हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२६) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२६)  ? ?

उच्चरित शब्द

अभिदा है,

शब्द की

सीमाएँ हैं,

संज्ञाएँ हैं,

आशंकाएँ हैं,

चुप्पी

व्यंजना है,

चुप्पी की

दृष्टि है,

सृष्टि है,

संभावनाएँ हैं!

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 10:44 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

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अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १५७ ☆ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १५७ ☆

✍ मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे 

हिस्से में  खेत  घर न ही खलिहान चाहिए

ख़िदमत को माँ पिता मेरे भगवान चाहिए

 *

रब रूठ जाए मुझसे तो परवाह कब मुझे

माँ जैसा सिर्फ़ एक निगहबान चाहिए

 *

सर जिसके सामने न  उठा उम्र भर सकूँ

ऐसे बशर का कोई न अहसान चाहिए

 *

हालात हों बुरे तो उसूलों पे ही रहूँ

क़ायम मुझे पहाड़ सा ईमान चाहिए

 *

हर रंग के गुलों से महकता जो  हर समय

दुनिया बने इक एक ऐसा ही गुलदान चाहिए

 *

मुमकिन नहीं है ज़ीस्त में दुश्वारियाँ न हों

इंसान को  हयात पै आसान चाहिए

 *

गद्दार है जो देश के माफिक न सोचते

हमको वतन परस्त ही इंसान चाहिए

 *

क्या अगले पल हो इसका भरोसा नहीं है पर

सौ वर्ष का बशर को है सामान चाहिए

 *

ग़ैरों का ग़मगुसार खुदाया मैं हो सकूँ

मालिक मेरे अरुण को ये इमकान चाहिए

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ हेमंत साहित्य # ६१ – खामोश गूँज… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – खामोश गूँज।)

☆ हेमंत साहित्य # ६१ ☆

✍ खामोश गूँज… ☆ श्री हेमंत तारे  

कोई नहीं सीखाता

खामोशियों को पढना

यां कि

उन्हें सुनना, समझना, सुलझाना |

 

खामोशियों का होता है

स्वरचित व्याकरण, गणित

और

हिज्जों का खेल,

जो आ ही जाता है

हर किसी को, देर – सबेर

जीवन पाठशाला के

मुडे – तुडे पन्नों में सिमटे पाठों से

जिन्हें बार – बार पढा जाते हैं

जाने अन्जाने में,

गुरू घंटाल बहुतेरे |

 

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६९ ☆ पर्यावरण मुक्तक ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “पर्यावरण मुक्तक“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ६९ ☆

✍ पर्यावरण मुक्तक ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

पर हाँ इनकी अपनी कोई बंदगी नहीं होती।

धूप में खड़े सरे राह सबको बाँटते हैं छाँव

इतनी बड़ी मिसाल जहान में कहीं नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

हर डाल पर कुदरत की रोशनी नहीं होती।

पक्षियों का बसेरा, राहगीरों का भी सहारा,

बिन इनके धरा पर कभी हरियाली नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

इनके मन की भाषा किसी ने यूँ सुनी होती।

पतझड़ में भी हँसी नवपल्लव की सजावटें

हार मान लेना तो इनकी रवानी नहीं होती।

*

कौन कहता है दरख्तों में ज़िंदगी नहीं होती,

इनकी कथा किसी किताब में लिखी नहीं होती।

फल फूल छाँव दे जीवन सँवारना ही किताब है

बिना इस किताब के कोई जिंदगी नहीं होती।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति(मानद)

दिनांक 28 मार्च, 2026

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कादम्बरी # १५४ – बुन्देली कविता – ”तीन दिना की धरी कढ़ी है” ☆ आचार्य भगवत दुबे ☆

आचार्य भगवत दुबे

(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆. आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे। 

आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – तीन दिना की धरी कढ़ी है।)

✍  साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १५४ ☆

☆  बुन्देली कविता – तीन दिना की धरी कढ़ी है ☆ आचार्य भगवत दुबे ✍

तीन दिना की धरी कढ़ी है ओइ खुबाउत जौन सड़ी है

सिर पे उठा लेत घर सारो रार मचाउत नाक चढ़ी है

 *

जबरइँ मो से खुआ लेत है बिना बात के काल लड़ी है

 बेंच खाइ है लाज-सरम सब बा अकड़ैलू बिना पढ़ी है

 *

ओ खें नोंइँ मान-मरजादा लाल छड़ी, मैदान खड़ी है

 माँग रई दस तोला सुन्नो हँड़िया नोंई इतै गड़ी है

बा दद्दा की धौंस बताउत ‘भगवत’ देउत रोज तड़ी है

© आचार्य भगवत दुबे

82, पी एन्ड टी कॉलोनी, जसूजा सिटी, पोस्ट गढ़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ ये वक्त नहीं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – ये वक्त नहीं…!

☆ ॥ कविता॥ ये वक्त नहीं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

ये वक्त नहीं सच बोलने का,

ढोल  की  पोल  खोलने का।

*

शहरों में  भेड़िए  घुस आए हैं,

रास्ता बचा नहीं है बचने का।

*

गिद्ध नज़रें गढ़ाए ताक में बैठे,

ठौर निरापद नहीं है रहने का।

*

सियासत  कोठे का पेशा हुई,

सबको इंतज़ार है बिकने का।

*

जिस्मों की नुमाइश हो रही है,

मेला  लगा इज़्ज़त बेचने का।

*

लोग अपने गुणगान में लगे हैं,

सब्र  नहीं दूसरे को सुनने का।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२५) ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – चुप्पियाँ – (२५  ? ?

तुम्हारा चुप

मेरे चुप से

अलग है,

मुझे लगा

वह रक्त की लालिमा

और जल की प्रवहनीयता पर

प्रश्न उठा रहा है।

?

© संजय भारद्वाज   

(2.9.2018, प्रातः 10:03 बजे)

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # २२६ – ये वसुंधरा हरी-भरी… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “ये वसुंधरा हरी-भरी…। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # २२६ ☆

☆  ये वसुंधरा हरी-भरी…  श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

ये वसुंधरा हरी-भरी, कितनी हसीन है।

यह जन्म भूमि है मेरी, पावन जमीन है।।

*

देवों की जन्म भूमि यह,शत्-शत्  करें नमन।

माँ भारती की स्तुति पर, हमको यकीन है।।

*

शुभ संस्कार सभ्यता है, यह संस्कृति महान।

राम-कृष्ण-बुद्ध की धरा, भारत कुलीन है।।

*

हिमालय हमारा रक्षक,शिव-शक्ति की कृपा।*

माँ के चरण पखारता, सागर प्रवीन है।

*

मौसम बिखेरे रँग यहाँ, नाचे मन मलंग।

उमंगें हरेक पर्व में, हर भक्त लीन है।।

*

है देश यह सपेरों का, किसी ने यह कहा।

बदला है देखिए अभी, कितना नवीन है।।

*

निर्माण का संकल्प ले, बढ़ते कदम रहे।

प्रगतिशील है हरेक पथ, उन्नत मशीन है।।

*

दुश्मन पड़ोसी में बसे, हैं हर समय लड़े।

आतंकी पाक को अभी, लड़ाता चीन है।।

*

ब्रम्होस को हमने चला, जग को दिखा दिया।

हिन्दुस्ताँ बदल चुका है, शत्रु-दहन-सीन है।।

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

23/6/26

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २९१ – सूरज नहीं दिया…२ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता –  सूरज नहीं दिया…२ ।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २१० ☆

☆ –  सूरज नहीं दिया ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ✍

मेरे बच्चो !

इस जमाने में

खुशहाली का रास्ता

बहुत तंग है.

आम आदमी के लिये बंद है,

सिफारिश के बिना योग्यता अपंग है।

यकीन करो,

मैं तुम्हारे लिये

सब सुख मुहैया करना चाहता हूँ,

एक सही आदमी की तरह जीकर

मरना चाहता हूँ।

काश!

शेष वर्षों में ऐसा हो पाए,

हर आदमी

जरूरत की चीजें पाए।

बहरहाल

मैं अपने पास

नहीं फटकने दूँगा हताशा, निराशा,

नहीं चाहिये सोने के कटोरे में दूधभात,

हड्डियों को चन्दन सा घिसकर

जुटा ही लूँगा बताशा ।

और जब

उम्मीद का बताशा चुकेगा

यानी जिन्दगी का बताशा घुलेगा

तब मेरे पौरुष का

आखिरी पृष्ठ खुलेगा,

जब सुलग रही होगी चिता

तब तुम कह सकोगे कि हमारा पिता

दूसरों के लिये भी जिया था

वो सूरज नहीं दिया था।

 

स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २८८ – “भूल चुके लोगों की स्मृति में…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत भूल चुके लोगों की स्मृति में...”।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २८८ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “भूल चुके लोगों की स्मृति में...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी 

जीवन भर कर्मठता के

पर्याय रहे पापा ।

एक अबूझा किन्तु सार्थक

न्याय रहे पापा ॥

 

किसी एक स्थिर पड़ाव

पर ठहर नहीं पाये ।

सदा खोज में लगे रहे

हम समझ नहीं पाये ।

 

उनका हर गतिशील कदम

था चौपाई जैसा –

लोगों की नजरो में पर

असहाय रहे पापा ॥

 

सुबह किसी नदिया के तट से

लगभग आर्द्र दिखें ।

जन जन के विस्तृत ललाट पर

बस सौहार्द लिखें ।

 

जीवन के व्यापार जगत के

थे सदस्य जैसे –

लोगों को सुख देने का

व्यवसाय रहे पापा ॥

 

किसी भी जगह भरी भीड़ में

पहचाने जाते ।

भूल चुके लोगों की स्मृति में

फिर फिर आते ।

 

कर्मों की मोटी किताब जो

पढ़नी है सबको –

उसी ग्रंथ के छोटे से अध्याय

रहे पापा ॥

         

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

27-06-2026

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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