हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २१० – कर्तव्य भाव का बोध ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “कर्तव्य भाव का बोध । आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २१० – कर्तव्य भाव का बोध  ☆

सेना करे कमाल देखिए।

दुश्मन की हर चाल देखिए।।

 *

सीमा पर चौकस रहते हैं।

राष्ट्र भक्ति की ढाल देखिए।।

 *

जो भी कदम मिला कर बढ़ते।

उनका ऊँचा भाल  देखिए।।

 *

अनुशासन में पगे हुए सब।

दुश्मन है बेहाल  देखिए।।

 *

करें सुरक्षा हम सबकी वे।

रखें हमारा ख्याल देखिए।।

कर्तव्य भाव का बोध सदा।

इस पर नहीं सवाल देखिए।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २७२ – आकाशवाणी ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – आकाशवाणी।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७२ – आकाशवाणी ✍

(काव्य संग्रहशब्द नहीं रहे शब्द से )

 

ये आकाशवाणी है

अब आप समाचार सुनिये ।

कल बिजली का बिल आयेगा

मकान मालिक चीखेगा

परसों बुआ आयेंगी

चिट्ठी न मिलने पर

दादा जी नाराज हैं

बहू के अस्पताल पहुँचने की

संभावना है

बउ के घुटनों में दर्द है

एम.आर.दो माह बाद मिलेगा

अगले चौबीस घंटे

मौसम खराब रहेगा

गरज के साथ छींटे पड़ेंगे।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २७१ – “बह रही सरिता पुलक…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत बह रही सरिता पुलक...)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २७१ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “बह रही सरिता पुलक...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

पेड़ हैं पर्यावरण है,

और तुम हो ।

बस यही शालीन

सा कुछ ,आचरण है,

और तुम हो ॥

 

धडकनों में धुँध

कोहरा हृदय में है।

जो हमारे इस गुजरते

समय में है ।

 

क्या पता कल की

विरासत क्या रहे,

आज यह हम में

प्रकृति का उद्धरण है,

और तुम हों ॥

 

वायु के वक्तव्य को

विस्तार  देती ।

बह रही सरिता पुलक

अधिकार देती ।

 

नींद से बोझिल थ कीं

आँखें भले,

ठीक आगे सही

अपना जागरण है,

और तुम हो ।

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

 संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – त्रिकाल ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – त्रिकाल ? ?

कालजयी होने की लिप्सा में,

बूँद भर अमृत के लिए,

वे लड़ते-मरते रहे,

उधर हलाहल पीकर,

महादेव, त्रिकाल भए..!

(कवितासंग्रह ‘क्रौंच’ से।)

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५२ ☆ # “प्रेम…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “प्रेम…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५२ ☆

☆ # “प्रेम…” # ☆

जो झंकृत कर दे सांसों को

वही मधुर संगीत है

जो उन्माद भर दे रोम रोम में

वही  प्रेम गीत है

 

जिन नैनों में आस बसी हो

जिन होठों में प्यास सजी हो

व्याकुल तन हो, व्याकुल मन हो

जिस काया में रास रची हो

जिसमें पल-पल अगन लगाती

जन्म जन्म की प्रीत है

 

रूप से काया का रिश्ता

मोह से माया का रिश्ता

धूप से छाया का रिश्ता

तन से साया का रिश्ता

प्रेम में निभाना

युगों युगों की रित है

 

लैला मजनू शीरी फरियाद

प्रेमी करते उनको याद

हीर रांझा रोमियो जूलियट

कई प्रेमी हुए इसके बाद

प्रेमियों के विरहा में डुबे

कई लोकगीत है

 

प्रेम है सपनों को जीना

अपने प्रेमी को अपनाना

तोड़कर रूढ़ियों के बंधन

जग में चले तानकर सीना

प्रेम तो बस प्रेम है

ना कोई हार न जीत है

 

जो झंकृत कर दे सांसो को

वही मधुर संगीत है

जो उम्मत भर दे रोम रोम में

वही प्रेम गीत है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # ९५ – हम शीश झुकाते हैं… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता हम शीश झुकाते हैं।)

☆ अभिव्यक्ति # ९५ ☆ हम शीश झुकाते हैं☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

 

मैया तेरे चरणों में,

हम शीश झुकाते हैं,

 

खुद को समर्पित कर,

हम सुख पाते हैं,

ऊंचे पहाड़ों पे तेरा बसेरा,

कठिन डगर है,घना अंधेरा,

तेरे ही कदमों में,

हम झुक जाते हैं,

मैया तेरे चरणों में….

 

तेरे ही भगत हैं,

तेरे ही दीवाने,

अपनी व्यथा को,

आए हैं सुनाने,

तेरी ही कृपा पर तो,

हम सब इतराते हैं,

मैया तेरे चरणों में,,,,

 

हम तेरे भरोसे पर,

बड़ी दूर चले आए,

एक तेरा ही सहारा है,

हम यही मनाते हैं,

मैया तेरे चरणों में,

हम शीश झुकाते हैं.

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “मटमैले अनुभव” ☆ मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

?  कविता – मटमैले अनुभव ? मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆

कुछ पढ़ते, लिखते.., यूँ ही

ज़िंदगी का कोई कसैला स्वाद

कुछ क्षणों को,भुलाए रखता है

फिर धीरे धीरे लौट आता है

वहीं वापस, जहां से बेज़ायका हुए थे

इसके अतिरिक्त..,

अंधेरे में कुछ साये

चारों ओर ऐसे खड़े हो जाते हैं

कि हक़ीक़तों को नकार कर

कोई दायरा तोड़ने नहीं देते

लाख भुलाने के प्रयत्नों के बावजूद

अतीत की लहरों के थपेड़े,हृदय की शिलाओं पर

प्राकृतिक रूप से प्रहार करते हैं

अपने आघातों के माध्यम से ।

फिर नींद की जबर्दस्ती

आखिरकार, आगोश में ले ही लेती है

और,करवट लेती रात को

भोर की चौखट तक ले ही आती है…!!!!!

© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग

संपर्कबिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ शिव समान नहीं कोई दूजा ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे ☆

प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

☆ शिव समान नहीं कोई दूजा ☆ प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

शिव समान नहीं कोई दूजा, करो नित्य सब उनकी पूजा।

शिवजी की तो अति है माया, उनके बल है सबको भाया।।

शिव समान नहीं कोई दूजा, करो प्रेम से उनकी पूजा।

मंगलमय मौसम हैं लाते, भक्त सभी उनके गुण गाते।।

 *

शिव समान नहीं कोई दूजा, सभी कर रहे उनकी पूजा।

औघड़दानी की जय बोलो, सदा प्रेम से आँखें खोलो।।

 *

शिव समान नहीं कोई दूजा, जगत कर रहा उनकी पूजा।

करें राम भी उनका वंदन, रहे दूर उससे सब क्रंदन।।

 *

शिव समान नहीं कोई दूजा, सुख पाओ कर उनकी पूजा।

जीवन में हर सुख आ जाता, भक्त सदा मधुमय हो जाता।।

 *

शिव समान नहीं कोई दूजा, श्रद्धा से करना सब पूजा।

नहीं कभी फिर पीर सताये, मंगल से जीवन खिल जाए।।

 

© प्रो. (डॉ.) शरद नारायण खरे

प्राचार्य, शासकीय महिला स्नातक महाविद्यालय, मंडला, मप्र -481661

(मो.9425484382)

ईमेल – khare.sharadnarayan@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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English Literature – Poetry ☆ The Trial of Sleep…/नींद का मुक़दमा… ☆ Captain Pravin Raghuvanshi, NM ☆

Captain Pravin Raghuvanshi, NM

(Captain Pravin Raghuvanshi —an ex Naval Officer, possesses a multifaceted personality. He served as a Senior Advisor in prestigious Supercomputer organisation C-DAC, Pune. He was involved in various Artificial Intelligence and High-Performance Computing projects of national and international repute. He has got a long experience in the field of ‘Natural Language Processing’, especially, in the domain of Machine Translation. He has taken the mantle of translating the timeless beauties of Indian literature upon himself so that it reaches across the globe. He has also undertaken translation work for Shri Narendra Modi, the Hon’ble Prime Minister of India, which was highly appreciated by him. He is also a member of ‘Bombay Film Writer Association’.

We present Capt. Pravin Raghuvanshi ji’s amazing poem “~The Trial of Sleep…/नींद का मुक़दमा ~.  We extend our heartiest thanks to the learned author Captain Pravin Raghuvanshi Ji (who is very well conversant with Hindi, Sanskrit, English and Urdu languages) and his artwork.) 

? ~The Trial of Sleep??

 Sleep erased even the address of my home

Darkness stole from me the right to my name

 *

Dreams grew weary, slipping down my lids

Wakeful eyes lost even the right to sleep

 *

I burned myself like a helpless, forsaken flame

Night too denied me the right to light

 *

Sleep became a dove and flew into the sky

Carrying my peace and solace away

 *

The past shackled my breaths in heavy chains

The present slaughtered even my tomorrow

 *

Even their enmity was not without decorum

They killed my sleep, yet raised no cry

 *

Aftab, to whom shall I complain of sleep now

That tyrant parts me from myself every night

? नींद का मुक़दमा??

नींद ने मेरे घर का पता तलक मिटा दिया

अंधेरे ने भी मुझसे मेरा  नाम  छीन लिया

 *

ख़्वाब भी थक कर मेरी पलकों पे ढुलक गए

जागती आँखों ने सोने का हक़ भी खो दिया

 *

मैंने  ख़ुद  को  जलाया  एक  बेक़स शमा सा

शब ने भी मुझसे रोशनी का हक़ छीन लिया

 *

नींद फ़ाख़्ता हो गई, उड़ गई आसमान में

साथ  में  मेरा  चैन और  सुकून भी  ले गई

 *

माज़ी ने मेरी साँसों को बेड़ियों में जकड़ लिया

आज ने मेरा कल भी कत्ल-ओ-गारत कर दिया

 *

उनकी अदावत भी  किसी अदब से कम नहीं

मेरी नींद को फना कर उफ्फ तलक न किया

 *

‘आफ़ताब’ अब किस-किस से नींद का गिला करूँ

जालिम ने हर रात  मुझे मुझसे ही जुदा कर दिया

 

~प्रवीन रघुवंशी “आफताब”

 © Captain Pravin Raghuvanshi, NM

Pune

≈ Editor – Shri Hemant Bawankar/Editor (English) – Captain Pravin Raghuvanshi, NM ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – आशा ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – आशा ? ?

जलती सूखी ज़मीन,

ठूँठ-से खड़े पेड़,

अंतिम संस्कार की

प्रतीक्षा करती पीली घास,

लू के गर्म शरारे,

दरकती माटी की दरारें,

इन दरारों के बीच पड़ा

वो बीज…,

मैं निराश नहीं हूँ,

यह बीज मेरी आशा का केन्द्र है,

यह,

जो अपने भीतर समाये है

असीम संभावनाएँ-

वृक्ष होने की,

छाया देने की,

बरसात देने की,

फल देने की,

और हाँ;

फिर एक नया बीज देने की,

मैं निराश नहीं हूँ,

यह बीज

मेरी आशा का केन्द्र है।

?

© संजय भारद्वाज  

संध्या 5:31, दि. 25 दिसंबर 2015

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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