हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२३ ⇒ हठ – कड़ी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “हठ – कड़ी।)

?अभी अभी # ९२३ ⇒ आलेख – हठ – कड़ी ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

जो किसी अपराधी को हाथों में बांधी जाती है, वह हथकड़ी होती है। आज बँधी है, कल छूट जाएगी, हो सकता है, वह अपराधी न हो। और अगर हो भी तो सज़ा काटने के बाद रिहा भी हो सकता है। देश के लिए मर मिटने वालों के लिए क्या फाँसी और क्या हथकड़ी। फिल्मों और आजकल के टीवी सीरियल ने वैसे भी हथकड़ी को मज़ाक बना दिया है। एकता कपूर का ऐसा कोई सीरियल नहीं होगा, जिसमें नायक-नायिका ने हथकड़ी न पहनी हो, जेल न तोड़ी हो, और फाँसी के फंदे से वापस न आया हो।

हम इसीलिए हथकड़ी की नहीं हठ-कड़ी की बात कर रहे हैं। हठ एक रोग भी है, और योग भी। आज हम बाल-हठ, त्रिया-हठ और राज-हठ की चर्चा तो करेंगे ही, बाबा रामदेव के हठ-योग पर भी सर्च-लाइट डालेंगे।।

तो क्यों न त्रिया चरित्र के बजाय बाबा के हठयोग से ही शुरुआत की जाए। हठयोग प्रदीपिका के अनुसार ह (हकार) हमारी सूर्य नाड़ी अर्थात इड़ा है, और ठ (ठकार )चंद्र नाड़ी सुषुम्ना है। साधारण भाषा में प्राणायाम द्वारा सूर्य-चंद्र (उष्ण-शीतल)का सम अवस्था में सुषुम्ना में प्रवेश होता है, लेकिन अगर योग के नाम पर केवल कठिन आसन और स्वाभिमान यात्राएं ही निकाली जाएँ, तो वह केवल एक स्वदेशी हठ के नाम पर बाजारवाद फैलाना ही है, जिसका समय समय पर राजनैतिक फायदा वैसे ही उठाया जा सकता है, जैसा धर्म के नाम पर राजनीति में होता आया है। कबीर जिस इड़ा पिंगला सुषुम्ना की बात करते हैं, वही अध्यात्म है, वास्तविक हठ योग है।

हठ को आप ज़िद कह दें, जुनून कह दें, चाहें तो एक तरह का पागलपन कह दें। सभी प्रकार के हठ में बाल-हठ निर्दोष और मासूम होते हुए भी दिलचस्प और श्रेष्ठ है। बच्चों जैसी ज़िद कभी कभी बड़े-बूढ़े भी करते हैं, लेकिन अगर एक बार बच्चा ज़िद पर आ गया, तो आकाश पाताल एक कर देता है। वह केवल माँ की सूझ-बूझ ही होती है, जो बच्चे की ज़िद पूरी करने के लिए आसमान के चाँद को जल के थाल में उतरने के लिए मज़बूर कर देती है। बच्चे के पहाड़ जैसे हठ को एक छोटा सा खिलौना पल भर में समतल कर उसके मन को बहला सकता है।।

त्रिया हठ पर अधिक कहना उचित नहीं ! हम सब अपनी गृहस्थी लिए बैठे हैं। जो गुज़र रही है मुझ पर, उसे कैसे मैं बताऊँ। सबके अपने अपने किस्से हैं, अनुभव हैं। एक त्रिया का हठ हमने देखा, जब उसमें राजहठ भी शामिल हो गया। यानी करेला और नीम चढ़ा।

राज हठ में टके सेर भाजी और टके सेर खाजा बिकना कोई बड़ी बात नहीं ! जब यह राजहठ हिटलर बन जाता है तो दुनिया में तबाही खड़ी कर देता है। दुर्योधन के हठ और धृतराष्ट्र के पुत्रमोह के कारण अगर महाभारत हो सकता है, तो एक चाणक्य के अपमान के कारण समूचे नंद-वंश का संहार। यही हठ अगर नेताजी सुभाषचंद्र बोस को अंग्रेजों के खिलाफ आज़ाद हिंद फ़ौज़ खड़ी करने की हिम्मत देता है तो एक लाठी लंगोटी वाले को न केवल महात्मा का दर्ज़ा दिलवाता है, अपितु बँटवारे का दोषी भी करार दिया जाता है।

नमक सत्याग्रह और जेल भरो आंदोलन से क्या कभी किसी देश को आज़ादी मिली है। स्वदेशी भावना के लिए विदेशी कपड़ों की होली जैसी नौटँकी में अगर दम होता, तो बाबा रामदेव कब के गाँधीजी के अनुयायी हो जाते।।

गुलज़ार साहब ने एक गीत लिखा, चप्पा चप्पा चरखा चले ! उससे प्रेरित हो, एक बार मोदीजी ने चरखा चला भी दिया। लेकिन किसी ने प्रेरणा नहीं ली। जिस देश में गर्मी के मौसम में भी, गन्ने की चरखी को भी कोई नहीं पूछ रहा, वहाँ चरखे का क्या औचित्य ? अब गाँधी-भक्त मोदीजी डिजिटल चरखा लाने से तो रहे।

हथकड़ी तो इंसान को केवल एक अपराधी ही घोषित करती है, लेकिन हठ, एक ऐसी हथकड़ी है, जो इंसान खुद अपने हाथ से ही पहन लेता है। उसे हठधर्मिता कहते हैं। केवल अपना नुकसान तो ठीक, महापुरुषों का हठ तो देश के साथ भी खिलवाड़ कर गुजरता है। समझौता एक्सप्रेस भले ही न चलाएं, लेकिन जब हठ का मामला हो, थोड़ा ठहर जाएँ।

किसी का कहा मान जाएँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३१० ☆ मैं शब्द : तुम अर्थ… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख मैं शब्द : तुम अर्थ। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३१० ☆

☆ मैं शब्द : तुम अर्थ… ☆

एक नन्ही सी परिभाषा है, जीवन साथी की ‘मैं शब्द तुम अर्थ/ तुम बिन मैं व्यर्थ,’परंतु आधुनिक युग में यह कल्पनातीत है। आजकल तो जीवन- साथी की परिभाषा ही बदल गई है…’जब तक आप एक-दूसरे की आकांक्षाओं पर खरा उतर सकें; भावनात्मक संबंध बने रहें व मौज-मस्ती से रह सकें’ उचित है, अन्यथा संबंध-निर्वहन की आवश्यकता नहीं, क्योंकि जीवन खुशी व आनंद से जीने का नाम है; ज़िन्दगी को ढोने अथवा तिल-तिल कर मरने का नाम नहीं। सो! इस परिस्थिति में तुरंत संबंध-विच्छेद के लिए कदम बढ़ाना ही बेहतर है, सार्थक व सर्वश्रेष्ठ विकल्प है, क्योंकि आजकल ‘तू नहीं और सही’ का सर्वाधिक प्रचलन है।

प्राचीन काल में विवाह को पति-पत्नी का सात जन्मों तक चलने वाला संबंध स्वीकारा जाता था। परंतु आजकल इसके मायने ही नहीं रहे। वैसे तो आधुनिक युग में युवा-पीढ़ी विवाह रूपी संस्था को नकार कर, ‘लिव-इन’ में रहना अधिक पसंद करती है। जब तक मन चाहे साथ रहो और जब मन भर जाए; अलग हो जाओ। आजकल लोग भरपूर ज़िंदगी जीने में विश्वास रखते हैं। ‘खाओ पीओ, मौज उड़ाओ’ उनके जीवन का मूलमंत्र है। चारवॉक दर्शन में उनकी आस्था है और वे प्रतिबंधों में जीना पसंद नहीं करते।

शब्द ब्रह्म है; सृष्टि का सार है। शब्द और अर्थ का शाश्वत व चिरंतन संबंध है, क्योंकि शब्द में ही उसका अर्थ निहित होता है। ‘मैं शब्द, तुम अर्थ/ तुम बिन मैं व्यर्थ’ का जीवन में विशेष महत्व है। जिस प्रकार शब्द को अर्थ से अलग नहीं किया जा सकता; उसी प्रकार प्राचीन काल में पति-पत्नी को भी एक-दूसरे से अलग करने की कल्पना बेमानी थी, जिसका प्रमाण पत्नी का पति के साथ चिता के समय जौहर के रूप में देखा जा सकता था। परंतु समय के साथ सती-प्रथा का अंत हुआ, क्योंकि पत्नी को ज़िंदा जला देने को सामाजिक बुराई अर्थात् अपराध के रूप में स्वीकारा गया।

परंतु समय ने तेज़ी से करवट ली और संबंधों के रूपाकार में अप्रत्याशित परिवर्तन हुआ; लोग संबंधों को वस्त्रों की भांति बदलने लगे। वे अनचाहे संबंध-निर्वाह को कैंसर के रोग की भांति स्वीकारने लगे। जिस प्रकार एक अंग के कैंसर-पीड़ित होने पर, उस अंग को शरीर से निकाल कर बाहर फेंक दिया जाता है, ताकि उसका विष पूरे शरीर को दूषित न कर दे। उसी प्रकार यदि जीवन-साथी से विचार-वैषम्य हो, तो उसे जीवन से अलग कर देने को ही कारग़र उपाय समझा जाता है। यदि अपने शरीक़े-हयात से संबंध अच्छे नहीं हैं, तो उन संबंधों को ज़बरदस्ती निभाने का क्या औचित्य है? तुरंत संबंध-विच्छेद ही उसका सर्वोत्तम उपाय है; इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है… तलाक़ की संख्या में निरंतर इज़ाफा होना। पहले पति-पत्नी एक-दूसरे के बिना जीवन की कल्पना नहीं कर सकते थे। एक के अभाव में अर्थात् न रहने पर दूसरे को अपना जीवन निष्प्रयोजन अथवा निष्फल लगता था, क्योंकि वे एक-दूसरे की ज़रूरत बन चुके होते थे। परंंतु आजकल यदि पति-पत्नी में विचार-वैषम्य होता है; वे तुरंत अलग हो जाने को श्रेष्ठ उपाय स्वीकारते हैं।

आधुनिक युग में अहंनिष्ठ मानव आत्मविश्लेषण करना अर्थात् अपने अंतर्मन में झांकना व गुण-दोषों का विश्लेषण करना ही नहीं चाहता; उससे स्वीकारने की उम्मीद रखना, तो बहुत दूर की बात है। उसके हृदय में यह बात घर कर जाती है कि वह तो कदापि कोई ग़लती कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह तो गुणों की खान है। सारे दोष तो दूसरे व्यक्ति अर्थात् सामने वाले में हैं। इसलिए वह स्वयं में नहीं, प्रतिपक्ष को अपने भीतर सुधार लाने की आवश्यकता पर बल देता है। यदि वह समर्पण कर देता है, तो समस्या स्वतः समाप्त हो जाती है। यदि पत्नी, पति के अनुकूल आचरण करने लगती है; कठपुतली की भांति उसके इशारों पर नाचने लगती है, तो दाम्पत्य संबंध सुचारू रूप से क़ायम रह सकता है, अन्यथा अंजाम आपके समक्ष है।

ज़िंदगी एक फिल्म की तरह है, जिसमें इंटरवल अर्थात् मध्यांतर नहीं होता; पता नहीं कब एंड अर्थात् समाप्त हो जाए। आजकल संबंध भी ऐसे ही हैं… कौन जानता है, कब अलगाव की स्थिति उत्पन्न हो जाए। मुझे स्मरण हो रही है ऐसी ही एक घटना, जब विवाहोपरांत चंद घंटों में पति-पत्नी में संबंध-विच्छेद हो गया और पत्नी अपना ससुराल छोड़कर मायके चली गई। यदि आप कारण के बारे में जानेंगे, तो अचंभित रह जाएंगे। प्रथम रात्रि को बार-बार फोन आने पर, पति का पत्नी से यह कहना कि ‘बहुत फोन आते हैं तुम्हारे’ और पत्नी का इसी बात पर तुनक कर पति से झगड़ा करना; उस पर संकीर्ण मानसिकता का आरोप लगा, सदैव के लिए उसे छोड़कर चले जाना … हृदय को उद्वेलित कर सोचने को विवश करता है, ‘क्या वास्तव में संबंध कांच की भांति नाज़ुक नहीं हैं, जो ज़रा-सी ठोकर लगते दरक़ जाते हैं?’ परंतु यहां तो निर्दोष पति को अपना पक्ष रखने का अवसर भी प्रदान नहीं किया गया। बरसों से महिलाएं भी यह सब सहन कर रही थीं। उन्हें कहां प्राप्त है…अपना पक्ष रखने का अधिकार? पत्नी को तो किसी भी पल जीवन से बेदखल करने का अधिकार पति को प्राप्त था। महात्मा बुद्ध का यह कथन कि ‘संसार में जैसा व्यवहार आप दूसरों के साथ करते हैं, वही लौट कर आपके पास आता है।’ इसलिए सबसे सदैव अच्छा, उत्तम व शालीन व्यवहार कीजिए।

सो! आधुनिक युग में संविधान द्वारा महिलाओं को समानाधिकार प्राप्त हुए हैं, जो कागज़ की फाइलों में बंद हैं। परंतु कुछ महिलाएं इनका दुरुपयोग कर रही हैं, जिसका अनुमान आप तलाक़ के बढ़ते प्रचलन को देखकर लगा सकते हैं। आजकल ज़िंदगी लघु फिल्मों की भांति होकर रह गयी है, जो सीधे चरम सीमा पर पहुंचती हैं; जहां समझौते अथवा विकल्प की लेशमात्र भी संभावना नहीं होती।

कुछ लोग किस्मत की तरह होते हैं, जो दुआ से मिलते हैं और कुछ लोग दुआ की तरह होते हैं, जो किस्मत ही बदल देते हैं। इसलिए अच्छे दोस्तों को संभाल कर रखना चाहिए। वे आपकी अनुपस्थिति में भी आपके पक्षधर होते हैं तथा सदैव ढाल बनकर खड़े रहते हैं। वे आप पर विश्वास करते हैं; कभी आपकी निंदा नहीं करते और न ही आपके विरुद्ध आक्षेप सुनते हैं, क्योंकि वे केवल आंखिन-देखी पर विश्वास करते हैं, कानों-सुनी पर नहीं।

चाणक्य का यह कथन ‘ रिश्ते तोड़ने नहीं चाहिएं, परंतु जहां खबर न हो; निभाने भी नहीं चाहिएं ‘ बहुत सार्थक संदेश देता है। वे संबंध- निर्वहन पर बल देते हुए कहते हैं कि संबंध- विच्छेद कारग़र नहीं है। परंतु जहां संबंधों की अहमियत व स्वीकार्यता ही न हो; उन्हें ढोने का क्या लाभ…उनसे मुक्ति पाना ही हितकर है, श्रेयस्कर है। जहां ‘ताल्लुक़ बोझ बन जाए, तो उसको तोड़ना अच्छा,’ क्योंकि वह आपको मानसिक रूप से तो विचलित करता ही है;  आकस्मिक आपदा में भी डाल सकता है। वैसे भी आजकल सहनशीलता तो मानव जीवन से नदारद है। कोई भी दूसरे की भावनाओं को अहमियत नहीं देना चाहता; केवल स्वयं को सर्वश्रेष्ठ व सर्वोत्तम समझता है। सो! समन्वय व सामंजस्यता की कल्पना भी कैसे की जा सकती है? जहां समझौता नहीं होगा; वहां साहचर्य व संबंध-निर्वहन कैसे संभव है? आजकल हमारा विश्वास भगवान पर रहा ही नहीं। ‘यदि भरोसा प्रभु पर है, तो जो तक़दीर में लिखा है– वही पाओगे। यदि भरोसा ख़ुद पर है, तो वही पाओगे, जो चाहोगे।’ आजकल मानव स्वयं को भगवान से भी बड़ा समझता है तथा मनचाहा पाना चाहता है। इसलिए वह ‘तू नहीं, और सही’ में विश्वास कर आगे बढ़ता जाता है और जीवन में एक पल भी सुक़ून से नहीं गुज़ार पाता। सो! उसे सदैव घोर निराशा का सामना करना पड़ता है।

असंतोष अथवा और अधिक पाने की चाहना व लालसा अहंनिष्ठ व्यक्ति के जीवन की पूंजी बन जाती है और भौतिक संपदा प्राप्त करना उसके जीवन का एकमात्र प्रयोजन। धन से मानव सुख- सुविधाएं खरीद सकता है, जो केवल क्षणिक सुख प्रदान करती हैं। भले ही उस स्थिति में सब उसकी वाहवाही करते हैं, परंतु वह आंतरिक सुख-शांति व सुक़ून से कोसों दूर रहता है। इसलिए मानव को शाश्वत संबंध-निर्वाह करने की शिक्षा दी गई है। अरस्तु के शब्दों में ‘श्रेष्ठ व्यक्ति वही बन सकता है, जो दु:ख और चुनौतियों को ईश्वर की आज्ञा मानकर आगे बढ़ता है।’ सो! जीवन में विपत्तियों को ईश्वर की रज़ा स्वीकार, निरंतर आगे बढ़ते रहिए और पराजय को कभी मत स्वीकारिए। साहस व धैर्य से उनका सामना कीजिए, क्योंकि समय ठहरता नहीं; निरंतर चलता रहता है। इसलिए आप भी अनवरत आगे बढ़ते रहिए। वैसे आजकल ‘रिश्ते पहाड़ियों की तरह खामोश हैं। जब तक न पुकारें, उधर से आवाज़ ही नहीं आती’ दर्शाता है कि रिश्तों में स्वार्थ के संबंध तेज़ी से व्याप रहे हैं और अजनबीपन के अहसास के कारण चहुंओर मौन व गहरा सन्नाटा तेज़ी से बढ़ रहा है। सो! इस संवेदनहीन समाज में ‘ मैं शब्द, तुम अर्थ ‘ की कल्पना करना बेमानी है, कल्पनातीत है।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२२ ⇒ पवन-मुक्तासन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पवन-मुक्तासन।)

?अभी अभी # ९२२ ⇒ आलेख – पवन-मुक्तासन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

पवन तो वैसे ही मुक्त है, हम उसे और मुक्त क्या करेंगे। पंच तत्वों में वायु भी एक प्रमुख तत्व है। हमारी सृष्टि और देह दोनों ही इन पंच-तत्वों से निर्मित हुई है। वायु जिसे आप हवा भी कह सकते हैं, मुक्त तो है ही, कलयुग होते हुए भी आज तक मुफ़्त भी है। हमने पानी तक तो बेच दिया, अब हवा की बारी है। मैंने एक पेट्रोल पंप पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा देखा, मुफ़्त हवा ! मुझे बड़ी खुशी हुई, सोचा चलो हवा तो मुफ्त है। ज़माने की हवा, और बढ़ते प्रदूषण में अगर कहीं ताज़ी हवा मिल जाए, तो मुँह से वाह ही नहीं, वाह वाह निकलता है।।

ओ बसंती पवन पागल ! ना जा रे ना जा, रोको कोई। लेकिन कौन रोक पाया इस पागल पवन को ! इसे मुक्त ही रहने दो। योग के आठ अंगों में से एक अंग आसन है, वैसे तो इंसान की जितनी योनियाँ, उतने आसन, लेकिन एक आसन पवन-मुक्तासन भी है, जो शरीर की अपान वायु को मुक्त कर, पान-अपान का संतुलन बनाए रखता है।।

हमारे शरीर में पान अपान वायु का ही नहीं, व्यान, उदान और समान का भी अस्तित्व है। अपान वायु को बोलचाल की भाषा में वायु विकार कहते हैं। जो नियमित प्राणायाम नहीं कर पाते, वे पवन मुक्तासन से ही काम चला सकते हैं।

रात में जो अधिक देरी से भोजन करते हैं, देर रात की पार्टियों में गरिष्ठ, स्वादिष्ट और स्पाइसी खाना सूत लेते हैं, वे वायु-विकार को भी न्यौता दे चुके होते हैं। केवल एक पान खा लेने से अपान का तो बाल भी बाँका नहीं हो पाता।।

सुबह उठते ही अगर थोड़ा कुनकुना पानी पीकर पवन मुक्तासन कर लिया जाए, तो दिन भर के वायु विकार से कुछ हद तक मुक्ति तो मिल ही जाए। पुराने घरों में सुबह सुबह बुजुर्गों के मुँह से मंत्रों के बीच, वातावरण में एक आवाज़ और गूँजती थी, जिसका, घर का हर सदस्य आदी हो चुका होता था। हाँ, छोटे छोटे बच्चे कुछ समझ नहीं पाते थे।

आयुर्वेद के हिसाब से हमारे शरीर की हर बीमारी की जड़ पेट की खराबी है। पेट में रात का खाना जो पच नहीं पाता, वह अपच, खट्टी डकार, एसिडिटी और वायु विकार को जन्म देता है। वैद्यराज मरीज की नाड़ी देखते ही कोष्ठबद्धता घोषित कर देते हैं, और इसबगोल और एनीमा पर उतर आते हैं।।

पहला सुख निरोगी काया, दूसरा सुख, जेब में हो माया ! जेब में तो बहुत माल भरा है, और पेट में कचरा, तो ऊपर से तो सब अच्छा अच्छा, यानी गुड गुड, और अंदर पेट में गुड़-गुड़। और ऐसे में अगर पवन मुक्त हो गई, तो शरमासन और मुक्त-हँसासन। इससे बेहतर सुबह कुछ समय हल्के

व्यायाम, योगासन एवं प्राणायाम को दिया जाए, खुद भी खुली हवा में साँस लें और औरों को भी लेने दें।

कल शाम ही एक शोक-सभा में किसी ने गुप्त-पवन मुक्तासन कर दिया, कुछ ने आँखों के आँसू पोंछने के बहाने रूमाल निकाले, तो कुछ शोक सभा अधूरी छोड़कर ताज़ी बासंती हवा खाने हॉल के बाहर चले गए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # २७८ ☆ फागुनी आहट : रंगों से पहले का उजास… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना फागुनी आहट : रंगों से पहले का उजास। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख # २७८ ☆ फागुनी आहट : रंगों से पहले का उजास…

फाल्गुन का शुक्ल पक्ष जैसे ही आरंभ होता है, प्रकृति के स्वभाव में एक सूक्ष्म परिवर्तन दिखाई देने लगता है। यह परिवर्तन अचानक नहीं होता—यह धीमा, संयत और मधुर होता है। जैसे कोई कलाकार रंग भरने से पहले कैनवास पर हल्की रेखाएँ उकेर रहा हो।

हवा में एक नई पारदर्शिता है। धूप में कोमलता घुल गई है। वृक्षों की शाखाओं पर नवांकुरों की हरियाली केवल मौसम का संकेत नहीं, बल्कि जीवन की पुनरावृत्ति का संदेश है। सरसों के खेतों का पीत आभास, आम्र-मंजरियों की गंध, और दूर कहीं कोयल की प्रथम तान—ये सब मिलकर एक ऐसी भूमिका रचते हैं, जिसे हम “फागुनी आहट” कह सकते हैं।

यह वह समय है जब रंग अभी खुले नहीं हैं, पर उनकी उपस्थिति महसूस की जा सकती है। जैसे मन के भीतर कोई सुप्त ऊर्जा जाग रही हो।

और इसी जागरण को शब्द मिलते हैं—

खुशियाँ अपार लायी,

हौले-हौले मुस्कायी।

झूम के गुलाल संग,

देखो हमजोली आयी।।

*

तोड़ सारे बंधनों को,

बोलती उदासी देखो।

कलियाँ सजी हैं सारी,

रंग बिखराती देखो।।

फागुन केवल ऋतु नहीं, एक मनःस्थिति है। यह हमें याद दिलाता है कि ठहराव स्थायी नहीं होता। जमी हुई ठंडक के बाद ऊष्मा अवश्य आती है। रिश्तों में आई दूरी पिघल सकती है। संवाद फिर से आरंभ हो सकते हैं।

आज का युवा वर्ग, जो गति और प्रतिस्पर्धा के बीच जी रहा है, उसके लिए भी फागुन एक संदेश है—रुककर अपने भीतर के रंगों को पहचानो। जीवन केवल लक्ष्य नहीं, उत्सव भी है।

और शायद इसी भाव को आगे बढ़ाते हुए—

भावनाओं के तो बाँध

टूट-टूट बहते हैं।

जाने-अनजाने सारे

भेद सदा कहते हैं।।

*

लाल, नीले, पीले, हरे—

करते कमाल रंग।

फाग और फगुआ का

साथी ये धमाल रंग।।

फागुनी आहट हमें सिखाती है कि परिवर्तन शोर से नहीं, संकेत से आता है। उत्सव अचानक नहीं उतरते, वे भीतर तैयार होते हैं।

अभी रंगों का उत्सव दूर है, पर यह प्रारंभिक स्पर्श ही सबसे कोमल और सच्चा होता है। यही वह क्षण है जहाँ प्रकृति और मन एक साथ मुस्कुराते हैं।

फागुन की यह धीमी दस्तक हमें आमंत्रित करती है—

अपने भीतर के धुंधले कोनों में भी थोड़ा उजास भरने के लिए।

**

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – आलेख ☆ जब दिल गुनगुनाने लगे: हिन्दी फ़िल्मी गीतों का अमर जादू ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌷जब दिल गुनगुनाने लगे: हिन्दी फ़िल्मी गीतों का अमर जादू 🌷

कुछ फ़िल्में होती हैं।

कुछ कहानियाँ होती हैं।

और फिर होते हैं गीत — वे मधुर, काँपते हुए स्वर, जो चुपके से हमारी ज़िन्दगी में उतरते हैं और फिर कभी साथ नहीं छोड़ते।

हिन्दी सिनेमा ने हमें बहुत-से उपहार दिए हैं, पर सबसे अनमोल, सबसे स्थायी, सबसे आत्मा को छू लेने वाला उपहार है उसके गीत।

परदे से दृश्य उतर जाते हैं, सिनेमाघर बदल जाते हैं, कलाकार समय के साथ ओझल हो जाते हैं — पर गीत? वे चलते रहते हैं।

वे हमारे साथ बस-यात्राओं में होते हैं, विवाह की रातों में, बरसाती खिड़कियों के पास बैठी उदास शामों में, और सुबह की चाय के साथ आती धीमी धूप में।

हिन्दी फ़िल्म का गीत केवल गीत नहीं होता।

वह कविता है, जिसे सुरों का आकाश मिला है।

वह स्मृति है, जिसे लय का स्पर्श मिला है।

वह जीवन है, जो संगीत बनकर बह रहा है।

और जब शब्द, स्वर, संगीत और छायांकन एक साथ मिलते हैं — तब कुछ अलौकिक घटता है।

कुछ ऐसा, जो समय से परे हो जाता है।

🌷जब कविता ने परदे पर कदम रखा

 हर महान गीत की शुरुआत शब्द से होती है।

वे शब्द, जो केवल तुकबन्दी नहीं थे, बल्कि धड़कनों की भाषा थे। हमारे गीतों को गढ़ा उन कवियों ने, जिन्होंने बाज़ार के लिए नहीं, मनुष्य के लिए लिखा। उनकी कलम में विरह भी था, विद्रोह भी; करुणा भी थी, करिश्मा भी।

उनकी एक पंक्ति दशकों तक स्मृति में गूँजती रहती है।

कभी प्रेम की तरह, कभी प्रार्थना की तरह, कभी प्रश्न की तरह।

“सजन रे झूठ मत बोलो…” — कितनी सरल पंक्तियाँ, पर जीवन का सारा दर्शन समेटे हुए।

“ये महलों, ये ताजों, ये तख़्तों की दुनिया…” — मानो सफलता की चकाचौंध के पीछे छिपे खालीपन पर सीधा प्रश्न।

कविता ने सिनेमा में आकर अपनी गरिमा नहीं खोई; उसने परदे को गरिमा दे दी।

🌷वे आवाज़ें, जो घर-सी लगती हैं

फिर आए वे स्वर — जिनमें मिठास भी थी, दर्द भी; चंचलता भी थी, तप भी।

कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं, जिन्हें सुनकर लगता है जैसे कोई अपना पास बैठा हो।

जब कोई गायिका ऊँचे सुर में जाती है, तो वह केवल गाती नहीं — प्रार्थना करती प्रतीत होती है।

जब कोई गायक धीमे से शब्दों को थामता है, तो लगता है जैसे दिल की परतें खुल रही हों।

“चौदहवीं का चाँद हो…” सुनते ही मन में चाँदनी उतर आती है।

“मेरे सपनों की रानी…” की सीटी आज भी किसी साधारण दोपहर को उत्सव बना देती है।

“जाने कहाँ गए वो दिन…” में बीता हुआ समय जैसे आँखों के सामने लौट आता है।

और जब “जाने वो कैसे लोग थे…” सुनाई देता है, तो लगता है जैसे अधूरी मोहब्बत का कोई पुराना पत्र फिर खुल गया हो।

ये आवाज़ें केवल गायक-गायिकाओं की नहीं थीं — वे हमारी अपनी भावनाओं की प्रतिध्वनि थीं।

🌷धुनों के वे जादूगर

इन स्वरों के पीछे थे वे संगीतकार, जिन्होंने रागों में आत्मा भरी, लोकधुनों को शास्त्रीय गरिमा से जोड़ा, और पश्चिमी वाद्यों को भारतीय संवेदना में पिरो दिया।

उनकी रचनाएँ दृश्य को सजाती नहीं थीं; वे दृश्य को अर्थ देती थीं।

“ओ दुनिया के रखवाले…” में भक्ति की पुकार है।

“रमैया वस्तावैया…” में मिलन की सरल प्रसन्नता है।

“मेरा सुंदर सपना बीत गया…” में टूटे हृदय की करुणा है।

और फिर वह शाही वैभव — “प्यार किया तो डरना क्या…”

शीशमहल की चमकती दीवारों के बीच प्रेम का निर्भीक उद्घोष।

शब्द, स्वर और छायांकन — सब मिलकर प्रेम को अमर कर देते हैं।

🌷गीत, जो जीवन बन गए

कुछ गीत अब फ़िल्मों के नहीं रहे; वे हमारे हो चुके हैं।

“मेरा जूता है जापानी…” — कितनी सहज शरारत, कितना मासूम गर्व!

आज भी जब वह बजता है, तो भीतर कहीं एक भोला-सा आत्मविश्वास जाग उठता है।

कौन-सा विवाह ऐसा होगा जहाँ “ऐ मेरी ज़ोहरा जबीं…” पर मुस्कान न खिल उठे?

उम्र को ठेंगा दिखाता प्रेम — यही तो जीवन का सबसे सुंदर उत्सव है।

“एक चतुर नार…” की शरारत आज भी उतनी ही ताज़ी है।

हँसी और संगीत का ऐसा संगम, जो मन को हल्का कर दे।

और फिर वह गीत, जिसे सुनते ही आँखें नम हो जाती हैं —

“ऐ मेरे वतन के लोगों…”

यह केवल गीत नहीं, सामूहिक स्मृति है।

यह शहादत की याद है, यह कृतज्ञता की आँसू भरी सलामी है।

🌷हमारी साझा स्मृति

ये गीत मनोरंजन नहीं हैं; ये हमारी साझा डायरी हैं।

रेडियो के उन दिनों से, जब बिजली चली जाती थी और कोई ट्रांजिस्टर अँधेरे में गुनगुनाता रहता था…

रेलवे स्टेशन की चाय की दुकानों से…

कैसेट, सीडी और अब मोबाइल की प्लेलिस्ट तक —

इन गीतों ने हमारे जीवन के हर मोड़ पर साथ निभाया है। 

  • पहला प्रेम।
  • पहली विफलता।
  • पहली तनख़्वाह।
  • पहली विदाई।

जब भी कहीं से कोई पुरानी धुन तैरती हुई आती है — किसी कार की खिड़की से, पड़ोसी के घर से, या अचानक किसी याद की तह से —

मन ठिठक जाता है।

एक हल्की-सी मुस्कान आ जाती है।

जैसे कोई पुराना मित्र अचानक सामने आ खड़ा हुआ हो।

🌷जब तक भावनाएँ हैं, गीत रहेंगे

समय बदलेगा।

तकनीक बदलेगी।

रुचियाँ बदलेंगी।

पर ये गीत रहेंगे।

क्योंकि ये समय से बँधे नहीं हैं — ये भावनाओं से जुड़े हैं।

और जब तक मनुष्य प्रेम करेगा, खोएगा, आशा करेगा, प्रतीक्षा करेगा —

तब तक हिन्दी फ़िल्मी गीत गूँजते रहेंगे।

धीमे-धीमे।

अनवरत।

हमारे भीतर।

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२१ ⇒ मेहनत की लकीर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मेहनत की लकीर ।)

?अभी अभी # ९२१ ⇒ आलेख – मेहनत की लकीर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

उद्धयेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।

 न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः।।

लकीर को हम रेखा भी कहते हैं। जन्म के साथ ही हमारे भाग्य को भी जोड़ दिया जाता है, ग्रह, नक्षत्रों और रेखाओं से। आज जन्म लिए बालक का भविष्य फल कई वर्षों से नियमित रूप से दैनिक अखबारों की जगह घेरता चला आ रहा है। कुछ लोग तो “आपका आज का भविष्य फल ” पढ़कर ही आंखें खोलते हैं। वर्तमान में भविष्य खोजना ही कुछ लोगों का पुरुषार्थ होता है। वे हमेशा किसी अच्छे मुहूर्त की ताक में ही बैठे रह जाते हैं, और मौका हाथ से निकल जाता है।

हस्त रेखा अथवा ज्योतिष में जिनकी रुचि होगी वे शायद यह भली भांति जानते होंगे कि हमारे हाथ में मेहनत और पुरुषार्थ की भी शायद कोई रेखा होती हो। लेकिन लोग अक्सर नौकरी धंधा, शादी, बीमारी और बाल बच्चों की आस में ही किसी ज्योतिषी के आगे हाथ फैलाते देखे जाते हैं और व्रत उपवास, पुखराज, मूंगा और दान दक्षिणा के बिना बात बनते नजर नहीं आती।।

नेपोलियन का हाथ देखकर एक ज्योतिषी ने कह दिया था कि आपके जीवन में तो भाग्य रेखा ही नहीं है, आप सफल नहीं हो सकते। और सुना है कि नेपोलियन ने अपनी तलवार निकाली और अपनी हथेली चीरकर चुनौती दी, भाग्य की लकीर ऐसे बनती है पुरुषार्थ से। हाथ पर हाथ धरकर बैठने से नहीं।

जिनके हाथ में मेहनत की लकीर होती है, फिर उसके आगे सभी लकीरें फीकी पड़ जाती हैं, क्योंकि परिश्रम और पुरुषार्थ के आगे तो भाग्य भी नहीं टिक पाता।।

अब एक तरफ हमारा चार्वाक दर्शन भी है जो कहता है, कर्ज़ करो और घी पीयो जिसे लोग आजकल कोलोस्ट्रॉल घटाते हुए, कर्ज़ लेकर विदेशों में, चैन से जीयो के सिद्धांत के साथ अमल में ला रहे हैं। और अगर उनका हार्ट फेल भी हो गया, तो कौन सा दुनिया में प्रलय आ जाएगा। उधर हमारी आधी आबादी भाग्य, ईश्वर और मलूकदास की आस्तिकता और आशावाद के गुणगान करती नजर आ रही है ;

अजगर करे ना चाकरी

पंछी करे ना काम।

दास मलूका कह गए

सबके दाता राम।।

 जय श्रीराम

याद आती है, पुराने दौर की फिल्म नया दौर, जिसमें साहिर का एक गीत था, “साथी हाथ बढ़ाना साथी रे, एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। ” मेहनत जब संगठित होती है, तब मुट्ठी मजबूत होती है, एकता में सफलता और संपन्नता के दर्शन होते हैं। लेकिन संगठित मजदूर पूंजीवाद के लिए बहुत बड़ा खतरा है, इसलिए मजदूर हो या जनता, इनके बीच नेता को लाया जाए। वह आपको नारा देगा, नई नई मांगें देगा, आपके लिए पूंजीपतियों के साथ सौदा करेगा और संसद में आपकी आवाज बुलंद करेगा। देखिए मेहनत की लकीर किधर जाती दिखाई दे रही है।।

मेहनत के बिल्कुल करीब ही, एक गरीबी रेखा भी है

जिसे आजकल वोट बैंक भी कहते हैं। जो मेहनती लोग इस गरीबी रेखा से नीचे होते हैं, उनके क्रेडिट कार्ड को बीपीएल कार्ड कहते हैं, अंग्रेजी में बोले तो below poverty line हितग्राही। पानी बिच मीन प्यासी ! बस यही हाल होता है इस गरीबी रेखा का। सुरसा का मुंह है यह गरीबी रेखा। इन्हें आत्म निर्भर बनाने के लिए क्या क्या नहीं कर रही सरकार। उज्जवला, आयुष्मान, मान या ना मान। और बीपीएल वाली यह मीन इस रेखा के नीचे इतनी सुरक्षित है कि अब इस लकीर से ऊपर आना ही नहीं चाहती। आज भी याद है वह मछली वाला गीत ;

मछली जल की रानी है

जीवन इसका पानी है।

हाथ लगाओ, डर जाती

बाहर निकालो, मर जाती।।

मेहनत तो घोड़ा गधा भी कर लेता है। आजकल मेहनत के साथ साथ स्किल डेवलपमेंट भी जरूरी है। व्यर्थ पसीना बहाने से क्या फायदा। कहीं वायदा सौदे में फायदा तो कहीं शेयर मार्केट में जबरदस्त उछाल। कई नटवरलाल घर बैठे हर्षद मेहता और चार्ल्स शोभराज बन गए। जिनका भाग्य अच्छा था, आगे बढ़ गए, जिनका भाग्य खराब था, जेल में चक्की पीसिंग, चक्की पीसिंग।।

काश, हमारे हाथ में संतान योग, सफलता, संपन्नता, राजयोग, और वैभव लक्ष्मी की जगह, कुछ रेखाएं मेहनत, लगन, परिश्रम, आशा, विश्वास, आत्म विश्वास और इमानदारी की भी होती तो कितना अच्छा होता। हम आपस में हाथ से हाथ मिलाते, एक दूसरे का हाथ चूमते, एक ऐसी दुनिया बनाते जहां पत्थर की लकीर से भी मजबूत मेहनत की लकीर होती।

उद्यम ही मेहनत है, सूझ बूझ है। बुद्धि ज्ञान और विवेक उसके वाहन हैं। अपनी प्रतिभा को पहचानना और उसको अमल में लाना ही पुरुषार्थ है। श्रम और परिश्रम के बीच की दूरियों को कम करना है। आलस्य को विराम और श्रम को सम्मान ही हमारे हाथ की वह लकीर है जो हमें गीता के निष्काम कर्म के करीब ले जा सकती है। कोई है ऐसा हस्त रेखा विशेषज्ञ, जो हाथ में मेहनत की लकीर भी बता दे।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – जीवन और टी-20 क्रिकेट- ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – जीवन और टी-20 क्रिकेट- ? ?

जीवन एक अर्थ में टी-20 क्रिकेट ही है। काल की गेंदबाजी पर कर्म के बल्ले से साँसों द्वारा खेला जा रहा क्रिकेट। अंपायर की भूमिका में समय सन्नद्ध है। दुर्घटना, अवसाद, निराशा, आत्महत्या फील्डिंग कर रहे हैं। मारकेश अपनी वक्र दृष्टि लिए विकेटकीपर की भूमिका में खड़ा है। बोल्ड, कैच, रन-आऊट, स्टम्पिंग, एल.बी.डब्ल्यू….,  ज़रा-सी गलती हुई कि मर्त्यलोक का एक और विकेट गया। अकेला जीव सब तरफ से घिरा हुआ है जीवन के संग्राम में।

महाभारत में उतरना हरेक के बस में नहीं होता। तुम अभिमन्यु हो अपने समय के। जन्म और मरण के चक्रव्यूह को बेध भी सकते हो, छेद भी सकते हो। अपने लक्ष्य को समझो, निर्धारित करो। उसके अनुरूप नीति बनाओ और क्रियान्वित करो। कई बार ‘इतनी जल्दी क्या पड़ी, अभी तो खेलेंगे बरसों’ के फेर में अपेक्षित रन-रेट इतनी अधिक हो जाती है कि अकाल विकेट देने के सिवा कोई चारा नहीं बचता।

परिवार, मित्र, हितैषियों के साथ सच्ची और लक्ष्यबेधी साझेदारी करना सीखो। लक्ष्य तक पहुँचे या नहीं, यह समय तय करेगा। तुम रन बटोरो, खतरे उठाओ-रिस्क लो, रन-रेट नियंत्रण में रखो। आवश्यक नहीं कि मैच जीतो ही पर अंतिम गेंद तक जीत के जज़्बे से खेलते रहने का यत्न तो कर ही सकते हो न!

यह जो कुछ कहा गया, ‘स्ट्रैटिजिक टाइम आऊट’ में किया गया दिशा निर्देश भर है। चाहे तो विचार करो और तदनुरूप व्यवहार करो अन्यथा गेंदबाज, विकेटकीपर और क्षेत्ररक्षक तो तैयार हैं ही।

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९२० ⇒ पेन पेंसिल ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “पेन पेंसिल।)

?अभी अभी # ९२० ⇒ आलेख – पेन पेंसिल ? श्री प्रदीप शर्मा  ? 

जीवन, पढ़ने लिखने का नाम, पढ़ते रहो सुबहो शाम ! हमारे जमाने में ऐसी कोई नर्सरी राइम नहीं थी।

हम जब पैदा हुए थे, तब सुना था, हमारी मुट्ठी बंद थी, और हमसे यह पूछा जाता था, नन्हे मुन्ने बच्चे तेरी मुट्ठी में क्या है, तब तो हम जवाब नहीं दे पाए, क्योंकि उनके पास अपना खुद का जवाब मौजूद था, मुट्ठी में है, तकदीर हमारी। लेकिन हमने तो जब हमारी मुट्ठी खोली तो उसमें हमने पेन – पेंसिल को ही पाया।

न जाने क्यों इंसान को अक्षर ज्ञान की बहुत पड़ी रहती है। जिन बच्चों के हाथों में झुनझुना और गुड्डे गुड़िया होना चाहिए, उन्हें अनार आम, और एबीसीडी भी आनी ही चाहिए। सबसे पहले एक गिनती वाली पट्टी आती थी, जिसमें गोल गोल प्लास्टिक की रंग बिरंगी गोलियां दस तार वाले खानों में जुड़ी रहती थी। एक से सौ तक की गिनती उन प्लास्टिक की गोलियों से सीखी जाती थी और पट्टी, जिसे स्लेट कहते थे, पर चार उंगलियों और एक अंगूठे के बीच मिट्टी की कलम, जिसे हम पेम कहते थे, पकड़ा दी जाती थी। जब तक आप ढंग से पेम पकड़ना नहीं सीख लेते, आपकी अक्षर यात्रा शुरू ही नहीं हो सकती।।

ढाई अक्षर तो बहुत दूर की बात है, जिन हाथों में हमारी तकदीर बंद है, वह जिन्दगी की स्लेट पर एक लकीर ढंग से नहीं खींच पा रहा है। आज जिसे इमोजी कहा जा रहा है, ऐसे कई इमोजी बन जाने के बाद, जब तक, अ अनार का, A, एबीसीडी का, और चार अंक, १, २, ३, ४ के नहीं लिख लिए जाते, भैया होशियार नहीं कहलाए जाते थे। एक, दो, तीन, चार, लो भैया बन गया होशियार।

तुमने कितनी पेम तोड़ी है, और कितनी पेम खाई है, आज हमसे कोई हिसाब भले ही ना मांगे, लेकिन हमने पेम भी खाई है, और मार भी खाई है। मिट्टी में पैदा हुए, अपने देश की मिट्टी ही खाई है, कोई रिश्वत नहीं खाई।।

लेकिन हम पेम वालों को समय रंग बिरंगे पेन और पेंसिलों से ज्यादा दूर नहीं रख पाया। हमारे हाथ में स्लेट और पेम पकड़ाकर जब बड़ा भैया कागज पर पेन पेंसिल से लिखता था, तो हम सोचते थे, कल हम भी बड़े होंगे, शान से पट्टी पेम की जगह, कॉपी में पेंसिल पेन से लिखेंगे। लेकिन हमारे भैया ने कभी हमें कभी पेन पेंसिल को हाथ नहीं लगाने दिया। गर्व से डांटकर कहता, तुम अभी बच्चे हो, तोड़ डालोगे। और हमारा दिल टूट जाता।

पेम से ढाई आखर सीखने के बाद, हमारी नर्सरी में कागज और पेंसिल का प्रवेश होता था। बहुत टूटती थी, पेंसिल की नोक, तब हम शार्पनर नहीं समझते थे। नादान थे, ब्लेड से पेंसिल छीलने पर उंगली भी कटती थी, और मार भी खाते थे।

तकदीर का लिखा तो खैर, कौन मिटा सकता है, लेकिन पेंसिल का लिखा, जरूर इरेज़र से मिटाया जा सकता है।।

हम तब तक पेन के बहुत करीब आ गए थे। कलम दवात, पेन का ही अतीत है। पुरातन और सनातन तक हम नहीं जाएंगे, बस सरकंडे की कलम थी, जो बाद में होल्डर बन गई और स्याही दवात में बंद हो गई।

पेन, पेंसिल और होल्डर में एक समानता है, इनमें नोक होती है। बस यही नोक ही लेखन की नाक है। पेंसिल की नोक की तरह पेन देखो, पेन की धार देखो।

Pen is mightier than sword. किसी ने लिख मारा। और पढ़े लिखे लोगों में आपस में तलवारबाजी चलने लगी।।

आज के इस हथियार को जब हम कल देखते, तो बड़ा आश्चर्य होता था, ढक्कन वाला पेन, जिसमें एक स्टैंड भी होता था, खीसे में लगाने के लिए। पीतल की, स्टील की अथवा धारदार निब, जिसके नीचे एक सहारा और बाद में आंटे वाला हिस्सा, जिसे खोलकर पेन में ड्रॉपर से स्याही, यानी camel ink, भरी जाती थी। गर्मियों में कितने हाथ खराब हुए, कितने कंपास, बस्ते और कपड़े इस पेन के चूने से खराब हुए, मत पूछिए। आज कोई यकीन नहीं करेगा।

पेन पेंसिल का साथ जितना हमें मिला, उतना आज की पीढ़ी को नहीं मिल रहा। सुंदर लेखन, स्वच्छ लेखन और शुद्ध लेखन, मन और विचार दोनों को बड़ा सुकून देता है। बिना पढ़े लिखे, कोई हस्ताक्षर कभी बड़ा नहीं बनता। समय का खेल है। Only Signatories become Dignitaries.

आज हो गए हम डिजिटल, पढ़ लिख लिए, ईको फ्रेंडली हो गए, कागज़ बचाने लग गए, घर में ही एंड्रॉयड प्रिंटिंग स्टूडियो और फोटो स्टूडियो खोलकर बैठ गए। आप चाहो तो घर में ही एकता कपूर बन, एक फिल्म प्रोड्यूस कर नेटफ्लिक्स पर डाल दो।

अपने अतीत को ना भूलें। बच्चों को पट्टी पेम, काग़ज़, किताबें और पैन पेंसिल से भी जोड़े रखें।

स्कूल भी ब्लैक बोर्ड और चॉक खड़ू (crayon) से जुड़े रहें। ऑनलाइन से कभी कभी ऑफलाइन भी हो जाएं।

जीवन में थोड़ा नर्सरी, के.जी. भी हो जाए।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९१९ ⇒ आत्म-स्वीकृति ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “आत्म-स्वीकृति।)

?अभी अभी # ९१९ ⇒ आलेख – आत्म-स्वीकृति ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

आत्म, आत्मा का स्थूल स्वरूप है। आत्म-कथा में आत्मा को छोड़कर स्थूल देह का महिमामंडन किया जाता है। केवल स्वामी परमहँस योगानंद की ” योगी की आत्म-कथा ( An Autography of a Yogi ) ही एक ऐसी आत्मकथा है जिसमें जीवात्मा के साथ परमात्मा का भी विवेचन किया गया है, स्थूल के साथ सूक्ष्म शरीर की व्याख्या की गई है। वहाँ मैं से अधिक आत्म-तत्व की चर्चा की गई है।

मोहनदास करमचंद गाँधी की आत्म-कथा में हम ऐसी आत्म-स्वीकृति पाते हैं, जिन्हें आप स्वीकारोक्ति अथवा कॉन्फेशन कह सकते हैं। अपने गुणों का बढ़ा चढ़ाकर वर्णन और अवगुणों पर पर्दा ही अधिकतर आत्म-कथा की विषय- वस्तु होती है। ग़रीबी और अभाव का वर्णन इफ़राती से किया जाता है। उपलब्धियों का बखान भी नई नवेली दुल्हन के समान लजाकर किया जाता है। महात्मा-गाँधी की आत्म-कथा का शीर्षक, सत्य के प्रयोग है। जिसका अंग्रेज़ी शीर्षक My Confessions with Truth है। सत्य कोई प्रयोग की वस्तु नहीं, आचरण में उतारने वाली नैतिकता है। आप कुछ भी सोचें करें, नैतिकता की मर्यादा में रहकर करें। प्रयोग का प्रदर्शन अथवा स्वीकारोक्ति नैतिकता के दायरे में नहीं आती। शायद इसीलिए बापू की आत्म-कथा आज भी उनके लिए आत्म-घाती ही सिद्ध हो रही है। कहाँ का महात्मा, राष्ट्रपिता, लंपट कहीं का ! जैसे विशेषण भी उपहार-स्वरूप अनादर सहित प्रेषित किये जाते रहे हैं।।

जब हम आत्म-स्वीकृति की बात करते हैं, तो उसमें आत्म-मंथन भी समाहित है। गुण-दोषों का अवलोकन, अन्तरावलोकन का विषय है, जिसके आधार पर आत्म-शुद्धि संभव है। यह चित्त-शुद्धि का एक सूक्ष्म प्रयास है। आत्म-बल इसी चित्त-शुद्धि की देन है।

आत्म-बल, आत्म-विश्वास का परिष्कृत स्वरूप है, जहाँ स्वयं से अधिक उस सर्व-शक्तिमान पर भरोसा किया जाता है। यह आस्था, विश्वास और समर्पण की वह चरम अवस्था है, जिसे नारद-भक्ति-सूत्र में आत्म-निवेदन की संज्ञा दी गई है।।

आत्म-स्वीकृति स्वयं को, अपने गुण-दोषों सहित पहचानने की एक सूक्ष्म प्रक्रिया है। ईश्वर तो हमें हमारे गुण-दोषों सहित स्वीकार कर लेता है लेकिन संसार दोषमुक्त नहीं, दोषयुक्त है। वह आपके दोषों को स्वीकार नहीं करता, केवल गुणों का गाहक है। फलस्वरूप हम अपनी बुराइयों और अवगुणों को छुपा लेते हैं और अच्छाइयों को जग-जाहिर कर देते हैं। और इससे ही हमें मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा और प्रशंसा हासिल होती है। यह सतही अच्छाई ही संसार है, जो आपकी नित्य शुद्ध, बुद्ध आत्मा से कोसों दूर है।

आत्म-स्वीकृति मान्यता प्राप्त धर्म नहीं, सहज, सरल अध्यात्म है, चित्त शुद्धि का एकमात्र ऐसा उपाय है, जहाँ निंदा-स्तुति, छल-कपट के लिए कोई स्थान नहीं। केवल निष्ठा, प्रेम और समर्पण है, जिसके बिना स्वयं का, एवं जगत का वास्तविक कल्याण संभव नहीं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १६६ – देश-परदेश – दूध ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १६५ ☆ देश-परदेश – दूध ☆ श्री राकेश कुमार ☆

दूध गर्म हो या ठंडा, है तो अमृत ही खूब पीना चाहिए। विगत दिनों कुछ दिन राजस्थान के शहर जोधपुर में था। उपरोक्त फोटो वहीं की है। प्रतिदिन नियम से कुल्लड़ में गर्मा गर्म दुग्धपान का आनंद लिया। दुकान भी करीब 75 वर्ष पुरानी है।

बड़ी सी कढ़ाई में दूध की बाल्टियां उड़ेल कर, नीचे भट्ठी कीे आंच पर धीमे धीमे दूध के गर्म होते समय की खुशबू राहगीरों को आकर्षित करने का दम रखती हैं। हम भी पहले दिन उसी खुशबू के जाल में फंस गए, जब तक रहे उसके दीवाने बन गए।

रात्रि का भोजन छोड़ कर गर्म दूध के साथ फिड़िया का सेवन सर्वोत्तम माना जाता हैं। दूध के कुल्लड के ऊपर मोटी मलाई की परत तो सोने पर सुहागा का काम करती हैं।

लौटती ठंड की सर्द हवाएं, गर्म दूध की तलब बढ़ाने में उत्प्रेरक का कार्य बाखूबी करती हैं। आज मौका भी है, और दस्तूर भी, तो इस वेलेंटाइन डे का मज़ा लीजिए ” गर्मा गर्म” दूध अपने अपने  वेलेंटाइन के साथ हो जाय।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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