन्दा कर सकती है। बचपन में हम निंदा नहीं समझते थे, केवल चुगली से ही काम चला लिया करते थे। किसी के कान भरना क्या चुगली करना नहीं।
अगर पुलिया न होती, तो हम अपने दिल की बात कहां करते। दीवारों के भी कान होते हैं, पुलिया के कान, मुंह, आंख कुछ नहीं होते। आज तक किसी पुलिया ने इधर की बात इधर नहीं की। न कुछ लिया, न कुछ दिया। बस जो उस पर बैठा, उसको थोड़ा आराम दिया। उसे अपने मन की बात कहने का मौका दिया। कितनों ने पुलिया पर बैठकर अपनी फिक्र धुएं में उड़ाई है, कितने थके हुए राहगीरों ने यहां बैठकर राहत की सांस पाई है। क्या आपको कभी किसी पुलिया की याद आई है।।
– स्मृतिशेष वरिष्ठ पत्रकार मोहन शशि नहीं रहे – भावपूर्ण श्रद्धांजलि – ☆ साभार – श्री मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’ –
हमारे आदरणीय श्री मोहन शशि जी
हमारे मोहल्ले के श्याम कक्का, लीला कक्का, एवं मोहन कक्का यह ऐसे नाम थे, जो सभी के जुबान में रटे थे। हम सभी मित्रों की नगर के समाचार पत्रों की पाठशाला उनके घर पर हुआ करती थी। संपादक होने के कारण उनके घर जबलपुर के सभी अखबार आया करते थे और लेखन अभिरुचि बचपन से होने की वजह से मुझे पढ़ने का बड़ा शौक रहता था। श्री मोहन शशि अपने भाइयों में सबसे छोटे थे।
समाचार पत्र नवभारत में पत्रकार होने के नाते पूरे शहर में उनकी धाक थी। मिलन संस्था का एक बड़ा नाम था। मोहन शशि जी ने जबलपुर में नौटंकी, कव्वाली, बेलबाग की मुजरा पार्टी जैसे कार्यक्रमों की जगह शहर में सांस्कृतिक एवं साहित्य कार्यक्रमों से हवा का रुख बदला और बड़े-बड़े स्टेज बनाकर या गीत संगीत का वातावरण बनाया।
उन्हीं कार्यक्रमों से नगर में के के नायकर, यंग आर्केस्ट्रा के रजनीकांत, दत्तात्रेय-हेमंत कुलकर्णी बंधु, निरंजन शर्मा जैसे अनेक कलाकार उभर कर आए और पूरे देश में छा गए।
उनके बड़े भाई श्री श्यामलाल यादव बाद में पार्षद भी बने। मोहल्ले के लड़के बिगड़े न इसलिए आदर्श छात्र मंडल संस्था को बनाया। लालचबूतरा एक मंच बना। जिसमें वर्ष भर ढेर सारे कार्यक्रम होते रहते थे। जिसमें श्री लीलाधर यादव संयोजक बने। उस समय मिलन मित्रसंघ संस्था की धूम थी। सन् 1974-75 में श्री नाथ की तलैया में मिलन का एक भव्य कार्यक्रम होने वाला था। और उसी समय इलाहाबाद नाट्य संघ का कार्यक्रम भी तीन दिवसीय शहीद स्मारक में होने वाला था।
शशि जी इस कार्यक्रम में असुविधा महसूस कर रहे थे। तब उन्होंने हमारी संस्था को यह कार्यक्रम को करने का आफर दिया। हम लोगों ने कमर कसी मधुकर सरोज कोष्टा, शैलेश साहू, सुंदर लाल कोष्टा, महेश सिंह ठाकुर, मगन ठेकेदार सहित अनेक मित्र थे, मै (मनोज कुमार शुक्ल) सचिव था।
शहीद स्मारक में गेट के अगल-बगल दो खिड़कियां हुआ करतींः उसमें टिकट काउंटर के द्वारा अंदर प्रवेश मिलता था। अर्थात लोग टिकट खरीद कर ही कार्यक्रम को देखने जाते थे। इस तरह कार्यक्रम तीन दिनों तक चला जिसमें कई नाटक दिन में तीन नाटक संपन्न हुए। शशि जी समय निकालकर एक दो बार राउंड लगाते और खुश होते की आदर्श छात्र मंडल ने बखूबी अपने कर्तव्य का निर्वहन किया। शहर में जगह-जगह पोस्टर लगाए गए थे। पोस्टर बनाने में मधुकर सरोज कोष्टा सिद्ध हस्त थे। जिनकी आज देश में कई जगह चित्र प्रदर्शनी लग चुकीं हैं।
1978- 79 के दौरान हमारे एक कहानी संग्रह क्रांति समर्पण में श्री मोहन शशि ने भूमिका लिखी थी। इस कहानी संग्रह में पिता पुत्र की कहानियां थीं। श्री रामनाथ शुक्ल श्रीनाथ मेरे पिताजी थे। मिलन में मैं वर्षों कोषाध्यक्ष रहा। नौकरी की वजह से मैं इस शहर से उस शहर जाता रहा। जब गृह नगर आता तो उनसे अवश्य मिलता। तबसे लेकर आज तक उनका सानिध्य मुझे मिलता ही रहा है।
हमने नगर ही नहीं प्रदेश में सांस्कृतिक एवं साहित्यिक वातावरण की अलख जगाने वाले एक पुरोधा को खोया है। ईश्वर उन्हें अपने चरणों में जगह दे।
साभार – श्री मनोज कुमार शुक्ल ‘मनोज’, जबलपुर
🙏💐ई-अभिव्यक्ति परिवार की ओर से स्मृतिशेष मोहन शशि जी को विनम्र श्रद्धांजलि💐🙏
≈संस्थापक संपादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(ई-अभिव्यक्ति में प्रत्येक सोमवार प्रस्तुत है नया साप्ताहिक स्तम्भ कहाँ गए वे लोग के अंतर्गत इतिहास में गुम हो गई विशिष्ट विभूतियों के बारे में अविस्मरणीय एवं ऐतिहासिक जानकारियाँ । इस कड़ी में आज प्रस्तुत है एक बहुआयामी व्यक्तित्व “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” के संदर्भ में अविस्मरणीय ऐतिहासिक जानकारियाँ।)
स्व. इन्द्र बहादुर खरे
☆ कहाँ गए वे लोग # ५२ ☆
☆ “सुप्रसिद्ध साहित्यकार और शिक्षाविद – स्व. इन्द्र बहादुर खरे और उनका सृजन” ☆ श्री यशोवर्धन पाठक ☆
(73 वी पुण्य तिथि 13 अप्रैल पर शत शत नमन)
बड़ी भली है अम्मा मेरी
ताजा दूध पिलाती है।
मीठे मीठे फल लेकर
मुझको रोज खिलाती है।
अपने समय में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल उपरोक्त मनमोहक काव्य पंक्तियों के रचयिता, सुप्रसिद्ध साहित्यकार एवं शिक्षाविदस्व श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपनी साहित्य साधना से राष्ट्रीय स्तर पर जबलपुर को गौरवान्वित किया था। खरे जीने अपने साहित्यिक जीवन में गद्य और पद्य में जो कुछ भी साहित्य सृजन किया उसने उनके समय में तो अपार लोकप्रियता अर्जित की ही बल्कि वह आज भी चर्चित, पठनीय और प्रभावी है।
हितकारणी कालेज के प्रारंभिक काल के प्रसिद्ध प्राध्यापक, जबलपुर के माडल हाई स्कूल के प्रतिष्ठित शिक्षक एवं विजन के फूल और भोर के गीत जैसी अनेक काव्य कृतियों के रचियता स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे ने अपने समय में अनेक साहित्यिक पुस्तकों के प्रतिष्ठित लेखकों के रुप में चर्चित रहे हैं लेकिन यह भी स्मरणीय है कि उन्होंने शैक्षणिक संस्थानों के लिए अपने समय में ऐसी पाठ्य पुस्तकों की रचना की जो कि उनके समय में पाठ्यक्रम में न केवल शामिल की गई बल्कि उपयोगी और ज्ञानवर्धक भी सिद्ध हुईं। शिक्षा जगत के लिए काफी पहले भारत के गौरवशाली इतिहास से छात्रों को परिचित कराने के लिए भारत वैभव के नाम से 3 भागों में विभक्त पुस्तकें पाठ्यक्रम में शामिल की गई थीं जिसमें भारत वैभव के भाग 3 की रचना स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे नेकी थी।
सुभाष प्रिटिंग प्रेस से मुद्रित इस पुस्तक में 21 अध्याय शामिल किये गए थे जिसमें हमारा देश, भारतीय स्वतंत्रता, 1857 की जनक्रांति, गांधीजी और असहयोग आंदोलन, हमारी राजनीतिक प्रगति, बारडोली सत्याग्रह और सरकारी दमन, 1934 से 1941 और 1942 से 1947 तक का कालखंड, आजादी के बाद का घटना चक्र इत्यादि प्रमुख विषयों से संबंधित अधिकांश महत्वपूर्ण बातें समझाईं गयी थी।
आज अगर हम इस पुस्तक की विभिन्न बातों पर ध्यान दें तो हम आज भी ऐतिहासिक महत्व की दृष्टि से इस पुस्तक को शिक्षा जगत के लिए प्रासंगिक और उपयोगी पाते हैं। इस सबंध में स्व. श्री खरे जी के सुपुत्र आदरणीय श्री अमित रंजन जी ने भी पुस्तक में लिखा है कि आदरणीय पाठक स्वयं तय करें कि 150 में लिखी पुस्तक आज भी कहाँ तक उपयोगी है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि स्व श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की अन्य पठनीय और लोकप्रिय कविताओं को पूर्व में स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था जिनमें बड़ी भली है अम्मा मेरी, ताजा दूध पिलाती है, शिक्षा जगत में काफी लोकप्रिय और प्रभावी मानी जाती थी।
भोपाल के संदर्भ प्रकाशन से प्रकाशित इस पुस्तक का पुनः प्रकाशन खरे परिवार के सहयोग से किया गया है। इस पुस्तक का आवरण पृष्ठ भारत के नक्शे में महात्मा गॉंधी के चित्र के साथ काफी आकर्षक लग रहा है। इस पुस्तक के प्रकाशन से आदरणीय स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी का प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व और भारत के ऐतिहासिक महत्व की बातें दोनों ही दिल और दिमाग में ताजी हो गईं।
साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के ऐसे श्रद्धेय और प्रेरणा स्रोत पितृ पुरुष स्व. श्री इन्द्र बहादुर खरे जी की पुण्यतिथि पर सादर स्मरण के साथ शत शत प्रणाम।
(पूर्वसूत्र- माझ्या नकळत्या वयापासूनच मनात रूजत गेलेला ‘त्या’च्या अस्तित्वाबद्दलचा विश्वास नंतरच्या असंख्य अनुभवांमुळे अधिकाधिक दृढ होत गेलेला आहे आणि माझ्या स्वेच्छानिवृत्तीनंतरच्या काळातही वेळोवेळी मला जाणवत राहिलेला त्याचा अलौकिक स्पर्श माझं जगणं अधिकच अर्थपूर्ण करतो आहे!
त्या सगळ्याच अनुभवांबद्दल सविस्तर न लिहिता त्यातले प्रातिनिधिक ठरतील असे दोन अनुभव मात्र या संदर्भात मला आवर्जून सांगावेसे वाटतायत.)
पुण्याच्या ‘क्वेस्ट टूर्स’ तर्फे २०१६ साली आम्ही नॉर्थ ईस्टच्या ‘सेव्हन सिस्टर्स’ टूरला गेलो होतो तेव्हाची गोष्ट. प्रवास कालावधी २१ दिवसांचा. सहप्रवासीही आमच्यासारखेच प्रवासाची आवड असलेले. पहिल्या दिवशी परस्परांच्या औपचारिक ओळखीचा कार्यक्रम. नंतर अल्पकाळातच त्या ओळखी मनमोकळ्या गप्पांमुळे अधिकच घट्ट झालेल्या. पहिल्या दहा दिवसांचा एक टप्पा पूर्ण होऊन आता नागालँड, मणिपूर, त्रिपुरा आणि मिझोराम ही स्थळे बाकी होती. आमचा पुढचा मुक्काम होता नागालॅंडसाठी. त्याआधीचा ‘काझीरंगा’ अभयारण्याजवळ असलेल्या एका हाॅटेलमधील आमच्या वास्तव्यातला तो अखेरचा दिवस होता.
त्यादिवशी चेक आऊट करून आम्ही नागालॅंडला निघालो आणि अचानक दुधात मिठाचा खडा पडावा तसं झालं. मग तोवरचा आमचा आनंद, उत्साह सगळा नासूनच गेला. कारण ध्यानीमनी नसताना नागालॅंड बाॅर्डरच्या अलिकडे असलेल्या चेकपोस्ट जवळ आमची टुरीस्ट बस अडवली गेली. नागालॅंडमधे दोन दिवसांपासून कांही मागण्यांसाठी आंदोलन सुरू होतं ज्याला नेमकं आजच अचानक हिंसक वळण लागलं होतं म्हणे. पाठोपाठ नुकतेच दोन बाॅंबस्फोटही झाल्याने १४४ कलम जाहीर होऊन संचारबंदीची घोषणा झाली होती. त्यामुळे पुढे अर्थातच ‘नो एंट्री’! नाईलाजाने बस परत फिरली. आम्हाला पुन्हा आधी चेक आऊट केलेल्याच हाॅटेलवर घेऊन आली आणि अखेर उर्वरीत दहा दिवसांची टूर रद्द होऊन सर्वांची परतीच्या प्रवासाची तयारी सुरू झाली.
अचानक असं विघ्न येऊन टूर अर्धवट सोडून घरी परत फिरावं लागल्याने आम्हा सर्वांचाच विरस झाला पण त्याला पर्याय नव्हता. कदाचित हेच हिंसक वळण आणि संचारबंदी आम्ही नागालँडमधल्या हॉटेलमधे चेकइन केल्यानंतर उद्भवली असती तर? त्या परिस्थितीत याहीपेक्षा भयंकर असं कांहीही घडू शकलं असतं. परिस्थिती अनिश्चित काळापर्यंत चिघळलीही गेली असती आणि आम्ही बंद दाराआड तिथं अडकून पडलो असतो. त्यापेक्षा हे बरं म्हणत आहे ते स्वीकारण्याशिवाय पर्याय कुठे होता? माझ्यासाठी मात्र ते तेवढंच असणार नव्हतं. मी ट्रीप अर्धवट टाकून असं परत यायची वेळ आलीच नसती तर त्यामुळे पुढच्या आयुष्यभराचं सगळंच स्वास्थ्य मी हरवून बसलो असतो असं वाटायला लावणारं एक आक्रित तिथं घरी माझी वाट पहात होतं! मला घरी जाईपर्यंत त्याची कल्पना नव्हती एवढंच!
आम्ही मधेच कां परत येतोय ते तिथून निघाल्यानंतर घरी मोघम कळवून ठेवलं होतं. त्यामुळे आम्ही रात्री लवकर घरी पोचल्यावर सलिल/अनघाशी आधी जुजबी चर्चा झाली ती त्यासंबंधीच. पण कां कुणास ठाऊक ते दोघे नेहमीसारखे मोकळे वाटत नव्हते. जेवणं आवरून आम्ही दोघे बॅगा आवरायला आमच्या रूममधे आलो तसे पाठोपाठ सलिल/अनघाही आले.
” बाबा, तुम्ही टेन्शन घेणार नसाल तर एक सांगायचंय. ” सलिल म्हणाला.
” असं कां विचारतोयस? काय झालंय? “
“कोल्हापूरहून उदयदादाचा परवा फोन आला होता. पुष्पाआत्याबद्दल. “
“कां रे? पुष्पाताई बरी आहे ना…? ” हे विचारतानाही माझा आवाज थरथरतोय हे लक्षात येताच मनात येऊ पहाणाऱ्या कुशंका मी झटकून टाकल्या…
उदय माझ्या पुष्पाताईचा मुलगा. काळजी करण्यासारखं कांही असल्याशिवाय तो असा फोन करणं शक्यच नव्हतं.
“सांग ना,.. काय झालंय? ”
सलिलनं सांगितलं ते ऐकून माझ्या काळजाचा ठोकाच चुकला. पुष्पाताईचं डाव्या हाताच्या अंगठ्याजवळचं बोट खूप दिवसांपासून दुखत होतं. अलिकडे त्या बोटाला सूजही येऊ लागली म्हणून लगेच ऑर्थोपेडिकला दाखवलं. ट्रीटमेंट सुरू झाली. ट्रीटमेंटनंतरही बोटाचं इन्फेक्शन वाढतच गेलं. त्या बोटाच्या हाडाचा भुगा होऊ लागलाय हे लक्षात आलं आणि मग नाईलाजाने ते बोट कापायचा निर्णय झालाय. परवा सोमवारी कोल्हापूरला आॅपरेशन करायचं ठरलंय. सलिलने सांगितलं त्याचा हा सारांश.
ऐकता ऐकता मी गंभीर झाल्याचं लक्षात येताच सलिल म्हणाला,
“बाबा, जवळच्या बोटांपर्यंत इन्फेक्शन पोचू नये म्हणून हे आॅपरेशन आवश्यक आहे म्हणालेत डाॅक्टर. आत्ता नऊच तर वाजतायत. आत्या अजून झोपली नसेल. तुम्ही आत्याशी फोनवर बोला हवंतर. तुम्हा दोघांनाही बरं वाटेल. “
” नको. मी उद्या सकाळी लवकरच कोल्हापूरला जाऊन समक्षच भेटतो तिला. तरच माझं समाधान होईल… “
मी वरवर शांतपणे म्हणालो खरं पण रात्रभर माझ्या डोळ्याला डोळ्या नव्हता. आम्हा सर्व लहान भावंडांसाठी तिच्या कोवळ्या वयापासून परोपरीने झटणाऱ्या आमच्या या बहिणीचं माझ्या आयुष्यातलं स्थान ती अशी संकटात असताना मला नव्याने जाणवलं! हे दुखणं आणि ऑपरेशनचा निर्णय सगळं हू़ की चू न करता नेहमीच्याच अतिशय शांत आणि धीरोदात्तपणानं तिनं स्वीकारलं असेलही कदाचित पण मलाच ते स्वीकारता येईना. ट्रीप अर्धवट सोडून इथं आलो म्हणून हे आपल्याला आधीच सगळं समजलं तरी. एरवी ट्रीप निर्विघ्नपणे पूर्ण झाली असती, दहा दिवसांनंतर आपण आलो असतो, तर तिचं बोट कापून टाकलेला पंजाच पहावा लागला असता. नुसत्या कल्पनेनेही माझ्या अंगावर सरसरून काटाच आला! पण हे आधी आपल्याला समजून उपयोग काय? आताही वेगळं काय होणाराय? मी तिचं बोट थोडंसं वाचवू शकणाराय? उघड्या डोळ्यांनी पहात रहाण्याशिवाय काय करु शकतो मी?? अशाच सगळ्या नकारात्मक विचारांनी मन अधिकच अंधारून आलं. त्या रात्री अंथरुणाला पाठ टेकली तरी स्वस्थता नव्हतीच. मी कांहीतरी करायला हवं होतं पण कांहीच करू शकत नव्हतो…! मनाच्या त्या असहाय, हतबल अवस्थेत प्रवासाने थकलेलं शरीर शांत झोपेसाठी आसुसलेलं पण मनात मात्र हे सगळे उलटसुलट विचार ठाण मांडून बसलेले. अर्धवट ग्लानी, अर्धवट जागेपण याच अवस्थेत माझी घुसमट वाढत चालली. त्यातच रात्र उलटली तरी मिटल्या नजरेसमोरची असंख्य काटेरी प्रश्नचिन्हं बोचतच राहिलेली! आणि.. आणि.. अचानक त्या प्रश्नांचा गुंता दिसेनासा होत अगदी पुसटसा असा एक चेहरा माझ्या मिटल्या नजरेसमोर क्षणभर तरळून अलगद विरून गेला न् मी शहारलो. दचकून जागा झालो. उठून बसत अलगद डोळे उघडले तेव्हा पहाटेचे ४ वाजून गेले होते. मन मात्र माझ्या मिटल्या नजरेसमोर क्षणभर तरळून गेलेल्या त्या चेहऱ्याभोवतीच घुटमळत राहिलं… आणि… आणि अचानक ओळख पटली! .. ते.. ते.. डाॅ. चंद्रशेखर परांजपेच.. हो… नक्कीच. पण मग माझ्या मनातल्या घुसमटीचा अर्थाअर्थी यांच्याशी काय संबंध? असंही क्षणभर वाटून गेलं आणि दुसऱ्याच क्षणी त्या प्रश्नाचं उत्तर दिल्यासारखा एक आशेचा किरण मला स्वच्छ दिसू लागला..!
यातून कांहीतरी चांगलंच निष्पन्न होणार असेल. नक्कीच. पण कसं? हे सगळे माझ्या मनाचे खेळच तर नसतील? पण परांजपे डाॅक्टरांचा विचार अलिकडे कणभरसुध्दा मनात नव्हता मग भास म्हंटलं तरी तो परांजपे डाॅक्टरांचा चेहराच कां?? …
हा.. हा ईश्वरी संकेत तर नसेल? हा प्रश्न मनात उभारला आणि तोच मला मी याक्षणी काय करायला हवं त्याची नेमकी दिशा दाखवून गेला. आत्ताच्या माझ्या अस्वस्थतेचं कारण ठरलेल्या ताईच्या प्राॅब्लेमबद्दल सगळं मनापासून बोलून मन मोकळं करायला डॉ. परांजपेंखेरीज माझ्यासाठी दुसरं होतंच कोण?
डाॅ. परांजपे आमचे फॅमिली डॉक्टर. शांत. हसतमुख. अभ्यासू. हुशार. आणि विश्वासू! त्यांना पिढीजात चालत आलेला वैद्यकीचा वारसा तर मिळाला होताच शिवाय त्यांचं वेगळेपण म्हणजे त्यांनी आयुर्वेद(एम्. डी.) नंतर एम्. बी. बी. एस्. पदवीही प्राप्त केली होती. त्यामुळे आयुर्वेदीक औषधांचाच नव्हे तर गरजेनुसार अॅलोपथीचा उपयोगसुध्दा करु शकणारे डाॅ. परांजपे हे आमच्या माहितीतलं अपवादात्मक उदाहरण होतं! त्यांच्याशी बोलून निदान मनावरचं ओझं हलकं तरी होईल असं वाटलं आणि मी लगेच डाॅ. परांजपेना फोन करून त्यांच्या भेटीची तासाभरानंतरची वेळ ठरवली.
त्यांच्याकडे जाण्यासाठी बाहेर पडलो तेव्हा मनातला अंधार दूर करणारा त्यांच्या रुपातला तो आशेचा किरण त्या प्रकाशवाटेवर माझी सोबत करीत होता..! !
☆ शॉर्टकट… – भाग – २ – ☆ सौ. पुष्पा चिंतामण जोशी ☆
(स्वतःच्या आणि कुटुंबाच्या उज्वल भविष्याची स्वप्न पाहत चित्रानं आईचा, दीदी आणि भाईसाहेबांचा आशीर्वाद घेतला. भावांना जवळ घेऊन निरोप घेतला आणि मोठ्या हिमतीनं विमानात पाय ठेवला. दुबई एअरपोर्टवर सुरेंद्र सुलेखा तिला न्यायला आले होते. चित्रा सुखरूप दुबईला पोचल्याचा फोन आला तेव्हा सर्वांचा जीव भांड्यात पडला होता.) – इथून पुढे – –
साऱ्या विचारांनी, आठवणींनी शिणून राजश्रीला झोपाळ्यावरच डुलकी लागली. जाग आली तेव्हा सुनंदाबाई स्वयंपाक करून निघून गेल्या होत्या. रमेश येऊन त्याचं आवरून पेपर वाचत होता. राजश्री जागी झालेली पाहून त्यानं काळजीन विचारलं, ॓बरं वाटत नाहीये का? किती थकलेला दिसतोय तुझा चेहरा!॔
“ काही नाही. थोडी डुलकी लागली होती. देवाजवळ देवा लावते आणि जेवून घेऊया “ राजश्री उठत म्हणाली.
जेवण झाल्यावर राजश्रीने संध्याकाळी बँकेत कळलेली चित्राच्या अकाउंटची हकीगत रमेशला सांगितली. चित्रा चोरी करणार नाही याबद्दल दोघांचीही खात्री होती.
मग नेमकं काय झालं असेल? चार-पाच महिन्यात एवढे कसले पैसे जमा झाले असतील? अशा विचारांच्या आवर्तात केव्हातरी राजश्रीला झोप लागली. दुसऱ्या दिवशी लवकर उठून आवरून रमेश दौऱ्यावर चालला होता तेव्हाच राजश्रीलाही जाग आली होती पण तिला उठावसंच वाटेना. पुन्हा चित्राच्या विचारात ती बुडून गेली..
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सुरुवातीला आठवड्यातून एकदा चित्राचा ठराविक वेळी फोन येई तेव्हा तिची आई, भाऊ येऊन बसत. स्पीकरवर फोन ठेवला की साऱ्यांना तिचं बोलणं ऐकता येई. आणि तिच्याशी बोलताही येई. दुबईच्या कितीतरी गोष्टी ती उत्साहाने सांगत असे.
॓दीदी इथला एअरपोर्ट, रस्ते अगदी स्वच्छ आणि सुंदर आहेत. रस्त्यावर छान झाडं, फुलं आहेत आणि दिनेश रस्त्यावर इतक्या प्रकारच्या सुंदर मोटारी बघितल्या ना की मला तुझी खुप आठवण येते. किती प्रकारची गाड्यांची चित्रं तू जमविली आहेस. मी येताना आणीन आणखी चित्रं तुझ्यासाठी.
दीदी, सुलेखाताईची जागा पण आपल्यासारखी छान आहे. इथे मॉल्सपण खूप मोठे आहेत. ही दोघही मला बरोबर घेऊन जातात. आम्ही खरेदी करतो, खातो पितो. काळजी करू नका मी मजेत आहे.॔ असं उत्साहाने सांगायची तर कधी आपुलकीने दीदीची, भाईसाहेबांची चौकशी करायची. दहावीत गेलेल्या दिनेशला नीट अभ्यास करायलाही सांगायची.
घरकाम आणि स्वयंपाक या दोन्ही जबाबदाऱ्या चित्रानं घेतल्याने, सुलेखाला अगदी मोकळं छान वाटत होतं. गेली चार वर्ष स्वतः सगळं काम आणि नोकरी करण्यात तिची फार धावपळ झाली होती.
असाच एकदा चित्राचा ठरल्यापेक्षा वेगळ्या वेळी फोन आला होता. ॓दीदी इथे येऊन आता दोन महिने होऊन गेले. मी सुलेखा ताईला माझ्या होम सायन्सच्या कोर्सबद्दल विचारलं. माझी सर्टिफिकेट तिच्याजवळ दिली. पण सुलेखा ताई म्हणाली की तू येईपर्यंत इथलं शैक्षणिक वर्ष अर्धं संपून गेलं आहे. आता तू घरच्या कॉम्प्युटरवर दुपारी प्रॅक्टिस कर. काही नवीन माहिती मिळव.॔ हे सारं ऐकताना चित्राच्या आवाजातली निराशा झाली जाणवत होती.
त्या रात्री मुद्दाम फोन करून राजश्री सुलेखाशी बोलली. पण ॲडमिशनचे काही अवघड नियम गोड भाषेत सांगून सुलेखानं वेळ साजरी केली. पुढच्या वर्षीच्या ॲडमिशनची आत्ताच चौकशी करते असेही ती म्हणाली. पण राजश्रीच्या मनातही शंकेची पाल चुकचुकली. पूर्ण शैक्षणिक वर्ष फुकट गेल्याने चित्राचाही जीव हळहळत होता. तिला मुकाट्याने घर काम आणि बाजारहाट करण्यावाचून गत्यंतर नव्हतं. तिच्या पगाराचे पैसे मात्र सुलेखा नियमित पाठवत होती. तरी हळूहळू चित्राच्या फोनमधला उत्साह कमी होत असल्याचं राजश्रीला जाणवलं.
काल बँकेत कळालेल्या माहितीने तर राजश्रीला आणखीनच कोड्यात टाकलं होतं. सुलेखाला सकाळीच फोन करावा असं ठरवून राजश्री स्वतःचं आवरत होती. तेवढ्यात सुनंदाबाई आल्या त्या सांगतंच की, ॓अहो दीदी, चित्रा आज पहाटे अचानक घरी आलीय. तुम्हाला सर्वांना भेटावसं वाटलं म्हणून आले. इतकंच बोलली आणि डोक्यावर पांघरून घेऊन आडवी झाली. आज रात्री ती तुम्हाला भेटायला येणार आहे. माझ्याशी धड काही बोललीच नाही. तुमच्याजवळ बोलेल काहीतरी कदाचित !॔हे ऐकून राजश्रीला चांगलाच धक्का बसला. सुलेखानं साधं फोन करून चित्राच्या येण्याबद्दल कळवलंही नव्हतं. काय झालं असेल नेमकं? राजश्री विचारात पडली. आता रात्रीची आणि चित्राची वाट बघण्याखेरीज उपाय नव्हता.
चित्रा आल्यावर राजश्रीनं तिला स्वतःजवळ सोफ्यावर बसवून घेतलं. पाठीवरून हात फिरवला आणि प्रेमानं विचारलं,॓ बरी आहेस ना बेटा?॔ पण राजश्रीच्या या प्रश्नावर चित्रा बांध फुटल्यासारखी गदगदून रडू लागली. राजश्रीने तिला थोडं रडू दिलं. शांत झाल्यावर चित्रा म्हणाली, ॓दीदी, माझ्या हातून मोठी चूक झालीय. मला क्षमा करा. मी तुमचा माझ्यावरचा विश्वास मोडलाय. काय आणि कसं सांगावं तेच कळत नाहीये….. पण आता मला सगळं सांगायलाच हवं.
तिथे माझा सगळा दिवस कामात जात होता पण रात्री मात्र माझ्या खोलीमध्ये झोपायला गेल्यावर तुमच्या सर्वांच्या आठवणीनं मला फार रडू यायचं. एकटं.. एकटं वाटायचं. तिथे खायला प्यायला कमी नव्हतं पण ज्या उद्देशाने मी इथे आले होते त्या माझ्या शिक्षणाचं काहीच पुढे होत नव्हतं.
सुट्टीच्या दिवशी त्या दोघांबरोबर मला फिरायला मिळायचं. चकचकीत, डोळे दिपवणाऱ्या त्या श्रीमंत जगाचं दर्शनही मोहात पाडणारं होतं. त्या दोघांबरोबर मी पहिल्यांदा मॉलमध्ये गेले तेव्हा त्या उंच सरकत्या जिन्यांवरून मला सावरण्याच्या निमित्तानं सुरेंद्रने माझा हात दाबून धरला, तेव्हाच त्याचा स्पर्श मला वेगळा वाटला. मग लक्षात यायला लागलं की, सुलेखाताई अंघोळीला गेली असेल तेव्हा स्वयंपाकघरात काहीतरी मागायच्या निमित्ताने येऊन तो मला जाणूनबुजून स्पर्श करायचा. दीदी, खरं सांगते इथे तुमच्याकडे मला कसलीच भीती वाटली नाही. भाईसाहेबांबद्दल तर नेहमी आदरच वाटला. पण तिथे सुरेंद्रचं लागट वागणं जाणवायला लागलं होतं.॔
चित्रा पुन्हा हुंदके देऊन रडू लागली. चित्राच्या डोळ्यांपुढे तो पहिलाच प्रसंग उभा राहिला…
एकदा सुरेंद्र अचानक ऑफिसमधून लवकर घरी आला. सुलेखाताईला घरी यायला अजून वेळ होता. आपण सोफ्यावर बसून कादंबरी वाचण्यात गढलो होतो. वॉश घेऊन आल्यावर सुरेंद्रनं बॅगेतून एक छान मोठं चॉकलेट काढून आपल्या पुढे धरलं. चॉकलेट घ्यायला हात पुढे केल्यावर तो म्हणाला, ॓अगं, नको. पुस्तक वाचतेयस ना? ते खराब होईल. मीच देतो तुला… असं म्हणत त्यानं अगदी जवळ बसून आपल्या तोंडात चॉकलेट भरवलं. आपण वाचत असलेल्या कादंबरीत नुकताच अशा प्रकारचा प्रसंग रंगवला होता. त्यानं लावलेल्या भारी सेंटचा मंद सुवास, तोंडात विरघळणाऱं चॉकलेट, त्याची भुरळ घालणारी नजर सारं मोहात पाडणारं होतं. त्याच्या मिठीला आपण केलेला प्रतिकार लटका आहे हेही त्याच्या केव्हाच लक्षात आलं होतं…
पण हे सगळं दीदीला कोणत्या तोंडानं सांगणार?
हुंदके थांबल्यावर चित्रा दीदीला एवढंच म्हणाली, दिवसेंदिवस दिवस त्याची लगट वाढत चालली होती. आणि मी कबूल करते की माझाही पाय मोहाच्या घसरगुंडीवर पडला होता. मला सावरायला कुणी नव्हतं.
सुरेंद्र– सुलेखा ताईच्या लग्नाचा वाढदिवस जवळ आला होता. खरेदी करायला आम्ही तिघं एकत्रच गोल्डसुक मार्केटला गेलो होतो. सोन्याचा तो चमचमणारा बाजार पाहून डोळे दिपून जात होते. ताईंची पसंती चालली होती. मीसुद्धा मला आवडलेला एक सोन्याचा नेकलेस पुन्हा पुन्हा गळ्याला लावून बघत होते. मागच्या आरशात पाहिलं तर सुरेंद्र ॓छान दिसतोय ॔ अशी पसंतीची मान डोलावत, मोठ्या डोळ्यांनी माझ्याकडेच पाहत होता. दोन-चार पगार आपल्याला इथेच द्यायला सांगून तो सेट खरेदी करता आला तर किती छान होईल, या विचाराने झोपेतसुद्धा मला तो हार दिसत होता.॔
थोडं थांबून, पाणी पिऊन चित्रा पुढे सांगू लागली, ॓एखादं सामान आणायचं राहिलं असलं तर मी आमच्या घराजवळ असलेल्या स्टोअरमध्ये जात असे. तिथेच माझी आणि हमीदाची चार-पाच वेळा गाठ पडली होती. ती सुद्धा काही सामान घ्यायला स्टोअर मध्ये यायची. तिच्याशी बोलताना कळलं की तीही हैदराबादहून इथे एका कुटुंबात काम करण्यासाठी आली होती. तिला आठ नऊ भावंडे होती. वडिलांच्या बांगड्या विकण्याच्या व्यवसायात त्यांचं भागत नव्हतं. कुणाच्या तरी ओळखीनं ती दुबईला आली होती. साधारण माझ्याच वयाची होती. इथे तिला घरकाम पुष्कळ होतं. फक्त नियमितपणे तिच्या घरच्यांना तिचा पगार मिळत होता आणि हमीदाला पंधरा-वीस दिवसांनी अम्मीशी फोनवर बोलता येत होतं.
त्या दिवशी सामान घ्यायला मी स्टोअरमध्ये गेले तर हमीदा भेटली. कोणीतरी बोलायला भेटलं म्हणून बरं वाटलं. ॓ठहरोना हमिदा. साथ जायेंगे.॔ असं म्हणत तिला थांबवून माझं सामान घेऊन झाल्यावर आम्ही बरोबर निघाले. थकल्यासारखी दिसणारी हमीदा पावले ओढीत सावकाश चालत होती.
माझं बालपण एका सुसंस्कृत लोअर मिडल क्लास परिवारात गेलं.
छान होते ते दिवस. आम्ही चार बहिण भाऊ. अगदी सामान्य परिस्थिती, सामान्य घर, सामान्य राहणीमान. पण घरातील नियम मात्र त्या मानानं बरेच होते. घराच्या आतले आणि घराच्या बाहेरचेही
*उंबरठा* के इस पार और उस पार के भी. ***
कसं वागायचं? कसं रहायचं? स्वतः ला कसं सांभाळायचं? काय बोलायचं? सांगायचं? कोणाशी बोलायच? कोणाशी नाही? कपडे कसे घालायचे? अंधार व्हायच्या आधी घरी यायचं. हे बाळकडू (नियम) आम्हाला मिळालेले. त्यात मी मुलगी म्हणून चार जास्तीचे नियम होतेच.
अभ्यासाकडे विशेष लक्ष असायचं, कारण या परिस्थितीतून बाहेर पडण्यासाठी एकच निश्चित मार्ग म्हणजे चांगले शिक्षण. त्यामुळे नियमित अभ्यास हा एक प्रमुख नियम होता.
आमच्यावर घरच्यांचीच काय? शेजारी पाजाऱ्यांची पण नजर असायची. त्यांना पण आम्हाला रागवायचा हक्क होता. शाळेतील प्रत्येक गोष्ट घरापर्यंत सहजच पोहचत असे…
उंबरठा म्हणजे लक्ष्मण रेषा होती.
त्यावेळेस या सर्व गोष्टींबद्दल काही वाटलं नाही. आजूबाजूला सर्व माहोल तसाच होता. आमच्या सारखेच सर्व. Lower middle class चे आमचे शेजारी.
अगदी चाळ वातावरण नसलं म्हणजे एकदम एकदुसऱ्याच्या घरात डोकावत नसलो तरी, सर्वांना आजूबाजूच्या बऱ्याच बातम्या माहीत असतं.
आजच्या पन्नास पंचावन्न वर्षांपूर्वीची सामाजिक व्यवस्था, त्यात मराठी, अजून भर म्हणजे लोअर मिडिल क्लास स्टेटस म्हणजे काहीही करायच्या आधी *लोक काय म्हणतील? * हा million dollars प्रश्न उभा राहात असे. आपल्यापेक्षा लोकांचा विचार जास्त होत असे. समाजाच्या नियमांविरूद्ध जायची हिम्मत नव्हती. त्यावेळेस ही स्मार्ट श्रीमंत लोक होतेच त्यांना प्रथम भेटण्याचा अनुभव आम्हाला कोॅलेजमध्ये आला. त्यांच्या मते आम्ही *बेहेनजी* कैटिगरी चे होतो.
… बरे असो.
तसंही घरची सामान्य परिस्थिती बघता विशेष काही करायचा स्कोप नव्हताच. जेमतेम पैसा त्यामुळे जेमतेम राहणीमान. आजूबाजूला तसेच सर्व होते, म्हणून वाईटही वाटत नसे. घरी आम्ही मजेत रहायचो, प्रश्न वगैरे विचारायची पद्धत नव्हती.
My word is final. मैने जो कह दिया सो कह दिया।असा अलिखित नियमच होता. ं
फॅशनच्या नावाखाली असं काही खूप सांगण्यासारख काही विशेष नाही. वर्षातून एखादा सिनेमा, एखाद वेळेस हॉटेलिंग एवढीच काय ती चंगळमंगळ. वर्षातून दिवाळीचा एखादा ड्रेस वगैरे. कपडे च जास्त नसायचे, म्हणून आता सारखं कपडे ओसंडून आलमरीतून खाली पडतायेत असं वगैरे कधीच झालं नाही.
आजची मुलं हे ऐकून चकितच होतील नाही का? – –
– – सकाळी लवकर उठायचं? संध्याकाळी सातच्याआधी घरी यायचं? कुठे जातो? आणि केंव्हा घरी येणार हे सांगूनच बाहेर पडायचे. व्यवस्थित कपडे घालायचे, म्हणजे पूर्ण अंग झाकलेले. मुल मुली एकत्र जातायेत ते तर.. बाप रे! ! अशक्यच.
बापरे! म्हणजे किती कंट्रोल हा? म्हणजे हे घर आहे की जेल? काय समजायचं?
आता अशा सूचना आज मुलांना दिल्या तर मुलामुलींचा स्वतः चां आई वडिलांबरोबर डायव्हर्सच होईल बहुतेक.
आजकाल कपड्यांबद्दल काय बोलायचं? (जेवढे फाटके तेवढे छान,), महागडा मोबाईल, रात्री बेरात्री घरी येणे, बॉयफ्रेंड तर मस्टच आहे, त्याशिवाय फ्रेंड सर्कल मध्ये value च नाही. Status च नाही. हे सर्व स्मार्टनेस चे पॅरामीटर्स आहेत.
खरं तर आता आपल्याला पण असं बघायची सवय झाली आहे. बघताना त्रास होतो. स्वतःच्या मुलांबरोबर बोलायची आईवडिलांची किती हिम्मत आहे? आणि किती मुले सहज ऐकतात? माहित नाही… मुलामुलींचा एकत्र गृप, एकमेकांच्या खांद्यावर हात ठेवून सहज गप्पा मारणं, एकत्र पिकनिक, हॉटेलिंग या सहज घडणाऱ्या गोष्टी झाल्या आहेत. खूपदा बघायला, पचायला जड जात पण मुलांना कसं सांगायचं? हा एक मोठा प्रश्न बहुतेक प्रत्येक घरी असावा असं वाटतं.
आजकाल मुलांना रागावणे मारणे बंदच आहे. म्हणजे अगदी अमेरिकेसारखी परिस्थिती अजून आलेली नाही की मुलं लगेच 911 वर फोन करतील. पण एकुलत्या एक मुलाला मारणं बरोबर नाही. नाही का? कुठे बिथरला तर? मुलं आईवडीलांना घाबरतात, असं वाटतं नाही. याउलट आई वडिलच मुलांना घाबरतात की काय अस वाटत? आता सायकॉलॉजी बदलली आहे. *Friendly relations* या थीमवर सर्वच नाती आहेत.
– म्हणजे एखाद्या मुलीला *ए राजू लवकर ये* असा आवाज देताना ऐकलं की ती मुलाला बोलवतेय? की नवऱ्याला? हे पटकन कळत नाही.
आता सर्वच समीकरणे बदलली आहेत.
Middle class ही बराच स्मार्ट झाला आहे. थोडा जास्तच. म्हणजे जे, जेवढ आहे/नाही, त्यापेक्षा जास्त दाखवायचा प्रयत्न फक्त मुलच नाही, तर सर्वच करतायेत.
– – जग बदलत आहे. आपल्याला ही बदलावच लागेल. पण दिशा चुकतेय, अस वाटतय. नवीन जगातील काय घ्याव आणि काय नाही? हे समजत नाहीये.
फक्त काय आणि किती? मनाचा आणि घराचा उंबरठा लक्षात ठेवल्यास बरं होईल. शिस्त मग ती वागण्यात, बोलण्यात, पैसे खर्च करण्यात किंवा फॅशन च्या नावाखाली, स्मार्ट नेस, modernization च्या नावाखाली किती आणि कुठे थांबायचे, हे वेळेवर कळलं तर बरं होईल. सध्याची विस्कळीत झालेली सामाजिक स्थिती कदाचित सुधारेल… म्हणजे young generation सुसाट सुटली आहे. आणि Seniors confused आहेत.
प्रत्येक 5 वर्षांत समाजात बदल होतातच. पण इतक्यात हा बदल खूप जाणवतोय. *मानसिक तब्येत* बघून तर भीती वाटतेय. * स्वातंत्र्य * च्या नावाखाली वागण्या बोलण्याची पातळी अजून किती खाली जाईल? माहित नाही.
भारतात राहून अमेरिकन्स सारख वागताहेत. आणि जग म्हणे भारताकडे बघतय. खरय का?
आम्हा जेष्ठांना आता खूप कठीण झालय. आम्ही आयुष्यात खूप पेपर सोडवले. खूप परीक्षा दिल्या. आतापर्यंत छान पास होत होतो आम्ही. आम्ही भावनांचा अभ्यास केलाय, पण इतक्यात सर्व प्रश्न पत्र व्यवहारांचे येत आहेत. तेथे आमची गडबड होतेय.
हे चतुर युग आहे. जोपर्यत आपली यात्रा पूर्ण होत नाही, तोपर्यंत उतार चढाव बघण आलच.
तेंव्हा कमी आणि मोजक बोलायच. आणि आपला मान जपायचा. कुठं मुकं, कुठं बहिर, कुठं आंधळ व्हायच हे आता लक्षात आल. मी स्वतःच माझ्या प्रश्नाचे उत्तर शोधलय.
मला कुठेतरी वाचलेल एक छान वाक्य आठवल, •••
जिंदगी परिवर्तनो से ही बनी है।। किसी भी परिवर्तन से घबराए नही ।उसे स्वीकार कीजिए। । कुछ परिवर्तन आपको भी उन्नति का नया मार्ग दिखायेंगे, आपकी सुप्त इच्छांए पूर्ण करने का अवसर देंगे.
आयुष्याचा प्रवास कधीच ठरवून होत नसतो. जशी वळण येतील, तस वळावच लागेल.
फक्त प्रत्येक odd situation मध्ये मनाच्या उंबरठ्यावर उभं राहून शांतपणे विचार करायचा.
ठरलं तर मग…..
… नवीन जगात यात्रा करायला मी आता पूर्णपणे तयार आहे.
☆ काय एक एक माणसे असतात! – लेखक : नितीन मांडे ☆ प्रस्तुती : गौरी गाडेकर ☆
काय एक एक माणसे असतात!
– – वाचाच!
मागे असेच एकदा सज्जनगडावरील ग्रंथ चाळत होतो!
अचानक एका पुस्तकाने लक्ष वेधून घेतले! संस्कृत दासबोध! अरे बापरे!
प्राकृत दासबोधाचा संस्कृत अनुवाद! कसं शक्य आहे?
हातात घेऊन पुस्तक चाळलं तर खरेच तो एक अति उत्कृष्ट संस्कृत अनुवाद होता ग्रंथराजाचा! त्वरीत गडावरून आज्ञा मिळवून घेऊन ग्रंथ खाली आणला व स्कॅन करविला! लेखकांचा क्रमांक दिलेला होता पण संपर्क नाही होऊ शकला!
आता आली का पंचाईत! त्यांच्या अनुज्ञेशिवाय ग्रंथ साईटवर टाकावा तरी कसा?
समर्थांची प्रार्थना केली मनोमन… अणि दिवस पुढे सरले.
नाव पक्के लक्षात होते लेखकांचे, “राम वेळापुरे”… रामशास्त्री… असो. समर्थेच्छा!
वर्षभराने असाच एक दिवस शिवथर घळीत गेलो असताना एक विक्षिप्त वाटावा असा म्हातारा मनुष्य भेटला. विस्कटलेले मळकट पांढरे केस, अस्ताव्यस्त वाढलेली दाढी,
बेरकी डोळे, पाय गोल झालेले त्यामुळॆ वजनकाट्यासारखी डौलदार चाल!
त्यात संघाची चड्डी घातलेली त्यामुळॆ काड्यामोड्या झालेले पाय अधिकच नजरेत भरणारे…
म्हातारा घळ झाडीत होता. उत्कंठेने त्यांचेकडॆ पाहात पहात जवळ जाताच डोके खाजवीत उभा राहिला!
एक डोळा जवळपास मिटलेला व एक डोळा भिवई वर ताणून उघडा धरलेला अशा अवस्थेत खेकसला! “कोण रे तु? इथं कुठं वाट चुकलास? “
मी माझा लौकिक परिचय दिला. चांगलंय म्हणाला… जा पळ घरी… इथं काय मिळणार तुला?
जा लग्न कर, संसार कर, पोरंबाळं होऊदेत, गाडी बंगला घे, आईबापाला सुख दे, इथं काय ठेवलय दगडं आणि माती!
मी म्हणालो, इथंच तर खर सुख आहे बाबा! हे सर्व असूनही इथं का यावसं वाटतं मग?
बेरकी नजर टाकीत म्हातारा उभा राहिला! आता मात्र हातातला झाडू टाकून देत माझ्याकडे वरपासून खालपर्यंत पाहिलं आणि म्हणाला, अस्सं! ! ! बर मग जा आत!
मी दर्शन घेऊन परत आलो! म्हाता-याबद्दल माझी उत्कंठा शिगेला पोहोचली होती!
मी परतून विचारलं, “बाबा आपलं नाव काय? “
“या शेणाला राम वेळापुरे म्हणतात! ” “वेळापुरे? श्याम? ” “अरे श्याम नाही राम! “
आणि अचानक माझ्या डोक्यात ट्युब पेटली! अरे बापरे! रामशास्त्री वेळापुरे? संस्कृत दासबोधाचे कर्ते? मी चटकन विचारले, ते संस्कृत दासबोध कर्ते?
“तिथं तिथं… ” समर्थांकडे हात करीत ते म्हणाले, “तिथंच बसलेत त्या दासबोधाचे कर्ते! मी साधा मास्तरडा रे! मला काय दगड कळतय संस्कृतातलं? यांची प्रेरणा होती, होऊन गेलं ते पुस्तक… त्यात या शेणाचं काहीही कर्तृत्व नाही! “
मती सुन्न झाली! इतकं जबरदस्त पुस्तक लिहून हा मनुष्य इतका अलिप्त? इतका निगर्वी? इतका अनासक्त?
नंतर त्यांनी सांगितले की येणा-या काळात संस्कृत ही जगाची ज्ञानभाषा होणार आहे! तेंव्हा जगभरातील लोकांना दासबोध कळावा म्हणून यांनी आत्ताच तो अनुवादून ठेवलाय! आणि हे खरे आहे बरे! संस्कृतचे खरे जाणकार आज भारताहुन अधिक जर्मनीत आहेत, हे अनुभवणारे मित्र आहेत माझे तिथे!
बाबा बेलसरेंकडे जाऊन ही इच्छा रामशास्त्रींनी बोलून दाखविताच त्यांनी सांगितले घळीत जाऊन समर्थांना आत्मनिवेदन करा! तरच कार्य सिद्धीस जाईल! आणि खरोखरीच पुढची पाच वर्षे रामशास्त्री घळीत बसून राहिले व त्यांनी हा अवघा ग्रंथ एकटाक लिहून काढला! कल्याण स्वामींनी लिहिला त्याच जागी बसून! कठीण शब्दांचे अर्थ त्यांना समर्थ आपोआप स्फ़ुरून देत असत! काय चमत्कार आहे हा! वाचून पहा ग्रंथ! खरोखरीच अप्रतीम झाला आहे!
मग त्यांची आयतीच परवानगीही मिळाली आणी ग्रंथ दासबोध. कॉम वर आला!
ते म्हणाले, “अरे माझी मुर्खाची परवानगी कसली मागतोस? हे सर्व ज्ञान समर्थांचे! त्यांना विचार आणि दे टाकून! माझे काय आहे त्यात! “
डोळ्यात पाणी आले… पायावर डोके ठेवायला गेलो तर जोरात ओरडले! “अरे अरे अरे! सांभाळ! डोक्याला शेण लागेल तुझ्या! “
मला काही कळॆना, बुचकळ्यात पडून उभा राहिलो, तर म्हणाले, “मघाशी म्हणालो नाही मी? या शेणाला राम वेळापुरे म्हणतात? मग माझ्या पायावर डोके ठेवलेस तर शेण लागेल ना कपाळकरंट्या! ” आणि खो खो खो हसू लगले!
त्यांची समर्थांप्रती दृढ निष्ठा, श्रद्धा, आत्मनिवेदनभक्ती, आणि टोकाची अनासक्ती, विरक्ती, निरीच्छा पाहून पुन्हा १००० वेळा मनोमन दंडवत घातले!
अशी माणसे आजही निर्माण होताहेत यातच समर्थांच्या लोकोत्तर कार्याचे यश सामावलेले आहे!
☆ ‘लोणार सरोवराच्या बाजूचे विस्मयकारी रामाचे मंदिर…’ लेखक : ” रामभक्त ” प्रशांत कुलकर्णी ☆प्रस्तुती – डाॅ. मीना श्रीवास्तव ☆
लोणार सरोवराच्या पाण्यापाशी जाताना उंचावरून एका पायवाटेने खाली उतरत यावं लागतं… हा रस्ता नागमोडी वळणाचा आणि जंगलातून जाणारा आहे. याचं पायवाटेवर जरासं आडवाटने बाजूला काही अंतर चालतं गेलं की डाव्या बाजूला थोडंसं उंचावर हे एक अदभूत आणि खास वैशिष्ट्यपूर्ण असे श्रीरामाचे मंदिर आहे. मोडतोड आणि अत्यंत दुर्लक्षित झालेलं हे मंदिर अजूनही त्याच्या पुराणकालीन वैभवशाली श्रीमंतीची साक्ष देत उभे आहे.
या मंदिराचे वैशिष्ट्य म्हणजे या मंदिरात फक्त श्रीरामाची मूर्ती आहे, सहसा श्रीराम यांची एकटी मूर्ती कधीही नसते. श्रीरामाच्या एका बाजूला बंधू लक्ष्मण आणि दुसऱ्या बाजूला पत्नी सीता उभे असतात. अजून खास म्हणजे श्रीराम यांची ही मूर्ती निशस्त्र अवस्थेत आहे आणि हे ही वैशिष्ट्यपूर्ण आहे. श्रीरामाच्या हातात कायम धनुष्यबाण दाखवले जाते जे या मूर्तीत नाही.
यामागे एक खास कारण आहे. श्रीराम वनवासात असताना येथे या सरोवराच्या बाजूला वास्तव्यास असताना त्यांचे वडील दशरथ यांचे निधन झाले. श्रीरामांनी आपल्या वडिलांचा दशक्रियाविधी येथून वीस किमी अंतरावर असलेल्या पैनगंगा नदीच्या काठी मेहकर येथे केला. तेथेच श्री बालाजी यांची खास मूर्ती आहे त्यावर मागच्या भागात लिहिले आहेच…
श्रीराम यांना आपल्या वडीलांचे पिंडदान करायचे होते आणि ते वनवासात असल्याने त्यासाठी अट अशी होती त्या विधीसाठी श्रीराम निशस्त्र असायला हवेत आणि त्यांच्याबरोबर कोणी स्वकीय असायला नको. हेच पिंडदान श्रीरामांनी या सरोवराच्या बाजूला केले आणि त्याचं ठिकाणी सध्याचे हे निशस्त्र श्रीरामाचे मंदिर आहे.
या मंदिरात एक अचंबित करणारी गोष्ट अशी या ठिकाणी तुम्ही गाभाऱ्यात मूर्तीच्या समोर उभे राहून हात जोडून नमस्कार करायला उभे राहिलात की तुम्हाला श्रीरामांच्या मूर्तीच्या एका बाजुला लक्ष्मण आणि दुसऱ्या बाजूला सीता मातेचे दर्शन होते. हे खूपच आश्चर्यकारक आहे. त्यामागे एक खास कारण आहे. या मंदिरात सभामंडपात दगडी सुबक नक्षीकाम केलेले बारा खांब आहेत, जे एका विशिष्ट रचनेत मंदिरात बसवले गेले आहेत. चार मोठे खांब सभामंडपात मध्यभागी आणि चार छोटे खांब उजव्या बाजूला आणि चार डाव्या बाजूला. हे खांब अशा रितीने बसवले गेले आहेत की ज्यावेळी आपण मूर्ती समोर हात जोडून उभे असतो त्यावेळी प्रकाशाची किरणे विशिष्ट कोनातून परावर्तित होईन आपली स्वतःची सावली श्रीरामाच्या मूर्तीच्या बाजूला अशा प्रकारे पडते की आपल्याला त्या मूर्तीच्या एका बाजूला सीतामाता आणि दुसऱ्या बाजूला लक्ष्मण उभे आहेत हा भास निर्माण होतो. मी हे प्रत्यक्ष बघितल्यावर अंगावर रोमांच उभे राहिले. जरा विचार करा त्यावेळी आजच्या सारखे कॅलक्युलेटर, संगणक, दुर्बीण, होकायंत्र असे कोणतेही अद्ययावत साधन सामुग्री उपलब्ध नसताना हे त्यांनी कसे निर्माण केले असेल? अहो एक दोन सेंटीमीटर जरी खांबांची लांबी, रुंदी, ठेवण बदलली तरी ही विस्मयकारी गोष्ट साकारणे केवळ अशक्य आहे. यावरून त्याकाळी विज्ञान किती प्रचंड ताकदीचे होते याची प्रचिती येते…
एवढंच नाही तर या मूर्तीच्या समोर उभे राहून तुम्ही आपले दोन्ही हात डोक्यावर सरळ उभे नेऊन डावीकडे उजवीकडे बाय बाय केल्यासारखे हलवले तर श्रीरामांच्या मस्तकाच्या वर मागच्या भिंतीवर या आपल्या हातांच्या सात सात सावल्या पंखा घालत असल्यासारख्या हलताना दिसतात. हे दोन्ही प्रकार मी स्वतः प्रत्यक्ष अनुभवल्यावर माझ्या अंगावर अक्षरशः काटा उभा राहिला. असे अजूनही खास वैशिष्ट्य या मंदिरात आढळले…
यावरून जरा विचार करा की आपले पूर्वज किती विद्वान आणि प्रचंड कलात्मक होते. त्यावेळेसची पाषाण शिल्पकला किती अफाट होती. आपण कल्पनाही करू शकत नाही इतकं हे भव्यदिव्य आहे, पण काळाच्या ओघात अक्षरशः नेस्तनाबूत होत आहे…
अरे हो अजून एक खास बाब अशी या मंदिरात होकायंत्र काम करत नाही. तिथे मंदिरात विश्रांतीसाठी खाली जमिनीवर बसलो असताना होकायंत्र काढून वेगवेगळ्या दगडावर ठेऊन पाहिलं तर त्या होकायंत्राची सुई दक्षिण उत्तर दाखवत नाही. वेगवेगळ्या दगडावर होकायंत्र ठेवलं की ती सुई भरकटत जाते पण स्थिर दक्षिण उत्तर होत नाही. आहे की गमतीशीर? … अर्थात यामागे शास्त्रीय कारण आहे…
या मंदिराची सध्याची अवस्था पाहून मन विषण्ण झालं… इतकं मोठं वैभव आपल्याकडे आहे याचा खरोखरचं अभिमान वाटतो…