हिन्दी साहित्य – जीवन यात्रा ☆ “तुम गये…सब गया!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके ☆

श्री संभाजी बबन गायके

 

☆ जीवन यात्रा ☆ “तुम गये…सब गया!” ☆ श्री संभाजी बबन गायके

सपनों की उडान भरना कोई गुनाह तो नहीं! भला आसमां को हमारी उडान से क्या दिक्कत थी? हम सिर्फ आसमां छूना चाहते थे! हमारा आशियाना तो हम जमींपर बनाने वाले थे…या किसी पेड पर! आसमां अच्छी तरह जानता है…यह सफर अकेले तय नहीं किया जा सकता!

उसके साथ हाथों में लिये हाथ…अग्नि के फेरे लगाने के ख्वाब मन में लिये मैं प्रतीक्षा कर रही थी. खबर मिली की वो आ रहा है…! यह किसी ने नहीं बताया… कि कैसे?

अग्नि तो प्रदीप्त हुई… और वह आगे भी बढा…लेकिन मैं उसके साथ फेरे नहीं ले सकती थी. पहले चिता से धुआं उठा…और मैंने देखा.. .मेरे अरमां जल रहे थे! उसको गले लगा भी लेती तो कैसे? अब तो वह अग्नि की बाहों में था…शांत, क्लांत! उसकी बंद आंखों के पीछे उसने क्या कुछ संजो कर रखा होगा…शायद परिवार की यादे…और मेरी याद भी! उसका देखना अब खत्म…और मेरा देखते रहना आरंभ हो चुका था… लेकिन यह मोहलत कुछ पलों में थम जानी थी… आग की लपटे… न जाने उन्हें किस बात की जल्दी थी… कि उसे राख बनाने में जरा भी देर उन्हें मंजूर न थी!

वह मेरा भी था… लेकिन दुनिया की व्यवस्था की दृष्टि से उस पर मेरी मुहर लगी नहीं थी… इसलिये उसकी चिता से दूरी बनाकर खडी रही मैं… जो तस्वीर दिल में थी… उसका भौतिक रूप मेरे हाथों में धर चुपचाप खडी रही! लेकिन आंसू बतिया रहे थे… बयां कर रहे थे… जो मैं शब्दों में बयां नहीं कर सकती थी.

बदन पर हमने ऐसा कुछ पहन रखा होता है… जो हमें खुलकर रोने की इजाजत नहीं देता. और उसे भी तो रोना रुलाना पसंद नहीं था… उसकी हंसी हवा का वो झोंका होती था… जो दिल को पल में आसमां छूने ले जाता था… अब उसके दामन से हवा भी नहीं आ रही… जिसे मैं सलाम पेश करूं!

उसकी राख मांग में भरने का इंतजार करवायेगी यह चिता… अगली सुबह तक. बीच में एक लंबी रात तो होगी… जो शायद कभी खत्म ही नहीं होगी अब!

हिसाब लगाने बैठ जाऊं तो पता है… हाथों में कुछ न बचेगा… तुम गये… सब गया… यही अब सच है!

जी तो करता है कि मैं भी तुम्हारे साथ हो लूं… लेकिन मेरा धर्म इसकी इजाजत नहीं देता… कर्तव्य का धर्म!

हम वर्दी वाले जानते है… ऐसा भी हो सकता है… कि जिंदगी का दामन हाथों से छूट जाये! या फिर कोई साथी बिछड जाये… हम उडान रोक नहीं सकते!

अग्नि शांत होगी… मैं माथे पर मांग में उसकी राख रच लूंगी और दुसरे ही क्षण एक लंबी, उंची उडान भरूंगी… वो आसमां में तारा जो बन गया है… उसे नजदीक से देखना जो है!   

(कुछ दिन पूर्व देश ने दो वीर वैमानिक खो दिये. Flight Lieutenant पूर्वेश दुरगकर और Squadron Leader अनुज वशिष्ट. इन में से अनुज जी का विवाह एक पायलट युवती से निश्चित हुआ था, पर दुर्भाग्य से उनका यह सपना अधुरा रह गया. खैर, जिंदगी तो चलती रहेगी… निर्णय लिये जायेंगे. लेकिन देश सेवा में रत सैनिक और उनके परिजन जो त्याग करते है… उसकी किसी से भी तुलना नहीं हो सकती. मां-बाप, भाई-बहन का दुख तो बडा हैं ही… पर जिस युवती ने अपने सुखी जीवन के सपने संजोये होते है… उस पे क्या बीतती है… यह वही जान सकता है. इस लेख में उसकी मनोदशा चित्रित करने की कोशिश की गयी है… सिर्फ यह कहने के लिये… कि हमारे देश की रक्षा करने वाले अपने निजी जीवन में क्या क्या खोते हैं? हमें उनके प्रति सदैव आभारी रहना चाहिये. इन दोनों सपूतों को भावभीनी श्रद्धांजली. उनके परिवार के प्रति संवेदना और उस युवती के उज्ज्वल भविष्य के लिये शुभकामनाएं! 💐)

जय हिंद. जय हिंद की सेना!

 साभार – चित्र इन्टरनेट से

© श्री संभाजी बबन गायके 

पुणे

9881298260

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – उस भील स्त्री की तरह ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – उस भील स्त्री की तरह ? ?

पटरियों पर रेल सरपट दौड़ती

अनगिनत निगाहें

झोपड़ी के आगे ठहरती,

तीखे नयन नक्शवाली

गहरी साँवली निर्धन भीलनी,

वक्ष खुले रखती पर

पीयूष पान करते शिशु को ढकती,

निर्वसन आँखें अपलक निहारती

खुले यौवन को कामांध तकती,

पत्थर के सीने पर पटरियाँ

वात्सल्य से लिपट जाती

नवांकुर सींचने के आनंद में

आँखें मींचे मंद-मंद वह मुस्कराती,

रथ पर चढ़ने से रेल में चलने तक

प्रस्तरयुग के डॉटकॉम इरा में ढलने तक

वीभत्स हुई भावना, विकृत हुई वासना

पवित्र रही कामना, विस्तृत हुई उपासना,

माटी से माटी बतियाती रही

रेल आती रही, रेल जाती रही,

नयी संतानें जन्म पाती रही,

आज की माँ कल की लोरी सुनाती रही,

दौर बदला पर नहीं बदला

हथेलियों से भविष्य को थपथपान,ा

अपना जीवनसत्व उसे पिलाना,

आते कल को रास्ता दिखाना

भविष्य के लिये आस्था जगाना,

सच देखता, सच सुनता हूँ

इसलिए कहता हूँ

काल-पात्र-परिस्थिति के परे

मेरी कविता है उस भील स्त्री की तरह।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ गुरुवार 12 मार्च से हमारी आपदां अपहर्तारं साधना आरंभ होगी। यह श्रीराम नवमी तदनुसार गुरुवार दि. 26 मार्च तक चलेगी। 🕉️ 

💥 इस साधना में श्रीरामरक्षा स्तोत्र एवं श्रीराम स्तुति का पाठ होगा‌। मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Articles ☆ When Learning Becomes a Lifelong Light ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of HappinessHe served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

👨‍🎓 When Learning Becomes a Lifelong Light 👨‍🎓

 👨‍🎓 A Blessing for the Young, A Moment of Pride for the Family 👨‍🎓

“There is no end to education. It is not that you read a book, pass an examination, and finish with education. The whole of life, from the moment you were born to the moment you die, is a process of learning.”

— J. Krishnamurti

There are moments in life when the heart pauses with quiet gratitude. Not merely because someone has succeeded, but because success has arrived with humility, maturity, and grace. Such moments reassure us that the values we cherish still travel faithfully from one generation to the next.

All parents wish for the flourishing of their children. They dream that their children may not only succeed in examinations but also grow into thoughtful and compassionate human beings. Yet, in today’s complex world, choosing the right path of education can often feel like navigating an uncertain journey.

True education, after all, is not limited to textbooks and grades. A good institution does far more than prepare students for examinations. It nurtures individuals who are responsible, empathetic, and capable of contributing meaningfully to society.

👨‍🎓 Education that Nurtures the Mind and the Heart 👨‍🎓

 Modern thinkers speak of what is called Positive Education—a thoughtful blending of academic learning with the science of happiness and well-being. This approach recognises that education must cultivate not only knowledge but also character.

 Positive Education encourages young minds to strengthen relationships, experience positive emotions, develop resilience, practise mindfulness, and live healthy, balanced lives. In a world that moves at great speed, these qualities are perhaps even more valuable than academic distinctions.

 As the noted psychologist Martin Seligman reminds us:

“All young people need to learn workplace skills, which has been the subject matter of the education system in place for two hundred years. In addition, we can now teach the skills of well-being — of how to have more positive emotion, more meaning, better relationships, and more positive accomplishment.”

 Similarly, Angela Duckworth beautifully summarises the essence of true education:

“Intelligence plus character — that is the goal of true education.”

She explains that character itself rests upon three pillars:

Strengths of heart — the ability to give and receive from others,

Strengths of mind — the capacity to think, imagine, and create,

Strengths of will — self-control, determination, and grit.

When these three strengths come together, education becomes a force that shapes both the intellect and the soul.

 👨‍🎓 A Moment that Filled an Elder’s Heart with Joy 👨‍🎓

As elders, we sometimes worry about the direction in which the world of education is moving and how our younger generation will navigate it. Yet, from time to time, life offers reassuring glimpses of hope.

One such moment arrived for me when I came across the following post by my nephew, Lavish Singh—a brilliant young mind who has recently graduated as a top-performing Computer Science and Engineering student of the 2025 batch at IIITDM Kurnool, securing the first position among all B.Tech programmes. Today, he continues his academic journey by pursuing M.Tech in Computational and Data Science at the prestigious Indian Institute of Science, Bengaluru.

What filled me with pride was not merely his academic excellence, but the humility, gratitude, and depth of thought reflected in his own words.

I am honoured to share his post exactly as he wrote it:

👨‍🎓 Post of Lavish Singh:

“With profound humility and heartfelt gratitude, I share that I have been honoured with the Gold Medal as both the Branch Topper in Computer Science & Engineering and the Overall Topper of the graduating batch at IIITDM Kurnool 2021-2025.

“This achievement is not mine alone. It has been made possible by the incessant showers of blessings and grace from the great lineage of gurus whose wisdom continues to guide me, the unconditional love, sacrifice, and faith of my parents bestowed upon me as a privilege, the steadfast support of my family, who have been my anchor through every phase, the friendship, camaraderie, and shared aspirations of my friends, who made every moment meaningful and the contributions of every individual and well wishers who encouraged and supported me in countless ways.

“I have officially graduated with a B.Tech degree in Computer Science & Engineering, carrying not just academic laurels, but a deeper understanding of discipline, resilience, and community. This milestone is both a culmination and a beginning, a responsibility to contribute with purpose, to learn with humility, and to grow with compassion.

As I move forward, I hold close the values instilled in me by all those who walked with me on this journey. I am immensely grateful.

“ॐ सह नाववतु।

सह नौ भुनक्तु।

सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः॥

(Om saha nāvavatu, saha nau bhunaktu, saha vīryaṃ karavāvahai | tejasvi nāvadhītamastu mā vidviṣāvahai, Om śāntiḥ śāntiḥ śāntiḥ||)

“May the spirit of learning, mutual respect, and peace always guide us.”

👨‍🎓Faith in the Younger Generation👨‍🎓

Reading these words, one feels reassured that the future rests in capable and thoughtful hands. Academic success is admirable, but when it walks hand in hand with humility, gratitude, and a sense of responsibility towards society, it becomes truly meaningful.

Lavish, and countless young minds like him, represent a generation that is not merely gathering knowledge but shaping character. They remind us that education can still remain a sacred journey of learning, service, and self-discovery.

 To Lavish, I offer the affectionate blessings of an elder:

May your intellect continue to shine, your curiosity remain alive, and your heart stay rooted in humility. May your journey at the Indian Institute of Science open even greater horizons of knowledge and service. And may you continue to make your parents, teachers, family, and well-wishers proud.

 At the same time, this message is for the entire younger generation: we believe in you, we trust your wisdom, and we look forward to the brighter world you will help create.

 For learning, as Krishnamurti reminds us, never truly ends. It flows through life like a quiet river — deepening, widening, and nourishing everything along its path. 👨‍🎓

#LifelongLearning #EducationWithCharacter #IIScJourney #BlessingsAndGratitude #PositiveEducation #FaithInYouth

♥ ♥ ♥ ♥

© Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अकेला ? ☆ भावानुवाद – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? कविता ?

☆ अकेला? ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

(श्री सुहास रघुनाथ जी की मराठी कविता “एकटा ?” का उनके ही  द्वारा हिंदी भावानुवाद. आप उनकी मराठी कविता इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं 👉 मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ एकटा? ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆)

 

“आप अकेले ही रहोगे? “

जब तुम पूछती हो, तब,

सचमुच मुझे आती है हंसी!

 

कहा हूँ मैं अकेला?

साथ में होते हैं ना

ये शब्द, कल्पना और

हमारे ख्वाब!

सचमुच,

हम अकेले ही आये हैं

और अकेले ही जाएंगे

वैसे कितना भी कहो ,

किन्तु, वह सच नहीं है !

 

पैदा होते ही, होते हैं साथ

ख्वाब हमारे उज्वल भविष्य के

और जाते समय

होती है हमारे पास

जीवन भर के यादों की गठरी !

तो बताओ, कैसा हूँ मैं अकेला?

 

भीड़ में तो अकेला नहीं

और एकांत मे भी

मैं अकेला नहीं होता,

मेरे अंदर होती है

एक नगरी ख्वाबों की

और

साम्राज्य स्मृतियों का

तो बताओ

मैं अकेला कैसा?

© श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

सांगली (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८५ – नवगीत – हार-जीत… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – हार-जीत

? रचना संसार # ८५ – गीत – हार-जीत…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

हम अपनों से हार रहे,

जग की कैसी अजब रीत रे।

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत रे।।

 

सुरभित उर की हैं साँसे,

मादक सावन का समीर है।

जलकण बन आँखे बरसे,

प्रतिपल पिया मिलन अधीर है।।

सेज सजी है सपनों की,

निशदिन गाते प्रेम गीत रे।

 

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

 

खिली कली भँवरे हँसते,

यौवन इठला रहा आज है।

साँस- साँस है नाच रही,

बतला सजन ये क्या राज है।।

व्याकुल है आलिंगन को,

ऋतु में  कैसी बढ़ी शीत रे ।

 

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

 

 तिल -तिल मैं तो नित्य जली,         

 अगन लगाती प्रेम ज्वाल भी।

 आँख मिचौली खेलें सब,

  पूछें नहीं कोई हाल भी ।।

  मिलन यामिनी आयी अब,

  घूँघट पट खोलते मीत रे ।।

 

 हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१३ ☆ भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

यादों में बस झूलता, मेरा प्यारा गाँव ।

खूब मजा लेते सभी, ठंडी ठंडी छाँव।।

 *

मिलजुलकर रहते सभी, कच्चे ईट मकान।

साथ सुख – दुख बांट रहे, उनकी है पहचान।।

 *

चलो गाँव की ओर सभी, मिले वहाँ सुख चैन।

याद बहुत आती मुझे, ठंडी – ठंडी रैन।।

 *

आती गर्मी देख लो, तपन बढ़ेगी खूब।

संगी साथी गाँव में, नहीं लगेगी ऊब।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९५ ☆ गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९५ ☆

गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी☆ श्री संतोष नेमा ☆

लेकर हाथ कनक  पिचकारी |

होली   खेलें   कृष्ण   मुरारी ||

झूम-झूम   कर   नाचे   राधा,

निरखें  सखियाँ     बारी-बारी ||

लेकर हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

मिटी  सभी  आपस  की  दूरी।

हुई   कामना   सबकी  वी पूरी।

रँग    खुशी  के  बिखर  रहे  हैं, 

मिली   प्रेम   की   है   कस्तूरी।

 लगे न  युवती आज    कुँवारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

आज   शत्रु  भी  लगता  भाई।

होली    ने    दुश्मनी    मिटाई ।

पढ़ते  आज  सभी  मिल मानो,

सधे   प्रेम   के    अक्षर    ढाई।   

मन   भाए   हैं।  हृदय  बिहारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फूला     टेसू     भी    इतराये |

रंगों    का   मतलब  समझाये।

मन   भाती  फूलों   की  होली ,

रंग – रसायन     हमें  न   भाये।

गारी  आज  लगे  अति   प्यारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फागुन  बौरा  कर  ज्यों  आया |

रंग   प्यार   के  अद्भुत   लाया ||

ढोल – मृदंग  चंग   सब   बाजें,

सबका   हृदय    देख    हर्षाया।   

मिलता  है  “संतोष”  सभी  को,

आज    उड़ेलो    मस्ती    सारी ||

लेकर  हाथ  कनक   पिचकारी |

रँग    खेल   रहे   कृष्ण  मुरारी ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १५ – कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मनवा बैरी…’।)

☆ शशि साहित्य # १५ ☆

? कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हृदय हो रहा वैराग्य का,

ढूंढ रहा शून्य में विस्तार का,

दौर है आज और अभी में जीने का,

पाल रहा सपना जन्म-जन्मांतर का,

दुनिया ठहरी निपट निराली,

क्यों ढूंढ रहा खुद अपना सा,

अति वृहद विशाल जगत में,

क्यों रचे है, स्वयं की दुनिया का,

पल पल बदलती दुनिया में,

ठीक नहीं, तटस्थ हो जाना तेरे कदमों का,

दुश्वार मगर बहुत यह काम,

खुद को समझा लेने का..

खुशियां भर लो जीवन में,

अल्प समय है जीने का…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४२ ⇒ रेसिडेंसी एरिया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रेसिडेंसी एरिया।)

?अभी अभी # ९४२ ⇒ आलेख – रेसिडेंसी एरिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे लिए हमारा निवास ही रेसिडेंस है लेकिन हमारे शहर में एक रेसिडेंसी एरिया भी है जहां कभी अंग्रेज अफसर रहते थे। जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, वे नान – रेसिडेंट कहलाते हैं। भारत में तब अंग्रेजों का ही शासन था, इसलिए वे रेसिडेंट कहलाए।

हम अपनी पहचान, परिवेश इतनी आसानी से नहीं बदलते। आज भी रेसिडेंसी एरिया अपनी जगह है, वहां अफसरों के निवास हैं, कलेक्टर, कमिश्नर के बंगले हैं, रेसीडेंसी कोठी है, रेसिडेंसी क्लब है। देश में हर जगह गेस्ट हाउस है, सर्किट हाउस है। अंग्रेज चले गए, ठाट बाट छोड़ गए।।

आज भी आप शहर के इस शांत क्षेत्र में चले जाएं, साफ सुथरी सड़कें, हरियाली, बड़े बड़े बंगले, साथ में खुले अहाते, बड़े बड़े मैदान। बगीचा, टेनिस कोर्ट और शुद्ध हवा। आसपास कोई बहु – मंजिला इमारत नहीं, कोई शॉपिंग मॉल अथवा ट्रेडिंग सेंटर नहीं। आपका पड़ोसी कोई अफसर ही हो सकता है, या फिर कोई कॉलेज का प्रोफेसर।

इसी क्षेत्र में जेल भी है और आकाशवाणी का प्रसारण केंद्र भी। आकाशवाणी के क्वार्टर भी हैं और उनके कर्मचारियों द्वारा बसाई गई रेडियो कॉलोनी। बस, इतनी ही कहानी है रेसीडेंसी एरिया की। इसके बाद एक तरफ अगर चिड़िया घर है तो दूसरी तरफ आजाद नगर।।

देश को आजाद हुए सात से अधिक दशक बीत गए, अंग्रेजी राज चला गया, जन सेवक आ गए, राजाओं के महल खाली हो गए, जनता झोपड़ी में और मंत्री बंगलों में आ गए। सन् ७४ में प्रदेश की राजधानी भोपाल प्रवास के दौरान टी टी नगर से लगे हुए ७४ बंगलों के दर्शन प्रात: कालीन भ्रमण के दौरान किए थे। अफसरों और मंत्रियों की नेम प्लेट और आलीशान बंगले। तब और अब मैं सुविधाएं बढ़ी ही हैं, कम नहीं हुई। उसी अनुसार महंगाई भी बढ़ी ही है, कम नहीं हुई।

सामंती सोच, अंग्रेजियत और कांग्रेसी संस्कृति को छोड़ हम एक नई संस्कृति में प्रवेश कर चुके हैं जिसे आप शुद्ध भारतीय संस्कृति कह सकते हैं। हमारे आचार विचार में सादगी और आदर्श का प्रवेश अगर आज भी नहीं होता, तो यह तय है कि हम एक दोहरी जिंदगी जी रहे हैं, जिसमें सिर्फ पाखंड और दिखावा है। आज कोई लाल बहादुर शास्त्री नहीं जो देश पर संकट के समय एक वक्त का भोजन छोड़ने का संकल्प ले और बिना सरकारी विज्ञापन बाजी और कार्यकर्ताओं के शोर के, देशवासी प्रेरित हो, एक समय का भोजन त्यागने का संकल्प ले लें।।

अफसर, गाड़ी बंगले नहीं छोड़ सकता, मंत्री कारों के काफिले और विमान यात्रा नहीं छोड़ सकता। जिस देश में सादगी दिखावा और पाखंड का प्रतीक बन जाए, वहां शान शौकत और भव्यता ही एकमात्र विकल्प बच रहता है। अंग्रेजों ने भारत नहीं, इंडिया छोड़ा। हमने उनका रेसीडेंसी एरिया अपना लिया। आज से उनके सारे बंगले हमारे बंगले हो गए। अर्दली जो थे, चपरासी हो गए।

कुछ भी हो, आई लव माय इंडिया ! इसीलिए मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, शाइनिंग इंडिया।

नमस्ते इंडिया, सावधान इंडिया।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८५ – जास्वंद…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८५ – विजय साहित्य ?

☆ जास्वंद…!

(अक्षरछंद… पंधराक्षरी)

(शीर्षक – औषध खासे.)

ज्या सुमनाचे,‌ चित्र काढता

दिसतो देव

त्या मोरयाची,‌जास्वंद फुले,

पुजेत ठेव. १

*

पाच पाकळ्या, गर्भ रेशमी,

घेर अनोखा

तुरा शोभतो, फुलातुनी‌ ज्या,

झुलतो झोका. २

*

लाल,भगवा, छटा आगळ्या,

कातर पाने

रंगपंचमी, नाजूक कांती,

रंग दिवाणे.३

*

नको सुईने, हारात गुंफू,

वाहू‌ चरणी

जास्वंदीची, फुले अनोखी,

नाचे धरणी. ४

*

तेल औषधी,त्वचा निरोगी,

किती फायदे

केस त्वचेला, देई तजेला,

गोड वायदे.५

*

अर्क काढूनी, तेल करावे,

औषध भारी

चूर्ण करोनी, चहा करावा,

तो गुणकारी. ६

*

गजाननाच्या,शिरी शोभते,फुल जास्वंदी

निसर्गातले, औषध खासे,

करे आनंदी…७

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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