हिंदी साहित्य – आलेख ☆ 🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें 🌱 

🏔️ हिमालय में 7,500 ग्लेशियर झीलें—क्या 189/195 झीलें कभी भी फट सकती हैं?

🇳🇵 नेपाल की त्रासदी से सबक, लेकिन घबराहट नहीं

नेपाल में हुई भीषण हिमालयी त्रासदी ने स्वाभाविक रूप से पूरे हिमालय को लेकर चिंता बढ़ा दी है। इसी बीच एक प्रमुख अखबार की यह सुर्खी सामने आई—

“चिंता… देश में 189 ग्लेशियर झीलें फटने की स्थिति में, पूरे हिमालय में 7500 ऐसी झीलें।”

सुर्खी निश्चित ही डर पैदा करती है। लेकिन क्या वास्तविक स्थिति इतनी भयावह है?

थोड़ा तथ्य समझना उपयोगी होगा। 🔍

🏔️ 7,500 का मतलब क्या है?

भारतीय हिमालय में हजारों छोटी-बड़ी ग्लेशियल झीलें हैं। National Remote Sensing Centre (NRSC) ने उपग्रहों की सहायता से 7,500 से अधिक ग्लेशियल झीलों को मैप किया है। ये 7,500 ऐसी झीलें नहीं हैं जिन्हें सरकार ने “फटने के कगार पर” माना है।

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, भारतीय हिमालयी क्षेत्र में कुल संख्या इससे भी काफी अधिक—लगभग 28,000 ग्लेशियल झीलों—की है। 7,500 का आंकड़ा उन झीलों से सम्बद्ध है जिन्हें उपग्रह आधारित अध्ययन में चिन्हित/मैप किया गया है।

🚨 फिर 189 या 195 का क्या अर्थ है?

यहीं पर समाचार की सुर्खी और वास्तविकता के बीच फर्क समझना जरूरी है।

NDMA ने विभिन्न वैज्ञानिक आंकड़ों, उपग्रह चित्रों और अन्य अध्ययनों को मिलाकर जोखिम-प्रधान झीलों की एक dynamic list तैयार की है।

2024 में इस सूची में 195 high-risk glacial lakes थीं। इससे पहले 189 का आंकड़ा प्रचलित था। अर्थात् 189 कोई “189 झीलें अभी फटने वाली हैं” वाली संख्या नहीं थी।

और high-risk का अर्थ “किसी भी क्षण फटने वाली” भी नहीं है।

इसका अर्थ है कि इन झीलों में ऐसे जोखिम-संकेत पाए गए हैं—जैसे क्षेत्रफल में तेजी से वृद्धि—जिनके कारण इनके संभावित GLOF (Glacial Lake Outburst Flood) का वैज्ञानिक आकलन और जोखिम-निवारण प्राथमिकता से किया जाना चाहिए।

🛰️ क्या सरकार केवल आंकड़े गिन रही है?

नहीं।

सरकार ने इस खतरे को गंभीरता से लेते हुए National Glacial Lake Outburst Flood Risk Mitigation Programme (NGRMP) शुरू किया है। इसके अन्तर्गत high-risk झीलों का ground assessment, जलस्तर और मौसम की निगरानी, bathymetric surveys, early-warning systems तथा आवश्यकता के अनुसार झील का जलस्तर कम करने जैसे उपाय किए जा रहे हैं।

Central Water Commission भी हिमालयी क्षेत्र में बड़ी ग्लेशियल झीलों और जल निकायों की नियमित निगरानी करता है और GLOF के लिए अधिक संवेदनशील अवधि में monitoring bulletins जारी करता है।

🇳🇵 नेपाल की त्रासदी हमें क्या बताती है?

नेपाल में हुई हालिया आपदा को केवल यह कहकर समझना भी सही नहीं होगा कि “एक ग्लेशियर झील फट गई और बाढ़ आ गई।”

उपलब्ध प्रारम्भिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, वहां glacier/ice-rock collapse और debris flow की cascading घटना ने नदी में अचानक अत्यन्त शक्तिशाली बाढ़ पैदा की। अर्थात् हिमालयी खतरे अनेक रूपों में सामने आ सकते हैं—glacial lake outburst, glacier collapse, landslide, debris flow अथवा प्राकृतिक अवरोध टूटने के रूप में।

🌡️ फिर असली चिंता क्या है?

चिंता जरूर है—लेकिन घबराने की नहीं, जागरूक होने की।

बढ़ते तापमान, ग्लेशियरों के पीछे हटने और कुछ ग्लेशियल झीलों के विस्तार से हिमालय की प्राकृतिक अस्थिरता बढ़ सकती है। इसलिए वैज्ञानिक निगरानी, early-warning systems, downstream hazard mapping, स्थानीय समुदायों की तैयारी और संवेदनशील क्षेत्रों में अनियंत्रित निर्माण पर सावधानी अत्यन्त आवश्यक है।

लेकिन “हिमालय में 7,500 झीलें हैं और 189 कभी भी फट सकती हैं” कहना उपलब्ध सरकारी आंकड़ों का सही अर्थ नहीं है।

🌱 सही निष्कर्ष

न तो खतरे को नकारना समझदारी है,

न ही आंकड़ों को सनसनी में बदलना।

हिमालय हमें चेतावनी दे रहा है कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ की गुंजाइश कम होती जा रही है। इसका उत्तर डर फैलाना नहीं, बल्कि विज्ञान, सतर्कता, बेहतर आपदा-प्रबंधन और पर्यावरण-सम्मत विकास है।

🏔️ हिमालय को डर की नजर से नहीं,

समझ और सम्मान की नजर से देखने का समय है।

🌿 जागरूक रहें। घबराएँ नहीं।

प्रकृति को समझें—और उसकी सीमाओं का सम्मान करें।

प्रस्तुति: जगत सिंह बिष्ट 🪷

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

LifeSkills

A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८२ ⇒ बस्ता ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “बस्ता…“।)

?अभी अभी # १०८२ ⇒ आलेख – बस्ता ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

अमीरों की टाउनशिप होती है, गरीबों की बस्ती ! बस्ती के बच्चे सरकारी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन और छात्रवृत्ति के लिए जाते हैं, और टाउनशिप के बच्चे आईपीएस और डीपीएस में एक अच्छा इंसान बनने। वे भी क्या दिन थे, जब सबके लिए एक ही स्कूल होता था, और एक जैसा ही बस्ता।

घर में हाथ से सिली हुई थैली ही बस्ता कहलाती थी, जिसमें एक पट्टी, पेम, पेंसिल और पढ़ने-लिखने की किताब होती थी।

कुछ सम्पन्न बच्चे तो पानी-पोता भी लेकर आते थे। कुछ गंदे बच्चे थूक से पट्टी पोंछ लेते थे, तो कुछ लट्ठे के कमीज से ही पट्टी साफ कर लिया करते थे। जिस रोज कोई राष्ट्रीय त्योहार होता था, बस्ती-पट्टे की छुट्टी हो जाती थी।।

समय के साथ बस्ता भी बड़ा होता चला गया। हर विषय की कॉपी किताब, परीक्षा के समय स्याही वाला पेन, स्केल, कंपास और न जाने क्या क्या ! जो बस्ता कभी हाथ में रहता था, अचानक वेताल की तरह कंधे पर आ बिराजा। खाने का टिफ़िन और वॉटर बॉटल भी साथ में ही लद लिये।

कभी कभी रेलवे के हम्मालों के कंधों और सर पर बोझा लदा देखकर आज के स्कूली बच्चे निगाहों के सामने आ जाते हैं।

मोटी ताज़ी स्कूल की फीस के साथ बच्चों के कंधों पर बस्ते का बोझ, सर पर पढ़ाई का बोझ, और माता-पिता पर बच्चे के उज्ज्वल भविष्य का बोझ।।

बस्ता बच्चे की पहचान है ! कभी किसी के बस्ते को लात लग जाती, तो उसको छूकर माफी माँगनी पड़ती थी। वह विद्या है। समय कितना भी बदल जाए, बस्ते में विद्या है, ज्ञान का भंडार है, सरस्वती का वास है। बच्चों का भविष्य है, माता पिता के सपने इन्हीं बस्तों में बंद है।

यह बस्तों की बस्ती है। यहाँ दिन भर मेहनत है, पढ़ाई है, और आंखों में अच्छे नम्बरों से पास होने की, स्कूल में टॉप करने की उम्मीद बसती है। बच्चा है, तो बस्ता है, जिसमें से ज्ञान बरसता है। हर बस्ते में एक बच्चे का सुनहरा भविष्य बसता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३४६ ☆ आलेख – खाप और खूंटा (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय आलेख – ‘खाप और खूंटा (वैचारिकी)‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३४६ ☆

☆ आलेख ☆ खाप और खूंटा (वैचारिकी) ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

हाल ही में हरयाणा की एक खाप पंचायत का ब्यौरा टीवी पर देखा। पंचायत में अन्य निर्णयों के अलावा लड़कियों के आचरण के बारे में कुछ निर्णय लिये गये— कि लड़कियां दुपहिया वाहन पर पीछे बैठते वक्त एक ही तरफ पैर रखें, दोनों तरफ नहीं, छोटे कपड़े न पहनें, मोबाइल का इस्तेमाल न करें, भाग कर शादी न करें, शादी में माता-पिता की सहमति लें, ‘लिव इन’ में न रहें। मर्जी की शादी करने वाले और ‘लिव इन’ में रहने वाले जोड़ों के लिए सामाजिक बहिष्कार की सज़ा निर्धारित की गयी।

ज़हिर है कि पितृसत्तात्मक समाज युवाओं, ख़ास तौर से लड़कियों पर अपनी गिरफ्त ढीली नहीं करना चाहता। हमारा संविधान नागरिकों को जो भी अधिकार दे, ये जाति- पंचायतें और ग्राम-पंचायतें समाज को पुरानी, प्रासंगिकता खो चुकी मान्यताओं में ही जकड़ कर रखना चाहती हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के एक ताज़ा निर्णय के अनुसार लिव-इन रिश्ता शादी जैसा है। माता-पिता इसमें दख़ल नहीं दे सकते।

आज की लड़कियों को देखकर यह समझना मुश्किल है कि वे कितने  संघर्ष और कितनी बाधाओं को लांघ कर वर्तमान स्थिति तक पहुंच पायी हैं। कन्या भ्रूण हत्या, बाल विवाह, सती प्रथा, कन्या शिक्षा निषेध, विधवा विवाह निषेध, देवदासी प्रथा जैसे जाने कितने सड़े-गले नियम ख़त्म किये गये। इसमें उच्च अंग्रेज़ अधिकारियों और देशी समाज-सुधारकों की बड़ी भूमिका रही, जिन्होंने रूढ़िवादियो के कट्टर विरोध के बाद भी अपने प्रयासों में ढील नहीं आने दी। कहीं पढ़ा  कि प्राचीन बंगाल में पति की मृत्यु के बाद विधवा की दुर्गति हो जाती थी। बहुत दिनों तक मांगलिक कार्यों में विधवाओं को शामिल नहीं किया जाता था। विधवा के द्वारा रंगीन वस्त्र पहनना या आभूषण धारण करना भी अनुचित माना जाता था। उससे जीवन भर सफेद सादा वस्त्र धारण करने की अपेक्षा की जाती थी।

कई साल पहले एक अखबार में सती प्रथा पर एक बड़े धर्मगुरु का वक्तव्य पढ़ा था। वे राजस्थान में सती-प्रथा पर प्रतिबंध लगने से दुखी थे। उनका कथन था— ‘जो स्वेच्छयता से सती होना चाहती है उसे रोकना नहीं चाहिए और जो सती नहीं होना चाहती उसे इस कार्य के लिए बाध्य भी नहीं किया जाना चाहिए।— हमारे यहां आत्महत्या करने से पाप होता है, लेकिन सती को ऐसा कोई पाप नहीं लगता और सती होकर वह पति को भी पापों से मुक्त कर देती है।— सच्ची सती वह है जो पतिव्रता धर्म का पालन करे। ऐसा करने वाली स्त्री वस्तुत: पति के जीवन काल में ही सती हो जाती है।’

हमारे समाज में अगर सड़क पर लड़के लड़कियों के साथ गुंडई करें तो उसके लिए अक्सर लड़कियों के आचरण और उनके छोटे कपड़ों को ही दोषी माना जाता है। हमारे यहां लड़के-लड़की की दोस्ती को अस्वाभाविक माना जाता है। इसीलिए लड़की तभी सुरक्षित महसूस करती है जब वह लड़कें को अपना ‘भाई’ बना लेती है या उसकी कलाई पर राखी बांध देती है। लड़के- लड़की की ‘दोस्ती’ को हमेशा सन्देह की नज़र से देखा जाता है।

लड़कियों के ‘शऊर’ और उनकी ‘पवित्रता’ को लेकर इतनी ज़्यादा चौकन्नी और चिन्तित खापों को यह याद दिलाना ज़रूरी लगता है कि हरयाणा में ही एक सन्त विराजते हैं जो दो शिष्याओं पर कृपा बरसाने के जुर्म में 2017 से सज़ा काट रहे हैं और अब तक आठ साल में सत्रह बार पैरोल या फ़र्लो पर जेल से बाहर आ चुके हैं। जब भी जेल से बाहर आते हैं कारों के काफिले में निकलते हैं और बाहर आकर ऑनलाइन प्रवचन और भक्तों को आशीर्वाद देते हैं। हरयाणा की खापों की लड़कियों के आचरण पर बारीक नज़र रहती है, लेकिन ऐसे सन्तों के बारे में उनकी ज़बान बन्द रहती है। हरयाणा के एक मंत्री जी भी इन सन्त जी के सामने सिर नवाने के साथ चढ़ावा चढ़ा चुके हैं। कारण यह है कि सन्त जी के करोड़ों शिष्य हैं और उनके इशारे पर करोड़ों वोट पार्टी की झोली में गिर सकते हैं।

हमारे देश में धर्मगुरुओं के प्रति शिष्यों की आस्था इतनी ज़बरदस्त रहती है कि गंभीर आरोपों के बाद भी गुरूजी के प्रति शिष्यों की भक्ति में ‘डेंट’ नहीं लगता। दरअसल ज़्यादातर लोगों के लिए ज़िन्दगी में कोई न कोई खूंटा पकड़े रहना ज़रूरी होता है। बिना खूंटे के अपने बूते ज़िन्दगी काटने वाले विरले होते हैं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
2

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३५० – चमत्कार ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆ संजय उवाच # ३५० ☆ चमत्कार… ?

कभी किसी को कहते सुनते हैं कि आज तो चमत्कार हो गया! क्या है चमत्कार होना? स्थूल रूप से विचार करें तो मनुष्य के लिए जो अकल्पनीय है, ‘लार्जर देन लाइफ’ है, वही चमत्कार है। चमत्कार की विशेषता है कि वे सुनने में आते हैं पर दिखते नहीं। यद्यपि प्रकृति इसका अपवाद है। वहाँ हर क्षण चमत्कार उद्घाटित हो रहे होते हैं, बशर्ते हम उन्हें देखना चाहें।

लौटते हैं मूल विषय पर। चमत्कार एक अलग ही प्रकार की विडंबना का शिकार है। यदि वह आँखों से प्रत्यक्ष दिख गया तो फिर उसे चाहे जो नाम दें पर चमत्कार नहीं रह पाता। चमत्कार का दर्शन ही चमत्कार का विसर्जन है। इस संदर्भ में चमत्कार अभागा है, इस संदर्भ में चमत्कार एकमेवाद्वितीय है।

वस्तुत: चमत्कार कोई वाह्य बल या एक्सटर्नल फोर्स नहीं है। अपनी विसंगतियों से जूझते मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा कर गुज़रने की इच्छा होती है जो उसे सारी कठिनाइयों से पार कर ऊँचे, बहुत ऊँचे स्थापित कर दे। कभी विवशता के क्षणों में मनुष्य कल्पना करता है कि कुछ ऐसा हो जाए कि सारी समस्याएँ क्षण भर में अदृश्य हो जाएँ। कभी चाहता है कि परेशानियों का सामना किए बिना वे छू-मंतर हो जाएँ। प्राय: कामना करता है कि परिश्रम किए बिना ही रातों-रात उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो जाए। अपनी सारी वांछनाओं को पलक झपकते ही पाने का मानसिक माध्यम होता है चमत्कार।

ब्रह्मांड में चमत्कार होते हैं या नहीं, यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है। तथापि मनन करें तो मनुष्य का अस्तित्व अपने आप में चमत्कार उत्पन्न करने का बहुत बड़ा साधन है। दर्शन की एक धारा देह में ब्रह्मांड का दर्शन करती है। ब्रह्मांड समस्त अस्तित्व  का समुच्चय है। इसमें पदार्थ एवं ऊर्जा के सभी रूप तथा उनके द्वारा निर्मित लघुत्तम से महत्तम सभी संरचनाएँ सम्मिलित हैं।

ब्रह्मांड का लघु रूप पिंड या देह है। देह का विस्तार ब्रह्मांड है। एक तरह से देह, ब्रह्मांड का मॉडल है, छोटे आकार की रेपलिका है। मन, प्राण और देह मिलकर संभावनाओं का समुच्चय बनता है।

प्राण को परिभाषित करते हुए शाखायान आरण्यक कहता है,

यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः।

अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।

प्रज्ञा मनुष्य में अस्तित्व फूँक देती है। व्यष्टि को समष्टि की व्यापकता प्रदान करने की प्रकृति है प्रज्ञा‌। प्रकृति ब्रह्मांड का एक अंग है। जैसाकि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, प्रकृति में  निरंतर चमत्कार देखने को मिलते हैं। स्वाभाविक है कि प्रकृति के अंश मनुष्य में भी चमत्कार उद्घाटित करने की क्षमता अंतर्निहित है।

चमत्कार फलीभूत करने के लिए कार्य करना होगा।  कार्य को परिभाषित करते हुए विज्ञान कहता है कि  जब किसी वस्तु पर कोई बल लगाया जाता है और वस्तु उस बल की दिशा में विस्थापित होती है तो इसे बल द्वारा किया गया कार्य कहा जाता है। कार्य के लिए संकल्प, कर्मनिष्ठा और कठोर परिश्रम आवश्यक हैं।

अतः चमत्कार की प्रतीक्षा मत करो। चमत्कार के घटने  का माध्यम बनो। मनुज की देह मिली है, प्रज्ञा मिली है। अपार संभावनाएँ तुम्हारे पास हैं।

जैसे रीछपति जामवंत ने हनुमान जी उनकी क्षमताओं का स्मरण कराया था, वैसे ही आवश्यकता है अपनी क्षमताओं को स्मरण करने की, उनके अनुसार अपना समुद्र पार करने की।

‘चमत्कार’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-

चमत्कार,

चमत्कार,

चमत्कार..!

 

चमत्कार के किस्से

 

सुने सदा,

चमत्कार घटित होते

देखा नहीं कभी,

अपनी क्षमताओं का

चमत्कार

 

उद्घाटित करो,

फिर  चमत्कार को

अपनी आँख के आगे

घटित होते देखा करो..!।

‘स्मरण करने’ इसलिए कहा कि कोई दूसरा स्मरण नहीं कराएगा। अतः स्मरण रहे कि

जांबवंत तुम्हारे भीतर हैं, और हनुमान जी भी।

अब भी किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है क्या?

© संजय भारद्वाज 

रात्रि 12:37 बजे, 18.08.2026 (इसी विचार के साथ नींद खुली।)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी। 🕉️💥 

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०८१ ⇒ चिमटा संड्सी ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “चिमटा संड्सी…“।)

?अभी अभी # १०८१ ⇒ आलेख – चिमटा संड्सी ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

चिमटा और संड्सी का पूरा जीवन, किसी आदर्श गृहिणी की तरह चौके चूल्हे में ही गुजर जाता है। इन्हें भले ही पर्दे में नहीं रखा जाता हो, लेकिन इन्हें कभी रसोईघर छोड़ने की अनुमति नहीं मिलती। बैठक में तो इनकी परछाई भी प्रवेश नहीं कर सकती। इन्हें अक्सर आग से खेलना पड़ता है।

इनका रसोईघर में वही महत्व होता है जो पिंचिस, पेचकस(स्क्रूड्राइवर) और पाने(प्लायर) का एक मैकेनिक के लिए होता है।

रसोईघर भले ही कोई वर्कशॉप नहीं हो, लेकिन एक पाकशाला तो है ही।।

जब चिमटा छोटा होता है तो उसे चिमटी कहते हैं। अक्सर डिसेक्शन बॉक्स में और घड़ीसाजों के पास घड़ी के छोटे छोटे कलपुर्जों को पकड़ने के लिए चिमटियों का उपयोग होता है, जिसे forcep कहते हैं। बचपन में भाई बहन आपस में, और स्कूल में बच्चे एक दूसरे को च्यूंटी खोड़ते थे। यह एक ऐसी हरकत थी, जिस पर अक्सर किसी तीसरे व्यक्ति का ध्यान नहीं जाता था।

नाम के अनुरूप इसमें चींटी काटने जितना ही दर्द होता था। इसकी शिकायत एक आम समस्या थी।

जहां तवा है, वहां चिमटा है। बिना चिमटे के आग पर रोटी नहीं सिकती। पापड़ भी बिना चिमटे के नहीं सिकता। कितनी बार उलटने पलटने पर पापड़ की बेदाग सिकाई होती है, यह सब कुशल गृहिणी के साथ चिमटे का भी तो कमाल है। शैतान बच्चों के लिए माता का यह प्रिय गर्म अस्त्र बन जाता था जिससे सिर्फ उन्हें डराया जाता था।।

जब चिमटा और बड़ा हो जाता है तो उसे सन्यास ग्रहण करना पड़ता है और वह बाबाओं के हाथ में चला जाता है, तवे की रोटी त्याग इसे अलख जगानी पड़ती है। अलख निरंजन।

संड्सी को कुछ लोग संडासी भी कहते हैं, जो गलत है। वे भूल जाते हैं, मराठी में संडास किसे कहते हैं। हमारी भारतीय महिलाओं का रसोईघर, पूजा घर जितना ही पवित्र और साफ सुथरा होता है। कच्चे घरों में तो रोज रसोई के साथ चूल्हे को भी लीपा जाता था। रसोईघर में जूते चप्पल निषेध थे। तपेली, भगोनी और चूल्हे पर चढ़े अन्य गर्म पात्रों को संड्सी की पकड़ ही कुशलता से उतार पाती है। अगर चूल्हे पर दूध उफन रहा हो और आसपास संड्सी नदारद हो तो घर में ही दूध की गंगा बह जाती है।

समय के साथ किचेनवेयर में भी बदलाव आने लगा है। तवे का स्थान हैंडल वाले नॉन स्टिक pan पैन ने ले लिया है। सभी बर्तनों में आजकल हैंडल लगे होते हैं। फिर भी चिमटे और संड्सी का महत्व कम नहीं हुआ है। कुशल गृहिणी है जहां, चिमटा संड्सी है वहां।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६५ – आलेख ☆ ~ धरती की वेदना ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६५ ☆

☆ आलेख ☆ ~ धरती की वेदना ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

(भीषण त्रासदी के कारक )

☆

आसमान से उतर रहे देवताओं को देखकर धरती माँ चिल्लाई,

नहीं नही…भाई अभी इसकी जरूरत नहीं है l अभी मुझ पर उतना अत्याचार नहीं है जितना कहा जा रहा है l अभी भी मै अनेकानेक, नेक इंसानों को लोंगो की मदद करते देख रही हूँ। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है l बस पीड़ा एक बात की है कि क्या सड़क, क्या बाजार, क्या स्कूल, क्या अस्पताल सब धक्कम – रेल हो रही है,

 मैं हिलती जा रही हूँ

मै बुरी तरह से काँप रही हूँ

आने वाले खतरे को भाँप रही हूँ।

कॉलोनी में गाड़ियों का रेला, रेल बनता जा रहा है। मोहल्ले की लड़ाई, किचन बर्तन से उतरकर, गाड़ियों की पार्किंग तक चली आयी है। रोडवेज की एक बस निकली नहीं कि दूसरी भर जा रही है। जहाँ देखो भीड़ ही भीड़।

राशन की लाइन में भीड़,

मॉल- वाटर पार्क में भींड,

ऑफिस दफ्तरों की भींड,

रोडवेज रेलवे स्टेशनो में भींड,

शेर सपाटा-तीर्थ यात्रा करने वालों की भीड़

टूरिस्ट हैं या तथाकथित तीर्थ यात्रियों

मै नही जानता लेकिन लगी हुई है भीड़,

भीड़ ही भीड़, भीड़ इतनी कि मैं खुद अपनी नीड ढूढ़ रही हूँ। रोज बा रोज नए-नए अस्पतालों के खुलने के बावजूद भी अस्पतालों में भीड़ ही भीड़ है। ओ.पी.डी. से ओ.टी. तक की भीड़, एक्स रे -अल्ट्रासाउंड सेंटर की भीड़, पैथोलॉजी में खून निकलवाने वालों की भीड़, अस्पताल के अगल बगल खून चूसने वाले दलालों की भीड़।

इतना ही नहीं टूरिज्म की आड़ में सभी जा रहे हैं झुंड के झुंड पहाड़ों पर। वहाँ भी अब शांति नहीं, क्योंकि ये सारे पदयात्री नहीं।

गाड़ी, घोड़ा, मोटर बग्गी सब कुछ लेकर जाना है। इन लोगों के सुख सुविधा में कोई कमी न हो, वोट बैंक बरकरार रहे इसलिए विकास की आड़ में, काटते चले जा रहे हैं पहाड़ों को। बना रहे हैं रोज एक से एक बड़ी सड़के। मेरे पहाड़ों को तोड़ने के लिए जब आती है इनकी भारी भरकम मशीने, तब शांत पहाड़ चिघाड़ उठते हैं। रोने लगती है उनकी आत्माएं। काट -काट कर गिरा देते हैं देवदार और चीड़ के वृक्षो को। ये वृक्ष जो कि जकड़े रहते हैं अपनी जड़ों से इन पहाड़ों को। पहाड़ों पर पहुंचकर बनाते हैं आलीशान होटल। पहुँच जाती है ढेर सारी गाड़ियाँ। इनके धुओं से बढ़ जाता है यहाँ का टेंपरेचर। टूट के गिर पड़ते हैं, विशाल और विशाल ग्लेशियर। टूट जाती है प्रकृति की बनाई हुई झील की दीवारें और बहता हुआ निकल पड़ता है जानलेवा शैलाब। तब होती केदारनाथ और नेपाल जैसी भीषण त्रासदी

मारी जाती है ढेर सारी मानवता। अनाथ हो जाते हैं छोटे-छोटे बच्चे, बेसहारा हो जाते हैं बुजुर्ग माँ बाप।

यह सब देखकर मैं हिल उठती हूँ। फूट फूट कर रोती हूँ। आखिर मै करूँ तो क्या करूँ, ये तो मानते नहीं है।

पर यह सब होता ही भी है इन्हीं के कारण। इन लोगों ने तो एकदम हलचल बचा कर रख दी है। क्या धरती क्या आसमान, सब जगह भीड़ बेकाबू है, इनकी मनमानी जारी है। एक दिन आसमान भी मुझे रो कर कह रहा था कि तेरे बेटों ने यहां भी गंदगी बचा कर रख दी है। ढेर सारे रॉकेट, ढेर सारे उपग्रह क्या बोलते हैं, सैटेलाइट.. मेरे स्वच्छ शांत नीले आँगन में छोड़ रखा है l मैं बिलख रही हूँ। वायुयानों की तो बात ही छोड़ो, ये लाखों फतिंगो की तरह से इधर से उधर फुदक कर रहे हैं l इन्होने मेरा जीवन हराम कर दिया है।

हे देवगण ! मैं सिर्फ अपने बच्चों को बड़े प्यार से अपने गोद में पालना चाहती हूँ, और पालती भी हूँ। लेकिन इनके लिए शेष कार्य तो आप लोग ही करते हो l आप में से कोई धन के देवता हो, कोई ऐश्वर्या और यश के देवता हो, कोई जल के देवता हो, कोई ऊर्जा के देवता हो, कोई बुद्धि विवेक के देवता हो तो बस इतनी दया करो इन्हें इन्हे धन -दौलत सबकुछ दो पर बुद्धि विवेक कुछ ज्यादा ही दो, कि मेरे संकट में पड़े प्राण बच सके।

है देवगण ! मेरी पीड़ा के दो बड़े मूल कारण है, जो मुझे पीड़ित कर रहे हैं, मैं इसी विषय पर सोचती रहती हूं और आपसे कहती हूँ..

आप लोग मेरे इन पुत्रों से कहो कि-

‌ये लोग बढ़ती जनसंख्या पर नियंत्रण रखें।

‌प्रकृति और पर्यावरण का संरक्षण करें।

अगर ये लोग आपकी बात मानकर ऐसा करते हैं तब जाकर मेरी खुशी वापस लौटेगी.

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य #३३६ ☆ ज़िंदगी…लम्हों की किताब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

डॉ. मुक्ता

(डा. मुक्ता जी हरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से  हम  आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख ज़िंदगी…लम्हों की किताब। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की  लेखनी को  इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।) 

(डॉ मुक्ता जी द्वारा रचित एक भजन – इंसान मिट्टी से उपजा / स्वर- विकास यशकीर्ति, सौजन्य – तरूनम चैनल)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य  # ३३६ ☆

☆ ज़िंदगी…लम्हों की किताब… ☆ डॉ. मुक्ता ☆

‘लम्हों की किताब है ज़िंदगी/ सांसों व ख्यालों का हिसाब है ज़िंदगी/ कुछ ज़रूरतें पूरी, कुछ ख्वाहिशें अधूरी/ बस इन्हीं सवालों का/ जवाब है जिंदगी।’ प्रश्न उठता है–ज़िंदगी क्या है? ज़िंदगी एक सवाल है; लम्हों की किताब है; सांसों व ख्यालों का हिसाब है; कुछ अधूरी व कुछ पूरी ख्वाहिशों का सवाल है। सच ही तो है, स्वयं को पढ़ना सबसे अधिक कठिन कार्य है। जब हम ख़ुद के बारे में नहीं जानते; अनजान हैं ख़ुद से… फिर ज़िंदगी को समझना कैसे संभव है? ‘जिंदगी लम्हों की सौग़ात है/ अनबूझ पहेली है/ किसी को बहुत लगती लम्बी/ किसी को लगती सहेली है।’ ज़िंदगी सांसों का एक सिलसिला है। जब कुछ ख्वाहिशें पूरी हो जाती हैं, तो इंसान प्रसन्न हो जाता है; फूला नहीं समाता है– मानो उसकी ज़िंदगी में चिर-बसंत का आगमन हो जाता है और जो ख्वाहिशें अधूरी रह जाती हैं; टीस बन जाती हैं; नासूर बन हर पल सालती हैं, तो ज़िंदगी अज़ाब बन जाती है। इस स्थिति के लिए दोषी कौन? शायद! हम…क्योंकि ख्वाहिशें हम ही मन में पालते हैं और यह सिलसिला अनवरत चलता रहता है। एक के बाद दूसरी प्रकट हो जाती है और ये चाहतें हमें चैन से नहीं बैठने देतीं। अक्सर हमारी जीवन-नौका भंवर में इस क़दर फंस जाती है कि हम चाह कर भी उस चक्रवात से बाहर नहीं निकल पाते। परंतु इसके लिए दोषी हम स्वयं हैं, परंंतु उस ओर हमारी दृष्टि जाती ही नहीं और न ही हम यह जानते हैं कि हम कौन हैं? कहाँ से आए हैं और इस संसार में आने का हमारा प्रयोजन क्या है? संसार व समस्त प्राणी-जगत् नश्वर है और माया के कारण सत्य भासता है। यह सब जानते हुए भी हम आजीवन इस मायाजाल से मुक्त नहीं हो पाते।

सो! आइए, खुद को पढ़ें और ज़िंदगी के मक़सद को जानें; अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखें और बेवजह ख्वाहिशों को मन में विकसित न होने दे। ख्वाहिशों अथवा आकांक्षाओं को ज़रूरतों-आवश्यकताओं तक सीमित कर दें, क्योंकि आवश्यकताओं की पूर्ति तो सहज रूप में संभव है; इच्छाओं की नहीं, क्योंकि वे तो सुरसा के मुख की भांति बढ़ती चली जाती हैं और उनका अंत कभी नहीं होता। जिस दिन हम इच्छा व आवश्यकता के गणित को समझ जाएंगे; ज़िंदगी आसान हो जाएगी। आवश्यकता के बिना तो ज़िंदगी की कल्पना ही बेमानी है, असंभव है। परमात्मा ने प्रचुर मात्रा में पृथ्वी, वायु, जल आदि प्राकृतिक संसाधन जुटाए हैं… भले ही मानव के बढ़ते लालच के कारण हम उनका मूल्य चुकाने को विवश हैं। सो! इसमें दोष हमारी बढ़ती इच्छाओं का है। इसलिए इच्छाओं पर अंकुश लगाकर उन्हें सीमित कर तनाव-रहित जीवन जीना श्रेयस्कर है।

ख्वाहिशें कभी पूरी नहीं होती और कई बार हम पहले ही घुटने टेक कर पराजय स्वीकार लेते हैं; उन्हें पूरा करने के निमित्त जी-जान से प्रयत्न भी नहीं करते और स्वयं को झोंक देते हैं– चिंता, तनाव, निराशा व अवसाद के गहन सागर में; जिसके चंगुल से बच निकलना असंभव होता है। वास्तव में ज़िंदगी साँसों का सिलसिला है। वैसे भी ‘जब तक साँस, तब तक आस’ रहती है और जिस दिन साँस थम जाती है, धरा का, सब धरा पर, धरा ही रह जाता है। मानव शरीर पंच-तत्वों से निर्मित है…सो! मानव अंत में पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश में विलीन हो जाता है।

‘आदमी की औक़ात/ बस! एक मुट्ठी भर राख’ यही है जीवन का शाश्वत सत्य। मृत्यु निश्चित व अवश्यंभावी है; भले ही समय व स्थान निर्धारित नहीं है। इंसान इस जहान में खाली हाथ आया था और उसे सब कुछ यहीं छोड़, खाली हाथ लौट जाना है। परंतु फिर भी वह आखिरी सांस तक इसी उधेड़बुन में लगा रहता है और अपनों की चिंता में लिप्त रहता है। वह अपने आत्मजों व प्रियजनों के लिए आजीवन उचित-अनुचित कार्यों को अंजाम देता है…उनकी खुशी के लिए; जबकि पापों का फल उसे अकेले ही भुगतना पड़ता है, क्योंकि ‘सुख के सब साथी, दु:ख में न कोय’ अर्थात् सुख-सुविधाओं का आनंद तो सभी लेते हैं, परंतु वे पाप के प्रतिभागी नहीं होते। आइए! हम इससे निज़ात पाने की चेष्टा करें और हर पल को अंतिम पल स्वीकार कर निष्काम कर्म करें। कबीरदास जी का यह दोहा समय की सार्थकता पर प्रकाश डालता है–’ काल करे सो आज कर, आज करे सो अब/ पल में प्रलय हो जाएगी, बहुरि करेगा कब?’ जी हां! कल अर्थात् भविष्य अनिश्चित है; केवल वर्तमान ही सत्य है। इसलिए जो भी करना है; आज ही नहीं, अभी करना बेहतर है। क़ुदरत ने तो हमें आनंद ही आनंद दिया है, दु:ख तो हमारी स्वयं की खोज है। इससे तात्पर्य है कि प्रकृति दयालु है; मां की भांति मानव की हर आवश्यकता की पूर्ति करती है। परंतु मानव स्वार्थी है; उसका अनावश्यक दोहन करता है; जिसके कारण अपेक्षित संतुलन व सामाजिक-व्यवस्था बिगड़ जाती है तथा उसके कार्य-व्यवहार में अनावश्यक हस्तक्षेप करने का परिणाम है सुनामी, अत्यधिक वर्षा, दुर्भिक्ष, अकाल, महामारी आदि…जिनका सामना आज पूरा विश्व कर रहा है। मुझे स्मरण हो रहा हो रहा है… भगवान महावीर द्वारा निर्दिष्ट–’जियो और जीने दो’ का सिद्धांत, जो अधिकार को त्याग कर्त्तव्य-पालन व संचय की प्रवृत्ति को त्यागने का संदेश देता है। सृष्टि का नियम है कि ‘एक साँस लेने के लिए मानव को पहली सांस को छोड़ना पड़ता है।’ सो! जीवन में ज़रूरतों की पूर्ति करो; व्यर्थ की ख्वाहिशें मत पनपने दो, क्योंकि वे कभी पूरी नहीं होतीं और उनके जंजाल में फंसा मानव कभी भी मुक्त नहीं हो पाता। इसलिए सदैव अपनी चादर देख कर पांव पसारने अर्थात् संतोष से जीने की सीख दी गयी है… यही अनमोल धन है अर्थात् जो मिला है, उसी में संतोष कीजिए, क्योंकि परमात्मा वही देता है, जो हमारे लिए आवश्यक व शुभ होता है। सो! ‘सपने देखिए! मगर खुली आंख से’… और उन्हें साकार करने की भरपूर चेष्टा कीजिए; परंतु अपनी सीमाओं में रहते हुए, ताकि उससे दूसरों के अधिकारों का हनन न हो।

संसार अद्भुत स्थान है। आप दूसरे के दिल में, विचारों में, दुआओं में रहिए। परंतु यह तभी संभव है, जब आप किसी के लिए अच्छा करते हैं; उसका मंगल चाहते हैं; उसके प्रति मनोमालिन्य का दूषित भाव नहीं रखते। सो! ‘सब हमारे, हम सभी के’ –इस सिद्धांत को जीवन में अपना लीजिए… यही आत्मोन्नति का सोपान है। ‘कर भला, हो भला’ तथा ‘सबका मंगल होय’ अर्थात् इस संसार में हम जैसा करते हैं; वही लौटकर हमारे पास आता है। इसीलिए कहा गया है कि ‘रूठे हुए को हंसाना; असहाय की सहायता करना; सुपात्र को दान देना’ आदि सब प्रतिदान रूप में लौट कर आता है। वक्त सदा एक-सा नहीं रहता। ‘कौन जाने, किस घड़ी, वक्त का बदले मिज़ाज’ तथा ‘कल चमन था, आज एक सह़रा हुआ/ देखते ही देखते यह क्या हुआ’– यह हक़ीक़त है। पल-भर में रंक राजा व राजा रंक बन सकता है। क़ुदरत के खेल अजब हैं; न्यारे हैं; विचित्र हैं। सुनामी के सम्मुख बड़ी-बड़ी इमारतें ढह जाती हैं और वह सब बहाकर ले जाता है। उसी प्रकार घर में आग लगने पर कुछ भी शेष नहीं बचता। कोरोना जैसी महामारी का उदाहरण आप सबके समक्ष है। आप घर की चारदीवारी में क़ैद हैं… आपके पास धन-दौलत है; आप उसे खर्च नहीं कर सकते; अपनों की खोज-खबर नहीं ले सकते। कोरोना से पीड़ित व्यक्ति राजकीय संपत्ति बन जाता है। यदि बच गया, तो लौट आएगा, अन्यथा उसका दाह-संस्कार भी सरकार द्वारा किया जाएगा। हां! आपको सूचना अवश्य दे दी जाएगी।

लॉकडाउन में सब बंद है। जीवन थम-सा गया है। सब कुछ मालिक के हाथ है; उसकी रज़ा के बिना तो एक पत्ता भी नहीं हिल पाता…फिर यह भागदौड़ क्यों? अधिकाधिक धन कमाने के लिए अपनों से छल क्यों? दूसरों की भावनाओं को रौंद कर महल बनाने की इच्छा क्यों? सो! सदा प्रसन्न रहिए। ‘कुछ परेशानियों को हंस कर टाल दो, कुछ को वक्त पर टाल दो।’ समय सबसे बलवान् है; सबसे बड़ी शक्ति है; सबसे बड़ी नियामत है। जो ठीक अर्थात् आपके लिए उपयुक्त व कारग़र होगा, आपको अवश्य मिल जाएगा। चिंता मत करो। जिसे तुम अपना कहते हो; तुम्हें यहीं से मिला है और तुम्हें यहीं पर सब छोड़ कर जाना है। फिर चिंता और शोक क्यों?

रोते हुए को हंसाना सबसे बड़ी इबादत है; पूजा है; भक्ति है; जिससे प्रभु प्रसन्न होते हैं। सो! मुट्ठी खुली रखना सीखें, क्योंकि तुम्हें इस संसार से खाली हाथ लौटना है। अपने हाथों से गरीबों की मदद करें; उनके सुख में अपना सुख स्वीकारें, क्योंकि ‘क़द बढ़ा नहीं करते, एड़ियां उठाने से/ ऊंचाइयां तो मिलती है, सर को झुकाने से।’ विनम्रता मानव का सबसे बड़ा गुण है। इससे बाह्य धन-संपदा ही नहीं मिलती; आंतरिक सुख, शांति व आत्म-संतोष भी प्राप्त होता है और मानव की दुष्प्रवृत्तियों का स्वत: अंत हो जाता है। वह संसार उसे अपना व खुशहाल नज़र आता है। सो! ज़िंदगी उसे दु:खालय नहीं भासती; उत्सव प्रतीत होती है, जिसमें रंजोग़म का स्थान नहीं; खुशियाँ ही खुशियाँ हैं; जो देने से, बाँटने से विद्या रूपी दान की भांति बढ़ती चली जाती हैं। इसलिए कहा जाता है–’जिसे इस जहान में आंसुओं को पीना आ गया/ समझो! उसे जीना आ गया।’ सो! जो मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ कर प्रसन्नता से स्वीकार करें, और  ग़िला-शिक़वा कभी मत करें। कल अर्थात् भविष्य अनिश्चित है; कभी आएगा नहीं…उसकी चिंता में वर्तमान को नष्ट मत करें… यही ज़िंदगी है और यही  है लम्हों की सौग़ात।

●●●●

© डा. मुक्ता

माननीय राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत, पूर्व निदेशक, हरियाणा साहित्य अकादमी

संपर्क – #239,सेक्टर-45, गुरुग्राम-122003 ईमेल: drmukta51@gmail.com, मो• न•…8588801878

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ रक्षाबंधन विशेष – रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ☆

डाॅ राकेश सक्सेना

(डाॅ राकेश सक्सेना जी पूर्व सदस्य हिंदी सलाहकार समिति, खान मंत्रालय, भारत सरकार, जेएलएन पी०जी० काॅलेज, एटा से हिंदी विभागाध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हैं। कनाडा, भूटान, नेपाल, श्रीलंका, ताशकंद आदि देशों की विदेश यात्राएँ। 07 मौलिक कृतियां, 20 सम्पादित, अनगिनत पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित.  आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण।)

☆ आलेख – रक्षासूत्र और भारतीय संस्कार परम्परा: प्रतीकों से संस्कृति संरक्षण  ☆ डाॅ राकेश सक्सेना ✍

रक्षासूत्र रक्षा करने वाला वह धागा है,जो नकारात्मक ऊर्जा, संकटों व बुरी नज़र से बचाता है। यह मनुष्य को धर्म, सत्य और अच्छे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। वेदों में इसे रक्षाबंधन भी कहा गया है। पौराणिक कथा के अनुसार प्रथम प्रसंग में जब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी तब दानवराज बलि, महाबली की पत्नी विंध्यावली ने बली की रक्षार्थ उनके हाथ में रक्षासूत्र बाँधा था तथा दूसरे प्रसंग देवासुर संग्राम में जब इन्द्र कमज़ोर पड़ गए तो इन्द्राणी शची ने मंत्रों से अभिसिंचित करके श्रावण शुक्ला पूर्णिमा को इन्द्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा और उनकी विजय हुई। इस धागे को दाहिने हाथ की कलाई पर बाँधा जाता है क्योंकि दाहिना हाथ कर्म का प्रतीक है। श्रावण शुक्ला पूर्णिमा की तिथि को मनाया जाने वाला रक्षाबंधन पर्व का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व है। यह केवल बहन-भाई का त्यौहार ही नहीं है अपितु गुरू अपने शिष्य को, ब्राह्मण अपने यजमानों को और पत्नी अपने पति को भी रक्षासूत्र बाँधती है। आज के समय में रक्षासूत्र एक सुरक्षा कवच है। यह सुरक्षा बाहरी संकट नहीं है। भारतीय चिंतन में रक्षा का व्यापक अर्थ धर्म, सत्य,कर्तव्य,सम्बन्ध,मर्यादा, प्रकृति और मानवीय मूल्यों की रक्षा भी है। इसी प्रकार ‘ सूत्र ‘ शब्द केवल धागे का नाम नहीं, वह जोड़ने,बाँधने और सम्बन्ध स्थापित करने का प्रतीक है।

भारतीय संस्कृति में संस्कार का अर्थ कर्मकांड नहीं अपितु मनुष्य के जीवन को परिष्कृत करने, उसे सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ने और जीवन-मूल्यों के प्रति जागरूक बनाने की एक प्रक्रिया है। जन्म से मृत्यु तक हमारे यहाँ अनेक संस्कारों का उल्लेख मिलता है,जिनमें मंत्र, अग्नि, जल, पुष्प,अक्षत, दीप, तिलक और सूत्र का प्रयोग होता है, जो अनुष्ठान को सुन्दर बनाने के साथ अमूर्त विचारों को मूर्त रूप प्रदान करते हैं। दीपक ज्ञान का, जल शुद्धता और जीवन, अग्नि पवित्रता और साक्षित्व,अक्षत पूर्णता,मंगल, तिलक शुभता  व सूत्र सम्बन्ध, संकल्प और संरक्षण का प्रतीक है। रक्षासूत्र इसी संकल्प को शरीर पर एक प्रतीक के रूप में धारण कराता है। जब किसी व्यक्ति की कलाई पर सूत्र बाँधा जाता है तो वह सूत्र उसके संकल्प की याद दिला सकता है कि मैं अपने कर्तव्य के प्रति सजग रहूँ, सम्बन्धों का सम्मान करूँ, सत्य और सदाचार के मार्ग पर चलूँ और अपने परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायी रहूँ। इस दृष्टि से रक्षासूत्र बाहरी बंधन नहीं, आंतरिक अनुशासन का प्रतीक है।

रक्षासूत्र की सर्वाधिक लोकप्रिय सामाजिक अभिव्यक्ति रक्षाबंधन पर्व में दिखाई देता है। बहन द्वारा भाई की कलाई पर राखी बाँधना पारिवारिक संस्कृति में स्नेह, विश्वास और पारस्परिक उत्तरदायित्व का प्रतीक है। राखी बाँधने की परम्परा परिवार को स्मरण कराती है कि रक्त सम्बन्ध केवल जैविक सम्बन्ध नहीं हैं,उनमें भावनात्मक दायित्व भी निहित है। यूँ तो इस पर्व की छवि इससे कहीं व्यापक है। भारतीय परम्परा में रक्षा का दायित्व केवल पुरुष का नहीं माना जा सकता। माता परिवार की रक्षा करती है, पिता परिवार का पालन करके दायित्व निभाता है, बहन भाई के सुख-दुःख में साथ देती है और भाई, बहन के सम्मान और सुरक्षा का ध्यान रखता है, मित्र भी संकट में सहायता करते हैं। इसलिए आधुनिक संदर्भ में रक्षासूत्र को परस्पर संरक्षण और सहयोग का प्रतीक बनाना अधिक सार्थक होगा। भारतीय परिवार व्यवस्था का आधार भावनात्मक सम्बन्ध और परस्पर उत्तरदायित्व भी रहा है अत: रक्षासूत्र पारिवारिक चेतना का दृश्य प्रतीक भी है, जो सम्बन्धों को व्यवहार में जीवित रखने का अवसर देता है। आज संयुक्त परिवारों का आकार घट रहा है,इस स्थिति में रक्षाबंधन जैसा पर्व परिवार के सदस्यों को पुन: जोड़ने का अवसर प्रदान करता है। रक्षासूत्र सामाजिक समरसता, प्रकृति संरक्षण, लोक संस्कृति, पर्यावरणीय चेतना, स्त्री सम्मान के मध्य सेतु बन सकता है।

      किसी भी सांस्कृतिक प्रतीक का महत्व उसके भौतिक अस्तित्व से अधिक उसके अर्थ में होता है। यदि रक्षासूत्र केवल कलाई पर बँधा धागा बनकर रह जाए तो उसकी सांस्कृतिक शक्ति सीमित हो जाती है ,यदि वह  सम्बन्धों की याद दिलाए, कर्तव्य का बोध कराए, परिवार को जोड़े, सामाजिक समरसता बढ़ाए, प्रकृति संरक्षण को बढ़ावा दे, स्त्री सम्मान का संदेश दे और मानवीय मूल्यों की रक्षा का संकल्प जगाए तो वह जीवंत संस्कृति का प्रतीक बन जाता है एतदर्थ रक्षासूत्र भारतीय संस्कृति की उस प्रतीकात्मक परम्परा का प्रतिनिधि है, जिसमें छोटी-सी वस्तु के भीतर व्यापक जीवन-दर्शन को अभिव्यक्त करने की क्षमता है। धागा भौतिक रूप से कमजोर हो सकता है किन्तु जब वह विश्वास, प्रेम, संकल्प और उत्तरदायित्व से जुड़ता है तो उसका सांस्कृतिक अर्थ अत्यन्त शक्तिशाली हो जाता है। रक्षासूत्र इसी जीवंत सांस्कृतिक स्मृति का सुन्दर प्रतीक है। आज आवश्यकता है कि इस पर्व के भीतर छिपे मानवीय मूल्यों को समझें और उन्हें वर्तमान जीवन की आवश्यकताओं से जोड़ें!!

■

©  डाॅ राकेश सक्सेना

पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष, 68, शान्तीनगर, एटा ( उ०प्र० ) 207001

मोबाइल: 94122 82235

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – रक्षाबंधन ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – रक्षाबंधन ??

भाई-बहन के सम्बन्धों का उत्सव मनाने वाला रक्षाबंधन संभवत: विश्व का एकमात्र पर्व है। इस पर्व में बहन, भाई को राखी बांधती है। पुरुष भी परस्पर राखी बांधते हैं। पुरोहित द्वारा भी राखी बांधी जाती है। अनेक स्थानों पर वृक्षों को भी राखी बांधी जाती है। ‘भविष्यपुराण’ के अनुसार इंद्राणी द्वारा निर्मित रक्षा सूत्र को देवगुरु बृहस्पति ने इंद्र के हाथों बांधते हुए स्वस्तिवाचन किया था।  रक्षासूत्र का मंत्र है-

येन बद्धो बलि राजा, दानवेन्द्रो महाबल:

तेन त्वामपि बध्नामि रक्षे मा चल मा चल:।

इस मंत्र का सामान्यत: यह अर्थ लिया जाता है कि दानवीर महाबली राजा बलि जिससे बांधे गए थे,(धर्म में प्रयुक्त किए गये थे)  उसी से तुम्हें बांधता हूं। ( प्रतिबद्ध करता हूँ)।  हे रक्षे!(रक्षासूत्र) तुम चलायमान न हो, चलायमान न हो। चलायमान न होने का अर्थ स्थिर अथवा अडिग रहने से है।

प्रकृति के विभिन्न घटकों, समाज के विभिन्न वर्गों को रक्षासूत्र बांधना/ उनसे बंधवाना राष्ट्रीय एकात्मता का प्रदीप्त और चैतन्य है। भारतीय समाज को खंडित भाव से खंड-खंड निहारने वाली आँखों के लिए यह अखंड भाव का अंजन है।

एक विचारप्रवाह है कि वैदिक काल से  रक्षाबंधन रक्षासूत्र एवं प्रतिबद्धता का उत्सव रहा। विदेशी आक्रमणकारियों के भारत में प्रवेश के पश्चात स्थितियाँ बदलीं। आक्रांताओं से  अपनी अस्मिता की रक्षा के लिए कन्याएँ, भाई को रक्षासूत्र बांधने लगीं। सहोदर की समृद्धि वह सुरक्षा के लिए कार्तिक शुक्ल द्वितीया को मनाया जाने वाला भाईदूज या यमद्वितीया का त्योहार भी इसी शृंखला की एक कड़ी है।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️  श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी 🕉️

  💥 

इस साधना में-

ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।

गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।

इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।

मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।

हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।

≈≈

≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares

हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७९ ⇒ रक्षाबंधन विशेष – मामा का घर ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “मामा का घर…“।)

?अभी अभी # १०७९  ⇒ आलेख – मामा का घर ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

समय बदलते देर नहीं लगती !

जो कभी नानी का घर था, समय के साथ मामा का घर हो गया। समय ने मामा को भी गाँव से शहर भेज दिया। अब जहाँ मामा, वहाँ मामा का घर।

माँ और मामा का भाई-बहन का रिश्ता रहता था। साल में केवल एक त्योहार, जो माँ और मामा को एक सूत्र में बाँधता था – राखी !

मेरी माँ, पाँच भाईयों में इकलौती बहन थी। कभी राखी पर किसी मामा के घर नहीं गई। लेकिन राखी हर साल, हर हाल में, भाइयों की कलाई तक पहुँच जाती थी।।

वह फ़ोन और मोबाइल का युग नहीं था ! लिफ़ाफ़े में ही राखी भेजी जाती थी। और साथ में जाता था, दो लाइन का पत्र, जो हर वर्ष मुझे ही लिखना पड़ता था। मैं चिढ़ता, नाराज़ होता, भाईयों को तुम्हारी चिंता नहीं, और तुम फिर भी हर साल !

दो लाइन की चिट्ठी का मजमून, अमूनन, यही रहता था। पूज्य भाई साहब !सादर प्रणाम। आप स्वस्थ होंगे। राखी भिजवा रही हूँ। बंधवा लें। भाभीजी को प्रणाम। आपकी बहिन।

आज माँ नहीं है ! पाँच मामाओं में से एक भी मौजूद नहीं है। जहाँ आज भी बहन नहीं पहुँच पाती, राखी ज़रूर पहुँच जाती है। फ़ोन पर बातचीत हो जाती है।

व्हाट्सएप्प के जरिए फोटोज की भी आवाजाही चला करती है। पीढियां बदल गईं। रिश्ते नहीं बदले !।।

आज भी नानियाँ हैं, बच्चे हैं, नानी का घर है। हां ! नानी की कहानियाँ ज़रूर बदल गई हैं ! आज की नानियाँ बच्चों को होमवर्क करवाती हैं, स्टॉप तक स्कूल छोड़ने जाती हैं। सब साथ-साथ पीवीआर में फ़िल्म देखने जाते हैं। हां, टिकट आज भी मामा ही लाते हैं।

रिश्ते हैं तो प्यार है। प्यार है तो त्योहार है। हमें आज के दिन इन प्यार के बंधनों की ही रक्षा करना है। रिश्ते जहाँ परवाह है, सम्मान है, एक दूसरे के लिए दिलों में प्यार भरा आग्रह है, स्नेहयुक्त अनुरोध है। हर घर में एक नानी-नाना हो, मामा हो, दादा-दादी, चाचा-चाची, भाई-बहन हो। संस्कार हो, तो कहाँ से समाज में राग-द्वेष हो, विसंगति हो, विपरीत बुद्धि हो। हम आगे बढें, लेकिन अतीत की सुखद छाँव, वर्तमान को सहेजती, दुलारती, निरन्तर प्रगति की ओर अग्रसर करती रहे।

सभी को रक्षाबंधन पर्व की शुभकामना।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares