हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३४ – कर्मण्येवाधिकारस्ते! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३४ कर्मण्येवाधिकारस्ते! ? श्री संजय भारद्वाज ☆

एक युवा व्यापारी मिले।  बहुत परेशान थे। कहने लगे, “मन लगाकर परिश्रम से अपना काम करता हूँ  पर परिणाम नहीं मिलता। सोचता हूँ काम बंद कर दूँ।” यद्यपि उन्हें  काम आरम्भ किए बहुत समय नहीं हुआ है। किसी संस्था के अध्यक्ष मिले। वे भी व्यथित थे। बोले,” संस्था के लिए जान दे दो पर आलोचनाओं के सिवा कुछ नहीं मिलता। अब मुक्त हो जाना चाहता हूँ इस माथापच्ची से।” चिंतन हो पाता, उससे एक भूतपूर्व पार्षद टकराए। उनकी अपनी पीड़ा थी। ” जब तक पार्षद था, भीड़ जुटती थी। लोगों के इतने काम किए। वे ही लोग अब बुलाने पर भी नहीं आते।”

कभी-कभी स्थितियाँ प्रारब्ध के साथ मिलकर ऐसा व्यूह रच देती हैं कि कर्मफल स्थगित अवस्था में आ जाता है। स्थगन का अर्थ तात्कालिक परिणाम न मिलने से है। ध्यान देने योग्य बात है कि स्थगन किसी फलनिष्पत्ति को कुछ समय के लिए रोक तो सकता है पर समाप्त नहीं कर पाता।

स्थगन का यह सिद्धांत कुछ समय के लिए निराश करता है तो दूसरा पहलू यह है कि यही सिद्वांत अमिट जिजीविषा का पुंज भी बनता है।

क्या जीवित व्यक्ति के लिए यह संभव है कि वह साँस लेना बंद कर दे?  कर्म से भी मनुष्य का वही सम्बंध है जो साँस है। कर्मयोग की मीमांसा करते हुए भगवान कहते हैं,

‘न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।’

कोई क्षण ऐसा नहीं जिसे मनुष्य बिना कर्म किए बिता सके। सभी जीव कर्माधीन हैं। इसलिए गर्भ में आने से देह तजने तक जीव को कर्म करना पड़ता है।

इसी भाव को गोस्वामी जी देशज अभिव्यक्ति देते हैं,

‘कर्मप्रधान विश्व रचि राखा।’

जब साँस-साँस कर्म है तो उससे परहेज कैसा? भागकर भी क्या होगा? ..और भागना संभव है क्या? यात्रा में धूप-छाँव की तरह सफलता-असफलता आती-जाती हैं। आकलन तो किया जाना चाहिए पर पलायन नहीं। चाहे लक्ष्य बदल लो पर यात्रा अविराम रखो। कर्म निरंतर और चिरंतन है।

सनातन संस्कृति छह प्रकार के कर्म प्रतिपादित करती है- नित्य, नैमित्य, काम्य, निष्काम्य, संचित एवं निषिद्ध। प्रयुक्त शब्दों में ही अर्थ अंतर्निहित है। बोधगम्यता के लिए इन छह को क्रमश: दैनिक, नियमशील, किसी कामना की पूर्ति हेतु, बिना किसी कामना के, प्रारब्ध द्वारा संचित, तथा नहीं करनेवाले कर्म के रूप में परिभाषित किया जा सकता है।

इसमें से संचित कर्म पर मनन कीजिए। बीज प्रतिकूल स्थितियों में धरती में दबा रहता है। स्थितियाँ अनुकूल होते ही अंकुरित होता है। कर्मफल भी बीज की भाँति संचितावस्था में रहता है पर नष्ट नहीं होता।

मनुष्य से वांछित है कि वह पथिक भाव को गहराई से समझे, निष्काम भाव से चले, निरंतर कर्मरत रहे। अपनी कविता ‘कर्मण्येवाधिकारस्ते’ उद्धृत करना चाहूँगा-

भीड़ का जुड़ना,

भीड़ का छिटकना,

इनकी आलोचनाएँ,

उनकी कुंठाएँ,

विचलित नहीं करतीं

तुम्हें पथिक..?

पथगमन मेरा कर्म,

पथक्रमण मेरा धर्म,

प्रशंसा, निंदा से

अलिप्त रहता हूँ,

अखंडित यात्रा पर

मंत्रमुग्ध रहता हूँ,

पथिक को दिखते हैं

केवल रास्ते,

इसलिए प्रतिपल

कर्मण्येवाधिकारस्ते!

 

विचार कीजिएगा।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

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☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १७५ – देश-परदेश – जिस गांव जाना नहीं उसका रास्ता क्यों पूछना ? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १७५ ☆ देश-परदेश – जिस गांव जाना नहीं उसका रास्ता क्यों पूछना ? ☆ श्री राकेश कुमार ☆

बचपन से ये ही सब सुनते आ रहें हैं।सयाने कहा करते थे,उस गली का रास्ता क्यों पूछना, जहां जाना ही नहीं हैं ? अपने काम से मतलब रखो, अपने उद्देश्य की तरफ ध्यान लगाओ आदि।

विगत कुछ वर्षों से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के प्रसार से संपूर्ण विश्व से पल पल की खबर कुछ क्षणों में हम सबकी स्क्रीन पर रहती हैं।

आज चुनाव परिणाम आने हैं, सभी लोग टीवी पर  बड़ी खबर / ब्रेकिंग न्यूज सुन सुन कर अपने आप को अपडेट कर रहें हैं।

सड़कों पर भीड़ बिल्कुल भी नहीं है, सरकारी दफ्तर/ बैंक आदि खुले है,परंतु ग्राहक नगण्य हैं।दोपहर में जब सब्जी के ठेले पर पहुंचे, तो विक्रेता गिड़गिड़ाने लगा, बोला सुबह से बोहनी नहीं हुई हैं। सस्ते भाव में सब्जी खरीद लेवें, गर्मी से सब्जी खराब हो जाएगी। हमने भी उसकी आपदा से अवसर निकाल कर आवश्यकता से अधिक सब्जी खरीद ली है।

 सुबह एक मित्र को फोन किया तो बोला कल बात करना आज चुनाव परिणामों में व्यस्त हैं। एक अन्य मित्र को फोन किया, वो तुनक कर बोला तुम्हे कोई काम नहीं है, क्या ? आज चुनाव का मज़ा लो।हमने उसको बताया एक अन्य मित्र की तबियत बहुत नाज़ुक बनी हुई है, उसकी कुशल क्षेम पूछने अभी चलते हो क्या  ? उसने आज के लिए मना कर दिया।

आज के चुनाव परिणाम पूर्व और दक्षिण के दो दो राज्यों के आने हैं। हम यहां उत्तर भारत में रहते हैं। उन चारों राज्यों में हमारा कोई संबंधी भी नहीं रहता है। हम जीवन में कभी वहां गए भी नहीं हैं, फिर वहां के परिणामों से हमें क्या लेना देना ? मोहल्ले के एक परिचित कुछ समय से बीमार हैं, वहां कभी झांका तक नहीं है। बाकी पूरी दुनिया की ख़बर हमें रहनी चाहिए।

मुकेश जी का पुराना गीत “जिस गली में तेरा घर ना हो बालमा, उस गली से हमें गुजरना नहीं” के बोल अब बेमानी हो चुके हैं। आजकल तो हम लोग किसी भी गली में जाकर नया बलमा बना लेते है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८५ ⇒ संगत पंगत की ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “संगत पंगत की ।)

?अभी अभी # ९८६ ⇒ आलेख –  संगत पंगत की  ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

संगत पंगत की कर लीजे ! संतों का सत्संग तो हमने बहुत कर लिया, संतों का रंग भी हम पर चढ़ भी गया, और इतना चढ़ा कि हमें धर्म और राजनीति दोनों की समझ आ गई।

आज के संत पलायन वादी नहीं, वे पहाड़ों में कंदराओं में जाकर नहीं बैठ जाते, वे दीमक को मौका ही नहीं देते, कि वे मधुमक्खी की तरह देह से चिपककर, उनके तपस्वी, ओजस्वी, आभायुक्त और विरक्त शरीर का अलंकार बनें।

वे भी निष्काम कर्म का पालन करते हुए, इस मायावी जगत में रहकर मानव मात्र के कल्याण के लिए कृत संकल्पित रहते हैं।

ग्राम्य सभ्यता ने ही हमें समय पर उठना बैठना, चलना फिरना सिखाया। हम प्रकृति के इशारों पर सूर्योदय के पहले ही सुख की नींद त्याग, दिशा मैदान के लिए निकल जाते थे। चलते चलते ही नीम और बबूल की पतली टहनी तोड़ी और कोलगेट टूथ ब्रश तैयार।

रफ और टफ वातावरण में नित्य कर्म, हमारी दैनिक दिनचर्या का ही एक अंग था। बुजुर्गों के साथ, प्रसाधन का संसाधन, मात्र धोती लोटा होता था, कुएं, बावड़ी और नदियों की कोई कमी नहीं थी।।

बस समझिए, वहीं से पंगत की संगत शुरु हो गई थी।

संयुक्त परिवार के सभी बच्चे एक साथ बैठकर भोजन करते थे। नानी, दादी और ताऊजी हमें उंगली पकड़कर शादियों में जीमने ले जाते थे। अपना लोटा ग्लास ही हमारा निमंत्रण पत्र होता था।

नर्सरी केजी, की ट्रेनिंग के पश्चात् हम शहर आ गए, गली, मोहल्लों और बाड़ों में बस गए। सिगरी न्यौते के बुलावे के लिए, नाई घर पर आता था। बाहर साइकिल पर से ही मौखिक निमंत्रण दे, चला जाता था। समय, स्थान और प्रयोजन। हमें तो सिर्फ जीमने से मतलब था।।

घरों में तब रसोई गैस का आगमन नहीं हुआ था। चूल्हे के साथ सिगड़ी का भी उपयोग शुरू हो चुका था। सिगरी न्यौते का अर्थ, घर में उस रोज सिगड़ी नहीं जलेगी। घर के सभी सदस्य, जिनमें अतिथि देव, साले बहनोई सभी शामिल होते थे, सादर आमंत्रित थे।

आज जिसे हम भंडारा कहते हैं, वही पहले पंगत कहलाती थी। जब तक एक पंगत नहीं उठ जाती थी, दूसरी नहीं लगती थी।

बाकायदा पानी और बुहारी से धर्मशाला के फर्श को स्वच्छ किया जाता था। फिर बारी आती थी, पत्तल दोने की। पत्तल उल्टी सीधी होती थी, उसे परखकर सीधा किया जाता था। दोने फूटे ना हों, इसका विशेष खयाल रखा जाता था। पहले रायता फैलता था, आजकल जान बूझकर फैलाया जाता है।।

पंगत का अपना एक मेनू होता था। आलू का साग, पूड़ी, नुक्ती सेंव और लड्डू। मौसम के हिसाब से खीर अथवा रायता। आप जितना खाते, उतनी ही अधिक आपकी मनुहार होती। जो ठूंस ठूंस कर खाते थे, उनकी तो बात ही कुछ और थी, लेकिन जो नहीं खाते थे, उन्हें भी ठूंस ठूंस कर खिलाया जाता था। लेकिन तब के लोग कुछ अलग ही मिट्टी के बने थे, वे पंगत में ना करना जानते ही नहीं थे।।

पंगत का एक अनुशासन होता था। नमः पार्वती पतये हर हर महादेव के जयघोष के साथ, पहले अन्नदेव को प्रणाम किया जाता था, उसके बाद ही पंगत शुरू होती थी। सामूहिक संगत का आनंद आता था पंगत में। पंगत के बीच में से नहीं उठा जाता था। जब सबका भोजन हो जाता था, उसके बाद ही पंगत से उठकर हाथ धोया जाता था।

लगता है, अब पंगत और संगत के दिन लद गए। बफैलो की तरह खड़े खड़े खाना ही हमारी नियति बन गया है। सात्विक भोजन का स्थान मोमोज, मंच्यूरीअन, पिज्जा और पास्ता ने ले लिया है। हम कहते हैं गिद्ध भोज, और उसमें शामिल भी होते हैं।

कितने बदल गए आजकल मजबूरी में महात्मा गांधी।।

वैसे जब आयोजन बड़े बड़े रिजॉर्ट और पंच सितारा होटलों में होंगे, तो काहे की पंगत। लेकिन हां, वहां संगत के लिए कॉकटेल पार्टियां हैं न। वैसे भी लाखों की ज्वैलरी, हजारों के सूट, टाई और चमचमाते जूते पहन, कौन किसी पंगत का रुख करता है। यह मन्नू भंडारी का महाभोज है, किसी पंगत की संगत नहीं ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८५ ⇒ खाली स्थान ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “खाली स्थान।)

?अभी अभी # ९८५ ⇒ आलेख – खाली स्थान ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो भरा हुआ है, वह तो हमें दिखाई दे जाता है, लेकिन क्या जो खाली है, वह भी हम देख सकते हैं। हमें बैठना है, और सभी कुर्सियां जब भरी होती हैं, तब हमें एक खाली कुर्सी की तलाश होती है। जब हॉल में कोई नहीं होता, सभी कुर्सियां खाली ही होती हैं।

जब हम पढ़ते थे, तब खाली स्थानों को हमें भरना होता था। एक वाक्य के बीच में कुछ शब्दों की जगह खाली स्थान होता था, जिसे हमें अर्थपूर्ण शब्दों से भरना होता था।।

अर्थ और व्यर्थ की तरह खाली और भरा हुआ दोनों का अपना अपना महत्व है। पहले जो खाली होता है, उसको भरने की कोशिश की जाती है, और बाद में उसे ही खाली करने का प्रयास किया जाता है।

अगर हमें प्यास लगी है, तो एक खाली ग्लास हमारे किसी काम का नहीं। एक भरा हुआ पानी का ग्लास ही हमारी प्यास बुझा सकता है। हम पानी पी जाते हैं, ग्लास फिर खाली हो जाता है।

ग्लास कभी भरकर नहीं रखा जाता। खाली रहना ही उसकी नियति है। अगर वह भरेगा तो खाली होने के लिए ही। हमारे लिए एक खाली ग्लास का कोई महत्व नहीं। जब कि ग्लास को पीकर खाली हमने ही किया है। हम बड़े चतुर हैं, हम खाली स्थान का उपयोग अपने लिए ही करते हैं। बस, उसे भरते रहते हैं, खाली करते रहते हैं।।

हम जब भीड़ में होते हैं, तो एकांत ढूंढते हैं, और जब अकेले होते हैं, तो किसी का साथ तलाशते हैं। पेट खाली है, भूख लग रही है, पेट में फिर भी चूहे दौड़ रहे हैं। पेट को पहले भरा जा रहा है। भूख शांत हुई, हम संतुष्ट हुए। लेकिन कब तक ! बहुत हुआ, सुबह हो गई, अब पेट खाली करना है। सोचते रहिए अन्न का अर्थ और व्यर्थ का अर्थ।

खाली दिमाग शैतान का घर ! क्या किया जाए, कुछ सकारात्मक सोचा जाए, चिंतन मनन किया जाए। एक दिल सौ अफसाने। किस किसकी सुनें, किस किसकी मानें।

सोच सोचकर, चिंतन कर करकर, व्यर्थ की चिंता और बढ़ा ली। बहुत सोचते हो आप। अगर इसी तरह सोचते रहे तो अवसादग्रस्त हो जाओगे। ध्यान करो, चित्त को शांत करो, विचार शून्य रहने की कोशिश करो।।

इस धरती पर दो तिहाई पानी है, फिर भी इंसान की प्यास नहीं बुझती। कहीं वह जरूरत से अधिक भरा हुआ है तो कहीं अंदर से पूरा खाली है। जहां पैसा है, वहां चैन नहीं और जहां पैसा नहीं, वहां भी बैचेनी है। हर जगह एक खाली स्थान अभाव का है, जिसे हर प्राणी भरने की कोशिश करता है।

हम शून्य को भरने की कोशिश करते हैं। खाई में भी शून्य होता है। अमीरी गरीबी की खाई तो हम भर नहीं सकते, अपने अंक के आगे तो कई शून्य लगा सकते हैं। अपना अभाव दूर होते ही हमारा भाव भी बदल जाता है। एक संपन्न, भरा पूरा, सुखी परिवार।।

राजनीति में बहुत खाली स्थान है और हर खाली स्थान एक शैतान का घर है। हमारा मन भी एक चतुर, चंचल राजनीतिज्ञ ही है, उसके चुनाव पर किसी आयोग का कोई अंकुश नहीं। उसे विवेक के अधीन कर दीजिए, वह शांत हो जाएगा।

हमारे आसपास का शून्य तो हमें दिखाई नहीं देता, और हम अंदर से भरे भरे रहते हैं। शून्य खालीपन नहीं, अवसाद नहीं, असफलता नहीं, शून्य में सभी संभावनाएं हैं।

ग्लास अगर आधा खाली है तो आधा भरा भी है। सबके ग्लास भरे रहें, बूंद बूंद ही सही प्रेम और करुणा रस रिसता रहे।

कोई स्थान खाली ना हो, अमृत रस बरसता रहे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३३३ – स्टैच्यू..! ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३३३ स्टैच्यू..! ?

संध्याकाल है। शब्दों का महात्म्य देखिए कि प्रत्येक व्यक्ति उनका अर्थ अपने संदर्भ से ग्रहण कर सकता है। संध्याकाल, दिन का अवसान हो सकता है तो जीवन की सांझ भी। इसके सिवा भी कई संदर्भ हो सकते हैं। इस महात्म्य की फिर कभी चर्चा करेंगे। संप्रति घटना और उससे घटित चिंतन पर मनन करते हैं।

सो अस्त हुए सूर्य की साक्षी में कुछ सौदा लेने बाज़ार निकला हूँ। बाज़ार सामान्यत: पैदल जाता हूँ। पदभ्रमण, निरीक्षण और तदनुसार अध्ययन का अवसर देता है। यूँ भी मुझे विशेषकर मनुष्य के अध्ययन में ख़ास रुचि है। संभवत: इसी कारण एक कविता ने मुझसे लिखवाया, ‘उसने पढ़ी आदमी पर लिखी किताबें/ मैं आदमी को पढ़ता रहा।’

आदमी को पढ़ने की यात्रा पुराने मकानों के बीच की एक गली से गुज़री। बच्चों का एक झुंड अपने कल्लोल में व्यस्त है। कोई क्या कह रहा है, समझ पाना कठिन है। तभी एक स्पष्ट स्वर सुनाई देता है, ‘गौरव स्टेच्यू!’ देखता हूँ एक लड़का बिना हिले-डुले बुत बनकर खड़ा हो गया है। . ‘ ऐ, जल्दी रिलीज़ कर। हमको खेलना है’, एक आवाज़ आती है। स्टैच्यू देनेवाली बच्ची खिलखिलाती है, रिलीज़ कर देती है और कल्लोल जस का तस।

भीतर कल्लोल करते विचारों को मानो दिशा मिल जाती है। जीवन में कब-कब ऐसा हुआ कि  परिस्थितियों ने कहा ‘स्टैच्यू’ और अपनी सारी संभावनाओं को रोककर  बुत बनकर खड़ा होना पड़ा! गिरना अपराध नहीं है पर गिरकर उठने का प्रयास न करना अपराध है। वैसे ही नियति के हाथों स्टैच्यू होना यात्रा का पड़ाव हो सकता है पर गंतव्य नहीं। ऐसे स्टैच्यू सबके जीवन में आते हैं। विलक्षण होते हैं जो स्टैच्यू से निकलकर जीवन की मैराथन को नये आयाम और नयी ऊँचाइयाँ देते हैं।

नये आयाम देनेवाला ऐसा एक नाम है अरुणिमा सिन्हा का। अरुणिमा, बॉलीबॉल और फुटबॉल की उदीयमान युवा खिलाड़ी रही। दोनों खेलों में अपने राज्य उत्तर प्रदेश का प्रतिनिधित्व कर चुकी थी। सन 2011 में रेलयात्रा करते हुए बैग और सोने की चेन लुटेरों के हवाले न करने की एवज़ में उन्हें चलती रेल से नीचे फेंक दिया गया। इस बर्बर घटना में अरुणिमा को अपना एक पैर खोना पड़ा। केवल 23 वर्ष की आयु में नियति ने स्टैच्यू दे दिया।

युवा खिलाड़ी अब न फुटबॉल खेल सकती थी, न बॉलीबॉल। नियति अपना काम कर चुकी थी पर अनेक अवरोधक लगाकर सूर्य के आलोक को रोका जा सकता है क्या? कृत्रिम टांग लगवाकर अरुणिमा ने पर्वतारोहण का अभ्यास आरम्भ किया।  नियति दाँतो तले उँगली दबाये देखती रह गयी जब 21 मई 2013 को अरुणिमा ने माउंट एवरेस्ट फतह कर लिया। अरुणिमा सिन्हा स्टैच्यू को झिंझोड़कर दुनिया की सबसे ऊँची चोटी पर पहुँचने वाली पहली दिव्यांग पर्वतारोही बनीं।

चकबस्त का एक शेर है,

कमाले बुज़दिली है, पस्त होना अपनी आँखों में

अगर थोड़ी सी हिम्मत हो तो क्या हो सकता नहीं।

स्टैच्यू को अपनी जिजीविषा से, अपने साहस से स्वयं रिलीज़ करके, अपनी ऊर्जा के सकारात्मक प्रवाह से अरुणिमा होनेवालों  की अनगिनत अद्भुत कथाएँ हैं। अपनी आँख में विजय संजोने वाले कुछ असाधारण व्यक्तित्वों की प्रतिनिधि कथाओं की चर्चा उवाच के अगले अंकों में करने का यत्न रहेगा। प्रक्रिया तो चलती रहेगी पर कुँवर नारायण की पंक्तियाँ सदा स्मरण रहें, ‘हारा वही जो लड़ा नहीं।’..इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ जब ‘मैं सही हूं’ बन जाए रिश्तों का दुश्मन…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – आजाद देश की पहचान। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।

☆ आलेख ☆ जब ‘मैं सही हूं’ बन जाए रिश्तों का दुश्मन…  ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

अलग परवरिश और बढ़ता अहंकार, क्यों टूट रहे हैं आज के रिश्ते

आज के समय में महानगरों में रहने वाले युवाओं और नवविवाहित जोड़ों के बीच रिश्तों में बढ़ती खटास एक गंभीर सामाजिक चिंता बनती जा रही है। आए दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़े, मनमुटाव, फिर दूरी और अंततः तलाक जैसे मामलों में बढ़ोतरी इस बात का संकेत है कि समस्या कहीं गहरी है। सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

सबसे बड़ा कारण है कि आज के युवा यह समझने में असफल हो रहे हैं कि पति-पत्नी दोनों अलग-अलग परिवारों और संस्कृतियों में पले-बढ़े होते हैं। उनकी सोच, आदतें, जीवनशैली और अपेक्षाएं अलग होना स्वाभाविक है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है जब दोनों में से कोई भी एक-दूसरे को समझने और स्वीकार करने की बजाय यह साबित करने में लग जाता है कि “मैं सही हूं” और “तुम गलत हो”।

पहले के समय में संयुक्त परिवारों का चलन अधिक था। माता-पिता और बुजुर्ग घर में मौजूद रहते थे और वे रिश्तों को संभालने, समझाने और संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। वे अनुभव के आधार पर छोटी-छोटी बातों को बढ़ने नहीं देते थे और समय रहते समाधान निकाल लेते थे। लेकिन आज के समय में अधिकांश युवा अपने माता-पिता से दूर, महानगरों में अकेले रह रहे हैं। ऐसे में जब कोई विवाद होता है, तो उसे सुलझाने वाला कोई नहीं होता, और छोटी बात भी बड़ा रूप ले लेती है।

एक और बड़ी समस्या है अहम (ego) और हावी होने की प्रवृत्ति। आज के कई रिश्तों में यह देखने को मिलता है कि दोनों ही अपने-अपने तरीके से चीजों को चलाना चाहते हैं। कोई झुकना नहीं चाहता, कोई समझौता नहीं करना चाहता। हर दिन किसी न किसी बात पर बहस होना, एक-दूसरे को गलत साबित करने की कोशिश करना, धीरे-धीरे रिश्ते में कड़वाहट घोल देता है। नतीजा यह होता है कि घर में बातचीत कम होती जाती है, सन्नाटा बढ़ता है और अंततः रिश्ते टूटने की कगार पर पहुंच जाते हैं।

रिश्ते कोई प्रतिस्पर्धा (competition) नहीं होते, जहां जीत-हार तय करनी हो। यह एक साझेदारी (partnership) है, जहां दोनों को मिलकर चलना होता है। अगर हर दिन लड़ाई ही “जीवन का हिस्सा” बन जाए, तो वह रिश्ता टिक नहीं सकता।

आज जरूरत इस बात की है कि युवा यह समझें कि रिश्ते समझ और सहयोग से चलते हैं, न कि अहंकार और जिद से। एक-दूसरे की बात सुनना, उनकी भावनाओं को समझना और उनके नजरिए को स्वीकार करना बेहद जरूरी है। हर बात पर प्रतिक्रिया देने की बजाय कई बार चुप रहना और स्थिति को शांत होने देना भी एक समझदारी है।

इसके साथ ही, यह भी जरूरी है कि हम यह स्वीकार करें कि पुरुष और महिला दोनों अलग-अलग सोच रखते हैं। उनकी भावनाएं व्यक्त करने का तरीका अलग होता है। यही बात प्रसिद्ध पुस्तक “Men Are from Mars, Women Are from Venus” भी बताती है कि दोनों के बीच अंतर स्वाभाविक है। इसलिए यह अपेक्षा करना कि सामने वाला व्यक्ति बिल्कुल हमारे जैसा सोचने लगे, न तो सही है और न ही संभव।

समाधान बहुत कठिन नहीं है।

सबसे पहले, एक-दूसरे को बदलने की कोशिश बंद करनी होगी।

दूसरा, खुलकर बातचीत को बढ़ावा देना होगा।

तीसरा, छोटी-छोटी बातों को नजरअंदाज करना सीखना होगा। और

सबसे महत्वपूर्ण, रिश्ते को “जीतने” की जगह “बचाने” की सोच अपनानी होगी।

अंततः, यह समझना जरूरी है कि विवाह सिर्फ साथ रहने का नाम नहीं है, बल्कि एक-दूसरे को समझने, स्वीकार करने और सहयोग देने का वादा है। अगर आज के युवा इस सच्चाई को समय रहते समझ लें तो रिश्तों में बढ़ती दूरियों को रोका जा सकता है और एक खुशहाल जीवन की ओर बढ़ा जा सकता है।

© डॉ रीटा अरोड़ा

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८४ ⇒ दिहाड़ी श्रमिक ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दिहाड़ी श्रमिक।)

?अभी अभी # ९८४ ⇒ आलेख – दिहाड़ी श्रमिक ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

(1 मई पर विशेष)

मज़दूर और श्रमिक में वही अंतर है जो एक आदिवासी और वनवासी में है, या कि जो अंतर एक विकलांग और दिव्यांग में है। मज़दूर के पसीने से कम्युनिज्म की बू आती है। वह कभी सीधे मुँह बात नहीं करता। हमेशा हल्ला ही बोला करता है। श्रमिक शब्द बड़ा शालीन और सुसंस्कृत लगता है।

जब तक मेरे शहर में कपड़ा मिलों का बोलबाला था, मज़दूर एकता ज़िंदाबाद थी। हमारी सरकार ने मज़दूर को श्रमिक बनाकर पदोन्नत किया, दैनिक को दिहाड़ी किया। 70 साल में जो नहीं हुआ, हमने कर दिखाया।।

मेरे पास के चौराहे पर प्रशासन ने दिहाड़ी श्रमिकों के लिए एक शेड बनाया है जो सुनसान पड़ा रहता है और दिहाड़ी श्रमिकों का जमावड़ा सड़क पर एक भीड़ का स्वरूप अख्तयार कर लेता है। श्रमिक का मेहनती, स्वस्थ और तंदुरुस्त होना ज़रूरी है। कारीगर तो अपने हुनर का पारंगत होता है, उसका सेहत से क्या लेना देना।

‌ये दिहाड़ी श्रमिक साईकल पर नहीं, मोटर साईकल पर आते हैं। कोई दोस्त इन्हें छोड़ जाता है। एंड्राइड फ़ोन होना आजकल सम्पन्नता की निशानी नहीं, समझदारी की निशानी है। आप जब किसी कारण इनकी सेवाएँ प्राप्त करना चाहेंगे, तो ये पहले आपको ऊपर से नीचे तक निहारेंगे। मानो आपकी औकात पता कर रहे हों।

जब उन्हें खात्री हो जाती है कि आप श्रमिक नहीं, श्रमिक की ‌सेवाएँ लेने आए हो, तो सम्मान से पूछते हैं, बाबूजी ! काम क्या है। आप काम समझाएं, उसके पहले वे आपको समस्या बता देंगे। एक आदमी के बस का काम नहीं है, अथवा एक दिन में जितना होगा कर देंगे।।

वैसे ‌सरकार की न्यूनतम दर एक दिन की 873 ₹ है, आपको जो देना हो, दे देना। हर काम के विशेषज्ञ होते हैं यहाँ। रंग रोगन अथवा सुतारी का काम ठेके पर भी किया जाता है।

आपकी तक़दीर अच्छी हो तो दिहाड़ी मजदूर भी अच्छा ही मिल जाता है।

‌श्रम की महत्ता कभी कम नहीं होने वाली। सुतारी, बिजली का काम, प्लम्बर और रंग-रोगन जैसा काम आजकल कामकाजी नौकरीपेशा इंसान के बस का नहीं। कुछ काम श्रम में नहीं शर्म में आते हैं।

जब कभी घर की सीवेज लाइन चोक हो जाती है, विशेषज्ञ को ढूंढा जाता है। जो मिलता है, मुँह फाड़ता है। ‌यह काम सबके बस का नहीं। मरता क्या न करता, मुंहमांगे दाम पर समस्या का निदान करवाया जाता है। व्हाट ए रिलीफ ?

इधर काम निकला, उधर प्रलाप शुरू ! छोटे से काम के इतने पैसे ? श्रम की महत्ता तब समझ में आती है, जब हम अपना देश छोड़ विदेश जाते हैं। वहाँ श्रम को केवल सम्मान ही नहीं, उचित मानदेय भी है।

एक छुट्टी मजदूरी वाले का कोई भविष्य नहीं ! जब ये संगठित होते हैं तो शोषक नज़र आते हैं। शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाना बग़ावत है, इसलिए समय रहते इन्हें कुचलना भी पड़ता है। इनके नेताओं के साथ समझौते भी करना पड़ते हैं। कभी ये सरकारें बनाते-गिराते थे, आजकल खुद ही गिरे हुए हैं।।

श्रम दिवस पर श्रम को सम्मान दीजिए, कल से जैसा चल रहा है, चलते रहने दीजिए। मज़दूर एकता ज़िंदाबाद..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३२० ☆ मोहे चिन्ता न होय… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मोहे चिन्ता न होय। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – अब तो आन बचाओ कन्हाई / स्वर- आरिफ & रूख़्सार)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३२० ☆

☆ मोहे चिन्ता न होय… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘उम्र भर ग़ालिब, यही भूल करता रहा/ धूल चेहरे पर थी, आईना साफ करता रहा’– ‘इंसान घर बदलता है, लिबास बदलता है, रिश्ते बदलता है, दोस्त बदलता है– फिर भी परेशान रहता है, क्योंकि वह खुद को नहीं बदलता।’ यही है ज़िंदगी का सत्य व हमारे दु:खों का मूल कारण, जहां तक पहुंचने का इंसान प्रयास ही नहीं करता। वह सदैव इसी भ्रम में रहता है कि वह जो भी सोचता व करता है, केवल वही ठीक है और उसके अतिरिक्त सब ग़लत है और वे लोग  दोषी हैं, अपराधी हैं, जो आत्मकेंद्रितता के कारण अपने से इतर कुछ देख ही नहीं पाते। वह चेहरे पर लगी धूल को तो साफ करना चाहता है, परंतु आईने पर दिखाई पड़ती धूल को साफ करने में व्यस्त रहता है… ग़ालिब का यह शेयर हमें हक़ीक़त से रूबरू कराता है। जब तक हम आत्मावलोकन कर, अपनी गलती को स्वीकार नहीं करते; हमारी भटकन पर विराम नहीं लगता। वास्तव में हम ऐसा करना ही नहीं चाहते। हमारा अहम् हम पर अंकुश लगाता है, जिसके कारण हमारी सोच पर ज़ंग लग जाता है और हम कूपमंडूक बनकर रह जाते हैं। हम  जीवन में अपनी इच्छाओं की पूर्ति तो करना चाहते हैं, परंतु उचित राह का ज्ञान न होने के कारण अपनी मंज़िल पर नहीं पहुंच पाते। हम चेहरे की धूल को आईना साफ करके मिटाना चाहते हैं। सो! हम आजीवन आशंकाओं से घिरे रहते हैं और उसी चक्रव्यूह में फंसे, सदैव चीखते -चिल्लाते रहते हैं, क्योंकि हममें आत्मविश्वास का अभाव होता है। यह सत्य ही है कि जिन्हें खुद पर भरोसा होता है, वे शांत रहते हैं तथा उनके हृदय में संदेह, संशय, शक़ व दुविधा का स्थान नहीं होता। वे अंतर्मन की शक्तियों को संचित कर निरंतर आगे बढ़ते रहते हैं; कभी पीछे मुड़कर नहीं देखते। वास्तव में उनका व्यवहार युद्धक्षेत्र में तैनात सैनिक के समान होता है, जो सीने पर गोली खाकर शहीद होने में विश्वास रखता है और आधे रास्ते से लौट आने में भी उसकी आस्था नहीं होती।

परंतु संदेहग्रस्त इंसान सदैव उधेड़बुन में खोया रहता है; सपनों के महल तोड़ता व बनाता रहता है। वह अंधेरे में गलत दिशा में तीर चलाता रहता है। इसके निमित्त वह घर को वास्तु की दृष्टि से शुभ न मानकर उस घर को बदलता है; नये-नये लोगों से संपर्क साधता है; रिश्तों व परिवारजनों तक को नकार देता है; मित्रों से दूरी बना लेता है… परंतु उसकी समस्याओं का अंत नहीं होता। वास्तव में हमारी समस्याओं का समाधान दूसरों के पास नहीं; हमारे ही पास होता है। दूसरा व्यक्ति आपकी परेशानियों को समझ तो सकता है; आपकी मन:स्थिति को अनुभव कर सकता है, परंतु उस द्वारा उचित व सही मार्गदर्शन करना कैसे करना व समस्याओं का समाधान करना कैसे संभव होगा?

रिश्ते, दोस्त, घर आदि बदलने से आपके व्यवहार व दृष्टिकोण में परिवर्तन नहीं आता; न ही लिबास बदलने से आपकी चाल-ढाल व व्यक्तित्व में परिवर्तन होता है। सो! आवश्यकता है,– सोच बदलने की; नकारात्मकता को त्याग सकारात्मकता अपनाने की;  हक़ीक़त से रू-ब-रू होने की; सत्य को स्वीकारने की। जब तक हम इन्हें दिल से स्वीकार नहीं करते; हमारे कार्य-व्यवहार व जीवन-शैली में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं आता।

‘कुछ हंसकर बोल दो/ कुछ हंस कर टाल दो/ परेशानियां बहुत हैं/  कुछ वक्त पर डाल दो’ में सुंदर व उपयोगी संदेश निहित है। जीवन में सुख-दु:ख, खशी-ग़म आते-जाते रहते हैं। सो! निराशा का दामन थाम कर बैठने से उनका समाधान नहीं हो सकता। इस प्रकार वे समय के अनुसार विलुप्त तो हो सकते हैं, परंतु समाप्त नहीं हो सकते। इस संदर्भ में महात्मा बुद्ध के विचार बहुत सार्थक प्रतीत होते हैं। जीवन में सामंजस्य स्थापित करने के लिए आवश्यक है कि हम सबसे हंस कर बात करें और अपनी परेशानियों को हंस कर टाल दें, क्योंकि समय परिवर्तनशील है और  यथासमय दिन-रात व ऋतु-परिवर्तन अवश्यंभावी है। कबीरदास जी के अनुसार ‘ऋतु आय फल होय’ अर्थात् समय आने पर ही फल की प्राप्ति होती है। लगातार भूमि में सौ घड़े जल उंडेलने का कोई लाभ नहीं होता, क्योंकि समय से पहले व भाग्य से अधिक किसी को संसार में कुछ भी प्राप्त नहीं होता। इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं स्वरचित मुक्तक संग्रह ‘अहसास चंद लम्हों का’ की पंक्तियां ‘दिन रात बदलते हैं/ हालात बदलते हैं/ मौसम के साथ-साथ/ फूल और पात बदलते हैं।’ इसी के साथ मैं कहना चाहूंगी, ‘ग़र साथ हो सुरों का/ नग़मात बदलते हैं’ अर्थात् समय व स्थान परिवर्तन से मन:स्थिति व मनोभाव भी बदल जाते हैं; जीवन में नई उमंग-तरंग का पदार्पण हो जाता है और ज़िंदगी उसी रफ़्तार से पुन: दौड़ने लगती है।

चेहरा मन का आईना है, दर्पण है। जब हमारा मन प्रसन्न होता है, तो ओस की बूंदे भी हमें मोतियों सम भासती हैं और मन रूपी अश्व तीव्र गति से भागने लगते हैं। वैसे भी चंचल मन तो पल भर में तीन लोगों की यात्रा कर लौट आता है। परंतु इससे विपरीत स्थिति में हमें प्रकृति आंसू बहाती प्रतीत होती है; समुद्र की लहरें चीत्कार करने भासती हैं और मंदिर की घंटियों के अनहद स्वर के स्थान पर चिंघाड़ें सुनाई पड़ती हैं। इतना ही नहीं, गुलाब की महक के स्थान पर कांटो का ख्याल मन में आता है और अंतर्मन में सदैव यही प्रश्न उठता है, ‘यह सब कुछ मेरे हिस्से में क्यों? क्या है मेरा कसूर और मैंने तो कभी बुरे कर्म किए ही नहीं।’ परंतु बावरा मन भूल जाता है  कि इंसान को पूर्व-जन्मों के कर्मों का फल भी भुगतना पड़ता है। आखिर कौन बच पाया है…कालचक्र की गति से? भगवान राम व कृष्ण को आजीवन आपदाओं का सामना करना पड़ा। कृष्ण का जन्म जेल में हुआ, पालन ब्रज में हुआ और वे बचपन से ही जीवन-भर मुसीबतों का सामना करते रहे। राम को देखिए, विवाह के पश्चात् चौदह वर्ष का वनवास; सीता-हरण; रावण को मारने के पश्चात् अयोध्या में राम का राजतिलक; धोबी के आक्षेप करने पर सीता का त्याग; विश्वामित्र के आश्रम में आश्रय ग्रहण; सीता का अपने बेटों को अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा पकड़ने पर सत्य से अवगत कराना; राम की सीता से मुलाकात; अग्नि-परीक्षा और अयोध्या की ओर गमन। पुनः अग्नि परीक्षा हेतु अनुरोध करने पर सीता का धरती में समा जाना’ क्या उन्होंने कभी अपने भाग्य को कोसा? क्या वे आजीवन आंसू बहाते रहे? नहीं, वे तो आपदाओं को खुशी से गले से लगाते रहे। यदि आप भी खुशी से कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो ज़िंदगी कैसे गुज़र जाती है– पता ही नहीं चलता, अन्यथा हर पल जानलेवा हो जाता है।

इन विषम परिस्थितियों में दूसरों के दु:ख को सदैव महसूसना चाहिए, क्योंकि यह इंसान होने का प्रमाण है। अपने दर्द का अनुभव तो हर इंसान करता है और वह जीवित कहलाता है। आइए! समस्त ऊर्जा को दु:ख निवारण में लगाएं। खुद भी हंसें और संसार के प्राणी-मात्र के प्रति संवेदनशील बनें; आत्मावलोकन कर अपने दोषों को स्वीकारें। समस्याओं में उलझें नहीं, समाधान निकालें। अहम् का त्याग कर अपनी दुष्प्रवृत्तियों को सद्प्रवृत्तियों में परिवर्तित करने की चेष्टा करें। गलत लोगों की संगति से बचें। केवल दु:ख में ही सिमरन न करें, सुख में भी उस सृष्टि-नियंता को भूलें नहीं… यही है दु:खों से मुक्ति पाने का मार्ग, जहां मानव अनहद-नाद में अपनी सुधबुध खोकर, अलौकिक आनंद में अवगाहन कर राग-द्वेष से ऊपर उठ जाता है। इस स्थिति में वह प्राणी-मात्र में परमात्मा-सत्ता की झलक पाता है और बड़ी से बड़ी मुसीबत में परेशानियां उसका बाल भी बांका नहीं कर पातीं। अंत में कबीरदास जी की पंक्तियों को उद्धृत कर अपनी लेखनी को विराम देना चाहूंगी, ‘कबिरा चिंता क्या करे, चिंता से क्या होय/ मेरी चिंता हरि करे, मोहे चिंता ना होय।’ चिंता किसी रोग का निदान नहीं है। इसलिए चिंता करना व्यर्थ है। परमात्मा हमारे हित के बारे में हम से बेहतर जानते हैं, तो हम चिंता क्यों करें? सो! हमें उस पर अटूट विश्वास करना चाहिए, क्योंकि वह हमारे हित में हमसे बेहतर निर्णय लेगा।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१९ ☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ख्वाब : बहुत लाजवाब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१९ ☆

☆ ख्वाब : बहुत लाजवाब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘जो नहीं है हमारे पास/ वो ख्वाब है/ पर जो है हमारे पास/ वो लाजवाब है’ शाश्वत् सत्य है, परंतु मानव उसके पीछे भागता है, जो उसके पास नहीं है। वह उसके प्रति उपेक्षा भाव दर्शाता है, जो उसके पास है। यही है दु:खों का मूल कारण और यही त्रासदी है जीवन की। इंसान अपने दु:खों से नहीं, दूसरे के सुखों से अधिक दु:खी व परेशान रहता है।

मानव की इच्छाएं अनंत है, जो सुरसा के मुख की भांति निरंतर बढ़ती चली जाती हैं और सीमित साधनों से असीमित इच्छाओं की पूर्ति असंभव है। इसलिए वह आजीवन इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और सुक़ून भरी ज़िंदगी नहीं जी पाता। सो! उन पर अंकुश लगाना अनिवार्य है। मानव ख्वाबों की दुनिया में जीता है अर्थात् सपनों को संजोए रहता है। सपने देखना तो अच्छा है, परंतु तनावग्रस्त  रहना जीने की ललक पर ग्रहण लगा देता है। खुली आंखों से देखे गए सपने मानव को प्रेरित करते हैं करते हैं, उल्लसित करते हैं और वह उन्हें साकार रूप प्रदान करने में अपना सर्वस्व झोंक देता है। उस स्थिति में वह आशान्वित रहता है और एक अंतराल के पश्चात् अपने लक्ष्य की पूर्ति कर लेता है।

परंतु चंद लोग ऐसी स्थिति में निराशा का दामन थाम लेते हैं और अपने भाग्य को कोसते हुए अवसाद की स्थिति में पहुंच जाते हैं और उन्हें यह संसार दु:खालय प्रतीत होता है। दूसरों को देखकर वे उसके प्रति भी ईर्ष्या भाव दर्शाते हैं। ऐसी स्थिति में उन्हें अभावों से नहीं; दूसरों के सुखों को देख कर दु:ख होता है–अंतत: यही उनकी नियति बन जाती है।

अक्सर मानव भूल जाता है कि वह खाली हाथ आया है और उसे खाली हाथ जाना है। यह संसार मिथ्या और  मानव शरीर नश्वर है और सब कुछ यहीं रह जाना है। मानव को चौरासी लाख योनियों के पश्चात् यह अनमोल जीवन प्राप्त होता है, ताकि वह भजन सिमरन करके अपने भविष्य को उज्ज्वल बना सके। परंतु वह राग-द्वेष व स्व-पर में अपना जीवन नष्ट कर देता है और अंतकाल खाली हाथ जहान से रुख़्सत हो जाता है। ‘यह किराये का मकान है/ कौन कब तक रह पाएगा’ और ‘यह दुनिया है एक मेला/ हर इंसान यहाँ है अकेला’ स्वरचित गीतों की ये पंक्तियाँ एकांत में रहने की सीख देती हैं। जो स्व में स्थित होकर जीना सीख जाता है, भवसागर से पार उतर जाता है, अन्यथा वह आवागमन के चक्कर में उलझा रहता है।

जो हमारे पास है; लाजवाब है, परंतु बावरा इंसान इस तथ्य से सदैव अनजान रहता है, क्योंकि उसमें आत्म-संतोष का अभाव रहता है। जो भी मिला है, हमें उसमें संतोष रखना चाहिए। संतोष सबसे बड़ा धन है और असंतोष सब रोगों  का मूल है। इसलिए संतजन यही कहते हैं कि जो आपको मिला है, उसकी सूची बनाएं और सोचें कि कितने लोग ऐसे हैं, जिनके पास उन वस्तुओं का भी अभाव है; तो आपको आभास होगा कि आप कितने समृद्ध हैं। आपके शब्द-कोश  में शिकायतें कम हो जाएंगी और उसके स्थान पर शुक्रिया का भाव उपजेगा। यह जीवन जीने की कला है। हमें शिकायत स्वयं से करनी चाहिए, ना कि दूसरों से, बल्कि जो मिला है उसके लिए कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। जो मानव आत्मकेंद्रित होता है, उसमें आत्म-संतोष का भाव जन्म लेता है और वह विजय का सेहरा दूसरों के सिर पर बाँध देता है।

गुलज़ार के शब्दों में ‘हालात ही सिखा देते हैं सुनना और सहना/ वरना हर शख्स फ़ितरत से बादशाह होता है।’

हमारी मन:स्थितियाँ परिस्थितियों के अनुसार परिवर्तित होती रहती हैं। यदि समय अनुकूल होता है, तो पराए भी अपने और दुश्मन दोस्त बन जाते हैं और विपरीत परिस्थितियों में अपने भी शत्रु का क़िरदार निभाते हैं। आज के दौर में तो अपने ही अपनों की पीठ में छुरा घोंपते हैं, उन्हें तक़लीफ़ पहुंचाते हैं। इसलिए उनसे सावधान रहना अत्यंत आवश्यक है। इसलिए जीवन में विवाद नहीं, संवाद में विश्वास रखिए; सब आपके प्रिय बने रहेंगे। जीवन मे ं इच्छाओं की पूर्ति के लिए ज्ञान व कर्म में सामंजस्य रखना आवश्यक है, अन्यथा जीवन कुरुक्षेत्र बन जाएगा।

सो! हमें जीवन में स्नेह, प्यार, त्याग व समर्पण भाव को बनाए रखना आवश्यक है, ताकि जीवन में समन्वय बना रहे अर्थात् जहाँ समर्पण होता है, रामायण होती है और जहाल इच्छाओं की लंबी फेहरिस्त होती है, महाभारत होता है। हमें जीवन में चिंता नहीं चिंतन करना चाहिए। स्व-पर, राग-द्वेष, अपेक्षा-उपेक्षा व सुख-दु:ख के भाव से ऊपर उठना चाहिए; सबकी भावनाओं को सम्मान देना चाहिए और उस मालिक का शुक्रिया अदा करना चाहिए। उसने हमें इतनी नेमतें दी हैं। ऑक्सीजन हमें मुफ्त में मिलती है, इसकी अनुपलब्धता का मूल्य तो हमें कोरोना काल में ज्ञात हो गया था। हमारी आवश्यकताएं तो पूरी हो सकती हैं, परंतु इच्छाएं नहीं। इसलिए हमें स्वार्थ को तजकर,जो हमें मिला है, उसमें संतोष रखना चाहिए और निरंतर कर्मशील रहना चाहिए। हमें फल की इच्छा कभी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि जो हमारे प्रारब्ध में है, अवश्य मिलकर रहता है। अंत में अपने स्वरचित गा त की पंक्तियों से समय पल-पल रंग बदलता/ सुख-दु:ख आते-जाते रहते है/ भरोसा रख अपनी ख़ुदी पर/ यह सफलता का मूलमंत्र रे। जो इंसान स्वयं पर भरोसा रखता है, वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है। इसलिए इस तथ्य को स्वीकार कर लें कि जो नहीं है, वह ख़्वाब है;  जो मिला है, लाजवाब है। परंतु जो नहीं मिला, उस सपने को साकार करने में जी-जान से जुट जाएं, निरंतर कर्मरत रहें, कभी पराजय स्वीकार न करें।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९८२ ⇒ बंटी और बबली ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बंटी और बबली।)

?अभी अभी # ९८२ ⇒ आलेख – बंटी और बबली ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कितना प्यारा नाम है बंटी और बबली ! बंटी है जहां, बबली है वहां। वैसे जरूरी नहीं कि हर बालक का नाम बंटी ही हो, और भी बहुत नाम हैं लाड़ प्यार वाले। कहीं उसे प्यार से बण्डू कहते हैं तो कहीं बिट्टू। जहां बिट्टू है, वहां फिर बिट्टी भी होगी। कहीं उसे बाबू कहते हैं तो कहीं बाबा। हमारा बाबा ही मराठी भाषियों का बाला अथवा बाळा है। बड़े होकर ये ही बाला साहेब ठाकरे और बाला साहेब देवरस कहलाते हैं। कौन जानता था बचपन का बाबू, बड़ा होकर बाबू जगजीवनराम निकलेगा।

जब बंटी की बात चली है तो क्यों न सबसे पहले “आपका बंटी” की ही बात कर ली जाए। जिन्होंने मन्नू भंडारी की कालजयी कृति आपका बंटी पढ़ी है, वे उसके बारे में मुझसे अधिक ही जानते होंगे, लेकिन जिन पाठकों ने यह उपन्यास नहीं पढ़ा, वे मेरा अभी अभी छोड़कर, पहले आपका बंटी पढ़ें।।

कोई भी उपन्यास हाथों हाथ नहीं पढ़ा जाता, लेकिन सन् १९७० में प्रकाशित यह उपन्यास आज के समय में भी कितना प्रासंगिक है, यह तो इस उपन्यास को पढ़ने के बाद ही जाना जा सकता है। इस उपन्यास के दो पक्ष हैं, एक स्त्री पुरुष के टूटते संबंध और बंटी की मनोव्यथा। बाल मनोविज्ञान पर हिंदी साहित्य में यह उपन्यास एक मील का पत्थर है।

फिल्म बंटी और बबली का, मन्नू भंडारी के आपका बंटी से कोई संबंध नहीं होते हुए भी समाज में बढ़ते तनाव, असुरक्षा और अपराध की पृष्ठभूमि में इन पात्रों के मनोविज्ञान का अध्ययन भी जरूरी हो जाता है। माता पिता का अपना व्यवहार किसी बच्चे की जिंदगी अगर बना सकता है, तो तबाह भी कर सकता है।।

एक लेखक कभी अपनी कहानी नहीं कहता। उसके आसपास बिखरी घटनाएं, दास्तान, लोगों की आपबीती, उनके कन्फेशन्स उसे अपनी कलम चलाने के लिए बाध्य कर देते हैं। हर लेखक मसीहा नहीं होता। या तो आवारा मसीहा होता है अथवा स्वदेश दीपक की तरह जिंदा ही किसी सलीब पर टंगा पड़ा होता है।

मन्नू भंडारी इतनी अकेली भी नहीं थी उस समय। राजेंद्र यादव के अलावा मोहन राकेश और कमलेश्वर एक परिवार की तरह ही तो थे। कहानियां लिखी जाती थीं, गर्मागर्म बहस चलती रहती थी और पकौड़ियां भी तली जाती थी। ममता और रवींद्र कालिया भी तब कहां अलग थे, इस लेखक समुदाय से।।

यही सच है, पर तो फिल्म रजनीगंधा बन भी गई, लेकिन आपका बंटी आज भी वहीं अकेला खड़ा है। और फिल्म में भी उसका साथ दिया भी तो किसने बबली ने। लेकिन दोनों मिलकर केवल एक मनोरंजक फिल्म ही बना पाए, इसके अलावा और कुछ नहीं।

धर्मवीर भारती भी एक समय इसी स्कूल के थे। लेकिन बाद में उन्होंने धर्मयुग में इतिहास रचा, तो कमलेश्वर सारिका में जा बैठे और राजेन्द्र यादव ने हंस का दामन थाम लिया। यह भी बुरा नहीं। जब चुक जाओ, तो संपादक बन जाओ। लेकिन यह जरूरी तो नहीं ! मनोहर श्याम जोशी ने साप्ताहिक हिंदुस्तान छोड़ने के बाद ही तो कसप, कुरू कुरू स्वाहा और हरिया हरक्यूलिस जैसी रचनाएं दी हैं।।

धर्मवीर भारती के उपन्यास पर आधारित एक फिल्म बनी थी ” एक था चंदर, एक थी सुधा”। यह फिल्म बनी जरूर, लेकिन दर्शकों को देखने को मिली मनोज कुमार की गुनाहों का देवता, जिसका भारती जी के उपन्यास से कोई लेना देना नहीं था।।

एक अच्छे लेखक का सृजन कभी सुख का सृजन नहीं हो सकता। क्योंकि लेखकीय सृजन में भोगा हुआ यथार्थ है, पीड़ा है, संत्रास है। लेखकीय पात्र बार बार अवचेतन में चिल्लाते हैं, कराहते हैं, लेखक को विचलित भी कर देते हैं। फेयरवेल टू आर्म्स जैसे उपन्यास का नोबेल पुरस्कार विजेता अर्नेस्ट हेमिंग्वे यूं ही खुद को गोली मारकर आत्म हत्या नहीं कर लेता।

किसी ने सही कहा है ;

बहुत कठिन है

डगर पनघट की।

आपका बंटी की कहानी है

हर परिवार की,

घट घट की।

लेकिन क्या करे बेचारी बबली।।

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© श्री प्रदीप शर्मा

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