हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१५ ☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख महाभारत नहीं रामायण। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१५ ☆

☆ महाभारत नहीं रामायण… ☆

‘जब तक सहने की चरम सीमा रहेगी, रामायण लिखी जाएगी। मांगा हक़, जो अपने हित में महाभारत हो जाएगी।’ जी हाँ! यही सत्य है जीवन का, जो सदियों से धरोहर के रूप में सुरक्षित है। इसलिए नारी को सहन करने की शिक्षा दी जाती है, क्योंकि मौन सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम निधि है। वैसे तो यह सबके लिए वरदान है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों ने मौन रहकर व चित्त को एकाग्र कर अपने अभीष्ठ को प्राप्त किया है और जीव-जगत् व आत्मा-परमात्मा के रहस्य को जाना है। जब तक आप में सहन करने की शक्ति व त्याग करने का सामर्थ्य है; परिवारजन व संसार के लोग आपको सहन करते हैं, अन्यथा जीवन से बेदखल करने में पल-भर भी नहीं लगाते। विशेष रूप से नारी को तो बचपन से यह शिक्षा दी जाती है, ‘तुम्हें सहना है, कहना नहीं’ और वह धीरे-धीरे उसे जीने का मूलमंत्र बना लेती है तथा पिता, पति व पुत्र के आश्रय में सदैव मौन रहकर अपना जीवन बसर करती है।

वास्तव में नारी धरा की भांति क्षमाशील व सहनशील है; गंगा की भांति निर्मल व निरंतर गतिशील है; पापियों के पाप धोती है; पर्वत की भांति अटल है, परंतु कभी उफ़् नहीं करती। इसी प्रकार नारी भी ता-उम्र सबके व्यंग्य-बाणों के असंख्य भीषण प्रहार व ज़ुल्म हंसते-हंसते सहन करती है… यहां तक कि वह कभी भी अपना पक्ष रखने का साहस  नहीं जुटा पाती। वैसे तो पुरुष वर्ग द्वारा यह अधिकार नारी-प्रदत्त हैं ही नहीं। सो! वह दोयम दर्जे की प्राणी समझी जाती है– एक हाड़-मांस की जीवित प्रतिमा, जिसे दु:ख-दर्द होता ही नहीं, क्योंकि उसका मान-सम्मान नहीं होता। इसलिए आजीवन कठपुतली की भांति दूसरों के इशारों पर नाचना उसकी नियति बन जाती है। वह आजीवन समस्त दायित्व-वहन करती है; उसी आबोहवा में स्वयं को ढाल लेती है; दिन-भर घर को सजाती-संवारती व व्यवस्थित करती है और वह उस अहाते में स्वयं को सुरक्षित अनुभव करती है। बच्चों को जन्म देकर ब्रह्मा व उनकी परवरिश कर विष्णु का दायित्व निभाती है और उसके एवज़ में उसे उस घर में रहने का अधिकार प्राप्त होता है; जिसे वह कभी अपना कह ही नहीं सकती। यदि वह संतान को जन्म देने में असमर्थ रहती है, तो बाँझ कहलाती है और उससे उस घर में रहने का अधिकार भी छीन लिया जाता है, क्योंकि वह वंश-वृद्धि नहीं कर पाती। परिणाम-स्वरूप पति के पुनः विवाह की तैयारियां प्रारंभ की जाती हैं। इस स्थिति में साक्षर-निरक्षर का भेद नहीं किया जाता है… भले ही वह अपने पति से अधिक धन कमा रही हो; अपने सभी दायित्वों को सहर्ष वहन कर रही हो। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना…जहां एक शिक्षित नौकरीशुदा महिला को केवल बाँझ कह कर ही तिरस्कृत नहीं किया गया; उसे पति के विवाह में जाने को भी विवश कर लिया गया, ताकि उसकी मांग में सिंदूर व गले में मंगलसूत्र धारण करने का अधिकार कायम रह सके और उसे विवाहिता के रूप में उस छत के नीचे रहने का अधिकार प्राप्त हो सके। परंतु एक अंतराल के पश्चात् घर में बच्चों की किलकारियां गूंजने के पश्चात् घर- आँगन महक उठा और वह खुशी से अपना पूरा वेतन घर में खर्च करती रही। धीरे-धीरे उसकी उपस्थिति नव-ब्याहता को अखरने लगी और वह उस घर छोड़ने को विवश हो गयी। परंतु फिर भी वह मांग में सिंदूर धारण कर पतिव्रता नारी होने का स्वांग रचती रही। है न यह उसके प्रति अन्याय…. परंतु उस पीड़िता को सब मूर्ख समझते हैं, जिसने घर फूंक कर तमाशा देखा है। इसलिए उसके पक्ष में कोई भी आवाज़ नहीं उठाता।

सो! जब तक सहनशक्ति है, आपकी प्रशंसा होगी और रामायण लिखी जाएगी। परंतु जब आपने अपने हित में हक़ मांग लिया, तो महाभारत होना निश्चित है। वैसे भी अधिकारों की मांग करना–संघर्ष का आह्वान करना है और संघर्ष से महाभारत हो जाता है और जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं रहता। राजनीति हो या धर्म; घर-परिवार हो या समाज; हर जगह इसका दबदबा कायम है। राजनीति तो सबसे बड़ा अखाड़ा है, परंतु आजकल तो सबसे अधिक झगड़े धर्म के नाम पर होते हैं। 

घर-परिवार में भी अब इसका पूर्ण हस्तक्षेप है। पिता-पुत्र, भाई-भाई व पति-पत्नी के जीवन से स्नेह-सौहार्द इस प्रकार नदारद है, जैसे चील के घोंसले से माँस। जहां तक पति-पत्नी का संबंध है, उनमें समन्वय व सामंजस्य है ही नहीं… वे दोनों एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपना क़िरदार निभाते हैं, जिसका मूल कारण है अहं; जो मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसी कारण वे आजकल एक-दूसरे के अस्तित्व को भी नहीं स्वीकारते; जिसका परिणाम अलगाव व तलाक़ के रूप में हमारे समक्ष है। वैसे भी आजकल संयुक्त परिवार-व्यवस्था का स्थान एकल परिवार- व्यवस्था ने ले लिया है, परंतु फिर भी पति-पत्नी आपस में प्रसन्नता से अपना जीवन बसर नहीं कर पाते और एक-दूसरे से निज़ात पाने में लेशमात्र भी संकोच नहीं करते। वैसे भी आजकल ‘तू नहीं, और सही’ का बोलबाला है। लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे हैं, जिसका मूल कारण ‘लिव-इन व प्रेम विवाह’ है। अक्सर बच्चे भावावेश में संबंध तो स्थापित कर लेते हैं और चंद दिन साथ रहने के पश्चात् एक-दूसरे की कमियाँ-ख़ामियाँ उजागर होने लगती हैं; जिन्हें वे स्वीकार नहीं पाते और परिणाम होता है तलाक़–जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा बच्चों को भुगतना पड़ता है। वैसे आजकल सिंगल पेरेंट का प्रचलन भी बहुत बढ़ गया है। सो! इन विषम परिस्थितियों में बच्चों का सर्वांगीण विकास कैसे संभव है? एकांत की त्रासदी झेलते बच्चों का भविष्य अंधकारमय हो जाता है। वे असामान्य हो जाते हैं; सहज नहीं रह पाते और वह सब दोहराते हुए अपना जीवन नरक-तुल्य बना लेते हैं। 

ग़लत लोगों से अच्छी बातों की अपेक्षा कर हम आधे ग़मों को प्राप्त करते हैं और आधी मुसीबतें हम अच्छे लोगों में दोष ढूंढ कर प्राप्त करते हैं। ग़लत साथी का चुनाव करके हम अपने जीवन के सुख-चैन को दाँव पर लगा देते हैं और दोष-दर्शन हमारा स्वभाव बन जाता है, जिसके परिणाम- स्वरूप हमारा जीवन जहन्नुम बन जाता है। आजकल लोग भाग्य व नियति पर कहाँ विश्वास करते हैं? वे तो स्वयं को भाग्य-विधाता समझते हैं और यही सोचते हैं कि उनसे अधिक बुद्धिमान संसार में कोई दूसरा है ही नहीं। इस प्रकार वे अहंनिष्ठ प्राणी पूरे परिवार की जीवन भर की खुशियों को लील जाते हैं। संदेह व अविश्वास इसके मूल कारक होते हैं। सो! समाज में शांति कैसे व्याप्त रह सकती है? इसलिए बीते हुए कल को याद करके उससे प्राप्त सबक़ को स्मरण रखना श्रेयस्कर है। मानव को अतीत का स्मरण कर अपने वर्तमान को दु:खमय नहीं बनाना चाहिए, बल्कि उससे सीख लेकर अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाना चाहिए। जीवन में सफलता पाने का मूलमंत्र यह है कि ‘उस लम्हे को बुरा मत कहो, जो आपको ठोकर पहुँचाता है; बल्कि उस लम्हे की कद्र करो, क्योंकि वह आपको जीने का अंदाज़ सिखाता है। दूसरे शब्दों में अपनी हर ग़लती से सीख गहण करें, क्योंकि आपदाएं आपके धैर्य की परीक्षा लेती हैं और मज़बूत बनाती हैं। सो! ग़लती को दोहराओ मत। जो मिला है, उन परिस्थितियों को उत्तम बनाने की चेष्टा करो; न कि भाग्य को कोसने की। हर रात के पश्चात् सूर्योदय अवश्य होता है और अमावस के पश्चात् पूनम का आगमन भी निश्चित है। जीवन में आशा का दामन कभी मत छोड़ें, क्योंकि गया वक्त लौटकर कभी नहीं आता। हर पल को सुंदर बनाने का प्रयास करें। जीवन में सहन करना व त्याग करना सीखें, क्योंकि अगली सांस लेने के लिए मानव को पहली सांस का त्याग करना पड़ता है। संचय की प्रवृत्ति का त्याग करें। इंसान खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ ही इस संसार से लौट जाना है। सो! सदाशयता को अपनाएं और दूसरों के प्रति कर्तव्यनिष्ठता का भाव रखें, क्योंकि कर्त्तव्य व अधिकार अन्योन्याश्रित हैं। अधिकार-स्थापत्य अशांति- प्रदाता है, जो हृदय का सुक़ून छीन लेता है। इसलिए उसे अपने जीवन से बाहर का रास्ता दिखा दें, ताकि हर घर में रामायण की रचना हो सके। पारस्परिक ईर्ष्या-द्वेष व संघर्ष को जीवन में पदार्पण मत करने दें, क्योंकि ये महाभारत के जनक हैं, प्रणेता हैं। सो! अलौकिक आनंद से अपना जीवन बसर कर लें।                   

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८७ – गीत – राम अवतार… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतराम अवतार

? रचना संसार # ८७ ☆

☆  गीत – राम अवतारसुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

 

पावन नवमीं चैत्र की, लिए राम अवतार।

कौशल्या बलिहार हैं, होती जयजयकार।।

*

मंगल गाते देवता, नभ बरसाते फूल।

सुर नर मुनि व्याकुल बड़े, मिले चरण की धूल।।

छवि मनहर शिशुराम की, दशरथ देख निहाल।

नमन करें जन-जन उन्हें, अवध पुरी के लाल।।

ढ़ोल नगाड़े बज रहे, सजते तोरण द्वार।

पावन नवमीं चैत्र की, लिए राम अवतार।।

*

भक्तों को हैं तारते, रखते हृदय विशाल।

दानव को हैं मारते, दुष्टों के हैं काल।।

जगतारक प्रभु राम हैं, जपिए प्रभु अभिराम।

जनक लली के नाथ हैं, दशरथ नंदन राम।।

जग के पालनहार हैं, महिमा अपरम्पार।

पावन नवमीं चैत्र की, लिए राम अवतार।।

*

नार अहिल्या तारते, धर्म परायण राम।

दीनदयाल कृपाल हैं, भक्ति करो निष्काम।।

राम नाम का जप करो, भक्तों आठों याम।

अवध नाथ रघुनाथ को, शत -शत करूँ प्रणाम।।

भक्तों की रक्षा करें, दुष्टों का संहार।

पावन नवमीं चैत्र की, लिए राम अवतार।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – हरापन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – हरापन ? ?

शादी-ब्याह में

हरी साड़ी

हरी चूड़ियाँ

यहाँ तक कि

अंतिम प्रयाण में भी

हरे वस्त्र,

महत्वपूर्ण है

स्त्री का हरा होना

हरा रहना..,

 

हरी घास

हरी पत्तियाँ

हरे पेड़

हरी काई

प्रकृति की

अक्षत सौंध है

हरा होना..,

 

पेड़-पत्तियाँ

निर्दय संहार के

शिकार हैं

पानी के अभाव में

काई पर

भ्रूण हत्या की मार है..,

 

मखमली घास पर

बलात लाद दी गई हैं

हजारों टन की इमारतें..,

 

चैनल बता रहे हैं

तलाक में

साढ़े तीन सौ

प्रतिशत की वृद्धि

लिव-इन

सिंगल पेरेंट

बलात्कार

विकृत यौन अत्याचार

और भी बहुत कुछ वीभत्स..,

 

दम जैसे

घुट-सा रहा है

हरापन हमसे

छूट-सा रहा है।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ आपदां अपहर्तारं साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी।  🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – पुस्तक चर्चा ☆ अब पछताये होत का (काव्य संग्रह) – डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

श्री यशोवर्धन पाठक

☆ पुस्तक चर्चा ☆ अब पछताये होत का (काव्य संग्रह) – डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी ☆ समीक्षा – श्री यशोवर्धन पाठक ☆

(26 मार्च जन्म दिवस के अवसर पर विशेष )

आज जब मैं प्रतिष्ठित साहित्यकार और शिक्षाविद डॉ. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी की चर्चित काव्य कृति अब पछताये होत का को गंभीरता से पढ़ने के बाद उस पर कुछ लिखने बैठा हूं तो मुझे इस कृति की शुरुआत में साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश शासन के निदेशक डॉ. विकास दवे की यह बात काफी प्रभावित कर रही है कि इस संग्रह की सबसे अच्छी बात  है रचनाओं के मनुष्य जीवन से सरोकार, उस पर सोने पर सुहागा यह कि वे आत्यांतिक मानवीय चिंतन प्रक्रिया से उपजे हैं। ये इस संग्रह की दो सशक्त भुजाएं हैं। डा. विकास दवे जी की ये प्रतिक्रिया कृति की उपयोगिता और पठनीयता को उजागर करती हैं। दवे जी लिखते है कि अभिजात जी लम्बे समय से लेखन के  क्षेत्र में सक्रिय हैं । आपकी रचनाओं के विषय चयन और प्रस्तुतियां पाठकों को लुभाएगें ।कृति की काव्य रचनाओं का अध्ययन और उस पर मनन करने के बाद पाठकों को उपरोक्त प्रतिक्रिया पूर्ण रूप से सही लगेगी ।  अब पछताऐ होत का संग्रह में  कवि की सार्थक सोच के अनुसार राष्ट्रीय, सामाजिक और पारिवारिक परिवेश की ऐसी कविताएं शामिल हैं जो कि सुधार वादी दृष्टिकोण को लेकर विभिन्न वर्गों के लिए प्रेरक संदेश देती नजर आती हैं ।इस कृति की एक विशेषता यह भी है कि इसमें त्रिपाठीजी ने पाठकों की पसंद का पूरी तरह ध्यान रखा है और काव्य रचनाओं को तीन भागों में विभाजित करके शामिल किया है याने संग्रह में गीत, ग़ज़ल और दोहे तीनों ही पाठक वर्ग को पढ़ने को मिल सकते हैं।  ये रचनाएं पढ़ने के बाद पाठक वर्ग भी इस बात को सहर्ष स्वीकार करेगा कि ये रचनाएं पठनीय और प्रभावी तो हैं ही साथ में प्रोत्साहन और प्रेरणा के लिए भी महत्वपूर्ण हैं ।इस संग्रह का  शुभारंभ कवि ने राष्ट्रीय भावना से ओत-प्रोत अपने एक मुक्तक से किया है जो कि पाठकों को प्रेरित भी करेगा और प्रभावित भी –

—–

जिनने अपना लहू लुटाया

उनको शीश झुकाने आये

कविताओं के शंखनाद से

सोया मुल्क जगाने आये

रात नहीं काले बादल का

छाया घुप्प अंधेरा है

सारे भारत वासी जागो

हम ये बात बताने आये

—–

संघर्ष की धूप में तपना और सुख की छांव में पलना दोनों ही को कवि जीवन की सफलता के लिए आवश्यक मानता है और उन्होंने इसे स्वीकार भी किया है –

—–

सुख और दुख दोनों साथी हैं

हमने दोनों को अपनाया

—–

मित्रता के निष्ठा पूर्वक निर्वाह को कवि ने अपने ही नजरिए से देखा है और जो महसूस किया है उसे अपनी रचना में व्यक्त भी किया है –

—–

हमने जिससे हाथ मिलाया

उसने ही दर दर भटकाया

दोस्त से बढ़ के दुश्मन अच्छा

—–

इस कृति में काव्य सृजन करने वाले डा अभिजात कृष्ण त्रिपाठी जी का हमेशा से सोचना रहा है कि अगर आम आदमी की भाषा में आम आदमी के लिए सृजन किया जाये तो वह अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रिय और पठनीय होता है। इसीलिए इस संग्रह में अधिकांश कविताएं बुंदेली भाषा में रचित की गई हैं और  ये रचनाएं इसीलिए अत्यंत रोचक और मनमोहक प्रतीत होती है।भाई श्री त्रिपाठी जी की बुंदेली भाषा में रचित कविताओं में भी  पाठकों को सार्थक संदेश ही नजर आयेगा –

—–

आईने की बात को तूं काहे झुठलात

सूरत जैसी होत है बेंसयी बौ दिखलात

—–

साहित्यिक और शैक्षणिक क्षेत्र के स्वनामधन्य प्रेरक और प्रणम्य व्यक्तित्व स्व. पंडित हरिकृष्ण जी त्रिपाठी के यशस्वी पुत्र डा. अभिजात कृष्ण त्रिपाठी का लेखन और साहित्यिक, सामाजिक और शैक्षणिक क्षेत्र में उनकी सक्रियता आज सराहना और प्रेरणा का विषय है । बुंदेली के सशक्त हस्ताक्षर श्रद्धेय श्री राज सागरी जी की ये पंक्तियां मेरे विचार से डा. अभिजात कृष्ण जी त्रिपाठी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर खरी उतरती हैं  और इन्हीं पंक्तियों में आज जन्म दिवस पर मंगल भाव व्यक्त करने के लिए भी उपयुक्त समझ रहा हूं –

—–

इल्मो अमल में राज बहुत कामयाब हूं

मेरा कोई जवाब नहीं लाजवाब हूं

पन्ने पलटते जाओ तो देखोगे दोस्तों

पढ़कर जिसे न भूल सको वो किताब हूं

—– 

© श्री यशोवर्धन पाठक

पूर्व प्राचार्य, राज्य सहकारी प्रशिक्षण संस्थान, जबलपुर

संपर्क – डा. मिली गुहा अस्पताल के पीछे, गुप्तेश्वर, जबलपुर, मोबाइल 9407059752

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१५ ☆ भावना के दोहे – श्रीराम  ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – श्रीराम )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१५ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – श्रीराम  ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

जनम लिया है अवध में, रूप सलोने राम।

आनंदित होते सभी, सरस अयोध्या धाम।।

 *

हम तो करते आपको, शत – शत करें प्रणाम।

आए हो इस धरा पर, सबके प्रभु श्री राम।।

 *

 नहीं जाति का भेद है, खाए  शबरी बेर।

राह राम की देखती, हुई नहीं है देर।।

 *

चैत्र मास नवमी हुई, महिमा प्रभु का नाम।।

हृदय सभी के बस रहे, सीता के प्रभु राम।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९७ ☆ गीत – आज नहीं तो कल होगा… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – आज नहीं तो कल होगा  आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९७ ☆

गीत – आज नहीं तो कल होगा☆ श्री संतोष नेमा ☆

आज नहीं तो कल होगा |

हर मुश्किल का हल होगा ||

लें धीरज से काम सदा |

अपना अगला पल होगा ||

आज नहीं तो कल होगा |

*

दुविधा में तुम मत रहना |

बात साफ अपनी कहना ||

रखें चरित्र सदा ऊँचा |

यह जीवन का है गहना ||

तब यह जन्म सफल होगा |

आज नहीं तो कल होगा |

*

होगी जितनी गहराई |

तभी दिखेगी सच्चाई ||

सच के मोती निकलेंगे |

हाथ लगेगी अच्छाई ||

निर्मल अन्तस्तल  होगा |

आज नहीं तो कल होगा ||

*

दृढ़ता से आगे बढ़ना

साहस का संबल रखना ||

मंजिल होगी मुट्ठी में |

तुम पुरुषार्थ सदा करना ||

निर्बल हृदय सबल होगा |

आज नहीं तो कल होगा ||

*

चिंतन की धारा गंगा।

तन-मन स्वस्थ भला चंगा।

होगा तब संतोष तुम्हें |

जीवन होगा सतरंगा।

कर्म नहीं निष्फल होगा |

आज नहीं तो कल होगा ||

हर मुश्किल का हल होगा |

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ वरिष्ठ पुरुषों में प्रोस्टेट स्वास्थ्य – एक सरल मार्गदर्शिका ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌼 वरिष्ठ पुरुषों में प्रोस्टेट स्वास्थ्य – एक सरल मार्गदर्शिका 🌼

प्रिय मित्रों, जैसे-जैसे हमारी आयु बढ़ती है, शरीर की देखभाल और भी आवश्यक हो जाती है। 50 वर्ष के बाद पुरुषों में एक सामान्य समस्या प्रोस्टेट ग्रंथि से जुड़ी होती है। आइए इसे शान्त और सरल भाषा में समझें।

🔍 प्रोस्टेट क्या है?

प्रोस्टेट पुरुषों में पाई जाने वाली एक छोटी ग्रंथि है, जो मूत्राशय (ब्लैडर) के नीचे स्थित होती है। यह प्रजनन प्रणाली का हिस्सा है। उम्र बढ़ने के साथ यह अक्सर बड़ी हो जाती है।

⚠️ प्रोस्टेट की समस्या क्यों होती है?

सबसे बड़ा कारण है बढ़ती उम्र। उम्र के साथ:

* हार्मोन में परिवर्तन होते हैं

* प्रोस्टेट धीरे-धीरे बढ़ने लगता है (इसे साधारण वृद्धि या BPH कहते हैं)

अन्य कारण:

* पारिवारिक इतिहास

* शारीरिक सक्रियता की कमी

* मोटापा

* असंतुलित आहार

👉 महत्वपूर्ण: सभी बुज़ुर्ग पुरुषों को यह समस्या नहीं होती। कई लोग पूरी ज़िंदगी बिना किसी विशेष परेशानी के रहते हैं।

📊 यह कितनी सामान्य है?

* 60 वर्ष के बाद लगभग 50% पुरुषों में प्रोस्टेट बढ़ने की समस्या होती है

* 80 वर्ष तक यह 80–90% पुरुषों में देखी जा सकती है

* लेकिन प्रोस्टेट कैंसर बहुत कम होता है

* जीवन में लगभग 10–15% पुरुषों को ही कैंसर हो सकता है

* और इनमें से भी कई मामलों में यह धीरे-धीरे बढ़ने वाला और कम खतरनाक होता है

 

🚫 मिथक या सत्य: क्या यौन सक्रियता से प्रोस्टेट की समस्या नहीं होती?

👉 सच्चाई (स्पष्ट रूप से):

कुछ शोध बताते हैं कि नियमित स्खलन (ejaculation) से प्रोस्टेट कैंसर का खतरा थोड़ा कम हो सकता है।

👉 लेकिन वास्तविकता यह है:

❌ यह पूरी तरह सुरक्षा नहीं देता

❌ यह कोई उपचार या निश्चित बचाव का उपाय नहीं है

❌ सामान्य यौन जीवन वाले लोगों में भी प्रोस्टेट की समस्या हो सकती है

✔️ इसलिए इस धारणा को अत्यधिक बढ़ा-चढ़ाकर नहीं मानना चाहिए।

⚕️ प्रोस्टेट कैंसर क्यों होता है?

कुछ पुरुषों में कोशिकाएँ असामान्य रूप से बढ़ने लगती हैं, इसके कारण:

* उम्र के साथ जीन में परिवर्तन

* हार्मोन (विशेषकर टेस्टोस्टेरोन) का प्रभाव

* पारिवारिक इतिहास

👉 अधिकांश मामलों में यह कैंसर धीरे-धीरे बढ़ता है, इसलिए समय पर जाँच और निगरानी बहुत लाभदायक होती है।

🛡️ बचाव और देखभाल – आप क्या कर सकते हैं?

🌿 स्वस्थ जीवनशैली

* रोज़ टहलना 🚶‍♂️ (30–40 मिनट)

* वजन संतुलित रखना

* अधिक फल और सब्ज़ियाँ खाना 🥦🍎

* लाल मांस और तले भोजन कम करना

* पर्याप्त पानी पीना 💧

* धूम्रपान और अधिक शराब से बचना

🧘‍♂️ सरल आदतें

* पेशाब को ज़्यादा देर तक न रोकें

* मूत्राशय को पूरी तरह खाली करें

* हल्का योग और प्राणायाम करें

💊 चिकित्सकीय देखभाल

* 50 वर्ष के बाद नियमित जाँच कराएँ (यदि परिवार में इतिहास हो तो पहले)

* डॉक्टर की सलाह से PSA जाँच

* दवाओं से वृद्धि को नियंत्रित किया जा सकता है

* कुछ मामलों में ही सर्जरी की आवश्यकता होती है

👉 समय पर जाँच = बेहतर स्वास्थ्य

😊 इन लक्षणों पर ध्यान दें (घबराएँ नहीं)

* बार-बार पेशाब आना, खासकर रात में

* पेशाब का धीमा प्रवाह

* शुरू करने में कठिनाई

* पूरा खाली न होने का अहसास

👉 ये लक्षण अक्सर साधारण वृद्धि (BPH) के होते हैं, कैंसर के नहीं।

🌸 संदेश

अधिकांश प्रोस्टेट समस्याएँ धीमी, नियंत्रित और उपचार योग्य होती हैं। सही जीवनशैली और समय पर डॉक्टर की सलाह से हम स्वस्थ और सुखद जीवन जी सकते हैं।

📢 यह जानकारी चिकित्सा विज्ञान पर आधारित है। कृपया इसे अपने मित्रों और परिजनों के साथ अवश्य साझा करें, ताकि सभी को सही जानकारी का लाभ मिल सके।

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९५५ ⇒ परीक्षा और अग्नि परीक्षा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “परीक्षा और अग्नि परीक्षा।)

?अभी अभी # ९५५ ⇒ आलेख – परीक्षा और अग्नि परीक्षा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

परीक्षा तो हम बचपन से देते आ रहे हैं। परीक्षा फल या तो पास होता है अथवा फेल। हर व्यक्ति पास नहीं होता और हर व्यक्ति फेल भी नहीं होता। सफलता और असफलता जीवन के दो आयाम हैं, जो सफल होता है, वह आगे बढ़ जाता है, और जो असफल होता है, वह थोड़ा पीछे रह जाता है। लेकिन संसार में अस्तित्व दोनों प्रकार के लोगों का हमेशा कायम रहता है, कोई जीवन में सफल है, तो कोई असफल। कोई अगर आगे बढ़ रहा है तो कोई पीछे भी छूट रहा है।

जीवन की परीक्षा में सफल होना अपने आपमें एक पुरस्कार है और असफल होना एक सबक। जो आज फेल हुआ हैं, वह कल पास भी हो सकता है।

गारंटीड सक्सेस गाइड से भी लोग जीवन में आगे बढ़े हैं और कोचिंग क्लासेस से भी। कुछ लोग परीक्षाएं पास  करके भी जीवन में सफल नहीं हो पाए और कुछ बिना पढ़े ही बाजी मार ले गए। संभावनाओं और विसंगतियों, सफलता और असफलता का नाम ही तो जिंदगी है।।

कभी कभी हमें जीवन में अग्नि परीक्षा भी देनी पड़ती है। सीता ने भी अग्नि परीक्षा दी थी। भक्त प्रह्लाद की भी एक तरह से अग्नि परीक्षा ही तो थी। अग्नि परीक्षा में सब उत्तीर्ण नहीं होते। सुकरात और मीरा दोनों ने जहर का प्याला पीया। इतिहास में दोनों अमर हैं।

जब जब भी हम अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ते हैं, वह हमारी अग्नि परीक्षा ही तो होती है। युद्ध में एक सिपाही की अग्नि परीक्षा ही तो होती है, युद्ध में जीत अगर अग्नि परीक्षा है तो युद्ध में शहीद होना भी अग्नि परीक्षा ही है। अग्नि परीक्षा में परिणाम नहीं देखा जाता, त्याग और समर्पण देखा जाता है।।

जो सच्चाई, ईमानदारी और धर्म के मार्ग पर चलते हैं, संसार उनकी अग्नि परीक्षा लेता ही रहता है।

सत्यवादी हरिश्चंद्र एक ही पैदा हुआ है, क्योंकि वह अग्नि परीक्षा में सफल हुआ। आज के युग में सत्य के मार्ग पर चलना कांटों से खेलना है। अगर आप सच के मार्ग पर निःसंकोच निडर होकर चल रहे हैं, तो मान लीजिए आप अग्नि परीक्षा ही दे रहे हैं।

झूठ फरेब, अन्याय, अत्याचार और शोषण की इस दुनिया में एक आम आदमी पल पल में अग्नि परीक्षा दे रहा है, फिर भी वह जिंदा है, क्या यह ईश्वर का चमत्कार नहीं!

आज दुनिया किताबी ज्ञान, आधुनिक विज्ञान और एक नई बीमारी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बलबूते पर ही चल रही है। आप परीक्षाएं देते रहिए, गला काट स्पर्धा में आगे बढ़ते रहिए, सफलता के परचम गाड़ते रहिए। निश्चिंत रहिए, आपको जीवन में कोई अग्नि परीक्षा नहीं देनी। वैसे भी होती क्या है अग्नि परीक्षा, गूगल सर्च तो इसे महज एसिड टेस्ट बता रहा है। यह कलयुग है, यहां परीक्षा और अग्नि परीक्षा नहीं, डिजिटल शिक्षा होती है। वैसे डिजिटल क्राइम से बचना भी किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ श्री राम ☆ सुश्री मंजिरी “निधि” ☆

सुश्री  मंजिरी “निधि”

(बड़ोदा से सुश्री  मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में  विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल  महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है आपकी कविता  श्री राम ।)

? कविता – श्री राम ☆ सुश्री  मंजिरी “निधि” ? ?

(हाकली छंद)

?

राम नाम का जाप करो

जग का ये संताप हरो l

सुबह करो या शाम करो

सदा राम का नाम धरो ll

*

राम नाम शब्द अधारा

जीव सृष्टि की यह धारा l

जो राम नाम अपना ले

जीवन का सब सुख पा ले ll

*

जीवन में उल्लास भरो

अधरों पर मधुहास भरो l

नेहा रस छलके जीवन

आनंदित हो सबका मन ll

© सुश्री  मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १७ – कविता – नया प्रयास… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता गोपी संग रास रंग।)

☆ शशि साहित्य # १७ ☆

? कविता – नया प्रयास…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

🫟🫟🫟🫟🫟

क्यूं उच्छवास में उदासी है ?,

मलाल है, कि पच्चीस भी निकल गया..

समय ही तो वह चक्र है,

जिसका हर पल बदल गया..

 

बीते कल पर डालो नजर,

कितने खजाने झोली में भर गया..

नए से रिश्ते, नयी दोस्तियां,

नई पहचान, नए सपने और,

नए अनुभव दे, परिपक्व कर गया..

 

कदमों तले तुम्हारे, ठोस आधार बन,

उन्नति के नए सोपान रच गया..

बिखेरे थे, जो धरती के गोद में,

उन बीजों का उत्सर्जन हो गया..

 

जितना बन सके, भला करते चलो,

धर्म से सुगम मार्ग, प्रशस्त हो गया..

बंदिशों की बेड़ी डालो, दुर्गुणों पर..

कह सको..  छब्बीस नई उपलब्धियां दे गया..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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