ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (8 सितंबर से 14 सितंबर 2025) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (8 सितंबर से 14 सितंबर 2025) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम! 

है कौन विघ्न ऐसा जग में,

टिक सके आदमी के मग में?

ख़म ठोंक ठेलता है जब नर

पर्वत के जाते पाव उखड़,

मानव जब जोर लगाता है,

पत्थर पानी बन जाता है।

8 सितंबर से 14 सितंबर 2025 तक के सप्ताह में आपको अपनी ताकत का भरपूर इस्तेमाल कब करना चाहिए, यह बताने के लिए, मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपके पास इस सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल को लेकर प्रस्तुत हूं।

अगर इस सप्ताह आपको तकलीफ की मात्रा ज्यादा लगे तो आपको चाहिए कि आप मेरी पुस्तक नासे रोग हरे सब पीरा में दिए गए हनुमान चालीसा के मंत्रों का संपुट पाठ करें और हनुमान जी की कृपा से अपने दुखों को समाप्त कर सुख प्राप्त करें।

इस सप्ताह सूर्य और बुध सिंह राशि में, गुरु मिथुन राशि में, वक्री शनि मीन राशि में और बाकी राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। मंगल प्रारंभ में कन्या राशि में रहेगा तथा 13 तारीख के 8:42 रात से तुला राशि में प्रवेश करेगा। शुक्र प्रारंभ में कर्क राशि में रहेगा एवं 14 तारीख के 1:06 रात से सिंह राशि में गोचर करेगा।

आईये अब हम राशिवार राशिफल के बारे में चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके लग्न और सप्तम भाव में कोई ग्रह नहीं है जिसके कारण आपका, आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। चतुर्थ भाव में बैठे शुक्र के कारण आपके पिताजी का स्वास्थ्य भी ठीक-ठाक ही रहेगा। पंचम भाव में मित्र राशि में सूर्य और बुद्ध की विराजमान है विराजमान है जो अत्यंत मजबूत है अतः आपके संतान को सुख प्राप्त होगा। संतान से आपको सहयोग मिलेगा। छात्रों की पढ़ाई अच्छी चलेगी। जरा सा प्रयास करके आप अपने शत्रुओं को इस सप्ताह पराजित कर सकते हैं। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव आ सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 सितंबर किसी भी कार्य को करने के लिए उत्तम है। 9 और 10 सितंबर को आपके कार्यों को करने के लिए अधिक परिश्रम की आवश्यकता होगी। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें तथा शुक्रवार को मंदिर में जाकर सफेद वस्तुओं का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपका, आपके जीवनसाथी का और माता जी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। छात्रों की पढ़ाई में बाधा पड़ेगी। आपके पंचम भाव में इस समय शत्रु भाव में मंगल विराजमान है जिसके कारण आपके संतान को कष्ट हो सकता है। दशम भाव में बैठे राहु अपने मित्र राशि में है इसके कारण कार्यालय में आपके द्वारा सहकर्मियों के साथ कटु व्यवहार किया जा सकता है। अतः आपको चाहिए कि आप कार्यालय में अपनी वाणी पर कंट्रोल रखें। आपको अपने उच्च अधिकारियों से लड़ने झगड़ने की प्रवृत्ति से बचना चाहिए। भाई बहनों के साथ तनाव रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 8, 13 और 14 सितंबर कार्यों को करने के लिए अनुकूल हैं। 11 और 12 सितंबर को आपको सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके लग्न में गुरु विराजमान है जो थोड़ा कमजोर हैं। परंतु उनकी दृष्टि सप्तम भाव पर अत्यंत मजबूत है। इसके कारण आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। तृतीय भाव में बैठे सूर्य और बुध के कारण आपका अपने भाई बहनों के साथ संबंध अच्छा रहेगा। नवम् भाव में राहु बैठा है जिसके कारण आपको भाग्य से सहयोग नहीं मिल पाएगा। अतः कोई भी काम करने के लिए आपको अधिक परिश्रम करना पड़ेगा। व्यापार ठीक चलेगा परंतु धन की आने की मात्रा में कमी रहेगी। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 सितंबर कार्यों को करने के लिए उपयुक्त हैं। 13 और 14 सितंबर को आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काली उड़द का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

कर्क राशि

इस सप्ताह आपके माता-पिता जी और जीवनसाथी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। लग्न में बैठे शुक्र के कारण आपको छोटी-मोटी परेशानी हो सकती है। परंतु यही शुक्र व्यापार में आप को लाभ दिलाएगा। धान भाव में बैठे सूर्य के कारण धन आने की संभावना है। भाई बहनों के साथ संबंधों में तनाव हो सकता है। भाग्य सामान्य रूप से साथ देगा। खर्चो के वृद्धि की भी संभावना है। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 सितंबर कार्यों को करने के लिए अच्छे हैं। 8 सितंबर को आपको सचेत रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

सिंह राशि

लग्न में बैठे बहुत मजबूत सूर्य के कारण इस सप्ताह आपके आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। आपका, आपके माता और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके भाग्य भाव को भाग्य देख रहा है अतः आपको भाग्य से लाभ हो सकता है। अष्टम भाव में बैठा वक्री शनि के कारण आपको दुर्घटनाओं के प्रति सचेत रहना चाहिए। कचहरी के कार्यों में किसी प्रकार का रिस्क ना लें। व्यापार में तेजी आएगी परंतु लाभ सामान्य रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 8 तथा 13 और 14 सितंबर कार्यों को करने के लिए मददगार हैं। 9 और 10 सितंबर को आपको बड़ी सावधानी से कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कन्या राशि

द्वादश भाव में इस सप्ताह सूर्य अत्यंत मजबूत स्थिति में है। इस कारण इस सप्ताह प्रयास करने पर आपको कचहरी के कार्यों में सफलता मिल सकती है। आपके जीवनसाथी और आपके माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। लग्न में बैठे मंगल के कारण आपको रक्त संबंधी रोगों से इस सप्ताह सावधान रहना चाहिए। दशम भाव में शत्रु क्षेत्री गुरु विराजमान है। अतः कार्यालय में आपको अपने सहकर्मियों से बहुत कम सहयोग मिलेगा। धन आने की मात्रा में कमी आएगी। भाग्य से आपके सहयोग मिल सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 सितंबर कार्यों को करने के लिए लाभदायक है। 8, 11 और 12 सितंबर को आपके कार्यों को करने के लिए अत्यंत सावधानी बरतना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन राम रक्षा स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

तुला राशि

इस सप्ताह आपका, आपके जीवनसाथी का और आपकी माता जी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। बुध ग्रह इस सप्ताह अपने मित्र राशि सूर्य के घर में विराजमान है। जिसके कारण आपका व्यापार ठीक चलेगा। व्यापार में अच्छा लाभ होगा। एकादश भाव में बैठकर सूर्य और बुध आपके व्यापार के लाभ में वृद्धि करेंगे। इसके अलावा धन आने की संभावना भी है। अगर आप कर्मचारी या अधिकारी हैं तो आपको अपने सहयोगियों से अच्छा सहयोग नहीं मिल पाएगा। भाग्य से इस सप्ताह आपको कोई विशेष लाभ नहीं होगा। आपके कार्यों को सफल बनाने के लिए अधिक परिश्रम करना पड़ेगा। आपके संतान को कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 सितंबर कार्यों को संपन्न करने के लिए हितवर्धक हैं। सप्ताह के बाकी दिन आपको सावधान रहकर कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह आपका, आपके जीवनसाथी का और आपके पिताजी का स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कार्यालय में आपकी प्रतिष्ठा बढ़ेगी। आपको अपने अधिकारियों का सहयोग प्राप्त होगा। धन आने की मात्रा में कमी आएगी, परंतु व्यापार ठीक चलेगा। इस सप्ताह आपके भाग्य भाव में शुक्र बैठा हुआ है। जो की कमजोर स्थिति में है। अतः आपको भाग्य से कोई विशेष लाभ नहीं हो पाएगा। इसी प्रकार संतान भाव में वक्री शनि विराजमान है। इनके कारण आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त नहीं होगा। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 13 तथा 14 सितंबर परिणाम दायक हैं। 11 और 12 सितंबर को आपको अपने कार्यों को करने में अधिक परिश्रम करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य ठीक रहेगा। इस सप्ताह आपके भाग्य भाव में सूर्य और बुध विराजमान है जिनके कारण भाग्य से आपको लाभ होगा। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप अपने कार्यों को भाग्य का सहारा लेकर संपन्न करें। कार्यालय में आपको सहकर्मियों का सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई ठीक चलेगी। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 सितंबर कार्यों को करने के लिए फलदायक है। 13 और 14 सितंबर को आपको कार्यों को बड़े ध्यानपूर्वक सावधानी से करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

इस सप्ताह आपका, आपके माता जी और पिताजी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। भाई बहनों के साथ भी संबंध सामान्य रहेंगे। धान भाव में राहु है जिसके कारण गलत रास्ते से धन आने का योग है। सप्तम भाव में कमजोर शुक्र बैठा हुआ है जिसके कारण आपके जीवन साथी को थोड़ा कष्ट हो सकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप अपने परिश्रम पर विश्वास करें और अपने परिश्रम से ही कार्यों को संपन्न करने का प्रयास करें। भाग्य का सहारा बिल्कुल ना लें। इस सप्ताह आपके लिए 11 और 12 सितंबर कार्यों को करने के लिए लाभकारी है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह आपके जीवनसाथी माताजी और पिताजी सभी का स्वास्थ्य ठीक रहेगा। आपके जीवन साथी को अच्छे परिणाम प्राप्त हो सकते हैं। सूर्य के सप्तम भाव में होने के कारण आपके जीवनसाथी के आत्मविश्वास में वृद्धि होगी। संतान भाव में कमजोर गुरु के होने के कारण इस सप्ताह आपको अपने संतान से कम सहयोग प्राप्त होगा। धन के आने की मात्रा में थोड़ी कमी हो सकती है। आपको दुर्घटनाओं के प्रति सचेत रहना चाहिए। आपको अपने शत्रुओं से भी सावधान रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 8 और 13 तथा 14 सितंबर कार्यों को करने के लिए परिणाम मूलक हैं। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गायत्री मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

शत्रु भाव में बैठे अत्यंत मजबूत सूर्य के कारण इस सप्ताह आप थोड़े से प्रयासों से ही अपने शत्रुओं को पराजित कर सकते हैं। कचहरी के कार्यों में सावधान रहें। इस सप्ताह आपको अपने संतान से सहयोग प्राप्त नहीं हो पाएगा। आपके जीवनसाथी को रक्त संबंधी कोई समस्या हो सकती है। कार्यालय में आपको अपने साथियों का सहयोग मिल सकता है। आपके माता जी को कष्ट हो सकता है। आपकी प्रतिष्ठा में थोड़ी कमी आ सकती है। इस सप्ताह आपके लिए 9 और 10 सितंबर कार्यों को करने के लिए शुभ है। 8 सितंबर को आपको सावधानी पूर्वक कार्यों को निपटाना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

 ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २४८ – होता था घर एक ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना  – होता था घर एक)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २४८ ☆

होता था घर एक ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆ 

शायद बच्चे पढेंगे’

होता था घर एक.’

शब्द चित्र अंकित किया

मित्र कार्य यह नेक.

*

अब नगरों में फ्लैट हैं,

बंगले औ’ डुप्लेक्स.

फार्म हाउस का समय है

मिलते मल्टीप्लेक्स.

*

बेघर खुद को कर रहे

तोड़-तोड़ घर आज.

इसीलिये गायब खुशी

हर कोई नाराज़.

*

घर न इमारत-भवन है

घर होता सम्बन्ध.

नाते निभाते हैं जहाँ

बिना किसी अनुबंध.

*

बना फेसबुक भी ‘सलिल’

घर की नयी मिसाल.

नाते नव नित बन रहे

देखें आप कमाल.

*

बिना मिले भी मन मिले,

होती जब तकरार.

दूजे पल ही बिखरता

निर्मल-निश्छल प्यार.

*

मतभेदों को हम नहीं

बना रहे मन-भेद.

लगे किसी को ठेस तो

सबको होता खेद.

*

नेह नर्मदा निरंतर

रहे प्रवाहित मित्र.

फेसबुक’ घर का बने

सलिल’ सनातन चित्र.

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २४६ – “उन को इस बातका गुमा न हुआ…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत उन को इस बातका गुमा न हुआ...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २४६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “उन को इस बातका गुमा न हुआ...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

कमीज में जो बटन थे वे सभी

टूट गये ।

रह गये वही लोग थे जो पीछे

छूट गये ॥

 

उन को इस बातका गुमा न हुआ

था लेकिन,

करें क्या उनकी सिफारिश के

बन्द फूट गये ॥

 

इस इमारत में नहीं खिडकी

कोई दरवाजा,

कहाँ से आये थे वे लोग

हमें लूट गये॥

 

ये बात और सारा घर था

मेरा कसरती,

फिर भी दुबले वे सभी लोग

मुझे कूट गये ॥

 

उसे नशा न था पर रही

कौन सी थी जिद

उखड़ गया तभी जब गले में

दो घूँट गये ॥

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

 ४.८.२०२५

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # १९ – कविता – हम शिवा के वंशज… ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # १९ ☆

☆ कविता  ☆ ~ हम शिवा के वंशज ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

 देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा… 1

*

हिमगिरी सा ताज सिर पर,

सागर चरण पखारे

 विंध्य  के शिखर से

माँ भी शक्ति निहारे

 बाग जलियांवाला,

मेरठ की क्रांति बोली

 काकोरी, चौरी चौरा,

 बलिया की बागी टोली

 यमुना के तट पर मथुरा,काशी, प्रयाग, गंगा

देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…2

 *

 नाना की लाड़ली थी,

झांसी की लक्ष्मी बाई

 सौ मिल का सफर कर,

 कालपी थी आई

लड़की नही थी वह,

 जलती सी एक चिंगारी

थी दुर्गा, चंडी, शक्ति ,

काली की थी कटारी

हम शान्ति दूत भी है, शिव ग्रीव के भुजंगा

देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा… 3

 *

 मंगल, भगत, उधम,

उद्धम मचाये आंधी

थे क्रांति वीर योद्धा,

नेता सुभाष, गांधी

 अशफाक, बिस्मिल सिर पर

 शोभता कफन था

 आजाद बोस खुदी  के

  श्वास में वतन था

ये क्रांति वीर योद्धा,सच में थे मस्त मलंगा

देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…4

 *

श्री राम -कृष्ण की है,

प्यारी धरा हमारी

नानक,कबीर, तुलसी,

 के ज्ञान की ये क्यारी

यह वीर बिरसा मुंडा,

कलाम की है धरती

स्वामी विवेकानंद के

व्याख्यान को जो सुनती

रसखान, सूर मीरा, रैदास का मन चंगा

देखो लहर रहा है, बड़े शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…5

 *

 शक्ति पीठ मंदिर,

ज्योतिर्लिंग  शिवाला

कहता है जय भवानी,

 मेवाड वाला भाला

माँ भारती के माथे

कश्मीर सा मुकुट है

माँ के चरण की पैजन,

 सागर का सुन्दर तट है

दो भव्य हैं भुजाये कच्छ, कंचन जंघा

देखो लहर रहा है, किस शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…6

 *

 आकाश, अग्नि, तेजस

हम त्रिशूल वाले

 हम चंद्रयान को भी,

 चांद पर उतारे

 ब्रह्मोस की गरज हम,

राफेल दम हमारा

 जिसने की शरारत

घुसकरके हमने मारा

 हम कोटिक युवा शक्ति  होने न देंगें दंगा

देखो लहर रहा है, किस शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…7

हम समृद्ध वृहद भारत,

बढ ती अर्थ शक्ति

विज्ञान कला कौशल,

हम है एक हस्ती

क्षय मुक्त हिन्द होगा,

संकल्प है हमारा

हम स्वास्थ्य वीर योद्धा

हमसे करोना हारा

हम आत्म निर्भर भारत, बजता हमारा डंका

देखो लहर रहा है, किस शान से तिरंगा

 हम शिवा के वंशज, लेना न हमसे पंगा…8

 ♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # 274 ☆ वटवृक्ष…  ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

सुश्री प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # 274 ?

☆  वटवृक्ष… ☆ सुश्री प्रभा सोनवणे ☆

गावाकडच्या  दारासमोरचा

 वटवृक्ष,

खूप आवडायचा लहानपणी,

त्याची ती लालचुटूक फळं,

ते खायला येणारे लाल चोचीचे पोपटी रावे!

पारंब्यांवर मन उगीचच घुटमळत  रहायचे !

बायका यायच्या वटपौर्णिमेला,

हातात धागा घेऊन,

मागायच्या दान,

“जन्मोजन्मी हाच नवरा मिळो” !

म्हणायच्या सावित्रीची गाणी,

सत्यवान जिवंत झाल्याची कहाणी,

ऐकवायच्या एकमेकींना—–

त्या ग्रामीण बायका!

अंब्याचं वाण द्यायच्या,

एकमेकींना!

पडायच्या पाया थोरामोठ्यांच्या!

किती भाबड्या होत्या,

त्यांच्या भावना !

 

काॅलेज मधे होते शिकत,

तेव्हा साजरे झाले महिला वर्ष!

महिला चळवळींनी जोर धरला,

महिला सजग झाल्या!

समानतेची मागणी करू लागल्या !

उफाळून आला स्त्रीवाद!

 

आज कुंडीत चाळीस वर्षापूर्वी,

सासुबाईंनी,

लावलेल्या वडाच्या फांदीचा

वटवृक्ष झालाय!

 

त्याला पाणी घालताना विचार आला,

हे बोन्साय नव्हे ,

गावाकडच्या मातीत लावलं तर  फोफावेलही……

 

घरात येऊन टी.व्ही.लावला तर,

सगळ्याच मालिकांमधून…..

वटपूजेचे इव्हेंटस् सुरू…..

आणि बातम्यांमधे….हनिमूनला गेलेल्या जोडप्यातील….

नवरीच्या..कुटील कारस्थानी सत्यकथा!

 

आठवली बालपणी पाहिलेली,

खेडूत बायकांची,

वडाची पूजा आणि फेरगाणी!

 

त्यापासून करून घेतलेली मुक्तता!

                आणि

आज पुन्हा..फेसबुक, टी.व्ही.मालिकेतला वटपौर्णिमेचा जल्लोष!

मला माझ्याच मनाचं

बोन्साय झाल्यासारखं वाटतंय,

वटवृक्ष होता… होता….

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # 287 ☆ व्यंग्य – हमारे कार्यालय ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘हमारे कार्यालय‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 287 ☆

☆ व्यंग्य ☆ हमारे कार्यालय

साढ़े  दस बजे कार्यालय खुलते हैं। खुलने का मतलब यह नहीं कि कर्मचारी अपनी सीटों पर आ जाते हों। खुलने का मतलब सिर्फ यह है कि साढ़े दस के बाद कभी भी दफ्तर के पट खुल जाते हैं। चपरासी मेज़ों पर कपड़ा मारने लगता है। जहां झाड़ू लगाने का रिवाज़ है वहां झाड़ू लगने लगती है। जो लोग साढ़े दस को साढ़े दस समझ कर आ जाते हैं वे झाड़ू से उठे गर्द-ग़ुबार से बचने के लिए बाहर भीतर परेड करते हैं।

ग्यारह बजे के आसपास कर्मचारी दफ्तर के कंपाउंड में घुसने लगते हैं। कंपाउंड में प्रवेश करते ही ड्यूटी शुरू हो जाती है। अपनी मेज़ पर पहुंचना ज़रूरी नहीं होता। बाहर ही सहयोगी, मित्र मिल जाते हैं। दो घड़ी बात करने का, पारिवारिक हाल-चाल लेने का, डी.ए. और बोनस के बारे में पूछने का मन होता है। इसके बाद  बरामदे के किसी कोने में गुटखा थूक कर कर्मक्षेत्र में प्रवेश किया जाता है। कार्यालय का कोई कोना असिंचित नहीं होता। लोग आते-जाते, सीढ़ियों से उतरते-चढ़ते निष्ठा से कोनों को सींचते हैं।

सवा ग्यारह बजे भी आधी मेज़ें खाली होती हैं। पूछने पर सहयोगी सच्चा सहयोगी-धर्म निबाहते हैं— ‘अभी आ जाएंगे’। फिर जोड़ देते हैं —‘अगर छुट्टी पर नहीं हुए तो।’ ज़्यादा पूछताछ करने वाले को डपट दिया जाता है— ‘अभी ग्यारह ही तो बजे हैं, थोड़ा घूमघाम कर आ जाओ।’ अगर चुस्ती और नियमितता का आदी कोई आदमी किसी काम का मारा दफ्तरों में आ जाता है तो यहां की चाल देखकर सकते में आ जाता है।

दफ्तर में प्रवेश करने पर कुछ मेज़ें खाली मिलती हैं, लेकिन कुछ मेज़ों के इर्द-गिर्द पूरा दफ्तर मिल जाता है। इन्हीं मेज़ों पर दो-चार लोग बैठे होंगे, बाकी इनके आसपास कुर्सियों पर होंगे। अबाध चर्चा चलती है— घोटालों की, क्रिकेट टेस्ट की, संभावित ट्रांसफरों की, नेताओं द्वारा साहब की रगड़ाई की। इसी बीच अगर काम का मारा कोई दफ्तर में आ जाता है तो वह कभी खाली  मेज़ को और कभी गप्पों में मशगूल इस गुच्छे को देखता है। बातचीत में बाधा डालने और रंगभंग करने की उसकी हिम्मत नहीं होती क्योंकि कर्मचारी पर काम करने की बाध्यता नहीं होती। ज़्यादा अकड़ दिखाओगे तो इतने चक्कर लगाने पड़ेंगे कि अंजर- पंजर ढीला हो जाएगा। क्या करोगे? शिकायत करोगे? जाओ, जहां जाना हो चले जाओ। अब तुम खड़े रहो, हम जा रहे हैं चाय पीने। लौट कर आने तक खड़े रहोगे तो सोचेंगे।

कर्मचारी-नेताओं की कुर्सियां हमेशा खाली रहती हैं। जन-सेवा में लगे रहते हैं, काम की फुरसत कहां? अफसर की हिम्मत कहां जो ज़बान हिलाए। नेता सुबह से शाम तक व्यस्त रहते हैं— मंहगाई, बोनस, भत्तों के लिए लड़ने में, अखबारों में विज्ञप्तियां देने में। एक ही काम वे नहीं कर सकते —कर्मचारियों को काम करने और उत्पादन बढ़ाने के लिए कहना। जो नेता कर्मचारियों को काम करने के लिए कहता है वह लोकप्रिय नहीं होता। इसलिए नेता ज़माने की नब्ज़ देखकर काम करते हैं।

कोई कर्मचारी मजबूरी में मेज़ पर सिर रखे झपकी लेता दिखता है। बीच-बीच में सिर उठाता है, अधखुली आंखों से इधर-उधर देखता है, फिर पूरा मुंह फाड़कर उबासी लेता है। लगता है गाल की खाल फट जाएगी। इसके बाद धीरे-धीरे फिर सिर को मेज़ पर टिका देता है। एकाध बार बीच में बुदबुदाता है— ‘बोर हो गए। कोई काम नहीं है।’

एक और मेज़ के पीछे एक ज़्यादा समझदार युवक है। वह काम के अभाव में कर्नल रंजीत या अमिताभ या कामिनी का उपन्यास पढ़ रहा है। बीच में कोई फाइल आकर उसके अध्ययन में बाधा डालती है। उसे फुर्ती से निपटा कर वह अगली मेज़ की तरफ धकेल देता है और फिर उपन्यास में डूब जाता है।

हमारे दफ्तरों की एक विशेषता यह है कि वहां काम न रहने पर भी किसी को बात करने की फुरसत नहीं होती। काम से आये आदमी को कर्मचारी बबर शेर की नज़र से देखता है। उसकी नज़र पढ़ते ही आदमी झुलस कर सिकुड़ जाता है। एक बार बाबू की नज़र पड़ने के बाद वह गिन गिन कर कदम रखता, दबे पांव मेज़ की तरफ बढ़ता है। दफ्तर के दरवाज़े में घुसते ही आदमी का मनोबल नीचे की तरफ गिरता है। आवाज़ धीमी हो जाती है। बहुत से लोग हकलाने लगते हैं। यहां सिर्फ छात्र-नेताओं और स्थानीय नेताओं की आवाज़ ही बुलन्द रह पाती है, बाकी लोग ज़्यादातर मिमियाते,चिरौरी करते दिखते हैं। अगर बाबू का मूड ठीक हुआ और टाइम हुआ तो काम कर देता है।

झपकी लेने वाले बाबू के सामने बड़ी देर से एक आदमी खड़ा अपनी उंगलियां मरोड़ रहा है। कुछ देर पहले उसने बाबू से कुछ पूछा था। सहमी हुई आवाज़ में दो-तीन बार दोहराने के बाद बाबू ने अपना सिर उठाया था और कुछ जवाब दिया था। जवाब इस तरह दिया गया था कि आदमी कुछ समझ नहीं पाया। बाबू ने फिर अपना सिर  मेज़ पर रख दिया था। आदमी ने फिर से बाबू से पूछा था। अब की बार बाबू ने सिर उठा कर भौंहें चढ़ाकर गुर्रा कर इस तरह जवाब दिया कि आदमी घबरा गया। जवाब फिर भी उसके पल्ले नहीं पड़ा। बाबू ने सिर वापस मेज़ पर टिका दिया।

आदमी अब पांव घसीटता बाबुओं के गुच्छे के पास पहुंच गया है। बातचीत में थोड़ा विराम होते ही वह अपना सवाल दोहराता है। एक बाबू गुटखा चबाते, कोई दो शब्दों का जवाब उसकी तरफ फेंक कर मुंह घुमा लेता है। गुटखे के उस पार से आया हुआ यह जवाब भी आदमी की पकड़ में नहीं आता। बाबू  फिर गप्पों में मशगूल हो गया है। अब उसकी सवाल पूछने की हिम्मत नहीं पड़ती।

ढीले पांवों से वह उपन्यास वाले बाबू की मेज़ पर पहुंचता है। भिनभिन करके अपना सवाल पूछता है। बाबू शायद सस्पेंस या रोमांस के शिखर पर है। वह बिना किताब से सिर उठाये कोई जवाब टपका देता है। जवाब फिर आदमी के सिर के ऊपर से गुज़र जाता है। हिम्मत बटोर कर वह फिर सवाल दोहराता है। अब बाबू उपन्यास से सिर उठाता है और ज़बान का कुछ बेहतर उपयोग करके कहता है, ‘सोहन बाबू के पास जाओ।’ ‘जाओ’ के साथ ही वह वापस सस्पेंस या रोमांस की दुनिया में उतर जाता है।

अब आदमी में यह हिम्मत नहीं कि पूछे कि सोहन बाबू कौन से हैं और कहां बिराजते हैं। हार कर वह बाहर बेंच पर एक टांग ऊपर रखकर बैठे चपरासी के पास पहुंचता है, बड़ी  शिष्टता से पूछता है, ‘सोहन बाबू कौन से हैं?’

चपरासी भी दुर्वासा के वंश का है। भृकुटि  तान कर मेज़ पर सोये बाबू की तरफ इशारा करता है, कहता है, ‘वह तो रहे। और कौन से हैं?’

आदमी वापस लौट कर मेज़ पर निद्रामग्न बाबू के सामने पहुंचता है। बाबू की नींद में खलल डालने के लिए उसका मन अपराधबोध से ग्रस्त है। वह फिर पुकार कर बाबू को इस नश्वर संसार में वापस बुलाता है। बाबू का सिर बांहों के ऊपर से धीरे-धीरे उठता है। आदमी कुछ दांत ज़्यादा निकालकर कहता है, ‘मेरी फाइल शायद आपके पास है।’

सोहन बाबू फिर  जबड़ा-तोड़ उबासी लेते हैं, फिर कहते हैं, ‘है न। हम तो आपसे दो-दो बार कहे कि हमारे पास है। आप सुने नहीं क्या?’

आदमी राहत  की सांस लेता है, कहता है, ‘तो फिर कष्ट करके निकाल दीजिए न।’

सोहन बाबू कष्ट करके अपना बायां हाथ उठाकर घड़ी देखते हैं, कहते हैं, ‘आधा घंटा में लंच होने वाला है। तीन बजे आइए, तभी देखेंगे।’

उनका सिर फिर मंज़िले-मक्सूद की तरफ झुकने लगता है और आदमी कुछ देर तक उनकी छवि निहारने के बाद पांव घसीटता दरवाज़े की तरफ बढ़ जाता है। चलते-चलते वह देखता है कि गुच्छे वाले बाबुओं ने अब ताश निकाल लिये हैं और उपन्यास वाला बाबू किताब पर झुका मन्द मन्द मुस्करा रहा है। लगता है हीरो हीरोइन का इश्क परवान चढ़ गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – कविता ☆‘ग़ज़ल – आसमान बन सकूँ’ ☆ डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘ ☆

डॉ. दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘

☆ ‘ग़ज़ल – आसमान बन सकूँ’ ☆ डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘ ☆

बेघर के लिए छत और मकान बन सकूँ

दिल चाहता है मैं भी, आसमान बन सकूँ ।।

*

बरसाऊँ नेह इतना, बादल में छुप के मैं

बस प्रेम-प्यार की मैं, दास्तान बन सकूँ।।

*

जुगनू सी चमक से करूँ, हर घर में मैं उजाला

ग़म की न रहे रात,बस विहान बन सकूँ।।

*

जीने की ख़्वाहिशों के,मैं रंग भरूँ इतने

पलकों में ख़्वाब, ख़ुशियों का जहान बन सकूँ।।

*

मुस्कान हो हर लब पर, अरमान यही है

है जुस्तजू कि,जश्न का सामान बन सकूँ।।

*

हर हाल में बेहाल, आज ज़िन्दगी यहाँ

क्या लिक्खूं कि,हर लब की मुस्कान बन सकूँ।।

*

हमने ‘उदार ‘ रह कर, सबको गले लगाया

सबके दिलों में, प्रेम की पहचान बन सकूँ।।

© डॉ० दुर्गा सिन्हा ‘उदार‘

कैलीफ़ॉर्नियां, अमेरिका

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ || चैत्रपालवी || ☆ सौ. शुभदा भा. कुलकर्णी (विभावरी) ☆

सौ. शुभदा भास्कर कुलकर्णी (विभावरी)

? कवितेचा उत्सव ?

☆ || चैत्रपालवी || ☆ सौ. शुभदा भा. कुलकर्णी (विभावरी) 

साद देतसे चैत्राला, बहरातला वसंत.

गुढी उभारून करु नववर्षाचे स्वागत..

*

जिर्ण पर्णे टाकुनिया वृक्ष नव्याने नटले

मोहक चैत्रपालवी फांदी-फांदीवर डोले..

*

विविध रंगी फुलांचा सुगंध दरवळला

छत्र घेऊनी उन्हाचे गुलमोहर फुलला..

*

आम्रतरु मोहरला बाळकै-या खुणावती

हर्षभरे फांदीवरी राघू-मैना गाणी गाती..

*

रसभ-या फळांतुनी अमृतरस पाझरे..

गोड -आंबट द्राक्षांचे वेल दिसती साजरे…

*

वळिवाची एक सर तप्त ऊनं शमविते..

थंडगार वा-यावर हिरवाई डोलविते…

*

निसर्ग हा खुलेपणी भरभरुन देतसे..

मनी ‘चैत्रपालवी ‘ जपण्यास सांगतसे…

💦🌨️.

©  शुभदा भा.कुलकर्णी (विभावरी)

कोथरूड-पुणे.३८.

   मो.९५९५५५७९०८ 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “What a level of confidence!” ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

श्री सुधीर करंदीकर

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☆ “What a level of confidence!” ☆ श्री सुधीर करंदीकर ☆

What a level of confidence !

माझ्या स्कुटरचा हेड लाईट ७ – ८ दिवसांपासून बिघडला होता. रोज बावधनहून घरी परत येतांना अंधार झालेला असतो, त्यामुळे हेड लाईट शिवाय गाडी चालवणे, जरा किंवा चांगलेच रिस्की वाटायचे. आळस केंव्हातरी अंगाशी येतोच – येतो, असं आपण मानतो. कल करे सो आज कर, वगैरे, अशा सगळ्या म्हणी मला पाठ आहेत. तरीही रिपेअर करायला मुहूर्त लागत नव्हता. आणि टाळाटाळ करण्याचं शुल्लक कारण होतं, आणि, ते म्हणजे, माझ्या नेहेमीच्या मेकॅनिकचे दुकान, माझ्या रोजच्या जाण्या – येण्याच्या रस्त्याच्या विरुद्ध बाजूला होते.  

त्यामुळे, लाईट दुरुस्त करायचा, म्हणजे सकाळी त्याच्याकडे गाडी न्यायची, तो म्हणणार, साहेब तासाभरानी या, करून ठेवतो. चालत घरी यायचं. तो वेळेत करून ठेवेल, यावर आपला कधीच विश्वास नसतो. म्हणून आपण त्याला फोन करणार, ‘झालीय का’.  मग चालत जाणार आणि गाडी आणणार.  दिव्यासारख्या किरकोळ कामाकरता इतके सोपस्कार नकोत, म्हणून, ‘आज करे सो कल कर, आणि कल करे सो परसो कर ’ असा माझा उलटा प्रवास सुरु होता.

काल रविवार होता. दुपारी आमचे युरोप मित्र श्री नेरकर यांच्याकडे गेलो होतो. घरी परत येतांना लक्षात आलं, की, मेकॅनिकचे दुकान याच रस्त्यावर आहे. विचार केला, की, गाडी त्याच्याकडे टाकू, रिपेअर होईपर्यंत इकडे -तिकडे बघू, टाईम पास करू. बायको घरी चालत जाईल.  ‘कल करे सो आज कर, आणि आज करे सो अभी’, असा  विचार पक्का झाला. कार्पोरेशन बॅंकेजवळ पोहोचलो आणि लक्षात आलं, की, इथे एक स्पेअर पार्टचं दुकान आहे आणि तिथे मेकॅनिक पण असतो. विचार बदलला. इथेच गाडी टाकली तर काम लवकर होणार, हे नक्की. 

बायको चालत घराकडे निघाली, मेकॅनिकला लाईटबद्दल सांगितले. त्यानी चेक केले आणि म्हणाला स्विच बदलावा लागेल. मी पैसे विचारले आणि दुकानात पैसे देईपर्यंत, यानी स्विच काढला – नवीन बसवला, म्हणाला साहेब गाडी झाली, घेऊन जा. जुना स्विच त्यानी माझ्या हातात दिला. 

मी : (सवयीप्रमाणे विचारलं) गाडी चालू करून लाईट लागतो, हे चेक केले ना ? 

मेकॅनिक : साहेब, त्याची काही गरज नाही. गाडी चालवतांना अंधार पडला, की, बटन ऑन करा. लाईट लागणार 

मी : एकदा चेक तर करून घ्या 

मेकॅनिक : साहेब, दुकानात सगळा  माल ओरिजिनल असतो. त्यामुळे मालावर माझा पूर्ण विश्वास आहे. काम करतांना, काम आणि मी, यामध्ये इतर काहीही  विचार मी कधीच मनात आणत नाही. त्यामुळे Always do it right, first time हा माझा मोटो आहे. काम चुकायची गुंजाईश – झिरो. 

मी (मनांत)  : हा माणूस आपल्यापेक्षा खूपच वर पोहोचलेला दिसतोय. 

मी मेकॅनिक ला थँक्स म्हणालो आणि गाडी सुरु केली. अजून लख्ख उजेड होता, पण सवयीप्रमाणे, माझा अंगठा लाईटच्या बटनावर गेला, की, निघण्यापूर्वी लाईट लावून बघावा म्हणून. पण लगेच विचार आला, की, मेकॅनिक ला बटणाच्या क्वालिटीवर आणि स्वतःच्या कामावर इतका विश्वास आहे, तर मला त्याच्या कामावर विश्वास ठेवायला काय हरकत आहे. माझा अंगठा आपोआप मागे आला. तेवढ्यात एका जवळच राहणाऱ्या मित्राचा फोन आला, थोडावेळ घरी येऊन जा, एक स्पेशल डिश आहे. 

मित्राकडून निघतांना चांगलाच अंधार पडला होता. गाडी सुरु केली. लाईट चे काम झाले आहे, हे माहित होते. बटन सुरु केलं आणि लाईट सुरु. मेकॅनिक बद्दल तोंडातून आपोआप शब्द आले – What a level of confidence !

घरी आल्यानंतर, मेकॅनिकचे, “काम करतांना, काम आणि मी, यामध्ये इतर काहीही  विचार मी मनात आणत नाही”, “Always do it right, first time हा माझा मोटो आहे. त्यामुळे काम चुकायची गुंजाईश – झिरो”, हे शब्द मनात घुमायला लागले. आणि मी भूतकाळात गेलो —

* कुणाच्या खात्यात बँकेत चेक भरायचा असेल, तर चेक लिहिल्यानंतर मी २-३ वेळा सगळे बरोबर आहे ना ! हे चेक करतो आणि बँकेत चेक बॉक्स मध्ये टाकण्यापूर्वी पुन्हा बघतो, कि, काही चुकले तर नाही ना !

* घराला कुलूप लावून बाहेरगावी जायचे असेल, तर ५-६ वेळा तरी कुलूप ओढून बघतो. नंतर गाडीत बसल्यानंतर काही वेळा मनात रुख-रुख राहते, की, कुलूप बरोबर लागलय ना, कार्पोरेशन चा पाण्याचा नळ बघायचा राहिला आहे – सुरु राहिला असेल तर काय होणार 

* कार लॉक करून आपण घरात येतो आणि मनात पाल चुकचुकते कि पार्किंग लाईट ऑन तर नसतील 

* एकदा आम्ही मित्र कारनी बाहेरगावी निघालो. थोडं पुढे गेलो आणि एक जण म्हणाला, गाडी मागे घे. दाराला बाहेरून कुलूप लावले आहे का नाही, आठवत नाही. संध्या चोऱ्या खूप होतायत. एक जण म्हणाला, बाहेरून एक्स्ट्रा कुलूप लावणे जास्त अनसेफ आहे. चोरांना खात्री असते, की, आत कुणी नाही आणि आपला मार्ग मोकळा आहे. लॅच चे कुलूप जास्त सेफ आहे, काळजी करू नको. पण मित्राला ते पटले नाही. आम्ही कार वळवली. घरी गेलो. कुलूप व्यवस्थित होते. तरी मित्रानी २-३ दा ओढून बघितले आणि आम्ही निघालो. 

* बऱ्याच वेळा आपण छोटा मोठा प्रवास करून, एखाद्या जागृत देवस्थानाला जातो. आत जातांना काहीतरी इच्छा घेऊनच आत जातो. मुद्दाम पूजेचे साहित्य विकत घेतो, फुलं घेतो. आत गेल्यावर व्यवस्थित दर्शन होतं. प्रसन्न मनानी आपण बाहेर पडतो. आणि मंदिराच्या बाहेर पडल्यावर लक्षात येतं, की, अरे, देवाकडे जे मागण्याकरता आपण इथपर्यंत आलो होतो, ते तर मागायचंच राहीलं .  

अशी भली मोठी यादी नजरेसमोरून जायला लागली. माझ्यासारखे अजून बरेच ‘मी’ नक्कीच असतील. आणि सगळ्यांचे असेच वेगळे वेगळे अनुभव पण असतील. या आपल्या अशा सवयीमुळे, वेळ तर वाया जातोच जातो आणि ताणतणाव पण वाढतात. जेवतांना कधी जोरदार ठसका लागतो, कधी पाय घसरून पडायला होतं, कधी भाजी चिरतांना चाकू हाताला लागतो, अपघात होतात, तब्येत बिघडते वगैरे, वगैरे.  

आणि या सगळ्याचं कारण काय? तर, कहींपे निगाहे – कहींपे निशाना आणि  Not doing things Right, at first time. ‘जहापे निगाहे – वहींपे निशाना’ हे जर जमवलं, तर काहीच कठीण नसतं. ह्याच आधारावर  स्वयंवर जिंकल्याचं महाभारतामधलं उदाहरण आहेच. आणि त्याकरता गरज आहे – मन लावून काम करण्याची – हातातले काम आणि मी यामध्ये इतर विचार न आणण्याची. असं म्हणतात, आंघोळ करत असाल तर – फक्त मी आणि आंघोळ यावर लक्ष ठेवा, जेवत असाल तर – समोरचे चविष्ट अन्न चावून खाणे आणि  मिळणारा आनंद यावर लक्ष केंद्रित करा. टीव्ही बघत असाल तर फक्त टीव्ही एन्जॉय करा. टॉयलेट ला गेला असाल तर फक्त तेच – फोन नाही / फेस बुक नाही.  एका वेळेस एकच काम आणि ते पण मन झोकून. 

मी मनात खूणगाठ बांधली, की, या क्षणापासून Do it right – First time चा अवलंब करायचा. रोज सकाळी उठल्यावर मेकॅनिकचे विचार, श्लोक म्हटल्यासारखे १० वेळा म्हणायचे. रोज रात्री झोपण्यापूर्वी मेकॅनिकचे विचार, श्लोक म्हटल्यासारखे १० वेळा म्हणायचे, म्हणजे ते अंतर्मनात रुजतील. असं सांगतात, की, एखादी गोष्ट सतत ३० दिवस केली, तर ती सवय लागते आणि ६० दिवस केली, तर तो स्वभाव बनतो. 

आणि मग एक दिवस, आपलेच अंतर्मन, आपल्या कामाकडे बघून म्हणेल – What a level of confidence!

© श्री सुधीर करंदीकर

मो. 9225631100 – ईमेल – srkarandikar@gmail. com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # 244 – गझल – आकाश भावनांचे…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # 244 – विजय साहित्य ?

☆ गझल – आकाश भावनांचे…! ☆

आकाश भावनांचे गझले तुझ्याचसाठी,

हे विश्व आठवांचे मतले तुझ्याचसाठी…! 

  *         

आकाश बोलणारे जमले तुझ्याचसाठी,

हे पंख, ही भरारी, इमले तुझ्याचसाठी…!

 *   

माणूस वाचताना, टाळून पान गेलो.

काळीज आसवांचे, तरले तुझ्याचसाठी..!

*

सारे ऋतू शराबी, देऊन झींग गेले

प्याले पुन्हा नव्याने, भरले तुझ्याचसाठी..! 

*

हा नाद वंचनांचा , झाला मनी प्रवाही

वाहतो कुठे कसा मी?, रमलो तुझ्याच साठी..!       

*

जखमा नी वेदनांची,आभूषणे मिळाली

लेऊन  साज सारा, नटलो तुझ्याचसाठी..!

*

काव्यात प्राण माझा, शब्दांत अर्थ काही

प्रेमात प्रेम गात्री, वसले तुझ्याचसाठी..!

*

आयुष्य सांधताना,जाग्या  अनेक घटना

हे देह भान माझे हरले तुझ्याचसाठी…!

*

कविराज रंगवीतो, रंगातल्या क्षणांना

चित्रात भाव माझे, उरले तुझ्याचसाठी..!

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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