हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ ? ?

आती-जाती

रहती हैं पीढ़ियाँ,

जादुई होती हैं

उम्र की सीढ़ियाँ,

जैसे ही अगली

नज़र आती है,

पिछली तपाक से

विलुप्त हो जाती है,

आरोह की सतत

दृश्य संभावना में,

अवरोह की अदृश्य

आशंका खो जाती है,

जब फूलने लगे साँस,

नीचे अथाह अँधेरा हो,

पैर ऊपर उठाने को

बचा न साहस मेरा हो,

चलने-फिरने से भी

देह दूर भागती रहे,

पर भूख-प्यास तब भी

बिना नागा लगाती डेरा हो,

हे आयु के दाता! उससे

पहले प्रयाण करा देना,

अगले जन्मों के हिसाब में

बची हुई सीढ़ियाँ चढ़ा देना!

मैं जिया अपनी तरह,

मरूँ भी अपनी तरह,

आश्रित कराने से पहले

मुझे विलुप्त करा देना!

 ?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 8:01 बजे, 21.4.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १४ – हास्य-व्यंग्य – “उई… छिपकली…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  उई… छिपकली…

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “उई… छिपकली…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

उस दिन मैं अपने कार्यालय के स्टाफ रूम में सहकर्मियों के बीच बैठा कहकहों के साथ चाय पी रहा था कि अचानक ऊपर से एक छिपकली मेरे सिर पर आ गिरी। छिपकली का मेरे सिर पर गिरना इतना अप्रत्याशित था कि मैं सिर को झटका देता हुआ उठ खड़ा हुआ। छिपकली जिस ओर भागी उस ओर बैठे लोग कुर्सियों से उचक कर किनारे खड़े हो गए। शरीर से हट्टी – कट्टी किंतु हृदय से कमजोर कुछ महिलाओं की चीख निकल गई – उई…. छिपकली….।

लोग अपनी घबराहट छिपाने हंसते हुए छिपकली को देख रहे थे जो पुनः दीवार पर चढ़ कर एक कीड़े को पकड़ने के लिए शिकारी की मुद्रा बना चुकी थी। छिपकली के लिए आदमी के ऊपर गिर जाना भले ही कोई उल्लेखनीय घटना न हो किंतु आदमी के लिए छिपकली का उसके ऊपर गिरना विशेष बात है।

छिपकली कितने बजे गिरी, उस समय का चौघड़िया क्या था, छिपकली शरीर के किस अंग में गिरी, किस दिशा से गिरी, गिर कर किस दिशा में भागी, उसका रंग – रूप क्या था, आदि – आदि बहुत सी ऐसी बातें हैं जो छिपकली के गिरते ही आदमी के मन में उठती हैं क्योंकि इन तमाम बातों के गणित से ही छिपकली के गिरने पर प्राप्त होने वाला शुभ – अशुभ फल निकाला जाता है।

बुजुर्गों का कहना है कि छिपकली के ऊपर गिरते ही स्नान करके भोले शंकर की स्तुति करना हितकर होता है। भोले के स्मरण से जहरीली छिपकली के गिरने से उत्पन्न होने वाले अशुभ फलों की आशंका समाप्त हो जाती है। यों पहले भी मेरे ऊपर दो – चार बार छिपकली गिर चुकी है किंतु यह पहला अवसर था जब कोई छिपकली दस लोगों की उपस्थिति में मेरे ऊपर गिरी और तरह – तरह के प्रश्न खड़े कर गई। मैं सोचता हूं कि न जाने उस छिपकली की मुझसे क्या दुश्मनी थी अथवा इतने लोगों के बीच उसने मुझमें क्या पाया जो वह सबके सामने मेरे सिर पर आ गिरी, अरे उसे गिरना ही था तो पूर्व छिपकलियों की भांति अकेले में मुझ पर गिर कर अपनी इच्छा पूरी कर लेती। जब से मुझ पर छिपकली गिरी है मैं बहुत परेशान हूं। मुझे तरह – तरह के सुझाव मिलना प्रारम्भ हो गए।

सर्वप्रथम मुझे अपने स्टाफ की महिला सदस्यों से सलाह मिली कि जहां भी बैठना हो पहले ऊपर देख लेना चाहिये कहीं ऊपर छिपकली तो नहीं है। कुछ महिलाओं ने तो यह भी कहा कि हम जहां भी बैठें थोड़ी – थोड़ी देर में ऊपर देखते रहें तो छिपकली के ऊपर गिरने से बच सकते हैं। मैं उनकी सूझबूझ और दूरदर्शिता पर हैरान था कि जिनके ऊपर जीवन में कभी छिपकली नहीं गिरी वे भी छिपकली को लेकर कितनी सतर्क हैं और एक मैं हूं जिस पर अनेक बार छिपकली गिर चुकी है फिर भी उससे बचने का उपाय नहीं सोच पाया।

लंच का समय समाप्त होने के कुछ ही देर बाद पूरे ऑफिस में यह खबर फैल चुकी थी कि आज स्टाफ रूम में मेरे सिर पर छिपकली गिर गई। मेरा अपनी कुर्सी पर बैठ कर कार्य करना मुश्किल हो रहा था। दो – दो, तीन – तीन के दल में सहकर्मी मुझसे मुलाकात करने आ रहे थे और मेरे प्रति मंगलभाव व्यक्त करते हुए मुझसे विस्तार में छिपकली प्रसंग सुनना चाह रहे थे। कुछ लोग छिपकली के ऊपर गिरने संबंधी स्वतः के अनुभव मुझे सुना रहे थे। कुछ महिलाएं और उनके स्वभाव से मेल खाते पुरुष स्टाफ रूम में जा जाकर उस दुस्साहसी छिपकली को देख रहे थे जो कुछ देर पहले मुझ पर गिरी थी। पूरे ऑफिस में छिपकली कांड गूंज रहा था। बड़े बाबू अपने आसपास बैठने वाले कर्मचारियों को बता रहे थे कि हम भारतीय हर मामले में पीछे हैं। हमारे यहां की छिपकलियां भी कोई छिपकलियां हैं अरे, छिपकलियां तो अफ्रीका में होती हैं जो गिरना नहीं उड़ना जानती हैं।

कुछ देर बाद मेरे सामने कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष व कुछ अन्य पदाधिकारी खड़े थे। अध्यक्ष महोदय मुझसे कह रहे थे – प्यारे भाई, चिंता मत करो छिपकली क्या चीज है यदि पहाड़ भी तुम्हारे ऊपर गिर जाए तो भी हम तुम्हारा बाल बांका नहीं होने देंगे। छिपकली शायद हमारी एकता और ताकत से परिचित नहीं थी। उन्होंने आवाज लगाई – कर्मचारी एकता, साथियों ने जवाब दिया – जिंदाबाद, जिंदाबाद। उन्होंने फिर आवाज लगाई – जो हमसे टकराएगा, साथियों ने जवाब दिया – चूर चूर हो जाएगा। मैंने अपने सुख – दुख के साथियों को चाय पिलाकर विदा किया।

इतने में मेरे एक बुजुर्ग साथी जो घर पर होमियोपैथी द्वारा लोगों का इलाज करते थे और दवाओं की एक इमरजेंसी पेटी ऑफिस में भी रखते थे मेरे पास आ पहुंचे। उन्होंने मुझे दवा की एक पुड़िया देते हुए कहा – यह लो इसे अभी एक गिलास पानी के साथ पी लो और किसी भी तरह के इन्फेक्शन की ओर से निश्चिंत हो जाओ। मैं दवा लेने से बचना चाहता था किंतु वे दवा देने का हाथ आया मौका खोना नहीं चाहते थे। अंततः वे विजयी हुए। इसी समय चपरासी ने आकर मुझसे कहा कि आपको फौरन साहब ने बुलाया है।

मैं हाथ जोड़े साहब के सामने खड़ा था। “सुना है तुम्हारे ऊपर छिपकली गिर गई”, साहब ने प्रश्न किया। मैंने कहा जी हां। वे बोले – यह बात तुम्हें सबसे पहले मुझे बताना थी। मेरे ऑफिस में क्या हो रहा है इसकी जानकारी मुझे इतनी देर से दूसरों के द्वारा मिल रही है। आप जानते नहीं कि मुझसे जानकारी छुपाने पर मैं आपको सस्पेंड भी कर सकता हूं। मैने कहा – सर मामूली सी घटना थी इसलिए….। वे बोले – घटना मामूली है या गंभीर यह तुम तय करोगे तो फिर मैं यहां किसलिए हूं। मैंने कहा, क्षमा करें सर गलती हो गई। उन्होंने कहा ध्यान रखिए आइंदा ऐसी गलती न हो। मैं जी सर कहकर वापस जाने को मुड़ा। वे बोले,  ठहरो आधे दिन के अवकाश का आवेदन देकर घर जाओ, स्नान करो, भगवान को अगरबत्ती लगाओ। छिपकली गिरने के बाद किसी को स्पर्श तो नहीं किया। मैंने कहा, जी नहीं सर। वे बोले – गुड। मैं आधे दिन का अवकाश लेकर घर की ओर बढ़ चला। डोरवेल सुनकर अम्मा जी ने दरवाजा खोला। “बेटा आज जल्दी आ गए”। हां अम्मा सिर पर छिपकली गिर गई थी इसलिए, ऐसा कहते हुए मैंने घर के अंदर प्रवेश करने कदम बढ़ाए ही थे तभी अम्मा ने कड़क आवाज में कहा – बहू से पानी भेज रही हूं बाहर से नहाकर ही घर के अंदर घुसना। मैं नहाने के लिए घर के बाहर दरवाजे पर खड़ा छिपकली को कोसता हुआ पानी आने की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३६ ☆ # “फुलझड़ी…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता फुलझड़ी…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३६ ☆

☆ # “फुलझड़ी…” # ☆

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए  है

जल रहे हैं कुछ जो

बुझ नहीं पाए है

 

हवा के तेज झोंकों ने

बेरहमी से उजाड़ा है

तिनका तिनका करके

बसेरों को उखाड़ा  है

हालात के मारो पर

यह कैसे दिन आए हैं

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए है

 

अंधकार से लड़ने

वह हिम्मत तो जुटा पाए

महंगाई के मारे हैं

दिया बाती कहां से लाए

फिर भी चमत्कार की वह

आस लगाए हैं

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए हैं

 

दिवाली की यह रात

कैसी काली रात है

जगमगा रही है दुनिया

वह खाली हाथ है

देखकर रोशनी का पर्व

आंसू निकल आए हैं

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए हैं

 

गरीबों की भाई

कहां होती दिवाली है

बाजार सजे है पर

जेब उसकी खाली है

मुन्नी के लिए फुलझड़ी

खुद को बेचकर लाए हैं

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए हैं

 

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए हैं

जल रहे कुछ जो

बुझ नहीं पाए हैं /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५१ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… २ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५१ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… २ ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

का हू है जा देह को, चल दें जब प्रान ।

जिन्दै पै तौ पूछ लो, फिर देऔ अस्थान ||

कनक-भवन में हो रओ, मदन महोत्सव आज ।

बिन न्यौते के आ जुरै, भृंग कुरंग समाज ।।

सीस समारे तीन घट, पनघट पे नट जाय ।

एक घूँट में बावरी, तौरो का घट जाय ||

कुच-कुरंग सहमे डरे, घर लइ सेंत कुलाँच |

मदन-अहेरी ने भरी, रोम कूप में आँच ||

बिरछ कलपतरु बिलसरओ, पैरें अंगिया सैत ।

लगीं चिरैयां चहकने, देख देख पर हेत ।

केस कसाई हो गये, कस कस मारे ज्यान ।

बाँद बूँदे धर दये, आदे दूदे प्रान ॥

काजर आदर पा गओ, भओ भाल सिंगार ।

मन मुतियन सो डुल रओ, कब से रओ निहार ।।

कमल कुसुम की करतां, आर्के करै किलोल ।

भौरं भीर भ्रम में परै, ऐसे लोल कपोल ||

तनक मनक झाँकें झकें, ताकें मनों पिनाक ।

आँक बाँक कैं सब गये, नाक सके ना नाक ॥।

चिबुक चिबक कैं रै गओ, करन लगो अरदास ।

नैन नगरिया दूर है, मोय बसा लो पास ||

हाँतन की सोमा गजब, उँगरिन झरै अँजोर ।

सुपयारे कारे परें, नौ देवै झकझोर ॥

संपत जैसे सूम की पिछवाड़े दब जाय ।

वैसइ देख नितम्ब-धन, खियाल चित्त में आय ।।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विस्मय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विस्मय ? ?

रोज निद्रा तजना,

रोज नया हो जाना,

सारा देखा- भोगा

अतीत में समाना,

शरीर छूटने का भय

सचमुच विस्मय है,

मनुष्य का देहकाल,

अनगिनत मृत्यु और

अनेक जीवन का

अनादि समुच्चय है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३३ ☆ # “यह कैसा समभाव है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता यह कैसा समभाव है…”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३३ ☆

☆ # “यह कैसा समभाव है…” # ☆

जिंदगी तूने दिए

यह कैसे घाव है

धूप ही धूप है

नहीं कोई छांव है

 

जख्म है रिसते हुए

अरमान हैं पीसते हुए

छटपटाती काया है

लहूलुहान पांव है

 

पेड़ कट रहे हैं

जंगल घट रहे हैं

बंजर हो गई है धरा

खुश होते राव है

 

प्रकृति का तांडव है

असहाय सा मानव है

फट रहे हैं बादल

विलुप्त होते गांव है

 

सागर में उफान है

लहरों में तूफान है

मांझी दुविधा में है

भंवर में फसी नांव है

 

यह उजड़ती हुई बस्तियां

चुपचाप खड़ी हस्तियां

बिक रहा है हर कोई

लग रहे बड़े-बड़े दांव है

 

यहां घुट रही हर सांस है

यहां टूट रही है आस है

तू फिर भी है खामोश खड़ा

यार, यह कैसा समभाव है ?

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 221 – लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपाय– ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में रचना सहित 145 बालकहानियाँ 8 भाषाओं में 1160 अंकों में प्रकाशित। प्रकाशित पुस्तकेँ-1- रोचक विज्ञान कथाएँ, 2-संयम की जीत, 3- कुएं को बुखार, 4- कसक, 5- हाइकु संयुक्ता, 6- चाबी वाला भूत, 7- बच्चों! सुनो कहानी, इन्द्रधनुष (बालकहानी माला-7) सहित 4 मराठी पुस्तकें प्रकाशित। मध्यप्रदेश साहित्य अकादमी का श्री हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार-2018 51000 सहित अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित व पुरस्कृत। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत साहित्य आप प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपायकी समीक्षा।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य # 221

☆ लेख – एआई से हैक हो रहा है आपका पासवर्ड, ये हैं बचाव के उपाय ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ 

आजकल हर कोई ऑनलाइन काम करता है. बैंकिंग, शॉपिंग, ईमेल, सोशल मीडिया आदि सभी काम ऑनलाइन किए जाते हैं. ऐसे में हमारी ऑनलाइन सुरक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपका पासवर्ड भी एआई से हैक हो सकता है?

जी हां, हाल ही में हुए एक शोध में यह बात सामने आई है कि एआई का इस्तेमाल करके हैकर्स आपके कीबोर्ड की आवाज सुनकर आपका पासवर्ड पता लगा सकते हैं. इस तरीके को अकाउस्टिक साइड चैनल अटैक कहा जाता है.

इस अटैक में हैकर्स आपके पासवर्ड डालते समय आपके कीबोर्ड की आवाज को रिकॉर्ड करते हैं. इसके बाद वे इस आवाज को एआई से प्रोसेस करते हैं और आपके पासवर्ड का अनुमान लगाते हैं.

शोध में पाया गया है कि एआई 95% सटीकता के साथ आपके पासवर्ड का अनुमान लगा सकता है. यह बात बहुत ही चिंताजनक है क्योंकि आजकल लोग बहुत ही कमजोर पासवर्ड का इस्तेमाल करते हैं.

अगर आप अपने पासवर्ड को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो आपको कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए. सबसे पहले, आपको एक मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए. आपका पासवर्ड कम से कम 8 अक्षरों का होना चाहिए और इसमें अक्षर, संख्या और विशेष वर्ण शामिल होने चाहिए.

दूसरा, आपको अपने पासवर्ड को एक ही वेबसाइट पर दोबारा इस्तेमाल नहीं करना चाहिए. हर वेबसाइट के लिए आपको एक अलग पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए.

तीसरा, आपको अपने पासवर्ड को किसी भी तरह से लिखकर नहीं रखना चाहिए. आप अपने पासवर्ड को एक पासवर्ड मैनेजर में रख सकते हैं.

अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आप अपने पासवर्ड को एआई से सुरक्षित रख सकते हैं.

एआई से हैकिंग से बचने के लिए कुछ उपाय

एक मजबूत पासवर्ड का इस्तेमाल करें. आपका पासवर्ड कम से कम 8 अक्षरों का होना चाहिए और इसमें अक्षर, संख्या और विशेष वर्ण शामिल होने चाहिए.

अपने पासवर्ड को एक ही वेबसाइट पर दोबारा इस्तेमाल न करें. हर वेबसाइट के लिए आपको एक अलग पासवर्ड का इस्तेमाल करना चाहिए.

अपने पासवर्ड को किसी भी तरह से लिखकर न रखें. आप अपने पासवर्ड को एक पासवर्ड मैनेजर में रख सकते हैं.

अपने सिस्टम को हमेशा अपडेट रखें. सॉफ्टवेयर अपडेट में अक्सर सुरक्षा से जुड़े सुधार होते हैं जो आपके सिस्टम को हैकिंग से बचाने में मदद करते हैं.

अनजान लिंक पर क्लिक न करें. अनजान लिंक पर क्लिक करने से आपके सिस्टम में मैलवेयर आ सकता है जो आपके पासवर्ड को चुरा सकता है.

सार्वजनिक Wi-Fi का इस्तेमाल सावधानी से करें. सार्वजनिक Wi-Fi का इस्तेमाल करने से आपके पासवर्ड को चुराने का खतरा बढ़ जाता है. ऐसे में आपके पासवर्ड को एन्क्रिप्ट करना चाहिए या आपके पासवर्ड को किसी पासवर्ड मैनेजर में रखना चाहिए.

अगर आप इन बातों का ध्यान रखेंगे तो आप अपने पासवर्ड को एआई से सुरक्षित रख सकते हैं.

© श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

18-08-2023

संपर्क – 14/198, नई आबादी, गार्डन के सामने, सामुदायिक भवन के पीछे, रतनगढ़, जिला- नीमच (मध्य प्रदेश) पिनकोड-458226

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com मोबाइल – 9424079675 /8827985775

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिंदी साहित्य – व्यंग्य ☆ मच्छर  “दानी” ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

सुश्री इन्दिरा किसलय

☆ व्यंग्य ☆ मच्छर  “दानी” ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆

——डाटा-आटा-टाटा–आटा-घाटा-चांटा-काटा——-चिरकुट मच्छर ने कबीले के सरदार मच्छर से कहा-बाॅस लगता है आपको पुस्तक मेले से लाई हुई “तुकबंदी”की किताब पसंद आ गई है।कविता लिखने का मूड है शायद !

सरदार दहाड़ा—हमारे पास किन्तु परन्तु इफ बट अगर मगर का  कोई काम नहीं।

जोकुछ है एकदम साॅलिड है।

चिरकुट चिरौरी करने लगा-माई बाप! कई भूत(पूर्व) सरदार बेशक कविताई,पेंटिंग में माहिर थे।एक तो हवाई जहाज उड़ाता था।पर आप तो”फेंक”भी लेते हैं,उड़ना उड़ाना,जिमिंग,कुकिंग,ड्रमवादन नौकायन सभी कुछ कर लेते हैं।ऑल इन वन।गोडसे का मंदिर बनायेंगे कहते हैं लोग।आपका तो बनना ही चाहिए।

चिरकुट को सरदार ने सबासी दी।ऐसा है चिरकुट-हमने अच्छे अच्छे पोर्टफोलिओ लेडी मच्छर “एनोफिलीस”को दे रखे हैं।वे जनसेवा में पारंगत हैं।मीडिया में वक्त बेवक्त भूं भूं करती रहती हैं।जनता भुनभुन में उलझी रहती है और हम पृथ्वी के इस छोर से उस छोर तक बिंदास उड़ते रहते हैं।

श्रीलंका ने हमें तड़ीपार कर दिया।इंडिया 2030 तक हमें डोडो बना देगा।ये मुंह और मसूर की दाल।हम अंगद का पांव हैं।डटे रहेंगे।

सोचो चिरकुट!अगर हम न हों तो “स्वच्छता अभियान”का क्या होगा।झाड़ूवाले बाबा का क्या होगा।”फार्मा कंपनियां” चांदी कैसे कूटेंगी।ओडोमास मार्टिन कछुआछाप क्लोरोक्विन———!तुम्हें पता है

हमने “उड़नशील यूनिवर्सिटी से एम ए भी किया है।लिंग्विस्टिक्स पढ़ा है।वक्त के साथ शब्दों के मानी बदल जाते हैं।अब “मच्छरदानी”का अर्थ मसहरी नहीं रहा।मच्छर “दानी” (कर्ण के समान दानी)हो गया है।चीनी मसहरी के आॅर्डर मिले तो चिंग चिंग हमारे तलुए चाट रहा है।डंकमारकला की देशव्यापी कार्यशालाओं के कारण नेता हमारे एहसानमंद हैं ।

चिरकुट तुम कह सकते हो कि “येभी कोई दान है?”

बस नज़रिए का फर्क है–‘”हुस्न रंगीन है न सादा है।बस अपनी अपनी निगाह होती है।”

 इतना कहकर सरदार मच्छर फिर उड़ान भरने लगा।।

©  सुश्री इंदिरा किसलय 

नागपुर

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – पर्यायवाची ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – पर्यायवाची ? ?

कितना ही डराओ,

दबाओ, कुचलो,

मारो, पीटो, वध करो,

बार-बार संघर्ष करते हो,

हर बार उठ खड़े होते हो,

तुम पर क्या

मृत्यु का असर नहीं होता?

मैं हँस पड़ा,

मात्र शरीर नश्वर होता है,

पर शब्द ईश्वर होता है..,

सुनो,

अशेष का पर्यायवाची होता है,

सर्जक, जगत में

आठवाँ चिरंजीवी होता है!

?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 5 :05 बजे, 18 जुलाई 2024

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी (बुधवार 27 अगस्त) को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी (शनिवार 6 सितम्बर) तक चलेगी 🕉️

💥 साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः। इस मंत्र की कम से कम एक माला का संकल्प लेना होगा, साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ तुका म्हणे – काय ते विरक्ती… – अभंग रचना ☆ रसग्रहण – प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

? काव्यानंद ?

☆ तुका म्हणे – काय ते विरक्ती … – अभंग रचना ☆ रसग्रहण – प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

तुका म्हणे

काय ते विरक्ती न कळेची आम्हां /

जाणों एक नामा विठोबाच्या//१//

*

नाचेन मी सुखें वैष्णवांचें मेळीं /

दिंडी टाळघोळीं आनंदें या //२//

*

शांति क्षमा दया ते मी काय जाणें /

विठ्ठलकीर्तनें वांचूनियां //३//

*

कसया एकांत सेवूं तया वना /

आनंदें या जनामाजी असो//४//

*

कासया उदास होऊं देहावरीं /

अमृतसागरीं डुबोनियां //५//

*

तुका म्हणे मज असे हा भरवसा/

विठ्ठल सरसा चालतसे//६//

*

तुका म्हणे

तुकाराम महाराजांनी आत्मानुभवाने साधा सोपा भक्ती मार्ग स्वीकारला आहे. आणि तोच त्यांनी आपला जीवनक्रम ही मानला आहे. त्या मार्गाचे मोठेपण आणि सोपेपणा सांगताना ते म्हणतात.

विरक्ती म्हणजे नेमके काय हे आम्हाला माहीत नाही. आम्ही फक्त विठ्ठलाचे नाम जाणतो त्याचेच नाम संकीर्तन करतो. त्यांच्याच पायी लीन होतो.तेथेच आम्हाला जीवनाचे सारसर्वस्व भेटते. तेच आम्हाला सुखशांती मिळवून देते. म्हणूनच आम्ही टाळमृदंगाचा गजर करत वैष्णवाच्या मेळ्यात सहभागी होऊन आनंदाने नाचत भक्तीरसात न्हाऊन निघतो

.दया,क्षमा, शांती हे सारे काही आम्ही विठ्ठलाच्या तन्मयतेने केलेल्या कीर्तनातूनच जाणतो. विठ्ठला शिवाय आम्ही काहीच जाणवत नाही. मग आम्ही जप तप साधना करण्यासाठी काय म्हणून वनवासात एकांतात राहून तपश्चर्या करावी.आम्ही जनसमुदायात मिसळताना आनंदी होतो. तेच आम्हाला फलदायी वाटते. हितकारक वाटते. परमार्थ, अध्यात्म, विरक्ती हे शब्द आम्हाला फारच बोजड वाटतात. त्यांचा अर्थ ही आम्हाला निपटणे कळत नाही.ते सारेच कठीण आहे.अवघड आहे.म्हणून त्या जंजाळात पडावेसेही वाटत नाही. देवाचे भक्तीभावाने नामस्मरण करा. आनंदाने नाचा.तुम्हाला सर्व काही तेथेच मिळेल. त्यासाठी वनात राहून तपश्चर्या करण्याची जरुरी नाही. विविध प्रकारची कर्मकांडे, यज्ञयाग वृतवैकल्ये करण्यात ही काही अर्थ नाही.

.सर्वसामान्य माणसांच्या आनंदायी मेळ्यात राहूनच परमोच्च पारमार्थिक आनंद परम सुखाने लुटता येतो. भक्ती रसाने तुडूंब भरलेल्या अमृतसागरात डुंबत असताना परमेश्वरानेच दिलेल्या या देहाकडे मी उदास वाण्याच्या नजरेने मी का पाहावे आणि त्याला कशासाठी दंडीत करावे. लोकांच्यात सामील होऊन,त्यांच्यात मिळूनमिसळून विठ्ठलाचे नामस्मरण व नामसंकीर्तन करत रहाणे हाच परमार्थ करण्याचा अत्यंत सोपा पण अतिशय प्रभावी मार्ग आहे. तो मार्गच आपल्या मनोकामना पूर्ण करील. तोच आपल्याला सर्व काही शिकवील.म्हणूनच परमार्थ करताना विषेश आणि विशिष्ट कर्मकांडे करण्याची आवश्यकता नाही. भक्ती मार्ग इतका सहज आणि सोपा असताना तो अवघड आणि दुस्तर का करावयाचा.?

 *

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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