हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८९२ ⇒ सूत उवाच ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “सूत उवाच ।)

?अभी अभी # ८९२ ⇒ आलेख – सूत उवाच ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

यारों, शीर्षक हमारे पर मत जाओ ! कल एक भूले बिसरे मित्र का फोन आया, प्रदीप भाई कैसे हो !

ठंड में कोई खैरियत पूछे तो वैसे ही बदन में थोड़ी गर्मी आ जाती है। क्या आपने कभी पतंग उड़ाई है, उनका अगला प्रश्न था। उन्होंने मेरे जवाब का इंतजार नहीं किया और दूसरा प्रश्न दाग दिया, क्या कभी मांजा सूता है ? जो प्रश्न उन्हें सूत जी से पूछना था, वह उन्होंने मुझसे पूछ लिया। इसके पहले कि सूत उवाच, मैं अवाक् !और मैं पुरानी यादों में खो गया।

आज जिसे हमारे स्वच्छ शहर की कान्हा नदी कहा जाता है, तब यह खान नदी कहलाती थी, और हमें इसकी गंदगी से कोई शिकायत नहीं थी। रामबाग और कृष्णपुरा ब्रिज के बीच, एक पुलिया थी, जिसे हम बीच वाली पुलिया कहते थे। यह हमारे घर और मिडिल स्कूल को आपस में जोड़ती थी। खान नदी के आसपास तब बहुत सा, हरा भरा मैदान था, जो हमारे लिए खुला खेल प्रशाल था। यह पुलिया सूत पुत्रों के लिए मांजा सूतने के काम आती थी। कांच को बारीक पीसने से लगाकर पतंग उड़ाने, काटने और लूटने का काम यहां बड़े मनोयोग से किया जाता था।।

ऐसा नहीं कि हमने कभी पतंग नहीं उड़ाई। जब भी उड़ाई, पतंग ने आसमान नहीं देखा, हमने हमेशा मुंह की खाई। जिसके खुद के पेंच ढीले होते हैं, वे दूसरों की पतंग नहीं काटा करते। लूटमार से हम शुरू से ही दूर रहे हैं, किसी की कटी पतंग भला हम क्यों लूटें।

हमारे इसी शांत स्वभाव के कारण हमने देवानंद की फिल्म लूटमार और ज्वेल थीफ़ भी नहीं देखी।

जब मांजा सूतने में हमने कोई विशेष रुचि नहीं दिखाई तो मित्र ने अगला प्रश्न किया, अच्छा आपने सराफे की चाट तो खाई ही होगी और कभी दाल बाफले भी तो सूते ही होंगे और जब स्कूल में माड़ साब बेंत से सूतते थे, तब कैसा लगता था। पहले चाट और दाल बाफले और बाद में सुताई, यह क्या है भाई, हम फोन रखते हैं भाई। और हमने फोन रख दिया।।

हमारा यह मिडिल स्कूल वैसे भी सुभाष मार्ग और महात्मा गांधी मार्ग के बीच सैंडविच बना हुआ था। हमारे गांधीवादी हेडमास्टर ने हमसे चरखा भले ही नहीं चलवाया हो, तकली पर सूत जरूर कतवाया है।

हम यह भी जानते हैं कि सूत को सूत्र भी कहते हैं और पुरुष मंगलसूत्र नहीं,

यज्ञोपवीत धारण करते हैं, जो सूत के धागों से ही बनती है। सूत पुत्र दासी के पुत्र को भी कहते हैं और पवन के पुत्र को भी पवनसुत कहते हैं।।

आज तिल गुड़ का दिन है, जिन्हें मांजा सूतना है, मांजा सूतें, पतंग उड़ाएं, पेंच लड़ाएं, किसी की पतंग तो किसी के विधायक लूटें, हम तो बस मीठा खाएंगे मीठा बोलेंगे, मांजा नहीं, मज़ा लूटेंगे और भरपूर प्यार लुटाएंगे।

शुभ मकर सक्रांति !

सूत उवाच ..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ प्रतिकार — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंच, विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “प्रतिकार“.)

 ☆ कथा कहानी  ☆ प्रतिकार — ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

सुजाता कक्षा  नौ की छात्रा थी. गाँव के आसपास  केवल लड़कियों के लिए कोई  स्कूल नहीं होने के कारण , वह जनता इन्टर कालेज, पथरवा में पढ़ती थी. यह स्कूल लड़के – लड़कियों सबके लिए था और सुजाता की तरह बहुत सी लड़कियां भी विभिन्न कक्षाओं में पढ़ती थी. लड़कों की संख्या लड़कियों से काफी अधिक थी, लेकिन डरने जैसी कोई बात थी नहीं और पढ़ाई भी स्कूल में ठीक होता था. सुजाता के साथ उसकी सहेली आरती, जो कक्षा दस में पढ़ती थी, उसके साथ ही गाँव से आती थी. दोनों  खेतों के बीच बने पगडंडियों, छोटे रास्तों से आती थी. यह उनकी नित्य की दिनचर्या थी. रास्ते में कुछ अन्य गाँवों से भी छात्र – छात्राऐं मिलते जाते.

जाते समय सभी के बीच सामान्य पढ़ाई वा अन्य सामान्य बातें लगातार होती रहती थीं. कभी- कभी वे रास्ते में किसी खेत से गन्ना तोड़ कर चूस लिया करते थे अथवा लौटते समय अगर समय है, तो कोई खेल भी खेल लिया करते थे . यह उनकी रोज की दिनचर्या थी. स्कूल में पढ़ाई भी अन्य स्कूलों की तुलना में काफी अच्छी थी. स्कूल में प्रधानाचार्य छात्रों के  अनुशासन पर बहुत ही ध्यान रखते थे, इसलिए छात्र भी ढ़ंग से रहते थे. सुजाता का भी स्कूल का दैनिक कार्यक्रम सामान्य गति से चल रहा था और वह मन लगा कर पढ़ाई करती थी.

इधर कुछ दिनों पहले उसके गाँव के ही राम अधार जी, जो बाहर नौकरी करते थे, सेवानिवृत्त होने  के बाद गाँव में आ कर रहने लगे. उनका बहुत दिनों से  गाँव से कोई खास समबन्ध नहीं था, केवल किसी के शादी- व्याह,  या इसी प्रकार के किसी अवसर पर वे आते थे. उनके पास खेती काफी थी, जो उनके आदमी किया करते थे. वे भी बीच – बीच में आ कर  खेती का काम देख लिया करते थे. उनका गाँव में बड़ा सम्मान था. लेकिन उनके लड़के- लड़कियों, या परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में गाँव वालों को कोई खास जानकारी नहीं थी, क्योंकि पूरा परिवार एक साथ बहुत कम ही आता था. राम अधार जी सामान्यतः अपनी पत्नी जानकी के साथ ही आते थे और वह भी बहुत ही थोड़े समय के लिए आते. राम अधार जी अल्प, लेकिन मृदुभाषी थे.

उनके सभी बेटा- बेटी, बड़े हो चुके थे और उनकी शादियां हो चुकी थी. बेटे सब विभिन्न शहरों में नौकरी करते थे, इसलिए उनके साथ कोई बेटा नहीं आया, केवल पत्नी जानकी और उनका एक नाती संजय, उनके साथ गाँव आया और यही तीन लोग राम अधार जी के घर में रहते थे. संजय शहर छोड़ कर गाँव क्यों रहने आया, फिर अपने माता – पिता को छोड़ कर नाना- नानी के साथ क्यों रह रहा है, इसका कोई निश्चित कारण किसी को नहीं पता था, लेकिन गाँव का माहौल, जितनी मुंह उतनी बातें. कोई कहता कि इसका अपने माँ- बाप से पटता नहीं, इसलिए नाना – नानी के पास रहता है. नाना- नानी के यहाँ रहने से यह और बिगड़ गया है, इत्यादि.

चूंकि राम अधार जी का घर सुजाता के घर के पास ही था तो संजय के बारे यह सारी बातें, सुजाता के कानों में भी पड़ती थी, परन्तु वह इन बातों पर न तो ध्यान देती और न तो कुछ सोचती. अचानक सुजाता ने एक दिन संजय को अपने स्कूल में देखा तो वह चौंक गयी. चूंकि संजय ने कभी सुजाता को देखा नहीं था तो उसने ध्यान नहीं दिया. कुछ दिनों बाद सुजाता को पता लगा कि संजय का उसी के स्कूल में ग्यारहवीं कक्षा में प्रवेश मिला है. एक दिन रास्ते में संजय को उसने देखा भी और संजय की निगाह भी उस पर गयी. कुछ दिनों बाद संजय ने सुजाता को गाँव में भी देखा.

संजय गाँव से स्कूल अपनी सायकिल से आता – जाता था, और आते- जाते समय जोर- जोर से फिल्मी गाने गाता रहता था. पहले लड़के – लड़कियों ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन बाद में सबको बहुत ही खराब लगने लगा  . एक दिन सुजाता ने कह ही दिया कि अगर हमेशा गाना गाना इतना ही जरुरी है तो धीरे- धीरे गाओ, सबको क्यों परेशान करते हो ? संजय ने कोई जबाब तो नहीं दिया लेकिन उसके चेहरे के भाव से लगा कि उसे सुजाता की सलाह अच्छी नहीं लगी.

इधर संजय , जिसे इतना तो पता था  कि यह लड़की मेरे नाना के घर के आसपास ही कहीं रहती है, और उम्र में  मुझसे छोटी है . उसने सोचा कि  इसकी इतनी हिम्मत कैसे हुई कि मुझे अन्य लड़कियों के सामने कुछ कहे. संजय,  माँ बाप का इकलौता बेटा था, नाना- नानी का दुलारा था और उसे घर में कोई समझाता अथवा डांटता नहीं था. उसे अपने मन का करना ही अच्छा लगता था तथा उसका चरित्र भी कुछ ठीक नहीं था. उसने सुजाता के इस बात को मन में रख लिया. वह सुजाता को सबक सिखाने के लिए अवसर खोज रहा था.

एक दिन सुजाता को घर से स्कूल के लिए निकलने में देर हो गई और उसके साथ जाने वाले लड़के- लड़कियां जा चुके थे   उस दिन सुजाता अकेले  ही स्कूल जा रही थी. रोज उसी रास्ते वह स्कूल जाती थी, जाने पहचाने रास्ते,खेत, खलिहान व पगडंडियाॅं थी और वह अनेकों बार स्कूल अकेले गयी थी और आयी भी थी. कभी-  कभी देर तक पढ़ाई होने के कारण अंधेरे में भी उसे आना पड़ता था. इस कारण उसके मन में भय जैसी कोई बात नहीं थी. वह जानी- पहचानी पगडंडियों पर चली जा रही थी. चारो ओर गन्ना का हरा भरा खेत था, कई खेतों में गेहूँ की पौधे लहरा रहे थे, सरसों की पीली फूलों से खेत रगें थे. सुजाता जल्दी स्कूल पहुँचने की धुन में चली जा रही थी. इतने में पीछे से संजय सायकिल से आ गया और पास आते ही बोला, अपने को तुम क्या समझती हो, मैं चाहे जो कुछ भी करुं, तुम कहने वाली कौन होती हो?

संजय के अचानक आ जाने और इस प्रकार से पिछले घटना के बारे में इस ढंग से बात करना सुजाता को अच्छा नहीं लगा. सुजाता रुक गई और उससे बोली कि तुम्हें जो करना है, वह करो, लेकिन अगर मेरे सामने किया तो ठीक नहीं होगा, मैं मना करुंगी. अभी रास्ते से हटो, स्कूल की देरी हो रही है. संजय ने कहा कि अभी तो ठीक है, लेकिन तुमसे  एक दिन इसका बदला मै तो लेकर रहूँगा. सुजाता ने कहा कि जो करना होगा, कर लेना, अभी रास्ते से हटो! और सुजाता तेजी से चलते हुए स्कूल चली गई.

इस घटना का जिक्र उसने किसी से भी नहीं किया और वह भूल गयी. इस घटना को हुए एक सप्ताह बीता था, सुजाता अपनी अन्य सहेलियों के साथ स्कूल जा रही थी. अचानक संजय पीछे से आया और सुजाता को धक्का मार कर आगे तेजी से निकल गया. सुजाता जब तक संभले- संभले, तब तक संजय काफी आगे निकल चुका था. सहेलियों ने कहा कि रहने दो हो सकता है उसको जल्दी रही हो, इस कारण धक्का लग गया हो. लेकिन सुजाता के मन में यह लग गया कि इसने उस समय जो धमकी दी थी, यह उसी कारण हो सकता है. इसके बाद,  इस प्रकार की घटना सुजाता के साथ कई बार हुई. एक बार हद्द तब हो गयी, जब संजय ने सुजाता को अकेले पा कर, न केवल उसे धक्का दिया वरन् उसका दुपट्टा भी खींच कर ले गया और कुछ दूर जा कर दुपट्टा फेंक दिया.

सुजाता को अब लगा कि यह तो बहुत ज्यादा हो गया है, उसे इसका प्रतिकार करना ही होगा. उसके मन में एक बार विचार आया कि वह अपने घर पर बाबूजी को बताये. फिर समझ में आया कि कहीं बाबूजी पढ़ाई छोड़ा न दें. फिर आया कि बाबूजी इसके नाना से शिकायत करेंगे, तो नाना की बात या डांट , यह उद्दंड संजय कितना मानेगा कि नहीं मानेगा, ऐसे अनेकों विचार सुजाता के मन में चलने लगा . अन्त में सुजाता ने सोचा कि यह समस्या तो मेरी है, मुझे स्वयं ही इसका समाधान निकालना होगा. क्योंकि आज संजय है, कल कोई दूसरा हो सकता है, और मुझे तो रोज घर से बाहर निकलना ही है, स्कूल आना ही है. सुजाता ने मन ही मन एक निश्चय कर लिया.

इसके बाद सुजाता रोज जानबूझ कर स्कूल के लिए थोड़ी देर से निकलने लगी कि वह  स्कूल जाते समय अकेले ही रहे . एक दिन वह अकेले ही खेत के बीच के रास्ते से जा रही थी. एक तरफ गन्ने का खेत था तो दूसरी तरफ  गेहूँ की खेती थी. दूर कहीं पर गन्ने के  रस को कढ़ाई में ,गुड़ बनाने के लिए खौलाया  जा रहा था,उसकी सोंधी-  सोंधी खुशबू आ रही थी.  सुजाता स्कूल जा रही थी और जाते –  जाते इस बात का भी ध्यान रख रही थी कि संजय पीछे आ रहा है या नहीं. उसे संजय पीछे से आता हुआ दिखाई पड़ गया. संजय जैसे ही उसके बगल में आया, सुजाता ने उसकी सायकिल को जोड़ से पैर से धक्का दिया. संजय सायकिल सहित गेहूँ की खेत में गिरा. सायकिल छटक कर एक तरफ गिरा और संजय गेहूँ की खेत में. खेत में थोड़ी पानी होने के कारण कीचड़ हो गया था. संजय कीचड़ में बुरी तरह धंस गया. सुजाता ने उसकी सायकिल उठाई और उसके ऊपर फेंक दिया और फिर सायकिल पर चढ़कर सुजाता बोली कि लड़कियों को छेड़ने में बड़ा मजा आता है, अब तुम्हें मैं बताती हूँ. सुजाता ने बगल के गन्ने के खेत से गन्ना उखाड़ा और संजय को मारना शुरू कर दिया. संजय का पैर और पूरा शरीर, चूंकि कीचड़ में फंसा था , उसे उठने में थोड़ी परेशानी हो रही थी, लेकिन वह अपना बचाव कर रहा था, लेकिन सुजाता को गाली भी देता जा रहा था. शोर सुन कर आसपास खेतों में काम करने वाले किसान और अन्य लोग एकत्रित हो गये. लोगों ने कहा कि क्यों लड़ रहे हो, स्कूल जाओ.

सुजाता ने कहा कि आज मैं इसे नहीं छोडूँगी, बहुत परेशान करता है. खैर किसी प्रकार से लोगों ने दोनों को छुड़ाया. सुजाता तो स्कूल चली गई, लेकिन संजय कपड़े गन्दे हो जाने के कारण, वापस घर लौट गया. संजय के नाना राम अधार ने पूछा कि स्कूल क्यों नहीं गए और यह कपड़े पर कीचड़ कैसे लगा है, संजय ने एक झूठी कहानी बना कर उन्हें सुना दिया. लेकिन गाँव का मामला, सब एक-  दूसरे को थोड़ा बहुत तो जानते पहचानते ही थे, शाम ढलते- ढलते गाँव भर में सुबह स्कूल के रास्ते में हुई घटना की जानकारी पूरे गाँव को हो गई. सुजाता के घर वालों ने विशेषकर उसके पिता, पृथ्वी सिंह जी ने सुजाता से कहा कि मुझे क्यों नहीं बताया? उसका हाथ- पैर तोड़ देता . सुजाता ने कहा बाबूजी समस्या मेरी थी, तो उसका  मुझे ही समाधान करना था, आप मेरे साथ कहाँ – कहाँ जाते और मेरी रक्षा करते!

इधर राम अधार जी को जब इस घटना की पूरी जानकारी हुई तो वह पृथ्वी सिंह जी के पास आये और सुजाता से अपने संजय के व्यवहार के लिए माफी मांगी और कहा सुजाता तुम मेरी बेटी जैसी नहीं, बल्कि मेरी बेटी ही हो . दूसरे दिन राम अधार बाबू ने संजय को यह कह कर कि वह उनके साथ गाँव में रहने लायक नहीं है, उसे उसके घर वापस भेज दिया.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

19.12.2025

संपर्क – 1901 साई आराध्य, प्लाट नंबर- 18, सेक्टर- 35F, खारघर, नवी मुंबई – 410210

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संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २६४ – “एक समस्या टली…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत एक समस्या टली...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २६४ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “एक समस्या टली-...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

गाड़ी की चकील* टूटी है

जुँआ चरमराता ।

जैसे वह हो प्रणव गीत का

नायक उद्गाता* ॥

 

और अँधेरी रात

बैल के कंधे कसे – कसे ।

जैसे कर्जे में आसामी

लगते फँसे – फंसे ।

 

खीसे* की है नींव, कि

उसकी हिली हुई समझो |

वही आदमी करने निकला

मग में जगराता *॥

                                   

बित्ता बित्ता रेंग रही यह

सुविधा नासपिटी ।

जीवनरेखा लगे जहाँ पर  

है सिमटी – सिमटी ।

 

गर्मी की यह प्यास गले

को   भीषण सुखा रही –

बैलों की जोड़ी आपस का

तोड चली नाता ॥

 

माँग चूँग कर थका, चलाता

रहा  बैल गाड़ी ।

एक समस्या टली, दूर

तो दूजी है ठाँड़ी ।

 

हाल* उतरती दिखी तभी

बायें पहिये की किन्तु ,

धैर्यवान क्या कभी विपति में

ऐसे घबराता ?

 * चकील= पहिये को गाड़ी से पृथक न होने देने के लिये लगाया गया कील रूपी सपोर्ट ।

* उद्गाता= उच्चस्वर में गाने वाला,  सामवेद का गायक

* जगराता= रात्रि जागरण

* खीसा= जेब

* हाल= बैलगाड़ी के लकड़ी के पहिये के लिये लोहेका टायर

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

27 -11-2025

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ८६३ ⇒ डाॅ अनोख सिंग☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “डाॅ अनोख सिंग।)

?अभी अभी # ८६३ ⇒ आलेख – डाॅ अनोख सिंग ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कुछ लोग अनोखे होते हैं तो कुछ लोगों के नाम में कुछ अनोखापन होता है, लेकिन डाॅ अनोख सिंग तो यथा नाम तथा गुण थे यानी एक अनोखे दिलचस्प इंसान। किसी व्यक्ति के आगे डॉक्टर लगते ही यह भ्रम हो जाता है कि जरूर वह कोई डॉक्टर होगा, और वाकई अनोख सिंग एक डॉक्टर ही थे।

भले ही जात न पूछो साधु की, लेकिन किसी डॉक्टर की डिग्री तो परख ही लेनी चाहिए। चिकित्सा एक व्यवसाय है और आजकल जितने रोग उतने डॉक्टर ! एलोपैथी की तरह ही कई समानांतर चिकित्सा आज उपल्ब्ध है, जिनमें एक्यूप्रेशर और एक्यूपंक्चर प्रमुख हैं। डा अनोख सिंग एक्यूपंक्चर चिकित्सा में पारंगत थे और दमा यानी अस्थमा का इलाज करने माह में एक बार भटिंडा से इंदौर आते थे। वे नियमित रूप से माह के हर पहले रविवार और सोमवार को आते मरीजों का इलाज करते थे। ।

उनके पास कोई जादू की छड़ी अथवा भभूत नहीं थी, लेकिन हां एक झोला जरूर था जिसमें कुछ सुइयां थीं, जो मरीजों को चुभाई जाती थी। डॉक्टर तो वैसे भी कसाई ही होते हैं, जब कि यह तो सिर्फ सुई ही चुभाता था। हमारे शरीर में हर बीमारी के कुछ पॉइंट्स होते हैं, जिनमें कहीं एक्यूप्रेशर काम करता है तो कहीं /एक्यूपंक्चर।

सर्दी जुकाम, नजला और खांसी जब बेइलाज हो जाती है, तो वह सांस का रोग बन जाती है। कई इलाज हैं अस्थमा के एलोपैथी में ! गोली, इंजेक्शन, और सबसे अधिक कारगर इन्हेलर। बस मुंह खोलें और फुस फुस करते हुए दवा मुंह के अंदर। मछली की तरह तड़फता है एक दमे का रोगी, जब उसकी सांस उखड़ जाती है। एलर्जी टेस्ट से निदान में सहायता अवश्य मिलती है। कुछ लोग तो साउथ जाकर मछली का सेवन भी करने को तैयार हो जाते हैं तो कुछ आयुर्वेद पर भरोसा करते हैं। ।

अगर मैं भी सांस का शिकार ना होता तो शायद इस अनोखे इंसान से मिल भी नहीं पाता। किसी भुक्तभोगी सज्जन ने मुझे ना केवल इनकी जानकारी ही दी, एक दिन इनसे मेरा एक मरीज के रूप में परिचय भी करा दिया। छः फिट का एक आकर्षक खुशमिजाज सरदार, मानो अभी फौज से ही लौटकर आया हो।

नाम बताइए ? मैने अपना नाम बताया, पी के शर्मा !

उन्होंने मुझे घूरा अथवा निहारा, फिर बोले, महाराष्ट्र में हमें एक पी के झगड़े मिले थे, और हंस दिए।

हमारा उपचार शुरू हुआ, हमें भी छाती सहित कुछ जगह सुइयां चुभाई गई। खटमल मच्छर के काटने से थोड़ा अधिक दर्द भी महसूस हुआ, लेकिन असहनीय नहीं। केवल बीस मिनिट का खेल था सुइयां चुभाने का। हिदायतों का पिटारा लिए हमने उनसे विदा ली। ।

नीम हकीम, खतरे जान ! हम जहां भी गए हैं, अंध श्रद्धा नहीं, कुछ शंका लेकर ही गए हैं। सोचा अगर तत्काल असर ना भी हुआ तो अपनी दर्द निवारक सांस की गोली तो पास है ही। कुछ दिन तक हम अपनी सांस ढूंढते रहे लेकिन सांस ने उखड़ने से साफ इंकार कर दिया। हमें लगा डॉक्टर तेरा जादू चल गया।

अगले माह डॉक्टर ने फिर बुलाया था। मरीजों की भीड़ कहां नहीं, कितनी बीमारियां कितने रोग ! मुझे देखकर मुस्कुराए, कैसे हो झगड़े साहब ? यानी यहां मेरा नामकरण भी हो चुका था। अब मैं उनसे झगड़ा करने से तो रहा, क्योंकि उन्होंने मुझे पी.के.झगड़े के इतिहास के बारे में पहले ही बता दिया था। वे जितने आत्मीय थे, उतने ही मजाकिया भी।

हंसते हंसते सुइयां चुभाना कोई उनसे सीखे। ।

हर मरीज से उनका वार्तालाप बड़ा रोचक होता था। एक रिश्ता जो मन को भी मजबूत करे और रोगी में विश्वास का संचार करे। कई क्रॉनिक पेशेंट्स को स्ट्रेचर पर लाया जाता था, दूर दूर से रोगी इसी आस से आते थे, कि सांस में कुछ फायदा हो। लेकिन अगर हर डॉक्टर मसीहा ही होता तो शायद इस संसार में कोई रोगी ही नहीं होता।

हर व्यक्ति के जीवन में उतार चढ़ाव आते है, डाॅ अनोख सिंग भी आखिर थे तो एक इंसान ही। एक बार उन्हें लकवा मारा, फिर उठ खड़े हुए, बेटे की मौत का सदमा भी हंसते हंसते झेला, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। जब भी वापस आते, उसी उत्साह और उमंग के साथ। जिस माह नहीं आते, मरीज निराश हो जाते। ।

मैं हमेशा उनके लिए मिस्टर पी.के.झगड़े ही रहा। हमेशा सबसे मेरा परिचय यही कहकर कराते, ये झगड़े साहब हैं, लेकिन कभी हमसे नहीं झगड़ते। कोरोना काल में उनका आना जो एक बार बंद हुआ तो हमेशा के लिए ही हो गया। कोरोना ने उनको भी नहीं छोड़ा।

आज जब भी कभी थोड़ी सांस उखड़ती है अथवा किसी अस्थमा के मरीज को देखता हूं, तो अनायास ही इस अनोखे इंसान की याद आ जाती है। कुछ सुइयां रिश्तों की भी होती हैं, जब याद आती है, बहुत चुभती है। एक ऐसा दर्द जो मर्ज को ही गायब कर दे। क्या इसे ही रिश्तों का मीठा दर्द कहते हैं, सुइयां चुभाने वाले डाॅ अनोख सिंग अगर आज होते, तो जरूर जवाब देते। ।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “बालदिन…” ☆ सुश्री शीला पतकी ☆

सुश्री शीला पतकी 

? मनमंजुषेतून ?

☆ “बालदिन…” ☆ सुश्री शीला पतकी 

(१४ नोव्हेंबर…. बालदिन… या निमित्ताने – – )

आमची पिढी खूप निरागस होती, आज्ञाधारक होती, आई-वडील सांगतात मोठी माणसं सांगतात ते योग्य बरोबर !शिक्षकांबद्दल तर कमालीचा आदर, सर्वांना अगदी घरच्यांना आणि विद्यार्थ्यांनाही! मुलगा ऐकत नाही असे होत नव्हते. भरपूर खेळलोत, बिन खर्चाचे खेळलोत. खूप आनंद मिळवला. संध्याकाळचे डबे, असेल ते भरून बागेत गेलो सहभोजनाचा आनंद लुटला.. गच्चीवरच्या अंगती पंगती केल्या.. गोष्टी सांगितल्या गोष्टी ऐकल्या.. भरपूर दंगामस्ती केली.. पुस्तक वाचली… काही जणांनी थोडीशी बदमाशी पण केली पण ती बेताचीच.. !

आता पिढी बदलली आहे. न ऐकणं ही वृत्ती झाली आहे. पालकही आपल्याला मिळालं नाही ते त्यांना द्यायचं या वेडाने पछाडलेले आहेत.

…. मध्यंतरी एक प्रसंग घडला… मी माझ्या संस्थेच्या दारात रीक्षेची वाट पाहत उभी होते दोन ते अडीच वर्षाची एक मुलगी रस्त्याच्या मधून वेडी वाकडी कशीही चालत होती पळत होती मागे आई मावशी वगैरे चार-पाच बायका होत्या. रस्ता रहदारीचा, सायकल गाड्या येत होत्या. मी त्या मुलीलाही जरा ओरडले, तिला धरून ठेवलं. शेवटी तिच्या आईला थांबून घेतलं आणि सांगितलं “अहो ती मुलगी वाटेल तशी पळते तुम्ही सगळ्या गप्पा मारताय तुमचं लक्ष नाही…. त्यावर त्या बाई म्हणाल्या 

“काय करावं ऐकतच नाही “.. प्रत्येक पालकाचे हेच म्हणणे आहे… काय करावं ऐकत नाही…. सैराट चित्रपटात एक दृश्य दाखवल आहे आमदाराचा मुलगा प्राध्यापकांच्या तोंडात मारून वर्गातून बाहेर जातो प्राचार्य त्याबाबत बोलण्यासाठी घरी जातात त्या शिक्षकांची ओळख करून देतात त्यावर आमदार साहेब म्हणतात काय करावं आमच्या प्रिन्सला रागच आवरत नाही बघा एवढा वाक्यावर तो प्रसंग संपतो ही काय पद्धत आहे ना? शिक्षकाचे थोबाडीत मारायचं… ? ते उत्तम शिकवत आहेत आणि हा फोनवर बोलतोय…. हे शिक्षण सम्राटांच्या शाळा कॉलेजातले वास्तव आहे !आज एक घटना ऐकली वाघोलीच्या कुठल्यातरी शाळेतील एका वांड व्रात्य मुलाची…. विकृतपणे तो वर्गात त्रास देत होता तेव्हा शिक्षिकेने त्याचे तोंडात दिली त्याने व त्याच्या पालकांनी शाळेकडे तक्रार केली शाळेने अर्थात काहीतरी समजूत काढली असेल पण पालकांचे समाधान झाले नाही. त्यांनी एफ आयआर दाखल केला. बहुदा पोलिसांनी मध्यस्थी केली. त्यावर पालक म्हणाले “एका गोष्टीवर मी माफ करेन.. माझा मुलगा त्या बाईंच्या थोबाडीत मारेल” काय ही मानसिकता हाच मुलगा पुढे जेव्हा त्यांच्या थोबाडीत मारेल तेव्हा या गोष्टीची जाणीव त्यांना होईल.

 हल्ली गेट-टुगेदर होतात तेव्हा मुल सांगतात, ” बाई आम्हाला पूर्वीसारखे एक एक छडी मारा ना”… अरे त्या छडी मध्ये प्रेम होत प्रेम तू सुधारावा म्हणून केलेली ती धडपड होती. लोकांच्या लेकरांना मारायची हौस नसते शिक्षकाला… परवाच मी एका लेखात लिहिलं होतं ते एका माणसाने आठवण सांगितली होती मी खूप खोडकर होतो अभ्यास करत नव्हतो पण बाईने मला मारून तयार करून घेतलं आणि त्यांच्या अंतिम काळी मला जवळ बोलून म्हणाल्या मी तुला खूप मारलं रे मला क्षमा कर विद्यार्थी सुधारावा म्हणून मारलेली छडी किंवा केलेली शिक्षा ही शिक्षकाच्या काळजाला लागलेली असते हे कोणाला जाणवत नाही.

बालदिनी पालकांनी खरोखर आपण उत्तम पालक आहोत का याच एकदा परीक्षण कराव तुमचं मुल तुमचा जीव आहे याची जाणीव आम्हाला असते ते उत्तम व्हावे चांगलं नागरिक व्हावं यासाठी सजगपणे प्रयत्न करावे लागतात नको ते छाटावं लागतं चांगलं ते वाढू द्यावं लागतं ते बालक निरागस असतं त्याला कळत नाही दंगा धोपा खोड्या या त्याच्या सहज प्रवृत्ती असतात पण त्याला योग्य वळण देणं हे आपल्या सगळ्यांचेच काम आहे पूर्वी समाजातले लोक सुद्धा एखाद्या मुलाचं वर्तन चुकीचं असेल तर त्याला सांगत असत.

एकदा सिविल हॉस्पिटल च्या बाजूने तीन मुलं एका मोटरसायकलवर बसून रस्त्यावरच्या माणसांची टवाळी करत ओरडत चालली होती गाडीला प्रचंड स्पीड होता आणि कोर्टासमोर त्यांची गाडी स्लिप झाली अपघात झाला रस्त्यावरून जाणाऱ्या ज्या लोकांची तेथे टवाळी करत होते त्याच लोकांनी त्यांना दवाखान्यात ऍडमिट केले. हे कसले वागणे? याच्या समर्थन होऊ शकत नाही. अकरावी पास झालेल्या मुलाला वडिलांनी मोठ्या हौसेने बुलेट घेऊन दिली मित्रांसमवेत हिंडायला गेला अपघात झाला आणि जागीच खलास बापाने मृत्यू भेट दिला असं झालं …

…. कोणत्या वयात मुलाला काय द्यावं ते वापरायला तो जबाबदार आहे का कशाचाच विचार नाही एक समाज असा आहे की तो आपल्या मुलांबाबत प्रचंड सतर्क आहे आणि दुसरा बेदरकार… त्यांना प्रचंड काम आहे आणि पैसा कमवायचा आहे त्यामुळे वेळ नाही…. खालच्या माणसाला पैसा मिळवल्याशिवाय गत्यंतर नाही त्यामुळे त्याला वेळ नाही …

…. पण गंमत म्हणजे सगळ्यांची स्वप्न मुलं आहेत… प्रत्येकाला वाटतं आपलं मूल काहीतरी वेगळं व्हावं पण त्या दिशेने जाणार पालकत्व मात्र दिसत नाही….. !असो

विषय खूप मोठा आहे लिहावं तेवढं कमी आहे लिहण्यापेक्षा काहीतरी कृती करावी असं वाटतं त्या निरागस सर्व बालकांना आजच्या बालक दिनानिमित्त अनेक आशीर्वाद आणि शुभेच्छा!!!

© सुश्री शीला पतकी

माजी मुख्याध्यापिका सेवासदन प्रशाला सोलापूर 

मो 8805850279

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – सीढ़ियाँ ? ?

आती-जाती

रहती हैं पीढ़ियाँ,

जादुई होती हैं

उम्र की सीढ़ियाँ,

जैसे ही अगली

नज़र आती है,

पिछली तपाक से

विलुप्त हो जाती है,

आरोह की सतत

दृश्य संभावना में,

अवरोह की अदृश्य

आशंका खो जाती है,

जब फूलने लगे साँस,

नीचे अथाह अँधेरा हो,

पैर ऊपर उठाने को

बचा न साहस मेरा हो,

चलने-फिरने से भी

देह दूर भागती रहे,

पर भूख-प्यास तब भी

बिना नागा लगाती डेरा हो,

हे आयु के दाता! उससे

पहले प्रयाण करा देना,

अगले जन्मों के हिसाब में

बची हुई सीढ़ियाँ चढ़ा देना!

मैं जिया अपनी तरह,

मरूँ भी अपनी तरह,

आश्रित कराने से पहले

मुझे विलुप्त करा देना!

 ?

© संजय भारद्वाज  

प्रातः 8:01 बजे, 21.4.19

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र दी जावेगी. 🕉️ 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १४ – हास्य-व्यंग्य – “उई… छिपकली…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆

श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  उई… छिपकली…

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # १४ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “उई… छिपकली…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

उस दिन मैं अपने कार्यालय के स्टाफ रूम में सहकर्मियों के बीच बैठा कहकहों के साथ चाय पी रहा था कि अचानक ऊपर से एक छिपकली मेरे सिर पर आ गिरी। छिपकली का मेरे सिर पर गिरना इतना अप्रत्याशित था कि मैं सिर को झटका देता हुआ उठ खड़ा हुआ। छिपकली जिस ओर भागी उस ओर बैठे लोग कुर्सियों से उचक कर किनारे खड़े हो गए। शरीर से हट्टी – कट्टी किंतु हृदय से कमजोर कुछ महिलाओं की चीख निकल गई – उई…. छिपकली….।

लोग अपनी घबराहट छिपाने हंसते हुए छिपकली को देख रहे थे जो पुनः दीवार पर चढ़ कर एक कीड़े को पकड़ने के लिए शिकारी की मुद्रा बना चुकी थी। छिपकली के लिए आदमी के ऊपर गिर जाना भले ही कोई उल्लेखनीय घटना न हो किंतु आदमी के लिए छिपकली का उसके ऊपर गिरना विशेष बात है।

छिपकली कितने बजे गिरी, उस समय का चौघड़िया क्या था, छिपकली शरीर के किस अंग में गिरी, किस दिशा से गिरी, गिर कर किस दिशा में भागी, उसका रंग – रूप क्या था, आदि – आदि बहुत सी ऐसी बातें हैं जो छिपकली के गिरते ही आदमी के मन में उठती हैं क्योंकि इन तमाम बातों के गणित से ही छिपकली के गिरने पर प्राप्त होने वाला शुभ – अशुभ फल निकाला जाता है।

बुजुर्गों का कहना है कि छिपकली के ऊपर गिरते ही स्नान करके भोले शंकर की स्तुति करना हितकर होता है। भोले के स्मरण से जहरीली छिपकली के गिरने से उत्पन्न होने वाले अशुभ फलों की आशंका समाप्त हो जाती है। यों पहले भी मेरे ऊपर दो – चार बार छिपकली गिर चुकी है किंतु यह पहला अवसर था जब कोई छिपकली दस लोगों की उपस्थिति में मेरे ऊपर गिरी और तरह – तरह के प्रश्न खड़े कर गई। मैं सोचता हूं कि न जाने उस छिपकली की मुझसे क्या दुश्मनी थी अथवा इतने लोगों के बीच उसने मुझमें क्या पाया जो वह सबके सामने मेरे सिर पर आ गिरी, अरे उसे गिरना ही था तो पूर्व छिपकलियों की भांति अकेले में मुझ पर गिर कर अपनी इच्छा पूरी कर लेती। जब से मुझ पर छिपकली गिरी है मैं बहुत परेशान हूं। मुझे तरह – तरह के सुझाव मिलना प्रारम्भ हो गए।

सर्वप्रथम मुझे अपने स्टाफ की महिला सदस्यों से सलाह मिली कि जहां भी बैठना हो पहले ऊपर देख लेना चाहिये कहीं ऊपर छिपकली तो नहीं है। कुछ महिलाओं ने तो यह भी कहा कि हम जहां भी बैठें थोड़ी – थोड़ी देर में ऊपर देखते रहें तो छिपकली के ऊपर गिरने से बच सकते हैं। मैं उनकी सूझबूझ और दूरदर्शिता पर हैरान था कि जिनके ऊपर जीवन में कभी छिपकली नहीं गिरी वे भी छिपकली को लेकर कितनी सतर्क हैं और एक मैं हूं जिस पर अनेक बार छिपकली गिर चुकी है फिर भी उससे बचने का उपाय नहीं सोच पाया।

लंच का समय समाप्त होने के कुछ ही देर बाद पूरे ऑफिस में यह खबर फैल चुकी थी कि आज स्टाफ रूम में मेरे सिर पर छिपकली गिर गई। मेरा अपनी कुर्सी पर बैठ कर कार्य करना मुश्किल हो रहा था। दो – दो, तीन – तीन के दल में सहकर्मी मुझसे मुलाकात करने आ रहे थे और मेरे प्रति मंगलभाव व्यक्त करते हुए मुझसे विस्तार में छिपकली प्रसंग सुनना चाह रहे थे। कुछ लोग छिपकली के ऊपर गिरने संबंधी स्वतः के अनुभव मुझे सुना रहे थे। कुछ महिलाएं और उनके स्वभाव से मेल खाते पुरुष स्टाफ रूम में जा जाकर उस दुस्साहसी छिपकली को देख रहे थे जो कुछ देर पहले मुझ पर गिरी थी। पूरे ऑफिस में छिपकली कांड गूंज रहा था। बड़े बाबू अपने आसपास बैठने वाले कर्मचारियों को बता रहे थे कि हम भारतीय हर मामले में पीछे हैं। हमारे यहां की छिपकलियां भी कोई छिपकलियां हैं अरे, छिपकलियां तो अफ्रीका में होती हैं जो गिरना नहीं उड़ना जानती हैं।

कुछ देर बाद मेरे सामने कर्मचारी यूनियन के अध्यक्ष व कुछ अन्य पदाधिकारी खड़े थे। अध्यक्ष महोदय मुझसे कह रहे थे – प्यारे भाई, चिंता मत करो छिपकली क्या चीज है यदि पहाड़ भी तुम्हारे ऊपर गिर जाए तो भी हम तुम्हारा बाल बांका नहीं होने देंगे। छिपकली शायद हमारी एकता और ताकत से परिचित नहीं थी। उन्होंने आवाज लगाई – कर्मचारी एकता, साथियों ने जवाब दिया – जिंदाबाद, जिंदाबाद। उन्होंने फिर आवाज लगाई – जो हमसे टकराएगा, साथियों ने जवाब दिया – चूर चूर हो जाएगा। मैंने अपने सुख – दुख के साथियों को चाय पिलाकर विदा किया।

इतने में मेरे एक बुजुर्ग साथी जो घर पर होमियोपैथी द्वारा लोगों का इलाज करते थे और दवाओं की एक इमरजेंसी पेटी ऑफिस में भी रखते थे मेरे पास आ पहुंचे। उन्होंने मुझे दवा की एक पुड़िया देते हुए कहा – यह लो इसे अभी एक गिलास पानी के साथ पी लो और किसी भी तरह के इन्फेक्शन की ओर से निश्चिंत हो जाओ। मैं दवा लेने से बचना चाहता था किंतु वे दवा देने का हाथ आया मौका खोना नहीं चाहते थे। अंततः वे विजयी हुए। इसी समय चपरासी ने आकर मुझसे कहा कि आपको फौरन साहब ने बुलाया है।

मैं हाथ जोड़े साहब के सामने खड़ा था। “सुना है तुम्हारे ऊपर छिपकली गिर गई”, साहब ने प्रश्न किया। मैंने कहा जी हां। वे बोले – यह बात तुम्हें सबसे पहले मुझे बताना थी। मेरे ऑफिस में क्या हो रहा है इसकी जानकारी मुझे इतनी देर से दूसरों के द्वारा मिल रही है। आप जानते नहीं कि मुझसे जानकारी छुपाने पर मैं आपको सस्पेंड भी कर सकता हूं। मैने कहा – सर मामूली सी घटना थी इसलिए….। वे बोले – घटना मामूली है या गंभीर यह तुम तय करोगे तो फिर मैं यहां किसलिए हूं। मैंने कहा, क्षमा करें सर गलती हो गई। उन्होंने कहा ध्यान रखिए आइंदा ऐसी गलती न हो। मैं जी सर कहकर वापस जाने को मुड़ा। वे बोले,  ठहरो आधे दिन के अवकाश का आवेदन देकर घर जाओ, स्नान करो, भगवान को अगरबत्ती लगाओ। छिपकली गिरने के बाद किसी को स्पर्श तो नहीं किया। मैंने कहा, जी नहीं सर। वे बोले – गुड। मैं आधे दिन का अवकाश लेकर घर की ओर बढ़ चला। डोरवेल सुनकर अम्मा जी ने दरवाजा खोला। “बेटा आज जल्दी आ गए”। हां अम्मा सिर पर छिपकली गिर गई थी इसलिए, ऐसा कहते हुए मैंने घर के अंदर प्रवेश करने कदम बढ़ाए ही थे तभी अम्मा ने कड़क आवाज में कहा – बहू से पानी भेज रही हूं बाहर से नहाकर ही घर के अंदर घुसना। मैं नहाने के लिए घर के बाहर दरवाजे पर खड़ा छिपकली को कोसता हुआ पानी आने की प्रतीक्षा कर रहा हूं।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३६ ☆ # “फुलझड़ी…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता फुलझड़ी…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २३६ ☆

☆ # “फुलझड़ी…” # ☆

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए  है

जल रहे हैं कुछ जो

बुझ नहीं पाए है

 

हवा के तेज झोंकों ने

बेरहमी से उजाड़ा है

तिनका तिनका करके

बसेरों को उखाड़ा  है

हालात के मारो पर

यह कैसे दिन आए हैं

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए है

 

अंधकार से लड़ने

वह हिम्मत तो जुटा पाए

महंगाई के मारे हैं

दिया बाती कहां से लाए

फिर भी चमत्कार की वह

आस लगाए हैं

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए हैं

 

दिवाली की यह रात

कैसी काली रात है

जगमगा रही है दुनिया

वह खाली हाथ है

देखकर रोशनी का पर्व

आंसू निकल आए हैं

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए हैं

 

गरीबों की भाई

कहां होती दिवाली है

बाजार सजे है पर

जेब उसकी खाली है

मुन्नी के लिए फुलझड़ी

खुद को बेचकर लाए हैं

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए हैं

 

आंधियों ने अब तक

कितने दीपक बुझाए हैं

जल रहे कुछ जो

बुझ नहीं पाए हैं /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५१ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… २ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… २ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५१ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… २ ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से) 

का हू है जा देह को, चल दें जब प्रान ।

जिन्दै पै तौ पूछ लो, फिर देऔ अस्थान ||

कनक-भवन में हो रओ, मदन महोत्सव आज ।

बिन न्यौते के आ जुरै, भृंग कुरंग समाज ।।

सीस समारे तीन घट, पनघट पे नट जाय ।

एक घूँट में बावरी, तौरो का घट जाय ||

कुच-कुरंग सहमे डरे, घर लइ सेंत कुलाँच |

मदन-अहेरी ने भरी, रोम कूप में आँच ||

बिरछ कलपतरु बिलसरओ, पैरें अंगिया सैत ।

लगीं चिरैयां चहकने, देख देख पर हेत ।

केस कसाई हो गये, कस कस मारे ज्यान ।

बाँद बूँदे धर दये, आदे दूदे प्रान ॥

काजर आदर पा गओ, भओ भाल सिंगार ।

मन मुतियन सो डुल रओ, कब से रओ निहार ।।

कमल कुसुम की करतां, आर्के करै किलोल ।

भौरं भीर भ्रम में परै, ऐसे लोल कपोल ||

तनक मनक झाँकें झकें, ताकें मनों पिनाक ।

आँक बाँक कैं सब गये, नाक सके ना नाक ॥।

चिबुक चिबक कैं रै गओ, करन लगो अरदास ।

नैन नगरिया दूर है, मोय बसा लो पास ||

हाँतन की सोमा गजब, उँगरिन झरै अँजोर ।

सुपयारे कारे परें, नौ देवै झकझोर ॥

संपत जैसे सूम की पिछवाड़े दब जाय ।

वैसइ देख नितम्ब-धन, खियाल चित्त में आय ।।

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विस्मय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विस्मय ? ?

रोज निद्रा तजना,

रोज नया हो जाना,

सारा देखा- भोगा

अतीत में समाना,

शरीर छूटने का भय

सचमुच विस्मय है,

मनुष्य का देहकाल,

अनगिनत मृत्यु और

अनेक जीवन का

अनादि समुच्चय है!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  नवरात्र साधना सोमवार दि. 22 सितम्बर 2025 से बुधवार 1 अक्टूबर तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा-

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः।

इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। माला जप के साथ मौन साधना एवं आत्मपरिष्कार साधना चलेंगी। 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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