हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०० – कथा कहानी – घुटनों के बल बैठी इंसानियत ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय कथा- घुटनों के बल बैठी इंसानियत)  

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # १०० – कथा कहानी  – घुटनों के बल बैठी इंसानियत ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)

चमकती हुई कांच की दीवारों और मखमली कालीनों से सजे उस बड़े से शोरूम में वीआईपी ग्राहकों का हुजूम हमेशा वैसे ही उमड़ता था जैसे मुफ़्त के चंदन को घिसने के लिए पूरी बारात तैयार खड़ी हो। रामसरन वहां पिछले बीस साल से इस देश के लोकतंत्र की तरह घुटनों के बल बैठा था जिसका मुख्य और इकलौता काम वीआईपी पैरों के तलवों का नाप लेना था ताकि बड़े साहबों को कॉर्पोरेट की सीढ़ियां चढ़ने में कोई तकलीफ़ न हो। जब वह किसी बड़े साहब के पैर में पांच हजार का जूता डालने के लिए अपनी रीढ़ को नब्बे डिग्री पर मोड़ता तो उसकी हड्डियों से एक अजीब सी कराह उठती थी जो शोरूम के उस धीमे विदेशी संगीत में वैसे ही विलीन हो जाती थी जैसे चुनाव के बाद जनता के वादे। शोरूम के बड़े मालिक अक्सर मुस्कुराते हुए कहते थे “रामसरन तुम्हारे हाथों में जादू है क्योंकि तुम पैर देखकर ही इंसान की औकात और उसके बैंक बैलेंस का सही साइज बता देते हो।” रामसरन बस अपनी फीकी मुस्कान का विज्ञापन बिखेर कर रह जाता और उसकी आंखें काउंटर के पीछे रखे उस बड़े से चमड़े के बक्से पर टिक जातीं जिस पर हमेशा एक बड़ा सा ताला वैसे ही जड़ा रहता था जैसे हमारी व्यवस्था पर जवाबदेही का ताला। उस बक्से में क्या था यह रहस्य शोरूम के किसी पढ़े-लिखे कर्मचारी को नहीं पता था क्योंकि उसकी चाबी हमेशा रामसरन के गले में एक गंदे से धागे में लिपटी रहती थी। लोग कहते थे कि रामसरन ने इस दुकान में अपनी जिंदगी की सारी खुशियां दफन कर दी हैं और अब वह बस एक जिंदा लाश की तरह दूसरों के तलवे चाटने और सहलाने की कला में पीएचडी कर रहा है। आज भी जब शहर के सबसे बड़े बिजनेसमैन कपूर साहब अपनी चमचमाती कार से उतरे तो रामसरन पहले से ही फर्श पर घुटने टेक कर उनका स्वागत करने के लिए तैयार बैठा था मानो वह किसी राजा के सामने झुका हुआ कोई बंधुआ मजदूर हो जिसका अपनी परछाई पर भी कोई हक नहीं था।

कपूर साहब ने अपने भारी पैर को रामसरन के घुटने पर वैसे ही टिका दिया जैसे सरकारें जनता के सिर पर टैक्स का बोझ टिका देती हैं और बड़े घमंड से कहा “रामसरन इस बार कोई ऐसा जूता दिखाओ जो मेरी इस नई बिजनेस डील की तरह बिल्कुल शाही और बेदाग हो जिसमें सामने वाले की औकात नीचे दबी दिखे और पैसों की फिक्र मत करना।” रामसरन ने उनके मोजे को उतारते हुए बहुत धीरे से कहा “साहब पैर का नाप तो वही रहेगा जो पिछले साल था पर इस बार आपके तलवों की चमड़ी थोड़ी ज्यादा सख्त हो गई है शायद दूसरों का हक दबाते-दबाते वहां की संवेदनशीलता ही मर गई है।” कपूर साहब इस गहरे कटाक्ष को समझ नहीं पाए और जोर से हंसे और बोले “तुम बस पैर का साइज नापो रामसरन मेरी जिंदगी का नाप लेने की औकात मत बनाओ।” तभी काउंटर पर बैठे मैनेजर ने अपनी ऊंची गर्दन को और तानते हुए आवाज लगाई “रामसरन जल्दी करो अपनी इस दार्शनिक बकवास को बंद करो और अंदर के केबिन से वह खास इटालियन लेदर वाला पीस निकाल कर लाओ जो सिर्फ बड़े साहब की शान के लिए ही स्पेशल इम्पोर्ट किया गया है।” रामसरन उठा और हांफते हुए अंदर के अंधेरे कमरे की तरफ चला गया जहां जूतों के डिब्बों का एक ऐसा पहाड़ खड़ा था जो हमारे देश के विकास के दावों जैसा खोखला था। वहां पहुंचते ही उसने अपनी फटी कमीज के अंदर से वह चाबी निकाली और उस रहस्यमयी बक्से को एक पल के लिए सहलाया पर तभी मैनेजर के चिल्लाने की आवाज आई जो किसी भूखे भेड़िए की दहाड़ जैसी थी। उस बंद केबिन में घुटन और मुनाफे की बू इतनी ज्यादा थी कि रामसरन का दम फूलने लगा और उसकी आंखों के सामने कॉर्पोरेट गुलामी की धुंध छा गई पर वह खुद को संभालते हुए उस कीमती जूते का डिब्बा लेकर बाहर आ गया।

कपूर साहब के पैरों में वह नया इटालियन जूता पहनाते समय रामसरन के हाथ ऐसे कांप रहे थे जैसे रिश्वत लेते हुए किसी नए क्लर्क के हाथ कांपते हैं और उसकी आंखों से पानी की एक बूंद चुपके से गिरकर जूते के चमकदार फीते पर ठहर गई। कपूर साहब ने चिढ़कर अपना पैर पीछे खींचा मानो उनका पवित्र पैर किसी अछूत की भावना से दूषित हो गया हो और बोले “यह क्या बदतमीजी है रामसरन तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरे पांच हजार के ब्रांडेड जूते पर अपने इन मुफ्त के आंसुओं को गिराने की क्या तुम्हारी बची-कुची अक्ल भी घास चरने गई है।” रामसरन ने तुरंत अपने फटे हुए अंगोछे से उस बूंद को पोंछा और गिड़गिड़ाते हुए कहा “माफ करना साहब बस इस पांच सितारा शोरूम की चकाचौंध से आंखों का पानी मर गया है और वही बाहर आ रहा है वैसे यह जूता आपकी झूठी शान में चार चांद लगा देगा।” तभी शोरूम का कांच वाला दरवाजा खुला और एक बूढ़ा भिखारी अंदर आने की हिमाकत करने लगा जिसे वहां खड़े सूट-बूट वाले सिक्योरिटी गार्ड ने तुरंत ऐसे धक्के मारकर बाहर निकाल दिया जैसे बजट से गरीब को बाहर निकाला जाता है। उस भिखारी को देखकर रामसरन के चेहरे का रंग बिल्कुल सफेद पड़ गया जैसे उसके शरीर का सारा खून किसी ने चूस लिया हो और उसके हाथ से पैर नापने वाला वह लोहे का स्केल फर्श पर गिर गया जिससे पूरा शोरूम गूंज उठा। मैनेजर ने गुस्से में आकर रामसरन को डांटते हुए कहा “अगर यह नाटक ही करना है तो सीधे सड़क पर भीख मांगो इस तरह हमारे वीआईपी ग्राहकों के सामने अपनी कंगाली का तमाशा मत बनाओ।” रामसरन ने चुपचाप अपना सिर झुका लिया क्योंकि वह अच्छी तरह जानता था कि इस आलीशान दुकान में जूते बिकते हैं इंसानी जमीर तो यहां मुफ़्त में गिरवी पड़ा रहता है।

दोपहर ढल चुकी थी और शोरूम में उन रईसों की भीड़ थोड़ी कम हुई जो अपनी बोरियत मिटाने के लिए लाखों की शॉपिंग करते हैं तो रामसरन चुपके से उस अंदर वाले अंधेरे केबिन में गया और उसने उस रहस्यमयी बक्से का ताला खोल दिया। बक्से के अंदर कोई सोने-चांदी के सिक्के नहीं थे बल्कि उसके अंदर धूल से सनी हुई एक बहुत पुरानी फटी हुई हवाई चप्पल की जोड़ी और कुछ पुराने अखबार के टुकड़े रखे थे जो इस देश की गरीबी के आंकड़ों की तरह फटे हुए थे। रामसरन ने उन चप्पलों को अपनी छाती से लगा लिया और इस तरह फूट-फूटकर रोने लगा जिससे उसकी सिसकियां उस बंद कमरे की वातानुकूलित दीवारों से टकराकर वापस आने लगीं क्योंकि एयर कंडीशनर हवा को तो ठंडा कर सकते हैं पर किसी के कलेजे की आग को नहीं। उसने उस चप्पल को चूमते हुए कहा “मैं रोज सुबह यहां दूसरों के पैर नापता हूँ उनकी हैसियत का अंदाजा लगाता हूँ पर तुम्हारे पैरों का सही नाप आज तक इस शोरूम से खरीद नहीं पाया।” तभी मैनेजर अचानक बिना दस्तक दिए अंदर आ गया और उसने रामसरन को इस हालत में देखकर अपनी भौहें सिकोड़ते हुए पूछा “रामसरन यह तुम क्या पागलों जैसी हरकत कर रहे हो और इस बदबूदार कबाड़ को इस वीआईपी शोरूम की नाक के नीचे क्यों छुपा कर रखा है।” रामसरन ने अपनी गीली आंखों को पोंछते हुए एक तीखा व्यंग्य कसा “साहब यह कबाड़ नहीं है यह मेरी औकात का वह आईना है जिसे मैं रोज रात को देखता हूँ ताकि कहीं इन बड़े साहबों के जूते चमकाते-चमकाते मैं यह न भूल जाऊं कि मैं भी एक इंसान हूँ।” मैनेजर ने उसकी इस गहरी बात को एक अनपढ़ की बकवास समझते हुए कहा “चलो अपनी यह फिलॉसफी बाहर फुटपाथ पर बेचना अभी एक नए साहब आए हैं जो अपने लाडले के लिए सबसे महंगा जूता खरीदना चाहते हैं।”

रामसरन फिर से अपनी उसी चिरपरिचित मुद्रा में घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया और उस नए साहब के छोटे बच्चे के पैर का नाप लेने लगा जो लगातार अपनी मां की गोद में वैसे ही मचल रहा था जैसे सत्ता के लिए नेता मचलते हैं। बच्चे की मां ने रामसरन की झुकी हुई पीठ और फटे हुए कपड़ों की तरफ देखते हुए बहुत तिरस्कार और घमंड से कहा “देखो बेटा अगर अच्छे से पढ़ाई नहीं करोगे और बड़े होकर साहब नहीं बनोगे तो तुम्हें भी इसी तरह लोगों के पैरों में बैठकर उनके जूते साफ करने पड़ेंगे और यही तुम्हारी औकात होगी।” रामसरन के दिल पर यह बात किसी जलती हुई कील की तरह चुभ गई पर उसने बिना कुछ कहे बच्चे के पैर में वह सुंदर सा मखमली जूता पहना दिया जो उस बच्चे की पूरी जिंदगी की कमाई से भी महंगा था। तभी उस बिगड़ैल बच्चे ने रामसरन के चेहरे पर एक जोर की लात मार दी जिससे रामसरन के सूखे होठों से खून की एक पतली धारा बह निकली और फर्श पर गिर गई। पूरा शोरूम एक पल के लिए शांत हो गया पर बच्चे के पढ़े-लिखे माता-पिता ने माफी मांगने की जहमत उठाने के बजाय हंसते हुए कहा “बच्चा है थोड़ा नटखट है वैसे भी इसे आदत है सबको अपनी उंगलियों पर नचाने की और बड़े बाप का बेटा है तो लात मारना तो इसका जन्मसिद्ध अधिकार है।” रामसरन ने जमीन पर गिरे अपने उस खून को अपनी कांपती उंगली से साफ किया और एक दर्दनाक मुस्कान के साथ बोला “कोई बात नहीं मेमसाब बड़े लोगों के बच्चों की लात भी हमारे जैसे गरीबों के लिए किसी शाही आशीर्वाद से कम नहीं होती।” इस मार्मिक और कड़वे दृश्य को देखकर वहां खड़े कुछ नए सेल्समैन की आंखों में भी शर्म के आंसू आ गए पर इस शोरूम के सिस्टम में रामसरन की लाचारी का अंत अभी बहुत दूर था।

शाम को जब शोरूम के बंद होने का वक्त आया और कांच के दरवाजों पर ताले लटकने लगे तो मालिक ने रामसरन को अपने केबिन में बुलाया और उसके हाथ में एक सफेद लिफाफा थमाते हुए बहुत ही ठंडे लहजे में कहा “रामसरन तुम्हारी उम्र अब हो चुकी है और तुम्हारे कांपते हाथों की वजह से हमारे वीआईपी ग्राहकों को बहुत असुविधा होती है इसलिए यह तुम्हारी सैलरी का आखिरी हिसाब है और कल से आने की जरूरत नहीं है।” रामसरन ने उस लिफाफे को देखा जिसमें उसकी बीस साल की वफादारी की कीमत चंद नोटों के रूप में बंद थी और फिर उसने अपने गले से वह चाबी निकालकर मालिक की कांच वाली मेज पर रख दी और कहा “साहब बस मुझे वह बक्सा ले जाने की इजाजत दे दीजिए जो अंदर रखा है क्योंकि मेरा हिसाब तो उसी में बंद है।” मालिक ने एक अमानवीय हंसी हंसते हुए कहा “ले जाओ वह कबाड़ वैसे भी वह हमारे इस ब्रांडेड शोरूम के स्टैंडर्ड को खराब कर रहा था पर जाते-जाते यह तो बता जाओ कि उस फटी चप्पल से तुम्हारा ऐसा क्या आशिकाना रिश्ता है।” रामसरन ने उस भारी बक्से को अपने बूढ़े और झुके हुए कंधों पर उठाया और दरवाजे की तरफ बढ़ते हुए रोते हुए कहा “साहब बीस साल पहले मेरा इकलौता बेटा इसी शोरूम के बाहर नंगे पैर घूम रहा था और मैंने उसे वीआईपी ग्राहकों के महंगे जूतों पर दाग लगने से बचाने के लिए और अपनी नौकरी बचाने के डर से बहुत दूर भगा दिया था जो बाद में एक तेज रफ्तार अमीर की कार के नीचे कुचल कर मर गया। यह चप्पल उसी के नंगे पैरों की है जिसका नाप लेने के लिए मैं आज तक हर आने वाले अमीर बच्चे के पैर में अपनी जिंदगी ढूंढता रहा ताकि अपने मरे हुए बेटे को एक बार सही साइज का जूता पहना सकूं पर इस शोरूम ने मुझे सिर्फ दूसरों के पैर मापना सिखाया अपने बेटे का कफ़न सिलना नहीं।” रामसरन की यह बात सुनते ही मालिक के पैरों के नीचे से मखमली कालीन खिसक गया और वह आलीशान शोरूम उस बूढ़े बाप के आंसुओं के समंदर में ऐसे डूब गया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – “राजनीति के कान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

☆ लघुकथा – “राजनीति के कान” ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

– मंत्री जी, बड़ा कहर ढाया है ,,,आपने।

– किस मामले में भाई?

– अपने इलाके के एक मास्टर की ट्रांस्फर करके।

– अरे , वह मास्टर? वह तो विरोधी पार्टी के लिए भागदौड़,,,

– क्या कहते हैं हुजूर?

– उस पर यही इल्जाम है।

– ज़रा चल कर कार तक पहुंचने का कष्ट करेंगे?

– क्यों?

– अपनी आंखों से उस मास्टर को देख लीजिए। जो चल कर आप तक तो पहुंच नहीं पाया। बदकिस्मती से उसकी दोनों टांगें बेकार हैं। और भागदौड़ करना उसके बस की बात कहां? जो अपने लिए भागदौड़ नहीं कर सकता, वह किसी के विरोध में क्या भागदौड़ करेगा?

– अच्छा भाई। तुम तो जानते हो कि राजनीति के कान बहुत कच्चे होते हैं और आंखें तो होती ही नहीं। खैर। आपने कहा है तो मैं इस गलती को दुरुस्त करवा दूंगा।

खिसियाए हुए मंत्री जी ने कहा जरूर लेकिन आंखों में कहीं पछतावा नहीं था।

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ५५ – लघुकथा – संशय ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ५५ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ संशय ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

महेंद्र को उम्मीद थी कि, वे एक दिन उसके घर जरूर आयेंगें । वह पलक पावड़े बिछाए उनका बराबर इंतजार करता रहता था । अपने मन में वह तमाम ख्वाहिशों को बुनता और सोचता कि अगर वे उनके घर आये तो वह अपनी टूटी चारपाई पर एक फटा ही सही लेकिन सुन्दर साफ बढ़िया सा चादर बिछायेगा। छोटी सी कटोरी में गइया के थोड़े से दूध में जमी मीठी दही खिलायेगा।

कई बार उसे ऐसा लगता था कि वे आज उसके घर की तरफ आ रहे हैं, बस चंद पलों में आ ही जायेगे, ये सब सोच कर उसका मन बाँसो उछलने लगता था ।

वह स्वयं तो रोज उनके घर जाता, उनको नमस्ते कर हालचाल भी पूछता, उनके हर दुख सुख में अपने सामर्थ्य के हिसाब से खड़ा रहताl

पिछले दिनों जब उनके घर में उनका लड़का करोना से बीमार था, तब उनके अपने लोग दूर से झाँक कर चले गए थे, लेकिन महेन्द्र इन बातों से बेफिक्र न सिर्फ उनके घर गया था, बल्कि उनका हाल चाल पूछते हुए बोला था कि बाबूजी, भईया ठीक हो जायेगे, मैंने भईया के लिए हनुमान जी से मन्नत मांगी है ।

भला हो कोरोना का, शायद वह भी उसके प्रेम और समर्पण को समझ गया था, यही कारण था कि चौदह दिन बीतने के बाद उसका नन्हका भी पहले की तरह स्वस्थ होकर किलकारी भर रहा था।

लेकिन महेन्द्र को एक बात समझ में आ रही थी कि वे उसके घर तो नही आते है लेकिन उनके मन में मेरे बाबू के प्रति ममता और प्यार तो जरूर है।

आखिर वे मेरे घर क्यों नही आते है, इस बात का उसे उत्तर नहीं मिल रहा था ।

एक जब उसने थोड़ा दिमाग लगाया, तो उसे हल्का हल्का समझ में आया कि इसमे तो पद और कद का मामला है, जिसके बढ़ने और घटने का संकट या संशय है । बस..बस.. बस यही बात है कि वह नही आते है ।

चलो उनके इस संशय – संकोच पर भी आंच न आये । वे भले ही न आएं, लेकिन उनकी यशकीर्ति और ऊंचाइया छुए, अंततः वह ऐसा सोच कर खुश हो गया थाl

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

लखनऊ, उप्र, (भारत )

दिनांक 22-02-2025

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुज #३२५ ☆ लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२५ – साहित्य निकुंज ☆

☆ लघु कथा – पहचाना जब मुझे वृक्ष ने ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कॉलेज के दिनों की बात है। उन दिनों पर्यावरण संरक्षण पर हमें बड़े प्रेरक पाठ पढ़ाए जाते थे। अध्यापक बताते थे कि वृक्ष केवल प्रकृति की शोभा नहीं, बल्कि मानव जीवन के आधार हैं। उनकी बातें मेरे मन में इतनी गहराई से उतर गईं कि मैंने निश्चय कर लिया है जीवन में जहाँ भी अवसर मिलेगा, मैं वृक्ष अवश्य लगाऊँगा।

उस दिन के बाद वृक्षारोपण मेरे लिए केवल एक सामाजिक कार्य नहीं रहा, बल्कि एक भावनात्मक दायित्व बन गया। किसी के जन्मदिन पर, किसी के विवाह के अवसर पर या किसी शुभ कार्य के आरंभ में मैं एक पौधा अवश्य लगाता। मुझे विश्वास था कि यदि प्रत्येक व्यक्ति एक-एक वृक्ष भी लगाए, तो धरती की हरियाली कभी समाप्त नहीं होगी।

समय अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। देखते ही देखते कई वर्ष बीत गए। एक दिन मुझे उस गाँव जाने का अवसर मिला जहाँ वर्षों पहले मैंने आम का एक पौधा लगाया था। गाँव पहुँचते ही लोगों ने बड़े प्रेम से मेरा स्वागत किया और खाने के लिए ताज़े आम लाकर रख दिए। आमों का स्वाद अद्भुत था। बातचीत के दौरान किसी ने मुस्कराकर कहा, “ये उसी वृक्ष के फल हैं जिसे आपने वर्षों पहले लगाया था।”

यह सुनते ही मैं कुछ क्षणों के लिए मौन रह गया। मेरी आँखें अनायास उस वृक्ष को खोजने लगीं। सामने एक विशाल आम का वृक्ष खड़ा था, जिसकी शाखाएँ फलों से लदी हुई थीं। मुझे लगा जैसे वह वृक्ष मुझे पहचान रहा हो। बरसों पहले मेरे हाथों से मिट्टी में रोपा गया छोटा-सा पौधा आज एक विशाल वृक्ष बनकर न केवल फल दे रहा था, बल्कि अनेक लोगों को छाया और सुख भी बाँट रहा था। उस क्षण मेरे हृदय में जो संतोष और प्रसन्नता थी, उसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

लेकिन उसी यात्रा में एक ऐसा दृश्य भी देखने को मिला जिसने मन को उदासी से भर दिया। सड़क के किनारे मैंने बरगद, पीपल और आँवले के कई पौधे लगाए थे। मैं उत्सुक था कि वे अब बड़े वृक्ष बन चुके होंगे और राहगीरों को छाया दे रहे होंगे। परंतु जब वहाँ पहुँचा, तो देखा कि सड़क चौड़ी करने के लिए उन सभी वृक्षों को काट दिया गया था। जहाँ कभी हरियाली लहराती थी, वहाँ अब केवल धूल, पत्थर और कंक्रीट दिखाई दे रहे थे।

उन कटे हुए ठूँठों को देखकर ऐसा लगा मानो किसी ने मेरे अपने परिवार के सदस्य छीन लिए हों। मन भारी हो गया। एक ओर उस आम के वृक्ष की सफलता का आनंद था, तो दूसरी ओर कटे हुए वृक्षों का दर्द। उसी क्षण मुझे अनुभव हुआ कि वृक्ष केवल पेड़ नहीं होते, वे हमारी स्मृतियों, भावनाओं और भविष्य से जुड़े होते हैं।

घर लौटकर मैंने अपने आँगन में लगे उन वृक्षों को देखा जिन्हें मैंने स्वयं रोपा था। वे हवा में झूम रहे थे। उनकी हरी पत्तियाँ मानो मुझे संदेश दे रही थीं-“जो हमें जीवन देता है, हम उसे कई गुना लौटाते हैं।”

मैंने उसी दिन फिर एक संकल्प लिया कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, वृक्षारोपण का कार्य कभी नहीं छोड़ूँगा। कटे हुए वृक्षों का दुःख मनाने से अधिक आवश्यक है नए वृक्ष लगाना। क्योंकि वृक्ष केवल हमें ऑक्सीजन नहीं देते, वे आशा देते हैं, जीवन देते हैं और आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुंदर संसार छोड़ जाते हैं।

आज भी जब उस आम के वृक्ष की याद आती है, तो ऐसा लगता है मानो वह मुझे आशीर्वाद दे रहा हो। तब मेरे मन से एक ही बात निकलती है-वृक्ष लगाना प्रकृति की सेवा ही नहीं, बल्कि आने वाले कल के प्रति हमारी जिम्मेदारी भी है।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संवाद # १६१ ☆ ऐतिहासिक लघुकथा – सत्य का साहस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं। आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित एक विचारणीय ऐतिहासिक लघुकथा ‘सत्य का साहस। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # १६१ ☆

ऐतिहासिक लघुकथा – सत्य का साहस ☆ डॉ. ऋचा शर्मा ☆ 

दरबार खचाखच भरा हुआ था। पेशवा राज्य के प्रधान न्यायधीश राम शास्त्री, नारायणराव की हत्या के संदर्भ में अपना निर्णय सुनानेवाले थे।

सत्ता के लोभ में रघुनाथराव ने अपने भतीजे नारायण राव की हत्या करवा दी थी। जनता सच जानती थी लेकिन जल में रहकर मगर से बैर कैसे करे? पेशवा के खिलाफ आवाज उठाने का साहस भी किसी में नहीं था। नारायणराव की हत्या से मन ही मन व्यथित कुछ लोगों ने पेशवा राज्य के प्रधान न्यायधीश राम शास्त्री के पास जाकर न्याय की गुहार लगाई।

राम शास्त्री अपने निष्पक्ष न्याय के लिए प्रसिद्ध थे। उन्होंने रघुनाथराव पर लगे आरोपों की गहरी जाँच-पड़ताल की और पेशवा के दरबार में अपना निर्णय सुनाया –‘मैं पेशवा राज्य का प्रधान न्यायधीश हूँ। तमाम तथ्यों के आधार पर प्रमाणित होता है कि रघुनाथराव और आनंदीबाई ने मिलकर योजनाबद्ध तरीके से नारायणराव की हत्या करवाई है। सत्य सबके सामने है। महाराष्ट्र की जनता ही आपको दंड देगी, अब मैं आपके राज्य में नहीं रह सकता।‘ यह कहकर वह निडर न्यायधीश वहाँ से चला गया।

पेशवा रघुनाथराव अपने सिंहासन पर बैठे राम शास्त्री को दृढतापूर्वक जाते हुए देखते रह गए।

© डॉ. ऋचा शर्मा

प्रोफेसर एवं अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर. – 414001

संपर्क – 122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆ लघुकथा – उपयोग… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “उपयोग“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६७ ☆

✍ लघुकथा – उपयोग… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

जबसे बच्चे अलग रहने लगे हैं तबसे वह बदल गई है। किसी से कोई शिकायत नहीं करती। बेटे बहू नहीं चाहते कि उनकी माँ जीवन काम करती रहे इसलिए खाना बनाने के लिए बाई नियुक्त करदी है। पूरे समय सोना आसान नहीं है। बाकी के लोग अपने काम में लगे रहते हैं।उसे व्यर्थ की राजनीति की बातें अच्छी नहीं लगती। इसलिए यूट्यूब पर भगवान कृष्ण संबंधी कार्यक्रम सुनती रहती है। आपने एक बार कोई कार्यक्रम यूट्यूब पर देखा तो दूसरे दिन अपने आप एक दर्जन कार्यक्रम आज जाते हैं और उनमें से चयन करना पड़ता है। अब सर्च नहीं करना पड़ता।

एक दिन एक रेसिपी का वीडियो अपने आप आ गया। उसने देखा तो हर रोज नये नये रेसिपी वीडियो आने लगे। उसे वे अच्छे लगने लगे। न सास बहू का टेंशन न नंद भौजाई की नोंक झोंक, क्योंकि पारिवारिक वीडियो में यही सब कुछ रहता है। इसलिए आज उसने एक नई डिश बनाई भाप पर और फिर एक चम्मच तेल से छोंक दिया। चखने के लिए कहें या खाने के लिए, एक पति ही उपलब्ध है तो सारे एक्सपेरीमेंट उसी पर। पति को अच्छी लग गई तो पड़ोसियों को भी अच्छी लगेगी इसलिए बाँट आई। उसके बाद देखा गया कि उस नई डिश का जो कुछ बचा खुचा था उसे वह खा रही थी।डिस्कवरी और डिश बनाने का उपाय करती रहती है खाने को तो दो ही जाने हैं तीसरा तो कोई है कुछ बना करके और कोशिश करने लगी कोई अच्छा करें वह वही करें वह अपने लिए बचा कुछ खाने को बैठे हैं । मेरी समझ में नहीं आया लोग अच्छे-अच्छे व्यंजन बनाते हैं और खाते हैं लेकिन  यह महिला है कैसी कि अपने लिए ना बनाकर औरों के लिए बनाती है। हालांकि अब उम्र का प्रभाव हो गया है और अब उतना कम नहीं कर पाती फिर भी दूसरों के लिए काम करने की भावना उसमें है । रेसिपी के नये वीडियो उसका समय अवश्य काटने में मदद कर रहे हैं। लगता है मोबाइल का अच्छा उपयोग सीख लिया है।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – टूटता हुआ घर।)

☆ लघुकथा # ११६ – टूटता हुआ घर श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

संध्या धीरे-धीरे रात की बाँहों में समा रही थी। आँगन में रखे तुलसी चौरे का दीपक टिमटिमा रहा था। हल्की हवा में चमेली की भीनी सुगंध घुली थी, पर घर के भीतर वातावरण भारी और उदास था।

रसोई में खड़ी सविता दर्द से कराहते हुए भी चुपचाप खाना बना रही थी। सुबह से पैरों में सूजन थी, शरीर बुखार से तप रहा था, लेकिन पति और परिवार की चिंता में उसने अपनी तकलीफ़ को जैसे भीतर ही कैद कर लिया था।

चूल्हे की आँच से उसका चेहरा लाल हो गया था। माथे से पसीने की बूंदें लगातार टपक रही थीं।

उधर बैठक में बैठे उसके पति विकास बार-बार घड़ी देख रहे थे। स्वभाव से वह अत्यंत गुस्सैल और अहंकारी थे। उन्हें ज़रा-सी देरी भी बर्दाश्त नहीं होती थी।

सविता ने थरथराती आवाज़ में कहा—

“खाना तैयार है…”

बस इतना सुनना था कि विकास भड़क उठे।

“अब याद आया खाना? क्या कर रही थी इतनी देर से?”

उन्होंने क्रोध में भरी गरम दाल की थाली उठाकर ज़ोर से फर्श पर फेंक दी।

थाली पलट गई।

उबलती दाल पास खड़ी सात वर्ष की बेटी गुड़िया के हाथ और चेहरे पर गिर गई।

“माँऽऽ…!”

उसकी दर्दभरी चीख पूरे घर में गूँज उठी।

सविता का कलेजा काँप गया।

वह बदहवास होकर बेटी को सीने से चिपकाए अस्पताल की ओर भागी।

डॉक्टर मरहम लगाते हुए बोले—

“जलन तो ठीक हो जाएगी… लेकिन बच्ची बहुत डर गई है।”

गुड़िया लगातार काँप रही थी।

उसकी छोटी-सी उँगलियाँ माँ का आँचल कसकर पकड़े थीं।

सविता की आँखों से आँसू बहते रहे।

शायद दर्द बेटी के हाथ से ज्यादा उसके अपने हृदय में था।

रात गहरा चुकी थी। घर लौटकर वह चुपचाप बरामदे में बैठ गई।

पास ही बैठी दादी सब देख रही थीं। उनकी बूढ़ी आँखों में अनगिनत प्रश्न तैर रहे थे।

उन्होंने मन ही मन सोचा—

“कैसा दुर्भाग्य है… लोग मंदिरों में सिर झुकाते हैं, रामायण-महाभारत देखते हैं, पर अपने भीतर बैठे रावण को नहीं पहचानते।”

इतने में दरवाज़ा खुला।

विकास भीतर आए।

चेहरा बुझा हुआ था। हाथ में कुछ कागज़ थे और आँखों में टूटा हुआ अभिमान।

माँ ने धीरे से पूछा—

“क्या हुआ बेटा?”

विकास कुर्सी पर ढहते हुए बोले—

“आज मेरा प्रमोशन रुक गया…

बॉस ने साफ कह दिया—

‘जिस इंसान को अपने गुस्से पर नियंत्रण नहीं, वह दूसरों का नेतृत्व नहीं कर सकता।’”

कमरे में सन्नाटा फैल गया।

माँ उठीं, बेटे के सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं—

“बेटा…अहंकार इंसान से पहले उसका सुख छीनता है, फिर अपनों का विश्वास… और अंत में उसका सब कुछ।”

फिर उनकी भर्राई आवाज़ कमरे में गूँज उठी—

“अहंकार की आग में, जल जाते संबंध, रावण जैसा ज्ञान भी, नहीं बचा पाया वंश।”

विकास की नज़र धीरे-धीरे गुड़िया के जले हाथों पर गई…

फिर सविता के सूजे पैरों पर…

और अंत में अपने हाथ में पकड़े अस्वीकृत प्रमोशन पत्र पर टिक गई।

उन्हें पहली बार एहसास हुआ—

आज उनका प्रमोशन नहीं रुका था…

आज उनका घर टूटते-टूटते बचा था।

उनकी आँखों से आँसू बह निकले।

वह धीरे से सविता के पास गए और काँपती आवाज़ में बोले—

“सविता… मुझे माफ़ कर दो…

मैं अपने अहंकार में इतना अंधा हो गया था कि तुम्हारा दर्द भी नहीं देख पाया।”

सविता ने कुछ नहीं कहा।

बस उसकी आँखों से बहते आँसू वर्षों से दबे दर्द की कहानी कह रहे थे।

उधर तुलसी चौरे का दीपक अब भी जल रहा था—

धीमा, शांत…मानो टूटते रिश्तों को फिर से रोशनी देने की प्रार्थना कर रहा हो।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – बुत युग ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – बुत युग ? ?

सारे बदहवास थे। इस तरह की बीमारी इससे पहले न देखी, न सुनी। उस लेटे हुए आदमी के अंग एक-एक कर धीरे-धीरे पत्थर होते जा रहे थे।

अचानक एक औरत की चीख सन्नाटे को चीरने लगी। एक आदमी बालों से पकड़कर औरत को लात, मुक्कों से बेदम मार रहा था। वह चीख रही थी, मदद की गुहार लगा रही थी। भीड़ चुप थी। आदमी ने हैवान की मानिंद चाकू से कई वार औरत पर किए।

औरत अब लोथड़ा थी। आदमी जा चुका था। भीड़ मर चुकी थी।

उधर शोर उठा, ‘अरे आदमी बुत में बदल गया, आदमी बुत में बदल गया।’ लेटा हुआ आदमी ऊपर से नीचे तक पूरा पत्थर हो चुका था।

बुत युग की यह शुरुआत थी।

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ १७ मई से ज्येष्ठ अधिकमास आरंभ हुआ है। इसी दिन से नारायण साधना आरंभ होगी।  इसका मंत्र है – ॐ नारायणाय नम:। 🕉️

💥 इसके साथ मौन साधना एवं आत्म परिष्कार भी चलेंगे। अपनी हर निर्बलता पर विजय पाने का साधन है आत्म परिष्कार। इसका नियमित अभ्यास रखे💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६७ – शोभा की सुंदरता ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है स्त्री विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा शोभा की सुंदरता ”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६७  ☆

🌻लघु कथा🌻 शोभा की सुंदरता 🌻

आज सुबह शोभा कार्यक्रम का वीडियो बना रही थी। सामने मोबाइल पर अपना चेहरा देख अंर्तमन से आवाज आई– अब तुम बूढ़ी हो चली। सफेद होते केश झुर्रियाँ लटकते गाल, शिकन पड़े ललाट और होठों पर बरसों की चुप्पी साधे। वह घटना जिसने उसके मुस्कान पर ताला लगाया।

जीना तो सीखा, धैर्य सहनशीलता की मूरत बन पति का असमय संग छोड़ जाना, पूरा कारोबार संभाला, बच्चों की परवरिश करते उसने हिम्मत और हौसला बुलंद रखा।

मोबाइल का स्क्रीन बंद करते हुए वह बोल पड़ी— अब मैं बूढ़ी हो चली। सामने बैठी सहेली उठी धीरे से मुस्कुराया और उसने शोभा के उलझे बंधे लटों को खोल होठों पर लाली लगाई और छोटी सी लाल बिंदी माथे पर लगा बोली– शोभा कभी बूढ़ी नहीं होती। चाहे सृष्टि हो, सरिता हो, सृजन हो, प्रकृति हो, पूजन हो, धर्म हो, कर्म हो, अपने हो, सपने हो, खुशियाँ हो और हरियाली हो, कल आज और कल शोभा न कभी बूढ़ी हुई है और न कभी होगी।

उसकी सुंदरता सदैव रहती है तुम वही शोभा हो। दोनों एक दूसरे के गले लग मुस्कुरा उठी।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३७ ☆ कथा-कहानी – समाधान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम एवं विचारणीय कथा – ‘समाधान‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३७ ☆

☆ कथा-कहानी ☆ समाधान ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

रोज़ शाम को शुभा का इंतज़ार होता है। पांच बजे के बाद दरवाज़े पर आहट होने पर सबकी  निगाहें इसी उम्मीद के साथ उठती हैं कि दरवाज़े पर शुभा होगी।

दो महीने पहले शुभा की नियुक्ति एक सरकारी महाविद्यालय में  व्याख्याता के पद पर हुई थी। नियुक्ति में कोई दिक्कत नहीं हुई। परेशानी तब हुई जब पोस्टिंग ऐसे  महाविद्यालय में हुई जो शहर से करीब साठ मील दूर था। अब रोज़ सुबह आठ बजे तीन चार मील दूर स्टेशन जाना पड़ता है। उसके बाद दो घंटे की ट्रेन यात्रा के बाद महाविद्यालय पहुंचना पड़ता है। फिर भी अपने पैरों पर खड़े होने और समाज में अपनी जगह बनाने के ख़याल से अच्छा लगता है। शुभा का संसार अब बड़ा हो गया है। समाज में अब उसकी हैसियत बन गयी है। अभी ट्रेन में अकेले यात्रा करने की आदत नहीं थी। शुरू शुरू में काफी मुश्किल महसूस होती थी। सिमट सिकुड़ कर यात्रा पूरी करनी पड़ती थी। कभी किसी के  उड़ते हुए फ़िकरे को सुनकर अनसुना करना पड़ता था। फिर धीरे-धीरे आदत होने लगी। शुभा को भी लगने लगा कि सब कुछ इतना ख़तरनाक नहीं होता जितना  दूर से महसूस होता है।

संबंधियों, पड़ोस और नगर में अब शुभा का अपना वजूद है। कहीं आयोजनों, कार्यक्रमों में जाती है तो लोगों की निगाहें उसकी तरफ उठतीं और टिकतीं हैं। उसकी बात कान देकर सुनी जाती है। परिवार में भी उसकी बात लगभग निर्णयात्मक होती है।

लेकिन ज़िन्दगी का रास्ता हमवार नहीं होता। एक शाम शुभा लौटी, लेकिन रोज़ की तरह नहीं। जब लौटी तो ख़ामोश, चेहरे पर परेशानी। घर में आकर बिना किसी से बात किये पलंग पर लेट गयी। सब हतप्रभ। मां के प्राण हलक में आये। कौन सी मुसीबत आयी?

पूरा घर से शुभा के आसपास इकट्ठा हो गया। सब तरफ से चिन्तित सवाल। पूछताछ से पता चला कि कुछ लड़के थे जिन्होंने लौटते में पूरे रास्ते शुभा को तंग किया। पूरे रास्ते फ़िकरेबाज़ी। अपने स्टेशन तक पहुंचना पहाड़ हो गया। डिब्बे के सारे यात्री तटस्थ बने रहे। कुछ ऐसे भी थे जो ख़ुद शरीफ़ बने स्थिति का आनंद लेते रहे। अब शुभा भयभीत थी। पता नहीं वे लड़के कहां के थे। उन्होंने अगर उसे ही लक्ष्य बनाकर रोज़ परेशान करना शुरू कर दिया तो आना जाना संकट का काम हो जाएगा।

उसकी रिपोर्ट सुनकर घर के सभी बड़े लोग अपराध-बोध से ग्रस्त हो गये। सभी को लगा लड़की से नौकरी करा के गलती की। सदियों से लड़कियां घर में बैठती रही हैं। सिर्फ शादी करके दूसरे के घर की शोभा बनती रही हैं। अगर शुभा भी नौकरी न करती तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ता। जिन  जिन सदस्यों ने पहले शुभा की पीठ ठोंकी थी उन्हें लगने लगा कि उनसे गलती हो गयी।

सबसे पहले टिप्पणी शुभा के बूढ़े दादाजी की तरफ से आयी। वे शुरू से ही लड़कियों की नौकरी के खिलाफ थे। उन्होंने अपना गुस्सा बेटे-बहू पर उतारा। तमतमाकर बोले, ‘हमने पहले ही कहा था कि लड़कियों को घर में ही रखो, लेकिन तुम्हें तो लड़कियों की कमाई से घर भरने की पड़ी है।’

बेटा-बहू चुप, जैसे चोरी करते पकड़े गये हों। शुभा फिलहाल अकेले यात्रा करने को तैयार नहीं है। मन में भय बैठ गया है, उससे मुक्ति पाने में समय लगेगा।

मां पति से पूछती हैं, ‘शुभा का ट्रांसफर अपने शहर में नहीं हो सकता?’

शुभा के पिता पहले ही अपने पिता की डांट खाकर झल्लाये हैं। खीझ कर कहते हैं, ‘ट्रांसफर रातोंरात नहीं होते। रातोंरात ट्रांसफर उनके होते हैं जिनकी लंबी पहुंच होती है। अपनी बेटी की तो नौकरी लग गयी, यही बहुत समझो।’

शुभा छुट्टी लेकर घर बैठ गयी है। फिलहाल कुछ सोचना नहीं है। पिता कई बार कह चुके हैं, ‘बेटा, नहीं चलती तो छोड़ो नौकरी वौकरी। तुम्हारे नौकरी न करने के बावजूद गृहस्थी  तो चलेगी ही। अभी हमारे हाथ  पांव चलते हैं।’ लेकिन उनकी आवाज़ में दम नहीं है। शुभा की तनख्वाह से घर में रौनक आयी है। घर के अविवाहित बच्चों की कमाई ज़्यादातर चमक-दमक और शौक पूरे करने में जाती है, इसलिए उसका असर तत्काल दिखायी पड़ता है। अब बेटी घर में बैठी है इसलिए वीर-भाव के प्रदर्शन के बावजूद पांव के नीचे से खिसकती ज़मीन का एहसास होता है।

शुभा के दादाजी एकदम तुले हैं कि नौकरी से तत्काल इस्तीफा दे दिया जाए और शुभा के पिता उनसे कन्नी काटते घूमते हैं। घर में चूहा- बिल्ली का खेल चलता है। दादाजी पुराने ज़माने के, आज की ज़मीन से कटे हैं। उनके पुत्र सारी मान्यताओं और परंपराओं के बावजूद आज के दबावों को समझते हैं।

इस बीच शुभा के पिता कॉलेज के प्रिंसिपल से मिल आये हैं। वहां से कोई उत्साहवर्धक जवाब नहीं मिला। प्रिंसिपल ने कहा, ‘नौकरी करना है तो कुछ दिक्कतें उठानी पड़ेंगीं, कुछ रिस्क लेना पड़ेगा। आप उन लड़कों के बारे में जानकारी दे सकें तो मैं पुलिस में रिपोर्ट करा दूंगा।’ शुभा के पिता को लड़कों की कुछ जानकारी मिली थी, लेकिन वे बड़े झमेले में नहीं फंसना चाहते थे। पूरे रास्ते पुलिस उनकी बेटी की चौकीदारी करने से रही।

चार-छ: दिन गुज़रने पर विचार बदलने लगे। शुभा को भी कुछ अटपटा लगने लगा और घर के लोगों के स्वर बदलकर कुछ ऐसे हो गये कि लंबी छुट्टी लेना ठीक नहीं है। नयी नौकरी है, कोई अड़चन आ सकती है। मोटी तनख्वाह वाली  नौकरी पर इस तरह लात मार देना अक्लमंदी की बात नहीं।

तय हुआ कि शुभा का छोटा भाई मुन्नू उसके साथ रोज़ सफर करेगा। पुरुष का होना ज़रूरी है, भले ही छोटा भाई हो। घर के वातावरण को देखते हुए मुन्नू ने मना नहीं किया। अब फिर शुभा की कॉलेज यात्रा शुरू हो गयी। तीन-चार दिन सब ठीक-ठाक चलता रहा, फिर मुन्नू ने असहयोग शुरू कर दिया। कहा, ‘सब कुछ तो ठीक चल रहा है। फालतू मुझको इतनी दूर दौड़ना पड़ता है।’ उसने जानबूझ कर हीला-हवाला करना शुरू कर दिया। कभी सो कर उठने में घंटों लगाता, कभी बाथरूम में घुसकर समाधि लगा लेता।

तीन-चार दिन बाद उसने विद्रोह का झंडा खड़ा कर दिया। अब यह व्यर्थ का काम उसके वश का नहीं। उसका पूरा दिन नाश हो जाता है। पढ़ाई लिखाई का नुकसान अलग होता है। शुभा के माता-पिता के सामने फिर समस्या खड़ी हुई। आज के ज़माने में बेटी के साथ रोज़ जाने वाला कौन है, और फिर हर किसी पर भरोसा कैसे किया जाए? किसी पराये व्यक्ति के साथ रोज़ जाने पर लोगों को टिप्पणी करने का मौका मिलता है।

मुन्नू के मना करने के बाद शुभा के पिता ने दो-तीन दिन की छुट्टी ली। लेकिन अब शुभा को इस इंतज़ाम से कष्ट होने लगा। पहले  मुन्नू कॉलेज के आसपास वक्त गुज़ारने के लिए निरर्थक घूमता था, अब पिता कॉलेज के किसी कोने में बैठकर ऊंघते थे। कॉलेज के लोगों के सामने कैफियत देते शुभा को शर्म आती थी। और भी शिक्षिकाएं थीं जो निर्द्वंद्व आती जाती थीं और वे कभी रास्ते में हुई दिक्कतों का रोना नहीं रोती थीं। ऐसी भी शिक्षिकाएं थीं जो अकेले शहर में कमरा लेकर रह रही थीं और फिर भी कभी कोई शिकायत नहीं करती थीं।

पिता तीसरे दिन शुभा के साथ जाने की तैयारी कर रहे थे कि शुभा ने उन्हें रोक दिया, कहा, ‘मैं चली जाऊंगी। आप अपनी नौकरी पर जाइए।’

पिता अचकचाये, बोले, ‘बेटा रास्ते में फिर कुछ गड़बड़ हुआ तो?’

शुभा ने संयत स्वर में जवाब दिया, ‘चिन्ता छोड़ दीजिए। वहां प्रिंसिपल हैं, पुलिस है, इतने सारे साथी हैं। फिर ये छेड़छाड़ करने वाले किस सीमा तक जाएंगे यह मेरी समझ में आ गया है। मैं आराम से वापस लौट आऊंगी।’

बहुत दिनों बाद पिता के मन से एक भारी बोझ हटा। धूप का एक टुकड़ा जो इतने दिनों तक ग़ायब था, फिर घर में कौंध कर उसे रौशन कर गया।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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