(ई-अभिव्यक्ति में मॉरीशस के सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामदेव धुरंधर जी का हार्दिक स्वागत। आपकी रचनाओं में गिरमिटया बन कर गए भारतीय श्रमिकों की बदलती पीढ़ी और उनकी पीड़ा का जीवंत चित्रण होता हैं। आपकी कुछ चर्चित रचनाएँ – उपन्यास – चेहरों का आदमी, छोटी मछली बड़ी मछली, पूछो इस माटी से, बनते बिगड़ते रिश्ते, पथरीला सोना। कहानी संग्रह – विष-मंथन, जन्म की एक भूल, व्यंग्य संग्रह – कलजुगी धरम, चेहरों के झमेले, पापी स्वर्ग, बंदे आगे भी देख, लघुकथा संग्रह – चेहरे मेरे तुम्हारे, यात्रा साथ-साथ, एक धरती एक आकाश, आते-जाते लोग। आपको हिंदी सेवा के लिए सातवें विश्व हिंदी सम्मेलन सूरीनाम (2003) में सम्मानित किया गया। इसके अलावा आपको विश्व भाषा हिंदी सम्मान (विश्व हिंदी सचिवालय, 2013), साहित्य शिरोमणि सम्मान (मॉरिशस भारत अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 2015), हिंदी विदेश प्रसार सम्मान (उ.प. हिंदी संस्थान लखनऊ, 2015), श्रीलाल शुक्ल इफको साहित्य सम्मान (जनवरी 2017) सहित कई सम्मान व पुरस्कार मिले हैं। हम श्री रामदेव जी के चुनिन्दा साहित्य को ई अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों से समय समय पर साझा करने का प्रयास करेंगे।
आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय गद्य भँवर “– लेखक की बेईमानी…” ।)
~ मॉरिशस से ~
☆ कथा कहानी ☆ गद्य – भँवर # ११० — लेखक की बेईमानी —☆ श्री रामदेव धुरंधर ☆
वयोवद्ध सनत से पढ़ना तो छूट ही जाता, लेकिन उन्होंने जारी रखा। बच्चे उनकी रुचि के अनुसार पुस्तकें खरीद लाते थे। चालीस साल पहले की बात थी सनत अपने आंगन में फूल बो रहे थे। तभी एक मोटर खराब हो जाने पर उनके घर के सामने रुकी थी। सनत ने स्वयं मोटर ठीक कर दी थी। उन्होंने एकाकी आदमी को अतिथि स्वरूप चाय पिलायी थी। इस परिवार और घर से प्रभावित आदमी के पूछने पर उन्होंने संघर्षों से भरा अपना जीवन और पारिवारिक अनुराग उसे बताया था। वही लिखा गया था और आज सनत वही पढ़ रहे थे। आदमी से जब बात हुई थी सनत पढ़ने में कमजोर ही थे। उन्होंने कहा था पढ़ना आता नहीं है। आदमी जो एक सुविख्यात लेखक था उनकी अनपढ़ता का लाभ उठा कर उनकी अद्भुत जीवन यात्रा और आदर्श परिवार की कहानी को अपने विशद संस्मरण के नाम से लिखा था।
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३४१ ☆ क्या चल रहा है? …
एक विज्ञापन बहुत लोकप्रिय हुआ था, ‘क्या चल रहा है?’ उत्तर मिलता था, ‘फलां-फलां बॉडी-स्प्रे चल रहा है।’ इसी तर्ज़ पर एक मित्र से पूछा,‘क्या चल रहा है?’ उत्तर मिला,‘यही सोच रहा हूँ कि इतना जीवन बीत गया, क्या किया और क्या कर रहा हूँ? जीवन में क्या चल रहा है?’ उत्तर चिंतन को दिशा दे गया।
स्तुतः यह प्रश्न हरेक को अपने आपसे अवश्य करना चाहिए-‘क्या चल रहा है?’ दिन में जितनी बार आईना देखते हो, उतनी बार पूछो खुद से-‘क्या चल रहा है?’ बकौल डॉ. हरिवंशराय बच्चन-‘जीवन सब बीत गया, जीने की तैयारी में।’ चौबीस घंटे भौतिकता के संचय में डूबा मनुष्य जीवन में भौतिकता का भी उपभोग नहीं कर पाता। संचित धन को निहारने, हसरतें पालने और सब कुछ धरा पर धरा छोड़कर चले जानेवाले से बड़ा बावरा भिखारी और कौन होगा? पीछे दुनिया हँसती है-‘संपदा तो थी पर ज़िंदगी भर ‘मंगता’ ही रहा।’
बड़ा प्रश्न है कि क्या साँसें भी विधाता द्वारा प्रदत्त संपदा नहीं हैं? प्राणवायु अवशोषित करना-कार्बन डाय ऑक्साइड उत्सर्जित करना, इतना भर नहीं होता साँस लेना। मरीज़ ‘कोमा’ में हो तो रिश्तेदार कहते हैं-‘ कुछ बचा नहीं है, बस किसी तरह साँसें भर रहा है।’ हम में से अधिकांश लोग एक मानसिक ‘कोमा’ में हैं। साँसें भर रहे हैं, समय स्वतः जीवन में कालावधि जोड़ रहा है। काल के आने से पूर्व मिलनेवाली अवधि-कालावधि। हम अपनी सुविधा से ‘काल’ का लोप कर ‘अवधि’ के मोह में पड़े बस साँसें भर रहे हैं। फिर एक दिन एकाएक प्रकट होगा काल और पूछेगा-‘क्या चल रहा है?’ जीवन भर सटीक उत्तर देनेवाला भी काल के आगे हकलाने लगता है, बौरा जाता है, सूझता कुछ भी नहीं।
एक साधु से शिष्य ने पूछा कि क्या कोई ऐसी व्यवस्था की जा सकती है जिसमें मनुष्य की मृत्यु का समय उसे पहले से पता चला जाए। ऐसा हो सके तो हर मनुष्य अपने जीवन में किए जा सकनेवाले कार्यों की सूची बनाकर निश्चित समय में उन्हें पूरा कर सकेगा, मृत्यु के समय किसी तरह का पश्चाताप नहीं रहेगा। साधु ने कहा, ‘जगत का तो मुझे पता नहीं पर तेरी मृत्यु आठ दिन बाद हो जाएगी। सारे काम उससे पहले कर लेना।’ कहकर साधु आठ दिन की यात्रा पर चले गए। इधर गुरु का वाक्य सुनना भर था कि शिष्य का चेहरा पीला पड़ गया। वह थरथर काँपने लगा। खड़े-खड़े उसे चक्कर आने लगा। कुछ ही मिनटों में उसने खटिया पकड़ ली। खाना-पीना छूट गया, हर क्षण उसे काल सिर पर खड़ा दिखने लगा। आठ दिन में तो वह सूख कर काँटा हो चला। यात्रा से लौटकर गुरु जी ने पूछा, ‘क्यों पुत्र, सब काम पूरे कर लिए न?’ शिष्य सुबकने लगा। आँखों में बहने के लिए जल भी नहीं बचा था। कहा, ‘गुरु जी, कैसे काम और कैसी पूर्ति? मृत्यु के भय से मैं तो अपनी सुध-बुध भी भूल गया हूँ। कुछ ही क्षण बचे हैं, काल बस अब प्राण हरण कर ही लेगा।’ गुरु जी मुस्कराए और बोले, ‘ यदि मृत्यु की पूर्व जानकारी देने की व्यवस्था हो जाए तो जगत की वही स्थिति होगी जो तुम्हारी हुई है।…और हाँ सुनो, तुमसे असत्य बोलने का प्रायश्चित करने मैं आठ दिन की साधना पर गया था।
तुम्हारी और मेरी भी मृत्यु कब होगी, मैं नहीं जानता।’
काल आया भी नहीं था, उसकी काल्पनिक छवि से यह हाल हुआ। वह जब साक्षात सम्मुख होगा तब क्या स्थिति होगी? जीवन ऐसा जिओ कि काल के आगे भी स्मित रूप से जा सको, उसके आगमन का भी आनंद मना सको। जैसा पहले कहा गया-साँस लेना भर नहीं होता जीवन। शब्द है-‘श्वासोच्छवास।’ प्रकृति में कोई भी प्रक्रिया एकांगी नहीं है। लेने के साथ देना भी जुड़ा है। जीवन भर लेने में, बटोरने में लगे रहे, भिखारी बने रहे। संचय होते हुए भी देने का मन बना ही नहीं, दाता कभी बन ही नहीं सके।
जीवन सरकती बालू वाले टाइमर की तरह है। रेत गति से सरक रही है, अवधि रीत रही है। काल निकट और निकट, सन्निकट है। कोई पूछे, न पूछे, बार-बार पूछो अपने आप से- ‘क्या चल रहा है?’ अपने उत्तर आप जानो पर हरेक पर अनिवार्य रूप से लागू होनेवाला मास्टर उत्तर स्मरण रहे-काल चल रहा है।
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
नारायण साधना संपन्न हो चुकी। नई साधना की सूचना यथासमय देंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
~ The Fairy Who Walked with Light… ~
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They say that once, between a sigh of heaven and a dream of earth, a fairy lost her way among the stars and descended softly into the world of dust and days.
It chose the shape of a wanderer. The world called her Saira. Not because that was her name, but because no mortal tongue could utter the melody from which she was born. She descended from the heavens above.
She belonged to no kingdom. No walls could keep her. No horizon could contain her. She was a wild note in the song of creation—a free spirit woven from moonlight, wonder, and wandering stars.
The wind borrowed its freedom from her. The rivers learned movement by watching her pass. And flowers bloomed instinctively, believing spring itself had arrived. The trees inclined to offer their obeisance.
She wandered through seasons as though they were merely chambers within an endless celestial palace.
Autumn draped copper leaves at her feet like offerings. Winter wrapped her in silver silence, yet could never chill the warmth she carried within.
Spring adorned her with blossoms and birdsong, while summer scattered stardust across her laughter. The flowers reinvented new sprightly colours with divine fragrance.There was something else, though no one could name it.
A presence. A radiance. A silent companion that followed her like sunlight follows dawn. Sometimes it appeared as a shimmer of gold at the edge of twilight. Sometimes as a fleeting glow between one heartbeat and the next. Sometimes as nothing more than a feeling of safety arriving before lurking danger.
The old wanderers spoke of it in hushed voices. They called it: “The Light Between Worlds.”
Some believed it was a guardian, a protector. Others said it was merely another light, traveling distant skies beneath the countless stars.
It moved unseen beside her, guarding the fragile miracles that heaven had entrusted to earth.
And Saira, unaware of her own enchantment, continued gathering sunsets, speaking to stars, and teaching lonely hearts how to create wonders.
Children smiled when she passed. Birds altered their songs. Even sorrow, for a fleeting moment, forgot its own name.
Years drifted by like silver leaves upon a moonlit stream. The radiance of youth slowly bloomed with the time, her eyes became mesmerizing
—turquoise blue, fathoms beneath them. These two doe-eyed wonderers of eternity, shone behind her mortal skin, which was fairer than the word fair.
Then one morning, when dawn was still deciding whether to arrive, she stood beneath a sky strangely familiar.
The stars seemed closer than they had ever been. The wind spoke softly in a language only her heart had kept.
She smiled. Not a farewell. Not a promise. But a recognition! As though some distant constellation had whispered her name.
Then quietly, with wonder still alive within her eyes, she continued her journey, following a path of stars, visible only to her.
The morning remained resplendent. The earth remained rooted.
And somewhere, far beyond the reach of earthy maps, the fairy walked on.
Still, on certain nights, when moonlight spills like silver wine across sleeping fields, travellers speak of a radiant figure walking the borders of dream and reality. A wayfarer of no single realm. A presence too entire to be contained by one world.
A celestial wanderer. A fairy of forgotten skies. A soul too vast to belong entirely to this world. And the wind, faithful as ever, in its old fidelity continued to follow her, carrying fragments of her fragrant laughter, through valleys of memory and across horizons yet to be defined.
Some say, the Light Between Worlds still moves beside her. Others believe, it rides a celestial creature protecting her under the sky, under its guardianship.
For some stories are not meant to end. They simply continue, beyond the last page, beneath the same eternal sky, ever after.
(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)
☆ आलेख ☆ अंतरराष्ट्रीय योग दिवस ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆
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ऋषि परंपरा से वैश्विक मंच तक: 21 जून और एक सूत्र में बंधती दुनिया
प्राचीन भारतीय धरोहर से वैश्विक कल्याण तक: ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संकल्प को साकार करता 12वां अंतरराष्ट्रीय योग दिवस
“वर्मा जी, आज पार्क में इतनी भीड़ क्यों है?”
सुबह की सैर करते हुए शर्मा जी ने पूछा।
“अरे भाई, आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस है। देखिए, बच्चे भी आए हैं, युवा भी और बुजुर्ग भी।”
शर्मा जी कुछ देर तक लोगों को योग करते हुए देखते रहे। फिर मुस्कुराकर बोले, “अद्भुत बात है। हजारों साल पहले हमारे ऋषियों ने जंगलों और आश्रमों में जो साधना की थी, आज वही पूरी दुनिया को जोड़ रही है।”
वर्मा जी ने सहमति में सिर हिलाया।
“यही तो भारत की सबसे बड़ी देन है। ऐसा ज्ञान जो किसी एक देश, जाति या धर्म के लिए नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए है।”
उनकी बात सुनकर मन अनायास ही उस भारत की ओर चला जाता है, जहाँ ऋषि-मुनियों ने जीवन को केवल जीने का नहीं, बल्कि समझने का प्रयास किया। उन्होंने शरीर, मन और आत्मा के बीच संतुलन स्थापित करने की जो विधि खोजी, वही आगे चलकर योग के रूप में विश्व को मिली।
आज जब दुनिया 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाती है, तो यह केवल एक स्वास्थ्य कार्यक्रम नहीं होता। यह उस सांस्कृतिक विरासत का उत्सव होता है जिसने मानवता को जोड़ने का मार्ग दिखाया है।
योग का अर्थ ही है – जोड़ना।
शरीर को मन से जोड़ना।
मन को आत्मा से जोड़ना।
और व्यक्ति को समस्त सृष्टि से जोड़ना।
शायद यही कारण है कि योग की यात्रा आश्रमों से शुरू होकर आज वैश्विक मंच तक पहुँच चुकी है।
वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारत के प्रस्ताव को अभूतपूर्व समर्थन देते हुए 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया। इसके बाद से हर वर्ष दुनिया के कोने-कोने में लाखों लोग एक साथ योग का अभ्यास करते हैं। यह दृश्य केवल स्वास्थ्य जागरूकता का नहीं, बल्कि वैश्विक एकता का भी प्रतीक है।
भारत की संस्कृति सदैव “वसुधैव कुटुम्बकम्” के दर्शन को मानती रही है।
अर्थात् पूरी पृथ्वी एक परिवार है।
आज जब दुनिया युद्धों, तनाव, मानसिक असंतुलन, अकेलेपन और जीवनशैली जनित रोगों से जूझ रही है, तब योग इस दर्शन को व्यवहार में बदलने का माध्यम बनकर सामने आया है।
योग किसी सीमा में बंधा हुआ विचार नहीं है।
न यह किसी धर्म का प्रचार है और न किसी विशेष वर्ग का अधिकार।
यह तो जीवन को संतुलित बनाने की सार्वभौमिक कला है।
इसी भावना को और अधिक अर्थपूर्ण बनाती है वर्ष 2026 के 12वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की थीम –
“स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग” (Yoga for Healthy Ageing)।
यह विषय केवल लंबी उम्र की बात नहीं करता।
यह स्वस्थ, सम्मानजनक और सक्रिय जीवन की बात करता है।
आज चिकित्सा विज्ञान ने मनुष्य की औसत आयु बढ़ा दी है। लोग पहले से अधिक वर्षों तक जीवित रह रहे हैं। लेकिन क्या वे उतने ही स्वस्थ और आत्मनिर्भर भी हैं?
यही प्रश्न आज पूरी दुनिया के सामने है।
बढ़ती उम्र के साथ गठिया, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, स्मृति ह्रास, तनाव और अकेलापन जैसी समस्याएँ भी बढ़ रही हैं। ऐसे समय में योग केवल व्यायाम नहीं, बल्कि जीवन की गुणवत्ता को बेहतर बनाने का माध्यम बनकर उभरा है।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि नियमित योगाभ्यास शरीर की लचक बनाए रखने, संतुलन सुधारने, रक्तचाप नियंत्रित करने और मानसिक तनाव को कम करने में अत्यंत प्रभावी है। प्राणायाम फेफड़ों की क्षमता बढ़ाता है, ध्यान मानसिक शांति देता है और योगासन शरीर को सक्रिय बनाए रखते हैं।
लेकिन योग की सबसे बड़ी शक्ति उसके शारीरिक लाभों से भी आगे है। आज का मनुष्य पहले से अधिक सुविधासंपन्न है, फिर भी भीतर से बेचैन है।
हमारे पास संवाद के अनेक साधन हैं, लेकिन संवाद कम होते जा रहे हैं।
हमारे पास जानकारी बहुत है, लेकिन आत्मज्ञान कम होता जा रहा है।
हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, लेकिन स्वयं से दूर होते जा रहे हैं।
योग हमें इसी खोए हुए संतुलन की ओर वापस ले जाता है।
महर्षि पतंजलि ने कहा था – “योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” अर्थात् मन की चंचल वृत्तियों को शांत करना ही योग है।
यह सूत्र आज उतना ही प्रासंगिक है जितना हजारों वर्ष पहले था।
जब हम कुछ क्षणों के लिए अपनी साँसों पर ध्यान देते हैं, तो हम वर्तमान में लौट आते हैं।
जब हम ध्यान में बैठते हैं, तो हम स्वयं से मिलते हैं।
और जब हम स्वयं से जुड़ते हैं, तभी दूसरों से भी सही अर्थों में जुड़ पाते हैं।
यही योग का आध्यात्मिक पक्ष है।
यही उसकी वैश्विक शक्ति है।
योग हमें सिखाता है कि जीवन केवल उपलब्धियों का नाम नहीं है।
जीवन संतुलन का नाम है।
सफलता का भी महत्व है, लेकिन शांति का भी।
प्रगति आवश्यक है, लेकिन स्वास्थ्य भी।
भौतिक समृद्धि जरूरी है, लेकिन मानसिक संतोष भी।
आज अंतरराष्ट्रीय योग दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है कि स्वस्थ समाज ही सशक्त राष्ट्र का निर्माण कर सकता है।
यदि व्यक्ति स्वस्थ होगा तो परिवार स्वस्थ होगा।
परिवार स्वस्थ होगा तो समाज स्वस्थ होगा।
और समाज स्वस्थ होगा तो विश्व में शांति और समरसता का मार्ग प्रशस्त होगा।
अंततः 21 जून केवल एक तिथि नहीं है। यह हमें अपनी जड़ों की याद दिलाने वाला दिवस है।
यह हमें बताता है कि भारत की प्राचीन ऋषि परंपरा आज भी मानवता का मार्गदर्शन कर सकती है।यह हमें विश्वास दिलाता है कि विज्ञान और अध्यात्म विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने भीतर संतुलन, करुणा और जागरूकता का दीप जलाएँ।
क्योंकि जब व्यक्ति स्वयं से जुड़ता है, तब परिवार जुड़ता है। जब परिवार जुड़ते हैं, तब समाज जुड़ता है।
और जब समाज जुड़ते हैं, तब सचमुच पूरी दुनिया एक सूत्र में बंध जाती है।
यही योग का संदेश है। यही भारत की विरासत है और यही “वसुधैव कुटुम्बकम्” का साकार रूप है।
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – विमर्श: योग दिवस…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८३ ☆
☆ विमर्श: योग दिवस…☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
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योग क्या?
जोड़ना, संचय करना.
संचय क्या और क्यों करना?
सृष्टि का निर्माण और विलय का कारक है ‘ऊर्जा’, अत: संचय ऊर्जा का… लक्ष्य ऊर्जा को रूपांतरित कर परम ऊर्जा तक आरोहण कर पाना.
ऊर्जा संचय और योग में क्या संबंध है?
योग शारीरिक, मानसिक और आत्मिक ऊर्जा को चैतन्य कर, उनकी वृद्धि करता है .फलत: नकारात्मकता का ह्रास होकर सकारात्मकता की वृद्धि होती है. व्यक्ति का स्वास्थ्य और चिंतन दोनों का परिष्कार होता है.
योग धनाढ्यों और ढोंगियों का पाखंड है.
योग के क्षेत्र में कुछ धनाढ्य और ढोंगी हैं. धनाढ्य होना अपराध नहीं है, ढोंगी होना और ठगना अपराध है. पहचानना और बचना अपनी जागरूकता और विवेक से ही संभव है, गेहूं के बोर में कुछ कंकर होने से पूरा गेहूं नहीं फेंका जा सकता. इसी तरह कुछ पाखंडियों के कारण पूरा योग त्याज्य नहीं हो सकता.
दैनिक जीवन की व्यस्तता और समयाभाव के कारण योग करने नहीं जाया जा सकता.
योग करने के लिए कहीं जाना नहीं है, न अलग से समय चाहिए. एक बार सीखने के बाद अभ्यास अपना काम करते हुए भी किया जा सकता है. कार्यालय, कारखाना, खेत, रसोई हर जगह योग किया जा सकता है, वह भी अपना काम करते-करते.
योग कैसे कार्य करता है?
योग मुद्राएँ शरीर की शिराओं में रक्त प्रवाह की गति को सुधरती हैं. मन को प्रसन्न करती है. फलत: थकान और ऊब समाप्त होती है. प्रसन्न मन काम करने पर परिणाम की मात्रा और गुण दोनों में वृद्धि होती है. इससे मिली प्रशंसा और सफलता अधिक अच्छा करने की प्रेरणा देती है.
योग खर्ची ला है.
नहीं योग बिन किसी अतिरिक्त व्यय के किया जा सकता है. योग रोग घटाकर बचत कराता है.
कैसे?
योग से सही आसन सीख कर कार्य करते समय शरीर को सही स्थिति में रखें तो थकान कम होगी, श्वास-प्रश्वास नियमित हो तो रक्त प्रवाह की गति और उनमें ओषजन की मात्रा बढ़ेगी.फलत: ऊर्जा, उत्साह, प्रसन्नता और सामर्थ्य में वृद्धि होगी.
योग सिखाने वाले बाबा ढोंगी और विलासी होते हैं.
निस्संदेह कुछ बाबा ऐसे हो सकते हैं. उन्हें छोड़कर सच्च्ररित्र प्रशिक्षक को चुना जा सकता है. दूरदर्शन, अंतरजाल आदि की मदद से बिना खर्च भी सीखा जा सकता है.
योग और भोग में क्या अंतर है?
योग और भोग एक सिक्के के दो पहलू हैं. ‘दुनिया में हम आए हैं तो जीना ही पड़ेगा’, जीने के लिए अन्न, वस्त्र, मकान का भोग करना ही होगा. बेहतर जीवन स्तर और आपदा-प्रबंधन हेतु संचय भी करना होगा. राग और विराग का संतुलन और समन्वय ही ‘सम्भोग’ है. इसे केवल दैहिक क्रिया मानना भूल है. ‘सम्भोग’ की प्राप्ति में योग सहायक होता है. ‘सम्भोग’ से ‘समाधि’ अर्थात आत्म और परमात्म के ऐक्य की अनुभूति प्राप्त की जा सकती है. अत्यधिक योग और अत्यधिक भोग दोनों अतृप्ति, अरुचि और अंत में विनाश के कारण बनते हैं. ‘योग; ‘भोग’ का प्रेरक और ‘भोग’ ‘योग’ का पूरक है.
योग कौन कर सकता है?
योग हर जीवित प्राणी कर सकता है. पशु-पक्षी स्वचेतना से प्रकृति अनुसार आचरण करते हैं जो योग है. मनुष्य में बुद्धितत्व की प्रधानता उसे सर्वार्थ से दूर कर स्वार्थ के निकट कर देती है. योग उसे आत्म तत्व के निकट ले जाकर ब्रम्हांश होने की प्रतीति कराता है. कंकर-कंकर में शंकर होने की अनुभूति होते ही वह सृष्टि के कण-कण से आत्मीयता अनुभव करता है. योग मौन से संवाद की कला है. बिन बोले सुनना-कहना और ग्रहण करना और बाँट देना ही सच्चा योग है.
योग दिवस क्यों?
योग दिवस केवल स्मरण करने के लिए कि अगले योग दिवस तक योगरत रहकर अपने और सबके जीवन को बेहतर और प्रसन्नता पूर्ण बनाएँ.
(21 जून विश्व संगीत दिवस पर कोयल को अर्पित व्यंग्य योग)
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प्रिय कुहू
तुम 46 डिग्री टेम्प्रेचर में भी कूकीं। बदरीले मौसम,धुंआधार बारिश और हाड़ कँपाती ठंड में भी। मधुऋतु में कूकना तुम्हारा मौलिक अधिकार है।
तुम्हें कौन समझाए कि बेमौसम कूकना अच्छा नहीं होता। भले ही चीनी से ज्यादा मीठी कूक क्यों न हो। हमने कब कहा कि मुहूर्त निकलवाकर कूको ,पर जनरल नॉलेज नाम की कोई चीज होती है कि नहीं।
बेशक तुम पक्षी -जगत की नेत्री हो पर, हर बात पता हो जरूरी तो नहीं। वैसे भी अज्ञानी रहकर सब कुछ पाया जा सकता है तो ज्ञान की सिफारिश किसलिए।
कभी सुमित्रानंदन पंतजी ने तुम से गुजारिश की थी ! याद करने की कोशिश करो। मुझे पता है तुम भूली नहीं हो। भूलने का अभिनय कर रही हो। जिसमें तुम्हें महारत है।
हैरानी इस बात की है कि जहां तुम्हें याद रखना होता है वहां तुम भूल जाती हो। और जहां भूलना चाहिए वहां शिद्दत से याद रखती हो।
उन्होंने कहा था—- गा कोकिल बरसा पावक कण नष्ट भ्रष्ट हों जीर्ण पुरातन*—–वे जानते थे कि सुर सम्राज्ञी रसप्रिया वक्त पड़ने पर अग्नि भी बरसा सकती है। मृदूनि कुसुमादपि, वज्रादपि कठोर। तुम्हारे लिये यह पथ अपरिचित नहीं है। इसमें नया कुछ भी नहीं। भगवान कृष्ण ने होठों पर बाँसुरी रखी तो तर्जनी पर सुदर्शन चक्र।
शक्तिरूपा महामाया के हाथों में वीणा होती है पर असुर संहार हेतु धनुष ,त्रिशूल ,और अन्य आयुध भी होते हैं।
लोग कहते हैं तुम कौए के घोंसले में अपने अंडे छोड़ आती हो। तुम काली कलूटी हो । तो क्या। रंग देखकर कैसे फैसला किया जा सकता है। गोरा, मन से काला ढुस भी हो सकता है। रंग तो सियार भी बदल लेते हैं। बगुला ,मौनी बाबा बनकर मछली का शिकार करता है। चाहे जो हो तुम “तोतों “से तो लाख गुना अच्छी हो। तुम्हारा अपना राग है। सुर है। स्वयं की भाषा है। तुम्हें आज तक कोई तोता बनाने में कामयाब नहीं हो सका।
कभी सोचने की जहमत भी उठाओ। तुम्हें हम कादम्बरी, कोकिल, पिक, वसंतदूती, वनप्रियः चाहे जिस नाम से पुकारें कोयल ही रहोगी ना। नाम बदलने से फितरत नहीं बदलती ना पाखी। जन्मजात आदतें आखिर तक साथ रहती हैं।
अपनी ही सूरत पर नर्सिसस की तरह रीझनेवाला, जमाखोर मनुष्य तुम्हारे सुरदान का महत्व समझ ही नहीं सकता। क्योंकि उसकी सुरों की समझ खो गई है। वह निहायत बेसुरा और भौंडा हो गया है।
कुहू तुम सपने देखती हो। बेचती नहीं। तुम्हारे स्वप्न में एक हरा भरा मुल्क है। ताकि आनेवाली पीढ़ियों को जंगल सलामत मिले। बाग बगीचे वन उपवन अमराइयों में वे कूकती फिरें। मौसम में मिश्री घोलें।
तुम कूको कुहू। जी भरकर कूको। कभी तो इंसान के न सही, नदी जंगल पहाड़ के देवता के कानों पर जूँ रेंग जाये।
इंतजार लंबा हो रहा है। अब पंतजी की बात मान भी जाओ ना।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – सड़क पर बिखरा साहित्य।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०३ – व्यंग्य – सड़क पर बिखरा साहित्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
सड़कों पर दौड़ते वाहन केवल वाहन नहीं होते, बल्कि चलती-फिरती दर्शनशास्त्र की यूनिवर्सिटी होते हैं। जब कोई नौसिखिया ड्राइवर अपनी चमचमाती कार में बैठकर स्टियरिंग थामता है तो उसे लगता है कि वह सड़क का सिकंदर है लेकिन असली ज्ञान तो उस खटारा ट्रक के पीछे लिखा होता है जो धुएं का गुबार छोड़ते हुए कहता है “मालिक की ज़िंदगी, चेले की ऐश उड़ाओ कैश”। यह लाइन पढ़ते ही कार के गियर में हाथ लगाए बैठे मध्यमवर्गीय इंसान का सारा घमंड वैसे ही पिघल जाता है जैसे चिलचिलाती धूप में कुल्फी पिघलती है। हमारे देश की सड़कों पर ट्रैफिक रूल्स की कॉपियां भले ही धूल खा रही हों पर इन ट्रकों और ऑटो के पीछे लिखे जीवन के गहरे फलसफे हर आने-जाने वाले की आत्मा को झकझोर कर रख देते हैं। आप किसी भी बड़े शहर के चौराहे पर खड़े हो जाइए आपको यमराज की ड्यूटी और इंसानी मजबूरी का ऐसा लाइव कॉम्बिनेशन कहीं और देखने को नहीं मिलेगा जो इन गाड़ियों के बंपर पर मुफ्त में उपलब्ध रहता है। यह इस देश का सबसे सस्ता और टिकाऊ मनोरंजन है जिसे देखने के लिए किसी मल्टीप्लेक्स का टिकट नहीं कटाना पड़ता बस अपनी आंखें खुली रखनी पड़ती हैं।
सड़क पर निकलते ही पहला मुकाबला उस बिरादरी से होता है जो जीवन को एक रेस समझती है और जिनकी गाड़ियों के पीछे लिखा होता है “धीरे चलोगे तो बार-बार मिलोगे, तेज़ चलोगे तो हरिद्वार मिलोगे”। इस एक लाइन में जीवन और मृत्यु का जो अद्भुत ककहरा सिखाया गया है उसे पढ़कर बड़े-बड़े संतों की समाधि भंग हो सकती है। लोग सुबह-सुबह ऑफिस जाने की जल्दी में अपनी बाइक को हवाई जहाज बनाने की कोशिश करते हैं तभी उनके सामने कोई ऐसा ही ऑटो आ जाता है जिसके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है “हँस मत पगली, प्यार हो जाएगा ब्रेक मत मार, एक्सीडेंट हो जाएगा”। इसे पढ़कर अच्छे-अच्छे रोमियो अपनी गाड़ी की स्पीड चालीस से नीचे कर लेते हैं क्योंकि मोहब्बत और हाईवे दोनों में ही जब ब्रेक फेल होता है तो नुकसान सीधा दिल और बंपर का ही होता है। भारतीय सड़कों पर ड्राइविंग करना किसी युद्ध के मैदान में उतरने जैसा है जहाँ आपको हर मोड़ पर एक नई चुनौती का सामना करना पड़ता है। यहाँ यमराज किसी कोने में बैठकर चाय की चुस्की ले रहे होते हैं और उनके प्रतिनिधि के रूप में हमारी गाड़ियों के पीछे लिखा होता है “दम है तो पास कर, वरना बर्दाश्त कर”। यह सीधा सा संदेश उस पूरी व्यवस्था पर करारा तमाचा है जो हर वक्त आगे निकलने की अंधी दौड़ में अंधी हो चुकी है।
सच्ची मोहब्बत की तलाश में भटके हुए आशिकों के लिए तो ये गाड़ियां किसी मंदिर के चबूतरे जैसी हैं जहाँ हर टूटे दिल की दास्तान पेंट से लिखी होती है। जब कोई आशिक अपनी महबूबा की शादी के गम में देवदास बनने की बजाय ट्रक का ड्राइवर बन जाता है तो वह अपनी गाड़ी पर लिखवाता है “दिल दिया था जिसको, वो चली गई विप्रो, अब ढूँढ रहा हूँ उसको मेट्रो-मेट्रो”। यह महज़ एक शायरी नहीं बल्कि कॉरपोरेट जगत की उस कड़वी सच्चाई का दस्तावेज़ है जहाँ भावनाएं सैलरी पैकेज के सामने घुटने टेक देती हैं। ऐसी ही एक गाड़ी के पीछे जब लिखा मिलता है “तूने ठुकराया मेरा प्यार, अब देख मेरी कार का गियर” तो समझ आता है कि इश्क में मिला धोखा ही इंसान को बड़ा बिज़नेसमैन या फिर भारी वाहन का मालिक बनाता है। सड़कों पर चलता हुआ यह दर्द जब गियर के साथ बदलता है तो रात के सन्नाटे में हेडलाइट की रोशनी में एक और लाइन चमकती है “महबूबा की याद में, गियर बदला रात में”। इस देश के सारे आशिक अपनी नाकामी का जश्न इन सड़कों पर गाड़ियां दौड़ाकर मनाते हैं मानो उनका क्लच और ब्रेक ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा बचा हो। प्यार में जुदाई झेल रहे इन जाबाँजों की बातें सुनकर तो पत्थर का दिल भी पिघल जाए और वह भी अपनी गाड़ी की डिक्की पर कुछ ऐसा ही लिखवाने को मजबूर हो जाए।
आर्थिक मंदी और मध्यमवर्गीय परिवारों के संघर्ष की जो गाथा इन लोहे के शेरों पर लिखी होती है वह किसी अर्थशास्त्र की किताब में नहीं मिल सकती। जब एक आम आदमी बैंक से लोन लेकर अपने सपनों की गाड़ी सड़क पर उतारता है तो उसकी पहली प्रार्थना यही होती है “मालिक की दया, बैंक का कर्जा”। यह लाइन उस अंतहीन चक्रव्यूह को बयां करती है जिसमें फंसा इंसान हर महीने की तारीख आने से पहले ही कांपने लगता है। इसके ठीक बगल में कोई पुरानी खटारा गाड़ी अपनी जर्जर हालत पर हंसती हुई कहती है “ये मत देख कि कितनी पुरानी है, ये देख कि कितनी तूफानी है”। यह आत्मविश्वास ही इस देश की असली ताकत है जो संसाधनों की कमी के बावजूद आसमान छूने का हौसला रखता है। किश्तों के बोझ तले दबे हुए ड्राइवर्स का दर्द तब और गहरा हो जाता है जब उनकी गाड़ी के पीछे लिखा होता है “किश्तों पर ज़िंदा हूँ, मालिक का परिंदा हूँ”। यह पंक्तियां किसी बड़े कवि की कविता से कम नहीं हैं जो सीधे समाज के उस हिस्से पर रोशनी डालती हैं जो दिन-रात पसीना बहाकर देश का चक्का चलाता है। लोन पर ली गई गाड़ियों के मालिक जब दुनिया की बुरी नज़रों से परेशान होते हैं तो साफ लिख देते हैं “लोन पर ली है भाई, घूर कर नज़र मत लगा” जिससे बुरी नज़र वाले का मुंह खुद ही काला हो जाता है।
इन वाहनों के पीछे छिपा शुद्ध देसी हास्य रस ऐसा होता है जो डिप्रेशन के मरीजों के लिए रामबाण इलाज की तरह काम करता है। किसी सिग्नल पर खड़े होकर जब अचानक नज़र पड़ती है “हॉर्न पो पो दीदी गो गो” तो चेहरे पर हंसी की ऐसी लहर दौड़ जाती है जिसे रोकना नामुमकिन हो जाता है। यह लाइन हमारे समाज के उस स्टीरियोटाइप पर एक मीठा सा कटाक्ष है जो महिलाओं की ड्राइविंग को लेकर अक्सर चुटकुले बनाता रहता है। वहीं दूसरी तरफ पारिवारिक सुख और सामाजिक ताने-बाने को एक साथ समेटे हुए एक लंबा सा ट्रक कहता है “छोटा परिवार, सुखी परिवार और ये लंबा ट्रक, सबका यार”। सड़कों पर चलने वाले इन मुसाफिरों का अपनी गाड़ियों से ऐसा रिश्ता होता है कि वे उन्हें महज़ मशीन नहीं बल्कि अपने जिगर का टुकड़ा समझते हैं। जब कोई मनचला अपनी गाड़ी को हवा में उड़ाने की कोशिश करता है तो उसे रोकने के लिए पीछे लिखा होता है “धीरे चलो, घर पर कोई इंतज़ार कर रहा है शायद बेलन लेकर”। यह बेलन का डर ही है जो इस देश के शादीशुदा पुरुषों को सुरक्षित घर पहुँचाने में पुलिस प्रशासन से ज़्यादा मददगार साबित होता है और सड़कों पर होने वाले हादसों को रोकता है।
जीवन के परम ज्ञान और सस्पेंस की जो बातें इन गाड़ियों के पिछले हिस्से में छिपी होती हैं उन्हें समझने के लिए थोड़ी दार्शनिक दृष्टि की जरूरत होती है। जब आप अपनी गाड़ी को बहुत संभाल कर चला रहे होते हैं तभी सामने वाले ट्रक पर लिखा होता है “नज़र हटी, दुर्घटना घटी सब्जी पूरी बंटी”। यह लाइन मौत के बाद होने वाले भोज की तरफ इतना सटीक इशारा करती है कि पढ़ने वाला तुरंत अपनी सीट बेल्ट और हेलमेट को ठीक करने लगता है। जीवन की नश्वरता को इससे बेहतर तरीके से कोई और नहीं समझा सकता जहाँ एक पल की लापरवाही आपको सीधे परलोक का टिकट दिला सकती है। समय के चक्र और इंसान की औकात को याद दिलाते हुए एक और सूक्ति वाक्य मिलता है “समय बलवान है, इंसान तो बस मेहमान है”। इन पंक्तियों को पढ़कर लगता है कि जैसे कोई सूफी संत अपनी कुटिया छोड़कर हाईवे पर ट्रक चलाने आ गया हो और लोगों को मोक्ष का रास्ता दिखा रहा हो। इसी सस्पेंस और चेतावनी के बीच जब लिखा मिलता है “आज नकद, कल उधार गाड़ी पर लिखना मना है यार” तो समझ आता है कि इस आध्यात्मिक दुनिया के पीछे भी व्यापार का असली नियम पूरी कड़ाई से लागू होता है।
छोटे वाहनों और दोपहिया गाड़ियों के पीछे का टशन तो बड़े-बड़े राजा-महाराजाओं के ठाट-बाठ को भी फीका कर देने का माद्दा रखता है। एक छोटा सा ऑटो रिक्शा जब संकरी गलियों से सांप की तरह बलखाते हुए निकलता है तो उसके पीछे लिखा होता है “ऑटो है छोटा, पर दिल है बड़ा”। यह लाइन उस ड्राइवर के स्वाभिमान को दर्शाती है जो भले ही रोज़ का चंद रुपया कमाता हो पर किसी अमीर की अमीरी के आगे झुकना नहीं जानता। वहीं कॉलेज जाने वाले किसी लड़के की बाइक पर जब लिखा होता है “नो गर्लफ्रेंड, नो टेंशन” तो साफ़ समझ आता है कि यह दिल टूटने के बाद का वैराग्य है जो बाइक की रफ्तार में तब्दील हो चुका है। चालान के डर से कांपते हुए इस दौर के युवाओं का दर्द भी गाड़ियों पर बखूबी उभर कर सामने आता है जब वे लिखवाते हैं “चालान से डर नहीं लगता साहब, खाली जेब से लगता है”। कानून के लंबे हाथों और ट्रैफिक पुलिस के कैमरों के बीच ये छोटी गाड़ियां अपनी आज़ादी का परचम लहराते हुए कहती हैं कि हवा से बातें करना और सड़कों से नाता जोड़ना ही इनका असली मक़सद है।
सड़क का यह पूरा सफरनामा अजीबोगरीब घटना से होती है। हाईवे पर एक बहुत ही शानदार, महंगी और विदेशी स्पोर्ट्स कार फर्राटा भर रही होती है, जिसे देखकर ऐसा लगता है मानो वह सड़क पर नहीं बल्कि हवा में उड़ रही हो। उस कार का मालिक चश्मा चढ़ाए, स्टीयरिंग पर उंगलियां थिरकाते हुए खुद को दुनिया का शहंशाह समझ रहा होता है। तभी उसके आगे एक बहुत ही पुराना, जंग लगा हुआ और भयंकर काला धुआं छोड़ता हुआ कबाड़ ट्रक आ जाता है, जिसके पीछे बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है “जो हमसे टकराएगा, वो सीधा गैरेज जाएगा”। स्पोर्ट्स कार का घमंडी मालिक उस खटारे को देखकर खीझ जाता है और उसे ओवरटेक करने के लिए लगातार हॉर्न पर हॉर्न बजाने लगता है। वह खिड़की से हाथ बाहर निकालकर चिल्लाता है “ए भाई! साइड हटा अपनी इस बैलगाड़ी को!”
तभी वह खटारा ट्रक अचानक बीच सड़क पर रुक जाता है और उसके रुकते ही स्पोर्ट्स कार वाले को भी इमरजेंसी ब्रेक लगाने पड़ते हैं, जिससे उसकी कार के टायर चीख उठते हैं। कार का मालिक गुस्से में लाल-पीला होकर नीचे उतरता है और उस ट्रक के केबिन का दरवाज़ा खटखटाते हुए चिल्लाता है “बाहर निकल! गाड़ी चलानी नहीं आती तो रोड पर क्यों आ जाते हो?” जैसे ही ट्रक का खटखटाता हुआ दरवाज़ा चरमराकर खुलता है, अंदर से कोई साधारण ड्राइवर नहीं बल्कि खुद यमराज नीचे उतरते हैं। यमराज ने पैरों में हवाई चप्पल पहन रखी होती है, गले में गेंदे की सूखी माला होती है और हाथ में भैंसे की रस्सी की जगह एक चमचमाती डिजिटल चालान मशीन होती है। कार का मालिक उन्हें देखकर हक्का-बक्का रह जाता है और उसकी घिग्घी बंध जाती है।
यमराज बड़े प्यार से मुस्कुराते हैं, उस अमीर लड़के के कंधे पर हाथ रखते हैं और ठेठ बनारसी अंदाज़ में कहते हैं “काहे इतना भौकाल टाइट कर रहे हो बाबू? बहुत देर से तुम हमारी गाड़ी के पीछे लिखी लाइनें पढ़ रहे थे न? अब जरा इस मशीन पर अपनी उंगली का अंगूठा लगाओ।” लड़का कांपते हुए पूछता है “प्रभु, आप यहाँ ट्रक चला रहे हैं?” यमराज हंसते हुए जवाब देते हैं “अरे भाई! धरती पर इतना ट्रैफिक और प्रदूषण हो गया है कि भैंसे को सांस लेने में दिक्कत होती है, इसलिए हमने भी लोन पर यह सेकंड हैंड ट्रक उठा लिया है। वैसे तुम्हारी कार का बीमा और तुम्हारी सांसों का परमिट दोनों ही आज इसी वक्त समाप्त हो चुके हैं, चलो अब चुपचाप पीछे वाले केबिन में बैठो, वहाँ पहले से ही तीन ओवरस्पीडिंग वाले आशिक बैठे ‘महबूबा की याद में’ गियर बदल रहे हैं!”
(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका व्यंग्य – “लॉ और इन-लॉ…“।)
अभी अभी # १०२५ ⇒ व्यंग्य – लॉ और इन-लॉ श्री प्रदीप शर्मा
इंसान प्रेम को रिश्तों में बांधता है, उसे नाम देता है, समाज उसे स्वीकृति देता है। रिश्ते लौकिक भी होते हैं और अलौकिक भी ! जिन प्रथा और परंपराओं को समाज मान्यता देता है, कालांतर में वे ही कानून का रूप ले लेती हैं। अग्नि को साक्षी मानकर सात फेरे लेने पर विवाह संपन्न हो जाता है। शादी होते ही नए रिश्ते जन्म लेने लगते हैं, सास ससुर, साला साली, दामाद और समधी, समधन। एक और संसार, जिसे ससुराल कहते हैं, जीवन में प्रवेश कर जाता है।
कानून को अंग्रेजी में लॉ कहते हैं और ससुराल पक्ष को इन -लॉ। दुनिया का कोई कानून आपको अपने ससुर को कानूनी रूप से पिता मानने को बाध्य नहीं कर सकता। हम यहां उनकी बात नहीं कर रहे, जो अपने बाप को ही बाप नहीं मानते। लेकिन ससुर को फादर -इन -लॉ, यानी कानून के अनुसार पिता तो नहीं माना जा सकता न। साला यह कौन सा लॉ है जो साले को जबरदस्ती ब्रदर – इन – लॉ, यानी कानूनी रूप से आपका भाई बना बैठता है। यह तो अंधा कानून हुआ। भाषा के नाम पर रिश्तों का यह अत्याचार हम कब तक सहते रहेंगे। सास, सास ही रहेगी, वह मदर – इन – लॉ, यानी कानूनी तरीके से हमारी मां नहीं बन सकेगी। बहू, बहू ही रहेगी, सारी खुदाई एक तरफ रहेगी, लेकिन जोरू का भाई, जोरू का भाई ही रहेगा, कानूनी रूप से हमारा भाई यानी ब्रदर – इन – लॉ कभी नहीं बनेगा। हमने पहले भी अंग्रेजी का विरोध किया है, और कानूनन, रिश्तों की आड़ में ससुराल को हम पर हावी करने की इस साजिश का हम पुरजोर विरोध करते हैं।।
हम शायद इस बात को इतना तूल भी नहीं देते, अगर हमारी साली बीच में नहीं आती ! हमने शादी ही यह सोचकर करी थी कि साली, आधी घर वाली लेकिन जब अंग्रेजी किताब उठाई तो पाया वह तो सिस्टर – इन – लॉ है, यानी वह तो आधी बहन बनने पर तुल गई। आग लगे ऐसी अंग्रेजी किताबों को। कितना प्यारा शब्द है दूल्हा – दुल्हन !
और अंग्रेजी में ब्राइड और ब्राइड ग्रूम। हमें तो इस इंग्लिश शब्द में जोरू और जोरू के गुलाम वाली बू आती है। हसबैंड वाइफ फिर भी थोड़ा ठीक है, वाइफ ही अपना बैंड बजा रही है, फादर – इन – लॉ तो नहीं।
हम कानून का भी सम्मान करते हैं और रिश्तों का भी। कुछ रिश्ते कानून से भी ऊपर होते हैं, और संसारी रिश्तों से भी ! उन्हें हम अलौकिक रिश्ते कहते हैं। शिव पार्वती, लक्ष्मी नारायण और सीता – राम की तरह ही एक अलौकिक रिश्ता और भी है राधा कृष्ण का, जहां कोई सामाजिक बंधन, मर्यादा नहीं। सबसे ऊंची, प्रेम सगाई। एक ऐसा आदर्श जो मुक्त है, उन्मुक्त है, लेकिन आचरण में नहीं उतारा जा सकता। भक्त होना बड़ा कठिन है। अपने पति के होते हुए जब चित्तौड़ की महारानी, मीराबाई गलियों में इकतारा ले, गाती फिरती है, मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई। जाके सर मोर मुकुट, मेरो पति सोई, तो सारे आदर्श, प्रथा, परंपराएं, सामाजिक बंधन, कानूनी बेड़ियां कमजोर पड़ जाती हैं। मीरा जीत जाती है, जगत हार जाता है।।
चलिए वापस लौटते हैं लव इन और इन लाँ के रिश्ते से लिव इन रिलेशन पर ! जी हां, वही मुक्त और उन्मुक्त प्रेम जिसे सुप्रीम कोर्ट भी मान्यता दे चुका है। गुजरात का छुट्टा छेड़ा, कब का गुजरात छोड़, एक व्यापक रूप अख्तयार कर चुका है। विवाह का रजिस्ट्रेशन जरूरी है, लिव इन का नहीं, क्योंकि विवाह एक बंधन है और लिव इन एक आपसी करार, जिससे आप जब चाहें करें इन्कार।
रिश्तों में प्रेम हो, मर्यादा हो, एक ऐसा मनोवैज्ञानिक बंधन हो जिसमें मुक्ति का भी अहसास हो। समाज और कानून के बंधन में कब बंध पाए प्रेम के रिश्ते। अगर रिश्तों में प्रेम होता तो इतने तलाक नहीं होते। घर घर में पारिवारिक क्लेश और मनमुटाव नहीं होता। एक ही रास्ता रिश्तों को पटरी पर लाने का। लव इन, लॉ आउट। लव नॉट आउट।।
विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ?
☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (22 जून से 28 जून 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆
जय श्री राम। कहा जाता है कि समय सबसे बलवान होता है परंतु हमारे देवता श्री माता अंजनी के लाल श्री हनुमान जी समय से भी शक्तिशाली है अगर समय कुछ गड़बड़ करता है तो उसको सुधारने की ताकत हमारे श्री हनुमान जी में है, हनुमान जी की भक्ति की कड़ी में आज की चौपाई है –
नासै रोग हरे सब पीरा |
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ||
इस चौपाई के संपुट पाठ करने से समस्त प्रकार के रोग और पीड़ाओं का अंत हो जाएगा।
नासै रोग हरे सब पीरा नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।
आइये अब मैं पंडित अनिल पाण्डेय आपको इस सप्ताह अर्थात 22 जून से 28 जून 2026 तक के सप्ताह के, ग्रहों के विचरण की जानकारी दे रहा हूं।
इस सप्ताह सूर्य मिथुन राशि में, मंगल वृष राशि में, बुध, गुरु और शुक्र कर्क राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे
आईये अब हम राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।
मेष राशि
इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। व्यापारियों को सावधान रहना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से सहयोग मिल सकता है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 24, 25 और 26 तारीख के दोपहर तक का समय कार्यों के प्रति अनुकूल है। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर कार्यों का निपटारा करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
वृष राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने की थोड़ी उम्मीद है। भाई बहनों के साथ सामान्य संबंध रहेंगे अर्थात जैसे पहले थे वैसे ही रहेंगे। आपके जीवनसाथी को विभिन्न कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। दुर्घटना होने की आशंका करीब करीब नहीं है। आप को अपने संतान से इस सप्ताह कोई विशेष सहयोग नहीं मिल पाएगा। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 तारीख कार्यों को पूर्ण करने के लिए उपयोगी है। 24, 25 और 26 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन स्नान करने के उपरांत तांबे के पात्र में जल अक्षत और लाल पुष्प लेकर भगवान सूर्य को जल अर्पण करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है। औऊप
मिथुन राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। आपके जीवनसाथी के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपको अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। भाग्य पर नहीं। इस सप्ताह आपको अपने मानसिक स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सचेत रहना चाहिए। कुछ लोग आपको मानसिक कष्ट प्रदान करने का प्रयास कर सकते हैं। उनसे सावधान रहें। अगर आप सावधान रहेंगे तो वे आपको तंग नहीं कर पाएंगे। कचहरी के कार्यों में भी सावधान रहें। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख परिणाम दायक हैं। सभी प्रकार के कार्यों में सफलता प्राप्त करने के लिए आपको इन तारीखों का उपयोग करना चाहिए। 27 और 28 तारीख को आप अपने शत्रुओं पर सफलता पा सकते हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कर्क राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए ठीक रहेगा। उनको उन्नति प्राप्त हो सकती है। उनका अच्छा सहयोग आपको प्राप्त होगा। छात्रों के लिए भी यह सप्ताह ठीक रहेगा। उनको परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। व्यापार ठीक चलेगा। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह सामान्य रहेगा अर्थात जैसा पहले था वैसा ही रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी बरतें। इस सप्ताह आपके लिए 24, 25 और 26 तारीख के दोपहर तक का समय हर प्रकार के कार्यों के लिए ठीक-ठाक है। 26 तारीख की दोपहर से लेकर 27 और 28 तारीख को आपको सावधान रहना चाहिए। विशेष रूप से अपने संतान के प्रति। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर पूजा पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।
सिंह राशि
इस सप्ताह आपको धन लाभ की उम्मीद है। आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके माता जी का स्वास्थ्य भी ठीक रहेगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। संतान से आपके सहयोग मिलेगा। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। अधिकारी और कर्मचारियों को सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। व्यापार सामान्य रूप से चलेगा। दुर्घटनाओं से इस सप्ताह आपको थोड़ा सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 26 की दोपहर से लेकर 27 और 28 तारीख प्रतिष्ठा संबंधी कार्यों के लिए उपयोगी है। जनप्रतिनिधियों को इस तारीख का उपयोग करना चाहिए। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
कन्या राशि
इस सप्ताह आपके पास धन आने की उम्मीद है। कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है, मगर बहुत ज्यादा सावधानी लेनी पड़ेगी। सामाजिक प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ आपका संबंध ठीक-ठाक रहेगा। आपके माता जी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। आपका और आपके जीवन साथी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा। गारदन या कमर में दर्द हो हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख विभिन्न कार्यों में मददगार है। 26 तारीख के दोपहर से लेकर 27 और 28 तारीख को आपको अपने भाइयों के प्रति सावधान रहना चाहिए। उनसे आपको या उनको कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन सफेद चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
तुला राशि
इस सप्ताह भाग्य आपका साथ दे सकता है। कुछ कार्य भाग्य के भरोसे कर सकते हैं। मगर ज्यादा विश्वास आपको अपने कर्मों पर करना चाहिए। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। कार्यालय में आपको सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। वैसे कार्यालय में आपका कोई कुछ बिगाड़ नहीं पाएगा। इस सप्ताह आपके शत्रु शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं हो पाएंगे। इस सप्ताह आपके लिए 24, 25 और 26 की दोपहर तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए मंगल दायक है। 26 की दोपहर से लेकर 27 और 28 तारीख को आपको धन प्राप्त करने के संबंध में सतर्कता पूर्वक कार्य करना चाहिए। अगर आप सतर्कता पूर्वक कार्य नहीं करेंगे तो धन आपके पास नहीं आ पाएगा। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
वृश्चिक राशि
इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपकी मानसिक स्थिति भी बहुत अच्छी रहेगी। आत्मविश्वास बढ़ेगा। भाग्य से आपको लाभ मिलेगा। आपके जीवनसाथी को शारीरिक कष्ट हो सकता है। संतान से आपको सामान्य सहयोग ही प्राप्त हो पाएगा। ज्यादा सहयोग नहीं मिलेगा। दुर्घटनाओं से चोट लगने की संभावना बहुत कम है। धन आने की उम्मीद की जा सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 26 की दोपहर के बाद से लेकर 27 और 28 तारीख को लाभदायक है। 24, 25 और 26 तारीख की दोपहर तक आपको सावधान रहकर कार्यों का निष्पादन करना चाहिए। श्रइस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।
धनु राशि
इस सप्ताह आपका आत्मविश्वास बहुत बढ़ेगा। आपके कई कार्य आपके आत्म विश्वास के कारण ही संपन्न हो जाएंगे। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। दुर्घटनाओं से आपको खतरा होने की उम्मीद करीब करीब नहीं है। आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह थोड़े से परिश्रम से परास्त कर सकते हैं, परंतु उनसे आपको इस सप्ताह सावधान भी रहना चाहिए। आपका और आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख शुभ है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। वकीलों से मिलने का कार्य आपको 27 और 28 तारीख को विशेष रूप से कर लेना चाहिए। इसके अच्छे परिणाम निकल सकते हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
मकर राशि
यह सप्ताह आपके जीवन साथी के लिए अत्यंत अच्छा रहेगा। उनको बहुत सारे कार्यों में सफलता प्राप्त होगी। आपके शत्रु इस सप्ताह शांत रहेंगे। अगर आप ज्यादा प्रयास करेंगे समाप्त भी हो सकते हैं। धन प्राप्ति के लिए आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। मगर सावधानी बढ़ानी पड़ेगी। इस सप्ताह आपके लिए 24, 25 और 26 तारीख की दोपहर तक का समय अच्छा है। 26 के दोपहर के बाद से लेकर 27 और 28 तारीख को धन लाभ के मामले में आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।
कुंभ राशि
कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। आपको धन की प्राप्ति हो सकती है। आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य भी ठीक रहना चाहिए। आपके घर में धन खर्च की कोई योजना बन रही है। जैसे नया प्लाट खरीदना, मकान बनवाना, शादी करना आदि। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त हो सकता है। परीक्षार्थियों को परीक्षा पास करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। इस सप्ताह आपके लिए 27 और 28 तारीख को कार्यालय के कार्यों में सफलता का योग है। 22 और 23 तारीख को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्व शीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।
मीन राशि
यह सप्ताह आपके संतान के लिए ठीक-ठाक हो सकता है। उनको सफलताएं प्राप्त हो सकती हैं। उनका अच्छा सहयोग भी आपको मिल सकता है। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। उनको सफलता प्राप्त हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध पहले जैसे ही रहेंगे। कचहरी के कार्यों में सावधानी पूर्वक कार्य करते रहें। सफलता मिल सकती है। प्रतिष्ठा सामान्य रहेगी अर्थात आपकी प्रतिष्ठा में न कमी आएगी और ना बढ़ोतरी होगी। इस सप्ताह आपके लिए 22 और 23 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों को निपटने के लिए परिणाम मूलक और प्रभावशाली हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधान रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। कोई भी कार्य 26 तारीख के दोपहर के बाद से लेकर 27 और 28 तारीख को भाग्य के भरोसे नहीं छोड़ना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।
ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।