☆ जगातली सर्वात सुंदर नोकरी – लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री अमोल अनंत केळकर ☆ ☆
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ब्रेकिंग न्यूज: मुलांनी शेवटी जगातील सर्वात सुंदर नोकरी शोधली आहे… ‘आजोबा’ होणे!
एका लहान मुलाला शाळेत निबंध लिहायला सांगितला होता: “माझी महत्त्वाकांक्षा”.
त्याने लिहिले — मला राष्ट्रपती व्हायचे नाही, मला डॉक्टर व्हायचे नाही, मला शास्त्रज्ञही व्हायचे नाही. यापैकी काहीच नको! माझी भविष्यातील महत्त्वाकांक्षा आहे — आजोबा होणे!
कारण आजोबा होणे ही खरोखरच मोठी गोष्ट आहे!
कारण माझे आजोबा —
सकाळी उशिरा उठू शकतात,
दुपारी शांतपणे झोपू शकतात,
संध्याकाळी टीव्ही पाहू शकतात आणि लवकर झोपू शकतात.
कोणताही गृहपाठ नाही,
उन्हाळ्याच्या सुट्टीचे कोणतेही असाइनमेंट नाही,
आणि कोणतीही ट्यूशनसुद्धा नाही.
जर काहीच काम नसेल, तर ते झाडाखाली बसून वाऱ्याचा आनंद घेऊ शकतात,
किंवा पार्कमध्ये जाऊन कोणासोबत तरी बुद्धिबळ खेळू शकतात.
त्यांना हवा तितका वेळ ते व्हिडिओ गेम्स खेळू शकतात — कोणीही तक्रार करत नाही!
सकाळी कॉफी, दुपारी चहा, रात्री वाईन — राजासारखे आनंदी जीवन.
बसमध्ये मोफत प्रवास,
आणि नशीब चांगले असेल तर कोणीतरी जागाही देते.
हाय-स्पीड ट्रेन आणि चित्रपट — अर्ध्या किमतीत!
त्यांना जे वाटेल ते ते खाऊ शकतात — गरम पदार्थ जसे की कांदा भजी, राईस केक, सूप, ग्रील्ड सॉसेज आणि बरेच काही. थंड पदार्थांमध्ये आईस्क्रीम, पुडिंग, जेली, चीज — आणि त्यांना कोणीही थांबवत नाही (जोपर्यंत ते जास्त खात नाहीत).
त्यांना आवडेल ते ते करू शकतात — गाणे, डान्स, पेंटिंग, पियानो किंवा ट्रम्पेट वाजवणे, गिर्यारोहण किंवा ट्रेकिंगला जाणे!
आणि खिशात पैसे असतील तर ते जगभर फिरू शकतात!
आजोबा होणे खरोखरच खूप छान आहे!
प्रेरणा:खुद्द आजोबांनाही कदाचित माहीत नसेल की ते खरोखर किती आनंदी आहेत!
(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “सम्मान खरीदो” ।)
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कलम के पहलवान…“।)
अभी अभी # ९७२ ⇒ आलेख – कलम के पहलवान श्री प्रदीप शर्मा
कलम के धनी तो बहुत हुए हैं, कलम के सिपाहियों ने भी कई वैचारिक जंग जीती हैं, आज हम कलम के पहलवानों की चर्चा करेंगे। जैसा कि सर्वविदित है, मौसिकी हो या पहलवानी, उस्ताद से गंडा बंधवाने की प्रथा है। रियाज और वर्जिश की दरकार तो है ही।
बिन गुरु ज्ञान कहां से आए ! घिस घिस कर शालिग्राम की तरह, कलम घिस घिसकर ही कोई कलम का पहलवान बन सकता है। योग गुरु, संगीत के आचार्य और अखाड़े के उस्ताद की तरह एक कलम के पहलवान को भी अपने कलम गुरु की चिलम भरनी पड़ती है। कलम का गुरु द्रोणाचार्य की तरह नहीं होता। वह जिस शिष्य पर मेहरबान हो जाता है, उससे वह कलम पकड़ने वाली कोई उंगली गुरु दक्षिणा में नहीं मांगता, अपितु अपनी कलम ही उसे प्रसाद स्वरूप ईनाम में दे देता है।।
पूत के पांव पालने में, और कलम का सिर पहले दवात में होता था। दवात की स्याही में डुबो डुबोकर कलम कागज पर अक्षर बनाती थी। गुरुकुल का ज्ञान kores की स्याही की एक टिकिया से शुरू होता था। कागज़ के अखाड़े में कलम ने भी कोई कम घास नहीं छीली। कई बार कागज़ छलनी हुआ तो कई बार कलम क्षतिग्रस्त हुई। वह कलम का बाल्यकाल था। सरकंडे और पार्कर पेन का संधि काल था वह। होल्डर और स्याही की दवात की दास्तान है यह।
जिस तरह बंदर के हाथ में उस्तरा नहीं दिया जाता, किसी काला अक्षर भैंस बराबर वाले के हाथ में कलम नहीं पकड़ा दी जाती थी। मिट्टी से पैदा हुए हो, पहले मिट्टी का सम्मान करना सीखो। पट्टी तब कागद का काम करती थी और पेम, पट्टी पर ढाई आखर प्रेम का लिखना सीख जाती थी। आज भी जो विद्या, अध्यापन कक्ष के श्याम पट के दायरे में, खड़ू निर्मित चाक से प्राप्त होती है, वह किसी गुरुकुल के ज्ञान से कम नहीं। दुनिया के सभी गणित के सवाल इसी ब्लैक बोर्ड पर हल हुए हैं। हर बार एक नया सवाल हल किया जाता है और बाद में उसे पोंछ दिया जाता है।
ज्ञान की स्लेट कोरी की कोरी ही रह जाती है। गुत्थी इसी तरह सुलझती, उलझती जाती है।
मेरा जीवन कोरा कागज़, कोरा ही रह गया। जब कलम कागज़ पर चलती है, तो जगह कम पड़ जाती है। कागज़ भी मानो कलम से कहता प्रतीत होता है, रंग दे, रंग दे, रंग दे, मुझे तू रंग दे। कलम के पहलवान पीठ झुकाकर ज्ञानपीठ के लिए सृजन रत रहते हैं। कलम वही जो कलमकार को पुरस्कार ही नहीं, कार भी उपलब्ध करवाए। महा मंडलेश्वर की उपाधि ना सही विद्या वाचस्पति, भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार और पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित होना तो बनता है।।
कलम का सदगुरु एक कलम के पहलवान को ज्ञानवान, बुद्धिमान और शक्तिमान बनाता है। जितने आचार्य, पंडित, और डॉक्टर साहित्य में पैदा हुए हैं, उतने अन्य किसी बौद्धिक क्षेत्र में नहीं हुए। आलोचक, समालोचक, समीक्षक यहां के शंकराचार्य हैं। साहित्य के सभी पीठ इनका सम्मान करते हैं। अगर आप एक सच्चे कलम के पहलवान हैं तो इन्हें कभी पीठ ना दिखाएं। इन्हें अपनी पीठ पर बिठाएं।
एक अप्रैल का ज्ञान भंग की तरंग में नहीं प्रस्फुटित होता। उसके लिए जन्मजात प्रतिभा संपन्न होना भी जरूरी होता है। अगर आपमें वह प्रतिभा नहीं है तो कलम के साथ पहलवानी ना करें, हवा आने दें। बेहतर है किसी साहित्य के उस्ताद अथवा विद्यालंकार से गंडा बंधवा ही लें।।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
2 अप्रैल से एक माह की हनुमान साधना वैशाख पूर्णिमा तदनुसार 1 मई 2026 को संपन्न होगी।
इसमें हनुमान चालीसा एवं संकटमोचन हनुमानाष्टक के पाठ किए जाएँगे। हनुमान चालीसा के 21 या अधिक पाठ करने वाले विशेष साधक तथा 51 या अधिक पाठ करने वाले महा साधक कहलाएँगे। 101 या अधिक पाठ करने वाले परम साधक कहलाएँगे। आत्म परिष्कार और मौन साधना साथ चलेंगे।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(Captain Pravin Raghuvanshi—an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.
We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~ Janani —the Creator…~”. We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.)
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया…“)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १४७ ☆
आँखों से मेरी वो कभी मंज़र नहीं गया… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – पेड- पौधे कभी सेल्फी नही लेते…।)
☆ हेमंत साहित्य # ५२ ☆
पेड- पौधे कभी सेल्फी नही लेते… ☆ श्री हेमंत तारे ☆
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरण – “साइकिल वाले सर… “।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६१ ☆
संस्मरण – साइकिल वाले सर… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆
बात 1994-95 की है। लवलेश सोलापुर में तैनात थे, दो चार महीने ही हुए थे। हिंदी कार्यशाला का आयोजन था। पैंसठ सत्तर वर्ष के एक वृद्ध करीब साढ़े छह फुट लंबे चोडा सीना, रंग गोरा ऑफिस में प्रविष्ट हुए। हिंदी कार्यशाला में व्याख्यान देने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया था। वे डी.ए.वी. कॉलेज के पूर्व प्रिंसिपल थे और एन.सी.सी. के कमांडेंट। हालांकि अंग्रेजी के विद्वान थे पर हिंदी ऐसी बोलते थे कि सुनने वाले के दिल में उतर जाए। पंजाबी थे और उनके संभाषण में पंजाबी टोन और अधिक रस घोल देती।
उन्हें देखते ही मिलने की एक सहज उत्कंठा जागृत हो जाती। व्याख्यान समाप्त होने के बाद लवलेश उनके सामने हाजिर हुआ और जैसे दृष्टि मिली तो वह एक विद्यार्थी की तरह उनके चरणों में झुक गया। उन्होंने उसे बाँह पकड़ कर उठाया और खाली पड़ी कुर्सी पर बिठाया तथा स्वयं भी एक कुर्सी पर बैठ गए। लवलेश का परिचय पूछा, कहाँ के निवासी हो, रुचियाँ क्या क्या हैं, सोलापुर में कहाँ रहते हो। वे पूछते गए और वहउत्तर देता गया।
वे भसीन सर के नाम से विख्यात थे। पूरा नाम पुराने लोग ही जानते होंगे। साइकिल पर हमेशा चलते और साइकिल पर एक झोला टंगा रहता। साइकिल वाले सर। रविवार का दिन था। लवलेश परिवार के साथ नाश्ता करने वाला था । घर के नाम पर एक ही कमरा था और उससे अटैच टॉयलेट बाथरूम। बेटे ने बताया कोई वृद्ध अंकल हैं साइकिल लिए हुए। लवलेश बाहर निकला और उन्हें प्रणाम करके अंदर ले आया। चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। उनके सामने नाश्ते की प्लेट रखी, उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। बातचीत में बताया कि उनकी दो बेटियाँ हैं। एक बेटी मुंबई में डॉक्टर है दामाद भी डॉक्टर हैं। छोटी बेटी डॉक्टरी पढ़ रही थी कि अचानक बीमार पड़ी तो आज तक पड़ी है। उसके इलाज पर सब कुछ चला गया। पैंशन से जैसे तैसे खर्च चल जाता है। ट्यूशन भी कर लेता हूँ। फिर मुस्कुरा कर तनाव झटक दिया और बच्चों से उनकी पढ़ाई के बारे में पूछते रहे। चलते चलते बोले कि मैं यहाँ से गुजर रहा था तो सहज ही साइकिल आपकी ओर मुड़ गई। वैसे मैं किसी के घर बहुत कम जाता हूँ।
कई बार बाजार में मिले तो उसी साइकिल पर। बाजार में भी लोग उनकी बहुत इज्जत करते। वे सबसे उनके बच्चों की पढ़ाई लिखाई की बात करते और कोई कठिनाई होती तो उसे दूर करने के लिए साइकिल पर ही उस बच्चे के स्कूल या कॉलेज में पहुंच जाते। प्राचार्य से बात करके समस्या सुलझा देते। सभी प्राचार्य उनका बहुत सम्मान करते क्योंकि अधिकांश उनके विद्यार्थी रहे थे या एनसीसी कैडेट्स।
उनके बहुत सारे विद्यार्थी आईएएस करके उच्च पदों पर आसीन थे। लवलेश के एक मित्र ओबीसी कैडर के थे और उनके बेटे को इंजीनियरिंग में एडमिशन के लिए कास्ट वेलीडिटी सर्टिफिकेट चाहिए था। बहुत भागा दौड़ की पर सफलता नहीं मिली। वे दोनों घर पर हताश बैठे थे कि भसीन सर आ गए। हमारी चिंता सुनकर बोले कि मैं एक पत्र लिखता हूँ। आप उसे भेज दीजिए। उनकी हैंड राइटिंग इतनी सुंदर थी बिल्कुल मोती जैसी। टाइपिंग की जरूरत नहीं थी क्योंकि उनकी हैंड राइटिंग उनकी पहचान थी। उनके पत्र का यह असर हुआ कि बच्चे का प्रोवीजनल एडमिशन हो गया और कॉलेज को अनुदेश प्राप्त हुए कि इस प्रमाण पत्र के लिए योग्य विद्यार्थियों का एडमिशन रोका न जाए और उनसे लिखित ले लिया जाए कि भविष्य में वे प्रमाण पत्र प्रस्तुत कर देंगे।
एक बार सुबह-सुबह आए। अब उनका लवलेश के घर पर आना आम बात हो गई थी। आकर कुर्सी पर बैठ गए। उनके चेहरे पर बहुत चिंता के भाव थे। लवलेश ने चाय का प्याला हाथ में दिया तो कांपते हाथों ले लिया, बोले कुछ नहीं। फिर लवलेश ने व्यग्रता से पूछा कि सर क्या बात है। उनकी आंखों में आँसू छलक आए। बोले, “घर की अंदरूनी बातें किसी से नहीं कहता, आपसे भी नहीं कहूंगा। किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया, न उधार मांगा। ट्यूशन करता रहा। पर आज ऐसी नौबत आ गई है कि उधार मांगना पड़ेगा। बिजली का बिल छह हजार का आ गया है। बिजली वाले कहते हैं कि पहले बिल भरिए, फिर देखेंगे। फिर लवलेश से सीधे बोले, “मुझे छह हजार उधार दे दीजिए, मैं वापस कर दूंगा। ” लवलेश ने कहा कि सर उधार तो नहीं दे पाऊंगा पर आपका बिल अवश्य भर दूंगा। उनके चेहरे पर संतोष के भाव देखकर लवलेश को बहुत खुशी हुई।
लवलेश को कुछ पुस्तकें व एक शब्दकोश चाहिए था। सोलापुर में कहीं मिल नहीं रहे थे। एक पुस्तक तो भसीन सर की ही लिखी हुई थी पर उनके पास उसकी प्रति नहीं थी। सारी पुस्तकें चाँद प्रकाशन की थी। मुंबई वीटी (अब सीएसएमटी) के सामने चाँद प्रकाशन का बोर्ड लगा देखता था। भसीन सर बोले, “जब भी मुंबई जाओ तो चाँद प्रकाशन में जाना और मेरा नाम लेकर बोलना कि ये पुस्तकें मैंने मंगाई हैं।” दो लाइन शायद लिख कर भी दी थीं। खैर लवलेश चाँद प्रकाशन में गया और उनका लिखा कागज देते हुए पुस्तकें बता दीं। वह व्यक्ति अंदर केबिन में गया और लौटकर आया तो लवलेश के हाथ में पुस्तकें थमा दीं। पैसे पूछने पर मना कर दिया कि आप ले जाकर उन्हें दे दीजिए। लवलेश आश्चर्य में था कि इतने बड़े प्रकाशक ने बिना मूल्य लिए कैसे दे दीं। बाद में पता चला कि चाँद वाले और भसीन सर पंजाब के प्रसिद्ध आनंद परिवार से ताल्लुक रखते थे। पर किसी को बताते नहीं थे।
ऐसे थे भसीन सर। लवलेश के मन मस्तिष्क पर आज भी छाए हुए हैं।