हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४६ ☆ # “नई सुबह…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “नई सुबह…”।) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २४६ ☆

☆ # “नई सुबह…” # ☆

☆

बीत गई रात बीत गया साल

क्षितिज पर चमक रहा अरुणम भाल

आरक्त  हो गए वसुंधरा के गाल

दिशाएं गा रही नये सुर-ताल

 

सुबह की पवन मदमस्त कर रही है

टूटे हुए बदन में ऊर्जा भर रही है

अंगड़ाई लेती तरुणाई जाग रही है

रसिकों की टोली छूने को डर रही है

 

वाटिका में चटकती हुई कलियाँ  है

भंवरे घूम रहे बनकर छलिया है

यौवन का भार लिए डालियाँ है

भ्रमर कर रहे अठखेलियाँ है

 

पागल भंवरे घूम रहे हैं

कलियों को चूम रहे हैं

वाटिका में मदमस्त आलम है

मादक नशे में भंवरे झूम रहे हैं

 

पूरब से नई पवन बह रही है

नया संदेश सबसे कह रही है

जीना है तो खुलकर जियो

पुरानी परंपराएं  धीरे-धीरे ढह रही है

 

नई सुबह नए गीत लेकर आई है

नई सुबह नए मीत लेकर आई है

नई सुबह ने खुशबू लुटाई  है

नहीं सुबह  नई प्रीत लेकर आई

 

नई सुबह के साथ चलो हम भी होलें

कटुता को भूलकर प्रेम के दरवाजे खोलें

हम सभी उस महामानव के अंश है

आपस में सांप्रदायिकता का जहर ना घोलें /

☆

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एक पूर्णिका – जो हमेशा लड़े हैं हमारे लिये… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(पूर्णिका’  के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)

☆ पूर्णिका – जो हमेशा लड़े हैं हमारे लिये… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

☆

घर की बातें किसी को बताना नहीं

आग अपने ही घर में लगाना नहीं

 *

जो है औकात उसकी बिठाना वहीं

बैठ जाये तो उसको उठाना नहीं

 *

जो हमेशा लड़े हैं हमारे लिये

उनकी नजरों से हमको गिराना नहीं

 *

कष्ट मुझको हुआ आपको भी तो है

फिर भी दुखियों का दिल दुखाना नहीं

 *

जो गलत हो रहा है उसको होने दो तुम

लेकिन तुम भी गलत कुछ कराना नहीं

 *

हैं गलत जो भी रश्में उन्हें तोड़ दो

घर की बुनियाद झूठी बनाना नहीं

 *

बन्दगी इश्क की जिस जगह पै न हो

‘प्रेम‘ ऐसी जगह आना-जाना नहीं ।

☆

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६१ – गीत – नया साल बन सके पुरोहित ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – गीत – नया साल बन सके पुरोहित।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६१ ☆

☆ गीत – नया साल बन सके पुरोहित ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

☆

नया साल बन सके पुरोहित

साँसों को यजमान बनाए

हास दे सके अधर अधर को

उल्लासों के सुमन खिलाए

.

खिलखिल खिल मन नलिनी शतदल

दे नीलिमा छत्र सिर पर धर

लाल लालिमा जवाकुसुम की

सके श्यामता ‘मावस की हर

शरत्पूर्णिमा की रजनीशी

चटक चाँदनी गले लगाए

नया साल बन सके पुरोहित

साँसों को यजमान बनाए

.

नव आशा ले करें अर्चना

श्रम-सीकर अँजुरी में भरकर

सफल साधना स्नेह सुवासित

पुष्पा दे जीवन सुगंध भर

किरण करों से भुवन भास्कर

सुख-समृद्धि हित यज्ञ कराए

नया साल बन सके पुरोहित

साँसों को यजमान बनाए

.

जग-जीवन की सुखकर सुषमा

दसों दिशा राजीव खिलाए

राज बहादुर करे धरा को

शांति निकेतन कर हर्षाए

विहँस जीव संजीव हो सके

हो प्रबुद्ध बुद्ध हो पाए

नया साल हो सके पुरोहित

साँसों को यजमान बनाए

☆

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१.१.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – अन्यमनस्क ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – अन्यमनस्क ? ? 

पग-पग आगे बढ़ो

सफलता के सूत्र इनसे पढ़ो,

सदा परफेक्शन चुनो

मन से काम करना इनसे गुनो,

अपने परिचय पर

वह अचकचा गया,

जीवनभर जो

अन्यमनस्क रहा,

मन से काम करने का

रोल मॉडेल भला कैसे हुआ?

?

© संजय भारद्वाज  

रात्रि 11:06 बजे, 1 जनवरी 2021

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ३९ – कविता – जो रस था गांव की माटी में ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ३९ ☆

☆ कविता ☆ ~ जो रस था गांव की माटी में ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

☆

क्यों कहां खो गयीं संस्कृतियाँ

 खोये वे अपने मानदंड

 खो गई धरोहर पुरखों की

 क्यों हुए आज  इतने उद्दंड

*

 भोजन करने के नीति नियम

 के पीछे वैज्ञानिक कारण था

 व्रत फलाहार नियमों में था

 व्रत के उपरांत ही पारण था

*

 पर आज हर तरफ लोप हुआ

 भोजन की पंगत नहीं रही

 सब खड़े-खड़े भोजन करते

 साधु की संगत नहीं रही

*

 तामस भोजन का चलन चला

छूटा घी, खांड, दूध, दही

चूल्हा, चौका, अइला, घईली

 खोयी घर की कंहतरी, रही

*

 ताजा गन्ना,शरबत खोया

खोया भाजी, भूना हो रहा

तिल वाली तिलकुट कहाँ गयी

बयना का तिलवा कहाँ रहा

*

 ये सभी व्यंजन अमृत थे

 थे प्यार के रस में पगे हुए

 रिश्ते भी अमृत जैसे थे

 थे आपस में थे बंधे हुए

*

 श्रेयस उस रस को ढूंढ रहा

 जो रस था  गांव की माटी में

 नीरस जीवन, रुखे रिश्ते

 होते शहरी परिपाटी में 

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १७ – अरावली… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर ☆

डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आपकी एक भावप्रवण रचना “अरावली…“.)

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # १७ ?

? अरावली… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

= 1 =

मज़बूर है बेबस है,वो अरावली सा है l

उत्तर की खोज में एक,प्रश्नावली सा है ll

= 2 =

बिछी हुई सियासती,बिसात हर तरफ़

सरकारी छतों से उफ़,बरसात हर तरफ़

माहौल आक़ाओं की विरुदावली-सा है ll

= 3 =

गीतावली दोहावली कवितावली सभी

सच की सूक्तियाँ लिए,शब्दावली सभी

ये ख़लबली हर धनबली,बाहुबली-सा है ll

= 4 =

श्रद्धांजलि पुष्पांजलि दिखावटी है सब

संवेदना बनावटी-मिलावटी  है अब

बर्ताव ऊपरी भले ही,मखमली सा है

= 5 =

चापलूसी-चमचागिरी की बयार है

झूठ की बहार,सच का तिरस्कार है

राजपथ भी अब तो,सँकरी गली सा है

= 6 =

बिछा रहे हैं शूल वो,राहों में हर तरफ़

पढ़ा नहीं जिन्होंने कभी,प्यार का हरफ़

अन्दर वो ज़हर,बाहर गुड़ की डली सा है

= 7 =

रंगीनियाँ-रौनक़ में,मेहबूबा की गली सा

मनहूस दरअसल,वो है कपटी छली सा

बहरूपिया लल्ला सा,कभी लली सा है

 = 8 =

चाहे जो चबा जाये,ऐसी मूँगफली सा

भौंरा जो मँडराये,उस फूल कली सा

चरित्र ये उस्मान की चित्रावली सा है

= 9 =

‘राजेश’ की हर दृश्यावली दीपावली सी

मेरी तो वंशावली है,गंगाजली सी

मेरा दर्द तुलसी की रत्नावली सा है ll

 ☆

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ “श्री हंस” साहित्य # १९० ☆ मुक्तक ।। नव वर्ष तेरा बार-बार अभिनंदन करना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

श्री एस के कपूर “श्री हंस”

 

☆ “श्री हंस” साहित्य # १९० ☆

☆ मुक्तक ।। नव वर्ष तेरा बार-बार अभिनंदन करना है ।। ☆ श्री एस के कपूर “श्री हंस” ☆

☆

विधा।।।।

= 1 =

नववर्ष तेरा बार-बार अभिनंदन करना है।

तुझकोअब पीड़ा दर्द हर मन से हरना है।।

करनीआलोकित धरा नवप्रभात किरणों से।

किसी महामारी से अब और नहीं डरना है।।

= 2 =

हर मन में तुझको भाव सदभाव भरना है।

भाव घृणा का तुझको अब नष्ट करना है।।

अहम नहीं  अहमियत का विचार जगाना।

मानवता को सदा लिए जीवित रखना है।।

= 3 =

शत्रु  की हर ललकार का उत्तर धरना है।

हर निर्बल निर्धन की भी झोली भरना है।।

विश्व में भारत मस्तक करना ऊंचा और।

हर दिल से निकालना प्रेम का झरना है।।

= 4 =

हे नववर्ष नारी समता   का पाठ पढ़ना है।

नैतिक शिक्षा प्रसार और अधिक करना है।।

मां भारती चरणोंअलख जलानी देशप्रेम की।

प्रकृति का दामन भी हरियाली से भरना है।।

= 5 =

नववर्ष आशायों का दामनऔर भरना है।

नई-नई चुनौतियों से अभी और लड़ना है।।

जन-जन के सपनों में   भी भरना है रंग।

नववर्ष तेरा बार-बार अभिनंदन करना है।।

☆

© एस के कपूर “श्री हंस”

बरेली ईमेल – Skkapoor5067@ gmail.com, मोब  – 9897071046, 8218685464

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२५३ ☆ कविता – जो जैसा है सोचता वैसे करता काम… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

 स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – जो जैसा है सोचता वैसे करता काम…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २५३ ☆

☆ जो जैसा है सोचता वैसे करता काम…  ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

☆

चेहरा है शरीर का ऐसा अंग प्रधान

जिससे होती आई है हर जन ही पहचान।

 *

द्वेष भाव संसार में है एक सहज स्वभाव

जाता है बड़ी मुश्किल से कर ढेरों उपाय ।

 *

स्वार्थ, द्वेष हैं शत्रु दो सबके प्रबल महान

जो उपजाते हृदय में लोभ और अभियान | ।

 *

होती प्रीति की भावना गुण-दोषों अनुसार

पक्षपात होता जहाँ दुखी वही परिवार

 *

जिनका मन वश में सदा औ खुद पर अधिकार

उन्हें डरा सकता नहीं कभी भी यह संसार ।

 *

इस दुनियाँ में हरेक का अलग अलग संसार

वैसा करता काम जन जैसा सोच विचार

 *

बहुतों को होता नहीं खुद का पूरा ज्ञान

 क्योंकि उनकी बुद्धि को हर लेता अभिमान।

 *

 हर एक जैसा सोचता वैसे करता काम

सहना पड़ता भी किये करमो का परिणाम ।

☆

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #७६ – नवगीत – आलोकित मधुमास… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – आलोकित मधुमास…।

? रचना संसार # ७६ – गीत – आलोकित मधुमास…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

☆

अन्तर्मन में प्रियतम बसते,

नवल जगी प्रिय प्यास।

उलझा बाहुपाश में मनवा,

हृदय मिलन की आस।।

*

महके बेला गंधिल क्यारी,

मधुर कलश मकरंद।

मंजुल मुखी रूप रति मोहे,

मधुमासी आनंद।।

महुआ किंशुक गुलमोहर ने,

लिखे प्रेम अनुप्रास।

*

चंदन काया दिव्य सुवासित,

दे आमंत्रण भान।

सम्मोहित सब चपल चंचला,

अवगुंठित पट जान।।

इन अधरों की पढ़ लो पाती,

सुखद मिले आभास।।

*

चहुँदिशि है प्रतिबिंब प्रेम का,

क्षण संदल अभिसार।

प्रतिभासित कोमल सुदीप्त भी,

यौवन की रसधार।।

करे समर्पण तन-मन अपना,

डोर थाम विश्वास।

*

मेघावरी ललित प्रिय अलकें,

अनुपम अंजन धार।

दृष्टि-वाण से करती घायल,

दो आलिंगन हार।।

बजती मादक शहनाई भी,

आलोकित मधुमास।

       ☆

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – विभाजन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – विभाजन ? ?

लहरों को जन्म देता है प्रवाह,

सृजन का आनंद मनाता है,

उछाल के विस्तार पर झूमता है,

काल का पहिया घूमता है,

विकसित लहरें बाँट लेती हैं

अपने-अपने हिस्से का प्रवाह,

शिथिल तन और

खंडित मन लिए प्रवाह,

अपनी ही लहरों को

विभक्त नहीं कर पाता है,

सुनो मनुज!

मर्त्यलोक में माता-पिता

और संतानों का

कुछ ऐसा ही नाता है!

?

© संजय भारद्वाज  

8.35 बजे, 18 मई 2019

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  भास्कर साधना गुरुवार 1 जनवरी 2026 से  रविवार 11 जनवरी तक चलेगी।

💥 इसका साधना मंत्र होगा- ॐ सूर्याय नम: 💥

🕉️ ग्यारह दिवसीय इस साधना में मौन साधना एवं आत्म-परिष्कार भी साथ-साथ चलेंगे।🕉️

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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