(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ “जय प्रकाश के नवगीत ” के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “नहा आया हूँ गंगा में” ।)
जय प्रकाश के नवगीत # १६१ ☆
☆ नहा आया हूँ गंगा में☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रीगणेश साधना, गणेश चतुर्थी तदनुसार सोमवार 14 सितंबर को आरम्भ होकर अनंत चतुर्दशी तदनुसार शुक्रवार 25 सितम्बर तक चलेगी।
इस साधना का मंत्र होगा – ॐ गं गणपतये नमः।
साधक को इस मंत्र की कम से कम एक माला (108 जप) का संकल्प लेना होगा। इस मंत्र के मालाजप के साथ ही कम से कम एक पाठ अथर्वशीर्ष का भी करना है। जिन्हें अथर्वशीर्ष बहुत कठिन लगे, वे इसे सुनें अवश्य।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकारश्री अरुण कुमार दुबे जी,उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “तीरगी शब कीमिटाना है …“)
श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक, चंद कविताएं चंद अशआर” शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – उकताहट…।)
(वरिष्ठ साहित्यकारडॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “क्रेता…“।)
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर आचार्य भगवत दुबे जी को सादर चरण स्पर्श । वे आज भी हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते हैं। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया है।सीमित शब्दों में आपकी उपलब्धियों का उल्लेख अकल्पनीय है। आचार्य भगवत दुबे जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व की विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 ☆ हिन्दी साहित्य – आलेख – ☆ आचार्य भगवत दुबे – व्यक्तित्व और कृतित्व ☆.आप निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणा स्त्रोत हैं। हमारे विशेष अनुरोध पर आपने अपना साहित्य हमारे प्रबुद्ध पाठकों से साझा करना सहर्ष स्वीकार किया है। अब आप आचार्य जी की रचनाएँ प्रत्येक मंगलवार को आत्मसात कर सकें गे।
आज प्रस्तुत हैं बुन्देली कविता – “लरका रय हैं हुँदरा देखौ“।)
साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ कादम्बरी # १६४ ☆
☆ बुन्देली कविता – “लरका रय हैं हुँदरा देखौ“☆ आचार्य भगवत दुबे
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “सजल – बदल गया है आज जमाना”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
मनोज साहित्य # २३५ ☆
☆ छल प्रपंच की आड़ ले… ☆श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित एक कविता “हिन्दी अनुरागी”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २७८ ☆
🌻कविता🌻 हिन्दी अनुरागी🌻
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हिन्दी अनुरागी बनें, रहे हिन्द का नाम।
हिन्दी में बातें करें, भारत भूमि धाम।।
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है सुघर मधुर सुंदर बोली, बावन सखियों की हमजोली।
इत -उत डोले पल-पल बोले, हिन्दी शब्द मकरंद घोले।।
हलचल करती पवन हिलोरें, मात्रा सुंदर लगती डोरे।
इन्द्रधनुष सी आभा न्यारी, भाषा लय बाधी है प्यारी।।
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भाषा इसकी है भली, करें सदा सम्मान।
ह्दय भाव से जोड़ती, सबका रखती ध्यान।।
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ज्ञानी कहते महिमा जानो, हिन्दी को सब अपना मानों।
खूब करें जन-जन की सेवा, छंद विधा के गणपत देवा।।
कोकिल कंण करें उच्चारण, गीत संगीत की है तारण।
माँ की ममता होती लोरी, लचक- मचक चलती है गोरी।।
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भाव भरी ये पावनी, सहती हरदम पीर।
कब आयेगा पावन पल, हिन्दी होगी हीर।।
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नैन निहारे तकती राहें, भरती रहती अपनी आहें।
कलम चलाओ हिन्दी धारी, तुम अब बन जाओ गिरधारी।।
कसकस थाथें हिन्दी आशा, राष्ट्र बचायें हिन्दी भाषा।।
धर्म कर्म की सुंदर वाणी, हिन्दी है जग की कल्याणी।।
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कानों में रस घोलती, मीठी सी पहचान।
आओं गढ़ ले आज हम, गर्वित दृढ अभिमान।।
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छम-छम बाजें पांवो झांझर, सात सुरो की पहनी घाघर।।
बैलों की घंटी की छुन- छुन, मीठी हिन्दी बाजें रुनझुन।।
लिख- लिख बांचे कविवर प्यारा, बढ़ता हिन्दी भाईचारा।
निकली लेकरआँचल ममता, इसकी नजरों में है समता।।
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धूँ- धूँ जलती आग में, देख रही सब ओर।
अपने मुझको थाम ले, लाज बचाओं छोर।।
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बना देह कंचन है मोती, पावन रिश्ते यही पिरोती।
आओं कर ले मीठी बातें, खूब कटेगी अपनी रातें।।
गंगा यमुना रेवा सरिता, बनी श्रेष्ठ हिन्दी शुभ वरिता।
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…५।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # ३०१ ☆
☆ – ठंडे ये ज्वालामुखी करो…१ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
आज
आम आदमी
संत्रस्त है, परेशान है
और है बेहद दुखी,
धैर्य के धिक्कार से
सहिष्णु मन भी
आतुर है
बन जाने को ज्वालामुखी।
याद आ रहा है
एक पुराना गीत-
‘मन के हारे हार है
मन के जीते जीत! ‘
गीत, आखिर गीत होता है
खण्डहर में गूँजते गीत से
आदमी भयभीत होता है।
हम,
खण्डहर में खड़े खड़े
भयभीत होते जा रहे हैं-
हमारी नियति-
होठों से गिरकर
पत्थर पर लिखे गीत होते जा रहे हैं।
हमारे नाकनक्श भूख
तराशे हैं,
हकीकत ये है –
हम कई दिनों से उपासे हैं, प्यासे हैं,
और
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈