हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५३ – देश-परदेश – International Day for Tolerance:16th Nov ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५३ ☆ देश-परदेश – International Day for Tolerance:16th Nov ☆ श्री राकेश कुमार ☆

आज के दिन को “विश्व सहनशीलता” दिवस के रूप में मनाए जाने का क्रम विगत कुछ दशकों से ज़ारी हैं। जब इस बावत जानकारी प्राप्त हुई, तो थोड़ा विस्मय भी हुआ। हम अभी तक ये ही समझते थे, कि असहनशीलता सिर्फ हमारे देश के नागरिकों में ही होती हैं, क्योंकि हम लोग तो बिना बात के भी असहनशील होने में देरी नहीं करते हैं। गुस्सा करना तो हम सबके दिलो दिमाग की प्राथमिकता में है।

छोटी छोटी बातों को लेकर नाराज़ होना हमारी परंपरा बन चुकी हैं। दिलों में आपसी भाई चारे की विरासत तो कब की दफ़न हो चुकी है। छोटे से लेकर उम्र दराज व्यक्ति लड़ने के बहाने खोजता रहता है। वो ज़माना लद गया, जब “जर, जोरू और जमीन” (धन, औरत और जमीन) के लिए ही झगड़े हुआ करते थे।

पश्चिम ने हमारी संस्कृति को अर्श से फर्श (आसमान से जमीन) पर पटक दिया हैं। पिता-पुत्र, भाई-बहन, पति-पत्नी जैसे पवित्र संबंधों को असहनशीलता ने विच्छेद कर तार तार कर दिया है।

शर्म और हया जैसे शब्दों को तो हिंदी के शब्द कोश से हटाने के प्रयास सफल रहें हैं। अंग्रेजी में “लेट गो” या पंजाबी भाषा में “ठंड रख” सुने हुए कई दशक हो गए हैं। नित जीवन में तो अब “जीरो टॉलरेंस” पूरी तरह अपना लिया है।

हमारे संतो ने मानव के हृदय में धीरज रखने के लिए, बहुत सारी रचनाएं, रची हैं। कबीर की वाणी भी ऐसा ही कुछ कह रही हैं।

कबीरा धीरज के धरे, हाथी मन भर खाय।

टूट एक के कारने, स्वान घरै घर जाय॥

अब लेखनी को विराम देता हूं कहीं प्रतिदिन लंबा लंबा पढ़ कर आप असहनशील ना हो जाएँ।☺️

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३३ ⇒ लिखकर रख लो ! ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “लिखकर रख लो !।)

?अभी अभी # ८३३ ⇒ आलेख – लिखकर रख लो ! ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अगर पूर्वाग्रह और दुराग्रहों को परे रख दिया जाए, तो फेसबुक संवाद का एक उत्कृष्ट माध्यम है ! जो कवि-सहित्यकार-शायर नहीं, वे भी जब तकिया और कलाम को एक करते हैं, तो कोई तकिया कलाम बन ही जाता है। मसलन, लिखकर रख लो !

किसी के कहने से कोई कुछ भी लिखकर नहीं रखता ! लेकिन अपनी बात पर जोर डालने के लिए ऐसा कहा जाता है। इसे आप चाहें तो ” लगी शर्त ! ” का विकल्प भी मान सकते हैं। मर्दों के लिए मूँछ मुंडवाना भी ऐसा ही एक तकिया-कलाम है, जिसका प्रयोग क्लीन-शेव्ड भी बेशर्मी से करते देखे गए हैं।।

बच्चों को नाना-नानी के घर जाने में जितनी खुशी होती है, उतनी ही खुशी आजकल उन्हें नाना-नानी को अपने घर बुलाने में भी होती है। वे उसे मेरा घर कहते हैं। बड़े शहरों और महानगरों में व्यस्तता दूरियों को और भी बढ़ा देती है। वीक-एंड में मिलना हो जाए, तो बहुत है।

मेरा नाती अक्सर मुझसे नाराज़ रहता है, इस बात से, कि नाना-नानी हमारे घर नहीं आते ! जब पहली बार वह हमें आग्रहपूर्वक अपना नया घर दिखाने ले गया था, तो खुशी से फूला नहीं समा रहा था। आओ नाना ! मैं आपको अपना नया घर दिखाता हूँ। जिस तरह हम खुशी और उत्साह से आगंतुकों को अपना नया घर, गृह-प्रवेश के पश्चात दिखाते हैं, बिल्कुल वही अंदाज़। यह हमारा ड्रॉइंग रूम, सोफा, मेरी उँगली पकड़ किचन में ले जाते हुए, यह हमारा मॉड्यूलर किचन, फ्रिज, माइक्रोवेव, और वॉश एरिया में ऑटोमैटिक वॉशिंग मशीन ! कैसा लगा ?

आओ अब मैं आपको मेरे रूम में ले जाता हूँ। यह मेरी पढ़ाई की टेबल, पापा का लैपटॉप और मेरे खिलौने। जब बच्चों के खिलौनों का नंबर आता है, तो उसकी मम्मी की वार्डरोब में रखी साड़ियाँ शरमा जाती हैं। बच्चों की गृहस्थी बड़ो की गृहस्थी से बहुत बड़ी होती है।।

मुझे याद है, उसका आग्रह तीन-चार दिन से कम का नहीं होता ! एक समय था, सुदूर, गाँव में, नाना-नानी के घर हमारा मन नहीं भरता था, और आज नाना-नानी के बिना नाती का मन नहीं भरता। एक ही आग्रह, आप मेरे घर क्यों नहीं आते ! जब कि दोनों एक ही शहर में।

इस रविवार उसका आग्रह दुराग्रह में बदल गया ! उसने अपनी मम्मी से बोला, आप नाना नानी को आज अपने घर ले चलो, वे मेरी बात नहीं सुनते। बेटियाँ तो वैसे ही भरी रहती हैं। उसने उलाहना-स्वरूप कह दिया, ” लिख लो बेटा ! नाना-नानी आज अपने घर किसी हालत में नहीं चलने वाले ! ” बाल-सुलभ मन कुछ समझा नहीं। उसने अचानक उसके बैग में से कॉपी-किताब निकाल ली, और बोला, ” ठीक है मम्मी ! मैं लिख लेता हूँ कि आज नाना-नानी हमारे घर किसी भी हालत में नहीं चलने वाले ! और नीचे मेरी साइन भी कर देता हूँ “।।

उसके भोलेपन ने मुझे गंभीरतापूर्वक सोचने पर मजबूर कर दिया और वह अपने नाना-नानी को अपने घर ले जाने में कामयाब हो गया। अब जब भी कोई व्यक्ति जब किसी बात पर ज़ोर देकर कहता है, लिख लो ! मेरी बात अगर झूठ निकले तो ! अक़्सर या तो यह अति-आत्म विश्वास होता है तो कहीं महज़ दम्भोक्ति ! मन करता है, इस बार लिखकर रख ही लूँ। वह भी क्या याद करेगा ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३११ – संघे शक्ति ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३११ संघे शक्ति… ?

कुछ घटनाएँ ऐसी घटती हैं जो नेत्रों को खारी बूँदों से भर देती हैं। उस सुबह भी कुछ ऐसा ही हुआ। कलेवर में छोटी पर प्रभाव में बड़ी घटना का साक्षी बना।

प्रात:कालीन भ्रमण से लौट रहा था। बस स्टॉप के पास वाले फुटपाथ पर एक पेड़ के नीचे दो-तीन वर्ष से एक फ़कीर का बसेरा है। फुटपाथ के एक ओर पार्क की दीवार है, दूसरी ओर सड़क और सड़क के उस पार चाय की छोटी-सी गुमटी। आते-जाते लोगों से फ़कीर की कभी चाय की मांग हो तो केवल पैसे देकर काम नहीं चलता। सड़क पार से एक प्याला चाय लाकर देना पड़ता है। शायद पैरों से लाचार से हैं यह वृद्ध क्योंकि उन्हें कभी चलते नहीं देखा।

सहसा दृष्टि पड़ी कि वृद्ध को घेरकर पास के उर्दू माध्यम के विद्यालय में पढ़नेवाली आठ-दस छात्राएँ खड़ी हैं। सिर पर स्कार्फ बाँधे, छठी-सातवीं में पढ़नेवाली बच्चियाँ। उत्सुकता के शमन के लिए अवलोकन किया तो नेत्र सजल हो उठे। भिक्षुक को पीने के लिए पानी चाहिए था और हर बच्ची अपनी वॉटर बॉटल में से थोड़ा-थोड़ा पानी फ़कीर के जलपात्र में डाल रही थी। अद्भुत, अलौकिक दृश्य! देखता ही रह गया मैं!

इच्छा हुई दौड़कर जाऊँ और इनके माथे पर हाथ रखकर कहूँ, “वेल डन बेटियो! सबाब का काम किया।” फिर लगा इस कच्ची उम्र को पाप-पुण्य के जटिल समीकरण से मुक्त ही रहने दूँ, रहने दूँ इन्हें सहज। सहजता जो जानती है कि प्यास है तो पानी की व्यवस्था करनी चाहिए।

फ़कीर की पानी की ज़रूरत पूरी करने के लिए एक साथ बढ़े इन नन्हे हाथों ने एक बात और सिखाई कि प्रयास सामूहिक हों तो पानी का पात्र ही नहीं, सूखी नदियाँ और रूठी बावड़ियाँ भी भरी जा सकती हैं।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३२ ⇒ नून बिन सब सून ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “नून बिन सब सून।)

?अभी अभी # ८३२ ⇒ आलेख – नून बिन सब सून ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आज का कान्वेंटी ज्ञान, नून को गुड आफ्टरनून वाला नून और सून को कम सून वाला सून भले ही समझ ले, लेकिन जिन्होंने मुंशी प्रेमचंद का नमक का दारोगा पढ़ा है, और जिन्हें गांधीजी के नमक सत्याग्रह की जानकारी है, वे नून तेल का महत्व अच्छी तरह से जानते हैं। सून भी सूना का ही अपभ्रंश है, नमक बिना भी कहीं इंदौर का नमकीन बना है।

कहने को हमारे शरीर में सभी आवश्यक तत्व मौजूद हैं, लेकिन ज़िंदा रहने और स्वस्थ रहने के लिए हमें नमक का सहारा लेना ही पड़ता है। अधिक नमक के हानिकारक परिणामों से पूरी तरह से परिचित होते हुए भी हमारे जीवन में नमक का एक अहम स्थान है।।

कल मेरा गला खराब हो गया था, मुंह से बोल नहीं निकल रहे थे। थोड़ा हल्दी नमक से गरारा किया, तो गला खुला। भोजन में अगर चुटकी भर नमक न हो, तो भोजन स्वादिष्ट नहीं बनता। जो पहले किसी का नमक खा लेते थे, वे नमक का कर्ज अदा करते थे। आजकल सिर्फ नमक की कीमत अदा करते हैं। सलीम जावेद पहले संवाद लेखक हुए हैं, जिन्होंने फिल्म शोले में गब्बर सिंह के मुख से एक स्वास्थ्य संबंधी संदेश इस तरह प्रसारित किया ;

सरदार ! मैंने आपका नमक खाया है।

तो ले, अब, बीपी की, गोली खा।।

इस धरती पर केवल इंसान ही ऐसा प्राणी है जो कपड़े पहनता है, और भोजन पकाकर खाता है। शेर जंगल का राजा है, फिर भी नंगा रहता है, और अपने हाथ से शिकार करता है, और बिना पकाए, नून तेल, पुष्प ब्रांड मसाले बिना ही खा लेता है। कैसी डायनिंग टेबल और शाही थाली। जब कि एक आम आदमी सूट बूट पहनकर जेब में एक 500 का नोट रख बढ़िया सी होटल में शाही पनीर और बिरयानी खाकर मूंछ और पेट पर हाथ फेर लेता है। शेर फिर भी शेर है, और आदमी, बेचारा आदमी।

आप चाहे किसी भी चीज का अचार डालो, अथवा ज़िन्दगी भर पापड़ बेलो, नून बिन सब सून। बिना तेल का, बिना मिर्ची का, अचार तो बन सकता है, लेकिन बिना नमक के नहीं। जिस तरह आज अखिलेश वल्द मुलायमसिंह की कहीं दाल नहीं गल रही, बिना नमक के कभी अचार भी नहीं गलता।।

नमक तो नमक होता है, फिर भी देश का नमक तो टाटा का नमक ही होता है। नमक से हड्डियां गलती भी हैं, और मजबूत भी होती है। आप किसी का भी नमक खाएं, कम ही खाएं। क्योंकि नमक का कर्ज भी अदा करना पड़ता है। आप मिर्ची तो खा भी सकते हो, और किसी को लगा भी सकते हो, लेकिन नमक किसी को नहीं लगाया जाता। जले पर नमक छिड़क ना हमें पसंद नहीं। हल्दी की रस्म तो सुनी है, कभी नमक की रस्म नहीं सुनी।

वैसे खाने में नमक मिर्ची की जोड़ी भाई बहन की जोड़ी लगती है। सिका हुआ भुट्टा हो तो नमक, नींबू से काम चल जाता है। जाम और जामुन पर अगर नमक मिर्ची नहीं बुरकी हो, तो मज़ा नहीं आता। दही बड़ा तो गार्निश ही नमक मिर्ची और भुने हुए जीरे के साथ होता है।।

नमक की महिमा जितनी मुंह में पानी लाती है, मात्रा बढ़ जाने पर आजकल बी पी भी उतना ही बढ़ाती है। स्वास्थ्य के रखवाले, नमक के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। आयोडीन गया भाड़ में, अगर स्वस्थ रहना हो, तो सेंधा नमक का ही सेवन करें।

मुझे याद है, खड़े नमक और खड़ी मिर्ची से मां मेरी नज़र उतारा करती थी। तब घरों में सिगड़ी हुआ करती थी। अंगारों पर जब नमक मिर्ची डाली जाती थी, तब अगर मिर्ची की धांस नहीं आई, मतलब नज़र लगी है, और अगर मिर्ची की धांस है, तो नज़र नहीं। जब से मां गई है, मुझे किसी की नजर ही नहीं लगी। मॉम बिन सब सून।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी / अंग्रेजी साहित्य – आलेख/Articles ☆ कैसे चुने अपने लिए परफ्यूम?: How to Choose the Right Perfume for Yourself? ☆ Dr. Anil Kumar Verma ☆

Dr. Anil Kumar Verma

(Director- askvastu.com, Vastu/ Geopathic Stress Consultant & Water Dowser.)

😎 कैसे चुने अपने लिए परफ्यूम? 😎

दरअसल परफ्यूम की खुशबू (फ्रेगरेंस) की durability समझने के लिए, परफ्यूम की बोतल पर लिखे हुए शब्दो EDC, EDT, RDP, PERFUM को समझना होगा जो परफ्यूम की सांद्रता और टिकाऊपन को दर्शाते हैं:

EDC (Eau de Cologne): इसमें फ्रेगरेंस ऑयल की मात्रा 2-5% होती है। यह बहुत हल्की खुशबू देता है, जो 1-3 घंटे रहती है। गर्मी या हल्की ताजगी के लिए उपयुक्त होता है।

EDT (Eau de Toilette): इसमें फ्रेगरेंस ऑयल की मात्रा 5-15% होती है। इस परफ्यूम की खुशबू 3-5 घंटे तक टिकती है। यह हल्की और ताजी खुशबू देता है, रोजाना इस्तेमाल और दिन में उपयुक्त होता है।

EDP (Eau de Parfum): इसमें फ्रेगरेंस ऑयल की मात्रा 15-20% होती है। यह सबसे मजबूत और लंबे समय तक चलने वाली खुशबू देता है, जो 5-8 घंटे तक रहती है। खास मौकों के लिए बेहतर होता है।

PERFUM या PARFUM: इसका मतलब परफ्यूम यानी इत्र से होता है जिसमें फ्रेगरेंस ऑयल की सबसे ज्यादा मात्रा (20-30%) होती है, इसलिए इसकी खुशबू सबसे ज्यादा टिकाऊ और गहरी होती है।

RDP आमतौर पर प्रयोग नहीं होता या ब्रांड के अनुसार अलग हो सकता है, लेकिन कभी-कभी RDP का उपयोग परफ्यूम के किसी विशेष संस्करण या ब्रांडिश नाम के रूप में होता है।

सारांश में, ये शब्द परफ्यूम की तेल की मात्रा और खुशबू के टिकने का समय बताते हैं। जितनी ज्यादा सांद्रता, उतनी ज्यादा खुशबू की अवधि और तीव्रता होती है।यह जानकारी परफ्यूम खरीदते समय आपकी मदद करती है कि आप अपनी जरूरत के हिसाब से हल्का या तेज खुशबू वाला परफ्यूम चुन सकें।

😎 How to Choose the Right Perfume for Yourself? 😎

To understand the durability of a perfume’s fragrance, you need to know the terms EDC, EDT, EDP, and PERFUM written on the perfume bottle, which indicate the concentration and lasting power of the fragrance:

EDC (Eau de Cologne): Contains 2-5% fragrance oil. It provides a very light scent that lasts 1-3 hours. Suitable for hot weather or a light, refreshing feel.

EDT (Eau de Toilette): Contains 5-15% fragrance oil. The scent lasts 3-5 hours. It offers a light and fresh fragrance, ideal for daily use and daytime.

EDP (Eau de Parfum): Contains 15-20% fragrance oil. It provides the strongest and longest-lasting scent, lasting 5-8 hours. Perfect for special occasions.

PERFUM or PARFUM: Refers to pure perfume with the highest fragrance oil concentration (20-30%), making it the most long-lasting and intense.

RDP is not commonly used and may vary by brand, sometimes referring to a special edition or branded version of a perfume.

Summary: These terms indicate the oil concentration and duration of the fragrance. Higher concentration means longer-lasting and more intense fragrance. This information helps you choose a perfume—light or strong—based on your needs when shopping.

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© डॉ अनिल कुमार वर्मा 

कार्यालय-सह-आवास: बंगला नंबर B 27 चौहान टाउन, जुंनवानी, भिलाई, छत्तीसगढ़ मोबाइल: 9425028600 वेबसाइट: www.askvastu.com

यूट्यूब चैनल: askvastu.com  ईमेल: vermanilg@gmail.com

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३१ ⇒ न्यूसेंस वैल्यू ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “न्यूसेंस वैल्यू।)

?अभी अभी # ८३१ ⇒ आलेख – न्यूसेंस वैल्यू ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हर परेशानी की हमें कीमत चुकानी पड़ती है। क्या परेशानी का कोई मूल्य नहीं होता। न्यूसेंस को आप आफ़त मुसीबत अथवा उपद्रव भी कह सकते हैं। इसे अनुभव तो किया जा सकता, लेकिन परिभाषित नहीं किया जा सकता।

अगर न्यूसेंस का जीवन में महत्व नहीं होता तो इसे यूं ही वैल्यू कहकर महिमामंडित नहीं किया जाता। रास्ते में चलते समय लगी ठोकर, और हर पांव में लगे कांटे की भी एक न्यूसेंस वैल्यू होती है।

वह हमें विचलित भी करती है और सतर्क भी। क्या बालहठ, बच्चों की मस्ती, शैतानी और धमा चौकड़ी एक तरह की न्यूसेंस वैल्यू नहीं। लेकिन कितनी प्यारी है यह न्यूसेंस वैल्यू।।

स्कूल कॉलेज के दिनों में क्या हम सिर्फ पढ़ाई ही करते थे। कॉलेज में क्लास से तड़ी मारकर फिल्में देखना, नकल, गुंडागर्दी और लड़कियों से छेड़छाड़ सबकी अपनी न्यूसेंस वैल्यू थी। मुझे अच्छी तरह याद है जो लड़के तब प्रोफेसर्स की नाक में दम कर देते थे, आगे चलकर वे जीवन में अच्छे और प्रतिष्ठित नागरिक भी बने, कोई पुलिस में, कोई आर्मी में, तो कोई सिविल सर्विसेज में।

कहीं कहीं अच्छाई की तो जीरो वैल्यू होती है और न्यूसेंस वैल्यू ही काम आती है। सीधी उंगली से जब घी नहीं निकलता, तो उंगली टेढ़ी करनी ही पड़ती है।

कानून अपने हिसाब से काम करता है, अतिक्रमण और आतंक का तो बुलडोजर से ही हिसाब चुकता किया जा सकता है।।

अगर आप लोकतंत्र की दुहाई देते हो, तो विपक्ष की न्यूसेंस वैल्यू को भी बर्दाश्त करना ही होगा। अपनी सुरक्षा और स्वार्थ के लिए अगर आपने कोई स्वामिभक्त कुत्ता पाला है, तो उसके भौंकने के न्यूसेंस को भी आपको बर्दाश्त करना पड़ेगा। रात को कुत्ते के भौंकने से अधिक परेशान और विचलित करने वाली कोई न्यूसेंस वैल्यू नहीं।

नादां की दोस्ती जी का जंजाल। जो अवांछित है, उसकी भी कुछ तो न्यूसेंस वैल्यू है। स्वार्थ और खुदगर्जी की इस दुनिया में कब कौन किस गधे को अपना बाप बना ले, कुछ कहा नहीं जा सकता।।

अब खोटे सिक्के को ही ले लीजिए। नहीं मामा से काना मामा ही भला। विवाह के प्रसंग में कभी कभी तो बारातियों के नाम पर, सड़क पर, न्यूसेंस वैल्यू ही नजर आती है। जो अधिक लुंगाड़े टाइप व्यक्ति होता है, जब वह नशे में धुत्त होकर नागिन डांस करता है, तो नोटों की बरसात शुरू हो जाती है।

क्या कभी आपने कचरे के बारे में सोचा है। कभी कचरे की न्यूसेंस वैल्यू ने हमारा जीवन नर्क बना रखा था। हर सड़क चौराहे, गली कूचे में कचरे का ही राज था। जगह जगह गंदगी और बदबू ही बदबू और कचरे के ढेर में मुंह मारते आवारा ढोर! और हम कचरा फेंकने वाले, बदबू के मारे, नाक पर रूमाल रख वहां से निकल जाते थे। लेकिन देखिए स्वच्छ भारत के दौरान घूरे के दिन भी फिरे और हर नागरिक ने कचरे को इज्जत देना सीख लिया। जिस कचरे की कभी न्यूसेंस वैल्यू थी, आज वह कहां से कहां पहुंच गया। दृढ़ संकल्प से सब कुछ मुमकिन है।।

हर सरकारी दफ़्तर में भरमार होती है न्यूसेंस वैल्यू की। चपरासी और बाबू से लेकर अफसर तक। जो आदमी काम का है, बस उसकी ही वैल्यू है। कभी कभी लोग पूछ भी लेते हैं, किस निकम्मे को मुंह लगा रखा है। लेकिन ऐसे नल्ले, पिछलग्गू और न्यूसेंस वैल्यू वाले व्यक्ति ही वक्त ज़रूरत काम आते हैं और चुनाव की वैतरणी पार लगवाते हैं।

हम अच्छी तरह जानते हैं आज के अखबार, सोशल मीडिया, टीवी न्यूज और टीवी सीरियल की न्यूसेंस वैल्यू, लेकिन इनके साथ के बिना हमारा अस्तित्व ही संभव नहीं। बहुत काम की है न्यूसेंस वैल्यू, इसे कभी कम नहीं आँकें।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ चिनारों की चित्रकारी- लाल पीली सुनहरी ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ आलेख ☆ “चिनारों की चित्रकारी- लाल पीली सुनहरी” ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

कभी मैंने पारिजात के लिये लिखा था—अवसान भी हो मधुरतम

यही पंक्तियां मैं लासानी चिनारों को अर्पित कर रही हूँ। शरद ऋतु का सिंगार करती, उसके मसृण स्वभाव से मेल खाती, चिनार से झरती हुई पत्तियां लाल पीली  सिन्दूरी, भूरी ,सुनहरी , सूर्य किरणों के झरने में नहाती,मिट्टी के परस से रोमांचित होती, नर्म कोमल हवाओं की बाँहों में बाँहें डाले सौंदर्य का स्वर्ग रचती हैं।

कितनी अजीब है प्रकृति बहारों में दीवाना बनाती है और पतझड़ में दार्शनिक रूप से मोह लेती है।

शाखों से झरने का, अलग होने का  दर्द इन पत्तियों के अलावा और कौन समझ सकता है।वे नहीं जानतीं कि लोग उनकी पीड़ा में भी आसक्ति ढूँढ लेते हैं।रूहानी सुकून महसूसते हैं।

जिन्दगी स्वयं को कभी नहीं दोहराती।दोहराव में भी नयापन होता है।जैसे इस खूबसूरत मंज़र को यादों में जिन्दगी मिलती है।जिसे मन की आँखें अपने एलबम में सहेज लेती हैं।

वन में रूप की ज्वाला केवल पलाश ही नहीं भड़काते, चिनारों को भी यह श्रेय दिया जाना चाहिए।

बेहद तकलीफ होती है यह देखकर कि जिन रंगीन पत्तों का राशिभूत सौंदर्य काबू में करने के लिए पर्यटकों के कैमरे निकल आते हैं उन्हीं पत्तों को कुछ कश्मीरी ठंड भगाने के लिए जला देते हैं।

बर्फानी ठंड के लिए रूपरेखा बनाती हुई  कश्मीर की वादी पत्तों की खामोशी का तर्जुमा कर नहीं पाती। ऐश्वर्य दिखाने के नाम पर मिट्टी को सौंप देती है। बेरहम ।

किसी शायर ने क्या खूब कहा है—-

उदासी रूह से गुजरी है

इस तरह जैसे

उजाड़ दश्त में पतझड़ की

दोपहर तन्हा।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

8/11/25

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २६६ ☆ ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # २६५ ☆ ग्रीन मोटिवेशन: अगहन गुरुवार का आधुनिक संदेश…

*

पौधे लगाएँ आप ढेरों, भावना मंगल करें।

फैली यहाँ हरियालि देखो, पीर मन की जो हरें।

सारे करेंगे अनुसरण तो, श्रेष्ठ होगी कल्पना।

द्वारे सजेंगे आम्र पत्ते, भव्य होगी अल्पना।।

*

आज जब दुनिया पेड़ों को खो रही है, अगहन का गुरुवार हमें अपनी जड़ें याद दिलाता है। यह दिन एक तरह से प्रकृति की पुकार है, जैसे धरती नरम आवाज में कहती हो: “मेरी देखभाल भी पूजा का हिस्सा है।”

इस वर्ष अगहन मास (मार्गशीर्ष मास) 6 नवंबर 2025 को आरंभ हुआ है।

  1. पौधरोपण की शुभ शुरुआत

लोग मानते हैं कि इस दिन लगाया गया पौधा घर में शांति और स्थिरता लाता है। आप इस अवसर पर अपने घर, मोहल्ले या खेत की किनारियों पर एक पौधा अवश्य लगाइए।

यह पौधा आने वाले समय में आपकी मेहनत, धैर्य और उम्मीदों का एक जीवित रूप बन जाता है।

  1. परिवार को ‘ग्रीन संकल्प’ दिलाएँ

एक छोटा-सा संकल्प बनाया जा सकता है—

  • हर महीने एक पौधा
  • पानी की बचत
  • किचन वेस्ट से खाद
  • प्लास्टिक का कम उपयोग

अगहन गुरुवार इस संकल्प को शुरू करने का शांत और पवित्र बनाइए।

  1. धान कटाई और कृतज्ञता का संदेश

किसानों के लिए यह महीना धरती द्वारा दिया गया उपहार है। ग्रीन मोटिवेशन यही कहता है कि उपहार को लौटाना भी जरूरी है—

थोड़ा पानी बचाकर, थोड़ी छाँव उगाकर, थोड़ा हरापन फैलाकर।

  1. सोशल मीडिया पर सकारात्मक हरियाली

डिजिटल प्रयास करें…

  • एक पौधा लगाने का छोटा वीडियो
  • अपने आँगन की हरियाली दिखाएँ
  • अगहन गुरुवार का ‘धीमा, शांत और हरा’ संदेश शेयर करें।

इससे यह पर्व केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं, बल्कि जीवन में ताजगी भरने का दिन बनेगा।

अगहन गुरुवार को परंपरा की पीली रोशनी और हरियाली की ठंडी छाया से सराबोर करते हुए आगे बढ़ें। इस दिन की सुंदरता यही है कि यह मन को शांत करता है और धरती से जोड़े रखता है। और जब मन और मिट्टी दोनों मुस्कुराएँ, तभी जीवन सच्चे अर्थों में समृद्ध होता है।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८३० ⇒ तत्व प्रेम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “तत्व प्रेम।)

?अभी अभी # ८३० ⇒ आलेख – तत्व प्रेम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मरहूम किशोर कुमार गांगुली अपनी फिल्म हम सब उस्ताद हैं, में, कह गए हैं, प्यार बांटते चलो ! अब प्यार कोई सुबह का अखबार तो है नहीं, कि घर घर बांटते चलो। ना ही प्रेम कोई रेवड़ी है, जो आंख मूंदकर अपने अपनों में निपटा दी जाए।

एक गीत में रफी साहब शर्तिया प्यार सिखाने की बात करते हैं !

आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूँ !

गोया प्यार नहीं, कार चलाना सिखा रहे हों। और सीखने वाली भी झट से हां कर देती है, सिखला दो ना। काश, वाकई ऐसा हो जाता, तो जगह जगह इश्तहार पढ़ने को मिलते, 30 दिनों में प्यार करना सीखिए। प्यार का भी लाइसेंस होता, पहले लर्निंग, बाद में परमानेंट। शायद सगाई लर्निंग और शादी पक्का लाइसेंस ही हो।।

कितना अच्छा हो, लोग प्यार में पी एच डी करें। संत महात्मा प्यार में डॉक्टरेट बांटें। प्यार का भी परीक्षा में एक प्रश्न-पत्र हो। प्यार कितने प्रकार के होते हैं ? प्यार के बुखार का कैसे इलाज किया जाता है। और एक अनिवार्य प्रश्न 20 अंक का प्रेम-पत्र। फिर कहाँ नफ़रत, द्वेष, ईर्ष्या के लिए जगह। लोग दुश्मनी ही भूल जाएँ।

प्रेम कहीं सिखाया नहीं जाता, प्रेम की कोई पाठशाला नहीं, कोई विश्वविद्यलय नहीं, फिर भी पशु-पक्षी तक प्रेम करना जानते हैं।

इंसानों में कितना प्रेम व्याप्त है, आप नहीं समझ सकते। कोई किताबों से प्रेम कर रहा है, तो कोई लिखने से। किसी को कविता से प्रेम है तो किसी को शायरी से। लोगों में प्रकृति प्रेमी भी हैं, और पशु-प्रेमी भी। अब गुटका और चाय से प्रेम की बात पर सुबह-सुबह मेरा मुँह मत खुलवाएं।।

आइए, आज हम भी प्रेम की बातें करें ! एक होता है व्यावहारिक प्रेम, जिससे हम whatsapp और फेसबुक वालों से रोज वास्ता पड़ता है। नमस्ते, सुप्रभात, वाला अभिवादन। दफ्तर में, स्कूल कॉलेज में, गुड मॉर्निंग का रिवाज़ है। आप चाहें तो इसे औपचारिक प्रेम भी कह सकते हैं।

परिवारों में भी प्रेम होता है ! मां बेटे का, भाई बहन का, दोस्तों का, प्रेमी-प्रेमिकाओं का, रिश्तेदारों का, और above all पति पत्नी का। यह सब भावनात्मक प्रेम है। आप इसे दिल का मामला भी कह सकते हैं। इसमें दिक्कत यह है कि

” अब जी के क्या करेंगे,

जब दिल ही टूट गया। “

प्रेम गाय से भी हो सकता है और अपने पालतू कुत्ते से भी। वसुधैव कुटुंबकम् कहने वाले अपने विरोधियों और दुश्मनों को इस प्रेम के दायरे में नहीं आने देते।।

एक प्रेम स्थूल नहीं, सूक्ष्म होता है, यह दिल का मामला नहीं, मन के अधिकार क्षेत्र का मामला है। मीरा और कृष्ण का प्रेम सांसारिक नहीं, स्थूल नहीं, तात्विक प्रेम था। जिस रास का जिक्र होता है, वहां स्थूल सूक्ष्म में समा जाता है। कृष्ण भक्त राधे राधे का जाप करते हैं, और राम भक्त सीताराम सीताराम का।

ईश्वर तत्व, गुरु तत्व और प्रेम तत्व एक ही हैं, इन्हें आप अलग नहीं कर सकते। जिस प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती, वही तत्व प्रेम है। ज़र्रे ज़र्रे में बस रहा है वो, जैसे मुरली में तान होती है। चैतन्य महाप्रभु को वह तत्व प्रेम सारे जगत में व्याप्त दिखता था। नारद भक्ति सूत्र इसी तत्व प्रेम की बात करता है।।

प्रेम गली अति सांकरी ! विराट प्रेम के लिए गोकुल और वृंदावन की गलियों में भटकना क्या ज़रूरी है। जो लोग नर्मदा की परिक्रमा करते हैं, वे शायद भक्ति और तत्व प्रेम के अधिक करीब हों, क्योंकि वे प्रकृति के साथ हैं, बहती नदी की तरह उनका प्रेम कहीं ठहरता नहीं, बहता रहता है। जो जहां है, चाहे तो वहीं, उसी स्थान पर इस तत्व प्रेम के सरोवर में स्नान कर सकता है। धारा सतगुरु, लेत नहाय क्यों न।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८२९ ⇒ ॥ चपरासी ॥ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “॥ चपरासी ॥।)

?अभी अभी # ८२९ ⇒ आलेख – ॥ चपरासी ॥ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो कभी अंग्रेजों का अर्दली था, वह आज हमारा चपरासी बन गया। अर्दली चाहे तो कह सकता है, साला मैं तो peon प्यून बन गया। अंग्रेजों के जमाने में, साहब के दफ्तर आने के पहले हर चीज व्यवस्थित हो जाए, यह काम एक अर्दली का होता था। आप अर्दली को अंग्रेजी शब्द orderly ऑर्डरली का अपभ्रंश भी कह सकते हैं, क्योंकि orderly शब्द का अर्थ ही व्यवस्थित होता है। जो चीज़ों को व्यवस्थित रखे, वह ऑर्डरली अर्थात् अर्दली। हमारे भाषाविदों को चपरासी शब्द में भी बू आने लगी और उन्होंने राजभाषा अधिकारियों के कहने पर उसे भृत्य बना दिया। शब्दों को नृत्य करवाने से कुछ हासिल नहीं होता। चपरासी, चपरासी ही रहता है, भृत्य कहने से कृतकृत्य नहीं हो जाता।

रूतबे में चपरासी चौकीदार से कम होता है लेकिन वह किसका चपरासी है, यह उस पर निर्भर करता है। वैसे एक चपरासी और चौकीदार की कभी आपस में तुलना नहीं की जा सकती ठीक उसी तरह जैसे एक राजा और एक विद्वान की। विद्वत्वं च नृपत्वं, च नैव तुल्यं कदाचन !

लेकिन क्यों। इसलिए, क्योंकि एक चपरासी और चौकीदार में रात दिन का अंतर है। चौकीदार रात भर डंडा और सीटी बजाता है, जब कि एक चपरासी सिर्फ सुबह १० से ५ साहब का हुक्म बजाता है।।

अगर अधिकार और रुतबे की बात करें, तो चौकीदार एक चपरासी पर भारी पड़ता है। जिम्मेदारी और जवाबदारी में भी चौकीदार, चपरासी पर भारी। अधिकार भी चौकीदार के अधिक। चौकीदार एक तरह का वॉच डॉग है। अगर गोरखा हुआ, तो शाब जी, ईमानदारी की जीती जागती मूरत। आजकल यह काम सिक्योरिटी एजेंसीज करने लगी है जिससे आर्मी के एक्स – सर्विसमेन भी आसानी से उपलब्ध हो जाते हैं। एक स्वयंभू चौकीदार के भरोसे इस देश के १३० करोड़ वासी आज भी चैन की नींद सो रहे हैं।

चपरासी अधिकतर शासकीय होता है। सरकारी दफ्तर और शासकीय अथवा प्राइवेट स्कूल और कॉलेज बिना चपरासी के नहीं चल सकते। स्कूल और कॉलेज का चपरासी क्लास के पीरियड और छुट्टी की सूचना अगर घंटी बजाकर दिया करता है तो एक चपरासी को साहब की घंटी सुनकर साहब के ऑफिस में प्रवेश करना पड़ता है।।

चौकीदार सलाम बजाता है जब कि सरकारी चपरासी को लोग सलाम बजाते हैं। साहब तो आते जाते रहते हैं, पक्की नौकरी तो चपरासी ही करता है। कुछ चपरासी तो साहब के इतने मुंह लगे होते हैं कि जब साहब लदते है तो चपरासी भी दहेज की तरह साथ जाता है। यह रिश्ता नमक के रिश्ते से ज़्यादा मज़बूत होता है।

साहब का मिज़ाज, कमजोरी, खासियत, मूड और पसंद नापसंद की पूरी जानकारी एक चपरासी को रहती है। साहब की अटैची का वज़न तक चपरासी उठाता है। कहीं कहीं तो ऐसा लगता है, दफ्तर का सारा बोझ ही चपरासी पर है। जिस रोज चपरासी छुट्टी पर रहता है, साहब का मूड भी ऑफ रहता है।।

अष्ट छाप के कवि भक्त सूरदास काग के भाग की सराहना करते हैं, जो उनके इष्ट हरि अर्थात बाल गोपाल श्रीकृष्ण के हाथ से माखन रोटी छीनकर ले जाता है। लेकिन एक साहब के चपरासी का भाग्य देखिए, वह कुछ छीनता नहीं, उसे सब कुछ अपने भाग्य और साहब के पुरुषार्थ से मिलता जाता है। मंदिर के भगवान से अगर मिलना है तो दान दक्षिणा का अधिकार पुजारी का होता है। साहब तक सीधा तो भगवान भी नहीं पहुंच पाता। पहले चपरासी से अपोइंटमेंट लेना पड़ता है। चपरासी, अपने भाग्य को सराहता है ! मेरा साहब की कृपा से, सब काम हो रहा है।

साहब और चपरासी का साथ सुख और दुख दोनों का होता है। जब साहब के यहां छापा पड़ता है तो चपरासी की भी बांंयी आंख फड़कने लगती है। साले सालियों के साथ बेचारे चपरासी के नाम भी दो चार मकान निकल आते हैं। वह बेचारा दार्शनिक अंदाज में, इतना ही कह पाता है, क्या करें साहब, गेहूं के साथ कभी कभी घुन भी पिस ही जाता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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