हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३०१ ☆ भावना के दोहे – प्यार ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – प्यार ।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३०१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – प्यार ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

☆

नेह छिपा दिल में रहा, नहीं बताया यार।

नयनों से बस देखते, बसता उरमें प्यार।।

*

देखा हमने ख्वाब तो, तुम तो मेहरबान।

फिसल गया वो हाथ से, रूठ गए अरमान।।

*

देख रहे है हम उन्हें, नहीं सँभलते आज।

प्यार नहीं उनको मिला, पिछड़ा हुआ समाज।।

*

दाग लगा है प्यार का, दामन बिल्कुल साफ।

बढ़ती फिर भी मुश्किलें, करें नहीं वो माफ।।

☆

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२८२ ☆ बुन्देली पूर्णिका – राधा कृष्ण पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपके दोहे – राधा कृष्ण पर दोहे…। आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २८२ ☆

☆ राधा कृष्ण पर दोहे… ☆ श्री संतोष नेमा ☆

☆

प्रेम दवा है रोग भी, प्रेम राधिका नाम |

मोहन राधे में रमे, राधा  मन घनश्याम ||

*

हरि जिसके हैं सारथी, उसके ही मन मीत |

हर मुश्किल में सर्वदा, होती उसकी जीत ||

*

जय राधे वृषभानुजा, कृष्ण चरण सुखधाम |

लेकर अपनी शरण में, करें सफल सब काम ||

*

जय मोहन मुरली धरा, मोहक मौलिक रूप |

मधुसूदना मनोहरा, माधव मदन अनूप ||

*

मोहन मुरली बज उठी, झुकी कदम की डाल |

राधा रम कर रास में, होतींं खूब निहाल ||

*

राधा जोगन प्रेम की, खोजे नवल किशोर |

नैन बसाये सांवरे, थामे प्रेमहिं डोर ||

*

वंशीवट की छाँव तले, सुन मुरली की तान |

राधा डूबी श्याम में, नित नित सुन नव गान ||

*

गलियाँ गोकुल की लगें, मुरलीधर का धाम |

अंत समय आता कहाँ, मुख से कृष्णा नाम ||

*

बृज की रज चंदन लगे, पावन यमुना धार |

कुंज गली अति पावनी, बृज का अनुपम प्यार ||

*

राधा प्रेम में बावरी, कृष्ण चरण अनुराग |

छलिया से जब मन लगा, बढ़ी प्रेम की आग ||

*

राधे राधे बोलिये, सुनते कृष्ण पुकार |

राधे कृष्णा नाम ही, साँचा प्रेमाधार ||

*

रंग बदलता ये जहाँ, देखा जग व्यवहार |

टूटे दिल को भा गया, कृष्णा तेरा प्यार ||

*

राधे राधे बोलिए, पावन राधा नाम |

नाम जाप से आ मिलें, मनमोहन घनश्याम ||

*

अहसासों का नाम ही, होता सच्चा प्यार |

दर्द किसी का झेल कर, दूजा सहता भार ||

*

चढ़े रंग जब प्रेम का, रंग न दूजा भाय |

इंद्रधनुष के रंग भी, फीके तब  पड़ जाय ||

*

रंग चढ़े जब प्यार का, चढ़े न दूजो रंग |

सबसे गहरा रंग यह, भीगे हर इक अंग ||

*

राधे राधे कह उठा, चरण शरण “संतोष” |

कृष्ण भक्ति देकर सदा, हरिये मेरे दोष ||

☆

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # २ – कविता – मेरा हौसला… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मेरा हौसला…‘।)

? कविता – मेरा हौसला…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

पंख मिले, हौसला मिला,

अभी उड़ान बाकी है, ,

आसमां तो छू लिया,

चांद आगोश, लेना बाकी है,

डोर विश्वास की थाम ली मैंने,

अभी अंकुश हटाना बाकी है,

पंख तो फैला ही लिए हैं,

इतिहास रचना बाकी है,

दिए की बेखौफ लहराती लौ,

तूफानों से बचाना बाकी है,

सपने तो सुहाने सज गए,

सपनों में रंग भरना बाकी है,

इस सुहाने सफर में,

तेरा हमसफ़र बनना बाकी है,

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – समय ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – समय ? ?

सारे मार्ग खुले थे,

दोनों साथ चले थे,

मैं बार-बार थमता रहा,

वह अबाध चलता रहा,

देखते-देखते ओझल हो गया,

अरे…!

समय हाथ से निकल गया!

?

© संजय भारद्वाज  

सोमवार दि. 30 .05 .2016, संध्या  7:15  बजे

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 6 नवम्बर से मार्गशीर्ष साधना आरम्भ होगी। इसका साधना मंत्र होगा – ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🕉️ 

🕉️ इसके साथ ही हम श्रीमद्भगवद्गीता का पारायण करेंगे। इसमें 700 श्लोक हैं। औसत 24 श्लोक या उनके अर्थ का यदि दैनिक रूप से पाठ करेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ एक पूर्णिका – सेवा करना अच्छा लगता है… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

(पूर्णिका’  के जनक साहित्याचार्य एडवोकेट डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’)

☆ एक पूर्णिका – सेवा करना अच्छा लगता है… ☆ डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’ ☆

☆

माँ तो आखिर माँ है उसको कैसा लगता है

साठ साल का बेटा है पर बच्चा लगता है

 *

कितना भी ऊधम करता हो, हो कितना भी उत्पाती

बाप को लेकिन अपना बेटा सच्चा लगता है।

 *

बेटी और बहिन की शादी में देते हैं धन खूब

जब सुसराल में दुख पाती तो धक्का लगता हैं

 *

गैरों का दुख देख दुखी हो जाता हूँ मैं अक्सर

क्योंकि मुझको सेवा करना अच्छा लगता है

 *

मंहगाई में अच्छा खाना न मिलने का आलम

आज जवानी में नाती भी बब्बा लगता है

 *

पापा हरदम बोला करते देव तुल्य है भैइया

लेकिन मुझको शैतानों सा चच्चा लगता है।

 *

पत्नी अच्छी मिल जाये तो जीवन का क्या कहना

‘प्रेम‘ तभी जीना भी हमको अच्छा लगता है।

☆

© डॉ. सलपनाथ यादव ‘प्रेम’

पूर्णिका जनक, साहित्याचार्य एडवोकेट

संपर्क – 2451, आदर्श भवन, अनुराग मार्ग, गांधीनगर, न्यू कंचनपुर, अधारताल, जबलपुर (म.प्र.) पिन – 482004

मो. – 9302189724, 09300128144, ई-मेल: salapnathyadav@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # २७३ ☆ बाल कविता – परियाँ कहतीं ‘वो ईश्वर है’… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’ ☆

डॉ राकेश ‘चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक लगभग तेरह दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकें ( बाल साहित्य व प्रौढ़ साहित्य ) तथा लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन।लगभग चार दर्जन साझा – संग्रह प्रकाशित तथा कई पुस्तकें प्रकाशनाधीन। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा बाल साहित्य के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य श्री सम्मान’ और उत्तर प्रदेश सरकार के हिंदी संस्थान द्वारा बाल साहित्य की दीर्घकालीन सेवाओं के लिए दिए जाने वाले सर्वोच्च सम्मान ‘बाल साहित्य भारती’ सम्मान, अमृत लाल नागर सम्मान, बाबू श्याम सुंदर दास सम्मान तथा उत्तर प्रदेश राज्य कर्मचारी संस्थान  के सर्वोच्च सम्मान सुमित्रानंदन पंत, उत्तर प्रदेश रत्न सम्मान सहित बारह दर्जन से अधिक राजकीय प्रतिष्ठित साहित्यिक एवं गैर साहित्यिक संस्थाओं से सम्मानित एवं पुरुस्कृत। 

आदरणीय डॉ राकेश चक्र जी के बारे में विस्तृत जानकारी के लिए कृपया इस लिंक पर क्लिक करें 👉 संक्षिप्त परिचय – डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी।

आप  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  उनका साहित्य प्रत्येक गुरुवार को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # २७३ ☆ 

☆ बाल कविता – परियाँ कहतीं ‘वो ईश्वर है’… ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’☆

☆

रोज हवाएँ बदला करतीं,

कभी पश्चिमी,कभी पूर्वी।

जाने इनको कौन चलाता,

कभी दक्खिनी,कभी उत्तरी।

 *

कभी बहें ये शीतल-शीतल,

कभी आग-सी बरसाती हैं।

कभी बहें ये तूफानी-सी,

कभी प्यार से सरसाती हैं।

 *

टिमटिम तारों-सी नभ में तो,

कभी पूर्ण उजियारी जैसी।

कभी बादलों के सँग मस्ती,

कहीं निपट अँधियारी जैसी।

 *

कोई तारा तेज चमकता,

कोई बिल्कुल मंदा-मंदा।

जाने क्या व्यापार हो रहा,

लगता जैसे गोरखधंधा।

 *

तारे भी दिन-रात चल रहे,

अटल दीखता बस ध्रुव तारा।

मण्डल दिखे सप्तऋषियों का,

दीख रहा गतिमय नभ सारा।

 *

कभी गरजकर बादल बरसें,

कहीं प्रलय-सी है आ जाती।

कहीं नहीं बरसे जल बिल्कुल,

धरा प्यास से ही मर जाती।

 *

कभी-कभी ये बादल राजा,

इंद्रधनुष को हैं ले आते।

रूप दिखाकर ये मनभावन,

पल दो पल में ही खो जाते।

 *

कहीं श्रृंखलाएँ गिरिवर की,

कोई ऊँची , कोई छोटी।

कहीं पठारों की मृतकाएँ,

कहीं दलदली बेहद खोटी।

 *

कहीं जंगलों की अमराई,

जिसमें पशुओं का विचरण है।

किस्म-किस्म के वन तरुओं पर,

पक्षि गणों का मृदु कलरव है।

 *

कहीं बह रहीं नदियाँ कल-कल,

कहीं मनोरम झरने प्यारे।

इन्हें देखकर प्यार उमड़ता,

प्यास बुझा सुख देते सारे।

 *

सागर कहीं महासागर हैं,

खारे जल से अटे हुए हैं।

अनगिन जीव रहा करते हैं,

मोती,माणिक छिपे हुए हैं।

 *

कहीं सुगन्धित धरा नहाए,

अन्न,फलों को रोज लुटाए।

प्राणों को नवजीवन देकर,

सप्त-सुधा रस है बरसाए।

 *

चलो! चलें परियों से पूछें,

कौन सभी का है निर्माता।

परियाँ कहतीं “वो ईश्वर है-

सबका चालक,जीवन दाता।।

☆

© डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001 उ.प्र.  मो.  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ तन्मय साहित्य # ३०२ – कविता – ☆ स्वयं से लड़ते रहे… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ साहित्यकार श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ जी द्वारा गीत-नवगीत, बाल कविता, दोहे, हाइकु, लघुकथा आदि विधाओं में सतत लेखन। प्रकाशित कृतियाँ – एक लोकभाषा निमाड़ी काव्य संग्रह 3 हिंदी गीत संग्रह, 2 बाल कविता संग्रह, 1 लघुकथा संग्रह, 1 कारगिल शहीद राजेन्द्र यादव पर खंडकाव्य, तथा 1 दोहा संग्रह सहित 9 साहित्यिक पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनार्थ पांडुलिपि – गीत व हाइकु संग्रह। विभिन्न साझा संग्रहों सहित पत्र पत्रिकाओं में रचना तथा आकाशवाणी / दूरदर्शन भोपाल से हिंदी एवं लोकभाषा निमाड़ी में प्रकाशन-प्रसारण, संवेदना (पथिकृत मानव सेवा संघ की पत्रिका का संपादन), साहित्य संपादक- रंग संस्कृति त्रैमासिक, भोपाल, 3 वर्ष पूर्व तक साहित्य संपादक- रुचिर संस्कार मासिक, जबलपुर, विशेष—  सन 2017 से महाराष्ट्र शासन के शैक्षणिक पाठ्यक्रम कक्षा 9th की  “हिंदी लोक भारती” पाठ्यपुस्तक में एक लघुकथा ” रात का चौकीदार” सम्मिलित। सम्मान : विद्या वाचस्पति सम्मान, कादम्बिनी सम्मान, कादम्बरी सम्मान, निमाड़ी लोक साहित्य सम्मान एवं लघुकथा यश अर्चन, दोहा रत्न अलंकरण, प्रज्ञा रत्न सम्मान, पद्य कृति पवैया सम्मान, साहित्य भूषण सहित अर्ध शताधिक सम्मान। संप्रति : भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स प्रतिष्ठान भोपाल के नगर प्रशासन विभाग से जनवरी 2010 में सेवा निवृत्ति। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता “स्वयं से लड़ते रहे…” ।)

☆ तन्मय साहित्य  # ३०२ ☆

☆ स्वयं से लड़ते रहे… ☆ श्री सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’ ☆

☆

जिंदगी भर,  हम रहे लड़ते स्वयम से

पर हुए ना मुक्त, अब तक भी अहम से।

*

यज्ञ जप तप दान धर्म सुकृत्य कितने

कभी मन से तो कभी अनमने मन से

जुड़ी इनके साथ तृष्णाएँ  कईं थी

श्रेष्ठ होने के सतत चलते जतन थे,

पठन पाठन भी चले आगम निगम के

पर हुए ना मुक्त, अब तक भी अहम से।

*

जटिल होती ही गई,   श्रम साधनाएँ

खो गई कमनीय,  मन की सरलताएँ

हो तिराहे पर खड़े,  अब दिग्भ्रमित से

सूझती राहें नहीं,   किस ओर जाएँ,

समझ आया आज,  बचना था चरम से

पर हुए ना मुक्त,  अब तक भी अहम से।

*

सहज रहते, संग खुशियाँ खिलखिलाती

दर्प,  संशय,  भय,  पराजय से बचाती

 खोजते यदि,  समन्वय कर श्वांस से तो

सुगमता से,   जिंदगी  फिर मुस्कुराती

वहम से हो मुक्त,  मिल जाते परम् से

पर हुए ना मुक्त, अब तक भी अहम से।

☆ 

© सुरेश कुशवाहा ‘तन्मय’

जबलपुर/भोपाल, मध्यप्रदेश, अलीगढ उत्तरप्रदेश  

मो. 9893266014

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ जय प्रकाश के नवगीत # १२३ ☆ भोर का संदेश ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

(संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं अग्रज साहित्यकार श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव जी  के गीत, नवगीत एवं अनुगीत अपनी मौलिकता के लिए सुप्रसिद्ध हैं। आप प्रत्येक बुधवार को साप्ताहिक स्तम्भ  “जय  प्रकाश के नवगीत ”  के अंतर्गत नवगीत आत्मसात कर सकते हैं।  आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण एवं विचारणीय नवगीत “भोर का संदेश” ।)       

✍ जय प्रकाश के नवगीत # १२३ ☆ भोर का संदेश ☆ श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव ☆

☆

एक जलती अँगीठी सा

सूर्य धरकर भेष

ले खड़ा पूरब दिशा में

भोर का संदेश ।

 

कुनकुनी सी धूप

पत्ते पेड़ के उजले

जागकर पंछी

दाना खोजने निकले

नदी धोकर मुँह खड़ी

तट पर बिखेरे केश।

 

पर्वतों के बीच

घाटी धुंध में लिपटी

रात चुपके से

कोने में जा सिमटी

सितारे लौटे घरों को

चाँद अपने देश ।

 

मंदिरों की ध्वजा

फूँके शंख पुरवाई

पाँखुरी पर फूल की

इक बूँद अलसाई

लिख रही दिन के लिए है

नियति के आदेश ।

***

© श्री जय प्रकाश श्रीवास्तव

सम्पर्क : आई.सी. 5, सैनिक सोसायटी शक्ति नगर, जबलपुर, (म.प्र.)

मो.07869193927,

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ ग़ज़ल # १२७ ☆ मीर ग़ालिब अभी भी जिंदा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे ☆

श्री अरुण कुमार दुबे

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री अरुण कुमार दुबे जी, उप पुलिस अधीक्षक पद से मध्य प्रदेश पुलिस विभाग से सेवा निवृत्त हुए हैं । संक्षिप्त परिचय ->> शिक्षा – एम. एस .सी. प्राणी शास्त्र। साहित्य – काव्य विधा गीत, ग़ज़ल, छंद लेखन में विशेष अभिरुचि। आज प्रस्तुत है, आपकी एक भाव प्रवण रचना “मीर ग़ालिब अभी भी जिंदा है…“)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ कविता # १२७ ☆

✍ मीर ग़ालिब अभी भी जिंदा है… ☆ श्री अरुण कुमार दुबे  ☆

☆

आदमी की वो जात का ही नहीं

कह रहा है जो अब ख़ुदा ही नहीं

 *

हक़ है मजदूर को भी जीने का

मील मालिक ये सोचता ही नहीं

 *

घोल के ये नहीं पिला सकते

जब हुनर तुमको सीखना ही नहीं

 *

सुनके अफवाह हो गया दंगा

वाकया शहर में हुआ ही नहीं

 *

मीर ग़ालिब अभी भी जिंदा है

 शेर इनका कोई मरा ही नहीं

 *

जो है सरपंच आज दुनिया का

अम्न दुनिया में चाहता ही नहीं

 *

माँ के पाँवों से होके है रस्ता

और जन्नत का रास्ता ही नहीं

 *

वो अरुण कुछ न ब्रज में पायेगा

प्रेम रस में जो भीगता ही नहीं

☆

© श्री अरुण कुमार दुबे

सम्पर्क : 5, सिविल लाइन्स सागर मध्य प्रदेश

सिरThanks मोबाइल : 9425172009 Email : arunkdubeynidhi@gmail. com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कविता # ३४ – अस्तित्व… ☆ श्री हेमंत तारे ☆

श्री हेमंत तारे 

श्री हेमन्त तारे जी भारतीय स्टेट बैंक से वर्ष 2014 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्ति उपरान्त अपने उर्दू भाषा से प्रेम को जी रहे हैं। विगत 10 वर्षों से उर्दू अदब की ख़िदमत आपका प्रिय शग़ल है। यदा- कदा हिन्दी भाषा की अतुकांत कविता के माध्यम से भी अपनी संवेदनाएँ व्यक्त किया करते हैं। “जो सीखा अब तक,  चंद कविताएं चंद अशआर”  शीर्षक से आपका एक काव्य संग्रह प्रकाशित हो चुका है। आज प्रस्तुत है आपकी एक कविता – अस्तित्व…।)

✍ अस्तित्व… ☆ श्री हेमंत तारे  ☆

☆

सतत अनदेखी

भी

नकार नही सकती

अस्तित्व

अनन्त काल तक

किसी दमदार बीज का ।

 

देर- सबेर

करवा ही देता है बीज

एहसास

अपने होने का

पैदा होकर चट्टान के गर्भ से ।

 

और

उसी दिन

कुछ नरम पड़ जाती है चट्टान

जननी बनकर ।

☆

© श्री हेमंत तारे

मो.  8989792935

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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