हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १६० ☆ मेरा साया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “मेरा साया” ।)

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १६० ☆

☆ मेरा साया ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

जब भी देखा दर्पन मैंने

मैं ही नज़र आया

मुझसे ही घबराया पल-पल

मेरा ही साया।

 

तृष्णा मरी

न मरा अहम

बिछा मोह सोया

मैली चादर

धोयी मन का

मैल नहीं धोया

 

करता रहा सवाल स्वयं से

जब भी भरमाया।

 

झूठ चाल

शकुनि के जैसी

सत्य युधिष्ठिर सा

भरी सभा में

मौन खड़ा है

धर्म निरुत्तर-सा

 

अट्टहास करता दु:शासन

जनमन थर्राया।

 

रामराज्य की

सुगढ़ कल्पना

बाट जोहता मन

मर्यादा की

लाँघ देहरी

सब संकल्प हवन

 

निर्वासित सा जीवन जीते

निशाचरी माया।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विरोधाभास… ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विरोधाभास? ?

किताब पढ़ना

गाने सुनना

टीवी देखना

तेल लगाना

औंधे पड़ना

शवासन करना

चक्कर लगाना

दवाई खाना..,

नींद के लिए रोजाना

हजार हथकंडे

अपनाता है आदमी,

जाने क्या है

आजीवन सोने को उन्मत्त

अंतिम नींद से

घबराता है आदमी!

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी। 🕉️

💥 इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।💥

💥 साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।🕉️

💥 हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १६७ ☆ छू के फूलों से बदन को  देखू… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “छू के फूलों से बदन को  देखू…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १६७ ☆

✍ छू के फूलों से बदन को  देखू… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

लाख मशगूल हों फ़ुर्सत होगी

आपको जब भी ज़रूरत होगी

 *

बच यहाँ सकते गुनाहों से तुम

एक ऊपर भी अदालत होगी

 *

ऐब आयें न नज़र फिर उसके

आपको उससे जो निस्बत होगी

 *

ख़ैर-अंदेश रिआया की बने

कब मुआफ़िक ये हुक़ूमत होगी

 *

छू के फूलों से बदन को  देखू

आपकी जब भी इजाज़त होगी

 *

साथ मज़लूम के जो होगें खड़े

उनमें ही अस्ल जसारत होगी

 *

दिल मेरा लेके अगर बदलोगे

ये अमानत में ख़यानत होगी

 *

उसको कैसे मैं कहूँ ज़िंदा है

ख़ून में जब न हरारत होगी

 *

ऐ अरुण होगी जमीं जन्नत सी

ख़त्म जब सबकी अज़ीयत होगी

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ७१ – नाव का धर्म… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – नाव का धर्म।)

☆ हेमंत साहित्य # ७१ ☆

✍ नाव का धर्म… ☆ श्री हेमंत तारे  

यूँ तो,

क्यों हो कोई संदेह

नाव का धर्म ही होता है

डूबते को पार लगाना,

निष्पाप, निष्पक्ष रहकर

मदद का हाथ बढ़ाना।

 

पर हर नाव

ऐसी होती नही!

कुछ नावें,

नावों के झुंड में

दबी-छिपी रहती हैं,

कुटिल,

मत्सर,

और विघ्नसंतोषक,

पतवार को समेटे

आस-पास तैरती कातर आंखों से बचाये ।

 

और मुमकिन कहां

उन्हें पहचान पाना

हर समय,

हर दौर,

हर ज़रूरत के पल।

 

बेहतर है,

तय कर ली जाएँ दूरियाँ

अपने ही दम,

उम्र के हर दौर

बिना किसी नाव,

बिना किसी सहारे

अपने ही दम।

 

सीख लिया जाए

तैरना,

लढना,

निपटना,

उलझी गुत्थियाँ

अपने ही हाथों सुलझाना।

 

हर नाव

किनारे नहीं लगाती;

कुछ नावों का धर्म

होता है जुदा

यथा,

 

हम तो डूबेंगे सनम,

तुम्हें भी

ले डूबेंगे साथ।

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ये मन तुम बिन कहीं और लगता नहीं  ☆ श्री अनिल वमोरकर ☆

श्री अनिल वमोरकर 

☆ कविता – ये मन तुम बिन कहीं और लगता नहीं  ☆ श्री अनिल वमोरकर ☆

ऐ माँ

ये मन

तुम  बिन

कही और

लगता नहीं..

 

ब्राह्ममुहुर्त

मानसपूजा में

ध्यान में

फिर सगुण पूजा में,

जप, विष्णू सहस्त्रनाम में

मन रमता,

तुम  बिन मन….

 

प्रसाद पश्चात

आपके द्वारा लिखीत

पुस्तक में खो जाता,

उसीमे मन मेरा रमता,

तुम बिन मन….

 

सात बजे की

आरती और जाप

रात का सत्संग

आनंदने मन डोलता,

तुम  बिन मन…

 

हनुमान चालीसा

पढकर जब सोता हूॅं

तेरी गोंद में पाता,

भाग्य को नमन करता,

तुम  बिन मन…

 

©  श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १६२ – बुन्देली कविता – ”कौन बख्त के मारे नइयाँ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – कौन बख्त के मारे नइयाँ।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६२ ☆

☆  बुन्देली कविता – कौन बख्त के मारे नइयाँ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

कौन बख्त के मारे नइयाँ

कइ नें दाग उघारे नइयाँ

कौन गवाही दैबे जैहै

प्राण कौन खें प्यारे नइयाँ

 *

उन दलितों के रंग न देखौ

कौनऊँ मन के कारे नइयाँ

 *

बाड़, बिजूके काम न दैहें

जे साँचे रखबारे नइयाँ

 *

कथरी में लुक के घी खा रय

बे कौनऊँ बेचारे नइयाँ

 *

महनत की कन्दील बुझै नें

छँटे अबै इंधयारे नइयाँ

 *

धन की बाजी जीत गए तुम

‘भगवत’ मन सें हारे नइयाँ

 

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “उसका आदमी…” ☆ श्री आशिष मुळे ☆

श्री आशिष मुळे

☆ कविता ☆

☆ “उसका आदमी…☆ श्री आशिष मुळे ☆

गाली उसे देते हो,

मगर भिड़ते अँधेरे से हो,

इतना साहस कैसे लाते हो—

क्या तुम आदमी उसके हो?

 *

दुकानें उसकी आबाद हैं,

मगर तुम दिवालिया हो,

हँसते फिर भी रहते हो—

लगता है उसी के आदमी हो।

 *

कटघरे में नैतिकता के

खड़े जैसे गुनहगार हो,

सदियों से जलते आए हो,

फिर भी आज ज़िंदा हो।

 *

पत्थर तुमने ठुकराए हैं,

पर इंसान बचाते हो,

नाम उसका लेते नहीं—

काम उसी का करते हो।

 *

ज़रूर, तुम आदमी उसके हो,

हाँ, तुम आदमी उसके हो…

© श्री आशिष मुळे

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २३४ – मनोज के दोहे – कविता ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है “मनोज के दोहे – कविता । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २३४ ☆

☆  मनोज के दोहे – कविता  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

कविता संग की दोस्ती, थामा उसका हाथ।

मुझसे जब-जब रूठती, तब-तब हुआ अनाथ।।

*

प्रश्न करे जग बावरा, लिखता जो दिन रात ।

कौन पढ़ेगा यह सभी, तेरे दिल की बात ।।

*

कुछ अपनेे ही कोसते, देख मेरा यह काज।

प्रतिपल समय गवाँ रहा, आती है ना लाज।।

*

तन की ताकत के लिये, पौष्टिक हैं आहार ।

मन की शक्ती के लिये, जीवन में सुविचार ।।

*

कविता कभी न चाहती, मानवता पर घात ।

जिसमें जग का हित रहे, उसे सुहाती बात ।।

*

मिटे विषमता देश की, अरू मानव मन भेद ।

प्रगति राह में सब बढ़ें, व्यर्थ बहे न श्वेद ।।

*

जगे हृदय संवेदना, या बदले परिवेश ।

यही सोच कर लिख रहा, शायद बदले देश ।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ टीस अभी बाकी है ☆ श्री रमाकांत ताम्रकार ☆

श्री रमाकांत ताम्रकार

☆ कविता – टीस अभी बाकी है श्री रमाकांत ताम्रकार 

हम एक बाड़े में रहते थे

14 किरायेदारों का एक परिवार

और केवल तीन पाखाने

एक पर मकान मालिक

के दामाद का कब्जा

सिर्फ तेरह परिवार को केवल 2

और वह आती जर्जर काया वाली

साफ कर जाती तीनों पाखाने

बिल्कुल चमचमाते से

कोई उन्हें बुआ बोलता

तो कोई दादी

वह लोगों की बड़ी अम्मा

बड़ी बाई और न जाने

कितने रिश्तों में बँधी थी वो

हाँ हम बच्चों के लिए

लाती वह परचून की दुकान से

ठंडी मीठी पिपरमेंट की गोलियां

हम बड़े ही चाव से खाते

और वह हमसे एसे बतियाती

दुलारती जैसे हम उनके बच्चे हो

त्योहारों के समय उनकी

चौदह परिवार आवभगत करते

और तो और रक्षाबंधन पर

वह इन चौदह परिवारों के

मुँह बोले भाइयों को

पाट की  राखी बांधती.

एक दिन वह बाड़ा बिक गया

सब तिरर  बिरर हो गये.

और खो गए वो प्यारे रिश्ते

हम भी खो गए

दुनियां की स्याह गालियों में

पर प्रेम,  स्नेह, अपनत्व की

टीस अभी भी बाकी है.

एक प्रकाश पुंज की तरह.

© श्री रमाकान्त ताम्रकार

संपर्क – 423 कमला नेहरू नगर, जबलपुर। 

मोबाइल 9926660150

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर / सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’   ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७७ – चौपाई – श्री गणेशाय नमः ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है आपकी  “चौपाई – श्री गणेशाय नमः”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७७ ☆

🌻 चौपाई – श्री गणेशाय नमः 🌻

शंकर  सुवन  भवानी  नंदन,  वेद  मंत्र  से  पूजन   वंदन।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

लंबोदर   है   सुंदर   प्यारे, हैं   अनंत   महिमा   है  न्यारे।

कृपा दृष्टि से पूरन  काजा, हे  गणनायक  मूषक  राजा।।

चरण   पखारे   निशदिन   सेवा,  यमुना गंगा निर्मल रेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

चार भुजाएं छबि है न्यारी, कटि पीताम्बर तुमको प्यारी।

एक  दंत  है  भगवन  धारें, संकट  विपदा  सबकी  टारें।।

बाल   मुकुंद   मनोहर   पुरवा, भोग  लगे  है  लड्डू  मेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

वक्रतुड  की  बात  निराली,  मंद –  मंद  मुस्काते  लाली।

माँ  गौरी  आँखों  के  तारें,  अरि  दानव   है तुमसे हारे।।

लौंग  पान से  सज्जित मेवा, चढ़ता  छप्पन  भोग  कलेवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा, भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

*

मातु-पिता  सर्वोत्तम  जानें, बुध्दि  देव  सब  तुमको  मानें।

रिद्धि-सिद्धि  है संग तिहारे,  बाल सखा सब रोज  पधारे।।

आन    विराजे    मेरे    ठेवा,  मंगल   मूरत   मंगल    देवा।

ज्ञान उजागर गुण के देवा,  भक्त करें सब मिलकर सेवा।।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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