हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघु कथा – आख़िरी टाँका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघु कथा ☆ आख़िरी टाँका ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

“मौसी, उँगली में फिर सुई चुभ गई?” राधा ने हँसते हुए पूछा।

अंजू ने उँगली से खून की बूँद पोंछी और मुस्करा दी, “अरे… इसकी आदत है।”

“इतने सालों से सिलाई कर रही हो, अब भी चुभ जाती है?”

“सुई से ज़्यादा ज़िंदगी चुभती है, बिटिया।”

राधा चुप हो गई।

कुछ देर बाद उसने कमरे में टँगे दर्जनों नए सूट देखे और फिर अंजू की फीकी, कई जगह से रफू की हुई साड़ी पर नज़र टिक गई।

“मौसी… अपने लिए कब सिलोगी?”

अंजू ने मशीन का पहिया फिर घुमा दिया।

“पहले यह ऑर्डर पूरा कर लूँ…”

खट… खट… खट…

कमरे में फिर वही आवाज़ गूँजने लगी।

राधा दरवाज़े पर खड़ी रही।

उसे समझ नहीं आ रहा था कि मौसी कपड़े सिल रही थीं…

या अपनी पूरी ज़िंदगी।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा-कहानी ☆ लघु उपन्यास – बीच का आदमी… # १ ☆ श्री मदन शर्मा ☆

☆ लघु उपन्यास  ☆ बीच का आदमी… # १ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

श्री मदन शर्मा 

(देहरादून के वरिष्ठ साहित्यकार श्री मदन शर्मा जी को सादर चरण स्पर्श । आप उस पीढ़ी के प्रतीक हैं जो सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करती रही है । श्री मदन शर्मा जी ने 05 जुलाई 2026 को अपनी आयु के नब्बे वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। उनका जन्म 05 जुलाई 1936 को पूर्वी पंजाब की छोटी सी रियासत मालेर कोटला में हुआ था। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में समर्पित कर दिया। उन्हीं के शब्दों में, “मैंने अब तक जितना लिखा है, वह सब प्रकाशित नहीं हो सका। उसमें से केवल आठ उपन्यास छपे हैं और लगभग पांच सौ छोटी-बड़ी रचनाएं विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं जिनमें कहानियां, व्यंग्य, लेख, लघुकथाएं, संस्मरण, एकांकी और रेडियो-नाटक शामिल हैं। चालीस रचनाओं का आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है।” वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज से आपके चर्चित लघु उपन्यास –  बीच का आदमी को ई-अभिव्यक्ति में श्रृंखलाबद्ध रूप से प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं।)

☆ लघु उपन्यास –  बीच का आदमी… # १ ☆ श्री मदन शर्मा  ✍

मेरे महान देश का एक गौरवशाली प्रांत।

उसी प्रांत में, पर्वतों से घिरा एक खूबसूरत-सा शहर।

शहर से थोड़ा हट कर, एक तंग, बलखाती नहर के किनारे बसा, ऊंचा-नीचा-सा गांव।

उसी गांव की सीमा से थोड़ा इधर, एक बड़ा कारख़ाना।

बड़े कारख़ाने में कार्यरत, दो-ढाई हज़ार रंगबिरंगे कर्मचारी और अधिकारी।

उन कर्मचारियों और अधिकारियों के, सपरिवार रिहाइश के लिये, चार वर्ग-किलोमीटर में फैली,

फैक्टरी-एस्टेट।

उसी एस्टेट के तीन भागः-

एक ओर, बैंगलो एरिया, केवल राजपत्रित अधिकारियों के लिये।

दूसरे कोने पर, वर्कर काॅलोनी और कुली कैम्प, साधारण कामगार, मज़दूरों आदि के लिये।

उन दोनों के मध्य, स्टाफ़-क्वार्टर्स, दो पाटों के बीच, लगातार पिसने वाले सुपरवाइज़रों के लिये…

≡ एक ≡

आशी की झुंझलाहट देख, हँसी आने को होती है। किंतु हँस पड़ना मज़ाक नहीं, क्योंकि मेरे बिना हँसे ही कह डालती है।

“कितनी बुरी बात है!”

उस तड़प में, एक कृत्रिम सी-पीड़ा हो जैसे!

मैं गम्भीर और अनमना-सा उसकी ओर ताकता रहता हूं। फिर पूछ ही लेता हूं, “क्या बुरी बात है मैडम?”

“मैडम-वैडम कुछ नहीं! जल्दी से उठ कर नहा लीजिये, वरना नाश्ते से हाथ धो बैठेंगे।”

“मैं दरअसल, एक बात सोच रहा था।” मैं कुछ कहने लगता हूं, मगर वह मुझे बीच में ही टोक कर कहती है, ”सिर्फ़ एक बात?…

बाई दि वे, आप सुबह से इस नेक काम सोचने के अलावा कर ही क्या रहे हैं? भई, छुट्टी का यह मतलब तो नहीं, कि आदमी दिन भर बिस्तर में पड़ा सोचता ही रहे। उसे उठकर कुछ तो करना ही चाहिये।”

मैं मुस्करा कर कह देता हूं, ”जब तुम अपनी बातचीत मंे, चाहिये शब्द का प्रयोग करती हो, तो जिस को कुछ भी पता न हो, उसे भी मालूम पड़ जाता है, कि तुम एक लेडी टीचर हो!”

मेरी बात सुनकर वह हँसती हुई एक निर्णय-सा सुना देती है, ”साढ़े ग्यारह तो हो ही गये। अब नाश्ते की बात भुलाकर, सीधे लंच की ही चिंता करूं। आप आराम से पड़े, अपने सोचने के कार्यक्रम को जारी रखिये। कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा… अब मेरी तरफ़ ऐसे मत देखिये, चाय का एक कप और बना लाती हूं।”

काफी दिन, बल्कि कहना चाहिये, कई वर्ष बाद, अर्चना का पत्र मिला है। इस दौरान, कितनी ही घटनाएं घट गई। कुछ मेरे साथ, जो अच्छी तरह मालूम हैं। कुछ उधर, जिन के बारे में बहुत कम मालूम है।

पत्र उठा कर, फिर पढ़ने लगता हूं… मैं कितने दिनों से आपको पत्र लिखने की सोच रही थी। लिखा भी कई बार। किंतु हर बार, पत्र अधूरा ही रहा और चिथड़े होकर, हवा में उड़ता हुआ, जाने कहां जा पहंुचा। मगर आज तो निश्चय कर के ही बैठी हूं। इस पत्र को पूरा करने के बाद, आज ही डाक के हवाले कर देना है… मैं भी कितनी स्वार्थी हूं! यह निर्णय पहले भी तो ले सकती थी। स्वार्थी शायद हूं ही! सीधे-सीधे ही लिख दूं, कि अरूणा के विवाह की तिथि निश्चित हो गई है। लड़का इंजीनियर है। स्वभाव का हँसमुख है। घर में अन्य सभी भी अच्छे स्वभाव के हैं। सबसे बड़ी बात यह है, कि लेन-देन का कोई भी चक्क्र नहीं… अगले महीने की सोलह में, दिन ही कितने रह गये! आप ही सोचिये, कैसे कर पाउंगी मैं यह सब? क्या यह संभव है, मुझ अकेली के लिये? मां, बाबू जी, सभी का काम, मुझे ही तो देखना होगा। मगर अनिल भइया, उनके स्थान पर तो आप ही को खड़ा होना होगा… मैं आप पर कोई बोझ नहीं डालूंगी और न कोई उलझन ही होगी। बस, आप इस मौक़े पर पहुंच ज़रूर जाना, वरना लोग कहेंगे, इन बेचारी अभागी लड़कियों का कोई भी अपना नहीं… एक बात और… अकेले नहीें आना… अर्चना।

चाय का प्याला लिये, वह फिर सामने मौजूद है और कह रही है, ”पत्र को बार बार और लापरवाही से पढ़ने के बजाये, एक ही बार जो ढंग से पढ़ लिया जाये!”

मैं उसकी बात का उत्तर न देकर, प्याला थाम लेता हूं।

चाय बहुत गरम है। घंूट भरते ही, तालू जल गया है। बिल्कुल उसी तरह, जैसे उस दिन अरूणा हलवे की प्लेट लेकर आई थी और…

अरूणा का विवाह हो जायेगा। मगर अर्चना? और वह मीता? मीता के अंकल?… सफ़ेद साड़ी में लिपटी और नंगे फ़र्श पर सीधी लेटी आंटी… उस बडे़े अफ़सर की बड़ी सी कोठी…

भयानक शोर… मशाीनों की निरंतर खड़खड़ाहट… कारीगर और मिस्त्री लोगों की हठधर्मी और अश्लील मज़ाक… यूनियन वालों के मज़दूर एकता और इन्क़्लाब जिं़दाबाद के बुलंद होते नारे… बड़े साहब के अजीबो-ग़रीब आदेश और छोटे साहब के जान लेवा अन्दाज़… एक एक दिन का अवकाश स्वीकृत कराने के लिये, घंटों चलते तकरार… यह अब तक क्यों नहीं हुआ? और वह काम कब तक पूरा होगा?… आप लोग कुछ करते क्यों नहीं? आप लोग तो किसी भी लायक़ नहीं!

उस दिन, लोक राम सामने आ खड़ा हुआ था। उसके इस तरह आने का अकसर एक ही अर्थ होता था।

“फिर बुलाया है?” मैंने जानते हुए भी पूछा।

“जी, फ़ौरन पहुंचने को कहा है।”

“कोई ख़ास बात?”

“बात तो नहीं मालूम। मगर मूड क़ाफ़ी ख़राब लगता है। दो-तीन को अभी-अभी झाड़ चुके हैं।”

मैं रजिस्टर छोड़, उठ खड़ा हुआ। कैबिन से बाहर निकला। लगभग सभी मशीनें चल रही थीं। किंतु कितने ही वर्कर अपनी मशीनें चलती छोड़ और चार-चार पांच-पांच के झंुड बना कर, गप्पों में व्यस्त थे। मुझे आता देख, उन की गतिविधयों में कोई भी व्यवधान नहीें पड़ा। केवल तीन चार ही, अपनी मशीनों के पास जा खड़े हुए।

तभी, अनिल, अपनी मशाीन बंद करके, ज्यूट से हाथ पोंछता हुआ मेरी ओर लपकता-सा आया और बोला, ”ऐसे तो काम नहीं चलेगा।”

मालूम था, मैं इस समय ज़रा सा भी रूक गया, तो कुछ अन्य वर्कर यहीं आ पहुंचेंगे। तब आध पौन घंटे से पहले तो क्या ही छूट पाउंगा!

अतः चलते-चलते ही कहा, ”मुझे मैनेजर साहब ने बुलाया है, लौटकर तुम्हारी बात सुनूंगा।”

मैनेजर, अर्थात नरेन्द्र मोहन के सामने, चार अधीनस्थ अधिकारी, अपराधियोें की तरह, सिर झुकाये खड़े थे। सामने खाली पड़ी कुर्सियों पर, शायद किसी को भी, बैठने का साहस नहींे हो पाया था। संभवतः ये सभी महानुभाव, सामने तन कर बैठे मैनेजर से, अच्छी खासी झाड़ खा चुके थे।

”ठीक है, आप लोग तशरीफ़ ले जा सकते हैं।” नरेन्द्र मोहन ने, एक ही बार में, हाथ हिलाकर, उन्हें विदा कर दिया।

अब मेरी बारी थी। उसने मुझे, ऊपर से नीचे और फिर नीचे से ऊपर तक देखा। जैसे, वह अजायबघर में रखी कोई विशेष चीज़, पहली बार देख, चकित हुआ जा रहा हो।

“कहिये श्रीमान! कैसे तकलीफ़ की?”

“सर, आपने मुझे बुलाया था।”

“ओह!” उसकी वाणी में चिरपरिचित कटुता और व्यंग्य की मिली जुली झलक थी।

“आपके फ़ोरमैन साहब आये हैं, या आज भी अपने दौलत-ख़ाना पर पड़े, आराम फ़रमा रहे हैं?”

“सर, उनकी चोट, अभी तक ठीक नहीं हुई।”

“हां… और आप की चोट? सुना है, चोट खाने में आप भी काफ़ी माहिर हैं।”

“नहीं सर, मुझे तो कोई चोट नहीं लगी।”

“ख़ैर, नहीं लगी, तो लग जायेगी। हां, यह बताइये, मैंने जो पचपन जाॅब बनाने के लिये कहा था, बन गये?”

“वे तो नहीं बने सर।”

“क्यों…? कब तक बन पायेंगे?”

“सर, अभी तो वे शुरू भी नहीं किये गये।”

“क्या…?” वह बुरी तरह गुर्राया।

“सर, जितने काम इस वक़्त मशीनों पर चढ़े हैं, सभी अर्जेंट हैं। उनमें से किसी को भी, दो दिन तक, मशीन से उतारना पाॅसिबल नहीं। फोरमैन साहब ने यही कहा था सर।”

“समझ में नहीं आता, आप को किस अक़्लमंद ने सुपरवाइज़र बना दिया!”

“सर, वोह…।”

“नो… नो आर्गूमेंट्स! मैं कुछ नहीं जानता, शाम तक वे पचपन काम बन जाने चाहिये! समझे?”

“सर, कौन सा काम बंद करा दूं?”

“यह मुझे बताना पड़ेगा? मिस्टर, नौकरी करनी है, तो ठीक से करो, वरना… तुम्हारी ए0 सी0 आर0 अभी गई नहीं, यहीं रखी है मेरे पास!”

मैनेजर नरेन्द्रमोहन ने ए0 सी0 आर0 ख़राब करने की फिर धमकी दी थी। उसके द्धारा, एक-दो उल्टे सीधे शब्द लिख देने से ही, मेरा कैरियर तबाह हो सकता था… नाॅट रिलाइवल… प्रमोशन, नाॅट येट आदि कुछ भी लिख देना मामला चैपट करने के लिये पर्याप्त था।

बहुत पहले से ही, वह मुझ से चिड़ा हुआ था। तभी से, जब मैं नौकरी के लिये, इस संस्थान में टेस्ट देने के लिये आया था। वह उस समय एसिसटेंट मैनेजर के पद पर था। उसी ने हम बत्तीस मेें से, पांच को चुनना था।

सुबह से शाम पांच बजे तक, उसने हमें यों ही धूप में बिठाये रखा। फिर कहा, ”आप लोग कल आइये।”

चलने लगे, तो हमें रोक कर, वह बहुत ही धीमी आवाज़ और राज़दारी के लहज़े मेें कहने लगा, ”देखो, कल आप लोगों को प्रेक्टिकल टेस्ट के लिये, एक जाॅब बनाने को दिया जायेगा। जो काम बनाना है, उसकी ड्राइंग भी आपको दे दी जायेगी। ड्राइंग को अच्छी तरह देख कर फ़ैसला कर लेना। सोच लेना, उस जाॅब को तुम बना भी सकते हो या नहींे। ऐसा न हो, कि मशीन ही तोड़ डालो। चलो, मशीन की भी कोई बात नहीं, अपना हाथ पैर कटवा लिया, तो हमारे लिये भी आफ़त खड़ी हो जायेगी। वैसे भी, अगर कुछ काम आता जाता न होगा, तो अपना कीमती वक्त बरबाद करोगे और हमें अलग परेशान करोगे!”

उसने यह बात, पान चबाते हुए, कुछ ऐसे ढंग से कही, कि अगले दिन, बत्तीस में से, केवल पंद्रह लड़के, टेस्ट के लिये पहुंचे।

कच्चे इस्पात का एक-एक टुकड़ा और रेती, सभी उम्मीदवारों को थमा दिया गया और कहा गया, कि धातु को शिकंजे में कस कर और सीधी रेती चला कर, प्रत्येक ओर से 90० के पक्के कोण बनाते हुए, दो इंच का घन तैयार करना है।

हम सभी, रेतियां चलाने लगे। पांच-सात मिनट ही हुए थे। कि वह आ पहुंचा और आंखें फैला कर बोला, ”वाह! क्या बात है! यह फ़ाइलिंग हो रही है? कहां से सीख कर आये आप लोग फ़ाइल चलाना?”

सभी उम्मीदवार पसीने में भीग गये और एक दूसरे का मुंह ताकने लगे।

“देखो, मैं बताता हूं, फ़ाइल कैसे चलाई जाती है।” इतना कह कर, उसने एक लड़के के हाथ से रेती पकड़ ली। उसका हैंडिल घुमा कर दूसरी ओर किया और उल्टी रेती चलाने लगा।

”कुछ समझे?… ऐसे चलाओ फ़ाइल।”

वह गम्भीर लग रहा था। किंतु मुझे, मेरे एक परिचित ने पहले ही समझा रखा था, कि वह मैनेजर, सीधे लोगों को उल्टी दिशा दिखाने में निपुण हैं। उसने जिससे कुछ लिया दिया होता है, वह उसे पहले ही होशियार कर देता है और शेष सभी को, उल्टे रास्ते पर घुमा देता है।

चुनांचे, मुझे और एक अन्य लड़के के अलावा, सभी उल्टी रेतियां चलाने लगे। दो मिनट के तमाशे के बाद ही, वह ऊंची आवाज़ में बोला, ”गुड! वेरी गुड! ये तेरह लड़के वाक़ई बहुत क़ाबिल हैं। मगर इनकी योग्यता के मुताबिक़, इस फैक्टरी में तो कोई भी काम नहीं है। इन्हें कहीं और जाकर, किसी बड़ी पोस्ट के लिये कोशिश करनी चाहिये।”

फिर उसने दरबान को बुला कर आदेश दिया, ”इन तेरह शरीफ़ आदमियों को साथ ले जाकर, परले गेट तक पहुंचा दो।”

तब, हम दो लड़के ही, पूरे लाॅट में से नौकरी पर लिये गये थे। किंतु उस समय, मैंने उल्टी रेती क्यों नहीं चलाई थी, वह इसी बात पर चकित और अप्रसन्न था।

उसके बाद भी, जब मैंने वर्कर से सुपरवाइज़र बनने के लिय परीक्षा में बैठना चाहा, तब उसने तमाशा दिखाया था।

“आप को यह किसने नेक राय दी सुपरवाइज़र बनने का सपना देखने की?”

”सर, राय तो किसी ने नहीं दी। दूसरे लड़के आवेदन दे रहे थे, मैंने भी दे दिया।”

“मतलब, आप सिर्फ़ भेड़चाल में शामिल हुए। अपने दिमाग़ से बिल्कुल काम नहीं लिया!”

”सर, मैं तो…।”

“देखो, तुम्हारे भले के लिये कह रहा हूं… उस बाबूगिरी के काम में कुछ नहीं रखा। अब तक यहां जितना काम सीखा है। कुर्सी पर बैठकर, सभी भूल जाओगे। मेरी मानो, तो जाकर अपनी एप्लीकेशन वापिस ले लो।”

अच्छा यही हुआ, कि वह उस दौरान, एक महीने की छुट्टी पर चला गया और उसकी अनुपस्थिति में, मैं बड़ी आसानी से, सुपरवाइज़र चुन लिया गया।

किंतु उसके बाद भी उसने मेरा पीछा नहीं छोड़ा। वह सड़क पर चलते-चलते ही, मुझे रोक लेता और शुरू हो जाता… कितने साल हो गये, फैक्टरी में काम करते? बताइये तो, माइक्रोमीटर में कितनी चूड़ियां होती हैं?… हाइटगेज क्या बला होती है?… पिच और लीड में क्या फ़र्क होता है? इन्टरलाॅकिंग कटर किस काम आते हैं? चूड़ियां काटने के लिये, गियर का सेट कैसे चुना जाता है? आप्टिकल पाय कैसे तैयार किया जाता है?

बहुत दिन बाद पता चला, कि वह इस प्रकार मुझे ही नहीं, अपितु बहुत से ऐसे लोगों को, जिन्हें वह नापसंद करता था, परेशान करता ही रहता था। जब तक कि सामने खड़ा व्यक्ति, पूरी तरह नर्वस होकर हथियार न डाल दे, वह प्र्रश्न पर प्रश्न दाग़ता ही चला जाता था और वह उस व्यक्ति को बार बार एहसास दिलाये जाता, कि वह महज़ एक नाकारा गधा है, जो फैक्टरी से मुफ़्त का वेतन बटोर कर, पूरे राष्ट्र को हानि पहुंचा रहा है!

मैं वर्कशाप में लौट कर आया, तो देखा, एक सौ चार में से, केवल तीस-बत्तीस मशीनों पर ही वर्कर काम कर रहे हैं। शेष सभी, संभवतः फ़ोरमैन साहब के अवकाश पर होने का जशन मना रहे थे।

सोहन लाल टर्नर, एक बहुत अच्छा और अनुभवी कारीगर था। वह वर्कर लोगों के बीच, ‘उस्ताद’ के रूतबे से पूजा जाता था। इस समय वह भी, अपनी मशीन छोड़, दस-बारह शार्गिदों की टोली के दरम्यान खड़ा, शेरो शायरी में मशग़ूल था।

मुझे समीप आते देख, कुछ वर्कर खिसकने लगे। किंतु उस्ताद ने उन्हें हाथ के संकेत से रोक लिया और अपने चेहरे पर शानदार क़िस्म की मुंस्कराहट लाकर, मुझे सम्बोधित करते हुए बोला, ”लीजिये साहब, आप भी एक ताज़ातरीं शेर मलाहिज़ा फ़रमाइये। अर्ज़ किया है, किः-

बस एक ही उल्लू काफ़ी था बरबाद गुलिस्तां करने को

हर शाख़ पे उल्लू बैठा है अंजाम-ए-गुलिस्तां क्या होगा

मैंने उसकी लम्बी मंूछों की ओर देखते हुए पूछा, ”यह शेर आपने लिखा है? मैंने तो इसे थोड़े दिन पहले, एक मुशायरे में सुना था।”

वह मुस्करा कर बोला, ”किसी ने चुरा लिया होगा!”

मैंने जलभुन कर कहा, ”बाई दि वे, आप की शेरोशायरी का यह दौर कब तक चलेगा?”

“बस, कैन्टीन से चाय आने ही वाली है। उसके बाद तो आप जानते ही हैं, मशीन होगी और हम होंगे।”

मैंने कहा, ”एक बात नोट कर लीजिये। आज शाम तक, वे पचपन स्क्रू, नई ड्राइंग के हिसाब से हर हालत में बन जाने चाहिये।”

“शाम तक?… न बन सकेें, तो?” उसने मुंह बना कर पूछा।

“तब मैनेजर एन0 मोहन साहब, अपना ताज़ा कलाम पेश करेंगे, जो ख़ास तौर पर आप की खि़दमत में होगा।”

एक कोने में, जहां चार-पांच मशीनें, मरम्मत के लिये पड़ी थीं, उनके पीछे बैठे कुछ आदमी, जुआ खेल रहे थे।

“शरम आनी चाहिये आप लोगों को!” मुझ से बिना कहे न रहा गया। वे झटपट, ताश के पत्ते और रेज़गारी, जेबों मंे ठोंस, उठ खड़े हुए।

“डयूटी पर भी जुआ? कितनी बुरी बात है!” मैंने कृष्ण की ओर देखते, फटकार लगाई। मगर वह कुछ महसूस करने के बजाये, तन कर खड़ा हो गया और कहने लगा, ”हां साहब, हम तो जो भी करें, बुरा है। छोटे लोग हैं न, इसलिये बुरा है! आप बड़े लोग, सारी सारी रात, उधर बड़ी क्लब में जो कुछ किया करते हैं, वह तो धर्म और पुन्य का काम होता होगा!”

“देखो, छुट्टी के बाद तुम लोग कुछ भी करो, मुझे कोई मतलब नहीं। मगर यहां…।”

ग़ौर किया, इसी दौरान दस बारह वर्करों का झंुड, मुझे घेरे खड़ा है।

“आप लोग अपनी अपनी मशीन पर जाकर काम शुरू कीजिये।” मैंने कुछ सख्ती से कहा। किंतु तभी, चाय वाला, एक हाथ में चाय का ड्रम और कंधे पर समोसे का डिब्बा लटकाये आ पहुंचा और सभी वर्कर, अपना अपना कप या गिलास उठाये, किलकारियां सी मारते हुए, चाय वाले की ओर भाग खड़े हुए।

मैं पुनः अपनी सीट पर आ बैठा और इस महीने, फिटिंग गु्रप में कितना काम हो चुका है, हिसाब करने लगा। देखा, कुछ फिटरों ने इस महीने में, बहुत ही कम काम अब तक किया है। मगर वे लोग तो कम करें या अधिक, उन्हें पूरा वेतन चाहिये। यही नहीं, पूरे वेतन के अलावा, कम से कम पचास प्रतिशत, पीस वर्क का लाभ भी हर हालत में मिलना चाहिये। नहीं मिलेगा, तो यूनियन वाले आ धमकेंगे और यहां मेज़ पर मुक्का मार कर दहाड़ेंगे, ”आप ग़रीब मज़दूरों का शोषण करने पर तुले हैं। हम ऐसा हरगिज़ होने नहीं देंगे।”

“मगर इन आदमियों ने, पूरा दिन काम भी तो नहींे किया।”

“अरे, आप अपना टाइम भूल गये, इधर कुर्सी पर बैठते ही!”

 

अनिल आ खड़ा हुआ।

“कहिये साहब, अब तो टाइम है आप के पास?”

“बोलो?”

“बोलना क्या है, इस सेक्शन से मेरा ट्रांस्फ़र करा दीजिये।”

“यहंा क्या तकलीफ़ है?”

“इस सेक्शन में, अनुशासन नाम की तो चीज़ ही नहीं रह गई है। जो जिस के जी में आता है, करता है। दिन भर चाय उड़ती हैैै। बीड़ियां फंूकी जाती हैं, मुशायरे होते हैं और जगह जगह जूए के अड्डे बने हैं… यह सब क्या है?”

मैंने कहा, ”मिस्टर अनिल, क्या आप इस फैक्टरी के नये महाप्रबंधक नियुक्त हुए हैं, जो इस तरह अनुशासन हीनता के ग़म में घुले जा रहे हैं?”

वह निराश सा होकर बोला, ”बडे़ ही अफ़सोस की बात है!”

मैंने कहा, ”बैठो और बैठकर इतमिनान से अफ़सोस करो।”

किंतु वह खड़ा ही रहा और बोला, ”आप भी दूसरे स्टाफ़ की तरह, वर्करों को हीन समझते हैं!”

मैंने हंस कर कहा, ”अरे भई, मैंने तो बैठने के लिये कहा है।”

वह समीप पड़े लकड़ी के स्टूल पर बैठ गया, तो मैंने उसे समझाने की कोशिश की। कहा, ”अनिल, तुम बस अपना काम किये जाओ।”

“अरे ये लोग?”

“ये लोग तो यों ही चलेंगें। सच मानो, इस देश को, कोई भी नहीं सुधार सकता।”

“न जाने क्यों, मुझे आप से हमदर्दी होने लगी है!”

“अब शायद तुम ख़ुद, मुझे हीन समझने लगे हो!”

“अच्छी बात! आप जब बात को समझना ही नहीं चाहते, तो यहां बैठ कर क्या करूंगा!”

वह उठने लगा। मगर मैंने उसका हाथ पकड़ कर रोक लिया।

“बात क्या है?” मैंने धीरे से पूछा।

“आप को शायद मालूम नहीं, कृष्ण, नरेन्द्र मोहन का आदमी है।”

“मालूम है।”

“मगर यह मालूम नहीं होगा, कि इस फैक्टरी में एक षड्यंत्र रचा जा रहा है।”

“षड्यंत्र?”

“मुझे डर है, कहीं आप भी इसका शिकार न हो जायें।”

“वैसे मामला क्या है?”

“मैं शाम को आप से मिलूंगा।” कह कर वह उठ खड़ा हुआ। वह कैबिन से बाहर निकला ही था, कि कोई वर्कर, मशीनों की ओर से चिल्लाया, ”साला चमचा, आ गया अपने बाप को तेल लगा कर!”

 

षड्यंत्र! कैसा षड्यंत्र होगा, जिसका, मैं स्वयं भी शिकार हो सकता था? मैंने तो कभी किसी का कुछ नहीं बिगाड़ा। फिर लोगों को मुझे से क्या शिकायत है? क्यों नाराज़ हैं वे?

चमचा! मुझे हंसी आ गई। किसी पर, मेरे जैसे मामूली आदमी का ‘चमचा’ होने का आरोप! क्या कहने!

अनिल, एक अच्छा, किंतु बहुत ही भावुक, दुबला पतला सा नवयुवक, बेहद परिश्रमी, दिन भर काम पर ही पिला रहने वाला कामगर। मगर मामूली सी बात पर भी, आवेश में आकर, चेहरा सुर्ख कर लेने वाला एक आदर्शवादी।

उसे ट्रेड टेस्ट में पास कराने में, मैंने सहयोग दिया था, या कहिये, कि उसके कार्य करने का ढंग ही इतना बढ़िया और प्रभावशाली था, कि बिना किसी पूर्व परिचय के भी, मुझे बोर्ड के पास जाकर, उसकी सिफ़ारिश करनी पड़ी थी। नौकरी पर लग जाने के कुछ दिन बाद ही, वह बहुत से पुराने और अनुभवी कारीगरों को भी पीछे छोड़ने लगा था। जिस किसी कठिन कार्य को हाथ में लेते, वे पुराने कारीगर झिझकते, या नख़रा दिखाते, वह आगे बढ़कर, और बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेता और जब तक उस जाॅब को पूरा करके, इंस्पेक्शन वालों से पास न करा लेता, वह साँस न लेता। इंस्पेक्शन वालों को भी उस पर पूरा भरोसा हो चला था। अनिल के हाथ से निकला काम है, तो सही हीे होनाा चाहिये।

मगर अनिल के आदर्शवाद से, मैं कभी कभी परेशान हो उठता था… लोगों को शरम भी नहीं आती! ये लोग, बिना काम किये ही, पूरा वेतन ले जाते हैं… इन अफ़सरों को तो गोली से उड़ा देना चाहिये, जो कारों में बैठ, मज़दूर काॅलोनी में जाकर, बच्चों को टाॅफ़ियां बांटने के बहाने, नल से पानी लेती औरतों के वक्ष के उभार देख कर तृप्त होते हैं… अब तो लगने लगा है, कि इस पूरे देश का ही बेड़ा ग़र्क़ होने वाला है! यहां तो हर आदमी को अपनी ही पड़ी है… यहां तो तुरंत सैनिक शासन क़ायम हो जाना चाहिये…।

अनिल कई दिन से ड्यूटी पर नहीं आ रहा था। पता चला, उसे बुख़ार चढ़ा है। फिर पता चला, बुख़ार उतर ही नहीं रहा है। एक दिन सोचा, शाम को उसके क्र्वाटर पर जाकर, पता किया जाये।

मैं बीच का आदमी हूं। फैक्टरी के भीतर और फैक्टरी के बाहर क्वार्टरों के मामले में भी। दायें हाथ, थोड़ा चल कर और मुख्य मार्ग पार करके, अफ़सरों के बंगले हैं और बायें हाथ थोड़ा चल कर और ढलान उतर कर, वर्करों के एक एक कमरे वाले, खपरैलनुमां क्वार्टरों की क़तारें शुरू हो जाती हैं। मेरा क्वार्टर इस दायें और बायें का संगम है। दो कमरे, आगे पीछे, दोनों ओर बरामदे और खुला आंगन। शेष सभी सुविधाएं भी उपलब्ध…।

किंतु वर्कर लोगों के एक एक कमरे वाले क्वार्टर!

केवल एक कमरा, छोटा सा बरामदा, उसी में एक ओर रसोई। पानी के नल और संडास की, बाहर संयुक्त व्यवस्था। जहां लोग क़तारों में खड़े, अपनी बारी की प्रतीक्षा किया करते। पानी की एक एक बाल्टी के, ‘पहले और बाद में’ के प्रश्न पर घंटों गाली गलौज। कितनी ही बार मारपीट की नौबत और कितने ही, जवान होते लड़के लड़कियों की प्रेम कहानियां, यहीं पर जन्म लेतीं और परवान चढ़तीं…।

वर्कर काॅलोनी के क्वार्टर शुरू होते ही, गोबर की दुर्गंध, नथुनों में प्रवेश करने लगी। सड़क किनारे, दरी बिछा कर ताश खेलने वालों में से कुछ ने, चकित सा होकर, एक बार मेरी ओर देखा और पुनः पतों में खो गये। नल पर पानी लेती कुछ स्त्रियों ने जैसे मुझे पहचानने का सा प्रयास किया। फिर मुंह घुमा कर आपस में खुसर पुसर करने लगीं। चार-पांच बच्चे, एक अन्य फटे कपड़े पहने मरियल से बच्चे को दबोचे हुए थे। न जाने वे उसकी चिथड़े हुई निक्कर की जेब से, क्या निकालना चाह रहे थे। एक मज़दूर की गाय, साथ वाले के बगीचे में मुंह मार रही थी और एक स्त्री घंूघट काढ़े और हाथ में लम्बा सा डंडा लिये, गाय पर पिल पड़ने के लिये भागी चली आ रही थी…।

मैंने उस ब्लाॅक में क्वार्टर की संख्या पढ़ी… यही होना चाहिये। बाहर दरवाजे़ के पास, पत्थर के कोयले की अंगीठी, पूरी तरह नहीं जली थी। उसमें से निकलता गहरा काला धुआं, फ़िज़ा मंे फैला जा रहा था।

अनिल की बहन थी, जो भीतर से, पंखा हाथ में लिये, अंगीठी को, पूरी तरह रोशन करने के लिये चली आ रही थी।

“अनिल है?” मैंने पूछा।

उसने हाथ जोड़ नमस्ते की, तो पंखा उसके हाथ से छूटने लगा। मगर ज़मीन पर गिरा नहीं।

“बुख़ार उतरा?” मैंने पूछा।

“ना… कम भी नहीं हुआ… आइये।”

अनिल आंखें बंद किये लेटा था। उसकी मां, ठंडे पानी में भिगो कर पट्टी उसके माथे पर रख रही थी। बोली, ”कल रात तो तबीयत बहुत ही बिगड़ गई थी… अरूणा, कुर्सी ज़रा इधर खिसका दो।”

मैं बैठ गया। एक मिनट, अनिल के तमतमाये चेहरे की और देखता रहा। फिर पूछा, ”दवा कहां से ली?”

“अपने अस्पताल की चल रही है। दवा क्या है, पानी-सा ही घोल कर दिये जा रहे हैं। बीमार ठीक हो तो कैसे!” मां ने निराश-सी होकर कहा।

तभी, अनिल की दूसरी बहन, जो अरूणा से दो ढाई वर्ष बड़ी लगती थी, दवा की शीशी लिये आ पहंुची।

“कौन सा डाक्टर था ड्यूटी पर?” मैंने पूछा।

“चैटर्जी।” वह उदास और थकी सी बोली।

मैंने कहा, ”ऐसा करों, पर्ची मुझे दे दो। डाक्टर चैटर्जी से कहकर, मैं अभी दवा बदलवा लाता हूं।”

“अरूणा…“ बड़ी बहन ने छोटी को आवाज़ दी, ”लैम्प इधर रख जाओ।”

तभी अनिल ने आंखें खोलीं और मेरी ओर देखा।

“आप ने क्यों कष्ट किया?”

“कष्ट कैसा!”

“आप…”

“तुम बहुत जल्द ठीक हो जाओगे।” कह कर मैं उठ खड़ा हुआ। चलने लगा, तो अरूणा बरामदे से ही बोली, “थोड़ा रूकिये, चाय बनने वाली है।”

“नहीं, इस समय चाय नहीं।” मैंने कहा।

“मैंने तो चायपत्ती भी डाल दी।”

उसकी अबोधता पर हँसी आने लगी। कहा, ”दूध और चीनी मत डालना। चाय पीने बैठ गया, तब डाक्टर तो मिल चुका। लाओ, वो पर्ची दो।”

अर्चना ने पर्ची दे दी। उसका चेहरा, अनिल से काफी मिलता था।

गम्भीरता, पूरे घर में शायद सबसे अधिक, उसी के हिस्से में आई थी।

“मैं चलंू आप के साथ। पूछने लगी।”

“किस लिये?”

“आपको एक बार फिर, इतना चक्कर लगानाा पड़ जायेगा।”

”उसकी चिंता मत करें।”

“लौट कर तो चाय पी लेंगे न?”

“न पीने वाली तो कोई बात नहीं।” मैंने हंसकर कहा।

अस्पताल से दवा लेकर लौटने और चाय पीकर, अनिल के क्र्वाटर से बाहर निकलने तक घना अंधेरा हो चला था।

दोनों बहनों ने एक साथ हाथ जोड़े। उस समय, उनके चेहरों पर तनाव कुछ कम था। डाक्टर द्धारा बदल दी गई दवा से, भाई के शीघ्र स्वस्थ हो जाने की सम्भावना मेें ही, शायद यह परिवर्तन हुआ था।

मैंने हाथ जोड़ और मुस्करा कर, दोनों बहनों के अभिवादन का उत्तर दिया।

शायद अंधेरे में ही, इधर-उधर से कई नज़रें, मेरे ऊपर जमी थीं। किसी ने ज़ोर से गले को खखारा और बलग़म का बड़ा सा थोबा, मेरे पैरों के समीप दे मारा।

 

क्रमशः…

© श्री मदन शर्मा 

देहरादून, उत्तराखंड  

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२३ – सावन का झूला… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय और अप्रतिम कथा – सावन का झूला।)

☆ कथा कहानी # १२३ – सावन का झूला श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

सावन की रिमझिम फुहारों के बीच मालती जी अपने बगीचे में तुलसी के पास दीपक जला रही थीं। तभी उनकी नजर एक अनजान लड़की पर पड़ी, जो चुपचाप बगीचे में खड़ी झूले को निहार रही थी।

मालती जी चौंक उठीं।

“कौन हो तुम? और मेरे बगीचे में क्या करने आई हो?

कुछ चुराने का इरादा है क्या?”

लड़की सहम गई। उसने दोनों हाथ जोड़ लिए।

“माफ कीजिए… मैं चोर नहीं हूँ।”

मालती जी ने गौर से देखा। लड़की के चेहरे पर मासूमियत थी। उसके कपड़ों और बातचीत से लग रहा था कि वह किसी अच्छे घर की पढ़ी-लिखी लड़की है।

“तो फिर अंदर कैसे आई?”

लड़की ने झेंपते हुए कहा, “गेट खुला था… इसलिए चली आई।”

मालतीने कहा-

“लेकिन क्यों?”

लड़की कुछ पल चुप रही। फिर उसकी आँखें झूले पर टिक गईं।

“मैं आपके बगल वाले घर में कुछ दिन पहले ही किराए से रहने आई हूँ।

सावन आया है… इस मौसम में तो हम मायके जाते थे, झूला झूलते थे, सहेलियों के साथ हँसते-गाते थे। लेकिन इस बार मायके नहीं जा पा रही हूँ।”

उसकी आवाज़ भर्रा गई।

“आज खिड़की से आपके आँगन में यह झूला दिखाई दिया। आपका इतना सुंदर बगीचा देखा तो बचपन याद आ गया। अब ऐसे बगीचे और झूले कहाँ देखने मिलते हैं?

पता नहीं क्यों… मैं खुद को रोक नहीं पाई और चली आई।”

मालती जी की कठोरता धीरे-धीरे पिघलने लगी।

लड़की ने संकोच से पूछा, “अगर आप कहें तो… क्या मैं थोड़ी देर झूला झूल सकती हूँ?”

मालती जी कुछ कह पातीं, उससे पहले लड़की ने अपने कान पकड़ लिए।

“सॉरी… मुझे बिना पूछे यहाँ नहीं आना चाहिए था। अब नहीं आऊँगी।”

वह मुड़कर जाने लगी।

“अरे, रुको बेटी!”

मालती जी की आवाज़ सुनकर लड़की रुक गई।

मालती जी झूले के पास गईं और उसके बैठने की जगह साफ करते हुए बोली—”इतने दिनों से इस झूले पर कोई बैठा ही नहीं?  आज कोई बचपन की याद लेकर आया है, तो मैं उसे कैसे मना कर दूँ?”

लड़की की आँखें भर आईं।

वह धीरे से झूले पर बैठ गई। मालती जी ने उसे हल्का-सा धक्का दिया।

झूला आगे-पीछे होने लगा।

लड़की के चेहरे पर बरसों बाद बचपन लौट आया।

कुछ देर बाद वह उठी और जाने लगी।

मालती जी ने पूछा, “बेटी, कल फिर आओगी?”

लड़की ने पलटकर देखा। उसकी आँखों में आँसू थे।

“अगर… आपको बुरा न लगे तो।”

मालती जी मुस्कुराईं, मगर उनकी आँखें भी नम थीं।

“बुरा क्यों लगेगा?

यह बगीचा मेरा है, लेकिन यह झूला तुम्हारे बचपन का भी तो है। जब मन करे, चली आना।”

लड़की ने आगे बढ़कर मालती जी को गले लगा लिया।

दोनों की आँखों से आँसू बह रहे थे।

सावन की बारिश बाहर भी हो रही थी और दोनों के भीतर भी।

मालती जी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—”बेटी, मायका दूर हो तो क्या हुआ… अब यह आँगन भी तुम्हारा है।”

लड़की ने आँसू पोंछते हुए मुस्कुराकर कहा—”और आप… मेरी अपनी मालती माँ।”

झूला अब भी धीरे-धीरे हिल रहा था।

उस दिन उस झूले पर सिर्फ एक लड़की नहीं झूली थी…

एक माँ को बेटी मिली थी और एक बेटी को अपना मायका।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ नीले घोड़े वाले सवारों के नाम  ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

श्री कमलेश भारतीय 

(जन्म – 17 जनवरी, 1952 ( होशियारपुर, पंजाब)  शिक्षा-  एम ए हिंदी , बी एड , प्रभाकर (स्वर्ण पदक)। प्रकाशन – अब तक ग्यारह पुस्तकें प्रकाशित । कथा संग्रह – 6 और लघुकथा संग्रह- 4 । यादों की धरोहर हिंदी के विशिष्ट रचनाकारों के इंटरव्यूज का संकलन। कथा संग्रह -एक संवाददाता की डायरी को प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से मिला पुरस्कार । हरियाणा साहित्य अकादमी से श्रेष्ठ पत्रकारिता पुरस्कार। पंजाब भाषा विभाग से  कथा संग्रह-महक से ऊपर को वर्ष की सर्वोत्तम कथा कृति का पुरस्कार । हरियाणा ग्रंथ अकादमी के तीन वर्ष तक उपाध्यक्ष । दैनिक ट्रिब्यून से प्रिंसिपल रिपोर्टर के रूप में सेवानिवृत। सम्प्रति- स्वतंत्र लेखन व पत्रकारिता)

पुनर्पाठ

☆ कथा कहानी ☆ नीले घोड़े वाले सवारों के नाम ☆ श्री कमलेश भारतीय ☆

(मित्रो। यह कहानी – नीले घोड़े वाले सवारों के नाम। धर्मयुग में जुलाई, 1982 में प्रकाशित हुई थी। इतने बरसों बाद फिर आपकी अदालत में। इसे जल्दी टाइप करवाने का श्रेय मेरे मित्र विनोद शाही को। इस कहानी का पंजाबी मे अनुवाद केहर शरीफ ने किया जो पंजाबी ट्रिब्यून में – रुत नवेयां दी आई शीर्षक से प्रकाशित हुई थी।)

नगर में कोहराम मच गया था।

और मुझे माला की चिंता सताई थी। बेतरह याद आई थी माला।

वह अपनी ससुराल में खैरियत से हो। यही दुआ मांगी थी। जब जब किसी बहू को दहेज के कारण मिट्टी का तेल छिड़ककर मारे जाने की खबर अखबार में पढ़ता हूं तब तब मेरा ध्यान अपनी इकलौती बहन माला की ओर चला जाता है। अजीब संयोग है कि ऐसा कोई दिन नहीं गुजरता, जब अखबार के किसी कोने में ऐसी मनहूस खबर न छपती हो और मुझे ऐसा लगता है जैसे मेरी इकलौती बहन रोज़ मरती हो। रोज़ रोज़ मरने की उसकी खबर पढ़कर मे रौंगटे खड़े हो जाते हैं। माला की याद के साथ ही याद आता है उसका गुनगुनाना :

उड़ा बे जावीं कावां

उडदा वे जावीं मेरे पेकड़े,,,,

यह महज गुनगुनाने लायक लोकगीत नहीं है। ससुराल में किसी दुखियारी बेटी द्वारा काजा का सहारा लेकर मायके की याद एव॔ वीरे तक अपना मन खोलकर रख देने का अनोखा साधन है।

कागा। अरे ओ कागा। उड़ते हुए मेरे मायके जाना… सचमुच यह लोकगीत भी नहीं, कागा भी नहीं। कागा के कहने के बहाने यह दुखियारी माला का मन है जो ससुराल के दुखों को भुलाने के लिए बार बार मायके की तरफ पंख लगाये उड़ता है और अपनी तकलीफों की कहानी, दर्द के पहाड़ों जैसे बोझ को मां से कहने से इसलिए कतराते है कि मां सब काम काज छोड़कर सहेलियों के गले लग कर रोने लगेगी। मां का कलेजा छलनी छलनी हो जायेगा। बाप से बी भेद खोलते हुए माला का मन भरता है। बाप ने पहले ही अपनी पहुंच से बाहर जाकर दान दहेज दिया था। अब वह दोहरी मार से, लोगों में बैठे हुए भी अपना आपा खो देगा। पर मेरी बेबसी पर आंसू बहाने से बढ़ कर कुछ कर नहीं पायेगा। हां, कागा, तुम सारी कहानी कहना तो कहना मेरे भाई से। कहानी सुनते ही उसकी आंखों में गुस्से की आग मच उठेगी और वह नीले घोड़े पर सवार होकर बहन की खोज खबर लेने निकलेगा।

नगर में यहां वहां, हर चौक, हर गली, हर बाजार, हर घर और हरेक की जुबां पर एक ही चर्चा थी – नवविवाहित की हत्या या आत्महत्या की रहस्यमयी घटना की औल मुझे एक ही चिंता थी बहन माला की।

माला हर समय हंसूं हंसूं करति रहती। जरा जरा सी बात पर उसके दांत खिल उठते और मां उसे टोकती रहती कि तेरी ये आदत अच्छी नहीं। ससुराल में धीर गंभीर रहना पड़ता है बहुओं को। बहुएं ही ही करतीं अच्छी नहीं लगतीं। भले घर की लडकियां बात बेबात पर दांत नहीं निकालतीं।

….

पिता बीमारी से लड़ रहे होते। मैं, जो माला का बड़ा भाई ही नहीं, बाप भी पिता की भूमिका निभाने को विवश था। मां को टोक देता – हंसने खेलने दे मां। मायके में ही तो लड़कियां मौज मस्ती करती हैं। कौन जाने कैसी ससुराल मिले ?

– कैसी ससुराल क्या ? मेरी बेटी राज करेगी राज।

– अभी से उसे ससुराल में सेवा करने की बजाय राज करने का पाठ पढ़ाओगी तो ऐसे लाड प्यार में खिल खिल क्यों न करेगी ?

– किसी के बाप का क्या जाता है जो मेरी बेटी हंसती है ?

– बाप तो इसका और मेरा एक ही है, अम्मा। मगर हम कौन इसके भाग की रेखा लिख सकते हैं ?

– ऊ…. माला इस प्रसंग से चिढ़ जाती और जीभ निकाल कर मुझे चिढ़ाने लगती। मैं भी बड़प्पन भूल कर पर हाथ उठा कर दौड़ पड़ता। मां बीच में आ जाती -मेरे जीते जी कोई हाथ लगा कर दिखाये तो मेरी लाडली को। और वह मां के पीछे छिपी मुझे जीभ दिखा दिखा कर चिढाती रहती।

लोगों की बातें, अखबार की रपटें, सब सुनता हूं तो घबरा जाता हूं।

– क्या जमाना आ गया है ? लोग किसी की जान को जान ही नहीं समझते ? गाजर मूली की तरह कट। बस। मामला खत्म।

– न मूर्खो। अंधेर साईं का…. तुम्हारी करतूत की खबर लोगों को न लगेगी ? लोगों के सामने बच बी गये पर ऊपर की अदालत कौन भुगतेगा ? वो ऊपर वाला तो सब कुछ देखता है,,,,जानी जान है।

-हाय। हाय। जिंदा जान को कैसे बकरे की तरह मार डाला। कसाई कहीं के। सुनते हैं, रात को खूब मारपीट की। अधमरी तो कर ही दिया था। फिर पिछले कमरे में ले गये थे। मिट्टी का तेल छिड़क कर आग लगा दी। कितनी तड़पी होगी। हाय राम। चीखी चिल्ला होगी। हाथ पांव मारे होंगे।

– मुए टेलीविजन मांग रहे थे। कहां से ला देती ? किस मुंह से मांगती? बहू के मायके में क्या पैसों की खान दबी होती है कि गयी और खोद लाई ?

– अब शमशान घाट का बाबा सच्चा बनता है कि मुझे नोट दे गये। हरामजादे। नोट दे गये या तूने ले लिए ? तुझे पता नहीं चला, जिस लाश को मुंह अंधेरे जलाने लिए हैं, शहर के चार आदमी साथ नहीं हैं, कुछ तो काली करतूत होगी ही। और वह चिल्लाने की बजाय मुंह में नोट दबा कर कोठरी में घुस गया? कुत्ता कहीं का। अब नगर भर में घूम रहा है अपने आपको धर्मात्मा साबित करने के लिए। पाखंडी। निकाल बाहर करो इसे शहर से या जिंदा गाड़ दो।

जितने मुंह, उतनी बातें।

नगर में एक तनावपूर्ण शांति।

लोग- जो दहेज न लेने, न देने की कसमें खाते नहीं थकते थे। लोग- जो दहेज न मिलने पर जान लेने से भी नहीं चूकते थे। लोग- अबूझ पहेली की तरह समझ में नहीं आते थे। लोग- जो जुलूस की शक्ल में नारे भी लगाते थे। लोग- जो समय आने पर बिखर भी जाते थे। लोग- जो गालियां देते नहीं थकते थे। वही लोग महज शोक प्रकट करने आते थे।

– च् च्, बहुत बुरा हुआ। महज मातमपुर्सी, महज नाटक। जैसे एकाएक धुंध उतर आई हो, सन्नाटा व्याप गया हो। कहीं कोई विरोध नहीं। विरोध की आवाज़ तक नहीं। शहर में जैसे एक नवविवाहिता सामान्य ढंग से सब्जी-भाजी बनाने रसोई घर में गयी हो और असावधानी में उसकी साड़ी का पल्लू आग पकड़ कर उसे जला गया हो। अखबार के किसी कोने को भरने के लिए एक छोटी सी खबर, जिसे सुबह रजाई में दुबके, चाय की चुस्कियों भरते, ताज़ा अखबार में सबने पढ़ा और शाम तक अखबार को रद्दी में फेंक दिया। घटना को भूल भुला दिया। रोज़ ऐसा होता है। कहीं न कहीं, किसी न किसी शहर में। क्यों होता है ऐसा ? कौन सिर खपाये…. भाड़ में जाये।

क्या माला के साथ भी…. ?

किसी शिकारी की बंदूक से निकली गोली की तरह यह सवाल मुझे छलनी कर जाता है। माला के बारे मः ऐसा सोचते ही सिहरन सी दौड़ने लगती है सारे जिस्म में। सिर, से लेकर पांव तक करंट की लहर गुजर जाती है और मैं सुन्न हो जाता हूं। अखबार के किसी कोने में छपी छोटी सी खबर भी मुझे माला के प्रति दुश्चिंताओं से भर देती है।

– मेरी बेटी राज करेगी, राज।

हर मां बाप, भाई बहन यही चाहते हैं कि ससुराल में उनकी लाडो राज करे। बीमार बाप बिस्तर से लगा, चाय, निगाहों से शादी की सारी रस्में देखता रहा था और उसकी जगह माला का कन्यादान मुझे ही करना पड़ा था। उसका धर्म पिता बन कर। राखी की लाज के साथ साथ उसके मान सम्मान का भार भी मेरे ही कंधों पर आ गया था। कन्या दान करके मैंने यही मांगा- मेरी बहन राज करे, राज।

एक दो बार ससुराल के चक्कर लगाने के बाद देखा कि माला की हंसी कहीं खो गयी थी।

तीज त्योहारों पर सब कुछ ले जाते भी डरी सही रहती। तानों की कल्पना मात्र से उसकी कंपकंपी छूट जाती। मिली हुई सौगातों पर ससुराल में होने वाली छींटाकशी याद करते उसका मन डूबने लगता। न चाहते भी उपहारोअऔ से लदी फदी जाती। अगली बार फिर वही उतरा हुआ चेहरा और मांगों का सिलसिला होता।

एक बड़ा भाई, जिसके अपने सपने झर चुके हों, अपनी बहन को सिवाय शुभकामनाओं के दे हो क्या सकता था ? एक मां भगवान् की मूरत के आगे माता रगड़कर बेटी का सुहाग बना रहे की दुआ ही कर सकती है। और कुछ नहीं। एक बीमार बाप सिवाय आशीर्वाद के और क्या सम्पत्ति दे सकता है ?

ये सब नाकाफी थे दुनिया के बाज़ार में, माला की ससुराल में।

इनका कोई मोल न था। कौड़ी थे, एकदम कौड़ी। माला के खत उसके दुख दर्दों का संकेत लिए रहते। खतों की लिखाई बेढंगी -बेतरतीब रहती। जिससे लिखने वाली के मन में व्याप्त भय, आशंका, चिंता, अस्थिरता आदि की सूचनाएं छिपाई हुई होने पर भी मिल हो जाती थीं।

फिर उसके खत जैसे सेंसर किए जाने लगे। किसी किसी खत में बनावटी खुशियां भरी होतीं तो कोई कोई खत टूटे फूटे अक्षरों में  कभी पेंसिल तो कभी कोयले से लिखा मिलता। और इस हिदायत के साथ कि चोरी से लिख रही हूं, इस खत का जिक्र न करें। बस। मिलने आ जाएं। दर्द की एक एक परत जम कर दर्द का पहाड़ बन जाती थी। जिसका बोझ बांटने के लिए वह कभी खत का तो कभी कागा का सहारा लेती थी।

बात बरसों से बढ़कर हाथापाई तक आ पहुंची थी। पीठ पर नीले नीले निशान जब जख्म बन जाते, तब मरहम के लिए मायके की हंसी ठिठोली याद आती। बात, तानों से बढ़कर इल्जामों तक पहुंच गयी थी और यहां तक कि घर से अपना हिस्सा बेचकर पैसा ला दो।

कई काली रातें गिद्ध की तरह डैने फैलाये शहर पर मंडरा कर निकल गयी थीं और लोग बेखबर सोच रहे थे या आंखें मूंदे सोने का बहाना कर रहे थे।

रपट तक दर्ज नहीं हुई थी। मामला ठप्प लग रहा था। हत्यारे मज़े में काम धंधों में लग गये थे। एकाएक शहर में हलचल मच गयी थी। नवविवाहिता के मायके से, आसपास के कई गांवों की पंचायतें इकट्ठी होकर आई थीं। ठसाठस लोग, भीड़ के बीच सिसकते भाई। थाने का घेराव ही हो गया लगता था। पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने की निंदा की जा रही थी। पुलिस मुर्दाबाद। हाय… हाय…. खा गये।

थानेदार ने रपट दर्ज न करने की बजाय भाषण झाड़ा था – एक सप्ताह हो गया इस कांड को। अब तक आप लोग कहां सो रहे थे ? मैं मोहल्ले में गया था और ललकार कर पूछा था-है कोई माई का लाल जो गवाही दे कि हत्या की गयी है ? है कोई भलामानस जो छाती ठोककर कहे कि मैंने देखा है ? क्या उसकी चीखें किसी ने नहीं सुनीं ? क्या आग का धुआं निकलते भी किसी ने नहीं देखा ? क्या एक ही दिन में मार डाला गया? रोज़ खटपट होती थी। मारपीट होती थी। गवाही दो। गवाही के बिना केस कैसा?

रिश्वतखोर हाय हाय…

नारे शहर भर में गूंजे थे। अखबारों को बिक्री का मसाला मिला था। मामला अधिकारियों के ध्यान में लाया गया था। अमन चैन कायम करना जरूरी हो गया था। जुलूस पर लाठी बरसाने से मामला शहर दर शहर फैल जाता। इसलिए जनता का गुस्सा शांत करने के लिए थानेदार की ही पेटी उतार दी गयी यानी सस्पेंड। हत्यारों को गिरफ्तार किया गया और फिर जैसे ठंडी राख में से हवा झोंका लगते ही चिंगारियां फूट पड़ती हैं -दबी हुई चर्चा छिड़ गयी।

– स्सालों को फांसी लगा देनी चाहिए।

– नहीं। चौक में कौड़े मारने चाहिएं।

– पूछो, तुम्हारी क्या बेटी नहीं है ?

– हाय। सुनते हैं उस दिन बेचारी ने ब्रत रखा था।

– देवी देवता भी कैसे निष्ठुर हैं। एकदम पत्थर।

– कैसे कैसे राक्षस हैं दुनिया में।

– पता चलेगा जब जेल में चक्की पीसेंगे। गले में फांसी का फंदा कसेगा…

– सब फसाद की जड़ छोटी ननद है।

– उसे क्या दूसरा घर नहीं बसाना ?

– क्या गारंटी है कि जहां वह जायेगी वहां उसे जलाया नहीं जायेगा ?

– नारी ही नारी की दुश्मन है।

इस चर्चा के बीच मैं एक बार फिर अलग थलग पड़ जाता हूं। ज़मीन के हिस्से की मांग जैसे किसी आरे की तरह माला को चीर कर रख गयी थी। टुकड़े टुकड़े हो गयी थी वह। होंठ बंद और आंखों से फूट पड़ा झरना आंसुओं का। काश, ज़मीन न होती। बाप ने शराब की लत में उड़ा दी होती। या भाई ने जुए में हार दी होती। यह ज़मीन न होती तो उसकी हड्डी हड्डी न टूटती।

निकलते निकलते बात मुझ तक पहुंची थी और सहज ही मुझे इस पर विश्वास नहीं आया था। पढ़ा लिखा वर्ग जो आर्थिक क्षमता का, आर्थिक अव्यवस्था का शिखर देख रहा है अपनी नजरों के सामने। वही,,,,वही हां जो देख रहा है अपनी बहनों को भी शादी ब्याह की उमर लायक। वही ननदें जिन्हें दूसरे घर बसाने हैं,,,कहां से ले आती हैं इतना बड़ा जिगरा,,,इतना बड़ा कलेजा ?

मैंने तैयारी की थी और मां ने रोक लिया था -न, न, पुत्तर। हम लड़की वाले हैं। फिर भी जंवाई है। हमारा दामाद। हम बेटी वाले हैं। हमें झुकना ही पड़ेगा।

– जंवाई है तो जंवाई बन कर रहे। नहीं तो…

मां ने मुझे जाने नहीं दिया था। कहीं माला की ससुराल जाकर कुछ ऐसा वैसा न कर दूं।

जुलूस नगर के हिस्सों में गुजर रहा है। थानेदार जो बहाल हो गया है।लोगों ने उसे पुलिस स्टेशन में कुर्सी पर बैठे देखा तो ऐसे हैरान हुए जैसे उसका भूत देख लिया हो। वह जिंदा जागता थानेदार था। आंखों में वही चीते सी चुस्ती, चेहरे पर रिश्वत की रौनक, मूंछों पर रौब झाड़ने वाली नौकरी का ताव और सबसे ऊपर वही चमचमाती वर्दी, बायीं ओर लटकता पिस्तौल, कंधों पर जगमगाते सितारे, न जाने कौन सी बहादुरी दिखाने पर। जब वह सरकारी बूटों तले सड़क को रौंदता, पूरी ऐंठ के साथ शहर में गश्त लगाने लगा तब सबको सरकार की मर्जी के बारे में कोई शक नहीं रह गया था।

यही क्यों, सारे हत्यारे बड़े मज़े में जमानतों पर छूट आए थे और हंस हंस कर बता रहे थे कि जिसने पायजामा बनाया है, उसने नाड़ा भी। कानून के इतने बड़े बड़े पोथे हैं कि कानून से बचने के लिए रास्ता निकल ही आता है।

जुलूस गुजर रहा है। नारे गूंजते जा रहे हैं – नाटक बंद करो। हत्यारों को सज़ा दो। नहीं तो हम सज़ा देंगे।

मां और मैं दरवाजे से बाहर निकल उमड़ आए लोगों… लोगों के जोश और गुस्से को देखकर कांपने लगते हैं। डर कर बिल्कुल नहीं, हम डरे हुए नहीं हैं। उनका जोश और गुस्सा मुझमें आ गया है और मैं भी उन लोगों के साथ हो लेता हूं। मां मुझे रोकती नहीं। वह जानती है कि माला मेरा इंतज़ार कर रही है। मैं जैसे नीले घोड़े पर सवार हूं। जल्दी पहुंचने के लिए उतावला। खोज खबर लेने। माला तेरे भाई जिंदा हैं… हजारों भाई…

© श्री कमलेश भारतीय

पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी

संपर्क :   1034-बी, अर्बन एस्टेट-।।, हिसार-125005 (हरियाणा) मो. 94160-47075

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – डर ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – लघुकथा – डर ? ?

पिता की खाँसी की आवाज़ सुनकर उसने रेडियो की आवाज़ बेहद धीमी कर दी। उन दिनों संयुक्त परिवार थे, पुरुष खाँस कर ही भीतर आते ताकि महिलाओं को सूचना मिल जाए।

…”संतोष की मॉं, ये तुम्हारे लल्ला को बताय देना कि वो आज के बाद उस रघुवंस के आवारा छोकरे के साथ दीख गया तो टाँग तोड़कर घर बिठाय देंगे, कौनो पढ़ाई-वढ़ाई नाय, सब बंद कर देंगे”…. वह मन मसोस कर रह गया।

रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचता रहा कि 17 बरस का तो हो लिया, अब और कितना बड़ा होना पड़ेगा कि पिता से डरना न पड़े।.. शायद बेटे का जन्म बाप से डरने के लिए ही होता है…वह मन ही मन बड़बड़ाया और औंधे होकर सो गया।

आज उसका अपना बेटा 17 बरस का हो चुका। बेहद जिद्‌दी! कल-से उसने घर में कोहराम मचा रखा था। उसे अपने जन्मदिन पर मोटरसाइकिल चाहिए थी और अभी तो उसकी आयु लाइसेंस लेने की भी नहीं हुई थी। ऊपर से शहर का ये विकराल ट्रैैफिक, उसने सोच लिया था कि अबकी बार बेटे की ये जिद्‌द पूरी नहीं करेगा।

…”मॉम, डैड को साफ-साफ बता देना, नेक्स्ट वीक मेरे बर्थडे से एक दिन पहले तक बाइक नहीं आई न, तो मैं घर छोड़कर चला जाऊँगा.. और हाँ, कभी वापस नहीं आऊँँगा।”… उसने बेटे की माँ के हाथ में बाइक के लिए चेक दे दिया।

रात को बिस्तर पर पड़े-पड़े सोचता रहा-…शायद बाप का जन्म बेटे से डरने के लिए ही होता है.., और वह सीधा होकर पीठ के बल सो गया।

?

© संजय भारद्वाज   

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

गुरु साधना 19 जुलाई से बुधवार 29 जुलाई तक चलेगी। 🕉️ 

इसका मंत्र होगा-

ॐ गुं गुरुभ्यो नम:

(उच्चारण- ओम गुम गुरुभ्यो नमह)

💥 आप अपने गुरु / मानस गुरु / मार्गदर्शक / माता /पिता / प्रेरक व्यक्तित्व आदि जिस किसी में भी आपकी श्रद्धा हो, को स्मरण कर इस मंत्र का पाठ कर सकते हैं। यदि ऐसा कोई व्यक्तित्व आपके जीवन में नहीं है तो भी अपनी सैद्धांतिक / वैचारिक प्रतिबद्धता को यह मंत्र समर्पित कर सकते हैं। सनातन ठहराव नहीं बहाव है। अतः प्रवाह की दिशा स्वयं तय करें। 💥

इसके साथ नीचे दिए श्लोक का भी अपनी सुविधा के अनुसार 11 /21 /31 /51 बार पाठ करें। 

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रेयस साहित्य # ६१ – लघुकथा – नेक इन्सान ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆

श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रेयस साहित्य # ६१ ☆

☆ लघुकथा ☆ ~ नेक इन्सान ~ ☆ श्री राजेश कुमार सिंह ‘श्रेयस’ ☆ 

आज सुबह से ही काफी बरसात हो रही थी। वैसे तो नन्हा छोटू रुई वाली मिठाई की स्टिक लेकर सुबह ही घर से निकल गया था, लेकिन आज ग्राहक नदारत थे। सुबह से बरसात शुरू हुई तो बंद होने का नाम नहीं ले रही थी। मनोहरलाल के समोसे वाली दुकान के आगे लगे टिन सेड में रखे बेंच का किनारा पकड़े छोटू बरसात के रुकने का इंतजार करता रहा। बरसात बिल्कुल ही बंद होने का नाम ही नहीं ले रही थी। सुबह से घर से निकले छोटू को बड़ी तेज भूख लगी थी, लेकिन पाकेट में एक भी रुपया नही था कि कुछ खरीद कर खा ले। पॉकेट में पैसा कहां से होता, उसकी तो अब तक एक भी मिठाई नहीं बिकी थी।

मनोहरलाल की दुकान पर बरसात के मौसम में चटक समोसे खाने वालों की लाइन लगी हुई थी।

अबे, यहां क्या बैठा है, हट किनारे, … एक साहब ने उसे डांटे हुए कहा।

बेचारा छोटू क्या ही जवाब देता। उसने थोड़ा सा सरकने में ही भलाई समझी। इसी बीच कार पर सवार तीन चार लोग मनोहरलाल की दुकान पर समोसे खाने के लिए उतरे। उन्हें देखते हैं, मनोहरलाल उनकी आव भगत में लग गया। उसकी सक्रियता को देखकर ऐसा लग रहा था कि ये लोग जरूर कोई विशेष लोग होंगे। उनके बैठने का इंतजाम मनोहरलाल को करना था सो मनोहरलाल सो उसने कड़े तेवर दिखाते हुए छोटू को डांटते हुए कहा..

अबे, बार-बार कह रहा हूँ कि भाग यहां से, यह नालायक जाने का नाम नही ले रहा है..

कैसे जाऊँ चाचा.. इतनी तेज बरसात हो रही है भीग जाऊँगा, मेरी मिठाईयाँ भीग जाएगीं।

तेरी मिठाईयाँ भींग जाएगीं, इससे मुझे क्या लेना देना, .. हता है कि नही। चाचा यह मेरी भी तो दुकान थी.. छोटू के इतना कहते ही मनोहरलाल ने उसे एक तगड़ा सा थप्पड़ नन्हें छोटू के गाल पर जड़ दिया।

नन्हा छोटू तिलमिला कर बेंच से नीचे गिर गया। उसके कपड़े कीचड़ में सन उठे। उसकी रुई वाली मिठाई कीचड में गिर कर पिचक गयी और ख़राब हो गयी। उस छोटे बच्चे की छोटी सी पूँजी बर्बाद हो गयी।

जमीन पर लुढ़का छोटू कभी खुद को देखता, तो कभी अपनी बर्बाद हो चुकी, रुई वाली मिठाई को देखता। उसने आरत दृष्टि से मनोहरलाल की ओर देखा। उसकी आंखों से आंसूओं की धारा फूट पड़ी। वह बिल्कुल बेचारा और विवश था। वह कर ही क्या सकता था।

आइये बाबूजी, आपलोग लोग बैठिए, ऐसा बोलते हुए मनोहरलाल ने कार से उतरे चारों लोगों को बेंच पर बैठने का अनुरोध किया। जगह की दिक्कत जैसी की तैसी थी। ग्राहकों से सारे बेंच भरे हुए थे।

मनोहरलाल की इस गंदी सी हरकत को देखकर कार से उतरे भद्र से दिखते सज्जन का चेहरा क्रोध से लाल हो उठा . अरे मनोहरलाल ! तुमसे इस लड़के को मारा क्यों? यह लड़का किसका है?… शायद उस सज्जन ने बच्चे की यह बात सुन ली थी कि “चाचा यह मेरी भी दुकान तो थी।”

 मनोहरलाल अब क्या ही जवाब देता, वह उस व्यक्ति का मुँह देखने लगा। थोड़ा हिचकते हुए बोला, साहब ! ये महेश का लड़का है। सभी एक दूसरे का मुँह देखने लगे।

अरे मनोहरलाल..महेश कहाँ है? क्या वह दुकान पर बिल्कुल नहीं आता ? उसको देखे तो मुझे महीना हो गए। तूँ उसकी दुकान पर काम करता था, मैं यह समझ रहा था कि महेश तुम पर बहुत विश्वास करता है, इसलिए सारी दुकान तुम्हारी जिम्मेदारी पर छोड़ रखा है।

उस सज्जन ने जब दुबारा डांटते हुए मनोहरलाल से पूछा तो मनोहरलाल ने सारी बातें उस नेक इंसान को बता दी ..

बाबूजी, महेश अब इस दुनिया में नहीं है। उसके गुजरे लगभग छः महीने से ऊपर हो गए। यह लड़का महेश का ही लड़का है।

महेश का लड़का है !..अरे महेश की पत्नी भी तो बरसों पहले गुजर गई थी। और उसका यह लड़का इस हाल में। अब तो यह बिल्कुल अकेला और अनाथ हो गया होगा।

अबे नालायक तुम अपने मालिक से इस तरह की वफादारी निभा रहे हो। उसके बेटे की जिम्मेदारी निभाने की जगह, तुम इस छोटे लड़के से ऐसा व्यवहार कर रहे हो, उसको इस तरह से पीट रहे हो।

अभी के अभी खाली कर दे इस गुमटी को, नहीं तो तुम्हारी हड्डी पसली तोड़ दूँगा। बिल्कुल अभी के दफा हो जा यहाँ से, नहीं तो पुलिस बुलाकर तुम्हें बंद करता हूँ। मैंने यह दुकान ( बड़ी सी गुमटी ) तुम्हें नहीं दी थी, मैंने यह दुकान उस महेश को दी थी जो की एक नेक और सज्जन इंसान था। मेरे बचपन का दोस्त था।

उस सज्जन ने छोटे छोटू के दोनों हाथों को पड़कर उठाया और उसे अपने बाहों में समेट लिया। उनके कपड़े गंदे हो गए लेकिन उनको इससे कुछ लेना देना नहीं था। इस वक्त तो उसके बचपन के दोस्त महेश का बेटा, छोटू उसकी बाहों में था। छोटू और वह सज्जन दोनों ही रो रहे थे। धूर्त मनोहरलाल दुकान छोड़कर फरार हो चुका था। दुकान में बैठे अन्य ग्राहक इस नेकइंसान के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त कर रहे थे।

♥♥♥♥

© श्री राजेश कुमार सिंह “श्रेयस”

कवि लेखक एवं समीक्षक

लखनऊ, उप्र, (भारत )

 दिनांक 23 जुलाई 2026

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा – दिल और दिमाग के बीच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा ☆

डॉ. रीटा अरोड़ा

(डॉ. रीटा अरोड़ा जी का ई-अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत. सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर। समाचार पत्रों एवं पत्र-पत्रिकाओं में आपके लेख एवं कविताएं निरंतर प्रकाशित होती रही हैं। आपका लेख-संग्रह ‘बांस का विवेक’ हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों संस्करणों में केडीपी (KDP) पर ‘अकीरा अराता’ (AKIRA ARATA) उपनाम से प्रकाशित है। आप जनवादी लेखक संघ, हरियाणा की सक्रिय सदस्य हैं।)

☆ लघुकथा ☆ दिल और दिमाग के बीच ☆ डॉ. रीटा अरोड़ा 

रीमा को विदेश की प्रतिष्ठित कंपनी से नौकरी का प्रस्ताव मिला। यह उसके वर्षों के परिश्रम का सपना था। लेकिन उसी समय उसके पिता की तबीयत बिगड़ गई। माँ की आँखों में चिंता थी और पिता के चेहरे पर मुस्कान, जो मानो कह रही थी-“तुम जाओ, हम संभाल लेंगे।”

रीमा का मन भावनाओं और वास्तविकता के बीच झूलता रहा। एक ओर अपने सपनों का भविष्य था, दूसरी ओर अपनों का वर्तमान।

उसने कुछ दिन रुकने का निर्णय लिया। पिता का इलाज करवाया और परिवार को संभाला। कुछ महीनों बाद उसने फिर आवेदन किया। इस बार उसे पहले से बेहतर अवसर मिला।

नियुक्ति-पत्र हाथ में लेकर जब वह पिता के कमरे में पहुँची, तो उन्होंने बस उसका हाथ थाम लिया। दोनों की आँखों में न कोई शिकायत थी, न कोई सफाई-सिर्फ़ एक गहरा सुकून था, जिसे शब्दों की ज़रूरत नहीं थी।

खिड़की से आती हल्की धूप कमरे में फैल रही थी। रीमा ने चुपचाप वह पत्र मेज़ पर रखा और पिता के कंधे पर सिर टिका दिया।

© डॉ रीटा अरोड़ा

सेवानिवृत्त एसोसिएट प्रोफेसर करनाल

≈  संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – लघुकथा – ☆ मेरा  परिवार… ☆ सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ☆

सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा

(सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार सुश्री नरेन्द्र कौर छाबड़ा जी पिछले 40 वर्षों से अधिक समय से लेखन में सक्रिय। 5 कहानी संग्रह, 1 लेख संग्रह, 2 लघुकथा संग्रह, 1 पंजाबी कथा संग्रह 1 तमिल में अनुवादित कथा संग्रह,मराठी में अनुवादित लघुकथा संग्रह, मराठी में अनुवादित  कहानी संग्रह, कुल 12 पुस्तकें प्रकाशित।  पहली पुस्तक मेरी प्रतिनिधि कहानियाँ को केंद्रीय निदेशालय का हिंदीतर भाषी पुरस्कार। एक और गांधारी तथा प्रतिबिंब कहानी संग्रह को महाराष्ट्र हिन्दी साहित्य अकादमी का मुंशी प्रेमचंद पुरस्कार 2008 तथा २०१७। प्रासंगिक प्रसंग पुस्तक को महाराष्ट्र अकादमी का काका कालेलकर पुरस्कार 2013 । लेखन में अनेकानेक पुरस्कार। आकाशवाणी से पिछले 45 वर्षों से रचनाओं का प्रसारण। लेखन के साथ चित्रकारी, समाजसेवा में भी सक्रिय । महाराष्ट्र बोर्ड की 10वीं कक्षा की हिन्दी लोकभारती पुस्तक में 2 लघुकथाएं शामिल 2018)

आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा मेरा  परिवार

? लघुकथा – मेरा  परिवार ? सुश्री नरेंद्र कौर छाबड़ा ?

अध्यापिका ने बच्चों से कहा- “ चलो बच्चों आज आप सभी अपने परिवार की जानकारी देंगे. आप सभी बताएंगे आपके परिवार में कितने सदस्य हैं और कौन-कौन हैं…  “ पहले बच्चे ने बड़े उत्साह से कहा – “मेरे परिवार में चार सदस्य हैं.  पापा, मम्मी, मैं और मेरी बहन.” दूसरे ने कहा – “मेरी फैमिली में तीन स    दस्य हैं. मैं और मेरे पापा मम्मी .”  यह गिनती 15 तक इसी तरह चलती गई. उसके पश्चात रोहन का नंबर आया वह बोला- “अध्यापक जी, मेरे परिवार में कुल 11 सदस्य  हैं. “क्लास के सभी बच्चे हंसने लगे. अध्यापक ने  भी हैरानी से पूछा- “11 सदस्य हैं… कौन-कौन  हैं…? रोहन बड़े उत्साह से बोल उठा-“ मेरे दादा दादी,  पापा मम्मी,  मैं और मेरी छोटी बहन, बड़े पापा, बड़ी मम्मी , उनका बेटा और बेटी.  दादी कहती है हम सबके साथ भगवान भी रहते हैं वह दिखाई नहीं पड़ते लेकिन वह हमारे घर में सबसे बड़े सदस्य के रूप में हमें मार्गदर्शन करते रहते हैं . इस तरह हमारे घर में कुल 11 लोग हैं…”  सभी बच्चे हैरानी से उसे देखकर हंसने लगे . एक बच्चा बोला- “लेकिन यह भगवान और दादा-दादी इनको तो मैंने कभी देखा ही नहीं.   दूसरा बोला- “हां मैंने भी उनका नाम तो सुना है लेकिन देखा नहीं…” कक्षा के कुछ और बच्चों की भी यही  प्रतिक्रिया थी. अध्यापिका के चेहरे पर गहरे तनाव की रेखाएं स्पष्ट नजर आने लगी थी. उसने भी तो लगभग इसी उम्र के अपने बेटे को अभी तक दादा दादी से नहीं मिलाया था न उनके बारे में कुछ बताया था.

© नरेन्द्र कौर छाबड़ा

संपर्क –  सी-१२०३, वाटर्स एज, विशालनगर, पिंपले निलख, पुणे- ४११०२७ (महाराष्ट्र) मो.  9325261079 

Email-  narender.chhabda@gmail.com

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ तीन फिटनेस सर्टिफिकेट और एक अंतिम सत्य ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌷लघुकथा ☘️ तीन फिटनेस सर्टिफिकेट और एक अंतिम सत्य 🌺

आज सुबह सैर के लिए निकला तो देखा कि एक अख़बार का हॉकर रामचरितमानस की चौपाइयाँ गुनगुनाते हुए बड़ी तन्मयता से अख़बार बाँट रहा था। भोर की ताज़ी हवा में तुलसीदास की वाणी का वह मधुर स्वर कुछ ऐसा घुला कि कदम अनायास ही ठिठक गए। 

मैंने मुस्कराकर कहा, “भाई, यह तो बहुत सुंदर बात है। सुबह-सुबह प्रभु का स्मरण भी हो रहा है और पूरी लगन से अपना काम भी।”

बातों-बातों में उसने बताया कि वह कभी फ्रीस्टाइल रेसलिंग करता था। स्वस्थ रहने के लिए आज भी रोज़ सुबह अख़बार बाँटता है और दिन में अपना दूसरा काम करता है। फिर उसने मेरी ओर देखा। मेरे सफ़ेद होते बालों और उम्र का सम्मान करते हुए बोला, “सर, आप इस उम्र में भी बिल्कुल फिट हैं!”

मन ही मन मैंने उस युवक को आशीर्वाद दिया।

थोड़ा आगे बढ़ा तो पार्क के बाहर एक फिटनेस ट्रेनर मिल गया। मुझे दूर से आते देखकर बोला, “आपको देखकर ही अच्छा लग जाता है। आपने अपने आपको बहुत अच्छी तरह मेंटेन रखा है।”

अभी इस प्रशस्ति का सुख पूरी तरह आत्मसात भी नहीं कर पाया था कि पार्क के भीतर एक योग प्रशिक्षक ने भी लगभग वही बात दोहरा दी—“आप हमेशा प्रसन्न रहते हैं, और इस उम्र में भी एकदम फिट हैं।”

बस, फिर क्या था! पंद्रह मिनट के भीतर तीन-तीन फिटनेस सर्टिफिकेट मिल चुके थे। मन मयूर-सा नाच उठा। प्रसन्नचित्त, हल्के कदमों और कुछ अधिक ही सीधी कमर के साथ घर लौटा।

घर पहुँचते ही यथार्थ ने बड़ी आत्मीयता से मेरा स्वागत किया।

स्वर गूँजा—“पार्क में ठीक से वॉक क्यों नहीं करते? बार-बार झूले पर जाकर बैठ जाते हो। नियमित योग भी नहीं करते। तोंद निकलने लगी है, कंधे भी झुकने लगे हैं। थोड़ा फिटनेस पर ध्यान दो। ट्रैकिंग पर भी चलना है!”

मैंने बिना किसी प्रतिवाद के सब कुछ शांत भाव से सुना।

आख़िर बाहर की दुनिया हमें उत्साह देती है, और घर की दुनिया हमें वास्तविकता से जोड़े रखती है।

ऐसे अवसरों पर मैं स्थितप्रज्ञ हो जाना ही श्रेयस्कर समझता हूँ।☺️

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

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A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.

The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈

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हिंदी साहित्य – लघुकथा ☆ सुबह की मुस्कान😊 ☆ श्री जगत सिंह बिष्ट ☆

श्री जगत सिंह बिष्ट

(Master Teacher: Happiness & Well-Being, Laughter Yoga Master Trainer, Author, Blogger, Educator, and Speaker.)

🌱 सुबह की मुस्कान😊

आज सुबह हमारे अपार्टमेंट की लिफ़्ट के कपाट जैसे ही ग्राउंड फ्लोर पर खुले, एक मधुर स्वर कानों में घुला — “गुड मॉर्निंग!”

मैंने मुड़कर देखा। एक प्रफुल्लित दंपत्ति मुस्कुराते हुए लिफ़्ट से बाहर निकल रहे थे। मैंने भी मुस्कान के साथ उनके अभिवादन का उत्तर दिया।

न जाने क्यों, लिफ़्ट से बाहर आते ही दोनों विपरीत दिशाओं में चल पड़े—पति बाईं ओर, पत्नी दाहिनी ओर।

पति ने हँसते हुए पुकारा, “अरे, उधर नहीं… इधर!”

पत्नी ने भी मुस्कुराकर अपनी दिशा बदल ली।

मैंने हल्के से चुटकी ली, “लगता है, आजकल रास्ते भी थोड़े-थोड़े भटकने लगे हैं!”

क्षण भर में तीनों की निश्छल हँसी एक साथ फूट पड़ी। लगा, सुबह की हवा में किसी ने थोड़ी-सी खुशबू, थोड़ी-सी आत्मीयता और थोड़ी-सी हँसी घोल दी हो।🥰

© श्री जगत सिंह बिष्ट

साधक

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