ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (14 सितंबर से 20 सितंबर 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (14 सितंबर से 20 सितंबर) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम। आज आपको 14 सितंबर से 20 सितंबर 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु साप्ताहिक राशिफल के पहले मैं श्री हनुमान जी की जय का नारा लगाना चाहूंगा और आपको यह बताना चाहूंगा कि श्री हनुमान जी अपने भक्तों के रक्षक हैं। उनसे प्रार्थना है कि एक गुरु की तरह वे मुझ पर ज्ञान की वर्षा करें। श्री हनुमान जी से प्रार्थना है कि आप मुझ पर श्री गुरु जी के समान कृपा कीजिए। इस संबंध में हनुमान चालीसा की चौपाई है।

जय जय जय हनुमान गोसाईं |

कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ||

इन चौपाईयों के संपुट पाठ करने से ज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

नासे रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

आइये अब मैं आपको 14 सितंबर से 20 सितंबर 2026 तक के सप्ताह के राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु राशिफल के पहले मैं आपको इस सप्ताह में ग्रहों के गोचर के बारे में पूरी जानकारी दूंगा।

इस सप्ताह गुरु कर्क राशि में, शुक्र तुला राशि में, बुध कन्या राशि में, वक्री शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। सूर्य प्रारंभ में सिंह राशि में रहेगा तथा 17 तारीख के 11.37 रात से वह कन्या राशि में प्रवेश करेगा। मंगल देव प्रारंभ में मिथुन राशि में रहेंगे तथा 18 तारीख की दिन के 3: 03 से कर्क राशि में गोचर करेंगे। आइए अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। अगर आप अविवाहित हैं तो विवाह के सुंदर-सुंदर प्रस्ताव आएंगे। अगर विंशोत्री दशा ठीक है तो आपका विवाह तय भी हो सकता है। आपको अपने संतान से लाभ प्राप्त हो सकता है। आपके व्यापारी प्रतिद्वंदी आपका नुकसान करने का प्रयास कर सकते हैं परंतु सफल नहीं होंगे। भाग्य से मामूली लाभ मिल सकता है। अधिकारी और कर्मचारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 14 और 15 तारीख विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उपयोगी है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपका अपने भाई बहनों से संबंध ठीक रहेगा। आपको अपने संतान से अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों को परीक्षाओं में सफलता प्राप्त होगी। व्यापारियों का व्यापार भी ठीक चलेगा। भाग्य के कारण आपको सफलता मिल सकती है। दुर्घटनाओं से नुकसान नहीं होगा। शत्रुओं से सावधान रहने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको थोड़ा सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए उत्तम रहेगा। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। व्यापारियों का व्यापार अच्छा चलेगा। छात्रों को सफलताएं प्राप्त होगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। धन आने की संभावना है। कर्मचारी और अधिकारियों को इस सप्ताह थोड़ा सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह अच्छा रहेगा। भाग्य के स्थान पर इस सप्ताह आपको अपने कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख सफलता प्राप्त करने के लिए मददगार हैं। 16, 17 और 18 को आपको कचहरी के कार्यों में प्रयास करने पर सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की संभावना है। कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह आपको कोई रिस्क नहीं लेना चाहिए। इस सप्ताह आपको भाग्य के स्थान पर अपने कर्मों पर विश्वास करना चाहिए। जनप्रतिनिधियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक रहेंगे। इस सप्ताह आपके लिए 14, 15 और 16 तारीख लाभदायक है। 19 और 20 तारीख को आपको अपने कार्यों के प्रति सचेत रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। घर में कोई अच्छा कार्य होगा जिसमें काफी धन व्यय हो सकता है। धन लाभ होने की पूर्ण संभावना है। प्रयास करें। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह काफी अच्छा रहेगा। अधिकारियों एवं कर्मचारियों को इस सप्ताह थोड़ा सतर्क रहकर कार्य करना चाहिए। उनको सफलताएं मिलेंगी। भाग्य से कोई विशेष आशा नहीं रखना चाहिए। कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आप अपने शत्रुओं को बड़े आसानी से थोड़े ही प्रयास से पराजित कर सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख उपयोगी है। 16, 17 और 18 को आपको थोड़ा सतर्क रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्तुओं का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

यह सप्ताह सामान्यतः आपके लिए अच्छा रह सकता है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह अच्छा फल देने वाला होगा। धन की प्राप्ति होगी। व्यापार में लाभ होगा। अधिकारी और कर्मचारियों को इस सप्ताह सतर्क रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको थोड़ा मानसिक तनाव हो सकता है। इस सप्ताह आपको अपने संतान से थोड़ी मदद मिल सकती है। कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख फलदायक है। 16, 17 और 18 तारीख को आपका अपने भाइयों के साथ संबंध थोड़ा ठीक हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें एवं शनिवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

यह सप्ताह आपके लिए ठीक रहेगा। अविवाहित जातकों को विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। कर्मचारी एवं अधिकारियों के लिए सप्ताह अच्छा रहेगा। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। कचहरी के कार्यों में सावधानीपूर्वक धन व्यय करने पर सफलता प्राप्त हो सकती है। भाग्य के स्थान पर इस सप्ताह आप को कर्म पर विश्वास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 14 और 15 तारीख की दोपहर तक का समय विभिन्न प्रकार के कार्यों को करने के लिए अनुकूल है। 16 तारीख के दोपहर से 17 और 18 तारीख को आपको धन के मामले में सतर्क रहना चाहिए अन्यथा आपका धन बर्बाद हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें एवं मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर विशेष रूप से हनुमान चालीसा का तीन बार वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का अच्छा योग है। अगर आप प्रयास करें तो आपको अपने व्यापार में बहुत अच्छा लाभ होगा। सामान्य तौर पर व्यापारियों को इस सप्ताह लाभ प्राप्त होगा। भाग्य से भी आपको मदद मिलेगी। अधिकारी एवं कर्मचारियों को कार्यालय में सावधान रहकर कार्य करना चाहिए। दुर्घटनाओं से बचने का प्रयास करना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख कार्यों को करने हेतु परिणाम दायक हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सावधानी पूर्वक, सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

यह सप्ताह अधिकारी और कर्मचारियों के लिए बहुत उत्तम है। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी

। धन लाभ भी होगा। व्यापारियों के लिए भी यह सप्ताह ठीक है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख शुभ और लाभप्रद हैं। 16, 17 और 18 को कचहरी के कार्यों में अधिक प्रयासों के बाद सफलता मिल सकती है। सप्ताह के बाकी दिन ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षरी मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

मकर राशि

अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए सप्ताह बहुत अच्छा रहेगा। कार्यालय में उनको अपने साथियों से बहुत अच्छा सहयोग प्राप्त होगा। मकर राशि के जातकों को अपने भाग्य से इस सप्ताह काफी मदद मिल सकती है। गलत रास्ते से धन आने का योग है। भाई बहनों के साथ संबंध थोड़े खराब हो सकते हैं। अविवाहित जातकों के लिए विवाह के नए-नए संबंध प्राप्त हो सकते हैं। इस सप्ताह आपके लिए 14, 15 और 16 की दोपहर तक का समय प्रकार से लाभप्रद है। 19 और 20 तारीख को आपको सतर्कता पूर्वक कार्यों को करना चाहिए। 16 की दोपहर से लेकर 17 और 18 तारीख को आपको अपने धन के प्रति सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह भाग्य अद्भुत रूप से आपकी मदद करेगा। धन आने का भी योग बन सकता है। दुर्घटनाओं से आप बचेंगे। पेट पेट का अगर कोई रोग है तो उसमें आपको लाभ प्राप्त होगा। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग नहीं मिल पाएगा। धन लाभ में कमी रहेगी। इस सप्ताह आपके लिए 14, 15, 18 19 और 20 तारीख ठीक-ठाक है। 16, 17 और 18 तारीख को आपके कार्यालय के कार्यों में बहुत सतर्कता बरतनी चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

इस सप्ताह आपका व्यापार उत्तम गति से चलेगा। ‌व्यापार में आपको काफी लाभ प्राप्त हो सकता है। भाग्य से भी आपको मदद मिलेगी। दुर्घटनाओं से आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको अपने संतान से अच्छी मदद मिल सकती है। व्यापारियों के लिए यह सप्ताह ठीक है। अधिकारियों को इस सप्ताह नुकसान हो सकता है। आपको अपने प्रतिष्ठा के प्रति इस सप्ताह सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 19 और 20 तारीख प्रभावशाली हैं। 14 और 15 तारीख को आपको सचेत रहना चाहिए। 16, 17 और 18 तारीख को आपको भाग्य के स्थान पर कर्म पर विश्वास करना चाहिए। परंतु इन तारीखों में आपको भाग्य से कोई बड़ा नुकसान नहीं होगा इस सप्ताह आपको चाहिए क्या प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ सरता श्रावण… ☆ उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

? कवितेचा उत्सव ?

☆ सरता श्रावण… ☆ उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे ☆

आला सरता श्रावण

मना लागे हुरहुर

वर्षेची ती रिमझिम

अंगणात भुरभुर..

*

जाई पावसाची सर

 भिजवीत अंगणाला

दिसे नभाच्या प्रांगणी

 इंद्रधनुष्याची माला..

*

हिरवीगार ही सृष्टी

 लोभवते क्षणोक्षणी

 किमयाही निसर्गाची

 भूल घाली मनोमनी..

*

सृष्टी गीत गाता गाता

 जाई श्रावण पाऊल..

 स्वागताला आतुरलो

 लागता गणेश चाहूल…

© उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/ सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेच्या उत्सव ☆ आवाज हा, आवाज हा… ☆ श्री अमोल अनंत केळकर ☆

श्री अमोल अनंत केळकर

? कवितेच्या उत्सव ?

☆ आवाज हा, आवाज हा… ☆ श्री अमोल अनंत केळकर☆

(अवधूत गुप्ते यांनी विद्यानंद बापट याच्यावर एक गाणे चित्रित केले आहे. त्यापासून स्फूर्ती घेऊन म्हणलं आपण पण एक ढोल बडवावा 😬)

 (गाण्याची चाल: आभास हा, छळतो मला.  चित्रपट : यंदा कर्तव्य आहे)

कधी दूरदूर कधी हे समोर, कान ठणकतो आज का

का हे कसे, होते असे, हा प्रश्न पडे जीवा

कसा सावरू मी आवरू सणाला

होई कंप का हा झोपताना ही मला

आवाज हा, आवाज हा

छळतो तुला छळतो मला 🎷

क्षणात आले स्पीकर सारे, भिंतीच बनूनी जाती

कधी मर्यादा तुटून गेली, काहीच उरे ना हाती

मी असाच उठतो उगाच पाहतो वेळ पुन्हा आठवते

मग मिटून डोळे, कुशी बदलून नको नको से होते

तू वाजताना, झोपण्याचा खेळ हा

दिसे स्वप्न का हे जागताना ही मला

आवाज हा, आवाज हा

छळतो तुला छळतो मला 🥁

 

मनात माझ्या हजार शंका (विद्या) आनंद शोधू कसा रे

तो इथेच आहे, तिथेच नाही आहे खरा कसा रे

नवे ध्वनी सारे,

नको वाटे ही हवा

ले -जहर झाले

 ऐकताना वृंद नवा

 

आवाज हा, आवाज हा

छळतो तुला छळतो मला 🎺 

#माझी_फुसकुंडी 📝

© श्री अमोल अनंत केळकर

बेलापूर, नवी मुंबई, मो ९८१९८३०७७९

poetrymazi.blogspot.in, kelkaramol.blogspot.com

a.kelkar9@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ खेळ… ☆ कल्याणी केळकर बापट ☆

कल्याणी केळकर बापट

? विविधा ?

खेळ☆  कल्याणी केळकर बापट

अमरावतीला दरवर्षी दोन तीन खूप मोठे मोठे दहीहंडीचे इव्हेंट होतात. ती गर्दी, तो डी जे चा कर्णकर्कश आवाज, ती सेलिब्रिटी लोकांची ह्या इव्हेंट मधील हजेरी त्यामुळे ह्याला इव्हेंट च म्हणायचं. पण यंदा अमरावतीला सरकारी दवाखान्याला लागलेल्या आगीमध्ये नवजात बालके दगावली, काही गंभीर जखमी झालीत त्यामुळे हे इव्हेंट रद्द करण्यात आले. दहीहंडी म्हटलं की आठवले ती सामूहिक एकोप्याने केलेला मानवी मनोरा. खरोखरच ह्या सांघिक खेळांमुळे साहस, परस्परांना सांभाळून घेणे, यश अपयश पचवायची ताकद आणि अजूनही काही महत्त्वाच्या गोष्टी शिकायला मिळतात.

खेळावरून आठवल हल्ली बहुतेक घरातील सगळी मुलं आपापल्या व्हरांड्यात हातात मोबाईल घेऊन बसले असतात. एकतर बहुतेक एकटी अपत्य, असले तर एखादे भावंड, संयुक्त कुटुंब जवळपास नाहीच त्यामुळे मग एकटेपणा घालविण्यासाठी एकतर मोबाईल किंवा टीव्ही. सगळी बालचमू, बच्चेकंपनी आपली इटूकली पिटूकली तोंड हिरमुसली करुन आपापल्या गँलरीत, व्हरांड्यात बसतात. प्रत्येक व्यक्तीला त्यांच्या बरोबरीची समवयस्क व्यक्ती च लागते साथीला.

माझं मनं एकदम 15, 20 वर्षे मागे गेले. डोळ्यांसमोर यवतमाळची छान टुमदार घरांची सोसायटी आठवली. लहानश्या व्यंकटेश ला खेळायला शेजारचे ढीगभर सवंगडी होते. सगळे बरोबरीचे मुलं संध्याकाळी शाळेतून आल्याबरोबर दप्तर कोपऱ्यात ठेऊन बाहेर खेळण्यासाठी धूम ठोकत असत. सगळे मैदानी खेळ कधी गुण्यागोविंदाने तर कधी जुजबी भांडण करीत खेळतं. त्यावेळेस खेळले जाणारे खेळ म्हणजे आबाधूबी, लपाछपी, टिक्करबिल्ला, लंगडी, आंबेफोडणी, डाबडुबली, तळ्यातमळ्यात, मामाचं पत्र, खुपसणी, सागरगोटे, लगोरी, खोखो, कबड्डी, रनिंग, पोतारेस, लिंबूचमचा असे सगळ्यांच्या आवडीचे.

हे सगळे वैभव मला, आणि नंतर माझ्या मुलाच्या पिढीला पण उपभोगायला मिळाले ह्यात आनंद मानायचा की बहुतेक नंतरच्या पिढ्या ह्या आनंदाला मुकणार ह्याचे दुःख करायचे हे कधीकधी कळतच नाही. पण हे बिनखर्चीक खेळ ह्या मुलांना खूप आनंद देऊन गेले आणि एकोपा कसा असतो हे मुलांना शिकवून गेले हे नक्की. खरंच लहानपण, बालपण हा जीवनातील परमोच्च सुखाचा काळ असावा.

मध्ये मात्र एकदा काँलनीतील बच्चे कंपनीला बेधुंदपणे खेळतांना बघून खूप आनंद झाला. खास करुन मुलं मैदानी खेळ खेळतात आहेत आणि ते पण मस्त सामुहिक मोठ्या ग्रुपमध्ये ही आनंदाचीच बाब. त्यामुळे तो खेळ बघतांना तेथे थबकले, घटकाभर निवांत तो खेळ बघण्यात रममाण झाले आणि खूपसारा आनंद मनात भरभरून जमा केला.

ह्या खेळांमध्ये वयोगटानुसार दोन ग्रुप पडले होते. ते दोन्हीही ग्रुप दोन वेगवेगळे खेळ खेळत होते. एका ग्रुप चा खेळ म्हणजे लांब लाईन करायची, पहिल्या मुलाने दुसऱ्या मुलाच्या कानात अगदी हळुवार एक वाक्य सांगायचं, असं क्रमाक्रमाने ते वाक्य पुढे पुढे नेऊन शेवटचा खेळाडू ते वाक्य जाहीर सांगायचा. आता खरी गंमत अशी की मूळ वाक्याचा आणि शेवटच्या जाहीर वाक्यात इतकी जास्त तफावत यायची की तो समुह हास्याने लोटपोट व्हायचा अर्थातच मला पण ते बघून जाम हसू येतं होतं. आता इकडे बाजूला दुसरा समुह दुसरा खेळ मांडुन बसला होता. ह्या दुसऱ्या खेळात एका मुलाच्या डोळ्याला पट्टी बांधल्या जायची. त्याला दुसरा मुलगा एखाद्या आजुबाजुच्या वस्तू चा रंग आकार हे हिंट वा क्ल्यु म्हणून द्यायचा आणि त्यावरून तो ती वस्तू ओळखायचा. ह्या खेळात पण खूप गंमत येत होती. सांगाणारा सांगायचा एक आणि ओळखणारा ओळखायचा भलतच.

ह्या दोन्ही खेळांनी गंमत तर आणलीच पण एक मनात खोल विचार पण रुजवला बरं का. पहिल्या खेळाने सुचविले खरोखरच आपले कान किती हलके असतात की कुणी एकमेकां मार्फत लांब वळून आलेली गोष्ट ही आपले मूळ रुप सोडून भलतेच वेगळे रुप घेऊन आपल्या कानांवर आदळते, मनावर बिंबते आणि मग आपला तसाच भलता ग्रह बनतो, दृष्टिकोन तयार होतो. ही गोष्ट किती हानीकारक नं. म्हणून स्वतः च्या कानांवर आणि नजरेवर विश्वास ठेऊन मगच निर्णय घ्यावेत. त्याक्षणी मनाशी पक्की खूणगाठ बांधली अशा ऐकीव गोष्टी ऐकून आपला तसा दृष्टिकोन तयार करुन एखाद्या निरपराध व्यक्तीवर अन्याय करायचा नाही, कारण असं झालं तर त्याच्या कितीतरी पट जास्त भरपाई आपल्याला इथल्याइथेच भरून द्यावी लागते.

दुसऱ्या खेळातून असा बोध मिळाला की आपली दृष्टी न वापरता दुसऱ्या च्या इंद्रियांचा वापर करुन मनात तयार केलेली प्रतिमा ही वास्तवतेपेक्षा कितीतरी निराळी असते. थोडक्यात काय तर आपले कान, आपली नजर आणि सगळ्यात महत्त्वाचं म्हणजे आपलं मनं हे कायम आपल्याशी खरं बोलत असतं. फक्त गरज असते ती दुसऱ्यांच्या कुबड्या न वापरता स्वतःवर आणि फक्त स्वतः वर विश्वास ठेऊन निर्णय घेण्याची.

खूप लहानलहान गोष्टींमधूनही कधीकधी खूप मोठा संदेश मिळतो हे मात्र खरं.

 

©  कल्याणी केळकर बापट

9604947256

बडनेरा, अमरावती

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “आईच्या हातचं…” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? जीवनरंग ?

☆ “आईच्या हातचं…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

झालं असं की,

माझ्या लग्नाच्या पंचविसाव्या वाढदिवशी एक पाकीट हातात ठेवत बाबा म्हणाले “निवांत झाल्यावर हे बघ. तुझ्यासाठी स्पेशल गिफ्टयं. ” दिवसभरातल्या गडबडीत पाकीटाविषयी विसरून गेले. रात्री झोपायच्या तयारीत असताना एकदम आठवलं. उत्सुकतेपोटी घाईघाईत पाकीट फोडलं तर त्यात एक पोस्टकार्ड होतं. लग्नाच्या आधी कामानिमित्त दुसऱ्या शहरात राहत होते तेव्हा आईनं पाठवलेलं पत्र होतं.

“प्रिय प्रिय सोनी..

अनेक अनेक आशीर्वाद!!

उद्या तुझा पंचविसावा वाढदिवस त्यानिमित्तानं आभाळभरून शुभेच्छा आणि थोडं मनातलं सांगावसं वाटलं म्हणून हे पत्र. तू माझ्यासाठी काय आहेस हे शब्दात सांगता येणार नाही. तुझ्यामुळे जगणं सुंदर झालं. तू आलीस अन माझं अवघं विश्व व्यापून टाकलस.

तुझ्यासोबतचा प्रत्येक क्षण हा सर्वोच्च आनंदाचा होता आणि कायमच राहील.

बघता बघता काळ चटकन सरला. तू मोठी झालीस. खूप शिकलीस. नोकरी मिळवून कमावतीसुद्धा झालीस. खूप छान वाटतयं आणि आता दोन महिन्यांनी तुझं लग्न…

बापरे!!

अजूनही खरं वाटत नाही. कालपरवा पर्यंत धडपडत पाउलं टाकणारी माझी छोटी बाहुली आता चक्क बोहल्यावर चढणार. तुला पसंतीचा, हवा तसा जोडीदार मिळाला. याचं मोठं समाधान आहे.

आता या क्षणी डोळ्यात आनंदाश्रू आहेत त्याचवेळस तू दुरावणार म्हणून हुरहूरही वाटतेयं. मुलीच्या आईला या अवघड प्रसंगाला सामोरं जावचं लागतं. असो…

तू हुशार आहेस, हिकमती, हिमती आहेस पण खूप घाई करतेस आणि आता राग कंट्रोल करायला शिक. आई ऐकून घेते म्हणून सासू ऐकलच असं नाही. नवरोबा तर नाहीच नाही. तेव्हा एकदम एक्साईट किवा इमोशनल होणं आता कमी कर. बाकी तू घरी आल्यावर बोलूच.

पुन्हा एकदा खूप खूप शुभेच्छा!!

आई..

पंचवीस वर्षांपूर्वीचं आईचं पत्र. पुन्हा पुन्हा वाचलं. क्षणभर वाटलं की आई माझ्यासमोर बसून बोलतेय. शब्दा शब्दात असलेला आपलेपणा, काळजी थेट काळजाला भिडलं. खूप भरून आलं. आईला कडकडून मिठी मारावीशी वाटली पण शक्य नव्हत. तिला जाऊन पंधरा वर्ष झाली. आईची खूप आठवण आली. ती आत्ता सोबत असायला हवी असं खूप आतून वाटलं आहे. हातातल्या पत्राकडं एकटक बघताना लक्षात आल की माझं अक्षरही बरचसं आईसारखचं आहे. गंमत वाटली. त्या पत्रानं आठवणींची एकेक फोल्डर पटापट उघडली. मोबाइलमधला आईच्या फोटोकडे पाहताना डोळे कधी वहायला लागले कळलंच नाही.

एका साधंसं पत्र पण त्यानं दिवस माझा अविस्मरणीय केला. आठवणीतली आई पत्ररूपानं माझ्यासोबत होती हे फार मोलाचं होतं. पूर्वी मोबाइल, ईमेल, सोशल मीडिया वगैरे नव्हतं हे एका दृष्टीने चांगलंच होतं. पत्राद्वारेच विचारल्या जाणाऱ्या ख्याली खुशालीचा आपलेपणा टाइप केलेलं वाचताना जाणवत नाही. एवढं मात्र खरं…

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ “ते शेवटचं गळणारं पान…!!!” ☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆

डॉ अभिजीत सोनवणे

© doctorforbeggars 

? मनमंजुषेतून ?

☆ डॉक्टर फॉर बेगर्स ☆ “ते शेवटचं गळणारं पान…!!!☆ डॉ अभिजीत सोनवणे ☆

खूप वर्षांपूर्वी वाचलेली एक कथा, आज मुद्दाम इथे सारांश देत आहे…

एक लहान मुलगी दुर्धर आजाराने अंथरुणाला खिळून असते, ती काहीच दिवसांची सोबती आहे, असं डॉक्टरांनी सांगितलेलं असतं.

पानगळीचा ऋतू येतो, मुलीला खिडकीतून दूरवर एक झाड दिसत असतं, या झाडाची एक एक करून रोज पानं गळून पडत असतात.

का कोण जाणे, पण या लहान मुलीला वाटतं, गळणाऱ्या या एकेक पानाप्रमाणे माझं आयुष्य सुद्धा एक एक दिवसांनी कमी होत आहे. जेव्हा या झाडाची संपूर्ण पाने गळून पडतील तेव्हा माझा सुद्धा मृत्यू झालेला असेल.

मुलीचे आई वडील सुद्धा मुलीसाठी दररोज झुरत असतात…

एके दिवशी “तो” दिवस येतो, झाडाची सर्व पानं गळून आता फक्त एकच पान शिल्लक राहिलेलं असतं…

मुलीला वाटतं माझा सुद्धा एकच दिवस शिल्लक राहिलेला आहे. झाडावरचं हे शेवटचं पान आता उद्या सकाळी गळून पडणार आणि त्याचबरोबर मी सुद्धा…!

या विचाराने, ती खचून जाते, आई-वडील आणि हे सर्व जग आपण कायमचं सोडून जाणार या विचाराने अस्वस्थ होते… तळमळते… खचून जाते, धाय मोकलून रडते…!

दुसऱ्या दिवशी सकाळी लवकर उठून मुलगी झाडाकडे पाहते, पान गळून पडलेलं नसतं, ते तिथंच असतं. पान गळून पडलं नाही म्हणजे आपण अजून जगणार… या विचाराने तीच्या मनातल्या आशा आणि जगण्याची उमेद प्रफुल्लित होते…

पुढे दुसरा तिसरा चौथा पाचवा… दिवसांवर दिवस जात असतात, परंतु शेवटचं ते पान कधीच गळून पडत नाही…

मुलीचा जगण्याचा उत्साह वाढतो…

कित्येक महिने जातात, निसर्ग नियमाप्रमाणे झाडाला पुन्हा पालवी फुटते, नवीन पानं येतात… पुन्हा पानगळ होते, तरीही शेवटचं ते पान गळून पडत नाही…

जितकी नवीन पानं फुटली आहेत, तितक्या दिवसांचं माझं आयुष्य मला पुन्हा मिळणार, असा विचार मुलगी करायला लागते… पानगळीनंतर जशी नवीन पाने फुटली, तसे माझ्याही आयुष्यातले दिवस वाढतील, या एका विचाराने मुलगी पुढे अनेक वर्ष आई-बाबांबरोबर जगली…

मुलीच्या आईने एके दिवशी मुलीच्या बाबांना प्रश्न केला, ‘हा चमत्कार घडला कसा? शेवटचं ते पान पानगळीत सुद्धा गळून पडलं नाही आणि इतक्या वर्षानंतर, जीर्ण होऊन सुद्धा झाडावर अजून कसं टिकून आहे?

“बाप” नावाचा तो “माणूस” उलगडा करतो…

शेवटचं ते पान राहिलेलं असताना, मुलगी रडून झोपी गेल्यानंतर, भल्या पहाटे तो त्या झाडाजवळ जातो, झाडाला मनापासून नमस्कार करतो. आणि शेवटचं जे एक पान राहिलेलं असतं, त्या पानाला तो फांदीला डिंकाने चिटकवून टाकतो, सुतळीने घट्ट बांधून टाकतो, अशाप्रकारे की ते पान कधीही पडू नये…!

दोघेही मग एकमेकांच्या गळ्यात पडून हमसून रडायला लागतात…!

कथा इथे संपते… कथा वाचून आपलेही डोळे भरून येतात…!

कथा इथे संपते परंतु विचार चक्र सुरू होतात…

आपण फक्त श्वास, अन्न आणि पाण्यावर जगत नाही, तर जगण्यासाठी लागते एक आशा – उमेद नावाची ज्योत…!

पराभूत होणं, म्हणजे हरणं नसतं…!

लढायच्या आधीच माघार घेणं, म्हणजे हरणं…!!

पडल्यानंतर उठून उभंच न राहणं, म्हणजे हरणं…!!!

प्रत्येकाच्या आयुष्यात पानगळ येते, आणि ते शेवटचं गळणारं पान सुद्धा…

अशावेळी गळणाऱ्या पानाबरोबर आपण गळून जायचं नसतं…

आपल्यासाठी सुद्धा कोणीतरी येऊन पान फांदीला चिटकवेल याची वाट न पाहता, गळणारं ते पान, स्वतःच उठून, फांदीला चिटकवून, हसत हसत जगायचं…!

परंतु आशा आणि उमेद हरवलेल्या, दुसऱ्याचं गळणारं ते पान मात्र पुढे होऊन आपणच चिटकवायचं… आणि एका क्षणी बाप होऊन जायचं… कुणासाठी आपणच आनंदाचं झाड व्हायचं…!!!

आपण ते दर वेळीच करता, दरवेळी आपणही कुणाचे तरी आईबाप होता… आनंदाचे झाड होता… मी अशा घटनांचा फक्त साक्षीदार असतो.

आपण सर्वांनी मिळून केलेल्या आणि मी प्रत्यक्ष पाहिलेल्या या घटना लेखाजोखाच्या स्वरूपात आपणास सविनय सादर!

  1. या महिन्यात अनेक गंभीर रुग्णांबरोबरच, त्याहून गंभीर असणारे दोन तरुण… या सर्वांना हॉस्पिटलमध्ये ऍडमिट केले. दोघांपैकी एकाला मदर तेरेसा होम मुंबई येथे काही दिवसांकरिता आरामासाठी (Recovery) ठेवले आहे, दुसऱ्याला त्याच्या मूळ गावी सोलापूर जिल्ह्यात पाठवले आहे.

त्यातला एक जण बऱ्यापैकी शिकलेला आहे, आश्रमात पोहोचल्यावर तो म्हणाला, ‘डॉक्टर आता बरा झालो की माझा बोजा मी तुमच्या डोक्यावर ठेवणार नाही… ‘

त्याला म्हणालो, ‘तू माझा बोजा किंवा भार कधीच नव्हतास, हां, तुझी जबाबदारी मात्र माझ्या डोक्यावर होती. ‘

‘भार आणि बोजा लादलेला असतो, जबाबदारी मनापासून स्वीकारलेली असते…! ‘

  1. रस्त्यावर भेटलेल्या, हातापायाने अधू झालेल्या आई-वडिलांना कमरेचे – मानेचे पट्टे, औषध गोळ्या, कुबड्या, काठ्या, वॉल्कर अशी सर्व वैद्यकीय साधने देऊन उपचार केले आहेत.
  2. घरातून बाहेर काढल्या गेलेल्या किंवा त्रासाला कंटाळून स्वतःहून बाहेर पडलेल्या अनेक प्रौढ आणि वृद्ध मावश्यांना एकत्र करून त्यांच्याकडून अस्वच्छ भागाची स्वच्छता करून घेत आहोत, अशा सर्वांची आम्ही टीम तयार केली आहे या टीमला “खराटा पलटण” असं नाव दिलं आहे. या महिन्यातील सणवार लक्षात घेता, स्वच्छता करणाऱ्या या लोकांच्या मुखी काहीतरी गोडधोड जावे, या भावनेने प्रत्येकाला पाच पाच किलो साखर दिली आहे.
  3. या वेळच्या पावसाने धरणं भरली, तसे अनेकांच्या डोळ्यात सुद्धा पाणी भरलं… रस्त्यावरचे अनेक संसार उध्वस्त झाले. अशा अनेकांना आपल्या सर्वांच्या वतीने किराणा, तसेच छत्री आणि रेनकोट दिले आहेत.

वर सांगितलेल्या लोकांच्या आयुष्यात जशा अवघड वेळा आल्या तशा, आपल्या सर्वांच्याच आयुष्यात अशा अवघड वेळा, कधी ना कधी येतच असतात. त्याच्या घटना – प्रसंग – स्वरूप – गांभीर्य वेगवेगळं असू शकतं.

आयुष्यात आलेली ही अवघड वेळ “काट्यासारखी” खुपते… पण आलेली ती वेळ मात्र त्यावेळी मारून न्यायची असते…

कारण सर्वात जास्त घाई कुणाला असते तर ती वेळेला…

“वेळ” कधीच खूप वेळ थांबत नसते, मग ती चांगली असो की वाईट…!

वेळ दाखवणाऱ्या घड्याळात सुद्धा फुलं नाही, तर “काटेच” असतात… हे जळजळीत सत्य आहे…

म्हणजे वेळेला सुद्धा “काटे” चुकलेले नाहीत…!

आणि म्हणून… आती रहेंगी बहारे… असं गुणगुणत, पुढं फुलंही वाटेत भेटतील, या आशेनं, काट्यासारखी खुपणारी तेव्हढीच ती वेळ, निभावून न्यायची बस्स…!

  1. या महिन्यात डॉ. सलीम शेख सर म्हणजे ऋषितुल्य व्यक्तिमत्व आदरणीय डॉ APJ अब्दुल कलाम सर यांचे नातू (त्यांच्या बंधूंच्या मुलाचे चिरंजीव) यांची अत्यंत जवळून आणि भावपूर्ण अशी भेट झाली. या भेटीचा सविस्तर वृत्तांत ग्रुप वर अगोदरच दिला आहे.
  2. या महिन्यात, मधूनच शाळा सोडलेल्या तीन मुला मुलींना त्यांच्या पालकांशी संवाद साधून पुन्हा शाळेत घातलं आहे. यातील एका मुलीला नर्सरी मध्ये घातलं आहे. शाळेत जाताना ही चिमुरडी, हसत हसत जाते. शाळेत जाताना कायम रडा रड करणारा मला मात्र मी आठवतो.
  3. याच महिन्यात अनेक जीवाभावाच्या वृद्ध व्यक्ती कायमच्या सोडून निघून गेल्या. आयुष्य हे भाड्याची खोली आहे, कधीतरी खाली करावीच लागणार…! हे वारंवार सिद्ध होतं…

मरणाने सुटका केली… जगण्याने छळलं होतं…!!!

या ओळी जणू यांच्यासाठीच लिहिल्या गेल्या…

पण पोटच्या लेकराप्रमाणे त्यांनी माझ्यावर प्रेम केलं, माया केली, मी त्यांना कधी विसरू शकणार नाही…

 “काळ, जात” राहील… मात्र “काळजात” कायम राहतील, त्यांच्या त्या सुगंधी आठवणी…!

  1. ज्यांना भारताचा नागरिक सोडाच, माणूसही समजलं जात नाही, अशांना एकत्र करून, आम्ही सर्वांनी 15 ऑगस्ट रोजी ध्वजाच्या आसपासच्या परिसराची स्वच्छता करून, ध्वजाला वंदन केले.

देश प्रेमाची ही ज्योत त्यांच्याही मनात अखंड तेवत राहील.

खरंतर आमच्याकडच्या या सर्व लोकांना रस्त्याकडेचे दगड धोंडे समजलं जातं, हरकत नाही…

झऱ्यातून वाहणाऱ्या पाण्याला एक मधुर नाद असतो, पण हा नाद निर्माण होतो, झऱ्यात असलेल्या त्या दगड धोंड्यांमुळेच…!

  1. रस्त्याकडेला जे पडून होते त्या सर्वांना रोज जेवण दिले आहे. अति गरीब रुग्ण ज्यांना डबा आणून देणारं कोणीही नाही अशा सर्वांना हॉस्पिटलमध्ये जाऊन जेवण दिलं आहे.

असो,

कुणाला तरी सोडणं, कुणाला तरी ढकलून पाडलं हा “क्षणाचा खेळ” आहे…!

पण कुणाला तरी जोडणं, कोणालातरी उचलणं हा “आयुष्याचा मेळ” आहे…!!

ज्यांना कधी पाहिलेही नाही, अशा सर्व बांधवांसाठी आपण आपल्या घासातला घास काढून देत आहात, त्यांना हात देत आहात. खऱ्या अर्थाने आपण आयुष्याचा मेळ घातला आहे!

 

© डॉ अभिजित सोनवणे

डाॕक्टर फाॕर बेगर्स, सोहम ट्रस्ट, पुणे

मो : 9822267357  ईमेल :  abhisoham17@gmail.com,

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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ मुरलीच्या स्वरांतला कृष्ण… ☆ संगीता कुलकर्णी ☆

संगीता कुलकर्णी

? मनमंजुषेतून ?

☆ मुरलीच्या स्वरांतला कृष्ण ☆ संगीता कुलकर्णी ☆

नभाच्या निळाईहून गहिरे तुझे नयन नीलकमल

अमावस्येच्या कुशीत जणू उमलले शशिकिरण निर्मल

कुंतलांच्या काळ्या मेघांत मोरपिसांची इंद्रधनू-रेष

तुझ्या एका स्मितात दडले सृष्टीचे सगळे अविनाश गूढविशेष

*

यमुनेच्या यौवनलाटांवर चांदण्यांची चंदेरी पाल

कदंबाच्या कुशीत विसावला तो सावळा नंदलाल

मुरलीच्या अधरामृताने निशेची झाली नादमयी

स्वरांच्या त्या सरींत विरघळली राधेची अंतरीची तृषामयी

*

तुझी मुरली की विरहिणीच्या हृदयाची हाक होती?

की अनंताच्या ओंजळीतील प्रेमाची पहिली चाहूल होती?

एक स्वर तुझा पडता कानावर काळही थबकून राहिला

आणि जीवाचा प्रत्येक कण श्यामरंगात न्हाऊन निघाला

*

गोपींच्या नयनी चंद्र उगवले अधरी थरथरले गान

पैंजणांच्या प्रत्येक नादात धुंद झाले वृंदावन

प्रेमाला जेव्हा शब्द उरले नाहीत तेव्हा  तू मुरली झालास

आणि मौनाच्या मंदिरामध्ये स्वतःच परमेश्वर झालास

*

राधा म्हणजे तुझ्या प्रेमाची निःशब्द लिहिलेली गाथा

तिच्या एका अश्रूबिंदूत सामावली युगांची व्यथा

भेट झाली क्षणभराची तरी जन्मोजन्मींचा सुगंध

दोन देहांच्या पलीकडले ते एकात्मतेचे चिरंतन छंद

*

पण रणांगणी जेव्हा अर्जुनाच्या हातून गांडीव गळाले

तेव्हा तुझ्या अधरांवरचे हास्य गीतेत रूपांतरले

कर्म तुझ्या ओठी आले अन्, मोहाचे मेघ विरले

अज्ञानाच्या अंधःकारातून आत्मज्ञानाचे सूर्य उगवले

*

सारथी तू तरी विश्वाचा नियंता तुझ्या मुठीत

रथाच्या चक्रांमधुनी जणू फिरती युगांची गती

विश्वरूपाच्या एका दर्शनात दिशा झाल्या दीपमाळा

अणुरेणूत अनंत दिसले विराट झाला नंदलाला

*

कधी गोकुळचा माखनचोर कधी करुणेचा सागर

कधी सखा कधी योगेश्वर कधी प्रेमाचा अमृतझर

तुझ्या लीलांना सीमा नाही तुझ्या रूपांना अंत नाही

तूच प्रश्न आणि तूच उत्तर तुझ्यावाचून सत्यच नाही

*

आजही मनाच्या मंदिरात तुझी पाऊले ऐकू येतात

विरक्त झालेल्या भावनांना तुझे स्वर पुन्हा जागवतात

जगण्याच्या या रणभूमीवर जेव्हा मी हरवून जातो

तेव्हा अंतरीचा सारथी होऊन तूच मला पुन्हा सावरतोस

*

म्हणून नको वैकुंठ मला नको मुक्तीचा मान

नको स्वर्गीय सुखांची माळ नको मोक्षाचे दान

फक्त एवढीच कृपा कर श्वासात तुझा स्वर राहू दे

हृदयाच्या प्रत्येक ठोक्यालाश्याम म्हणण्याची ओढ राहू दे

*

माझ्या अश्रूंना यमुना कर माझ्या भावांना भक्ती

माझ्या शब्दांना मुरली कर माझ्या मौनाला शक्ती

जीवनाच्या अंतिम संध्येला जेव्हा सारे रंग विरतील

तेव्हा माझ्या मिटलेल्या नयनांत फक्त तुझेच सावळे आकाश उरेल…

©  संगीता कुलकर्णी 

लेखिका /कवयित्री

ठाणे मो. 9870451020

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १०५ आणि १०६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १०५ आणि १०६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. १०५ – – – 

विवेके क्रिया आपुली पालटावी ।

अति आदरे शुध क्रिया धरावी ।

जनीं बोलण्यासारिखे चाल बापा ।

मना कल्पना सोडी संसार तापा ।।१०५।।

अर्थ : विवेकाच्या साहाय्याने आपल्या वागणुकीत बदल करावा. चांगले आचरण जाणीवपूर्वक आणि आदरपूर्वक करावे. आपले वागणे आणि बोलणे यात एकवाक्यता असावी. हा संसार जरी दुःखमय असला तरी त्याविषयी उगीचच नको त्या कल्पना करणे सोडून द्यावे.

(विवेक- सारासार विचार, पालटावी – बदल घडवून आणावा, शुध – चांगले/उत्तम आचरण, संसार तापा – संसारातील दुःख)

विवेचन : साधकाने कसे वागावे हे समर्थ मागील श्लोकाप्रमाणे याही श्लोकात सांगत आहेत. आयुष्यात आणि परमार्थ मार्गावर वाटचाल करताना देखील विवेक अतिशय महत्वाचा. विवेकबुद्धी म्हणजे सारासार विचार करण्याची बुद्धी. काय चांगले आहे, काय वाईट आहे हे समजून त्याप्रमाणे वागणे म्हणजे विवेक. दुर्योधन एकदा श्रीकृष्णाला म्हणाला होता की मला चांगले काय आहे हे समजते. मी वागतो ते वाईट आहे हेही मला समजते. पण मला चांगले वागण्याची बुद्धीच होत नाही. इथे दुर्योधनाच्या वागण्यात विवेक बुद्धीचा अभाव आढळतो. चांगले आणि वाईट म्हणजे श्रेयस आणि प्रेयस. श्रेयस म्हणजे आपल्या अंतिम हिताची जी गोष्ट आहे त्याची निवड करणे. प्रेयस गोष्ट सुरुवातीला आकर्षक वाटत असली तरी अंतिमतः आपली हानी करणारी असते. नियमित व्यायाम करणे अंतिमतः माझ्या हिताचे आहे. पण आळसामुळे मला झोप प्रिय वाटते. इथे मी श्रेयसची निवड न करता प्रेयस निवडतो. ते अंतिमतः हानिकारक आहे.

वाईट सवयींचे वळण लागण्यासाठी प्रयत्न करावे लागत नाहीत. पण चांगल्या गोष्टींची सवय जाणीवपूर्वक लावावी लागते. म्हणूनच समर्थ म्हणतात की ‘ शुध क्रिया धरावी ‘ म्हणजे जाणीवपूर्वक चांगल्या गोष्टींचे आचरण करावे. चांगल्या गोष्टींच्या आचरणासाठी समर्थ जाणीवपूर्वक ‘शुद्ध’ हा सुंदर शब्द वापरतात. खरोखरच जे चांगले आहे ते शुद्ध आणि ज्यामध्ये काही दोष आहे किंवा वाईट आहे ते अशुद्ध! विवेकाच्या साहाय्याने आपल्या वागण्याबोलण्यात योग्य तो बदल घडवावा. तो सुद्धा कसा? तर समर्थ म्हणतात, ‘ अति आदरे. ‘ त्या गोष्टींबद्दल म्हणजेच चांगल्या गोष्टींबद्दल मनात आदर बाळगून आदरपूर्वक त्यांचे आचरण करावे. आपल्या वागण्याने सज्जनांना आनंद होईल अशा प्रकारे वागावे. ‘ सदाचार हा थोर सांडू नये तो ‘ असे समर्थांनी आपल्याला मागील श्लोकात सांगितले आहेच. पण चांगल्या गोष्टी या पुन्हा पुन्हा सांगाव्या लागतात.

बऱ्याच वेळा आपले बोलणे आणि वागणे यात अंतर पडते. आपण बोलतो काही आणि करतो काही. म्हणजेच आपल्या ‘ कथनी और करनी ‘ यात फरक असतो. एखादी व्यक्ती वारंवार अशा पद्धतीने वागू लागली की समाज अशा लोकांवर विश्वास ठेवत नाही. त्यांच्या शब्दाला काडीचीही किंमत लोक देत नाहीत. म्हणूनच समर्थ म्हणतात की आपण जसे बोलतो तसे वागावे. आपले आचार, विचार आणि उच्चार यात एकवाक्यता असावी.

हा संसार दुःखमय आहे हे मान्य. त्यात पूर्णपणे सुखी आहे अशी कोणीच व्यक्ती नाही. पण म्हणून आपल्या भविष्याविषयी उगीच चिंता करीत बसू नये. कोणी भविष्यात आपले कसे होईल याच्या कल्पना करीत बसतात तर कोणी नको त्या कल्पनेच्या मनोराज्यात रमतात. कल्पनेनेच आपण स्वतःला दुःखी करून घेतो किंवा काल्पनिक गोष्टींमध्ये सुख मानत बसतो. संसार दुःखमय आहेच त्यात आणखी भर अशा कल्पना करून कशाला टाकायची? कल्पनाच करायची झाली तर ती चांगल्या गोष्टींची करावी. ज्या गोष्टींची कास आपल्याला धरायची आहे त्याबद्दल कल्पना करायला हरकत नाही. कारण त्यातूनच त्या चांगल्या गोष्टींचा पाठपुरावा आपण करू शकू.

स्वसंवाद 

१. दुर्योधनाप्रमाणे मलाही एखादी गोष्ट ‘चुकीची आहे’ हे माहीत असूनही, मी केवळ तात्कालिक सुखासाठी (प्रेयससाठी) विवेकाचा बळी देऊन त्याच मार्गावर चालत राहतो का?

२. चांगल्या सवयी आणि आचरण अंगी बाणवण्यासाठी मी समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे जाणीवपूर्वक आणि ‘अति आदराने’ (मनापासून) प्रयत्न करतो, की आळसाला शरण जातो?

३. चार लोकांमध्ये आदर्श विचार मांडताना, प्रत्यक्षात माझ्या कुटुंबात आणि व्यवहारात माझे बोलणे आणि वागणे यात थोडी तरी एकवाक्यता (प्रामाणिकपणा) असते का?

४. संसारातील चालू घडामोडींना सामोरे जाण्याऐवजी, मी भविष्यातील काल्पनिक संकटांचे ‘मनोराज्य’ उभे करून स्वतःचा ‘संसार ताप’ (चिंता) तर विनाकारण वाढवत नाही ना?

—–

श्लोक क्र. १०६ — — 

बरी स्नानसंध्या करी येकनिष्ठा ।

विवेके मना आवरी स्थानभ्रष्टा ।

दया सर्व भूतीं जया मानवाला ।

सदा प्रेमळु भक्तिभावे निवाला ।।१०६।।

अर्थ : आपले जे स्नानसंध्या आदी नित्यनैमित्तिक कर्म असेल ते निष्ठापूर्वक करावे. भरकटणाऱ्या म्हणजेच स्थानभ्रष्ट झालेल्या मनाला विवेकाच्या साहाय्याने आवर घालावा. सर्व प्राणिमात्रांबद्दल मनात दयाभाव किंवा करुणा असावी. अशी प्रेमळ व्यक्ती भगवंताबद्दल मनात असलेल्या भक्तिभावाने समाधान पावते.

(येकनिष्ठा – संपूर्ण श्रद्धेने, स्थानभ्रष्ट – भरकटणारे, निवाला – तृप्त झाला/समाधान पावला)

विवेचन : साधकाच्या अंगी कोणते गुण असावेत किंवा हे गुण त्याने कसे विकसित करावेत हे समर्थ या श्लोकात आपल्याला सांगताहेत. आपल्याला आपल्या धर्मात किंवा घरात परंपरेने चालत आलेले जे स्नानसंध्यादि कर्म आहे, ते निष्ठापूर्वक म्हणजेच संपूर्ण श्रद्धेने करायला हवे. त्याचप्रमाणे सद्गुरूंनी नामस्मरण आदी गोष्टींचा जो उपदेश आपल्याला दिलेला असेल, त्याचेही नियमितपणे पालन करणे आवश्यक आहे. स्नानाने आपल्या शरीराला स्नान घडते तर संध्या आपल्या मनाला स्नान घालते. अलीकडे या गोष्टींची कर्मकांड म्हणून जी हेटाळणी केली जाते, ती परमार्थ मार्गात बाधक ठरते. या गोष्टी नियमितपणे करण्याचे वळणच मनाला आणि शरीराला लावून घ्यायला हवे. घरात जर थोडे कर्मठ वातावरण असेल तर त्याचा फायदा असे वळण लागण्यासाठी फार उपयोगी पडतो. घरातूनच असे संस्कार मुलांवर होतात.

आज मोबाईल, टीव्ही यांच्यासारखी अनेक मनोरंजनाची साधने सर्वांना उपलब्ध झाली आहेत. समाजमाध्यमे आहेत. यातून बऱ्याचदा चांगले कमी आणि वाईट गोष्टीच जास्त डोळ्यासमोर येतात. ते सगळे पाहून आणि समाजातील लोकांचे नको ते आचरण पाहून आपले मन भरकटण्याचा म्हणजेच समर्थांच्या शब्दात स्थानभ्रष्ट होण्याचा मोठा धोका असतो. आजकाल समाजात वाटेल ते खाणे, वाटेल त्या वेळी खाणे, मन मानेल तसे वागणे याबद्दल लोक विधिनिषेध बाळगताना दिसत नाहीत. तात्पर्य, स्थानभ्रष्टता मोठ्या प्रमाणावर बोकाळली आहे. तिला आवर घालायचा असेल तर विवेक हवा. विवेक म्हणजे योग्यायोग्यतेची जाणीव होऊन योग्य गोष्टी करणे, अयोग्य गोष्टी कितीही आकर्षक वाटल्या तरी त्या करायचे टाळणे. यासाठी मनावर नियंत्रण ठेवण्याची सवय करावी लागते. एखादी गोष्ट वारंवार केली तर तिची सवय लागते. वाईट गोष्टींची सवय लागायला वेळ लागत नाही. चांगल्या गोष्टींची सवय मात्र जाणीवपूर्वक लावावी लागते.

ज्याला साधनामार्गावर वाटचाल करायची आहे अशा व्यक्तीच्या मनात केवळ मनुष्यच नव्हे तर सर्व प्राणिमात्रांबद्दल दया किंवा करुणाभाव हवा. आपल्याप्रमाणेच त्यांच्यातही परमेश्वराचा अंश आहे, याची जाणीव हवी. संत एकनाथांनी तृषार्त गाढवाला दुरून आणलेल्या गंगेच्या कावडीतील पाणी पाजले होते. सर्व प्राणिमात्रांबद्दलचा हा समत्वभाव संतांमध्ये आपल्याला विशेष करून दिसते. तुकाराम महाराज म्हणतात, ‘ दया तिचे नाव, सर्व भुतांचे पाळण आणिक निर्दालन कंटकांचे. ‘ हाच ‘ धर्म नीतीचा व्यवहार ‘आहे. सर्वांबद्दल प्रेम असणाऱ्या माणसाच्या मनातच ईश्वराबद्दल भक्तिभाव उत्पन्न होतो. आपल्या आणखी एका अभंगात तुकाराम महाराज म्हणतात, ” मृदू सबाह्य नवनीत, तैसे सज्जनांचे चित्त. ‘ ज्या चित्तात अशी मृदुता, प्रेमळपणा असेल आणि ईश्वराबद्दल भक्तिभाव असेल, असे चित्त समाधानी असते. तेच समर्थ आपल्याला या श्लोकात सांगतात.

स्वसंवाद 

१. रोजच्या धावपळीत शरीराच्या स्वच्छतेसोबतच, माझे मन शुद्ध आणि शांत ठेवण्यासाठी मी संतांनी सांगितलेल्या ‘संध्या’ किंवा नामस्मरणाचा आश्रय नित्यनेमाने घेतो का?

२. मोबाईल, इंटरनेट आणि समाजमाध्यमांच्या प्रभावामुळे माझे मन संसाराच्या नको त्या आकर्षणात ‘स्थानभ्रष्ट’ (भरकटत) होत असताना, मी त्याला विवेकाने आवर घालण्याचा प्रयत्न करतो का?

३. तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे माझे चित्त लोण्यासारखे ‘मृदू सबाह्य नवनीत’ आहे का? माझ्या मनात घरातील माणसांबद्दल, प्राणिमात्रांबद्दल आणि हाताखालील लोकांबद्दल खरी दया आणि करुणा आहे का?

४. बाह्य जगात आनंद आणि समाधान शोधण्याऐवजी, मी कधी आंतरिक ‘भक्तिभावाने’ मनाची तृप्ती किंवा समाधान अनुभवण्याचा प्रयत्न केला आहे का?

– क्रमशः श्लोक १०५ आणि १०६

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ त्या बिल्वपत्रातील एक पान…! – लेखिका : कल्याणी केळकर बापट ☆ प्रस्तुती : गौरी गाडेकर ☆

गौरी गाडेकर

 

? इंद्रधनुष्य ?

☆ त्या बिल्वपत्रातील एक पान…! – लेखिका : कल्याणी केळकर बापट ☆ प्रस्तुती : गौरी गाडेकर

आचार्य प्र. के. अत्रे 

तेरा ऑगस्ट. ही तारीख जणू साहित्यिकांसाठीच फुरसतीने काढलेली खास तारीख. ह्या दिवशी साहित्यातील रथी महारथी म्हणून प्रसिद्धीस पावलेले प्र. के. अत्रे, विश्राम बेडेकर आणि बालकवी ठोंबरे ह्यांची प्रकर्षाने आठवण करणारी तारीख. ह्या साहित्यातील बिल्वपत्राची जयंती 13 ऑगस्ट लाच. ह्या तिघांवर ही एकाच पोस्ट मध्ये लिहायला गेल तर ती पोस्ट न होता पुस्तकच होईल. म्हणून आज फक्त अत्र्यांविषयी.

 बरेचदा असं म्हंटल्या जातं, असं समजल्या जातं की सहवासाने प्रेम लाभतं, अनुभवातून आवड निर्माण होते त्यामुळे आपल्याला आपल्या काळात असणा-या कलाकारांबद्दल प्रेम वाटतं, आपल्याला त्यांच्या कलाकृती आवडतात. मग कधीतरी लक्षात येत आपल्या आधीही खूप चांगल्या कलाकृती घडून गेलेल्या आहेत, खूप चांगले व्यक्तीमत्व घडलेले आहेत फक्त त्या व्यक्तीमत्वांचा, त्यांच्या कलाकृतींचा आपला अभ्यास नसल्याने, त्यांच्या कलाकृतींची आपल्याला नीट ओळख न झाल्यामुळे त्याविषयी आपली आवड ही विकसीत झालेली नसते.

असेच एक झुंजार, अफलातून व्यक्तीमत्व म्हणजे प्रल्हाद केशव अत्रे. बरोबर माझ्या जन्माआधी एक वर्ष हे इहलोकीला गेलेले. त्यामुळे ह्यांच्याविषयीच्या, ह्याच्या लेखनाविषयीच्या सगळ्या गोष्टी वडीलधाऱ्या मंडळींकडून ऐकायला मिळायच्या किंवा ह्यांच्या लेखनातून उलगडत जायच्या. आचार्य अत्रे नेहमी म्हणायचे गडकरी नसते तर त्यांची जडणघडण झाली नसती आणि तात्यासाहेब कोल्हटकर नसते तर गडकरी घडले नसते. आज आचार्यांची जयंती. दर्जेदार साहित्य म्हणजे नेमकं काय हे ह्या सगळ्या लेखक मंडळींनी आपल्याला त्यांच्या साहित्यातून दाखवून दिलं.

कल्याणी केळकर बापट

प्र. के अत्रे ह्या बहुआयामी व्यक्तीमत्वाचे अवघ्या काही शब्दांत वर्णन म्हणजे अशक्यप्राय गोष्ट. अत्रे म्हणजे एक मराठीतील अष्टपैलू साहित्यिक, एक हाडाचे शिक्षणतज्ञ, एक दर्दी चित्रपटनिर्माते, एक बेडर वृत्तपत्रकार, एक घणाणते वक्ते आणि एक धुरंधर नेते. इतक्या सगळ्या गोष्टी एक एक करीत एकाच व्यक्तीत एकवटल्या असतील तर खरच ते व्यक्तीमत्व “झाले बहुत होतील बहूत परि ह्या सम हाच “ह्या प्रकारचे. त्यांना जाणणारे लोक म्हणायचे अत्रे म्हणजे गडगडाट, कर्दनकाळ आहेत.

आचार्यांचा जन्म सासवड (जिल्हा पुणे) ह्या गावचा. सासवड, पुणे, मुबंई व लंडन या ठिकाणी बी. ए. , बी. टी. , टी. डी. पर्यंत शिक्षण. नंतर पुण्यातील कँप एज्युकेशन सोसायटीच्या शाळेत प्रथम शिक्षक व पुढे प्राचार्य म्हणून काम केले. शिक्षणक्षेत्रानंतर पुढील पाऊल राजकारणात. पुण्याच्या नगरपालिकेचे काही काळ ते सदस्य होते. जवळपास १९३३ पासून त्यांनी नाट्यक्षेत्रात व पुढे चित्रपटसृष्टीतही शिरकाव केला. १९३९ नंतर मुंबईला स्थलांतर केल्यानंतर त्यांनी पत्रकारिता ह्या क्षेत्राशी नाते जोडून साप्ताहिक नवयुगपासून त्यांनी ह्याची सुरवात केली आणि नंतर मात्र अखेरपर्यंत ते वृत्तपत्रक्षेत्रातच राहिले.

त्यांनी प्रथम ‘मकरंद’ व नंतर ‘केशवकुमार’ या टोपणनावांनी काव्यलेखन केले. झेंडूची फुले हा त्यांच्या विनोदी व विबंडन-कवितांचा संग्रह. त्यात जुन्या वळणांच्या कवींचे व त्यांच्या कविता यांतील लकबांचे व वैगुण्यांचे विडंबन केलेले आहे.

नाटककार अत्रे घडल्याचा प्रभाव त्यांची साष्टांग नमस्कार, भ्रमाचा भोपळा व लग्नाची बेडी ही नाटके बघितल्यानंतर आपल्याला लगेच जाणवतो. घराबाहेर व उद्याचा संसार ही त्यांची विशेष गंभीर व सामाजिक समस्यात्मक नाटके आहेत.

.. १९६० नंतरच्या दुसऱ्या कालखंडातील त्यांची महत्त्वाची नाटके म्हणजे “तो मी नव्हेच”, “डॉक्टर” ही होत. सत्यसृष्टीतील खळबळजनक घटनांवर ती आधारलेली आहेत.

त्यांच्या लेखनात चरित्रं, प्रवासवर्णने, श्रध्दांजलीपर लेख, वृत्तपत्रीय लेख, साहित्यविषयक लेख, विविध भाषणं तसेच शालेयविषयक अभ्यासक्रमासाठी लिहीलेले लेख ह्यांचा समावेश आहे. महात्मा फुले, पंडित जवाहरलाल नेहरूंवरील सूर्यास्त, समाधीवरील अश्रू, केल्याने देशाटन, अत्रे उवाच, ललित वाङ्‌मय, हशा आणि टाळ्या ही त्यांची काही उल्लेखनीय पुस्तके होत. त्यांच्या नवयुग वाचनमाला व सुभाष वाचनमाला यांनी-विशेषत: पहिल्या मालेने-मराठी भाषासाहित्यविषयक शालेय पाठ्यपुस्तकाचा मराठीत एक आदर्शच निर्माण केला. मी कसा झालो? हे त्यांचे वाङ्‌मयीन आत्मशोधन होय. अत्र्यांनी आपले संपूर्ण जीवन खूप कल्पकतेने लिहून त्यास मराठी आत्मचरित्रपर साहित्यात विशेष महत्वाचे स्थान मिळवून दिले. कऱ्हेचे पाणी या पाच खंडांतील विस्तृत आत्मचरित्रात आपली जीवनकथा त्यांनी सांगितली आहे.

अत्र्यांच्या स्वतंत्र वृत्तपत्रव्यवसायाचा आरंभ साप्ताहिक नवयुगपासून झाला. गडकरी विशेषांक व दिवाळी अंकाच्या संपादनाची धुरा ह्यांनी समर्थपणे सांभाळली. त्यांनी जयहिंद नावाचे सायंदैनिक व तुकाराम नावाचे साप्ताहिक त्यांनी सुरू केले. परंतु स्वतःच्या अपत्याप्रमाणे त्यांनी स्वतः सुरू केलेल्या दैंनिक मराठा चे ते अखेरपर्यंत संपादक राहिले.

१९४४ मध्ये समीक्षक मासिकाच्या गडकरी विशेषांकाचे व दिवाळी अंकाचे संपादनही त्यांनी केले. १९४७–१९४८ या वर्षांत जयहिंद नावाचे एक सायंदैनिकही त्यांनी चालविले. तुकाराम नावाचे साप्ताहिकही त्यांनी काढले होते. दैनिक मराठाचे ते अखेरपर्यंत संपादक होते.

हे सगळे करतांनाच त्यांनी आपला मोर्चा चित्रपटांकडे वळविला व चित्रपट निर्मिती सुरू केली. धर्मवीर, प्रेमवीर, ब्रह्मचारी व ब्रँडीची बाटली हे त्यांचे काही लोकप्रिय चित्रपट होत. त्यांच्या श्यामची आई या चित्रपटास राष्ट्रपतींचे सुवर्णपदक व महात्मा फुले या चित्रपटास रौप्यपदक मिळाले.

लोकांनी उचलून धरलेली त्यांची खासियत ही खरी वक्तृत्व व वृत्तपत्र क्षेत्रात. त्यांचे वक्तृत्व हशा व टाळ्या यांनी गाजत असे.

नाशिक येथे १९४२ मध्ये भरलेल्या सत्ताविसाव्या महाराष्ट्र साहित्य-संमेलनाचे ते अध्यक्ष होते. अडतिसावे नाट्यसंमेलन, दहावे मराठी पत्रकार-संमेलनआणि बडोदे, इंदूर व ग्वाल्हेर येथील प्रादेशिक साहित्यसंमेलने यांची अध्यक्षपदेही त्यांनी भुषविली होती.

अशा ह्या हरहुन्नरी, विवीध क्षेत्रात निपुण असलेल्या अवलियाचे मुंबई येथे 13 जून 1969 ला निधन झाले. त्यांना त्यांच्या जयंतीदिनी विनम्र श्रध्दांजली.

 

लेखिका : कल्याणी बापट (केळकर)

बडनेरा, अमरावती,  9604947256

प्रस्तुती : गौरी गाडेकर

संपर्क – 1/602, कैरव, जी. ई. लिंक्स, राम मंदिर रोड, गोरेगाव (पश्चिम), मुंबई 400104.

फोन नं. 9820206306

≈संस्थापक  संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ म्हातारपण: हे समजून घ्या… लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री सुनीत मुळे ☆

श्री सुनीत मुळे

? वाचताना वेचलेले ?

☆ म्हातारपण: हे समजून घ्या… लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – श्री सुनीत मुळे 

म्हातारपणात एकटे पडू नका आणि कोणावरही ओझे बनू नका. यासाठी या गोष्टी आतापासूनच नक्की समजून घ्या.

१ :- जमिनीच्या भानगडीत पडू नका.

फक्त “शेजाऱ्याला धडा शिकवण्यासाठी” आपले आयुष्य कोर्ट-कचऱ्यांच्या पायऱ्यांवर वाया घालवू नका. कदाचित खटला संपण्यापूर्वीच तुम्ही जग सोडून जाल. आणि जर लढून जमीन जिंकलीच, तर तिथे तुम्ही नाही—वकीलच राहतील.

२ :- जुन्या गाड्या ओझे बनू शकतात.

पाच लाखांचा फायदा होत आहे, असा विचार करून जुन्या गाड्या घरी आणू नका. जर गाडी रस्त्यापेक्षा जास्त वेळ गॅरेजमध्ये उभी राहत असेल, तर हृदयविकाराचा झटका गाडीला नाही—तुम्हाला येईल.

 ३ :- आपली संपत्ती हस्तांतरित करण्याची घाई करू नका.

आज जरी मुले ‘देवासारखी’ वाटत असली, तरी एकदा सर्व संपत्ती त्यांच्या नावावर केली, तर त्याच घरात तुम्ही ‘नकोशी वस्तू’ बनू शकता. मुले वाईट नसतात, पण जग निर्दयी आहे. शेवटच्या श्वासापर्यंत काही ना काही आपल्या नावावर नक्की ठेवा.

४ :- आपली शेवटची बचत सुरक्षित ठेवा.

३० वर्षांच्या कमाईतून बनलेली पेन्शन मुलांच्या व्यवसायात गुंतवू नका. शेवटी औषधोपचारासाठी तुम्हाला त्याच मुलांसमोर हात पसरवावे लागतील.

५ :- मुलांच्या घरात चिकटून राहू नका.

फक्त ‘ती आपली मुले आहेत’ असे म्हणून त्यांच्या वैयक्तिक आयुष्यात हस्तक्षेप करू नका. जास्त जवळिकीने तुमचे प्रेम त्यांच्यासाठी ओझे बनू शकते. स्वतःसाठी एक छोटीशी जागा बनवा आणि स्वतंत्र आयुष्य जगा.

६ :- तीर्थयात्रेसाठी मुलांची वाट पाहू नका.

‘जेव्हा त्यांना सुट्टी मिळेल तेव्हा ते मला नेतील’, असा विचार करून प्रतीक्षा करू नका. जेव्हा त्यांना वेळ मिळेल, तेव्हा कदाचित तुम्ही चालण्याच्याही स्थितीत नसाल. जोपर्यंत ताकद आहे, तुमच्या आवडत्या ठिकाणी जा—मग एकटेच का असेना.

७ :- आज जे खाण्याची इच्छा असेल, तेच खा.

तुमच्या जोडीदाराला (पती/पत्नीला) आजच त्यांच्या आवडीची गोष्ट खाऊ घाला. खाण्याची थाळी घेऊन स्मशानात रडत म्हणणे—“त्यांना हे खूप आवडायचे”—फक्त दिखावा आहे.

 ८ :- स्वतःसाठी आरामाची व्यवस्था करा.

मृत्यूच्या दिवसापर्यंत कामाचा डोंगर उपसत बसू नका. जर तुम्ही सकाळपासून रात्रीपर्यंत फक्त धावतच राहिलात, तर शेवटी काहीही जिंकलेले नसेल. आपल्या शरीराला हवा असलेला आराम द्या.

९ :- झोपेपेक्षा मोठे कोणतेही औषध नाही.

अकारण येणारा निद्रानाश कमी करा आणि शांतपणे झोपा. जेव्हा तुम्ही आजारी पडाल, तेव्हा कोणीही तुमचे दुःख वाटून घेण्यासाठी येणार नाही—ते तुम्हाला एकट्यालाच सहन करावे लागेल.

 १० :- हे कधीही विसरू नका की तुम्ही एकटेच आला आहात.

ही अपेक्षा कमी करा की कोणीतरी तुमच्यासाठी सर्व काही करेल. एक दिवस तुमची सावलीही तुमची साथ सोडून जाईल. मृत्यूही एकटाच असतो—त्यामुळे एकटे राहणे आनंदाने शिका.

आनंद अशी कोणतीही गोष्ट नाही जी कोणी तुम्हाला देईल; आनंद अशी गोष्ट आहे जो तुम्हाला स्वतःच निर्माण करावा लागतो.

जेव्हा तुमचे पती/पत्नी निरोगी असतील, तेव्हा लहान-मोठे प्रत्येक काम स्वतः करायला शिकण्यात अजिबात संकोच करू नका.

तुम्ही जरी वसीयत (मृत्युपत्र) लिहिली असली, तरी ती बदलण्याचा संपूर्ण अधिकार तुमच्याकडे आहे—हे लक्षात ठेवा.

जर वारसदार तुम्हाला त्रास देत असतील किंवा परेशान करत असतील, तर लक्षात ठेवा—आज कायदा आणि जिल्हा प्रशासन तुमच्या पाठीशी आहे.

रोज चालण्याची सवय ठेवा आणि जर जुने मित्र किंवा नातेवाईक असतील, तर त्यांच्याशी तुमच्या तरुणपणाच्या आठवणी नक्की शेयर करा.

नेहमी लक्षात ठेवा की एक दिवस जीवनाचा हिसाब पूर्ण होईल; त्या शेवटच्या दिवसासाठी मानसिकदृष्ट्या तयार राहा.

शेवटी, हे जाणून की तुम्ही काहीही सोबत नेणार नाही—सर्वांच्या सोबत प्रेम आणि मित्रत्वाने वागा, गरजवंतांना मदत करा आणि स्वतःला एक चांगला माणूस बनवा…

लेखक : अज्ञात 

प्रस्तुती – श्री सुनीत मुळे

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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