(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – प्रायमरी का मास्टर…३।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २९९ ☆
☆ – प्रायमरी का मास्टर…४ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
आप जानते हैं
समाज के रजिस्टर में
प्राथमिक शिक्षक
सबसे निचली श्रेणी में दर्ज है?
किसी ने कहा था-
इसमें क्या हर्ज है,
वो तो छोटे बच्चों को पढ़ाता है
इसलिये छोटी रकम पाता है,
बेवकूफ है,
क्यों चिल्लाता है।
मैं नहीं जानता कि
ऐसी बेतुकी बात कौन कहता
या कि लिखता होगा,
ये बात तय है कि
ऐसा कहने वाला
स्कूल के दिनों में
खूब पिटता होगा।
खैर !
उस कमबख्त से क्या लेना है
मुझको या आपको
चलने दें वार्तालाप को।
ये सही है कि
वो ‘ग‘ गधे का पढ़ाता है।
पर ये गलत नहीं है कि
वो गधे को आदमी बनाता है,
उसे दिल्ली, भोपाल या विदेशों में,
पहुँचाता है
कभी गौर किया है कि
वो बदले में क्या पाता है।
जी,
वो लहू के घूँट पीता है।
क्रमशः…
स्व डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापकसंपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार, मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘जहाँ दरक कर गिरा समय भी’ ( 2014) कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के...”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २९६ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆
☆ “इस कुटुम्ब के सम्बर्धन के...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
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संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना संपन्न हुई. अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
≈≈
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(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “पवित्र बंधन…”।)
(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता ‘भारत मां का ये प्रहरी…‘।)
☆ अभिव्यक्ति # १२२ ☆
☆ भारत मां का ये प्रहरी… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆
(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ संजय उवाच # ३५० ☆ चमत्कार…
कभी किसी को कहते सुनते हैं कि आज तो चमत्कार हो गया! क्या है चमत्कार होना? स्थूल रूप से विचार करें तो मनुष्य के लिए जो अकल्पनीय है, ‘लार्जर देन लाइफ’ है, वही चमत्कार है। चमत्कार की विशेषता है कि वे सुनने में आते हैं पर दिखते नहीं। यद्यपि प्रकृति इसका अपवाद है। वहाँ हर क्षण चमत्कार उद्घाटित हो रहे होते हैं, बशर्ते हम उन्हें देखना चाहें।
लौटते हैं मूल विषय पर। चमत्कार एक अलग ही प्रकार की विडंबना का शिकार है। यदि वह आँखों से प्रत्यक्ष दिख गया तो फिर उसे चाहे जो नाम दें पर चमत्कार नहीं रह पाता। चमत्कार का दर्शन ही चमत्कार का विसर्जन है। इस संदर्भ में चमत्कार अभागा है, इस संदर्भ में चमत्कार एकमेवाद्वितीय है।
वस्तुत: चमत्कार कोई वाह्य बल या एक्सटर्नल फोर्स नहीं है। अपनी विसंगतियों से जूझते मनुष्य के भीतर कुछ ऐसा कर गुज़रने की इच्छा होती है जो उसे सारी कठिनाइयों से पार कर ऊँचे, बहुत ऊँचे स्थापित कर दे। कभी विवशता के क्षणों में मनुष्य कल्पना करता है कि कुछ ऐसा हो जाए कि सारी समस्याएँ क्षण भर में अदृश्य हो जाएँ। कभी चाहता है कि परेशानियों का सामना किए बिना वे छू-मंतर हो जाएँ। प्राय: कामना करता है कि परिश्रम किए बिना ही रातों-रात उसकी आर्थिक स्थिति बेहतर हो जाए। अपनी सारी वांछनाओं को पलक झपकते ही पाने का मानसिक माध्यम होता है चमत्कार।
ब्रह्मांड में चमत्कार होते हैं या नहीं, यह हमारी चर्चा का विषय नहीं है। तथापि मनन करें तो मनुष्य का अस्तित्व अपने आप में चमत्कार उत्पन्न करने का बहुत बड़ा साधन है। दर्शन की एक धारा देह में ब्रह्मांड का दर्शन करती है। ब्रह्मांड समस्त अस्तित्व का समुच्चय है। इसमें पदार्थ एवं ऊर्जा के सभी रूप तथा उनके द्वारा निर्मित लघुत्तम से महत्तम सभी संरचनाएँ सम्मिलित हैं।
ब्रह्मांड का लघु रूप पिंड या देह है। देह का विस्तार ब्रह्मांड है। एक तरह से देह, ब्रह्मांड का मॉडल है, छोटे आकार की रेपलिका है। मन, प्राण और देह मिलकर संभावनाओं का समुच्चय बनता है।
प्राण को परिभाषित करते हुए शाखायान आरण्यक कहता है,
यो व प्राणः सा प्रज्ञा, या वा प्रज्ञा स प्राणः।
अर्थात जो प्राण है, वही प्रज्ञा है। जो प्रज्ञा है वही प्राण है।
प्रज्ञा मनुष्य में अस्तित्व फूँक देती है। व्यष्टि को समष्टि की व्यापकता प्रदान करने की प्रकृति है प्रज्ञा। प्रकृति ब्रह्मांड का एक अंग है। जैसाकि ऊपर उल्लेख किया जा चुका है, प्रकृति में निरंतर चमत्कार देखने को मिलते हैं। स्वाभाविक है कि प्रकृति के अंश मनुष्य में भी चमत्कार उद्घाटित करने की क्षमता अंतर्निहित है।
चमत्कार फलीभूत करने के लिए कार्य करना होगा। कार्य को परिभाषित करते हुए विज्ञान कहता है कि जब किसी वस्तु पर कोई बल लगाया जाता है और वस्तु उस बल की दिशा में विस्थापित होती है तो इसे बल द्वारा किया गया कार्य कहा जाता है। कार्य के लिए संकल्प, कर्मनिष्ठा और कठोर परिश्रम आवश्यक हैं।
अतः चमत्कार की प्रतीक्षा मत करो। चमत्कार के घटने का माध्यम बनो। मनुज की देह मिली है, प्रज्ञा मिली है। अपार संभावनाएँ तुम्हारे पास हैं।
जैसे रीछपति जामवंत ने हनुमान जी उनकी क्षमताओं का स्मरण कराया था, वैसे ही आवश्यकता है अपनी क्षमताओं को स्मरण करने की, उनके अनुसार अपना समुद्र पार करने की।
‘चमत्कार’ शीर्षक की अपनी एक कविता स्मरण आ रही है-
चमत्कार,
चमत्कार,
चमत्कार..!
चमत्कार के किस्से
सुने सदा,
चमत्कार घटित होते
देखा नहीं कभी,
अपनी क्षमताओं का
चमत्कार
उद्घाटित करो,
फिर चमत्कार को
अपनी आँख के आगे
घटित होते देखा करो..!।
‘स्मरण करने’ इसलिए कहा कि कोई दूसरा स्मरण नहीं कराएगा। अतः स्मरण रहे कि
जांबवंत तुम्हारे भीतर हैं, और हनुमान जी भी।
अब भी किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करने की आवश्यकता है क्या?
रात्रि 12:37 बजे, 18.08.2026 (इसी विचार के साथ नींद खुली।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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श्रावण साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी आपको शीघ्र ही दी जावेगी।
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≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – दावे हवा हुए…!
(प्रतिष्ठित साहित्यकार मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। सम्प्रति – भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त अधिकारी, शिक्षा – एम फिल (समाजशास्त्र), प्रकाशन – दो कविता संग्रह एवं तीन शेर ओ अश्आर के संग्रह प्रकाशित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – “एक अहम फ़िलासफ़ी है यह ” ।)
कविता – एक अहम फ़िलासफ़ी है यह … मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि। संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है – सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण…।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २९१ ☆
☆ सम सामयिक गीत – शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण…☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆
☆
कहती हैं उज्ज्वल भविष्य पर, शिक्षक ही उपलब्ध नहीं।
जो हैं द्रोणाचार्य, एकलव्यों सा है प्रारब्ध यहीं।।
विश्वमित्र-संदीपनी गायब, राम-कृष्ण होंगे कैसे?
शोषित-पीड़ित शिक्षक जीवन बिता रहा जैसे-तैसे।।
धृतराष्ट्रों के वंशज पैलेट साध निशाना दे मारें।
शालाएँ हैं जीर्ण-शीर्ण पर नहीं सुधारें सरकारें।।
.
गुरुकुल पूँजीपति के हाथों बेच, किया है बंटाढार।
सरकारी शालाएँ बंजर, छलें दिखा भोजन उपहार।।
हैं नियुक्ति में घपलेबाजी, ट्रांसफर में नीलामी है।
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
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संजयउवाच@डाटामेल.भारत
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☆ आपदां अपहर्तारं ☆
श्रावण साधना गुरुवार दि. 30 जुलाई से आरंभ होकर शनिवार 28 अगस्त (रक्षाबंधन) तक चलेगी
इस साधना में-
ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा।
गोस्वामी तुलसीदास रचित रुद्राष्टकम् का पाठ करेंगे।
इस बार हम आदि शंकराचार्य के निर्वाण षटकम् / वैराग्य षटकम् का भी प्रतिदिन कम से कम एक पाठ अवश्य करेंगे।
मालाजप, रुद्राष्टकम्, निर्वाण षटकम् के साथ आत्मपरिष्कार व ध्यानसाधना भी नियमित रूप से चलेंगे।
हमारा प्रयास है कि महत्वपूर्ण स्तोत्रों का अधिकाधिक प्रसार हो।
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≈ संस्थापक संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈