हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 727 ⇒ सृजन और विसर्जन ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “सृजन और विसर्जन।)

?अभी अभी # 727 ⇒ सृजन और विसर्जन ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

एक इमारत बनती है, एक इमारत ढहती है, एक दीया जलता है, एक दीया बुझता है, एक कली खिलती है, एक फूल मुरझाता है, बहार के साथ खिजां भी चली ही आती है। चमन में रह के मेरा दिल, वीराना होता जाता है। खुशी के साथ, कुछ गम, भी शामिल होता जाता है।

सृजन में भले ही हमें सुख प्रतीत होता है, लेकिन सृजन की प्रक्रिया इतनी आसान भी नहीं। वैसे देखा जाए तो इस सृष्टि का एक ही सरजनहार है, एक ही पालनहार है और इसे समेटने वाला, विसर्जित करने वाला, संहारक भी एक ही है। सृजन विसर्जन सृष्टि का एक चक्र है, साइकल है, अथवा कहें तो रिसाइकल है।।

बनाना और मिटाना, क्रिएशन और डिस्ट्रक्शन है, आजकल हम जिसे विकास और विनाश में परिभाषित करते हैं। लेकिन देखा जाए तो ये दोनों हैं एक ही, केवल इनकी अवस्था में अंतर है। हमने एक गुब्बारे में हवा भरी, उसे फुलाया, और हवा के अधिक दवाब के कारण वह फूट गया। जितनी हवा का सर्जन हुआ था, वह विसर्जित हो गई।

हवा तो पहले से ही हवा थी, फिर हवा हो गई। कबीर भी यही कहना चाहते हैं ;

पत्ता टूटा डाल से ले गई पवन उड़ाय।

अब के बिछड़े कब मिलेंगे दूर पड़ेंगे जाय।।

सृजन का सिद्धांत भी शायद यही है। ऐसा कहा जाता है, पीड़ा से सृजन होता है, लेकिन सृजन में सुख है, इसलिए सृजन की पीड़ा में भी सुख है। जब एक मूर्तिकार किसी पत्थर को तराशकर मूर्ति बनाता है, तो भले ही उसे परिश्रम लगता हो, आनंद की अनुभूति होती हो, बेचारा पत्थर तो टूटता ही है न, बिखरता ही है न। जब पत्थर टूटता है, बिखरता है, पिघलता है, तब ही तो पत्थर में प्राण आते हैं।

पदार्थ कभी नष्ट नहीं होता, केवल अपना स्वरूप बदलता है। ख़ाक होने से, ख़ाक तो फिर भी बच ही जाती है, वही ख़ाक मिट्टी में मिल फिर कोई नई कहानी लिख जाती है। बीज में वृक्ष की संभावना है, लेकिन एक जला हुआ बीज कभी अंकुरित नहीं होता। सृजन का भी कुछ विधान है।।

क्या सृजन का दिखाई देना, प्रकट होना, अथवा बाहर आना जरूरी है। क्या जो प्रकट नहीं है, प्रकाशित नहीं है, वह सृजन नहीं है। हमारी पृथ्वी के गर्भ में क्या है, ऐसा नहीं है कि हम नहीं जानते। धधकते ज्वालामुखी हैं पृथ्वी के गर्भ में। उनका पृथ्वी के गर्भ में रहना ही सृष्टि का रहस्य है। ज्वालामुखी बाहर, सृष्टि अंदर। क्या कोरोना वायरस मानवता के साथ घिघौना मज़ाक नहीं ? सृजन वही श्रेष्ठ, जो कल्याणकारी हो। इसीलिए सृजन को क्रिएशन कहा गया है। सत्यं, शिवम्, सुंदरम्।

एक सृजनोन्मुख साहित्यसेवी की रचना जब एक पुस्तक का आकार ले लेती है, तब वह बड़ा प्रसन्न होता है। उसे याद आती है सृजन की पीड़ा। अधिक चिंतन से उसे कब्ज़ हो गई थी। घंटों विसर्जन कक्ष में बिताए थे उसने, इसबगोल और सिगरेट के धुएं के छल्लों के बीच। तब जाकर कुछ सृजन हो पाया था। जब सृजन शुरू होता है, तो विसर्जन बुरा मान जाता है। अब पुस्तक छपने के बाद कितनी हलकान, व्हाट ए रीलीफ।।

उसे याद आते हैं वे दिन, जब उसकी रचना संपादक द्वारा अस्वीकृत कर वेस्ट पेपर बास्केट के हवाले कर दी जाती थी। Love’s labour lost वाला फीलिंग आता था उसे। उसका संघर्ष रंग लाया। उसकी रचना ने पहले अखबार का मुंह देखा फिर

सप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्रिकाओं‌ का। बाद में तो कैलेंडर की तरह उसकी रचनाएं छपने लगी। सृजन सुख, छपास सुख, और पारिश्रमिक का सुख, यानी 3 इन 1 का सुख।

आज भी जब उसे कब्ज़ का अहसास होता है, वह जान जाता है, कलम से कुछ बाहर आने वाला है, सृजन सुख से बड़ा कोई सुख नहीं। दुनिया गोल है, जब तक पास में इसबगोल है। पहले सृजन सुख, बाद में विसर्जन सुख।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #283 ☆ गुण और ग़ुनाह… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख गुण और ग़ुनाह। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # 283 ☆

☆ गुण और ग़ुनाह… ☆

‘आदमी के गुण और ग़ुनाह दोनों की कीमत होती है। अंतर सिर्फ़ इतना है कि गुण की कीमत मिलती है और ग़ुनाह की उसे चुकानी पड़ती है।’ हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। गुणों की एवज़ में हमें उनकी कीमत मिलती है; भले वह पग़ार के रूप में हो या मान-सम्मान व पद-प्रतिष्ठा के रूप में हो। इतना ही नहीं, आप श्रद्धेय व वंदनीय भी बन सकते हैं। श्रद्धा मानव के दिव्य गुणों को देखकर उसके प्रति उत्पन्न होती है। यदि हमारे हृदय में उसके प्रति श्रद्धा के साथ प्रेम भाव भी जाग्रत होता है, तो वह भक्ति का रूप धारण कर लेती है। शुक्ल जी भी श्रद्धा व प्रेम के योग को भक्ति स्वीकारते हैं। सो! आदमी को गुणों की कीमत प्राप्त होती है और जहां तक ग़ुनाह का संबंध है, हमें ग़ुनाहों की कीमत चुकानी पड़ती है; जो शारीरिक या मानसिक प्रताड़ना रूप में हो सकती है। इतना ही नहीं, उस स्थिति में मानव की सामाजिक प्रतिष्ठा भी दाँव पर लग सकती है और वह सबकी नज़रों में गिर जाता है। परिवार व समाज की दृष्टि में वह त्याज्य स्वीकारा जाता है। वह न घर का रहता है; न घाट का। उसे सब ओर से प्रताड़ना सहनी पड़ती है और उसका जीवन नरक बन कर रह जाता है।

मानव ग़लतियों का पुतला है। ग़लती हर इंसान से होती है और यदि वह उसके परिणाम को देख स्वयं की स्थिति में परिवर्तन ले आता है, तो उसके ग़ुनाह क्षम्य हो जाते हैं। इसलिए मानव को प्रतिशोध नहीं; प्रायश्चित करने की सीख दी जाती है। परंतु प्रायश्चित मन से होना चाहिए और व्यक्ति को उस कार्य को दोबारा नहीं करना चाहिए। बाल्मीकि जी डाकू थे और प्रायश्चित के पश्चात् उन्होंने रामायण जैसे महान् ग्रंथ की रचना की। तुलसीदास अपनी पत्नी रत्नावली के प्रति बहुत आसक्त थे और उसकी दो पंक्तियों ने उसे महान् लोकनायक कवि बना दिया और वे प्रभु भक्ति में लीन हो गए। उन्होंने रामचरित मानस जैसे महाकाव्य की रचना की, जो हमारी संस्कृति की धरोहर है। कालिदास महान् मूर्ख थे, क्योंकि वे जिस डाल पर बैठे थे; उसी को काट रहे थे। उनकी पत्नी विद्योतमा की लताड़ ने उन्हें महान् साहित्यकार बना दिया। सो! ग़ुनाह करना बुरा नहीं है, परंतु उसे बार-बार दोहराना और उसके चंगुल में फंस कर रह जाना अति- निंदनीय है। उसे इस स्थिति से उबारने में जहां गुरुजन, माता-पिता व प्रियजन सहायक सिद्ध होते हैं; वहीं मानव की प्रबल इच्छा- शक्ति, आत्मविश्वास व दृढ़-निश्चय उसके जीवन की दिशा को बदलने में नींव की ईंट का काम करते हैं।

इस संदर्भ में, मैं आपका ध्यान इस ओर दिलाना चाहूंगी कि यदि ग़ुनाह किसी सद्भावना से किया जाता है, तो वह निंदनीय नहीं है। इसलिए धर्मवीर भारती ने ग़ुनाहों का देवता उपन्यास का सृजन किया,क्योंकि उसके पीछे मानव का प्रयोजन द्रष्टव्य है। यदि मानव में दैवीय गुण निहित हैं;  उसकी सोच सकारात्मक है, तो वह ग़लत काम कर ही नहीं सकता और उसके कदम ग़लत दिशा की ओर अग्रसर हो ही नहीं हो सकते। हाँ! उसके हृदय में प्रेम, स्नेह, सौहार्द, करुणा, सहनशीलता, सहानुभूति, त्याग आदि भाव संचित होने चाहिए। ऐसा व्यक्ति सबकी नज़रों में श्रद्धेय, उपास्य, प्रमण्य  व वंदनीय होता है। ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु तिन मूरत देखी तैसी’ अर्थात् मानव की जैसी सोच, भावना व दृष्टिकोण होता है; उसे वही सब दिखाई देता है और वह उसमें वही तलाशता है। इसलिए सकारात्मक सोच व सत्संगति पर बल दिया जाता है। जैसे चंदन को हाथ में लेने से उसकी महक लंबे समय तक हाथों में बनी रहती है और हमें उसके बदले में मानव को कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। इसके विपरीत यदि आप कोयला हाथ में लेते हो, तो आपके हाथ काले अवश्य हो जाते हैं और आप पर कुसंगति का दोष अवश्य लगता है। कबीरदास जी का यह दोहा तो आपने सुना होगा–’कोयला होय न उजरा, सौ मन साबुन लाय’ अर्थात् व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन लाना अत्यंत दुष्कर कार्य है। परंतु बार-बार अभ्यास करने से मूर्ख भी विद्वान बन सकता है। इसलिए मानव को निराश नहीं होना चाहिए और अपने सत् प्रयास अवश्य जारी रखने चाहिए।

यह कथन कोटिश: सत्य हैं कि यदि व्यक्ति ग़लत संगति में पड़ जाता है, तो उसको लिवा लाना अत्यंत कठिन होता है, क्योंकि ग़लत वस्तुएं अपनी चकाचौंध से उसे आकर्षित करती हैं, जैसे माया रूपी महाठगिनी अपनी हाट सजाए  सबका ध्यान आकर्षित करने में प्रयासरत रहती है।

शेक्सपीयर भी यही कहते हैं कि जो दिखाई देता है; वह सदैव सत्य नहीं होता और हमें छलता है। सो! सुंदर चेहरे पर विश्वास करना स्वयं को छलना व धोखा देना है। इक्कीसवीं सदी में सब धोखा है, छलना है, क्योंकि मानव की कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है। लोग अक्सर मुखौटा धारण कर जीते हैं। इसलिए रिश्ते भी विश्वास के क़ाबिल नहीं रहे। रिश्ते खून के हों या अन्य भौतिक संबंध– भरोसा करने योग्य नहीं हैं। संसार में हर इंसान एक-दूसरे को छल रहा है। इसलिए रिश्तों की अहमियत रही नहीं; जिसका सबसे अधिक खामियाज़ा मासूम बच्चियों को भुगतना पड़ रहा है। अक्सर आसपास के लोग व निकट के संबंधी उनकी अस्मत से खिलवाड़ करते पाए जाते हैं। उनकी स्थिति बगल में छुरी ओर मुंह में राम-राम जैसी होती है। वे एक भी अवसर नहीं चूकय और दुष्कर्म कर डालते हैं, क्योंकि उनकी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई जाती। वास्तव में उनकी आत्मा मर चुकी होती है, परंतु सत्य भले ही देरी से उजागर हो; होता अवश्य है। वैसे भी भगवान के यहां सबका बही-खाता है और उनकी दृष्टि से कोई भी नहीं बच सकता। यह अकाट्य सत्य है कि जन्म-जन्मांतरों के कर्मों का फल मानव को किसी भी जन्म में भोगना अवश्य पड़ता है।

आइए! आज की युवा पीढ़ी की मानसिकता पर दृष्टिपात करें, जो ‘खाओ पीयो,मौज उड़ाओ’ में विश्वास कर ग़ुनाह पर ग़ुनाह करती चली जाती है निश्चिंत होकर और भूल जाती है ‘यह किराये का मकाँ है/ कौन कब तक ठहर पायेगा/ खाली हाथ तू आया है बंदे/ खाली हाथ तू जाएगा।’ यही संसार का नियम है कि इंसान कुछ भी अपने साथ नहीं ले जा सकता। परंतु वह आजीवन अधिकाधिक धन-संपत्ति व सुख- सुविधाएं जुटाने में लगा रहता है। काश! मानव इस सत्य को समझ पाता और देने में विश्वास रखता तथा परहितार्थ कार्य करता, तो उसके ग़ुनाहों की फेहरिस्त इतनी लंबी नहीं होती। अंतकाल में केवल कर्मों की गठरी ही उसके साथ जाती है और कृत-कर्मों के परिणामों से बचना असंभव है।

मानव के सबसे बड़े शत्रु है अहं और मिथ्याभिमान; जो उसे डुबो डालते हैं। अहंनिष्ठ व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ और दूसरों को हेय मानता है। इसलिए वह कभी दयावान नहीं हो सकता। वह दूसरों पर ज़ुल्म ढाने में विश्वास कर सुक़ून पाता है और जब तक व्यक्ति स्वयं को उस तराजू में रखकर नहीं तोलता; वह प्रतिपक्ष के साथ न्याय नहीं कर पाता। सो! कर भला, हो भला अर्थात् अच्छे का परिणाम अच्छा व बुरे का परिणाम सदैव बुरा होता है। शायद! इसीलिए शुभ कर्मण से कबहुं न टरौं’ का संदेश प्रेषित है। गुणों की कीमत हमें आजीवन मिलती है और ग़ुनाहों का परिणाम भी अवश्य भुगतना पड़ता है; उससे बच पाना असंभव है। यह संसार क्षणभंगुर है, देह नश्वर है और मानव शरीर पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि व आकाश तत्वों से बना है। अंत में इस नश्वर देह को पंचतत्वों में विलीन हो जाना है; यही जीवन का कटु सत्य है। इसलिए मानव को ग़ुनाह करने से पूर्व उसके परिणामों पर चिन्तन-मनन अवश्य करना चाहिए। ऐसा करने के पश्चात् ही आप ग़ुनाह न करके दूसरों के हृदय में स्थान पाने का साहस जुटा पाएंगे।

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© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 726 ⇒ सुख सुविधा ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “सुख सुविधा।)

?अभी अभी # 726 ⇒ सुख सुविधा ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

कहते हैं, सुख दुख तो दिन रात और धूप छांव की तरह है, कभी सुख है, कभी दुख है, अभी क्या था, अभी क्या है। लेकिन सुख बड़ा स्वार्थी होता है, उसे जहां भी सुविधा नजर आती है, वह दुख का साथ छोड़ देता है और दुख बेचारा दुविधा में पड़ जाता है।

इसी तरह धन कभी निर्धन के पास नहीं जाता, उसे भी किसी दौलतमंद की तलाश होती है। धन दौलत और सुख सुविधा का एक अलग ही संसार होता है।

आप कह सकते हैं इनकी आपस में सांठगांठ होती है, nexus होता है।

क्या सुख, सुविधा का मोहताज है, क्या जहां सुविधा नहीं है, वहां सुख नहीं है। ऐसा नहीं है। सुख बड़ा खुदगर्ज और अवसरवादी है। क्या जब आज जैसी आधुनिक सुविधाएं नहीं थी, इंसान सुखी नहीं था। क्या बिजली का आविष्कार होने से पहले गर्मी लगने पर, हाथ से पंखा झलते हुए उसे सुख का अहसास नहीं होता था। एक हाथ जब दुखने लग जाता था, तो वह दूसरे हाथ से पंखा झलने लग जाता था। यहां देखिए सुख दुख दोनों साथ साथ चल रहे हैं। एक हाथ भी दुख रहा है, पंखा भी चल रहा है और सुख भी मिल रहा है।।

तब कहां इतनी सुख सुविधाएं थीं, कहां घर घर नल, ट्यूबवेल और डीजल के पंप सेट थे। लोग कुएं पर जाते थे, रस्सी बाल्टी से पानी निकालते थे, और स्नान करते थे। तब क्या उन्हें नहाने में सुख नहीं मिलता था। मेहनत और पसीना बहाने के बाद का सुख, कालांतर में आधुनिक सुविधा और धन दौलत ने हमसे छीन लिया।

इतनी सुख सुविधाओं और धन दौलत के बाद भी सुख में वह स्वाद क्यों नहीं जो असुविधा में रहते हुए, चूल्हे की रोटी और सिल बट्टे पर हाथ से पिसी चटनी में आता था। आज सुख सुविधा की यह स्थिति है कि रात में अचानक बत्ती गुल हो जाने से हम परेशान हो जाते हैं, पावर और नेट अगर एक साथ चला जाए तो सुखी दुखी हो जाते हैं।।

क्या सुख सुविधा और धन दौलत हमें चैन की नींद, सुख शांति और कड़ाके की भूख दे पाया है। अगर इसका उत्तर हां है तो हम जैसा सुखी कोई नहीं। और अगर इसका उत्तर ना है, तो हम जैसा दुखी, निर्धन और कंगाल कोई दूसरा नहीं। कोरोना काल में भी हमारे पास वह सब कुछ था, जो आज है, लेकिन केवल ईश्वर का साथ और इंसानियत ही हमारे काम आई। हमारे बीच कई अपने सगे, करीबी, दोस्त और रिश्तेदार ऐसे थे, जो सबका साथ छोड़ गए। नियति इतनी क्रूर भी हो सकती है, हमने पहली बार महसूस किया।

यह इंसान का स्वभाव है।

उसे सुख का पलना चाहिए, दुख की बैसाखी नहीं। पर क्या करें, हम छुट्टी के दिन चैन से परिवार के बीच बैठे हैं, अचानक फोन पर कोई बुरी खबर आ जाती है। सभी विचलित और दुखी हो जाते हैं। सुख सुविधा, धन दौलत अपनी जगह है। आप भले ही तत्काल प्लेन के टिकट बुक करा लें, कोई भी भौतिक सुख सुविधा आपका दुख कम नहीं कर सकती। यही हमारी नियति है। यही संसार है।।

सुख सुविधा और धन दौलत से ऊपर भी एक संसार संवेदना का है। किसी के सुख दुख में शामिल होना, सबके कल्याण की भावना रखना। हम ईश्वर से अपने लिए, अपने परिवार और परिजनों के लिए क्या नहीं मांगते। कहां कहां मन्नत नहीं मांगते। लेकिन क्या हमारा ध्यान कभी उधर भी जाता है, जो उपेक्षित हैं, असहाय हैं।

सुख सुविधा ही जीवन में सब कुछ नहीं होती। सब कुछ कहां शब्दों में बयां हो पाता है ;

अंधेरे में जो बैठे हैं

नजर उन पर भी कुछ डालो

अरे ओ रोशनी वालों।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 250 ☆ बूंदों के संग-संग… ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ ☆

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना बूंदों के संग-संग…” । इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – आलेख  # 250 ☆ बूंदों के संग-संग

छायी है घनघोर घटाएँ।

ऋतु मतवाली छम- छम आए।।

मेघा बरसे रिमझिम ऐसे।

पायल खनके गोरी जैसे।।

*

सावन की बूंदों में झूमें।

झूले की रस्सी बन घूमें।।

हरियाली की बात निराली।

हाथ रचाए लाली आली।।

मेंहदी भरे हाथ, खनकती हुई चूड़ियाँ सबका मन मोह लेतीं हैं। सावन न केवल बारिश के लिए जाना जाता वरन इसके आते ही शिवार्चन भी पूरे उत्साह के साथ शुरू होता है। कजरी, झूला, मल्हार, रक्षा बंधन, तीज का सिंघारा, घेवर, सजी- धजी सुहागन इन सबकी शोभा देखते ही बनती है। ये पूरा मास जहाँ एक ओर धरती को नव जीवन देता है, तो वहीं दूसरी ओर सभी जीव जंतु मानसिक रूप से खिल उठते हैं। प्रसन्न मन से क्या नहीं किया जा सकता। नागपंचमी का त्योहार सर्प की पूजा व उनकी उपयोगिता को आस्था के साथ समृद्ध करता है। कृष्ण पक्ष से शुक्ल पक्ष तक उमंगित हृदय से इस माह का आनन्द उठाएँ। सावन की पूर्णिमा भाई-बहन के स्नेहिल सूत्र को और भी दृढ़ करती है। मायके व ससुराल दोनों कुलों को जोड़ने वाली कड़ी प्रसन्न रहे तभी सावन चहकेगा, महकेगा।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # 296 – गुरु पूर्णिमा विशेष – सच्चा गुरु… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # 296 सच्चा गुरु… ?

मनुष्य अशेष विद्यार्थी है। प्रति पल कुछ घट रहा है, प्रति पल मनुष्य बढ़ रहा है। घटने का मुग्ध करता विरोधाभास यह कि  प्रति पल, पल भी घट रहा है।

हर पल के घटनाक्रम से मनुष्य कुछ ग्रहण कर रहा है। हर पल अनुभव में वृद्धि हो रही है, हर पल वृद्धत्व समृद्ध हो रहा है।

समृद्धि की इस यात्रा में प्रायः हर पथिक सन्मार्ग का संकेत कर सकने वाले मील के पत्थर को तलाशता है। इसे गुरु, शिक्षक, माँ, पिता, मार्गदर्शक,  सखा, सखी कोई भी नाम दिया जा सकता है।

विशेष बात यह कि जैसे हर पिता किसी का पुत्र भी होता है, उसी तरह अनुयायी या शिष्य,  मार्गदर्शक भी होता है। गुरु वह नहीं जो कहे कि बस मेरे दिखाये मार्ग पर चलो अपितु वह है जो तुम्हारे भीतर अपना मार्ग ढूँढ़ने की प्यास जगा सके। गुरु वह है जो तुम्हें ‘एक्सप्लोर’ कर सके, समृद्ध कर सके। गुरु वह है जो तुम्हारी क्षमताओं को सक्रिय और विकसित कर सके।

एक संत थे जिनके लिए कहा जाता था कि वे ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानते हैं। स्वाभाविक था कि उनके शिष्यों की संख्या में उतरोत्तर वृद्धि होती गई। हरेक के मन में ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग जानने की सुप्त इच्छा थी। एक दिन दैनिक साधना के उपरांत उनके परम शिष्य ने इस बाबत पूछ ही लिया। गुरुजी बोले, मैं तुम्हें ईश्वर तक पहुँचने के मार्गदर्शक तत्व बता सकता हूँ पर अपना मार्ग तुम्हें स्वयं ढूँढ़ना होगा।

ज्ञानी जानता है कि पुल पार करने से नदी पार नहीं होती। नदी पार करने के लिए उसमें कूदना पड़ता है। लहरों के थपेड़ों के साथ अन्य सभी आशंकाओं को भी तैरकर परास्त करना होता है। तैराकी के गुर सिखाये जा सकते हैं पर तैरते समय हरेक को अपने हिस्से की चुनौतियों से स्वयं दो-दो हाथ करने पड़ते हैं।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में समझना चाहें तो जीपीएस लगाकर गंतव्य तक पहुँचा तो जा सकता है पर रास्ते का ज्ञान नहीं होता। रास्ता समझने के लिए स्वयं भटकना होता है। अपना रास्ता स्वयं ढूँढ़ना होता है। स्वयं की क्षमताओं को सक्रिय करना होता है।  स्वयं को स्वयं ही अपना शोध करना होता है, स्वयं को स्वयं ही अपना बोध  करना होता है।

ध्यान रहे कि पथ तो पहले से ही है। तुम उसका अनुसंधान भर करते हो, आविष्कार नहीं। यह भी भान रहे कि पथ का अनुसंधान करनेवाले तुम अकेले नहीं हो, असंख्य दूसरे भी अपने-अपने तरीके से अनुसंधान कर रहे हैं। सारे मार्गों का अंतिम लक्ष्य एक ही है। अत: यह एकाकार का मार्ग है।

सच्चा गुरु वह है जो  तुम्हें एकल नहीं एकाकार की यात्रा कराये। एकाकार ऐसा कि पता ही न चले कि तुम गुरु के साथ यात्रा पर हो या तुम्हारे साथ गुरु यात्रा पर है। दोनों साथ तो चलें पर कोई किसी की उंगली न पकड़े।

यदि ऐसा गुरु तुम्हारे जीवन में है तो तुम धन्य हो। तुम्हारा मार्ग प्रशस्त है।

जिनकी गुरुता ने जीवन का मार्ग सुकर किया, उनका वंदन। जिन्होंने मेरी लघुता में गुरुता देखी, उन्हें नमन।

🕉️ गुरु पूर्णिमा की शुभकामनाएँ 🙏

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रावण साधना रविवार ११ जुलाई 2025 से प्रारंभ होगी। इस साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी। 💥 🕉️

💥 संभव हो तो परिवार के अन्य सदस्यों को भी इससे जोड़ें💥  

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 725 ⇒ वृद्धाश्रम ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी गद्य क्षणिका – “वृद्धाश्रम।)

?अभी अभी # 725 ⇒ वृद्धाश्रम ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मनु महाराज के चार वर्ण घोर कलयुग में शीर्षासन कर रहे हैं। अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष पर आधारित चार आश्रम ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास में वृद्धाश्रम का कहीं नामो निशान ही नहीं है।

किसी ने ठीक ही कहा है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। सौ बरस की ज़िंदगी को अपने हिसाब से चार आश्रमों में बांट देना, आज के युग में कहां की समझदारी है। सह शिक्षा में २५ वर्ष तक कठोर ब्रह्मचर्य का पालन, कहीं बाल विवाह तो कहीं पढ़ने लिखने और नौकरी की तलाश ही में लाखों का सावन चला जाता है। आंखों पर चश्मा चढ़ जाता है, फिर भी घोड़ी चढ़ना नसीब नहीं होता आज की पीढ़ी को। कहीं अटल जी का आदर्श तो कहीं मोदीजी का राष्ट्र सेवा का संकल्प गृहस्थाश्रम की नींव कमजोर करता प्रतीत होता है।।

अब अगर २५ वर्ष की उम्र में गृहस्थाश्रम में प्रवेश ले भी लिया तो शादी, नौकरी, बाल बच्चे, और मकान बनाने के बाद लड़कियों के हाथ पीले करने में ही बाल सफेद हो जाते हैं। कहीं रिटायरमेंट ६० का, तो कहीं ६२ का, अगर प्रोफेसरी कर ली, तो ६५ तक अटके रहो। बी पी, शुगर, कोलेस्ट्रॉल के बाद अब वानप्रस्थ के लिए क्या बचा। बाबा जी का ठुल्लू !

वानप्रस्थ क्षत्रियों के लिए वंशवाद का एक आदर्श उदाहरण है। गृहस्थाश्रम के २५ वर्षों में राज भी कर लो, आठ दस पटरानियों से विवाह कर बच्चों की पलटन खड़ी कर, खुद ५० होते ही वानप्रस्थ के लिए निकल लो। आपके पीछे लूटपाट हो या खून खराबा, पूजा पाठ से अपना परलोक सुधारो। आज की तरह नहीं, कि बेटे बहू का घर में राज और माता पिता वृद्धाश्रम चले आज।।

कहने को तो हर सिक्के के दो पहलू होते हैं, लेकिन वृद्धाश्रम का उजला पक्ष अभी तक अंधकार में ही है। क्या यह पीढ़ियों का टकराव है या फिर नई पीढ़ी का स्वार्थ और खुदगर्ज़ी। क्या इसके लिए एक ही पीढ़ी दोषी है अथवा इसके कुछ मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारण भी हैं। सुना है पूर्व चुनाव आयुक्त टी एन शेषन आखरी समय तक सपत्नीक वृद्धाश्रम में ही रहे। उन्हें भूल जाने की बीमारी हो गई थी। कई मानवीय पहलू हैं इस समस्या के, जिनका हल अभी समाज को ढूंढना है।

न जाने क्यों, वृद्धाश्रम को एक सकारात्मक स्थान नहीं माना जाता। ऐसी मान्यता है कि वहां केवल प्रताड़ित माता पिता ही रहते हैं। औलाद ने या तो मकानों पर कब्जा कर लिया है अथवा सब कुछ अपने नाम कर खुद विदेश चले गए हैं और माता पिता को वृद्धाश्रम में छोड़ गए हैं। जिनकी असहाय की कोई औलाद नहीं होती, ऐसे प्रौढ़ भी वृद्धाश्रम में देखे जा सकते हैं।

विधवाओं की स्थिति देखना हो तो कभी वृंदावन चले जाएं। उनके निमित्त कुछ दान दक्षिणा कर आएं, थोड़ा पुण्य थोड़ा आशीर्वाद कमाएं।।

अगर आदमी थोड़ा पढ़ा लिखा है, व्यावहारिक है। कुछ रिश्वत का पैसा बच्चों से बचा रखा है तो वृद्धाश्रम के बजाय वानप्रस्थ से एक सीढ़ी ऊपर डायरेक्ट सन्यास लेना अधिक समझदारी का काम है।

शहर से थोड़ा दूर कुछ जमीन हथियाकर एक कुटिया नहीं, कॉटेज बनवाएं। कुछ महात्माओं, महामण्डलेश्वरों के प्रवचन करवाएं। एक अच्छे यजमान बनें। अगर ईश्वर और महात्माओं की कृपा हुई, तो संन्यास पक्का। बस मान लिजिये, आपका पुनर्जन्म हुआ। इतना सम्मान, भेंट सम्मान और चढ़ावा, कि आप स्वयं कितनी ही गौ – शालाएं और वृद्धाश्रम संचालित कर अपना जीवन धन्य कर सकते हैं। अन्यथा अपनी पेंशन में संतुष्ट रहें, बाल बच्चों का खयाल रखें।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 724 ⇒ कीड़े मकोड़े ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक आलेख  – “कीड़े मकोड़े।)

?अभी अभी # 724 ⇒ कीड़े मकोड़े ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

Worms & insects 

आप इन्हें कीड़े मकोड़े कहें, या कीट पतंग, रेंगने वाले, उड़ने वाले, जमीन के अंदर रहने वाले, ये जीव बेचारे इस सत्य से अनभिज्ञ हैं, कि ये नर्क का जीवन भोग रहे हैं। भोग में रस होता है और इनकी भी यह भोग योनि है। जीवात्मा और परमात्मा के बीच पसरी माया का भेद, एकमात्र केवल मानव ही जान पाया है, क्योंकि उसमें भेद बुद्धि है।

प्राणी मात्र में ईश्वर का वास होते हुए भी, वह ईश्वर तत्व से कोसों दूर है। मनुष्य जन्म हमें कितनी भोग योनियों के बाद प्राप्त हुआ है, विज्ञान इस सत्य को आज तक नहीं जान पाया। डार्विन का विकासवाद का सिद्धांत एक अलग कहानी कहता है तो हमारे विभिन्न धर्म ग्रंथ कुछ और। कोई मनु की संतान है तो कोई adam eve और आदम हौवा की। लेकिन मनुष्य अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ है और इसीलिए वह अपने आप को ईश्वर के अधिक करीब पाता है।।

सृष्टि के जन्म और प्रलय अथवा कयामत की भी कई गाथाएं हैं। हमारे धर्म ग्रंथों के अनुसार ब्रह्मा जी को इस सृष्टि का जन्मदाता, भगवान विष्णु को पालनकर्ता और शिव को संहारकर्ता माना गया है। एक अज्ञात शक्ति है, उसे आप जितना चाहे नाम और स्वरूप दे सकते हैं। सब कुछ जानते हुए भी, इंसान के हाथ में कुछ नहीं है।

एक समझदार प्राणी होने के कारण आज इंसान विश्व की जनसंख्या को लेकर चिंतित और परेशान है। ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी वह इंसान को ही जिम्मेदार मानता है। सभ्यता की कीमत प्रकृति के साथ खिलवाड़ बंद करके ही चुकाई जा सकती है। मनुष्य को अभी और विकसित होना है, उसे मानव से महामानव और खुद से खुदा यानी इंसान से भगवान बनना है।।

वह आज भी अवतारवाद में विश्वास करता है। वो मसीहा आएगा, और हमें कल्कि अवतार की इतनी आस है कि हम हर महान इंसान में उसे ढूंढने लग जाते हैं। भक्तों के अनुसार तो कई कल्कि अवतार अभी भी इस धरा पर विचर रहे होंगे।

एक कीड़ा मकोड़ा बेचारा इन सबसे अनजान है। उसका तो जन्म ही कितने समय के लिए हुआ है, वह नहीं जानता। उसे कहीं भी कहीं भी, मक्खी और मच्छर की तरह मसल दिया जाता है। जीवः जीवस्य भोजनम्, कौन कब किसका आहार बन जाए, क्या पता।।

रेंगने वाले कीड़े अक्सर ज़मीन के अंदर ही रहते हैं, इधर दिन में बाहर आए और किसी का शिकार बने। बेचारे इसलिए रात में ही बाहर आते हैं। मक्खी मच्छर तो गंदगी में ही पनपते हैं, ईश्वर इन पर इतना मेहरबान है कि इनके जनसंख्या नियत्रण की चिंता तो इंसान भी नहीं कर पाता। ये थोक में पैदा होते हैं, और थोक में मुक्ति पाते हैं। ईश्वर जाने उनकी यात्रा कब शुरू हुई और कब तक चलेगी। कितने जन्म उन्हें और लेने पड़ेंगे, अभी इंसान बनने के लिए। क्या पता कभी बन पाएंगे भी या नहीं।

देवताओं को दुर्लभ यह मानव जन्म हमें तो मिल गया, लेकिन जनसंख्या नियंत्रण के बाद किसको मिलेगा, किसको नहीं मिलेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। इंसान एक समझदार प्राणी है, वह कीड़े मकोड़ों की तरह बच्चे पैदा करके नहीं छोड़ सकता। वह भी जानता है, बच्चे दो ही अच्छे।।

कीड़े मकोड़ों में किसी तरह के विकास की संभावना नहीं, फिर भी वे सृष्टि का एक आवश्यक अंग हैं, वे कभी प्रकृति के नियमों का उल्लंघन नहीं करते, केवल मनुष्य मात्र ही ऐसा प्राणी है, जो उनका दोहन और शोषण करता है।

जिस दिन हम ईश्वर की अहैतुकी कृपा और इन कीट पतंगों और कीड़े मकोड़ों के अस्तित्व का कारण जान जाएंगे, शायद इस सृष्टि और ब्रह्मांड के रहस्य को भी पहचान पाएंगे। सुबह की इस अमृत वेला में एक कॉकरोच मुझे देखकर मुंह छुपा रहा है, और एक मैं हूं, जो उसे देख यह सोच रहा हूं, क्या इसमें भी परमेश्वर का वास है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ न्यूज़ का मोर्स कोड… – ☆ श्री अजीत सिंह, पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन ☆

श्री अजीत सिंह

(हमारे आग्रह पर श्री अजीत सिंह जी (पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन) हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए विचारणीय आलेख, वार्ताएं, संस्मरण साझा करते रहते हैं।  इसके लिए हम उनके हृदय से आभारी हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक संस्मरणीय आलेख न्यूज़ का मोर्स कोड…।)

☆ आलेख – न्यूज़ का मोर्स कोड… – अजीत सिंह ☆

स्कूल, कॉलेज और यूपीएससी के मोर्स कोड कुछ हाथ लगे, तो हम न्यूज का मोर्स कोड सीखने आकाशवाणी की मॉनिटरिंग सर्विस में पहली नौकरी करने 15 जून 1971 को शिमला पहुंचे। पहले ही दिन हम इस बात को लेकर कुछ हैरान परेशान से हुए कि वहां समाचारों को स्टोरी कहा जा रहा था। स्टोरी तो कुत्ते, बिल्ली, बंदर, भालू, शेर आदि के काल्पनिक विवरण होते हैं, पंचतंत्र की तरह। लड़ते झगड़ते, बतियाते लोगों के विवरण कहानी कैसे हो सकते हैं!

कोई बुद्धु समझ मज़ाक न उड़ाए, इस डर से हमने पूछा भी नहीं। बस कबूल करते गए। आज 54 साल बाद आत्म मंथन से मुझे लगता है कि आदमी और जानवरों की कहानियों में कोई बड़ा फर्क नहीं है। और टीवी न्यूज चैनलों की प्राइम टाइम बहस को देख कर तो बिल्कुल नहीं लगता।

इन दिनों वॉट्सएप पर वायरल एक चुटकुला पढ़ा। पड़ोस का एक व्यक्ति एक लड़की से पूछता है, तुम क्या जॉब करती हो?

“जी मैं कुत्ते लड़वाने का काम करती हूं, लड़की ने कहा।

व्यक्ति ने पूछा, यह कैसी जॉब हुई, कुत्ते लड़वाने की जॉब?

लड़की ने कहा, जी मैं न्यूज चैनल की एंकर हूं।

यह न्यूज का मुद्दा है ही झगड़े का मुद्दा। सब शांत हो, हंसी खुशी का माहौल हो, तो कोई खबर नहीं होती। झगड़ा हो, गाली गलौज हो, मार पीट हो, तोड़ फोड़ हो, जितनी बड़ी हो, इतनी ही बड़ी न्यूज होती है।

न्यूज़ के चलन ने दादी नानी की कहानियां ख़तम कर दी हैं।

डर, सनसनी, जासूसी, ड्रग्स, सेक्स और क्या क्या मसाले डाले जाते हैं न्यूज बनाने के लिए,  इसे समझना ही न्यूज के मोर्स कोड को समझना है।

शुक्र है हम सब कुछ सीखने से बच गए। आकाशवाणी पर उन दिनों साफ सुथरे ढंग से सच्ची बात कहने का समय था।

आज भी बचा है, पर श्रोता दर्शक तो नीजि चैनल ले गए। सिग्नल की कवरेज तो 100% है, पर इसे पकड़ने वाले कितने हैं?

मास मीडिया लत डालता है, फिर आपकी जेब से पैसे निकालता है कि आपको पता भी नहीं लगता। और अब तो हमारे दिमाग की भी चोरी हो रही है।

बड़ा टेढ़ा मोर्स कोड है आजकल के सोशल मीडिया का। हर नागरिक को स्मार्टफोन से ज़्यादा स्मार्ट बनने की जरूरत है। यही कह रही थी पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ की प्रो अर्चना सिंह गत दिवस हमारे वेबिनार में।

बीते युग की बात कर रहा हूं, जब समाचार टेलीग्राम से भेजे जाते थे, मोर्स कोड की विधि से।

अपने मुंह मियां मिट्ठू होने का संभावित इल्ज़ाम अपने सिर लेते हुए मैं कहना चाहता हूं कि 70 के दशक में जब मैं  संवाददाता बना तो, सही या ग़लत, मुझे अक्सर ऐसा लगता था कि संवाददाता के रूप में मेरा पद आकाशवाणी में सबसे बढ़िया पद था। बड़े बड़े लोगों के संग बातचीत, देश विदेश की यात्राएं, प्रेस कॉन्फ्रेंस और इंटरव्यू, डिनर व लंच, घर व दफ्तर में एस टी डी सुविधा के फोन और राष्ट्रीय समाचार  बुलेटिन में बाइलाइन। और तो और, दफ्तर में आने जाने की कोई समय बद्धता भी नहीं। स्टोरी फाइल की और निकल गए । प्रेस क्लब की ओर या फिर कहीं और गपशप और खाने पीने  के लिए।

इतना कुछ तो  था इस पद के साथ। और क्या चाहिए था! पर धीरे धीरे प्रैसनोट व प्रेस कॉन्फ्रेंस कुछ रूटीन और बोरिंग से लगने लगे। मुझे साहित्यिक गोष्ठियों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जाना अच्छा लगता था। मेरी पत्रकारिता पर साहित्य का असर होना शुरू हो गया था। कुछ निखार दिखाई देता था। मैंने साहित्य की शैली  तो पकड़ी पर कल्पना का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं पड़ी। वो कहते हैं न sometimes facts are stranger than fiction. मेरे सामने फील्ड में ऐसे ही तथ्य थे जो साहित्यिक कल्पना जैसे लगते थे। मैंने जो लिखा, वह कहानियां नहीं हैं, रिपोर्ट्स हैं।

साहित्यिक कार्यक्रमों में  पत्रकार नहीं होते थे। उन्हे वहां कोई न्यूज की संभावना नहीं लगती थी। पर शब्दों पर लेखकों और कवियों की जो पकड़ थी, वह पत्रकारिता में अक्सर नहीं होती थी। मुझे साहित्य में रस आने लगा। पत्रकारिता को जल्दी में लिखा साहित्य कहा जाता है पर साहित्य तो जल्दबाजी में लिखा ही नहीं जा सकता। साहित्य में ठहराव होता है। पत्रकारिता में होड़ लगी रहती है कौन किस से पहले खबर प्रसारित करा लेता है। बदहवास हो जाते हैं पत्रकार इस भाग दौड़ में। कुछ समाचारों को गड्डमगड्डा भी कर जाते हैं। कुछ पत्रकार समाचारों को बढ़ा चढ़ा कर भेजते हैं ताकि उनकी खबर छपे, कहीं समाचार एजेंसी बाज़ी न मार जाएं और उन पर अगले दिन संपादक की डांट पड़े। 

उन दिनों खबर  सबसे पहले आकाशवाणी से ही जाती थी। इसके लिए मुझे ज़्यादा अलर्ट रहना पड़ता था। धीरे धीरे समझ में आने लगा कि तथ्य इकट्ठे कर लेने मात्र से रिपोर्टिंग नहीं होती।

उसे 5 W और 1 H के पारम्परिक स्टाइल में लिखा जाए या वॉयसकास्ट के रूप में पर्सनल टच के साथ। न्यूज़ मैनेजमेंट भी ज़रूरी है। अर्ली मॉर्निंग, लेट मॉर्निंग, अर्ली मिड डे, लेट मिड डे , अर्ली इवनिंग लेट इवनिंग, 6 टाइमजोन  होते थे एक खबर के। वॉइस कास्ट, न्यूजरील, सामयिकी, स्पॉटलाइट, मॉर्निंग कमेंट्री , तब्सरा, कितनी ही संभावनाएं हर खबर में ढूंढ कर रखनी पड़ती थी।

खबर का इंट्रो या मुखड़ा लिखना आसान नहीं होता। इसके लिए पत्रकारों को मेंटल कांस्टिपेशन हो जाती है। लिखते हैं, काटते हैं, फिर लिखते हैं। मुखड़ा लिख लिया जाय तो फिर काम सीधा हो जाता है।

न्यूज़ का मोर्स कोड धीरे धीरे समझ में आता है।

रिपोर्टिंग सामयिक इतिहास लिखने की प्रक्रिया भी है। रिपोर्टर इतिहासिक घटनाओं का गवाह होता है।

संवाददाता के तौर पर मेरी कार्य स्थली जम्मू कश्मीर राज्य रहा।  13 वर्ष जम्मू में और करीबन साढ़े 6 साल श्रीनगर में।

कठिन परिस्थितियों में काम किया। ठीक ही हो गया कुल मिला कर।  ‘कारेस्पांडेंट ऑफ द  ईयर’ नाम से आकाशवाणी पुरस्कार भी मिला । एक ‘सर्टिफिकेट ऑफ मेरिट’ भी मिला।

दिल्ली में न्यूज सर्विसेज डिविजन का न्यूजरूम बड़ी अजीब जगह है। वहां आपकी सर्विस  सेनियोरिटी नहीं चलती। प्रोफेशनल योग्यता की सेनियोरिटी चलती है। बड़े सीनियर अधिकारी छोटे बुलेटिन कर रहे होते हैं और जूनियर अधिकारी एडिटर इन चार्ज बने होते हैं। बड़े धुरंधर किस्म के लोग हैं वहां। कोई स्टेनोग्राफर चिल्ला कर न्यूज एडिटर को कहता है, सर, पार्लियामेंट से पहले द नहीं लगता। अगर आपने क्यों कह दिया तो सुनने को मिल सकता है, अंग्रेज़ी में क्यों नहीं चलता सर।

डी जी हरीश अवस्थी की न्यूज मीटिंग में जाने से लोग डरते थे। पर आदमी कमाल का प्रोफेशनल था। पहली क्लास के बच्चों की तरह हम उनसे न्यूज के  गुर सीखते थे। किसी को तो भयंकर किस्म की डांट भी पड़ती थी। इस सब के बीच न्यूज़ का मोर्स कोड सरल होता गया।

नौकरी से रिटायर हुए तो क्या करें। प्रेस नोट, प्रेस कॉन्फ्रेंस बंद हो गए, अब कैसे और किसकी रिपोर्टिंग करें!

हमने अपने आपको चुनौती दी कि अब आम आदमी की रिपोर्टिंग करेंगे। आम आदमी वह जिसका नाम, काम, संघर्ष और उपलब्धि मीडिया के लिए अक्सर कोई खबर नहीं बनती।

वानप्रस्थ सीनियर सिटीजन क्लब नाम से 8-10 साथियों के साथ मिलकर एक संस्था बनाई। हर सदस्य के विस्तृत आत्म परिचय का कार्यक्रम शुरू हुआ। मैंने रोचक न्यूज फीचर लिख कर स्थानीय समाचार पत्रों को भेजना शुरू किया। यह सिलसिला आज 18  साल बाद भी जारी है और संस्था के सदस्यों की संख्या 140 के करीब पहुंच गई है।

दिमाग में कुछ अजीब से ख्याल आते हैं। दिल को छूने वाली यादें उमड़ने लगती हैं।

लिखने पर मज़बूर कर देती हैं।

बेकस का मकान’,

‘ हरसिंहपुरा की पंजाबी बेटियां, क्यूं बार बार लेती हैं गांव का नाम’

‘छत्रपाल की याद में’,

‘श्रीनगर में सीआरपीएफ की लड़कियां’,

‘रेडियो अनाऊंसर का रेलवे स्टेशन’ ,

‘पूरे परिवार का जन्मदिन 15 अगस्त को ‘,

‘Jingoism, on the rise or on the wane?

‘पीली मंढोरी में जसिया को ढूढने आए थे पंडित जसराज ‘, ‘पितृपक्ष में पिता-स्मृति’

और

‘सुमित्रा ने कहा था…’ 

जैसे लेख बन जाते हैं।

अपने पिता और पत्नी पर लेख लिखना आसान भी है क्योंकि आपसे बेहतर उन्हे कौन जानता है। और मुश्किल भी कि अंतरंग बातों को पाठकों के लिए रुचिकर बना पाना आसान नहीं होता। निजता का सवाल भी है।

कई बार मुझे लगता है कि मानव सभ्यता के विकास में किसी कारण यह त्रुटि आ गई है कि हमें खून खराबा, लड़ाई झगडे, मृत्यु और विध्वंस में न्यूज नजर आती है जिसे हम अति उत्साहित हो प्रचारित करते हैं जबकि हंसते खेलते बच्चों, लहलहाते फूलों, उत्सव मनाते समुदायों में कोई न्यूज नजर नहीं आती। समाज में जैसी  सूचनाएं प्रचारित होगी, वैसा ही समाज बन जाएगा। आजकल हर व्यक्ति ऐसे बहस करता है जैसे टेलीविजन चैनलों पर होती है, उद्वेग और क्रोध से भरी हुई बातें।

गुड न्यूज जैसे गुम ही हो गई है। मैं गुड न्यूज ढूंढ़ता हूं। मेरा यह भी मानना है कि हर व्यक्ति के पास बड़ी कहानियां होती हैं। अगर ढंग से पूछा जाए तो वह बताने का इच्छुक भी है। मैं यही कोशिश करता हूं अपने सीमित सामर्थ्य के साथ।

और पिछले छह साल से मैं गुणीजनों के कई ग्रुपों से जुड़ा हूं जहां मुझे अति  प्रेम और  कुछ करने का उत्साह व प्रेरणा मिलती है।

न्यूज़ का मोर्स कोड शायद धीरे धीरे लेखन के मोर्स कोड की तरफ अग्रसर हो रहा है। मोर्स कोड वाला टेलीग्राम भेजने का सिस्टम अब बंद हो चुका है। नई तकनीक आ रही हैं। उन्हीं के अनुरूप लेखन शैली भी बदल रही हैं। अब फोन पर किसी भी लिपि में बोलकर लिखा और इसे भेजा जा सकता है। सुविधा के अनुरूप मेरी शैली भी बदल रही है। कुछ मित्र कहते हैं मेरा लेखन है तो पत्रकारिता पर इसकी शैली साहित्यिक लगती है।

मैं आपकी कहानियां सुनना चाहता हूं। अपनी कहानियां सुनाना चाहता हूं।

न्यूज़ का मोर्स कोड भी रोचक है, नीरस नहीं।

कठिन है, पर आनंददायक भी। मैंने इसे समझने की कोशिश भी की और इसे अपने अनुरूप ढालने की भी।

धन्यवाद मित्र विजय दीक्षित जी।

एक नई phrase देने के लिए, न्यूज का मोर्स कोड

☆ ☆ ☆ 

 © श्री अजीत सिंह

पूर्व समाचार निदेशक, दूरदर्शन हिसार।

मो : 9466647037

26.01.2025

(लेखक श्री अजीत सिंह हिसार से स्वतंत्र पत्रकार हैं । वे 2006 में दूरदर्शन केंद्र हिसार के समाचार निदेशक के पद से सेवानिवृत्त हुए।)

ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # 725 ⇒ घंटियाँ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी आलेख – “घंटियाँ।)

?अभी अभी # 724 ⇒ घंटियाँ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

घण्टा बड़ा होता है और घंटियाँ छोटी। 24 घंटे मिलकर एक दिन बनता है, जिसमें रात भी शामिल होती है। 60 मिनिट मिलकर एक घंटा बना सकते हैं लेकिन सभी घंटियाँ मिल-जुलकर एक घण्टा नहीं बना सकती। घण्टा, घण्टा है, घंटी घंटी।

घंटा-घर में कोई घंटा नहीं होता, एक घड़ी ज़रूर होती है, जो हर घंटे का अहसास दिलाती है,

टन टन की ध्वनि पैदा करती है। घड़ी भले ही खराब हो, घंटा घर को कोई फर्क नहीं पड़ता।।

घरों में पूजा-घर में घंटियाँ होती हैं, जो आरती के समय बजाई जाती है। बड़े बड़े मंदिरों में छोटे-बड़े घंटे-घंटियाँ बज उठती हैं, सुबह शाम, जब आरती का वक्त होता है।

आते-जाते, घंटों से छेड़छाड़ करना, छोटे बच्चों को गोद में लेकर घंटी बजाना बड़ा सुखद और मनोरंजक मंज़र होता है।

बचपन में अपने पाँवों पर खड़े होते ही पिताजी ने एक पहिये वाली साईकल दिलवा दी थी, जिसमें एक घंटी लगी हुई थी। घूमते पहिये के साथ-साथ घंटी की भी आवाज़ आती थी। दो पहिये की साईकल में अगर घंटी ना हो, तो चालान बन जाता था।

समय के साथ घंटी का स्थान हॉर्न ने ले लिया। कभी किसी घंटी वाले को निवेदन नहीं करना पड़ता था, कृपया घंटी बजाएँ।

जब कि भारी वाहनों के पीछे उसूलन लिखना पड़ता है, हॉर्न प्लीज।।

घर की डोअर बेल, दूध वाले की घंटी और गर्मी में कुल्फी-आइसक्रीम की घंटी पर सबका ध्यान रहता था। कितना भी पढ़ाकू छात्र क्यों न हो, छुट्टी की घंटी बरबस ध्यान आकर्षित कर ही लेती थी। गाँव में तो जानवरों के गले में भी घंटी बाँधने का रिवाज है। कहीं जंगल में चरने बहुत दूर न निकल जाए।

एक कहावत मेरे गले आज तक नहीं उतरी ! बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे ? ठीक है, बिल्ली शेर की मौसी है, लेकिन इतनी खूँखार भी नहीं। कभी कभी मेरी बिल्ली मुझसे भी म्याऊं कर लेती है, लेकिन मेरे लिए मेरी बिल्ली के गले में घंटी बाँधना कोई टेढ़ी खीर नहीं। लेकिन केवल किसी कहावत को गलत सिद्ध करने के लिए बिल्ली की मर्ज़ी के ख़िलाफ़ गले में घंटी बाँधना मुझे मंजूर नहीं। चोरी-चुपके चूहे का शिकार करने वाली बिल्ली क्या घंटी बजाकर शिकार करेगी ! बिल्ली के गले में घंटी बाँधना, उसके पेट पर लात मारने जैसा है।।

बच्चों के पाँव में पैजनियाँ और किसी नृत्यांगना के पाँव में घुँघरू, घंटी का ही, लघुतम स्वरूप है। जो कानों में मधुर रस घोल दे, वह घंटी। किसी की फ़क़त याद से ही दिल में घंटियाँ बजनी शुरू हो जाएं, वह स्थिति सबसे श्रेयस्कर है। ऐसे भी अवसर आते हैं जीवन में, साहब घंटी बजाते रह जाते हैं, और चपरासी का कहीं पता नहीं रहता। और वह बाहर बैठा साहब को कोस रहा होता है, क्या घर में भी बीवी को घंटी बजाकर बुलाते हैं। अपने हाथ से एक ग्लास पानी तक नहीं पी सकते साहबज़ादे।

सभी आवाज़ों के ऊपर अन्तरात्मा की आवाज़ की तरह, अचानक टेलीफोन की घंटी मेरा ध्यान आकर्षित करती है।

जब तक ना उठाओ, घर को सर पर उठा लेती है। मैं फ़ोन उठाकर घंटी की ध्वनि को विराम दे देता हूँ।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # 138 – देश-परदेश – राष्ट्रीय घड़ी दिवस: 19 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # 138 ☆ देश-परदेश – राष्ट्रीय घड़ी दिवस: 19 जून ☆ श्री राकेश कुमार ☆

घड़ी के उपयोग द्वारा, समय के सदुपयोग के लिए घड़ी का प्रचार प्रसार करने के लिए आज 19 जून को राष्ट्रीय घड़ी दिवस के रूप में चयन किया गया होगा।

सन 1950 तक तो लोग समय देखने के लिए घंटाघर जाते थे। ये सुविधा तो मात्र कुछ शहरों में हुआ करती थी। रेडियो भी समय की जानकारी प्राप्त करने का एक मुख्य स्रोत हुआ करता था। साठ का दशक आते आते घरों में घड़ी नामक यंत्र पैर पसारने लगा था। अमीरों के यहां पेंडुलम वाली घड़ी होती थी। एच एम टी ने लोगों को कलाई में घड़ी बांधना सिखाया था। चाबी से चलने वाली अलार्म घड़ी ने हमारे अनेकों सपनों को अधूरा रखने का कार्य बखूबी निभाया था।

हर कमरे में घड़ी, हर कलाई घड़ी, हर हाथ के मोबाइल में घड़ी पहुंच चुकी है। इस के बावजूद समय नहीं है, समय देखने का, हम अधिकतर सब जगह देरी से ही पहुंचते हैं।

क्या फ़ायदा ऐसी घड़ियों का जो समय का अनुशासन सिखाने में असफल रही हो। हवाई जहाज से यात्रा करने वाले औसतन 5% यात्री अपनी यात्रा नहीं कर पाते हैं। ट्रेन और बस के हालात इस से भी गए बीते हैं।

देरी से गंतव्य पर पहुंचने का ठीकरा अब ट्रैफिक जाम के माथे मढ़ना पुराना बहाना माना जाता है। स्वयं की अपनी इस लेट लतीफी की आदत को “राष्ट्रीय समय सूचक” ( I S D) तक कहने में हम सब अग्रणी रहते हैं।

ईश्वर ने पूरे विश्व में 24 घंटे का समय सब को दिया है। लोग फिर भी कह देते है, मरने का भी टाइम नहीं है। घड़ी के नाम से अब स्मार्ट वॉच भी आ गई है, लेकिन समय की पाबंदी को ना मानने वाले, जीवन में कभी भी स्मार्ट नहीं बन सकते हैं।

आप सबने भी इस फालतू का लेख पढ़ने में बहुत समय व्यर्थ कर दिया है, क्योंकि तय समय पर कार्य करने की खराब आदत अब क्या ठीक होगी।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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