हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆

श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता चुप रहने की सजा पाई है…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५३ ☆

☆ # “चुप रहने की सजा पाई है…” # ☆

हमने चुप रहने की सजा पाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

 

जब भी चाहा कि कुछ बोलें

जब भी चाहा कि मुंह खोलें

देखकर हवाओं का मंजर

चूभो  रही है जैसे खंजर

भावनाएं हो गई है बंजर

कशमकश है अंदर ही अंदर

जिव्हा में ताला लग गया है

मन में अंजाना सा डर जग गया है

आंखों के आगे धुंध छाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई है

 

चिड़ियों ने चहचहाना छोड़ दिया

कलियों ने भंवरों का दिल तोड़ दिया

फूल भी बेरंग हो गए अब

बगीचे बेढ़ंग हो गए अब

पतझड़ श्रृंगार को लुट गया

बहार का मौसम रूठ गया

चमन पर वीरानी छाई है

यह कैसी रुत आई है

हर तरफ बस तबाही तबाही है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई

हमने चुप रहने की सजा पाई है

 

भूख और प्यास की कहानी है

बड़ी बेरहम यह जिंदगानी है

भरी जवानी में हाथ कट गए

बेरोजगारी से हम पट गए

आंखों में बहता हुआ पानी है

डिग्रीयां  अब तो बस बेमानी है

उम्मीदें ना उम्मीदगी में ढल गई

इच्छाएं आकांक्षाएं देखते देखते जल गई

जिंदगी किस मुकाम पर लाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई हैं

 

क्या समय के साथ व्यवस्था बदलेगी ?

क्या कटरता की बर्फ पिघलेगी ?

हमारा दुख दर्द कोई समझ पाएगा ?

हमारे लिए कोई आवाज उठाएगा ?

क्या वाटिका में रंग-बिरंगे फूल खिलेंगे ?

लोक कटुता भूलकर एक दूसरे के गले मिलेंगे ?

क्या  नई किरण खुशियों का संदेश लाएगी ?

क्या चुप्पी तोड़ जिव्हा कुछ कह पाएगी ?

नई सुबह ने हर दिल में उम्मीद की ज्योत जलाई है

हमने हर कदम पर ठोकर खाई है

हमने चुप रहने की सजा पाई /

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अभिव्यक्ति # -९६ – सागर की लहरें… ☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

श्री राजेन्द्र तिवारी

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी जबलपुर से श्री राजेंद्र तिवारी जी का स्वागत। इंडियन एयरफोर्स में अपनी सेवाएं देने के पश्चात मध्य प्रदेश पुलिस में विभिन्न स्थानों पर थाना प्रभारी के पद पर रहते हुए समाज कल्याण तथा देशभक्ति जनसेवा के कार्य को चरितार्थ किया। कादम्बरी साहित्य सम्मान सहित कई विशेष सम्मान एवं विभिन्न संस्थाओं द्वारा सम्मानित, आकाशवाणी और दूरदर्शन द्वारा वार्ताएं प्रसारित। हॉकी में स्पेन के विरुद्ध भारत का प्रतिनिधित्व तथा कई सम्मानित टूर्नामेंट में भाग लिया। सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र में भी लगातार सक्रिय रहा। हम आपकी रचनाएँ समय समय पर अपने पाठकों के साथ साझा करते रहेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता सागर की लहरें।)

☆ अभिव्यक्ति # ९६ ☆ सागर की लहरें☆ श्री राजेन्द्र तिवारी ☆

सागर की लहरें, लहर लहर,

कुछ उठती हैं, लहराती हैं,

कुछ धीरे से ही उठती हैं

कुछ जोर लगाकर उठती हैं,

उठती हैं, फिर गिर जाती हैं,

उठती अन्तस गहराई से,

उठती हैं, वो चतुराई से,

वो लहरों से कतराती हैं,

फिर लहरों पर गिर जाती हैं,

इनको देखो तो गिनना तुम,

कभी इनकी बातें, सुनना तुम,

बस शोर नहीं है इनका वो,

अंतर्द्वंद को सुनना तुम,

भागी आती हैं, किनारे पर,

तट पे सिमटती जाती हैं,

क्या कहा, कभी, कुछ तट ने था

कदमों में सर को पटकती हैं,

क्या कहा था तट ने न जाने,

लहरें बेचैन हुई क्यों हैं,

क्या रिश्ता है, तट से इनका,

क्यों सर को अब भी पटकती हैं,

© श्री राजेन्द्र तिवारी  

संपर्क – 70, रामेश्वरम कॉलोनी, विजय नगर, जबलपुर

मो  9425391435

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २६८ – ग़ज़लिका – किस्से ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – किस्से)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २६८ ☆

☆ ग़ज़लिका – किस्से ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

दग़ा कहानी, वफ़ा फ़साना, सनम हमारे यही हैं किस्से।

तुम्हें छिपाना, मुझे दिखाना, हुए दर-ब-दर, सही हैं किस्से।।

*

न किस्सागोई, नई खोज है, यही विरासत हमें मिली है।

कहे ना कहे, कहे जा रहे, न जाने कितने, बने हैं किस्से।।

*

डगर डगर पर, शहर शहर में, गढ़े-बढ़े जा रहे दिनों-दिन

मिला मसाले, भरे रिसाले, हुए चटपटे, कई हैं किस्से।।

*

सियासती ही सियासती हैं, बयान इनके, बयान उनके।

न संसदों में, विधायिका में, जम्हूरियत के रहे हैं किस्से।।

*

चुरा रहे हैं, निगाह खुद से, लुका-छिपी का मजा ले रहे।

कहीं हसीं हैं, कहीं जवां हैं, ठठा रहे सब सुना के किस्से।।

*

कहे आइए, नहीं जाइए, दिखा जिहादी लवों को ठेंगा।

खड़े हों पैरों पे आप अपने, बनें हमसफर तभी न किस्से।।

*

नहीं रहूँ मैं, नहीं रहो तुम, मगर सुनाएगा वक्त तब भी।

यहीं पले थे, फ़ना हुए जो, ‘सलिलमियाँ के अनाम किस्से।।

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१९.११.२०२५

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अपने भी पेश आते हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – अपने भी पेश आते हैं…!

☆ ॥ कविता॥ अपने भी पेश आते हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

 

आजकल  अपने भी पेश आते हैं परायों की तरह,

आदमी हरदम मुखौटे बदल रहा सरायों की तरह।

*

वादों  की  जमीन  पर  काँटे बबूल के उग आए हैं,

रहनुमा  अवाम  को हाँक रहे हैं चौपायों की तरह।

*

कच्चे  धागों  की  मानिंद  रेशमी  रिश्ते  टूट रहे हैं,

माएँ  बच्चों को दूध पीला रही नाजायों  की तरह।

*

कोई  कितना  भी बचना चाहे, किंतु  बच ना पाए,

क़ातिल  हवाएँ पीछा कर रही हमसायों की तरह।

*

कब, कौन, किस बात पर  दुश्मनी पर उतर आए,

बेगुनाह  ज़िंदगी  को जिए जा रहे विषपायों तरह।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – औरत कभी बूढ़ी नहीं होती ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)

? संजय दृष्टि – औरत कभी बूढ़ी नहीं होती ? ?

छुटपन से

पानी पकड़ाना,

चाय बनाना,

खाना पकाना,

खाना खिलाना,

बरतना माँजना,

चूल्हा-चौका

साफ-सफाई

झाड़ू-पोछा

कपड़े धुलाई,

सुबह आँख खुलने से

रात आँख लगने तक,

उम्र के हर मोड़ पर

अविराम और हमेशा

खटती रहती है औरत..,

 

खेल-पढ़ाई

मस्ती-हाथापाई

नौकरी-कमाई

लड़कपन

पुरुष में बदलता है

दाम्पत्य से

बुढ़ापे तक

यात्रा करता है,

निरंतर अविराम

थकता और थकता है..,

 

साठ के बाद

पुरुष के भीतर का

बचपना लौटता है

पर बचपन से

समझदार हुई

औरत का दिन-रात

जस का तस

बना रहता है..,

 

पति के काँधे

जाए न जाए

ढलती उम्र के बावज़ूद

उसी ढर्रे पर चलता रहता है..,

 

रिटायर होता है पुरुष

औरत रिटायर नहीं होती

बूढ़ा होता जाता है पुरुष

औरत कभी बूढ़ी नहीं होती..!

?

© संजय भारद्वाज  

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर संपादक– हम लोग पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ 21 दिवसीय आशुतोष साधना रविवार दि. 8 फरवरी से शनिवार 28 फरवरी तक चलेगी 🕉️

💥 इस साधना में ॐ नमः शिवाय का मालाजप होगा। साथ ही शिव पंचाक्षर स्तोत्र का पाठ भी करेंगे 💥

॥ श्रीशिवपञ्चाक्षरस्तोत्रम् ॥

नागेन्द्रहाराय त्रिलोचनाय,
भस्माङ्गरागाय महेश्वराय ।
नित्याय शुद्धाय दिगम्बराय,
तस्मै न काराय नमः शिवाय ॥१॥

मन्दाकिनी सलिलचन्दन चर्चिताय,
नन्दीश्वर प्रमथनाथ महेश्वराय ।
मन्दारपुष्प बहुपुष्प सुपूजिताय,
तस्मै म काराय नमः शिवाय ॥२॥

शिवाय गौरीवदनाब्जवृन्द,
सूर्याय दक्षाध्वरनाशकाय ।
श्रीनीलकण्ठाय वृषध्वजाय,
तस्मै शि काराय नमः शिवाय ॥३॥

वसिष्ठकुम्भोद्भवगौतमार्य,
मुनीन्द्रदेवार्चितशेखराय।
चन्द्रार्क वैश्वानरलोचनाय,
तस्मै व काराय नमः शिवाय ॥४॥

यक्षस्वरूपाय जटाधराय,
पिनाकहस्ताय सनातनाय ।
दिव्याय देवाय दिगम्बराय,
तस्मै य काराय नमः शिवाय ॥५॥

पञ्चाक्षरमिदं पुण्यं यः पठेच्छिवसन्निधौ ।
शिवलोकमवाप्नोति शिवेन सह मोदते ॥

💥 मालाजप शिव पंचाक्षर स्तोत्र के साथ आत्मपरिष्कार एवं मौन-साधना भी नियमित रूप से चलेंगे 💥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८२ – नवगीत – श्याम पधारो… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीतश्याम पधारो

? रचना संसार # ८२ – गीत – श्याम पधारो…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

रक्षक बनकर श्याम पधारो,

ले लो  फिर अवतार।

पावन भारत की धरती पर,

अब जन्मो करतार।।

*

घोर निराशा मन में छाई,

मानव है कमजोर।

काम क्रोध मद मोह हृदय में,

थामो जीवन डोर।।

शरण तुम्हारी कान्हा आए,

तिमिर बढ़ा घनघोर।

अब भी चीर दुशासन हरते,

दुष्टों का है जोर।।

सतपथ में बाधक बनते हैं,

बढ़ते अत्याचार।

*

गीता का भी पाठ पढ़ा दो,

व्याकुल होते लाल।

नैतिकता की दे दो शिक्षा,

बन कर सबकी ढाल।।

आनंदित इस जग को कर दो,

चमकें सबके भाल।

धर्म सनातन हो आभूषण,

बदले टेढ़ी चाल।।

राग छोड़कर पश्चिम का हम,

रखें पूर्व संस्कार।

*

त्याग समर्पण पाथ चलें नित,

हमको दो वरदान।

शील सादगी को अपनाकर ,

नित्य करें उत्थान।

सत्य निष्ठ गंम्भीर बनें हम,

दे दो जीवन दान।

जीवन सार्थक कर लें अपना,

कृपा करो भगवान।।

मर्यादा के रक्षक प्रभु तुम,

जग के पालनहार।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९२ ☆ द्वार हृदय के अब तो खोलो… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय रचना द्वार हृदय के अब तो खोलो आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९२ ☆

द्वार हृदय के अब तो खोलो☆ श्री संतोष नेमा ☆

द्वार  हृदय  के  अब  तो  खोलो |

मीठे  स्वर   में   भी नित बोलो ||

रहे   न   बोली   में   कड़वाहट |

मन  में  मिश्री-सा   रस  घोलो ||

द्वार  हृदय  के  अब  तो खोलो।

*

घृणा-द्वेष   से   करो   किनारा।

हो   व्यवहार   सदा  ही  प्यारा।

लेकिन   धर्म – तराजू   में   तुम, |

मानवता  को   कभी   न  तोलो ||

द्वार  हृदय  के  अब  तो  खोलो ||

*

काम   करो   अच्छाई  के   तुम।

साथ   रहो   सच्चाई   के।  तुम।

छल -फरेब का छोड़  अनुशरण,

साथ  धर्म  के  अब  तो  हो  लो |

द्वार  हृदय  के  अब  तो  खोलो ||

*

हिन्दू-मुस्लिम   सिक्ख    इसाई।

सभी   एक  क्यों   बात  भुलाई।

रंग   खून   का   एक  सभी   का ,

भूलो    मत    समता    बड़बोलो ।

द्वार  हृदय  के  अब  तो   खोलो ||

*

समरसता   की   बात  करो   तुम |

नहीं  किसी  से   घात   करो  तुम ||

मिलता    है   संतोष   तभी   जब,

सिद्धांतों    से    कभी   न   डोलो |

द्वार   हृदय  के   अब   तो   खोलो

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “बावरे मन” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆

डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “बावरे मन” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

बावरे मन! करता फिरे तू मेरा-मेरा,

साथ न आए कोई भी, जब छूटेगा बसेरा।

*

माया के इस मेले में, तू खोया अनजान,

पल भर की है ये दुनिया, झूठा इसका मान।

तन-धन पर अभिमान करे, समझे इसे अपना,

साँस थमेगी एक दिन, टूटेगा हर सपना।

*

जिसे तू अपना कहता, वो अपने में मगन,

दुख की आँधी आए जब, रह जाएगा अकेला मन।

नाम-सुमिरन कर ले अब, यही सच्चा सहारा,

प्रभु बिन कोई नहीं है, जग सारा ही बेगाना।

*

संतों ने समझाया तुझको, जग है सपना-सा,

जो दिखता है आँखों को, वो है बस छलावा।

छोड़ दे ‘मेरा-तेरा’, कर दे मन को सादा,

तेरे भीतर ही बसता है, वो परम-पिता सारा।

*

बावरे मन! अब समझ ले, यही है सच्ची राह,

प्रभु चरणों में मिट जाए, जीवन की हर चाह।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर

जयपुर, राजस्थान

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३११ ☆ भावना के दोहे – ऋतु बसंत ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – ऋतु बसंत)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३११ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – ऋतु बसंत ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

कलियाँ गाती गीत है, पहने नित परिधान।

भंवरे गुंजन कर रहे, बनते वह नादान।।

 *

ऋतु बसंत की आ गई, करें वृक्ष शृंगार।

लता झूमती पेड़ पर, करे प्रेम इजहार।।

 *

 प्रेम प्यार के गीत का, पल्लव गाते गान।

लता झूमती प्यार में, वृक्षों पर मुस्कान।।

 *

आया फागुन झूम के, लिखें फाग के गीत।

हुई विदाई शीत की, ओ प्यारे मनमीत।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १३ – कविता – स्वागतम्… नई पीढ़ी का… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘स्वागतम्… नई पीढ़ी का।)

☆ शशि साहित्य # १३ ☆

? कविता – स्वागतम्… नई पीढ़ी का… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हर नजर ठहर रही तुम्हारी तरफ..

हर सपना अब साकार हो जाएगा..

विश्वास आर्यावर्त के संस्कारों पर,

यह व्यर्थ जाया नहीं हो पाएगा..

धरोहर हो, विलक्षण संस्कृति की,

तो हर दिन सुनहरा हो जाएगा..

जब अंधेरा अवरोध पैदा करे,

सूरज को, साथ लेकर चला जाएगा..

स्वर्ण रश्मियां बिखरेगी राह में,

रास्ता और भी आसान हो जाएगा..

सब की दुआ और हिम्मत तुम्हारी मिले..

दुनिया के हर दिल पर राज हो जाएगा..

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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