हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७० ☆ लघुकथा – अमोघ ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है एक विचारणीय लघुकथा  – “अमोघ“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७० ☆

✍ लघुकथा – अमोघ ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

घर बन रहा था। इंजीनियर बार बार बुलाया करते कि घर का निर्माण कार्य देख लीजिए। मैं कहता कि आप इंजीनियर हैं, निर्माण कार्य की जिम्मेदारी आपकी है और तकनीकी रूप से मैं तो कुछ जानता नहीं। उनके बार बार अनुरोध करने पर गया। बनते हुए घर को देख रहा था। कमरे छोटे लग रहे थे। लिविंग रूम और किचन के बीच दीवार बनी खड़ी थी। दीवार गीली थी। मैंने उस पर हाथ रखा तो लगा कि वह बहुत कमजोर है। मैं धक रह गया क्योंकि इतनी कमजोर दीवार रहेगी तो घर मजबूत कैसे रहेगा। अंदर ही अंदर मुझे क्रोध आ रहा था।

मैंने बिल्डर से बात की और अपना क्रोध दबाते हुए कमजोर घर की चिंता जताई तो बिल्डर थोड़ा हँस पड़े। बोले कि दीवार बनते समय कमजोर रहती है पर सूखने पर मजबूत हो जाती है और उसके ऊपर प्लास्टर होने पर एकदम मजबूत हो जाती है। ऐसी ही दीवारों से बना घर अच्छा और मजबूत बनता है। बिल्डर की बात मैंने सुनी और ठीक है साहब कहकर वहां से चला आया। बिल्डर और इंजीनियर अनुभवी थे और मुझे निर्माण कार्य का कोई अनुभव नहीं। चिंता थी और क्षोभ भी।

घर बन गया और बिल्डर ने चाभी दे दी परन्तु मैं नये घर में जो नहीं रहा था। किराए पर रहता था परन्तु मकान मालिक अब खाली करने को कह रहे थे। उन्हें पता चल गया था कि मेरा घर बन गया है। परिणामस्वरूप मुझे अपने घर में जाना पड़ा। नया घर सबको अच्छा लग रहा था। अच्छा तो मुझे भी लग रहा था पर मन में वह बनने वाली दीवार कोंध जाती। आज घर में रहते हुए दस वर्ष हो गए। कभी एक बूँद पानी नहीं आया। इंजीनियर बिल्डर पर बसा झूठा अविश्वास मजबूत विश्वास में बदलता गया। और विश्वास मेरे लिए अमोघ विश्वास बनता गया।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२० – रसेदार सब्ज़ी… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रसेदार सब्ज़ी)

☆ लघुकथा # १२० – रसेदार सब्ज़ी श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

शाम के पाँच बज चुके थे। सरकारी दफ़्तर में हिसाब-किताब देखते-देखते रामप्रसाद बाबू की आँख लग गई थी।

नींद में वह मुस्कुरा रहे थे—”आज घर जाऊँगा तो रसेदार सब्ज़ी बनी होगी। सुबह दाल बनाने को भी कह दिया था। दाँत अब पहले जैसे नहीं रहे, पर रसेदार सब्ज़ी के साथ रोटी आराम से खा लेता हूँ।”

तभी चपरासी ने आवाज़ दी, “बाबूजी! पाँच बज गए। घर नहीं जाना क्या?”

वह चौंककर उठे, झोला उठाया और रास्ते में आलू-टमाटर खरीद लिए। एक दुकान पर नज़र पड़ी तो पत्नी के लिए एक छोटा-सा पर्स भी ले लिया। मन ही मन सोचने लगे, “बहुत खुश होगी।”

घर पहुँचे। ताला खोला। भीतर सन्नाटा था।

उन्होंने सब्ज़ियाँ मेज़ पर रखीं और नया पर्स निकालकर दीवार पर टँगी पत्नी की तस्वीर के सामने रख दिया।

काँपती आवाज़ में बोले, “देखो… तुम्हारे लिए पर्स लाया हूँ।”

फिर रसोई में जाकर डिब्बे से सूखी रोटियाँ निकालीं, पानी में भिगोकर खाने लगे।

आँखों से आँसू लगातार गिरते रहे।

पत्नी को गुज़रे तीन वर्ष हो चुके थे, पर प्रेम ने आज तक यह स्वीकार नहीं किया था कि वह अब लौटकर नहीं आएगी।

उधर उसी समय उनका बेटा और बहू एक महंगे भोजनालय में परिवार के साथ भोजन कर रहे थे। तस्वीर खिंची और सामाजिक माध्यम पर लिखा गया—

“माता-पिता का आशीर्वाद ही सबसे बड़ी दौलत है।”

कुछ ही देर में सैकड़ों प्रशंसाएँ मिल गईं।

इधर रामप्रसाद बाबू की थाली में आज भी सूखी रोटी थी… और उधर बेटे की तस्वीर में संस्कार।

विडंबना यह नहीं कि पिता अकेला था, विडंबना यह थी कि उसका बेटा कभी अकेला दिखाई नहीं देता था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२१ ☆ पाऊस… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२१ ?

☆ पाऊस ☆  प्रभा सोनवणे ☆

पाऊस असा पाऊस तसा

पाऊस आहे कसा कसा …

*

पाऊस आहे मस्त कलंदर ,

खट्याळ ,खोडकर आणि बिलंदर !

*

पाऊस आहे निर्मळ, प्रेमळ

तसाच पाऊस भलताच चंचल!

*

पाऊस मुक्त पाऊस अनुरक्त

पाऊस असतो आसक्त !

*

पाऊस रिमझिम, पाऊस घनघोर ,

कधी विनयशील, कधी शिरजोर !

*

सांगू पाऊस कुणासारखा ?

लहरी लबाड नवऱ्या सारखा .

*

पाऊस वाटतो हवाहवासा

मनातनावर बरसावासा !!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५५ – बुन्देली कविता – ”तुम काऊ की खोट न देखौ” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – बे गुस्सा सें हेरत जा रय।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५५ ☆

☆  बुन्देली कविता – तुम काऊ की खोट न देखौ ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

तुम काऊ की खोट न देखौ

तनक छिले हैं, चोट न देखौ

*

कैसे कौन बटोर रओ है ये चुनाव में वोट न देखौ

रातों-रात बाँट दय ऊ ने दारू, उन्हा, नोट न देखौ

*

दंगल में ललकार रओ है ऊ कौ लाल लँगोट न देखौ

साँठ-गाँठ कर लइ बैरी सें बिठा लई है गोट न देखौ

*

श्रम के चना-चबैना नोंने अब काजू अखरोट न देखौ

भगवतसुख सें खाव मलीदा कैसें बन रव रोट न देखौ

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२७ – हर मानव को खुद तपना है ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “हर मानव को खुद तपना है। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२७ ☆

☆ हर मानव को खुद तपना है…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

हर मानव को खुद तपना है।

सद्कर्मों को करना है।।

*

पंछी सभी सिखाते हमको।

पर फैला कर उड़ना है।।

*

साथ निभाती प्रकृति हमेशा ।

फल-फूलों सा खिलना है।।

*

वृक्ष हमें छाया-फल देते।

पर-उपकारी गहना है।।

*

सही धर्म सिखलाता हमको।

नहीं किसी से कुढ़ना है।।

*

ज्ञानीजन से शिक्षा पाकर।

अमृत कलश को चखना है।।

*

संतों का सानिध्य मिले तो।

बैर-भाव को तजना है।।

*

भ्रष्टाचार बढ़ा है यारो।

नाग-कालिया नथना है।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ४२० ☆ आलेख – प्रेम जन्य अपराध ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२० ☆

?  आलेख – प्रेम जन्य अपराध ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

प्रेम मानव इतिहास की वह आदिम और शाश्वत ऊर्जा है, जो जीवन को अर्थ देती है, पर साथ ही वह अग्नि भी है जो मर्यादा की दीवारों को राख करने का साहस रखती है। समाज के ढाँचे को यदि एक स्थायित्व चाहिए, तो वह अक्सर परंपराओं, नियमों और दंड-विधानों के इर्द गिर्द बुना जाता है। इस व्यवस्था में ‘अपराध’  समाज का एक अवांछित अंग है, तो ‘प्रेम’ को समाज ने सदैव एक संदिग्ध, पर अनिवार्य अंग माना है।

प्रश्न यह है कि जो प्रेम जीवन का उत्सव होना चाहिए , वह हिंसा और छल की विभीषिका में क्यों बदल जाता है?

इंदौर की सोनम और पुणे की सिया द्वारा अपने प्रेमी की कुत्सित हत्या जैसी घटनाएँ इसी प्रश्न को एक भयावह समकालीन विमर्श में खड़ा करती हैं, जहाँ प्रेम की भाषा में अपराध की स्याही घुल गई है।

भारतीय मनीषा में प्रेम का स्वरूप कभी एक जैसा नहीं रहा। यदि हम ‘कामसूत्र’ के पन्नों को पलटें, तो वहाँ प्रेम को केवल शारीरिक आकर्षण नहीं, बल्कि एक परिष्कृत संस्कृति और परस्पर विश्वास के रूप में स्थापित किया गया है। वहाँ प्रेम के लिए एक स्वतंत्र स्थान की कल्पना थी। परंतु, इसके समानांतर मनुस्मृति और धर्मशास्त्रीय परंपराओं का कठोर अनुशासन भी चलता रहा। यह हमारे सामाजिक इतिहास का चिरंतन द्वंद्व है। एक ओर हमने प्रेम को काव्य माना, दूसरी ओर समय के प्रवाह में उसे कुल और जाति के कठोर अनुशासनों में कैद करने की कुचेष्टा की। जब प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को सामाजिक दीवारों के भीतर जबरन मोड़ने की कोशिश की जाती है, तो वह अपना प्राकृतिक स्वभाव खोने लगता है। और यह  धीरे-धीरे छल, अपराध और घुटन के विषैले अंकुर भी पैदा करता है।

सोनम और सिया की घटनाएँ इस बात का प्रमाण हैं कि आज का प्रेम जब अनियंत्रित और निकास रहित हो जाता है, तो वह मानवीय संवेदनाओं को त्याग देता है। फिल्मों में भी हमने इस अंतर्विरोध को बार-बार देखा है। कभी ‘इश्किया’ जैसी फिल्में प्रेम में छिपी उस काली छाया को दिखाती हैं, जहाँ जुनून अपराध का मार्ग प्रशस्त करता है, तो कभी थ्रिलर फिल्में यह दिखाती हैं कि कैसे रिश्तों के झूठ को छिपाने के लिए हिंसा का सहारा लिया जाता है।

इंदौर और पुणे की ये समकालीन घटनाएँ मात्र दो व्यक्तियों का अपराध नहीं हैं। यह उस सामाजिक वातावरण की विफलता है जहाँ रिश्तों के टूटने को ‘अपमान’ से जोड़ दिया जाता है। माता पिता के अहम पर चोट माना जाता है। जब कोई व्यक्ति समाज के डर से अपना सच नहीं कह पाता, या जब वह अपने प्रेम को ‘स्वामित्व’ समझने लगता है, तब उसे लगने लगता है कि प्रेम को समाप्त करने का एकमात्र तरीका ‘सामने वाले को समाप्त करना’ है।

यह हिंसा उस भावनात्मक परिपक्वता का अभाव है, जिसे हमारा शिक्षा तंत्र और पारिवारिक ढांचा कभी सिखा ही नहीं पाया।

यहाँ यह समझना आवश्यक है कि प्रेम का भाव स्वयं में नैसर्गिक स्वरूप में कभी अपराधी नहीं होता। अपराध तब जन्म लेता है जब प्रेम ‘उत्तरदायित्व’ से मुक्त होकर ‘स्वार्थ’ और ‘स्वामित्व’ की बेड़ियों में जकड़ जाता है। जब समाज प्रेम को अनुमति और निषेध के बीच सीमित कर देता है, तो युवा मन संवाद की स्वस्थ भूमि खो देता है। परिणामस्वरूप, संबंध या तो पूरी तरह आदर्शीकृत हो जाते हैं, या फिर वे अपराधीकरण की ओर ढल जाते हैं।

इन घटनाओं में मीडिया की भूमिका भी कम गंभीर नहीं है, जो अपराध को एक सनसनीखेज कहानी की तरह परोसता है, जिससे समाज में डर तो फैलता है, लेकिन अपराध के पीछे के सामाजिक मनोविज्ञान पर चर्चा कम होती है।

कानून , जुनूनी प्रेम के सम्मुख निर्बल रह जाता है।

इस समस्या का समाधान दंड की कठोरता से परे, सामाजिक चेतना के विस्तार में निहित है। सबसे पहले, हमें परिवारों के भीतर संवाद का एक नया वातावरण बनाना होगा। बच्चों को केवल अकादमिक शिक्षा नहीं, बल्कि भावनात्मक साक्षरता देनी होगी ताकि उन्हें यह समझ हो कि रिश्ता टूटना जीवन का अंत नहीं है। विवाह को एक सामाजिक सौदे से ऊपर उठाकर मानवीय सहमति का क्षेत्र बनाना होगा, जहाँ व्यक्ति अपनी असहमति को बिना किसी डर के व्यक्त कर सके। कानूनों का पालन अपनी जगह अनिवार्य है, लेकिन समाज को भी यह समझना होगा कि किसी भी अपराध को ‘प्रेम का नाम’ देकर उसे रोमांटिसाइज करना बंद करना होगा।

अंततः, प्रेम और अपराध के इस दुष्चक्र को तोड़ने का एकमात्र उपाय प्रेम को अधिक मानवीय और अधिक ईमानदार बनाना है।

हमें समाज में ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जहाँ व्यक्ति का सम्मान उसकी ‘मर्यादा’ से नहीं, बल्कि उसकी ‘संवेदनशीलता’ से आंका जाए। जब प्रेम में ईमानदारी होगी, तो उसे छिपाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, और जब छिपाने की जरूरत नहीं होगी, तो अपराध अपनी छाया में स्वतः गुम होकर सिमट जाएगा।

प्रेम की असली गरिमा उसे अनारकली सा दीवारों में कैद करने में नहीं, बल्कि उसे उत्तरदायित्व और परिपक्वता के खुले आकाश में जीने देने में है।

 

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव

समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार

लंदन प्रवास पर

ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८

readerswriteback@gmail.कॉम, apniabhivyakti@gmail.com

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७० – बारिश ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बारिश”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७०  ☆

🌻 अति लघु कथा (अ ल क) 🌻 🌧️बारिश🌧️

आज बारिश की बूँदों ने श्रेया के मन में ही नही, तन को भी फफोले बना रही थी। तेज, तर्रार, तीखे नयन नक्श, चुल्हे के जैसी धधकी ज्वाला जिसे अनजाने में ही किसी ने सुलगती धुंआ- धुंआ कर डाला।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १८४ – देश-परदेश – अमानत में ख़यानत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” ज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १८४ ☆ देश-परदेश – अमानत में ख़यानत ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हमारे देश में तो “पड़ोसी” को भाई जैसे रिश्ते से भी अधिक महत्व दिया जाता है। दुःख की घड़ी में तो सबसे पहले पड़ोसी ही काम आता है।

आज उपरोक्त फोटो स्थानीय समाचार पत्र में देख मन बहुत आहत हुआ। जिस समाज में “पड़ोसी पहले” या पड़ोस प्रेम/ सौहार्द का उदाहरण दिया जाता है, वहां इस प्रकार की घटना होना,  हमारे नैतिक पतन की पराकाष्ठा का पैमाना बन चुका है।

हम तो विगत छह दशकों से हमेशा अच्छे पड़ोसी से लाभान्वित होते आ रहे हैं। छोटे मोटे विवाद, विचारों में मतभेद एक आम बात हैं।

बचपन से आज तक सप्ताह में, कम से कम एक बार जब तक पड़ोसी से “बार्टर” पद्धति में प्राप्त व्यंजन का आनंद छूटा नहीं है। घर की सब्जी जब मन पसंद नहीं रहती थी, तब पड़ोस की चाची/ मासी के यहां से बिना मांगे स्वादिस्ट व्यंजन का खूब आनंद लेते आ रहें हैं। ये सब आप के साथ भी होता आ रहा है।

अब प्रश्न ये है, कि हमारी नैतिकता में इतनी गिरावट क्यों आ रही है? कहीं हम सब पारिवारिक मूल्यों से दूर पश्चिम की शरण में जाना तो नहीं है? धर्म से दूरी बढ़ती ही जा रही हैं। विषय विचार करने का है।

अब कलम को विश्राम देता हूं, द्वार पर लगी घंटी बजी है, अवश्य ही पड़ोसी की होगी, रविवार शाम के समय उनके यहां से इडली प्रति सप्ताह प्राप्त होती है।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३३४ ☆ पाखरू… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३३४ ?

☆ पाखरू… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

भेटायला, पाखरू आलंय दुरून

पाहू नका, शृंगार केवळ वरून

*

दिवसा ढवळ्या अंधार पडला

असा कसा हा प्रकार घडला

मळभ होतं, आलं प्रीतीचं भरून

*

मिठीत तुमच्या वाटतंय गोड

श्वास कोंडलाय करा धरसोड

हात माझा, ठेवा कायमचा धरून

*

तुमच्या नावाचं कुंकू भाळी

मळा हा पिकवा होऊन माळी

न्याहरीला, सकाळी आणते घरून

*

तुमच्या नावावर वावर सारं

नाही त्याच्यावर कसला भार

सातबारा, ठेवलाय कोरा करून

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९२ – पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९२ ☆

☆ –  पद्मा का क्रन्दन और चुप हिमालय…१  ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

पद्मा का क्रंदन

दस्तकें दे रहा है,

हिमालय के कानों पर,

और बाँधकर वज्र

प्राणों पर

हिमालय विन्ध्याचलहो रहा है।

हम नहीं करेंगे

अगस्त्य की प्रतीक्षा,

नहीं फलने देंगे कोई छल,

हिमालय हिमालय ही रहेगा

नहीं होने देंगे उसे विन्ध्याचल

बात पर्वतों की कर रहा हूँ

मगर, पर्वत आदमी नहीं होता,

हाँ, आदमी चाहे तो

पर्वत बन सकता है,

मुसीबत के मानसूनों के आगे

उसका सीना तन सकता है।

तो आओ,

हम पहाड़ों का पहाड़ा पढ़ें,

इंसानियत की सीढ़ी-दर-सीढ़ी चढ़ें,

और देखें कि कहाँ क्या हो रहा है।

हाय !

दिलों पर लकीरें खींचकर

सौंपा जा रहा है

प्रतिबंधित रिवेश,

कैसी विडम्बना है-

क्रमशः…

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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