English Literature – Articles ☆ Words of the Buddha ☆ Shri Jagat Singh Bisht ☆


Shri Jagat Singh Bisht

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

Authored six books on happiness: Cultivating Happiness, Nirvana – The Highest Happiness, Meditate Like the Buddha, Mission Happiness, A Flourishing Life, and The Little Book of Happiness. He served in a bank for thirty-five years and has been propagating happiness and well-being among people for the past twenty years. He is on a mission – Mission Happiness!

🌸 Words of the Buddha 🌸

Udāna 2.11 — Mucalindavagga

«Freedom from lust is happiness in the world,

the going beyond all sensual desires.

But the crushing out of the conceit “I am” —

this is the highest happiness.»

🪷 हिन्दी भावानुवाद

«इस संसार में राग से मुक्त होना सुख है,

सभी कामनाओं और इन्द्रिय-विषयों से परे हो जाना सुख है।

किन्तु ‘मैं हूँ’ के अहंकार का पूर्ण क्षय —

यही परम सुख है।»

🌿 Pāli

«Sukhā virāgatā loke

kāmānaṃ samatikkamo

asmimānassa yo vinayo

etaṃ ve paramaṃ sukhaṃ.»

✨ A reflection

The Buddha points to a happiness deeper than the pleasures of the senses.

When craving loosens its hold, the mind becomes freer. And when even the subtle conceit of “I”, “me” and “mine” falls away, one touches a happiness beyond ordinary worldly pleasure.

 🌼 चिन्तन

 बुद्ध हमें सुख की एक गहरी दिशा दिखाते हैं।

जब इच्छाओं और आसक्तियों की पकड़ ढीली पड़ती है, मन स्वतंत्र होने लगता है। और जब ‘मैं’ और ‘मेरा’ का सूक्ष्म अहंकार भी मिट जाता है, तब मन उस परम शान्ति और सुख को स्पर्श करता है जो बाहरी वस्तुओं पर निर्भर नहीं है।

 🙏 May we learn to let go — a little more each day.

 #Buddha #WordsOfTheBuddha #Dhamma #Udana #Mindfulness #Happiness #InnerPeace #Meditation #Wisdom #Buddhism

 ♥ ♥ ♥ ♥

Compiled by:

Jagat Singh Bisht

Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker

FounderLifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ शारदास्तवन… ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

डाॅ. निशिकांत श्रोत्री 

? कवितेचा उत्सव ? 

☆ शारदास्तवन… ☆ डाॅ. निशिकांत श्रोत्री ☆

☆

नमो शारदे मंगलाक्षी शुभांगी

तुझा वास असू दे सकलांतरंगी  ||ध्रु||

* 

तुझ्या हाती वीणा मधूर सप्तसुरी

प्रभा तेजःपुंज प्रज्ञे सावरी

विलसे मयुरावरी सप्तरंगी

नमो शारदे मंगलाक्षी शुभांगी ||१||

 *

तुझी अर्चना देइ संपूर्ण दान

तुझ्या ठायी अविचल राहू दे ध्यान

विवेका असो कांस बुद्धीतरंगी

नमो शारदे मंगलाक्षी शुभांगी ||२||

☆

कवी : © डॉ. निशिकान्त श्रोत्री

एम. डी. , डी. जी. ओ.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४३१ ☆ लंदन डायरी – जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४३१ ☆

?  आलेख – #लंदन_डायरी – जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी  ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

लंदन के Natural History Museum में आज एक ऐसी आकृति के सामने खड़ा था, जिसे देखकर विज्ञान कुछ और कहता है और मन कुछ और।

काँच के भीतर रखी सफेद, लहरदार संरचना को पहली नजर में देखा तो लगा, यह तो मेरे गणेश जी हैं! गोल-सा उदर, उभरती हुई मुखाकृति, सूँड़ जैसा आकार और दोनों ओर कानों का-सा विस्तार। किसी कुशल शिल्पकार ने मानो श्वेत पत्थर में गजानन को उतार दिया हो।

लेकिन यह किसी मूर्तिकार की बनाई प्रतिमा नहीं है। संग्रहालय इसे Gogotte कहता है, प्राकृतिक रूप से बनी एक विचित्र बलुआ-पत्थर संरचना। यह Lasting Impressions Gallery में प्रदर्शित है, जहाँ संग्रहालय पृथ्वी के अतीत की ऐसी प्राकृतिक वस्तुओं को प्रस्तुत करता है।

संग्रहालय स्वयं Gogotte को लगभग एक “solidified sandstone sculpture” जैसा बताता है। यह नमूना 2017 में संग्रहालय को सर डेविड एटनबरो के 90वें जन्मदिन के सम्मान में दिया गया था।

विज्ञान उसकी रचना की प्रक्रिया समझाता है। मेरी आँखें उसमें गणेश खोज लेती हैं।

यही भारतीय दृष्टि का सौंदर्य है। “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।” गणेश को देखने के लिए हमेशा किसी मंदिर में स्थापित प्रतिमा की आवश्यकता नहीं। भारत में किसी वृक्ष के तने की आकृति में वे दिखाई दे जाते हैं, किसी अनगढ़ पत्थर में सूँड़ उभर आती है और किसी चट्टान का प्राकृतिक उभार गजानन का आभास देने लगता है।

गणेश स्वयं प्रकृति और कल्पना के बीच एक सहज सेतु बना देते हैं।

वे हमारे मन में बसते हैं।

मूर्तिकार मिट्टी से गणेश गढ़ता है।

भक्त पत्थर में गणेश देख लेता है।

और कभी-कभी प्रकृति ऐसी आकृति बना देती है कि दोनों के बीच का अंतर ही मिट जाता है।

लंदन में गणेश की यह कहानी यहीं समाप्त नहीं होती।

कुछ दूरी पर British Museum के संग्रह में भारत से आई गणेश की अनेक प्राचीन प्रतिमाएँ हैं।

 ओडिशा की 12वीं शताब्दी की एक बलुआ-पत्थर प्रतिमा में गणेश चार भुजाओं के साथ कमल पर खड़े हैं और उनके पास उनका वाहन मूषक भी अंकित है। दूसरी, 13वीं शताब्दी की प्रतिमा में गणेश लक्ष्मी के साथ विराजमान हैं। यह पंचमुखी गणेश का अत्यंत विशिष्ट रूप है।

एक और 13वीं शताब्दी की गणेश प्रतिमा, जिसे British Museum ने Figure of Ganesha के रूप में दर्ज किया है, कभी लंदन के Horniman Museum और Brent Museum की Celebrating Ganesha प्रदर्शनियों में भी दिखाई गई थी। यानी लंदन में गणेश केवल किसी प्रवासी समुदाय की धार्मिक आस्था का हिस्सा मात्र नहीं हैं। भारतीय कला के इतिहास और वैश्विक संग्रहालय संस्कृति में भी उनकी अपनी जगह है।

Wimbledon में Shree Ghanapathy Temple है। इसकी कहानी तो जैसे लंदन में गणेश की जीवंत यात्रा है। 1979 में कुछ श्रीलंकाई हिंदू परिवार एक स्थानीय सभागार में गणेश की एक प्रतिमा के साथ नियमित पूजा के लिए जुटने लगे। वही प्रतिमा आज मंदिर की Utsavar Ghanapathy मानी जाती है। 1981 में पुराने Presbyterian Church भवन को रूपांतरित करके मंदिर का महाकुंभाभिषेक हुआ। मंदिर अपने इतिहास में इसे यूरोप का पहला पूर्णतः हिंदू मंदिर बताता है।

यह रोचक है कि पुराने चर्च में अब मंदिर है। इसी तरह पिछले दिनों मैने हैरो में आयोजित कवि गोष्ठी का उल्लेख अपनी डायरी में किया था , वह आयोजन स्थल भी मंदिर है, जो पहले चर्च ही था।

Tejendra Sharma

इस समय तो लंदन में गणेशोत्सव का वातावरण भी है। London Ganesh Utsava Samithi ने 14 से 26 सितंबर 2026 तक प्रतिदिन गणेश पूजा, विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों और 26 सितंबर को विसर्जन का कार्यक्रम घोषित किया है।

इस तरह एक ही शहर में गणेश के कितने रूप दिखाई देते हैं।

कहीं वे प्रकृति की अनायास रचना हैं।

कहीं सदियों पुराने भारतीय शिल्प में सुरक्षित हैं।

कहीं वे प्रवासी समुदाय की स्मृतियों और आस्था के साथ जीवित हैं।

और संग्रहालय में खड़े हुए मेरे भारतीय मन को अचानक फ्रांस से आए पत्थर में वे परिचित स्वरूप में दर्शन देते हैं।

मुझे आज Natural History Museum की इस Gogotte ने यही सोचने को विवश किया कि शायद आस्था केवल पूजा का विषय नहीं, दृष्टि का भी विषय है।

भूविज्ञानी उस आकृति में पृथ्वी का इतिहास पढ़ता है।कलाकार उसकी आकृतियों में सौंदर्य देखता है।

और भक्त उसमें गणेश दर्शन करता है।

कौन सही है?

शायद प्रश्न ही गलत है।

हर दृष्टि अपने अनुभव का अर्थ लेकर आती है। विज्ञान हमें बताता है कि यह आकृति कैसे बनी। आस्था हमें बताती है कि उसे देखकर हमारे भीतर क्या जागा।

फ्रांस की धरती पर करोड़ों वर्ष पहले बनी इस प्राकृतिक संरचना को लंदन में देखकर मेरे भीतर गणेश जागे।

और मन में यही आया—

गणेश शायद केवल मंदिर में विराजते देवता नहीं हैं। वे उस क्षण में भी हैं, जब हमारी दृष्टि किसी अनगढ़ वस्तु में अर्थ, सौंदर्य और मंगल का आकार पहचान लेती है।

आज मैंने गणेश जी को लंदन में खोजा नहीं।एक प्राकृतिक पत्थर ने मुझे उन्हें दिखा दिया।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७९ ☆ # “अंधकार…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “अंधकार…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २७९ ☆

☆ # “पलकों ने खता की…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

☆

पलकों ने खता की

आंखों ने सजा पाई

दिल से हाय निकली

आंखें हैं डबडबाई

 

कुछ टूट गया अंदर

कुछ टूट गया बाहर

टूटते हुए रिश्तों ने

हकीकत है समझाई

 

चेहरे पर रोष है

इरादों में जोश है

बहते हुए लावे ने

हर भीख है ठुकराई

 

शब्दों के हंसी फंदे

सब लूटने के धंधे

बहेलियां ने मुखौटे में

सूरत है छुपाई

 

अंगारों पर चल रहे हैं

मुफलिसी में पल रहे हैं

यह चुप्पी यह खामोशी

यह किस्मत कहां ले आई

 

अब टूट रहा है सब्र

बन जाए यहीं पर कब्र

सरमायेदारों के खिलाफ

“श्याम” तुमने आवाज है उठाई

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -१२३ – हमें तेरा ही सहारा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘हमें तेरा ही सहारा…‘।)

☆ अभिव्यक्ति # १२३ ☆

☆ हमें तेरा ही सहारा… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

मुझे तेरा ही सहारा, भगवान,

और कोई जग में नहीं,

 

हम तो तेरे ही भरोसे, भगवान,

भरोसा कोई और नहीं,

हमें तेरा ही सहारा,

 कोई और न हमारा,

तेरी कृपा हो कृपा निधान,

 और कोई जग में नहीं,

 

तू है करुणा का सागर,

 मेरी छोटी सी है गागर,

छलके न करुणा निधान,

और कोई जग में नहीं,

 

 तूने दुनिया बनाई,

 इसमें प्रीत जगाई,

 जुदाई न रहे भगवान,

और कोई जग में नहीं,

 

मुझे तेरा ही सहारा भगवान,

और कोई जग में नहीं.

☆

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १०५ आणि १०६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक १०५ आणि १०६ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक क्र. १०५ – – – 

विवेके क्रिया आपुली पालटावी ।

अति आदरे शुध क्रिया धरावी ।

जनीं बोलण्यासारिखे चाल बापा ।

मना कल्पना सोडी संसार तापा ।।१०५।।

अर्थ : विवेकाच्या साहाय्याने आपल्या वागणुकीत बदल करावा. चांगले आचरण जाणीवपूर्वक आणि आदरपूर्वक करावे. आपले वागणे आणि बोलणे यात एकवाक्यता असावी. हा संसार जरी दुःखमय असला तरी त्याविषयी उगीचच नको त्या कल्पना करणे सोडून द्यावे.

(विवेक- सारासार विचार, पालटावी – बदल घडवून आणावा, शुध – चांगले/उत्तम आचरण, संसार तापा – संसारातील दुःख)

विवेचन : साधकाने कसे वागावे हे समर्थ मागील श्लोकाप्रमाणे याही श्लोकात सांगत आहेत. आयुष्यात आणि परमार्थ मार्गावर वाटचाल करताना देखील विवेक अतिशय महत्वाचा. विवेकबुद्धी म्हणजे सारासार विचार करण्याची बुद्धी. काय चांगले आहे, काय वाईट आहे हे समजून त्याप्रमाणे वागणे म्हणजे विवेक. दुर्योधन एकदा श्रीकृष्णाला म्हणाला होता की मला चांगले काय आहे हे समजते. मी वागतो ते वाईट आहे हेही मला समजते. पण मला चांगले वागण्याची बुद्धीच होत नाही. इथे दुर्योधनाच्या वागण्यात विवेक बुद्धीचा अभाव आढळतो. चांगले आणि वाईट म्हणजे श्रेयस आणि प्रेयस. श्रेयस म्हणजे आपल्या अंतिम हिताची जी गोष्ट आहे त्याची निवड करणे. प्रेयस गोष्ट सुरुवातीला आकर्षक वाटत असली तरी अंतिमतः आपली हानी करणारी असते. नियमित व्यायाम करणे अंतिमतः माझ्या हिताचे आहे. पण आळसामुळे मला झोप प्रिय वाटते. इथे मी श्रेयसची निवड न करता प्रेयस निवडतो. ते अंतिमतः हानिकारक आहे.

वाईट सवयींचे वळण लागण्यासाठी प्रयत्न करावे लागत नाहीत. पण चांगल्या गोष्टींची सवय जाणीवपूर्वक लावावी लागते. म्हणूनच समर्थ म्हणतात की ‘ शुध क्रिया धरावी ‘ म्हणजे जाणीवपूर्वक चांगल्या गोष्टींचे आचरण करावे. चांगल्या गोष्टींच्या आचरणासाठी समर्थ जाणीवपूर्वक ‘शुद्ध’ हा सुंदर शब्द वापरतात. खरोखरच जे चांगले आहे ते शुद्ध आणि ज्यामध्ये काही दोष आहे किंवा वाईट आहे ते अशुद्ध! विवेकाच्या साहाय्याने आपल्या वागण्याबोलण्यात योग्य तो बदल घडवावा. तो सुद्धा कसा? तर समर्थ म्हणतात, ‘ अति आदरे. ‘ त्या गोष्टींबद्दल म्हणजेच चांगल्या गोष्टींबद्दल मनात आदर बाळगून आदरपूर्वक त्यांचे आचरण करावे. आपल्या वागण्याने सज्जनांना आनंद होईल अशा प्रकारे वागावे. ‘ सदाचार हा थोर सांडू नये तो ‘ असे समर्थांनी आपल्याला मागील श्लोकात सांगितले आहेच. पण चांगल्या गोष्टी या पुन्हा पुन्हा सांगाव्या लागतात.

बऱ्याच वेळा आपले बोलणे आणि वागणे यात अंतर पडते. आपण बोलतो काही आणि करतो काही. म्हणजेच आपल्या ‘ कथनी और करनी ‘ यात फरक असतो. एखादी व्यक्ती वारंवार अशा पद्धतीने वागू लागली की समाज अशा लोकांवर विश्वास ठेवत नाही. त्यांच्या शब्दाला काडीचीही किंमत लोक देत नाहीत. म्हणूनच समर्थ म्हणतात की आपण जसे बोलतो तसे वागावे. आपले आचार, विचार आणि उच्चार यात एकवाक्यता असावी.

हा संसार दुःखमय आहे हे मान्य. त्यात पूर्णपणे सुखी आहे अशी कोणीच व्यक्ती नाही. पण म्हणून आपल्या भविष्याविषयी उगीच चिंता करीत बसू नये. कोणी भविष्यात आपले कसे होईल याच्या कल्पना करीत बसतात तर कोणी नको त्या कल्पनेच्या मनोराज्यात रमतात. कल्पनेनेच आपण स्वतःला दुःखी करून घेतो किंवा काल्पनिक गोष्टींमध्ये सुख मानत बसतो. संसार दुःखमय आहेच त्यात आणखी भर अशा कल्पना करून कशाला टाकायची? कल्पनाच करायची झाली तर ती चांगल्या गोष्टींची करावी. ज्या गोष्टींची कास आपल्याला धरायची आहे त्याबद्दल कल्पना करायला हरकत नाही. कारण त्यातूनच त्या चांगल्या गोष्टींचा पाठपुरावा आपण करू शकू.

स्वसंवाद 

१. दुर्योधनाप्रमाणे मलाही एखादी गोष्ट ‘चुकीची आहे’ हे माहीत असूनही, मी केवळ तात्कालिक सुखासाठी (प्रेयससाठी) विवेकाचा बळी देऊन त्याच मार्गावर चालत राहतो का?

२. चांगल्या सवयी आणि आचरण अंगी बाणवण्यासाठी मी समर्थांनी सांगितल्याप्रमाणे जाणीवपूर्वक आणि ‘अति आदराने’ (मनापासून) प्रयत्न करतो, की आळसाला शरण जातो?

३. चार लोकांमध्ये आदर्श विचार मांडताना, प्रत्यक्षात माझ्या कुटुंबात आणि व्यवहारात माझे बोलणे आणि वागणे यात थोडी तरी एकवाक्यता (प्रामाणिकपणा) असते का?

४. संसारातील चालू घडामोडींना सामोरे जाण्याऐवजी, मी भविष्यातील काल्पनिक संकटांचे ‘मनोराज्य’ उभे करून स्वतःचा ‘संसार ताप’ (चिंता) तर विनाकारण वाढवत नाही ना?

—–

श्लोक क्र. १०६ — — 

बरी स्नानसंध्या करी येकनिष्ठा ।

विवेके मना आवरी स्थानभ्रष्टा ।

दया सर्व भूतीं जया मानवाला ।

सदा प्रेमळु भक्तिभावे निवाला ।।१०६।।

अर्थ : आपले जे स्नानसंध्या आदी नित्यनैमित्तिक कर्म असेल ते निष्ठापूर्वक करावे. भरकटणाऱ्या म्हणजेच स्थानभ्रष्ट झालेल्या मनाला विवेकाच्या साहाय्याने आवर घालावा. सर्व प्राणिमात्रांबद्दल मनात दयाभाव किंवा करुणा असावी. अशी प्रेमळ व्यक्ती भगवंताबद्दल मनात असलेल्या भक्तिभावाने समाधान पावते.

(येकनिष्ठा – संपूर्ण श्रद्धेने, स्थानभ्रष्ट – भरकटणारे, निवाला – तृप्त झाला/समाधान पावला)

विवेचन : साधकाच्या अंगी कोणते गुण असावेत किंवा हे गुण त्याने कसे विकसित करावेत हे समर्थ या श्लोकात आपल्याला सांगताहेत. आपल्याला आपल्या धर्मात किंवा घरात परंपरेने चालत आलेले जे स्नानसंध्यादि कर्म आहे, ते निष्ठापूर्वक म्हणजेच संपूर्ण श्रद्धेने करायला हवे. त्याचप्रमाणे सद्गुरूंनी नामस्मरण आदी गोष्टींचा जो उपदेश आपल्याला दिलेला असेल, त्याचेही नियमितपणे पालन करणे आवश्यक आहे. स्नानाने आपल्या शरीराला स्नान घडते तर संध्या आपल्या मनाला स्नान घालते. अलीकडे या गोष्टींची कर्मकांड म्हणून जी हेटाळणी केली जाते, ती परमार्थ मार्गात बाधक ठरते. या गोष्टी नियमितपणे करण्याचे वळणच मनाला आणि शरीराला लावून घ्यायला हवे. घरात जर थोडे कर्मठ वातावरण असेल तर त्याचा फायदा असे वळण लागण्यासाठी फार उपयोगी पडतो. घरातूनच असे संस्कार मुलांवर होतात.

आज मोबाईल, टीव्ही यांच्यासारखी अनेक मनोरंजनाची साधने सर्वांना उपलब्ध झाली आहेत. समाजमाध्यमे आहेत. यातून बऱ्याचदा चांगले कमी आणि वाईट गोष्टीच जास्त डोळ्यासमोर येतात. ते सगळे पाहून आणि समाजातील लोकांचे नको ते आचरण पाहून आपले मन भरकटण्याचा म्हणजेच समर्थांच्या शब्दात स्थानभ्रष्ट होण्याचा मोठा धोका असतो. आजकाल समाजात वाटेल ते खाणे, वाटेल त्या वेळी खाणे, मन मानेल तसे वागणे याबद्दल लोक विधिनिषेध बाळगताना दिसत नाहीत. तात्पर्य, स्थानभ्रष्टता मोठ्या प्रमाणावर बोकाळली आहे. तिला आवर घालायचा असेल तर विवेक हवा. विवेक म्हणजे योग्यायोग्यतेची जाणीव होऊन योग्य गोष्टी करणे, अयोग्य गोष्टी कितीही आकर्षक वाटल्या तरी त्या करायचे टाळणे. यासाठी मनावर नियंत्रण ठेवण्याची सवय करावी लागते. एखादी गोष्ट वारंवार केली तर तिची सवय लागते. वाईट गोष्टींची सवय लागायला वेळ लागत नाही. चांगल्या गोष्टींची सवय मात्र जाणीवपूर्वक लावावी लागते.

ज्याला साधनामार्गावर वाटचाल करायची आहे अशा व्यक्तीच्या मनात केवळ मनुष्यच नव्हे तर सर्व प्राणिमात्रांबद्दल दया किंवा करुणाभाव हवा. आपल्याप्रमाणेच त्यांच्यातही परमेश्वराचा अंश आहे, याची जाणीव हवी. संत एकनाथांनी तृषार्त गाढवाला दुरून आणलेल्या गंगेच्या कावडीतील पाणी पाजले होते. सर्व प्राणिमात्रांबद्दलचा हा समत्वभाव संतांमध्ये आपल्याला विशेष करून दिसते. तुकाराम महाराज म्हणतात, ‘ दया तिचे नाव, सर्व भुतांचे पाळण आणिक निर्दालन कंटकांचे. ‘ हाच ‘ धर्म नीतीचा व्यवहार ‘आहे. सर्वांबद्दल प्रेम असणाऱ्या माणसाच्या मनातच ईश्वराबद्दल भक्तिभाव उत्पन्न होतो. आपल्या आणखी एका अभंगात तुकाराम महाराज म्हणतात, ” मृदू सबाह्य नवनीत, तैसे सज्जनांचे चित्त. ‘ ज्या चित्तात अशी मृदुता, प्रेमळपणा असेल आणि ईश्वराबद्दल भक्तिभाव असेल, असे चित्त समाधानी असते. तेच समर्थ आपल्याला या श्लोकात सांगतात.

स्वसंवाद 

१. रोजच्या धावपळीत शरीराच्या स्वच्छतेसोबतच, माझे मन शुद्ध आणि शांत ठेवण्यासाठी मी संतांनी सांगितलेल्या ‘संध्या’ किंवा नामस्मरणाचा आश्रय नित्यनेमाने घेतो का?

२. मोबाईल, इंटरनेट आणि समाजमाध्यमांच्या प्रभावामुळे माझे मन संसाराच्या नको त्या आकर्षणात ‘स्थानभ्रष्ट’ (भरकटत) होत असताना, मी त्याला विवेकाने आवर घालण्याचा प्रयत्न करतो का?

३. तुकाराम महाराजांनी म्हटल्याप्रमाणे माझे चित्त लोण्यासारखे ‘मृदू सबाह्य नवनीत’ आहे का? माझ्या मनात घरातील माणसांबद्दल, प्राणिमात्रांबद्दल आणि हाताखालील लोकांबद्दल खरी दया आणि करुणा आहे का?

४. बाह्य जगात आनंद आणि समाधान शोधण्याऐवजी, मी कधी आंतरिक ‘भक्तिभावाने’ मनाची तृप्ती किंवा समाधान अनुभवण्याचा प्रयत्न केला आहे का?

– क्रमशः श्लोक १०५ आणि १०६

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # २१८ ☆ मुक्तक – ।। हो गये साठ के पार अभी असली इम्तिहान बाकी है।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

☆ “श्री हंस” साहित्य # २१८ ☆

☆ मुक्तक ।। हो गये साठ के पार अभी असली इम्तिहान बाकी है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

=1=

सफर जारी पर अभी तो आने को मुकाम बाकी है।

किया जा चुका बहुत कुछ पर अभी काम बाकी है।।

साठ   के   पार    हो   चुके    तो  कोई  बात   नहीं।

अभी तो नापी है ज़मीं अभी  आसमान   बाकी है।।

=2=

अभी अदा करने को शुक्रिया वह हर इन्सान बाकी है।

पूरे  जो  कर  नहीं  पाए  वह  हर  अरमान  बाकी  है।।

अभी  तो  शुरू  ही   हुई  है  जीवन  की  दूसरी  पारी।

जान लो कि  जिन्दगी का असली इम्तिहान बाकी है।।

=3=

अभी  भी  दुनियादारी  का  कुछ   लगान   बाकी  है।

कर नहीं पाए इस्तेमाल वह साजो सामान बाकी है।।

रुकना  नहीं   थमना  नहीं  तुम्हें  इस बीच   दौड़  में।

अभी  भी   जीतने   को   हर  तीर  कमान   बाकी  है।।

=4=

सेवा निवृत हो गए पर अभी अनुभव का सम्मान बाकी है।

कुछ नया करने सीखने को जज्बा और तूफ़ान बाकी है।।

अब  तो  वरिष्ठ  नागरिक  का  दायित्व  भी  है  कंधों पर।

अभी  देखने  घूमने  को  भी  पूरा    जहान   बाकी   है।।

=5=

चुप  रह  गई  जो  अब  तक  अभी   वह  जुबान बाकी है।

ऊपरवाले ने भी दिए काम  अभी  वह फरमान बाकी है।।

पूरा  करना  है  हर  काम   इसी   एक  ही  जिन्दगी   में।

भागते रहे जिंदगी भर अब जरा सा चैन आराम बाकी है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – वाचताना वेचलेले ☆ तसंच जाऊ नको..!  लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती : श्री मिलिंद जांबोटकर ☆

श्री मिलिंद जांबोटकर

📖 वाचताना वेचलेले 📖

☆ तसंच जाऊ नको..!  लेखक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती : श्री मिलिंद जांबोटकर ☆

आपले संस्कार, आपली संस्कृती.

घरी आलेल्या कुणालाही ‘तसंच’ पाठवायचं नाही आणि आपण कुणाकडे जाताना ही ‘तसंच’ जायचं नाही हा आमच्या घरचा शिरस्ता!

या ‘तसंच’मध्ये जगभरचा पाहुणचार सामावलेला होता.

माझे कुणी मित्रमैत्रीण ठरवून आले की बटाटेवडे कर, अचानक आले तर त्यांच्या आवडीचा गोडाचा शिरा नाहीतर सांजा कर.. अगदीच वेळ नसेल तरी धडपडत उठून किमान “सफरचंदाची एक फोड तरी खा” म्हणत ती हातावर दे.

आई-बाबांचे ऑफिसमधले कुणी पाहुणे आले तर किमान चहा तरी कर.

नातेवाईकांपैकी कुणी येणार असेल तर खास आवडी-निवडी जप हे सारं कसे अध्याहृतच होतं.

हे सगळं करताना आई-आजीच्या चेहऱ्यावर कधी आठी यायची नाही, कधीही श्रम दिसायचे नाहीत, आणि त्यांचं स्मितहास्य पण लोपायचं नाही… इतकं ते सारं अगदी सहज होतं! सहज होतं म्हणूनही ते सुंदरपण होतं!

पाहुण्यांसाठी असलेल्या ह्या नियमाला एक पोटनियमही होता. आपल्याच घरातून निघतानाही ‘तसंच’ निघायचं नाही. घरातल्या सर्व माणसांसाठीही एक उपनियम होताच!

सकाळचा चहा पिऊन झालेला असला तरी, “‘तशीच’ जाऊ नको ग कॉलेजला! ” असं म्हणत आजी तूपसाखर लावलेली एक पोळी घेऊन माझ्या मागे उभी असायचीच.

मनसुखानी नावाचा प्रोफेसर त्यावेळी आम्हां मुलींमध्ये भारीच फेमस होता. आमच्या गप्पांतून आजीला हे कळलं असावं. आणि मग..

“आजी, उशीर होतोय ग.. नकोय मला.. मी जाते तशीच, ” असं म्हणण्याचा अवकाश…

ती त्या मनसुखानीच्या नावाने बोटं मोडायची.

“त्या मनसुखानीला म्हणावं एवढी पोळी खाल्ल्याशिवाय माझी आजी काही मला ‘तशीच’ सोडत नसते. बाकी तू तुझं बघ, ” असा तिचा राग उफाळून यायचा पण घरातून निघताना ‘तसंच’ जायचं नाही हा तिचा नियम आम्हाला पाळायलाच लागायचा.

आपण कुणाकडे जातानाही ‘तसंच’ जायचं नाही हा या सगळ्याचा व्यत्यास.. तोही तितकाच खरा होता. आत्याकडे जाताना खास ठेवणीतल्या लोणच्याची बाटली भरली जायची. मावशीला आवडतात म्हणून घारगे व्हायचे.. एक ना दोन! यातलं काहीच नाही जमलं आणि अचानक कुणाकडे जावं लागलं तर जाता जाता द्राक्षं घे.. चिकू घे, असलं काही न काही त्या करायच्या.

हे सगळे सोपस्कार आई-आजी पाळायच्या इथपर्यंत ठीक! पण मी माझ्या शाळा-कॉलेजच्या वयात काही कामासाठी कोणाकडे एकटीच जातेय तरी या ‘तशीच’ जाऊ नको गं, म्हणायच्या आणि मग मात्र माझी चिडचिड व्हायची. मी कधी ऐकायचे, पण अनेकदा त्या-त्या वयातल्या न ऐकण्याच्या नादात ‘तशीच’ निघून जायचे. लहान आहे.. मोठी होईल तेव्हा कळेल, असं म्हणून सोडूनही द्यायच्या!

एकदाच आजीने या चिडचिडीवरचा उतारा केला.

मला म्हणाली, “कपभर चहाही न देता कुणाला ‘तसंच’ पाठवशील किंवा रिकाम्या हाताने कोणाकडे जाशील.. तर आपल्या घरातलं काही जाणार नाही.. पण पत मात्र जाईल. ज्याला ऐपत आहे, त्याने आपली पत सांभाळावी. ”

आजही माझ्या आणि माझ्यासारख्या अनेक घरातून ‘तसंच’ कुणी जात नाही. आणि आपणही ‘तसंच’ कुणाकडे जात नाही.

काय करणार..?

आजीचे नाते सांगणारी मौल्यवान विद्यापीठं शब्द पेरून आपल्या आसपासच वावरत असतात ना.

☆

लेखक : अज्ञात

प्रस्तुती: श्री मिलिंद जांबोटकर

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆ लघुकथा – संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक लघुकथा – “संस्कार प्रबल हैं…“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७८ ☆

✍ लघुकथा ☆ संस्कार प्रबल हैं… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

राम नरेश जी एक लेखक हैं। उम्र के लिहाज से यात्रा ज्यादा तो नहीं करते पर करनी तो पड़ती है । वे अपने बेटे के पास  पुणे आए। उनका बेटा आईटी सेक्टर में काम करता है।  पुणे बड़ा महानगर है। उसका क्षेत्रफल संभवतः अस्सी किलोमीटर है। देखने के लिए कई स्थान हैं और आसपास भी कई तीर्थ स्थल और पर्वतीय स्थल हैं।

राम नरेश जी के एक प्रकाशक मित्र भी पुणे आए हुए थे। उन्हें पता चल गया था कि राम नरेश जी भी पुणे पहुंच रहे हैं तो उनके काव्य संग्रह की पचास प्रतियाँ लेते आए थे और राम नरेश जी को सूचना भी दे दी।  दोनों शहर के उत्तरी दक्षिणी ध्रुव पर ठहरे थे और आसानी से एक दूसरे के पास आ जा नहीं सकते थे।  किसी बीच के स्थान पर मिलने पर मंथन हुआ। प्रकाशक महोदय की एसएनडीटी विश्व विद्यालय में मीटिंग थी और राम नरेश जी भी वहां आ सकते थे। इसलिए तय हुआ कि एसएनडीटी कॉलेज के गेट पर मिल लेंगे। वहाँ तक आने जाने के लिए बस मैट्रो की सुविधा भी है। टैक्सी ऑटो रिक्शा तो मिल ही जाते हैं।

दोनों के बीच तय हुआ कि बारह बजे के आसपास मिलेंगे। राम नरेश जी जब चलने को हुए तो उनकी पत्नी ने कहा कि मैं भी साथ चलती हूँ, यहां अकेले क्या करूंगी। बहू बेटे अपने अपने काम पर गए और बच्चे स्कूल में तो वे घर में अकेली ही हैं। वे टैक्सी से कॉलेज के गेट पर पहुंच गए और दस मिनट के अंदर प्रकाशक महोदय भी पहुंच गए और उन्होंने पुस्तकें दे दीं।    

महानगरों में ऐसे काम के लिए एक दूसरे के आवास पर जाना मुश्किल होता है क्योंकि समय, दूरी व  सुविधा सब देखनी पड़ती है। प्रकाशक महोदय ने कहा कि यहाँ मैट्रो रेल का स्टेशन है और यहाँ से बहुत जल्दी स्वारगेट पहुंच जाएंगे और मैट्रो का आनंद भी उठा लेंगे। वहाँ से तो वाघोली के लिए काफी सुविधाएँ हैं। राम नरेश जी फिजूलखर्ची पसंद नहीं करते थे। कम पैसे खर्च होने के कारण उन्होंने मैट्रो से जाने का निर्णय ले लिया।

राम नरेश जी अपनी पत्नी के साथ मैट्रो रेल के स्टेशन पर लिफ्ट से चले गए । थैली में पचास पुस्तकें थीं। उनका वजन देख कर राम नरेश जी को अपनी आयु का आभास हुआ। थैली उठा कर चलने में दिक्कत तो हो रही थी। खैर टिकट लेकर प्लैटफॉर्म पर आए। गाड़ी आने में पांच मिनट थे। वे दोनों प्लैटफॉर्म पर पहुंचे तो एक बैंच पर दो लड़कियाँ बैठी थीं। एक लड़की उठ खड़ी हुई और राम नरेश जी की धर्पमत्नी से बोली, “बैठिए आंटी जी”। थोड़ा ना नुकुर के बाद वे बैठ गईं। फिर उस लड़की ने राम नरेश जी से भी बैठने के लिए कहा। उन्होंने कहा कि उन्हें बैठने में कष्ट होता है इसलिए खड़े रहना ही अच्छा है और उस लड़की को धन्यवाद दिया। जब मैट्रो आ गई तो उस लड़की ने राम नरेश जी के हाथ से पुस्तकों का थैला ले लिया और उन्हें मैट्रो में चढ़ने दिया। ट्रेन में प्रवेश के बाद भी वह लड़की पुस्तकों के थैले को अपने पास ही रखे रही। राम नरेश जी ने मांगा तो बोली कि गाड़ी में झटके लगते हैं और संतुलन बनाए रखना मुश्किल होता है, आप गिर सकते हैं और मुझे तो मैट्रो रेल में चलने का अभ्यास है। फिर उसने पूछा कि पुस्तकें कैसी हैं तो राम नरेश जी ने बताया कि उन्हींकी लिखी हुई पुस्तकें हैं पर वे बंधी हुई है इसलिए तुम्हें दे नहीं सकता। वे लेखक हैं यह जानकर वह बहुत खुश हुई। फिर उसने अपना नाम बताया वंशिका,, और बताया कि वह पुणे में ही रहती है। उसके पिता होटल चलाते हैं। एसएनडीटी में बारहवीं में पढती है, रोज स्वारगेट से मैट्रो से ही आती है। राम नरेश जी जीवन में पहली बार मिली उस अपरिचित बच्ची की बात बड़े ध्यान से सुन रहे थे। बात करते करते गंतव्य आ गया और उसने पुस्तकों का थैला राम नरेश जी को दे दिया और खुद उतर गई। उसकी मीठी वाणी, अनुशासन और शि‍ष्टाचार देखकर राम नरेश जी को अपनी पोती की याद आ गई। वह भी उन्हें वजन नहीं उठाने देती। राम नरेश मन ही मन बुदबुदाए, समाज में अभी संस्कार प्रबल हैं।

☆

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२८ ☆ व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२८ ☆

?  व्यंग्य – ऊँट के मुँह में जीरा ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

ऊँट के मुँह में जीरा डालने से न ऊँट का पेट भरता है, न जीरे की ही प्रतिष्ठा बढ़ती है। पर हमारे देश में यह व्यवस्था का स्थायी चरित्र बन चुका है। जहाँ देखिए, वहीं जीरे बाँटे जा रहे हैं और ऊँट मुस्कुराते हुए भूखे रहने का अभ्यास कर रहे हैं।

सरकार हर 6 माह में मंहगाई राहत  की घोषणा करती है, । कर्मचारी पूछता है, कितना? जवाब आता है, इतना कि समाचार की हेडलाइन बन जाए, मगर जेब की सिलवट भी न बदले। यानी ऊँट के मुँह में जीरा।

 लेखक को वर्षों की तपस्या , प्रकाशक की मिन्नत , जोड़ तोड़ के बाद पुरस्कार घोषित होता है। पुरस्कार राशि देखकर लेखक भावुक हो गया। इसलिए नहीं कि रकम अधिक थी, बल्कि इसलिए कि यात्रा भत्ता उससे महँगा था । सम्मान का शॉल इतना बड़ा कि उसमें पूरा लेखक लिपट जाए, लेकिन लिफाफा इतना हल्का कि हवा भी उसे उड़ा ले जाए। साहित्य ने फिर कहा, “सम्मान अमूल्य होता है।” लेखक मन ही मन बोला, “हाँ, इसलिए उसका मूल्य कोई नहीं देता।”

आजकल संस्थाएँ भी जीरा वितरण अभियान चला रही हैं। पाँच सौ रुपये का मानदेय देकर लिखती हैं, “आपका अमूल्य सहयोग मिला।” अमूल्य सहयोग का मूल्य पाँच सौ! लगता है शब्दकोश भी अब महँगाई से डर गया है।

ज्यादा साहित्य प्रेमी आयोजक अपनी इज्जत बचाने के लिए स्वयं ही मानदेय को पत्रम पुष्पम लिख देते हैं, या सुदामा के चावल कहकर उसे थोड़ा ललित टच दे कर अपनी झेंप पता नहीं किससे मिटा लेते हैं।

डिजिटल दुनिया ने तो जीरे को और आधुनिक बना दिया है। घंटों का वेबिनार, दर्जनों स्लाइड, अंत में धन्यवाद और एक ई-प्रमाणपत्र।

प्रमाणपत्र डाउनलोड करते-करते बिजली का बिल ज़्यादा आ जाए तो आयोजक की आत्मा प्रसन्न हो जाती है कि ज्ञान का प्रसार सफल रहा।

शिक्षा में भी यही हाल है। बच्चों से कहा जाता है, बड़े सपने देखो। फिर स्कूल की लाइब्रेरी में तीन किताबें और उन पर चार ताले। खेलो, आगे बढ़ो, मगर मैदान पार्किंग बन चुका है। सपनों का ऊँट दौड़ना चाहता है, व्यवस्था उसे जीरा चबाने का प्रशिक्षण दे रही है।

महँगाई सबसे बड़ी जीरा विशेषज्ञ है। वेतन बढ़ा दो प्रतिशत, खर्च बढ़ा बीस प्रतिशत। फिर अर्थशास्त्री बताते हैं कि आपकी आय में वृद्धि हुई है। सचमुच हुई है, कैलकुलेटर पर, जेब में तो वही पुराना ऊँट बैठा जुगाली कर रहा है।

सोशल मीडिया ने इस मुहावरे को लोकतांत्रिक बना दिया है। किसी ने एक पौधा लगाया, सौ सेल्फियाँ खिंच गईं। किसी ने दो किताबें दान कीं, पचास पोस्ट लिख दीं। काम जीरा, प्रचार ऊँट। एक दर्जन केले मरीजो में बांटकर पुण्यात्मा बन कर ऊंट की तरह अस्पताल से निकलते नेता जी की फोटो अखबार में देखी ही होंगी ।

हम सब भी कहीं न कहीं इस खेल के हिस्सेदार हैं। रिश्तों में समय नहीं, लेकिन इमोजी भरपूर। पड़ोसी की खबर नहीं, मगर “टेक केयर” का संदेश तुरंत पहुँच जाता है। संवेदनाएँ भी अब इंस्टेंट जीरे की पुड़िया बन गई हैं। व्हाट्सएप पर ज्ञान त्वरित फॉरवर्ड कर देते हैं, किंतु अमल में नहीं लाते ।

दरअसल समस्या जीरे की नहीं, ऊँट की भूख को समझने की है। भूख बड़ी हो और समाधान प्रतीकात्मक, तो व्यंग्य अपने आप जन्म लेता है। समाज को रोटी चाहिए, हम उसे रिबन काटकर आशाई भरोसा परोस देते हैं। लेखक को सम्मान के साथ श्रम का मूल्य चाहिए, हम उसे स्मृति-चिह्न थमा देते हैं। नागरिक को सुविधा चाहिए, हम उसे घोषणा दे देते हैं।

अंत में लगता है कि इस मुहावरे का संशोधित संस्करण लिख देना चाहिए, “ऊँट अब जीरा नहीं माँगता, उसे इतना अनुभव हो गया है कि वह पहले लिफाफे का वजन तौलता है।”

और हमारे समय का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जीरा बाँटने वाले स्वयं को अन्नदाता समझते हैं।

 ☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

 

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