हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ संजय उवाच # ३२० – सोना और सोना ☆ श्री संजय भारद्वाज ☆

श्री संजय भारद्वाज

(“साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के  लेखक  श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है। साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ  हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से आपको  पाठकों का  आशातीत  प्रतिसाद मिला है।”

हम  प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है  इस शृंखला की अगली कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों  के माध्यम से  हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)

☆  संजय उवाच # ३२० सोना और सोना… ?

‘समय बलवान, समय का करो सम्मान’, बचपन में इस तरह की अनेक कहावतें सुनते थे। बाल मन कच्ची मिट्टी होता है, जल्दी ग्रहण करता है। जो ग्रहण करता है, वही अंकुरित होता है। जीवनमूल्यों के बीज, जीवनमूल्यों के वृक्ष खड़े करते हैं।

अब अनेक बार  किशोरों और युवाओं को मोबाइल पर बात करते सुनते हैं,- क्या चल रहा है?… कुछ खास नहीं, बस टीपी।.. टीपी अर्थात टाइमपास। आश्चर्य तो तब होता है जब अनेक पत्र-पत्रिकाओं के नाम भी टाइमपास, फुल टाइमपास, ऑनली टाइमपास, हँड्रेड परसेंट टाइमपास देखते-सुनते हैं। वैचारिक दिशा और दशा के संदर्भ में ये शीर्षक बहुत कुछ कह देते हैं।

वस्तुतः व्यक्ति अपनी दिशा और दशा का निर्धारक स्वयं ही होता है। गोस्वामी जी ने लिखा है- “बड़े भाग मानुष तन पावा। सुर दुर्लभ सब ग्रंथन्हि गावा।।” मनुष्य तन पाना सौभाग्य की बात है। देवताओं के लिए भी यह मनुष्य योनि पाना दुर्लभ है। वस्तुत: ईश्वर से साक्षात्कार की सारी संभावनाएँ इसी योनि में हैं। ध्यान देने योग्य बात है कि यह योनि नश्वर है।

योनि नश्वर है, अर्थात कुछ समय के लिए ही मिली है। यह समय भी अनिश्चित है। किसका समय कब पूरा होगा, यह केवल समय ही जानता है। ऐसे में क्षण-क्षण का अपितु क्षणांश का भी जीवन में बहुत महत्व है। जिसने समय का मान किया, उसने जीवन का सदुपयोग किया। जिसने समय का भान नहीं रखा, उसे जीवन ने कहीं का नहीं रखा। अपनी कविता ‘क्षण-क्षण’ का स्मरण हो आता है। कविता कहती है,  “मेरे इर्द-गिर्द / बिखरे पड़े हज़ारों क्षण / हर क्षण खिलते/ हर क्षण बुढ़ाते क्षण/ मैं उठा/ हर क्षण को तह कर / करीने से समेटने लगा / कई जोड़ी आँखों में / प्रश्न भी उतरने लगा / क्षण समेटने का / दुस्साहस कर रहा हूँ /मैं यह क्या कर रहा हूँ?..अजेय भाव से मुस्कराता / मैं निशब्द / कुछ कह न सका/ समय साक्षी है / परास्त वही हुआ जो/ अपने समय को सहेज न सका।”

एक प्रसंग के माध्यम से इसे बेहतर समझने का प्रयास करते हैं। साधु महाराज के गुरुकुल में एक अत्यंत आलसी विद्यार्थी था। हमेशा टीपी में लगा रहता। गुरुजी ने उसका आलस्य दूर करने के अनेक प्रयास किए पर सब व्यर्थ। एक दिन गुरुजी ने एक पत्थर उसके हाथ में देकर कहा,” वत्स मैं तुझ से बहुत प्रसन्न हूँ। यह पारस पत्थर है। इसके द्वारा लोहे से सोना बनाया जा सकता है। मैं दो दिन के लिए आश्रम से बाहर जा रहा हूँ। दो दिन में चाहे उतना सोना बना लेना। कल सूर्यास्त के समय लौट कर पारस वापस ले लूँगा।” गुरु जी चले गए। आलसी चेले ने सोचा, दो दिन का समय है। गुरु जी नहीं हैं, सो आज का दिन तो सो लेते हैं, कल बाजार से लोहा ले आएँगे और उसके बाद चाहिए उतना सोना बना कर लेंगे। पहले दिन तो सोने पर उसका उसका सोना भारी पड़ा। अगले दिन सुबह नाश्ते, दोपहर का भोजन, बाजार जाने का लक्ष्य इस सबके नाम पर टीपी करते सूर्यास्त हो गया। हाथ में आया सोना, सोने के चलते खोना पड़ा।

स्मरण रहे, यह पारस कुछ समय के लिए हरेक को मिलता है। उस समय सोना और सोना में से अपना विकल्प भी हरेक को चुनना पड़ता है। इति।

© संजय भारद्वाज 

अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆ 

मोबाइल– 9890122603

संजयउवाच@डाटामेल.भारत

writersanjay@gmail.com

☆ आपदां अपहर्तारं ☆

🕉️ सरस्वती साधना बुधवार 14 जनवरी से शुक्रवार 23 जनवरी तक चलेगी 🕉️

💥इसका साधना मंत्र होगा – ॐ ऐं सरस्वत्यै ऐं नम: 💥

💥 मालाजप, सूर्य नमस्कार आवर्तन, आत्मपरिष्कार मूल्यांकन एवं मौन साधना के साथ सरस्वती वंदना जारी रखें 💥

💥सरस्वती वंदना💥

 या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता।

या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना।

या ब्रह्माच्युतशङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता।

सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा॥

अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप  करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं। 

≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “तो” आणि आपण! ☆ श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

श्री प्रमोद वामन वर्तक  

? कवितेचा उत्सव ?

☆ 🙏 “तो” आणि आपण! 🙏 श्री प्रमोद वामन वर्तक ☆

नाही त्यास वावडे

सोनेरी देव्हाऱ्याचे,

“तो” जाणतो खरे रंग

हृदयातील भक्तीचे!

 “तो” भाव भावाचा

 सदा असे भुकेला,

 भुलेल का “तो” अशा

 बेगडी देखाव्याला?

साध्या नमस्काराची

“तो” धरीतसे आस,

असे साऱ्या चराचरी

त्याचाच बघा वास!

 “तो” दिसतो सर्वांना

 वेगवेगळ्या रुपात,

 पण समजावया हवा

 भाव आपल्या मनांत!

सदा राहून सजग

वावरा या जगती,

पडेल अवचित गाठ

कळेल त्याची महती!

कळेल त्याची महती!

© प्रमोद वामन वर्तक

संपर्क – दोस्ती इम्पिरिया, ग्रेशिया A 702, मानपाडा, ठाणे (प.) 400610 

मो – 9892561086 ई-मेल – pradnyavartak3@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – चित्रकाव्य ☆ फूल म्हणू की भूल मना… ☆ सुश्री नीलांबरी शिर्के ☆

सुश्री नीलांबरी शिर्के

?️?  चित्रकाव्य  ?️?

? फूल म्हणू की भूल मना… ?  सुश्री नीलांबरी शिर्के 

फूल म्हणू की भूल मना

दर्शने काही सुचेचना!

सूर्यकिरणी सौंदर्य नाहते

पाहते मी पुन्हा पुन्हा!

*
सौंदर्याला कणखर वेढा

नजाकतीने पडे भोवती!

सहजपणाने खडू नये

म्हणत असावी नियती!

© सुश्री नीलांबरी शिर्के

मो 8149144177

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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सूचना/Information ☆ संपादकीय निवेदन ☆  कविता – ती चार दैवी मुले – सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे – अभिनंदन ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

‘सूचना/Information 

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

💐 संपादकीय निवेदन 💐

💐 ✒️ अभिनंदन! अभिनंदन! अभिनंदन! ✒️ 💐

तितिक्षा इंटरनॅशनल, पुणे यांनी आयोजित केलेल्या दशकपुर्ती सोहळा काव्यलेखन स्पर्धेत आपल्या समुहातील ज्येष्ठ साहित्यिका श्रीमती उज्ज्वला सहस्रबुद्धे यांना त्यांच्या ‘तितिक्षा’ या रचनेसाठी सर्वोत्कृष्ट काव्य पुरस्कार मिळाला आहे.

ई अभिव्यक्ती मराठी परिवारातर्फे त्यांचे मन: पूर्वक अभिनंदन आणि पुढील लेखनासाठी शुभेच्छा 💐 💐

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– आजच्या अंकात वाचूया त्यांचे एक पुरस्कार प्राप्त कविता – “ती चार दैवी मुले…”

– संपादक मंडळ

ई – अभिव्यक्ती, मराठी विभाग

पुरस्कार प्राप्त कविता

विषय – तितिक्षा 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ ती चार दैवी मुले ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

बालपणी हरवली,

छाया माथ्यावरची!

पोरकी झाली चौघे,

वाट धरी पैठणची!… १

*

ब्रम्ह वृंदास सामोरे,

प्रश्न केले अवघड!

शुध्दिपत्र मिळण्यास,

खूप केली धडपड!… २

*

ज्ञाना देई गुरूपद,

निवृत्तीस ते श्रध्देने!

चालले सोपान, मुक्ता,

मागुती त्यांच्या मायेने!.. ३

*

तितिक्षा सर्वास होती,

घेण्यास ज्ञान सखोल!

वृत्ती सर्वांच्याच होत्या,

तितिक्षेत समतोल!… ४

*

आकलन झाले सर्वां,

ही आहेत दैवी बाळे!

यांच्या अथांग ज्ञानात,

श्रीकृष्ण अंतरी खेळे!.. ५

*

जाणली त्यांची तितिक्षा,

योगेश्वराने अंतरी!

ज्ञानेश्वरी ही जन्मली,

या नेवाश्यात भूवरी!.. ६

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ अडखळलेली पावलं… ☆ श्री नितीन सुभाष चंदनशिवे ☆

श्री नितीन सुभाष चंदनशिवे

? मनमंजुषेतून ?

☆ अडखळलेली पावलं… ☆ श्री नितीन सुभाष चंदनशिवे 

रुसून माहेरी आलेल्या ताईला सांगत होती आजी असेच काही समजावून…

“पिठात पाणी घातल्याबिगर भाकरी थापता येत न्हाई पोरी,

जगाची रीतच अशी ही सासुरवास कुणाला चुकलाय का?

कसा संसार उभा जन्म केला आमचं आम्हाला ठावं. “

 

मग आठवलं मला बालपण,

ताईने अंगणात आखलेली ती रिंगणं…

दगडाची चीप रिंगणात टाकून लंगडी खेळत म्हणायची,

“माझ्या नादाला कुणी जर लागलं तर,

एका फटक्यात आडवी करीन… “

तेव्हा आई म्हणायची

” उद्या लगीन झाल्यावर कळल तुला.

सासू एका दणक्यात सरळ करील. “

 

नाक फुगवत ताई म्हणायची

“अगं सासू असू दे न्हायतर नवरा.

मी करीन त्याचा भवरा.. “

 

आम्ही सगळे खळखळून हसायचो…

आणि ताई वाघिणीसारखी चालत म्हणायची,

“नाद करायचा न्हाय माझा चल हो बाजूला. “

आणि राजकुमारी असल्यागत ऐटीत झोक्यावर जाऊन बसायची.

 

आत्ता हीच वाघीण शेळी होऊन बसली होती

आज्जी सांगत होती.. आणि ताई फक्त मान डोलवत होती.

व्यवस्थेच्या पिंजऱ्यात ठेवलेली कोंबडीच ना शेवटी ती…

फरक इतकाच… मरेपर्यंत धगीवर शिजत राहते बस इतकंच…

 

जरा काय झालं, कुणी काय बोललं की,

रुसून लगेच माहेराला यायची.

माहेरपण जगायची..

चार दिवसात राग संपायचा

कुणीतरी समजूत काढायचं.

मग अचानक भावजी यायचे

चिमणी पुन्हा हसायची.. सगळं विसरायची.

आणि परत तिच्या चिमण्यासोबत निघायची…

 

“सासरच्या घरी जाताना अर्धं पोतं ज्वारी,

थोडंसं गहू, जमलंच तर वायशी तांदूळ,

आणि बरणीभर लोणचं, थोडीशी चटणी… 

आणि तिच्या काळजाची वाटणी करून

तिची निरोपाची पावलं चालू लागायची

 

गाडी यायची.. गडबड व्हायची

सामान अगोदर आत.. नंतर आमची चिमणी.. मग भावजी आत

खिडकीतून हात हातात यायचा

तिचे पाणावलेले डोळे.. त्या हिरव्या बांगड्या..

आणि खिडकीच्या काचेतून बाहेर हसत असलेलं..

तिचं तिच्या जन्मासोबत आलेलं स्वातंत्र्य…

 

टांग… टांग… घंटा वाजायची

तिचं स्वातंत्र्य आकाशात भुर्रकन उडून जायचं…

कंडक्टर दार जोरात ओढून घ्यायचा.

गाडी पुढे जायची..

 

तेव्हा… मला दिसायचं

गाडीच्या पाठीमागे लिहिलेले वाक्य..

 

“मुलापेक्षा मुलगी बरी

प्रकाश देते दोन्ही घरी”

——

© श्री नितीन सुभाष चंदनशिवे (दंगलकार)

लेखक / कवी

संपर्क – मु. पोस्ट. कवठेमहांकाळ, जि. सांगली.

मो 7020909521

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ “सुटल्या गाठी…” ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ “सुटल्या गाठी...” ☆ सौ राधिका भांडारकर 

(अनलज्वाला वृत्त ८+८+८)

साक्षीभावे पाही जेव्हा गतकालाला

जाणवते  मज अपार तृप्ती  शांत मनाला

 *

हळूच मग मी पीळ उसवते बंधनातला

तो एक श्वास मुक्त मोकळा तेव्हा सुटला

 *

सुटल्या गाठी सुटली माया निरोप समयी

विरक्त झाले संसारी मी नच लोभमयी

 *

त्या काळाच्या गाठोड्याला कशास उपसा

का अडकावे  पुनश्च आता  नुसता जलसा

*

मावळतीचे रंग मनाला किती भुलवती

बघायचे का वळून मागे वळणावरती

 *

आयुष्याच्या चौरंगावर विणले धागे

जो येतो तो जातो सारे ठेवित मागे

*

नकोत गाठी नकोत भेटी अलिप्त व्हावे

जळी राहोनि कोरडेपणी सुख मानावे

*

सुखदुःखाच्या गाठी मधले  आर्त गुंतणे

काळासोबत विरुनी  जावो हेच मागणे

© सौ. राधिका भांडारकर

ई ८०५ रोहन तरंग, वाकड पुणे ४११०५७

मो. ९४२१५२३६६९

radhikabhandarkar@yahoo.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २७८ – द्राक्ष…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २७८ – विजय साहित्य ?

☆ द्राक्ष…!

(अष्टाक्षरी)

द्राक्ष कोल्ह्यासी आंबट

आजी सांगायची मला

द्राक्ष आवडीचे फळ

पाहू बाग मळा चला.

*

बिया नसलेले द्राक्ष

वाटे रत्न अनमोल

किती खाऊ किती नको

द्राक्ष फळ लंबगोल.

*

बाग द्राक्षाची पाहून

पाणी‌ सुटते तोंडाला

काळी,लाल,हिरवीशी

घोस लोंबती वेलाला.

*

तासगांव नाशिकची

पहा द्राक्षे चवदार

रोग प्रतिकार शक्ती 

असे गुणकारी फार.

*

डोळे,हृदयाच्यासाठी

आहे द्राक्ष गुणकारी

द्राक्षासव,ताजारस 

असे मात्रा गुणकारी.

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ३… ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ३ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

तुकारामांचे मन प्रपंचात, संसारात मुळीच रमत नाही. पांडुरंगाच्या भेटीची त्यांना तळमळ लागून राहिली आहे, म्हणूनच ते एकसारखे म्हणतात,

भेटी लागी जीवा लागलीसे आस

पाही रात्रंदिस वाट तुझी

परमेश्वर प्राप्तीच्या वेडाने

कन्या सासुरासी जाये। मागे परतुनी पाहे।

तैसे झाले माझ्या जीवा ।केव्हा भेटसी केशवा।।

 

जीवना वेगळी मासोळी तैसा तुका तळमळी. ।

तुकारामांची अवस्था पाण्याबाहेर तडफडणाऱ्या मासोळी सारखी झाली आहे. पांडुरंगाची कृपादृष्टी मिळवण्यासाठी आता काय करावे हा एकच विचार त्यांच्या मनात रात्रंदिवस घोळत आहे.

ते पांडुरंगाला साद घालतात आणि म्हणतात,

तान्हेल्याची धनी फिटे गंगा नव्हे उणी।

माझे मनोरथसिद्धी पाव भावे कृपानिधी।।

तू तो उदारांचा राणा माझी अल्पशी ।

कृपादृष्टी पाहे तुका म्हणे होई साहे ।

एखाद्या तहानलेल्या माणसाने गंगेतले पाणी पिऊन त्याचे समाधान झाले, तरी गंगेचे पाणी काही कमी होत नाही. माणूस मात्र तृप्त होतो. त्याचप्रमाणे हे कृपेच्या सागरा माझ्या मनातल्या इच्छा, माझे सर्व मनोरथ तूच पूर्ण करू शकतोस.

तुम्ही माझ्याकडे कृपादृष्टीने पहावे एवढीच माझी अल्पशी इच्छा आहे. माझ्या साधनेत मला मदत करा.

भक्ती मार्ग हा परमेश्वरा प्रती जाण्याचा सर्वात सोपा मार्ग आहे. बहुतेक सर्व साधुसंत याच मार्गाने गेले आहेत, कारण या मार्गात कुठेही आड वळणे नाहीत. भक्ती मार्गाची ही वाट अगदी स्वच्छ आहे.

संत तुकारामही याच मार्गाने जात आहेत.

ते साधकांना सांगतात,

नव्हतो सावचित्त तेणे अंतरले हित।

पडिला नामाचा विसर वाढविला संसार।।

लटक्याचे पुरी गेलो वाहूनिया दूरी।

तुका म्हणे नाव आम्हा सापडला भाव।।

ते स्वतः विषयी सांगतात की हरी चिंतनाविषयी सावध नव्हतो, म्हणून विघ्ने आली. हरी नामाचा विसर पडला आणि संसार वाढवत बसलो. मायेच्या पुरात पुरता अडकलो. परंतु आता जागा झालो आहे. हरिभक्तीची नौका सापडली आहे.

तेव्हा आता काय उणे आम्हा विठोबाचे पायी

नाही ऐसे काही तेथे एक

तुका म्हणे मोक्ष विठोबाचे गावी

फुकाची लुटावी भांडारे ती

पांडुरंगाच्या गावाला मोक्षाची भांडारे भरलेली आहेत आणि भक्तांना ती अगदी मोफत आता लुटता येतात.

तुकाराम महाराज या मायामोहातून, प्रपंचातून मुक्त होऊन पांडुरंगाशी एकरूप होण्यासाठी पंढरीच्या पांडुरंगाच्या चरणावर माथा ठेवण्यासाठी आतुर झाले आहेत. अतिशय व्याकुळ झाले आहेत. ते म्हणतात, ” पांडुरंगा तू मला फक्त भेट दे”. त्यासाठी…

*नलगे हे तुझे ब्रह्मज्ञान। गोजिरे सगुण रूप पुरे।।

लागला उशिर।पतित पावन ।विसरूनी वचन। गेलास या।।*

जाळूनी संसार। बसला अंगणी ।तुझे नाही मनी ।मानसी हे।।

तुका म्हणे नको राग रागेजू विठ्ठला। उठी पावतात देई मला भेटी आता।।

या अभंगातूनही विठ्ठलाच्या भेटीची तुकाराम महाराजांना लागलेली तळमळच दिसून येते. या अभंगात वापरलेला रागेजू हा शब्द मला विशेष लक्षणीय वाटला. लहान मूल जसे लडिवाळपणे त्याच्या मातेकडे काही हट्ट करते, त्याचप्रमाणे तुकाराम महाराज या माऊलीला रागावू नकोस असे मोठ्या लडिवाळपणे सांगत आहेत.

संसारातून तुकाराम महाराजांना पूर्ण विरक्ती आलेली आहे. पंचेंद्रियांवर ताबा मिळवलेला आहे, आणि ते पांडुरंगाला म्हणतात,

संसार हा तीही केला पाठमोरा

नाही द्रव्यदारा जया चित्ती

शुभाशुभ नाही हर्षामर्श अंगी

जनार्दन जगी होऊनी ठेला

तुका म्हणे दिला देह एकसरे

जयासी दुसरे नाही मग

त्यांना आता मान मरातब काही नको. त्यात त्यांना थोडेही सुख वाटत नाही. गोड अन्न सुद्धा त्यांना विष समान वाटत आहे. कोणी त्यांची स्तुती केली तर त्यांचा जीव कासावीस होतो.

ते म्हणतात,

नको मृगजळा होऊ मज

तुका म्हणे आता करी माझे हित

काढावे जळत्या आगीतून.

हा संसार म्हणजे त्यांना जळती आग वाटत आहे.

तुकाराम महाराजांच्या प्रत्येक शब्दातून त्यांची विठ्ठल भक्तीची आणि विठ्ठलाच्या भेटीची तळमळ दिसून येते

विठ्ठला रे तू उदाराचा राशी

विठ्ठला तुझं पाशी सकळसिद्धी

विठ्ठला रे तुझे नाम बहु गोड

विठ्ठला तू पुरविशी सर्व कोड

विठ्ठला रे तुझे श्रीमुख चांगले

विठ्ठला रे सोस घेतला जीवे

विठ्ठला रे शोक करीत असे तुका

विठ्ठला तू एका झडकरी

संत तुकाराम हे पूर्णपणे विठ्ठलमय झालेले आहेत.

क्रमशः… ३ 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित  ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे —सूत्र ३६ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले ☆

श्री संदीप रामचंद्र सुंकले

? इंद्रधनुष्य ?

।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ३६ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले 

।। श्री नारद उवाच ।। 

 नारद भक्ती सूत्र क्र. ३६ 

अव्यावृत भजनात् ॥ ३६ ॥

अर्थ : (ते भक्तिसाधन) अव्यावृत्त – अखंड भजनाने (सिद्ध होते.)

विवरण : मागील सूत्रात विषयत्याग व संगत्याग हे साधन सांगितले. आता या सूत्रात ती भक्ती सिद्ध होण्याचे ‘अव्यावृत भजन’ हे साधन सांगतात. भजन हे प्रसिद्ध साधन आहे. सर्वच भाविक कोणत्या ना कोणत्या प्रकारे भजन करीतच असतात. पण ते भजन अनन्यभक्ती निर्माण करीलच असे नाही.

भजन हे भक्तीचे महत्त्वाचे अंग आहे पण ते अव्यावृत-अखंड-झाले पाहिजे. भजनात खंड पडण्याची देहभोगप्रवृत्ती, विषयवासना, विकाराधीनता, अश्रद्धा इत्यादी अनेक कारणे असतात, ती दूर करून पूर्ण भावनेने ते भजन झाले पाहिजे.

आपल्याकडे खास करून भक्तिमार्गात अखंड अनुसंधानाचे महत्त्व सांगितले आहे. अखंडित नामस्मरण हा त्यातल्या त्यात सोपा मार्ग.

समर्थ आपल्या दासबोधाच्या चौथ्या दशकातील तिसऱ्या समासात याचे पुढील प्रमाणे वर्णन करतात.

*स्मरण देवाचें करावें । अखंड नाम जपत जावें । नामस्मरणें पावावें । समाधान ॥ २॥ नित्य नेम प्रातःकाळीं । माध्यानकाळीं सायंकाळीं । नामस्मरण सर्वकाळीं । करीत जावें ॥ ३॥ सुख दुःख उद्वेग चिंता । अथवा आनंदरूप असतां । नामस्मरणेंविण सर्वथा । राहोंच नये ॥ ४॥ हरुषकाळीं विषमकाळीं । पर्वकाळीं प्रस्तावकाळीं । विश्रांतिकाळीं निद्राकाळीं |नामस्मरण करावें ॥ ५॥ कोडें सांकडें संकट । नाना संसारखटपट । आवस्ता लागतां चटपट । नामस्मरण करावें ॥ ६॥ चालतां बोलतां धंदा करितां । खातां जेवितां सुखी होतां । नाना उपभोग भोगितां । नाम विसरों नये ॥ ७|| संपत्ती अथवा विपत्ती । जैसी पडेल काळगती । नामस्मरणाची स्थिती । सांडूंच नये ॥ ८॥ वैभव सामर्थ्य आणी सत्ता । नाना पदार्थ चालतां ।उत्कट भाग्यश्री भोगितां । नामस्मरण सांडूं नये ॥ ९॥ आधीं आवदसा मग दसा । अथवा दसेउपरी आवदसा । प्रसंग असो भलतैसा । परंतु नाम सोडूं नये ॥ १०॥”*

*इथे भजन याचा व्यापक अर्थ अभिप्रेत असावा. टाळ, मृदुंग घेऊन २४ तास कीर्तन करणे इतका प्राथमिक अर्थ इथे नक्कीच नसावा. अंतर्मनात सतत सद्गुरूंनी दिलेल्या नामाचे स्मरण होणे, आणि त्याची एक धून, एक नाद सतत मनात गुंजत रहाणे, बाहेरून कर्म करीत असताना जसा मनुष्य श्वासोश्वास करीतच असतो, त्याप्रमाणे हा नामाचा नाद गुंजत रहाणे म्हणजे अखंड भजन. *

अशा अखंड भजनानेच खरी प्रेमभक्ती उत्पन्न होते. ध्रुव-प्रल्हादादिकानी अव्यावृत भजनच केले. ‘भजनं-भक्ति. ‘ भजन म्हणजेच भक्ती असा भजन शब्दाचा अर्थ आहे. पण ‘तुका म्हणे नाम । मागे मागे धावे प्रेम ।’ असे श्रीतुकाराममहाराज म्हणतात. अंतःकरणात गुणकामनारहित परमप्रेम एकदम सहजासहजी उत्पन्न होणे कठीण आहे. ती भक्ती या अखंड भजनाने उत्पन्न होते ‘आई आई’ या नावाने हाका मारतामारताच बालकाच्या ठिकाणी मातृप्रेम वृद्धिंगत होत असते.

श्रीकृष्ण म्हणतात, हे पार्था, जे भक्त विषयांना तिलांजली देऊन म्हणजे विषयांवर पाणी सोडून, सवासना विषयत्याग करून, यावत् प्रवृत्ती म्हणजे व्यवहाराचा निरोध करून मला अंतःकरणात साठवून माझ्या स्वरूपाचा भोग घेतात, त्यांचे माझ्या स्वरूपाचा कितीही भोग घेतला तरी समाधान होत नाही, ‘ जास्त काय, ‘भूक, तहान याचा त्यांना पत्ता नसतो. तेथे डोळे इत्यादी इंद्रियाकडे कोण पाहील? ‘ असा वरील ओव्याचा आशय आहे. व्यावृत म्हणजे तेथून परतणे. भजन करता करता कोणत्याही अन्य कारणाने भजनापासून परत न फिरणे.

श्रीभानुदासमहाराज सांगतात –

*”जैं आकाश वर पडों पाहे । ब्रह्मागोळ भंगा जाये । वडवानळ त्रिभुवन खाये । तरी तुझीच वाट पाहें गा विठोबा ॥०१॥ न करी आणिकांचा पांगिला । नामधारक तुझाचि अंकिला ॥०२॥ सप्त सागर एकवट होती । जैं हे विरुनी जाय क्षिती । पंचमहाभुतें प्रलय पावती । परि मी तुझाचि सांगातीं गा विठोबा ॥०३॥ भलतैसें वरपडों भारी । नाम न संडों टळों निर्धारी । जैसी पतिव्रता प्राणेश्वरी । विनवी भानुदास म्हणे अवधारी गा विठोबा ॥०४॥”*

(अभंग क्रमांक ५७)

अशी असिधारा भक्ति करता आली तर भगवंत दूर नाही. माउली आपल्या हरिपाठात सांगतात,

*”तीर्थ व्रत नेम भावेंवीण सिद्धि|*

*वायाची उपाधि करिसी जना।।१।।*

*

*भावबळें आकळे येऱ्हवीं नाकळे।।*

*करतळीं आंवळे तैसा हरी।।२।।”*

*

जय जय रघुवीर समर्थ!!

– नारद भक्तीसूत्र ३६.

नारद महाराज की जय!!!

– क्रमशः लेख क्र. ३६ 

© श्री संदीप रामचंद्र सुंकले (दास चैतन्य)

थळ, अलिबाग. 

८३८००१९६७६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ राऊळ…! ☆ श्री सुजीत कदम ☆

श्री सुजित कदम

? कवितेचा उत्सव ?

☆ राऊळ…! ☆ श्री सुजीत कदम  ☆

(छंद : अष्टाक्षरी…)

जाऊ नको खचूनीया

टाक पुढेच चाहूल

येते आहे मागावर

सुख शोधीत पाऊल. . . . !

*

सुख सोबती घेताना

नको जाऊ हुरळून

माय तुझी रे पाहते

यश तुझे दारातून. . . . !

*

फुलापरी वाढवले

काळजाच्या तुकड्याला

खाच खळगे पाहून

थोडा जप जीवनाला. . . . !

*

दोन घडीचे जीवन

जन्म मृत्यूचा प्रवास.

नको विसरू मायेचा

एका भाकरीचा घास. . . . !

*

खण जीवनाचा पाया

नको वाकडे पाऊल

यशोमंदिराचे तुझ्या

माय बोलके राऊळ.. . . !

 

© श्री सुजित कदम

पुणे

मो. 7276282626

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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