सूचनाएँ/Information ☆ “व्यंग्य के रंग” पुस्तक का भव्य लोकार्पण एवं परिचर्चा ☆ साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ☆

 ☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹“व्यंग्य के रंग” पुस्तक का भव्य लोकार्पण एवं परिचर्चा ☆ साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव 🌹

व्यंग्य साहित्य को समर्पित एक संकलन व्यंग्य के रंग

नई दिल्ली। हिंदी साहित्य के क्षेत्र में व्यंग्य विधा को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में “व्यंग्य के रंग” नामक व्यंग्य-संकलन का लोकार्पण एवं परिचर्चा समारोह  17 जनवरी, शनिवार को राजधानी दिल्ली के प्रतिष्ठित सांस्कृतिक केंद्र भारत मंडपम, प्रगति मैदान मे संपन्न हुई।

यह गरिमामय आयोजन ‘अद्विक पब्लिकेशन’ के तत्वावधान में आयोजित किया गया ।

इस पुस्तक में सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव सहित देश और विदेश के 88 प्रतिष्ठित व्यंग्यकारों की श्रेष्ठ रचनाएँ संकलित की गई हैं।

व्यंग्य साहित्य को अक्सर केवल हास्य का माध्यम समझा जाता है। वास्तव में यह समाज की विसंगतियों, विडम्बनाओं और विरोधाभासों को उजागर करने की सबसे सशक्त विधा है। “व्यंग्य के रंग” इसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए पाठकों को न केवल हँसने के लिए प्रेरित करता है बल्कि सोचने, आत्ममंथन करने और प्रश्न उठाने की चेतना भी प्रदान करता है।

आज के समय में समाज अनेक सामाजिक, राजनीतिक और नैतिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में व्यंग्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से व्यवस्था पर तीखे प्रहार करता है। इस पुस्तक में संकलित रचनाएँ आम आदमी की पीड़ा, सत्ता की विडम्बनाएँ, सामाजिक दिखावे, बदलते मूल्यों और आधुनिक जीवनशैली की विसंगतियों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती हैं।

“व्यंग्य के रंग” एक ऐसा व्यंग्य-संग्रह है, जिसमें विविध विषयों, शैलियों और दृष्टिकोणों का अनूठा समावेश देखने को मिलता है। पुस्तक में शामिल 88 व्यंग्यकारों की रचनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि हिंदी व्यंग्य केवल एक शैली नहीं, बल्कि एक सशक्त वैचारिक आन्दोलन है।

पुस्तक की प्रमुख विशेषताएँ —

  • समाज और राजनीति पर तीखा किंतु सुसंस्कृत व्यंग्य
  • समकालीन जीवन की सच्चाइयों का यथार्थ चित्रण
  • हास्य के साथ गहरी वैचारिक दृष्टि
  • भाषा की सरलता और प्रभावशीलता
  • विविध पीढ़ियों के व्यंग्यकारों का समावेश

यह पुस्तक पाठकों को नवविचारों से साक्षात्कार कराने के साथ-साथ बौद्धिक संतुष्टि भी प्रदान करती है।

 साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘ विनम्र’

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ हिंदी चेतना शिखर–2026 : जयपुर की डॉ. निशा अग्रवाल को एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ☆

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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹हिंदी चेतना शिखर–2026 : जयपुर की डॉ. निशा अग्रवाल को एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड 🌹

नई दिल्ली/जयपुर। हिंदी भाषा, देवनागरी लिपि और भारतीय सांस्कृतिक चेतना के वैश्विक उत्थान के उद्देश्य से धरा धाम इंटरनेशनल के तत्वावधान में 15 जनवरी 2026 को राजेंद्र भवन, नई दिल्ली में आयोजित अंतरराष्ट्रीय सम्मान समारोह “हिंदी चेतना शिखर–2026” ऐतिहासिक गरिमा के साथ संपन्न हुआ। इस कार्यक्रम का सुव्यवस्थित, प्रभावशाली एवं ओजस्वी संचालन डॉ. निशा अग्रवाल द्वारा किया गया।

समारोह के दौरान जयपुर (राजस्थान) की प्रतिष्ठित शिक्षाविद, शोधकर्ता एवं पाठ्यपुस्तक लेखिका डॉ. निशा अग्रवाल को Asia Book of World Records द्वारा World Record Holder के रूप में सम्मानित किया गया। यह सम्मान उन्हें शोध के क्षेत्र में असाधारण, मौलिक एवं समाजोपयोगी योगदान के लिए प्रदान किया गया, जिसे विधिवत एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स में दर्ज किया गया। डॉ. निशा अग्रवाल का यह विश्व-रिकॉर्ड जगत धर्म चक्रवर्ती, सौहार्द शिरोमणि संत डॉ. सौरभ पांडे जी के जीवन, दर्शन, विचारधारा एवं समकालीन प्रासंगिकता पर आधारित विस्तृत शोधग्रंथ के लिए स्थापित हुआ। यह शोधकार्य Divya Manavta Prerak Kahaniyan Anusandhan Kendra द्वारा प्रकाशित तथा प्रो. जनक प्रसाद के अकादमिक मार्गदर्शन में संपन्न हुआ। एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स द्वारा इस शोध को आध्यात्मिक अनुसंधान, मानवीय मूल्यों, अंतरधार्मिक सौहार्द एवं समकालीन विचार नेतृत्व के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया गया।

कार्यक्रम में अंतरराष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति रही। प्रमुख अतिथियों में रसायाचार्य डॉ. ई. माड़े धर्मयस (इंडोनेशिया), जनरल प्रो. जसवीर सिंह (आधिकारिक प्रतिनिधि – संयुक्त राष्ट्र | अमेरिका),डॉ. इंद्रजीत शर्मा (देवनागरी प्रवर्तक, अमेरिका),

डॉ. बी. एल. गौड़ (ख्यातिलब्ध साहित्यकार एवं उद्योगपति),डॉ. चिंगशुओं ‘जोया’ झांग,प्रो. (डॉ.) देवेश कुमार मिश्र (संस्कृत विभाग, इग्नू, नई दिल्ली), जगत धर्म चक्रवर्ती सौहार्द शिरोमणि डॉ. सौरभ पांडे जी (प्रमुख – धराधाम, गोरखपुर), डॉ नारायण यादव( M.D ऑफ ABWR) एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर डॉ. शंभू पंवार जी सम्मिलित रहे।

डॉ. निशा अग्रवाल अब तक 30 से अधिक पुस्तकों की रचना कर चुकी हैं। उनकी पुस्तकें कॉलेज शिक्षा, उत्तर प्रदेश बोर्ड एवं सीबीएसई बोर्ड के पाठ्यक्रमों में सम्मिलित हैं। उनका लेखन हिंदी भाषा, शिक्षा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों को समर्पित है, जिसने उन्हें शिक्षा जगत में विशिष्ट पहचान दिलाई है।

“हिंदी चेतना शिखर–2026” न केवल एक सम्मान समारोह रहा, बल्कि यह हिंदी को राष्ट्र से विश्व तक, और भारतीय संस्कृति को वैश्विक संवाद से जोड़ने वाला एक सशक्त वैचारिक मंच सिद्ध हुआ।

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन 31 जनवरी 2026 को संपन्न होगा ☆ साभार – सुश्री रानी सुमिता ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ अंतरराष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच का राष्ट्रीय सम्मेलन 31 जनवरी 2026 को संपन्न होगा ☆ साभार – सुश्री रानी सुमिता ☆

प्रतिष्ठित साहित्यिक संस्था अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच एवं हेमंत फाउंडेशन का राष्ट्रीय सम्मेलन एवं हेमंत स्मृति सम्मान समारोह शनिवार, दिनांक 31 जनवरी, 2026  को सुबह 10:30 से संध्या 5 बजे तक भोपाल में “ होटल ला पर्ल,प्लाट नंबर 138 -बी, बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय के सामने, होशंगाबाद रोड, भोपाल – 462026”  में आयोजित किया जा रहा है|

सम्मेलन की जानकारी देते हुए संस्था की संस्थापक अध्यक्ष श्रीमती संतोष श्रीवास्तव ने बताया- कार्यक्रम तीन सत्रों में संपन्न होगा “अलंकरण सत्र”, “काव्य सत्र” और “लघुकथा सत्र” ।

अलंकरण सत्र में  देश-विदेश से चयनित लेखकों रूबी मोहंती, डॉ. अलका अग्रवाल सिगतिया , शकुंतला मित्तल, डॉ. विद्या सिंह, डॉ. रानी श्रीवास्तव, सुनील दुबे वृक्षमित्र, विवेक रंजन श्रीवास्तव, शंकारानंद, कुसुम भट्ट ,रजनी गुप्त, जया आर्या, एकता अमित व्यास, रतना पांडेय, आशा सिंह गौर, देवेंद्र श्रीवास्तव, बद्र वास्ती को विभिन्न विधाओं में श्री गिरीश पंकज , श्री प्रेम जनमेजय, श्री ऋषि कुमार शर्मा श्री रामस्वरूप दीक्षित,  प्रो. राजेश श्रीवास्तव के कर कमलों द्वारा प्रतीक चिन्ह ,शॉल, श्रीफल एवं पुरस्कार राशि प्रदान कर सम्मानित किया जाएगा।

कार्यक्रम के अन्य सत्रों में डॉ. नुसरत मेहदी, डॉ. संजीव कुमार, डॉ. संजय सक्सेना करनल गिरिजेश सक्सेना, डॉ. शरद सिंह, वन्या जोशी (फिल्म अभिनेत्री)  हरि भटनागर ,क्षमा पांडेय, कांता रॉय, इकबाल मसूद मंच की शोभा बढ़ाएंगे एवं देशभर से पधारे कवि ,लघुकथाकार, शायर अपनी अपनी रचनाएं प्रस्तुत करेंगे। कार्यक्रम के पश्चात सभी को  प्रमाण पत्र वितरण किया जाएगा।

तीनों सत्रों में संचालन की बागडोर संभालेंगे मुजफ्फर इकबाल सिद्दीकी, घनश्याम मैथिल, डॉ विनीता राहूरिकर एवं आभार जया केतकी, रानी सुमिता।

वरिष्ठ लेखिका संतोष श्रीवास्तव स्वागत वक्तव्य , डा. प्रमिला वर्मा “हेमंत परिचय”  संस्था परिचय शेफालिका श्रीवास्तव एवं निर्णायक उद्बोधन डॉ. नीलिमा रंजन , सरस्वती वंदना महिमा श्रीवास्तव वर्मा प्रस्तुत करेंगी ।

प्रस्तुति – सुश्री रानी सुमिता

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆  कविता – ती चार दैवी मुले – सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

‘सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

💐 संपादकीय निवेदन 💐

💐 ✒️ अभिनंदन! अभिनंदन! अभिनंदन! ✒️ 💐

तितिक्षा इंटरनॅशनल, पुणे यांनी आयोजित केलेल्या दशकपुर्ती सोहळा काव्यलेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती उज्ज्वला सहस्रबुद्धे यांना त्यांच्या ‘तितिक्षा’ या रचनेसाठी सर्वोत्कृष्ट काव्य पुरस्कार मिळाला आहे.

ई अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे त्यांचे मन: पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐 💐

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– आजच्या अंकात वाचूया त्यांचे एक पुरस्कार प्राप्त कविता – “ती चार दैवी मुले…”

– संपादक मंडळ

ई – अभिव्यक्ती, मराठी विभाग

पुरस्कार प्राप्त कविता

विषय – तितिक्षा 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ ती चार दैवी मुले ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

बालपणी हरवली,

छाया माथ्यावरची!

पोरकी झाली चौघे,

वाट धरी पैठणची!… १

*

ब्रम्ह वृंदास सामोरे,

प्रश्न केले अवघड!

शुध्दिपत्र मिळण्यास,

खूप केली धडपड!… २

*

ज्ञाना देई गुरूपद,

निवृत्तीस ते श्रध्देने!

चालले सोपान, मुक्ता,

मागुती त्यांच्या मायेने!.. ३

*

तितिक्षा सर्वास होती,

घेण्यास ज्ञान सखोल!

वृत्ती सर्वांच्याच होत्या,

तितिक्षेत समतोल!… ४

*

आकलन झाले सर्वां,

ही आहेत दैवी बाळे!

यांच्या अथांग ज्ञानात,

श्रीकृष्ण अंतरी खेळे!.. ५

*

जाणली त्यांची तितिक्षा,

योगेश्वराने अंतरी!

ज्ञानेश्वरी ही जन्मली,

या नेवाश्यात भूवरी!.. ६

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचनाएँ/Information ☆ न्यूयार्क से ~ विश्व हिंदी दिवस और हिंदी दिवस: भाषा के दो उत्सव ~ ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

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(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹 न्यूयार्क से ~ विश्व हिंदी दिवस और हिंदी दिवस: भाषा के दो उत्सव ~ 🌹 श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 🌹

भारत की आत्मा उसकी भाषाओं में बसती है, और उन सबमें हिंदी का स्थान केन्द्रीय है। हिंदी केवल राष्ट्रभाषा नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की सांस्कृतिक पहचान, संवेदना और अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसी गौरव को मनाने के लिए हर वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस और 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। दोनों का उद्देश्य एक ही है ,भाषा के प्रति सम्मान और उसके विस्तार के संकल्प को जन जन में जगाना, फिर भी इनके परिप्रेक्ष्य अलग हैं।

हिंदी दिवस का राष्ट्रीय संदर्भ 

14 सितंबर, 1949 को भारत की संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा के रूप में स्वीकृति दी थी। तभी से हिंदी दिवस मनाने की परंपरा शुरू हुई। यह दिन हिंदी को प्रशासन और शासन की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने का प्रतीक है। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थानों में आयोजित कार्यक्रम हिंदी के औपचारिक संवर्धन के प्रयासों को प्रेरणा देते हैं। 14सितंबर का  दिन इंगित करता है कि हिंदी केवल बोलचाल की नहीं, बल्कि शासन और संवाद की प्रमुख धारा है।

विश्व हिंदी दिवस का अंतरराष्ट्रीय अर्थ 

विश्व मंच पर हिंदी की पहचान को प्रतिष्ठित करने के उद्देश्य से पहला विश्व हिंदी सम्मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित हुआ था। उसी घटना की स्मृति में प्रत्येक वर्ष 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विदेशों में बसे भारतीय, विश्वविद्यालयों और सांस्कृतिक संस्थानों के हिंदी प्रेमी  सभी मिलकर हिंदी के वैश्विक विस्तार का उत्सव मनाते हैं। यह केवल भाषा का उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के विविध रंगों को साझा करने का अवसर है।

न्यूयॉर्क काउंसलेट में विश्व हिंदी दिवस का रंगारंग आयोजन 

विश्व हिंदी दिवस की पूर्व संध्या पर भारतीय वाणिज्य दूतावास, न्यूयॉर्क में एक भव्य और रंगारंग आयोजन हुआ। विदेश की धरती पर हिंदी की गूंज सुनना अपने आप में एक अनमोल अनुभव रहा। इस अवसर पर मैंने स्वयं अपनी हिंदी रचना प्रस्तुत की, जिसे उपस्थित जनों ने बड़े मनोयोग से सुना।

कविता यह रही…

विदेश की धरती पर हिंदी

हिंदी है अस्मिता ,पहचान भारतीय

परदेश में, जन गण की शान भारतीय

भारत की राष्ट्र भाषा है, अभिमान है

विदेश की धरती पर हिंदी,पूरा हिन्दुस्तान है

 

प्राची की वाणी, शब्दों की गंगा है

एकता का सूत्र, संस्कृति का डंका है

विदेश में शाश्वत भावों की धारा है

विदेश की धरती पर हिंदी व्यवहार हमारा है

 

गिरमिटिया संग, रामचरित मानस 

दुनियां भर में, बहती पुरवाई है

दूर देश में नई पीढ़ी की उड़ती पतंग है

विदेश की धरती पर हिंदी, मन की उमंग है

 

फिल्मी गीतों में, रुनझुन संगीत है

विदेशी धरती पर मनचाहा मीत है

प्रवासी मन का, देशी परिधान है

विदेश की धरती पर हिंदी देशज सम्मान है

 

यूनीकोड में हिंदी, स्क्रीन आसमान है

डिजिटल दुनियां में, हिंदी का वितान है

इंस्टा की रील डायस्पोरा की मुस्कान है,

विदेश की धरती पर हिंदी नेह प्रावधान है

 

एकता का सूत्र, शाश्वत संचार है

“वसुधैव कुटुंबकम्” का प्रसार है

भारत के भाल की बिंदी , श्रृंगार है

विदेश की धरती पर हिंदी,नेह का संसार है

 

मां बाप आते हैं मौसम की तरह

परदेश में बच्चों के पास

खुशनुमा मुकाम है

विदेश की धरती पर हिंदी

प्यार का पैगाम है

आरजू है, इल्तिज़ा है ,

दुआ है सलाम है !

कार्यक्रम में झिलमिल, हिंदी यूएसए, गुलमोहर, डॉ. सोनिया शर्मा अकादमी तथा अल्फ्रेड स्कूल जैसी संस्थाओं की सक्रिय सहभागिता रही, जिन्होंने अपनी प्रस्तुतियों से हिंदी प्रेम को स्वर दिया। सजीव मंचन, गीत-संगीत, और वक्तव्यों ने वातावरण को उत्सवमय बना दिया।

 

इस अवसर पर मेरे सुपुत्र अमिताभ और श्रीमती कल्पना श्रीवास्तव भी सहभागी रहीं, जिनकी उपस्थिति ने इस क्षण को और भी आत्मीय बना दिया। रात्रिभोज के उपरांत यह प्रेरणादायक आयोजन सम्पन्न हुआ।

विदेश की भूमि पर हिंदी के प्रति ऐसा उत्साह देखकर मन में गर्व और भावुकता का संगम उमड़ पड़ा… जय हिंदी, जय भारती।

साभार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ई-अभिव्यक्ति, सम्पादक (हिन्दी)

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ जबलपुर शहर ने ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया ☆ साभार – श्री हिमांशु राय  ☆

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🙏💐 स्मृतिशेष ज्ञानरंजन 💐🙏

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

🌹 जबलपुर शहर ने ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया 🌹 साभार – श्री हिमांशु राय 🌹

(साभार – जबलपुर सफरनामा)

जबलपुर शहर के साहित्य जगत और कला जगत ने अपने ज्ञानरंजन को शिद्दत से याद किया। ज्ञान जी का निधन 7 जनवरी को हुआ। 10 जनवरी को शाम 4 बजे अन्नपूर्णा होटल इन के सभागार में ज्ञानरंजन जी को याद करने के लिए शहर के लोग जमा हुए। चार बजे लोग आना शुरू हुए और कुछ ही देर में हॉल पूरा भरा हुआ था। लोग बाहर खड़े थे। इनमें वो सब थे जो किसी न किसी कारण ज्ञान जी से जुड़े हुए थे। ज्ञान जी एक सार्वजनिक व्यक्तित्व थे। उनका हर व्यक्ति और संस्था से व्यक्तिगत ताल्लुक था। इसीलिए ज्ञान जी की श्रद्धांजलि सभा में साहित्यकार, पत्रकार, कलाकार और बड़ी संख्या में उनसे व्यक्तिगत रूप से जुड़े व्यक्ति शामिल थे।

अवधेश बाजपेयी ने ज्ञान जी का एक बहुत सुंदर पोट्रेट बनाया था। विवेक चतुर्वेदी ने श्रद्धांजलि सभा का बैनर बनाया था। पंकज स्वामी ने पूरे कार्यक्रम को फेसबुक लाइव करने की व्यवस्था की थी। अजय धाबर्डे ने फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के द्वारा हर क्षण को कैद किया। सबसे पहले हिमांशु राय ने सभा की शुरूआत की और बांकेबिहारी ब्यौहार को संचालन के लिए आमंत्रित किया। बांकेबिहारी ब्यौहार ने ज्ञानरंजन जी के सन् 1961 से जी एस कॉलेज में साथ रहे वरिष्ठ साहित्यकार श्री कुंदनसिंह परिहार को आमंत्रित किया। परिहार जी ने कहा कि ज्ञानरंजन उस दौर में अपनी कहानियां और उनकी भाषा के कारण बहुत चर्चा में रहे। वे बहुत खिलंदड़े व्यक्ति थे। साहित्य के अतिरिक्त उन्होंने खूब मित्र बनाए। लोगों के सुखदुख में खूब साथ दिया। राजेन्द्र चंद्रकांत राय ने कहा कि कॉलेज के दिनों में ज्ञान जी से परिचय हो जाने के कारण उनका साहित्य से गहरा नाता बना। उनकी कहानियां परंपरागत कहानियां से बहुत अलग थीं। इंदौर से आए तरूण भटनागर ने कहा कि उनके बिलकुल शुरूआती दौर में ज्ञानजी की कहानियां ने प्रभावित किया। ज्ञानजी ने उन्हें कहानियां लिखने के प्रेरित किया और मार्गदर्शन किया। राजेन्द्र दानी ने भरे गले से ज्ञान जी के सान्निध्य को याद किया। उन्होंने कहा कि ज्ञानजी जितने बड़े साहित्यकार थे उतने ही बड़े मनुष्य थे। वे हमारी और हमारे परिवार की व्यक्तिगत चिन्ता करते थे। उन्होंने पहल के सहयोगी के रूप में मुझे बहुत सिखाया और मुझ पर भरोसा किया। ज्ञान जी के निकट सहयोगी मनोहर बिल्लोरे ने कहा कि उनसे परिचय के बाद मेरा जीवन बदल गया। मैं न केवल साहित्य का अध्येता बना वरन उनके साथ पहल पत्रिका के लिए एक सहयोगी बन सका। उनके साथ प्रतिदिन बैठता था। राजीव शुक्ल ने बताया कि सन सत्तर के दशक में जबलपुर आकर जब ज्ञानजी से मुलाकात हुई तबसे आज तक गहरे संबंध बने हुए हैं जो साहित्य से लेकर व्यक्तिगत और पारिवारिक रहे हैं। पंकज स्वामी ने कहा कि ज्ञान जी ने समाज में हर किसी की चिंता करते थे। उन्होंने मेरे पुत्र से अलग से बातचीत की और उसकी परेशानियों को समझा। अपने यहां सब्जी देने आने वाले की लड़की को लैपटॉप खरीद कर दिया। कॉफी में बैठकर भी वो ये देखते थे कौन किस तरह से व्यवहार कर रहा है और उसकी व्यक्तिगत समस्या क्या है ?

हिमांशु राय ने याद करते हुए कहा कि सुदीप बैनर्जी के निधन पर उन्होंने कहा था कि मृत्यु को उत्सव के रूप में लिया जाना चाहिए। ज्ञान जी ने एक बहुत शानदान जीवन जिया। एक लेखक के रूप में वो अमर रहेंगे। उन्होंने अपने संपर्क में आए हर व्यक्ति से व्यक्तिगत संबंध बनाए और उसकी चिंता की। वो आलोचना करने और दंडित करने में भी पीछे नहीं रहते थे। उन्होंने सिखाया कि हर आयोजन को कितने सुनियोजित तरीके से किया जाना चाहिए। यहां तक कि इस उम्र में भी वे अपने कार्यक्रम का कार्ड बांटने घर घर जाया करते थे। पहल संगोष्ठी के रूप में उन्होंने एक बहुत शानदार परंपरा कायम की।

इंदौर से आए सुरेश पटेल ने भरे गले से बताया कि जीवन के शुरूआती दौर में ज्ञान जी ने उन्हें प्रेरणा दी कि तुम कबीर पर कार्य करो। आज कबीर समूह की अन्तर्राट्रीय स्तर की गतिविधि का कारण ज्ञान जी की प्रेरणा रही है। डा निशा तिवारी ने बताया कि प्रारंभ में उनके ज्ञान जी से संपर्क कालेज के कामों के कारण हुए। बाद में उन्होंने मेरे लेखन की प्रशंसा की। अवधेश बाजपेयी ने कहा कि मैं गांव से आया। जब ज्ञान जी से मिला तो ऐसा लगा मानो एक अभिभावक मिल गया जिसने मुझे कला की समझ और दृष्टि दी। विवेक चतुर्वेदी ने कहा कि ज्ञान जी ने हमेशा प्रोत्साहित किया और आलोचना के द्वारा रचनाओं का परिमार्जन किया। डा सुधीर तिवारी ने बताया कि उनके मेडिकल कॉलेज के दिनों में ज्ञानरंजन जी ने उनके नाटकों का निर्देशन किया था। श्रीमती गीता तिवारी ने ज्ञानरंजन जी से अपने पारिवारिक संबंधों को याद किया। डा स्मृति शुक्ला, श्रद्धा सुनील, कुंदन सिद्धार्थ, डा राधेश्याम सुहाने और डा अनामिका तिवारी ने उनके जीवन में ज्ञान जी के महत्व के बारे में बताया।

इस श्रद्धांजलि सभा में सैकड़ों लोग शामिल हुए। और अंत तक रूके रहे। किसी का जाने का मन नहीं कर रहा था। सभा के पश्चात् देर तक सभी लोगों ने मिलकर ज्ञान जी को लगातार याद किया। श्रद्धांजलि सभा में ज्ञानरंजन के पुत्र शांतनु, बहु, पोती ऋतुपर्णा और पुत्री वत्सला व नातिन सुकृति भी सीधे अस्पताल से आकर शामिल हुए। उल्लेखनीय है कि ज्ञान जी के निधन के उपरांत श्रीमती सुनयना ज्ञानरंजन अस्पताल में भरती हैं।

श्रद्धांजलि सभा में डा छाया राय, आकांक्षा सिंह, मदन तिवारी, मनु तिवारी, अजय यादव, देवेन्द्र सुरजन, प्रकाश दुबे, गंगाचरण मिश्रा, बसंत मिश्रा, पंकज कौरव, दिनेश चौधरी, विवेक श्रीवास्तव, रीना शुक्ला, तनु राय, डा भारती शुक्ला, नरेश जैन, रमेश सैनी, युनुस अदीब, तपन बैनर्जी, नवीन चौबे, मुरलीधर नागराज, डा एस के सिंह, सतीश रेड्डी, वेदप्रकाश अधौलिया, देवेन्द्र श्रीवास्तव आदि उपस्थित थे। पहल परिवार, अन्विति, विवेचना, विवेचना रंगमंडल, समागम रंगमंडल, नाट्यलोक, रंगाभरण, सुरपराग, म प्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रगतिशील लेखक संघ, कालजयी अनिल कुमार श्रीवास्तव फाउंडेशन आदि के सदस्य उपस्थित रहे।

साभार –  श्री हिमांशु राय, जबलपुर, मध्यप्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ संपादकीय निवेदन – डॉ. शैलजा करोडे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

डॉ. शैलजा करोडे

💐 अ भि नं द न 💐

मराठी भाषा विभाग , महाराष्ट्र शासन व महाराष्ट्र राज्य साहित्य आणि सांस्कृतिक मंडळ, मुंबई, यांच्या अनुदानातून जामनेर तालुका साहित्य संस्कृती मंडळाने आयोजित केलेल्या ‘ ग्रामीण युवा साहित्य संमेलन’ या दोन दिवसीय संमेलनात आपल्या समूहातील ज्येष्ठ लेखिका, कवयित्री डॉ. शैलजा करोडे यांच्या ” निशिगंध ” या ललित लेख संग्रहास  ” उत्कृष्ट ग्रंथ ” पुरस्काराने गौरविण्यात आले आहे. डॉ. शैलजा करोडे यांचे हे २५ वे पुस्तक आहे.

तसेच, ‘ समाज चिंतामणी प्रतिष्ठान, जळगाव ‘ आयोजित दुसऱ्या अखिल भारतीय online साहित्य संमेलनाच्या अध्यक्षा म्हणून शैलजाताईंना आमंत्रित केले गेले आहे.  

या दुहेरी सन्मानाबद्दल ई-अभिव्यक्ती (मराठी) परिवारातर्फे शैलजाताईंचे मनःपूर्वक अभिनंदन, आणि त्यांच्या यापुढील अशाच यशस्वी साहित्यिक वाटचालीसाठी हार्दिक शुभेच्छा !💐💐

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कविता ☆ शिवरूप दत्त स्तवन… + संपादकीय निवेदन – सौ. ज्योती कुलकर्णी – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ. ज्योती कुलकर्णी

💐 अ भि नं द न 💐

तितिक्षा भावार्थ सेवांतर्गत तितिक्षा इंटरनॅशनल, पुणे, आयोजित, साखळी चित्र काव्य लेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका सौ. ज्योती कुळकर्णी यांनी तीन चित्र काव्ये सादर केली होती. या तीन कव्यांसाठी त्यांना स्पर्धेत तृतीय क्रमांक प्राप्त झाला आहे.

ई अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे सौ. ज्योती कुळकर्णी यांचे मन: पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा!💐💐

पुरस्कार प्राप्त कविता ‘शिवरूप दत्त स्तवन आज प्रकाशित होत आहे. 🪻

संपादक मंडळ

ई अभिव्यक्ती मराठी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “शिवरूप दत्त स्तवन” ☆ सौ. ज्योती कुलकर्णी ☆

(तितिक्षा इंटरनॅशनल पुणे आयोजित साखळी चित्र काव्य लेखन स्पर्धेत – तृतीय पारितोषिक प्राप्त)

(पादाकुलक वृत)

अत्रीनंदन दत्ताच्या या

नमन करीते शिवरूपाला

मातृत्वाने या देवांच्या

सतीत्व ओळख अनसूयेला

*

श्रीदत्तगुरू अन विश्वगुरू

हाती त्याच्या चक्र सुदर्शन

सदा सर्वदा खल निर्दालन

देवाला या त्रिवार वंदन

*

त्रिशूल मानक त्रय गुण धारी

स्फटिक माळ ही करी शोभली

कमंडलूधर ईश्वर योगी

रुद्राक्षाची माळ घातली

*

त्रैमूर्तीचे दर्शन सुंदर

या जन्माचे सार्थक करते

नटराजाचे शिवतांडव की

न्याय गर्जना जगात घुमते

*

शिवदत्तात्रय कल्याणास्तव

हातामधला शंख फुंकतो

डमरूमधला ध्वनी येथले

उत्पत्ती लय सत्य मांडतो

© सौ. ज्योती कुलकर्णी

अकोला.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचनाएँ/Information ☆ स्मृतिशेष जय प्रकाश पाण्डेय जी को व्यंग्य मित्र अलंकरण समर्पित ☆ साभार – श्री रमाकांत ताम्रकार ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ स्मृतिशेष जय प्रकाश पाण्डेय जी को व्यंग्य मित्र अलंकरण समर्पित साभार – श्री रमाकांत ताम्रकार

रूप बदलते साँप व्यंग्य संग्रह का लोकार्पण संपन्न

व्यंग्यम का भावभीना कार्यक्रम

श्रीजानकीरमण महाविद्यालय में स्व. जयप्रकाश पाण्डेय जी का स्मृति जन्मोत्सव एवं व्यंग्य संग्रह “रूप बदलते साँप” का लोकार्पण संपन्न हुआ जिसमें मुख्य अतिथि श्री राजीव कुमार शुक्ल, विशिष्ट अतिथि रूप में श्रीजानकीरमण महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ अभिजात कृष्ण त्रिपाठी तथा मुख्य वक्ता के रूप में आचार्य भगवत दुबे  रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ कुंदनसिंह परिहार ने की।

स्व. जयप्रकाश पाण्डेय

कार्यक्रम का शुभारंभ माँ वीणा वादिनी के समक्ष दीप प्रज्ज्वलन से प्रारंभ हुआ। तदोपरांत स्व जयप्रकाश पाण्डेय जी के छाया चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। व्यंग्यम का परिचय एवं  स्वागत उद्बोधन रमाकांत ताम्रकार द्वारा दिया गया। स्व पाण्डेय जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर सुरेश मिश्र विचित्र‘, अभिमन्यु जैन सहित स्वर्गीय श्री पांडेय जी की धर्मपत्नी श्रीमती मंजू पांडेय जी ने अपने आत्मीय उद्गार व्यक्त किए।

अतिथियों के करकमलों द्वारा स्व. श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी के व्यंग्य संग्रह रूप बदलते साँपका भव्य लोकार्पण किया गया। इसी अवसर पर श्री दविंदर ग्रोवर ने व्यंग्य संग्रह रूप बदलते सांपमें संकलित अस्थि विसर्जन का लफड़ा व्यंग्य का पाठ किया गया। साथ ही आचार्य विजय तिवारी किसलयएवं यशोवर्धन पाठक ने पुस्तक पर चर्चा करते हुए विभिन्न प्रसंगों की विस्तृत व्याख्या की। हेमन्त बावनकर के श्री पांडेय जी पर केन्द्रित आलेख का वाचन किया। व्यंग्यम संस्था द्वारा श्री पांडेय जी के परिजनों को पाण्डेय जी को मरणोपरांत व्यंग्य मित्रअलंकरण प्रदान किया गया।

संपूर्ण कार्यक्रम का कुशल संचालन प्रतुल श्रीवास्तव ने तथा आभार श्री विनोद खंडालकर द्वारा व्यक्त किया गया। आयोजन में राज सागरी, मनोज शुक्ल मनोज, आशुतोष तिवारी, डॉ गंगाधर त्रिपाठी, अजय मिश्रा, संजय जैन, अनिल अग्रवाल, नरेश जैन, मकबूल अली कादरी, ओ पी गुप्ता अशोक शुक्ल, गणेश प्यासा, सुभाष जैन शलभ, मनोज जैन मित्र, सुजय पांडेय, स्वयं पांडेय की उल्लेखनीय उपस्थिति रही।

साभार – श्री रमाकांत ताम्रकार, जबलपुर  

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ ☆ पुणे में संपन्न सार्थक काव्यगोष्ठी ☆ साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ पुणे में संपन्न सार्थक काव्यगोष्ठी ☆ साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे ☆

हाल ही में हिंदी के सुप्रतिष्ठित कवि संदीप मिश्रा सरसजी के पुणे आने की ख़ुशी में काव्यगोष्ठी का आयोजन किया गया था । हिंदी-सिन्धी-उर्दू कवयित्री इंदिरा पूनावाला जी ने इस गोष्ठी का आयोजन किया था। काव्यगोष्ठी के अध्यक्ष कवि संदीप मिश्रा सरसजी और प्रमुख अतिथि श्री. राजेंद्र श्रोत्रिय जी को पुष्प, श्रीफल, शाल देकर सम्मानित किया गया।

इस अवसर पर ज्येष्ठ कवि श्री. नंदकुमार मिश्र आदित्य सामवेदी‘, श्री. गोविंद मिश्र, श्री. राजेंद्र श्रोत्रिय, डॉ. प्रेरणा उबाले, भावना गुप्ता, कुमार गौरव, वेद स्मृति मौजूद थे और उन्होंने अपनी कविताएँ काव्य गोष्ठी में प्रस्तुत की।

हास्य व्यंग्य कवि, नाटककार श्री राजेंद्र श्रोत्रिय, मध्य प्रदेश ने सरस्वती वंदना गाकर काव्य गोष्ठी का आरंभ किया तथा गाँव की स्मृतियाँ तजा करनेवाली शहरों से आया है प्रभाव, कितना बदल गया है गाँवकविता लय में प्रस्तुत कर सबको गाँव के वातावरण में ले गए। काव्य गोष्ठी की आयोजक इंदिरा पूनावाला शबनमने डरते-डरते एक-दूसरे के करीब आते हैं क्योंशीर्षक गज़ल पढ़कर समां बाँध दिया।

पुणे की हिंदी- मराठी में लेखन करने वाली कवयित्री डॉ. प्रेरणा उबाले ने जीवन की शाश्वतता और क्षणभंगुरता को प्रतिपादित करने वाली मिटता कुछ नहीं जिन्दगी से, मिलता सबकुछ जिन्दगी सेऔर भूख थोड़ी बची रहें, पेट में आग थोड़ी बची रहें शीर्षक कविताएँ प्रस्तुत की। श्री. गोविन्द मिश्र, ने अपने गाँव और पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कार्य की महती गानेवाला गीत प्रस्तुत किया। और वेद स्मृति कृति‘, उत्तरप्रदेश ने कुंडलियाँ छंद में माता धवला दो मुझे वरदानकविता का सरस पठन किया।

काव्य गोष्ठी के अध्यक्ष और प्रमुख अतिथि , साहित्य सृजन के संस्थापक श्री. संदीप मिश्र जी ने पुणे के अपने अनुभव सबसे साझा किए। पुणे की सभ्यता- संस्कृति की उन्होंने मुक्त कंठ प्रशंसा की। साथ ही पुणे के लोगों का हिंदी भाषा और साहित्य के प्रति रुझान उन्हें अच्छा लगा और अपनी अनुभूतियों से निर्मित कविताओं का सस्वर पठन किया मायके को संभाल देती हैं बिटिया, मन को खंगाल देती हैं बिटियाँकविता से उन्होंने सबको मोह लिया। वेद मन्त्रों का पूर्ण फल अम्मा, गंगा के दिव्य जल अम्मा, जिन्दगी की कठिन परीक्षा में , सारे प्रश्नों का एक हल अम्माकविता ने सबकी वाहवाही बटोरी। साथ ही भावना गुप्ता ने मैं कैसे कह दूं रुक जाना,’ और शांत हूँ खुद मेंकविताओं को प्रस्तुत किया।

सांस्कृतिक, सामाजिक दृष्टियों से साहित्य और भाषा को संरक्षण देने वाली तथा उनका संवर्धन करने वाली इस तरह की गोष्ठियों का आयोजन बहुत आवश्यक प्रतीत होता है। इंदिरा पूनावाला शबनमद्वारा आयोजित इस काव्य गोष्ठी में सभी ने कविताओं का आनंद लिया। विभिन विषयों पर पढ़ी गई कविताओं से हर्षोल्लास का वातावरण काव्य गोष्ठी में छाया रहा।

साभार – डॉ. प्रेरणा उबाळे

अध्यक्ष, हिंदी विभाग, मॉडर्न महाविद्यालय, शिवाजीनगर, पुणे

संपर्क- 7028525378

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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