हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग-२८ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – नैनीताल – भाग- २८ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

नैनीताल

कालाढूँगी से नैनीताल की तरफ़ मुड़ने लगे तो वहाँ पुलिस ने बेरीकेड़ लगा कर मुस्तैद चौकसी कर रखी थी। वे कोरोना चेकिंग कर रहे थे। उन्हें टेस्ट रिपोर्ट बताई। फिर भी संतुष्ट नहीं हो रहे थे। परिचय पत्र के रूप में स्टेट बैंक के पहचान पत्र दिखाते ही अफ़सर ने कहा जाइए। यात्रा शुरू होते ही पहाड़ियों का घुमावदार रास्ता आरम्भ हो गया। जिम कार्बेट कभी इन्ही रास्तों से पैदल नैनीताल ज़ाया करते थे। इन्ही पहाड़ियों में उन्होंने आदमखोरों का पीछा किया था और कई बार तो आदमखोरों ने उनका पीछा किया था। शुरू में पहाड़ियाँ थोड़ी सपाट सी थीं लेकिन दस किलोमीटर चलने के बाद तीखी चढ़ाई आते ही चारों तरफ़ खूबसूरत नज़ारे दिखने लगे। शाम के धुँधलके में नैनीताल पहुँच गये।

स्टेट बैंक का गेस्ट हाऊस बहुत ऊँची पहाड़ी पर बहुत देर तक ढूँढने के बाद मिल तो गया। परंतु वहाँ का केयरटेकर बोला कि आपकी बुकिंग नहीं है। काफ़ी बहस मुबाहिसों के बाद कमरा हासिल कर लिया। बाहर निकल कर देखा तो नैनीताल को घेरकर अतीव प्राकृतिक सौदर्य बिखरा था। पूरा शहर नज़र आ रहा था। झील को घेरकर बनी सड़क पर आवागमन चिटियों की चलत रेखा सादृश्य दिख रहा था।

नैनीताल कुमायूँ इलाक़े का प्रमुख शहर और भारत का एक लोकप्रिय पर्वतीय पर्यटन स्थल है। राज्य का उच्च न्यायालय स्थित होने से यह उत्तराखंड की न्यायिक राजधानी है। कुमाऊं मंडल का मुख्यालय होने के साथ-साथ एक महत्वपूर्ण ज़िला भी है। उत्तराखंड के राज्यपाल यहाँ राजभवन में रहते हैं। जबकि राजनीतिक राजधानी देहरादून है। नैनीताल संयुक्त प्रांत की ग्रीष्मकालीन राजधानी थी। नैनीताल बाहरी हिमालय की कुमाऊं तलहटी में राज्य की राजधानी देहरादून से 285 किमी की दूरी और नई दिल्ली से 345 किमी की दूरी पर स्थित है। यह शहर समुद्र तल से 6,358 फुट की ऊंचाई पर एक घाटी में स्थित है। जिसमें एक आंख के आकार की झील लगभग दो मील की परिधि में  पहाड़ों से घिरी हुई है, जिनमें से सबसे ऊंची नैना चोटी 8,579 फीट, उत्तर में देवपथ 7,999 फुट और पश्चिम में अयारपथ 7,474 फुट ऊंची चोटियों के शीर्ष से दक्षिण की ओर विशाल मैदान और उत्तर में बर्फीली श्रृंखला के साये में उलझी हुई लकीरों से पहाड़ी खेत के शानदार दृश्य हिमालय की केंद्रीय धुरी का निर्माण करती हैं। नैनीताल शहर का कुल क्षेत्रफल को 11.73 किमी है। झील की तलहटी झील के सबसे गहरे बिंदु, पाषाणदेवी के पास 85 मीटर की गहराई पर है। झील को विवर्तनिक रूप से बनाया गया माना जाता है। बलिया नाला, जो झील को भरने वाली मुख्य धारा है, और बाद की धाराएँ प्रमुख जोड़ों सहित 26 प्रमुख नाले झील  में मिलते हैं, जिसमें 3 बारहमासी नाले शामिल हैं।

पुराणों के अनुसार सती के शव के विभिन्न अंगों से बावन शक्तिपीठों का निर्माण हुआ था। इसके पीछे यह अंतर्कथा है कि दक्ष प्रजापति ने कनखल (हरिद्वार) में ‘बृहस्पति सर्व’ नामक यज्ञ रचाया। उस यज्ञ में ब्रह्मा, विष्णु, इंद्र और अन्य देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन जान-बूझकर अपने जमाता भगवान शंकर को नहीं बुलाया। शंकरजी की पत्नी और दक्ष की पुत्री सती पिता द्वारा न बुलाए जाने पर और शंकरजी के रोकने पर भी यज्ञ में भाग लेने गईं। यज्ञ-स्थल पर सती ने अपने पिता दक्ष से शंकर जी को आमंत्रित न करने का कारण पूछा और पिता से उग्र विरोध प्रकट किया। इस पर दक्ष प्रजापति ने भगवान शंकर को अपशब्द कहे। इस अपमान से पीड़ित हुई सती ने यज्ञ-अग्नि कुंड में कूदकर अपनी प्राणाहुति दे दी। भगवान शंकर को जब इस दुर्घटना का पता चला तो क्रोध से उनका तीसरा नेत्र खुल गया। भगवान शंकर के आदेश पर उनके गणों के उग्र कोप से भयभीत सारे देवता ऋषिगण यज्ञस्थल से भाग गये। भगवान शंकर ने यज्ञकुंड से सती के पार्थिव शरीर को निकाल कंधे पर उठा लिया और दुःखी हुए इधर-उधर घूमने लगे। तदनंतर सम्पूर्ण विश्व को प्रलय से बचाने के लिए जगत के पालनकर्त्ता भगवान विष्णु ने चक्र से सती के शरीर को काट दिया। तदनंतर वे टुकड़े 52 जगहों पर गिरे। वे 52 स्थान शक्तिपीठ कहलाए। सती ने दूसरे जन्म में हिमालयपुत्री पार्वती के रूप में शंकर जी से विवाह किया। पौराणिक मान्यता है की सती के नैन यहाँ गिरने से नैना देवी का शक्ति पीठ स्थापित हुआ।

नैनीताल ऐतिहासिक रूप से कुमाऊं क्षेत्र का हिस्सा रहा है। 10वीं शताब्दी में कत्यूरी राजवंश के पतन के बाद, कुमाऊं कई छोटी रियासतों में विभाजित हो गया था, और नैनीताल के आसपास का क्षेत्र एक खासिया परिवार की विभिन्न शाखाओं के अधीन था। कत्यूरियों के बाद कुमाऊं पर समेकित प्रभुत्व हासिल करने वाला पहला राजवंश चंद था, लेकिन इसमें कई शताब्दियां लगीं और नैनीताल और इसके आसपास के क्षेत्र अवशोषित होने वाले अंतिम क्षेत्रों में से एक थे।

त्रिलोक चंद ने तेरहवीं शताब्दी में भीमताल में एक किला बनवाया था, लेकिन उस समय नैनीताल स्वयं चंद शासन के अधीन नहीं था, और राज्य की पश्चिमी सीमा के पास स्थित था। उद्यान चंद के शासनकाल के दौरान, चंद राज्य की पश्चिमी सीमा कोशी और सुयाल नदियों तक फैली हुई थी, लेकिन रामगढ़ और कोटा अभी भी पूर्व खासिया शासन के अधीन थे। 1488 से 1503 तक शासन करने वाले कीरत चंद अंततः नैनीताल और आसपास के क्षेत्र पर अधिकार स्थापित करने में सक्षम हुए थे। खासिया प्रमुखों ने 1560 में अपनी स्वतंत्रता हासिल करने का प्रयास किया, जब उन्होंने रामगढ़ के एक खासिया के नेतृत्व में सफलता के एक संक्षिप्त क्षण का आनंद लिया, लेकिन बाद में बालो कल्याण चंद द्वारा निर्ममता से वश में कर लिया गया। अठारहवीं सदी के अंतिम दशक में आपसी दुर्भावनाओं व राग-द्वेष के कारण चंद राजाओं की शक्ति बिखर गई थी। फलतः गोरखों ने अवसर का लाभ उठाकर हवालबाग के पास एक साधारण मुठभेड़ के बाद सन्‌ 1790 में अल्मोड़ा पर अपना अधिकार कर लिया।

कुमाऊं पर गोरखा शासन 24 वर्षों तक चला। इस अवधि के दौरान काली नदी को अल्मोड़ा के रास्ते श्रीनगर से जोड़ने वाली एक सड़क थी। गोरखा काल के दौरान अल्मोड़ा कुमाऊं का सबसे बड़ा शहर था, और अनुमान है कि इसमें लगभग 1000 घर थे।

कुमाऊँ की पहाड़ियाँ एंग्लो-नेपाली युद्ध (1814-16) के बाद ब्रिटिश शासन के अधीन आ गईं। नैनी ताल के हिल स्टेशन शहर की स्थापना  1841 में हुई थी, जिसमें शाहजहांपुर के एक चीनी व्यापारी पी. बैरोन द्वारा पहले यूरोपीय घर (पिलग्रिम लॉज) का निर्माण किया गया था। अपने संस्मरण में, उन्होंने लिखा: “यह अब तक का सबसे अच्छा स्थल है जिसे मैंने हिमालय में 2,400 किमी की यात्रा के दौरान देखा है।”

1846 में, जब बंगाल आर्टिलरी के एक कैप्टन मैडेन ने नैनी ताल का दौरा किया, तो उन्होंने दर्ज किया कि “बस्ती के अधिकांश हिस्सों में घर तेजी से उभर रहे थे: कुछ सैन्य रेंज के शिखर की ओर समुद्र तल से लगभग 7,500 फीट ऊपर थे। स्थानीय लोगों द्वारा इसका नामकरण ऊबड़-खाबड़ और जंगली आन्यारपट्टा आशीष (अन्यार-पट्ट – कुमाऊँनी में – पूर्ण अंधकार) किया था क्योंकि घने जंगलों के कारण यहाँ कम से कम सूर्य की किरणें पड़ती थीं। सेंट जॉन (1846) चर्च जंगल में सबसे शुरुआती इमारतों में से एक था। उसके बाद बेल्वेडियर, अल्मा लॉज, एशडेल कॉटेज (1860 ) बनीं। जल्द ही, यह शहर ब्रिटिश सैनिकों और औपनिवेशिक अधिकारियों और उनके परिवारों द्वारा मैदानी इलाकों की गर्मी से बचने की कोशिश करने वाला एक रिसॉर्ट बन गया। बाद में, यह शहर संयुक्त प्रांत के गवर्नर का ग्रीष्मकालीन निवास बन गया।

30 जुलाई 2021 को हमने एक पूरा दिन नैनीताल के दर्शनीय स्थलों के लिए रखा था। नैनीताल को भारत के लेक सिटी के रूप में भी जाना जाता है। कहा जाता है कि एक समय में नैनीताल जिले में 60 से अधिक झीलें थीं। चारों ओर सुंदरता बिखरी पड़ी है। सैर-सपाटे के लिए दर्जनों जगहें हैं, जहां पर्यटक मंत्रमुग्ध हो जाते हैं। बर्फ से ढके पहाड़ों से घिरा यह स्थान झीलों से भरा हुआ है। नैनीताल हिमालय की कुमाऊँ पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है।

नैनी झील नैनीताल का सबसे प्रमुख आकर्षण है, जो हरी घाटियों से घिरा है। यात्री नौकायन (रोइंग), रोइंग, पैडलिंग (नौकायन) जैसी गतिविधियों का आनंद ले सकते हैं। यह झील काफी लंबी है और इसके उत्तरी भाग को ‘मल्ली ताल’ कहा जाता है, जबकि दक्षिणी भाग को ‘तल्ली ताल’ कहा जाता है। यह एकमात्र झील है जिस पर एक पुल और एक डाकघर है।

मॉल रोड नैनीताल की एक प्रसिद्ध सड़क का नाम है, और हाल ही में इसे बदलकर ‘गोविंद बल्लभ पंत मार्ग’ कर दिया गया है। दुकानों और बाजारों के अलावा, कई बैंक और ट्रैवल एजेंसियां मॉल रोड पर उपलब्ध हैं। यह सड़क मल्लीताल को महाल्ली से जोड़ती है। एक अन्य पर्यटक आकर्षण ‘ठंडी सड़क’ है, जो नैनी झील के दूसरी ओर स्थित है। हम लोग एक नौका पर सवार होकर दो घंटे नैनीताल में नौकायन का आनंद लेते रहे। चारों तरफ़ पहाड़ों पर बादलों की अठखेलियाँ मस्त वातावरण रच रही थीं। मंद-मंद रिमझिम फुहारों ने वातावरण को और भी रोमांटिक बना दिया। झील की सैर के बाद चिड़िया घर की सैर को निकल गए।

नैनीताल में चिड़ियाघर 1984 में स्थापित किया गया था। यह नैनीताल बस स्टॉप से केवल एक किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह चिड़ियाघर विभिन्न जानवरों का घर है, जिनमें बंदर, साइबेरियाई बाघ, तेंदुए, भेड़िये, ताड़ के सिवेट बिल्लियाँ, रोज़ रिंग पैराकेट्स, सिल्वर तीतर, पहाड़ी लोमड़ी, सांभर, प्यारे और बार्क हिरण और हिमालयन काला भालू  भी शामिल है। चिड़ियाघर सोमवार और सभी राष्ट्रीय छुट्टियों पर बंद है।

नैनीताल की सात चोटियों में 2611 मीटर ऊंची नैनी चोटी (चाइना पीक) सबसे ऊंची चोटी है। चाइना पीक की दूरी नैनीताल से लगभग 6 किलोमीटर है। इस चोटी से हिमालय की ऊँची चोटियाँ दिखाई देती हैं। नैनीताल झील और शहर के भव्य दृश्य भी हैं। फिर नीचे आकर टिफ़िन टॉप पर चढ़े। टिफिन टॉप एक सुंदर पिकनिक स्थल है, जिसे ‘डोरोथी की सीट’ के रूप में भी जाना जाता है। अयारपट्टा चोटी पर स्थित यह स्थान समुद्र तल से 7520 फीट की ऊँचाई पर स्थित है। यात्री यहाँ से ग्रामीण परिदृश्य के साथ शक्तिशाली हिमालय पर्वतमाला के प्रभावशाली दृश्यों का आनंद ले सकते हैं। इस स्थान का विकास डोरोथी शैले (एक अंग्रेजी कलाकार) के पति द्वारा विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु के बाद किया गया था। नैनीताल टाउन से 4 किमी दूर स्थित, यह टिफिन टॉप प्रकृति की फोटोग्राफी के लिए एक आदर्श स्थान है।

अगली सुबह सेंट जॉन चर्च इन वाइल्डरनेस गए जो मल्लीताल (नैनीताल के उत्तरी भाग) में स्थित  एक शांत जगह है। यह चर्च वर्ष 1844 में स्थापित किया गया था। अभिलेखों के अनुसार, कोलकाता के बिशप, डैनियल विल्सन, इस चर्च की आधारशिला स्थापित करने के लिए यहां आए थे, अपनी यात्रा के दौरान, वे बीमार हो गए और उन्हें पास के जंगल में एक अधूरे घर में रहना पड़ा।  इसलिए, चर्च को जंगल में सेंट जॉन के रूप में जाना जाने लगा। यह चर्च 1880 में भूस्खलन का शिकार हुए लोगों के एक स्मारक के रूप में भी काम करता है, जहाँ कांस्य पट्टिका में मारे गए लोगों के नाम लिखे हैं।

उसके बाद गुफा गार्डन गए। गुफा गार्डन को इको गुफा गार्डन के नाम से भी जाना जाता है। यह नैनीताल का एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है। यह उद्यान अपने आगंतुकों को पर्यावरण के अनुकूल जीवन शैली की एक झलक प्रदान करता है। छह भूमिगत पिंजरे हैं जो पेट्रोमैक्स लैंप द्वारा प्रकाशित किए जाते हैं और एक संगीत वाद्ययंत्र की ताल पर चलने वाला एक फव्वारा भी है जो पहली बार नैनीताल में स्थापित किया गया था। इन गुफाओं को टाइगर गुफा, पैंथर गुफा, चमगादड़ गुफा, गिलहरी गुफा, फ्लाइंग फॉक्स, एव और एप गुफा के रूप में जाना जाता है। इन गुफाओं को जोड़ने का मार्ग काफी संकीर्ण है, कभी-कभी यात्रियों को रेंगने की आवश्यकता होती है। ये सभी गुफाएँ प्राकृतिक हैं और स्थानीय प्रशासन द्वारा प्रबंधित हैं।

नैनीताल के पास एक खुर्पाताल भी है। कॉटेज, फिशिंग फिटर (झोपड़ी) लोगों के लिए स्वर्ग है। यह नैनीताल से 10 किमी दूर स्थित है। यह खूबसूरत छोटा उपग्राम (खेरा) समुद्र तल से 1635 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। यहां की प्राकृतिक सुंदरता किसी को भी मंत्रमुग्ध कर देती है। खूबसूरत झील और आसपास के घर और होटल कई बार इस सुंदरता को बढ़ाते हैं। 19 वीं शताब्दी तक खुर्पाट लोहे के औजारों के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन अब यह हरी सब्जियों के लिए प्रसिद्ध है।

तीसरे दिन सबसे पहले नैनीताल झील के किनारे पर स्थित नयना देवी के मंदिर पर देवी दर्शन किया। उसके ठीक बाजू में सिक्ख गुरुद्वारा में मत्था टेका। फिर नैनीताल झील में नाव की सवारी पर एक घंटा बिताता। इस झील में कई फ़िल्मों की शूटिंग हुई है। जिनमे कटी पतंग फ़िल्म का गाना “जिस गली में तेरा घर न हो बालमा” बहुत प्रसिद्ध है। झील से चारों तरफ़ के गगनचुंबी पर्वत शिखर अत्यंत मनोरम दृश्यावली बनाते हैं। उसके बाद रोपवे से नैनीताल शहर की ऊँची चोटी पर पहुँच कर पूरे शहर को देखा और फ़ोटो खींचे। फिर मॉल रोड पर दो घंटे मटरगश्ती करते रहे। इस प्रकार हमारा अंतिम पड़ाव पूरा हुआ।  

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग-२७ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २७ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ज़िम कार्बेट-नैनीताल

जिम ने कुछ समय छोटी हल्द्वानी में भी बिताया, जिसे उन्होंने गोद लिया था और जिसे कॉर्बेट्स विलेज के नाम से जाना जाने लगा। जंगली जानवरों को परिसर से बाहर रखने के लिए कॉर्बेट और ग्रामीणों ने 1925 में गांव के चारों ओर एक दीवार का निर्माण किया। 2018 तक दीवार अभी भी खड़ी है, और ग्रामीणों के अनुसार इसे बनाने के बाद से दीवार ने ग्रामीणों पर जंगली जानवरों के हमलों को रोका जा सका था। उनकी यादों को मोती हाउस के रूप में बरकरार रखा गया था, जिसे कॉर्बेट ने अपने दोस्त मोती सिंह के लिए बनवाया था, और कॉर्बेट वॉल, एक लंबी दीवार (लगभग 7.2 किमी) गाँव के चारों ओर फसलों की जंगली जानवर से रक्षा के लिए बनाई गई थी। उन्होंने जंगली बिल्लियों और अन्य वन्यजीवों की घटती संख्या के बारे में लिखना और चेतावनी देना जारी रखा।

1947 के बाद, कॉर्बेट और उनकी बहन मैगी न्येरी, केन्या चले गए थे, जहां वे होटल आउटस्पैन के मैदान में ‘पक्सटू’ कॉटेज में रहते थे, जो मूल रूप से उनके दोस्त लॉर्ड बैडेन-पॉवेल के लिए बनाया गया था। जिम कॉर्बेट अपनी बहन मैगी कॉर्बेट के साथ गुर्नी हाउस में रहते थे। नवंबर 1947 में केन्या जाने से पहले उन्होंने श्रीमती कलावती वर्मा को घर बेच दिया। घर को एक संग्रहालय में बदल दिया गया है और इसे जिम कॉर्बेट संग्रहालय के रूप में जाना जाता है। आज हम कालाढुंगी के उसी संग्रहालय के प्रांगण में उन्हें याद करके आदरांजलि अर्पित कर रहे हैं।

केन्या भी कभी ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा रहा था। रानी एलिज़ाबेथ द्वितीय केन्या गई थीं। तब उनके लिए ट्रीटॉप हट बनाई है थी जिसमें कॉर्बेट 5-6 फरवरी 1952 को राजकुमारी एलिजाबेथ के अंगरक्षक के रूप में ट्रीटॉप्स पर (एक विशाल फ़िकस के पेड़ की शाखाओं पर बनी एक झोपड़ी) साथ रहे। उस रात राजकुमारी के पिता, किंग जॉर्ज VI की मृत्यु हो गई, और एलिजाबेथ रानी बन गई। दुनिया के इतिहास में पहली बार एक युवा राजकुमारी के रूप में पेड़ पर चढ़ी और अपने सबसे रोमांचक अनुभव के रूप में वर्णित करने के बाद वह अगले दिन पेड़ से इंग्लैंड की रानी बनकर नीचे उतरी। अपनी छठी पुस्तक, ट्री टॉप्स को समाप्त करने के कुछ दिनों बाद दिल का दौरा पड़ने से कार्बेट की मृत्यु हो गई, और उन्हें न्येरी में सेंट पीटर्स एंग्लिकन चर्च में दफनाया गया।  कॉर्बेट और उनकी बहन की लंबे समय से उपेक्षित कब्रों की मरम्मत और जीर्णोद्धार जिम कॉर्बेट फाउंडेशन के संस्थापक और निदेशक जैरी ए. जलील द्वारा 1994 और 2002 में किया गया।

जिम कॉर्बेट की कुल सात किताबें भारत में प्रकाशित हुई हैं। जिनके हिंदी संस्करण भी  आ चुके हैं। वन्य जीवन में रूचि रखने वालों के लिए उनका साहित्य अद्भुत ख़ज़ाना से कम नहीं है। 

1.जंगल की कहानियां। 1935 में निजी तौर पर प्रकाशित (केवल 100 प्रतियां)

सामग्री: गांव में वन्य जीवन: एक अपील, पीपल पानी टाइगर, मेरे सपनों की मछली, एक खोया स्वर्ग, आतंक जो रात में चलता है, पूर्णा लड़की और इसकी रहस्यमय रोशनी, चौगढ़ टाइगर्स।

2.कुमाऊं के आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, बॉम्बे 1944

सामग्री: लेखक का नोट (आदमखोर होने के कारण), चंपावत मानेटर, रॉबिन, चौगढ़ टाइगर्स, द बैचलर ऑफ पोवलगढ़, द मोहन मानेटर, फिश ऑफ माय ड्रीम्स, द कांडा मैनेटर, द पीपल पानी टाइगर, द ठक मैन-ईटर, जस्ट टाइगर्स।

3.रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1947

सामग्री: द पिलग्रिम रोड, द मैन-ईटर, आतंक, आगमन, जांच, पहली हत्या, तेंदुए का पता लगाना, दूसरा किल, तैयारी, जादू, ए नियर एस्केप, द जिन ट्रैप, द हंटर्स हंटेड, रिट्रीट, फिशिंग इंटरल्यूड, एक बकरी की मौत, साइनाइड जहर स्पर्श, सावधानी में एक सबक, एक जंगली सूअर का शिकार, एक देवदार के पेड़ पर सतर्कता, आतंक की मेरी रात, तेंदुए से लड़ता है तेंदुए, अंधेरे में एक शॉट, उपसंहार।

4.मेरा भारत। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1952

सामग्री: समर्पण और परिचय, गांव की रानी, ​​कुंवर सिंह, मोती, पूर्व लाल टेप दिन, जंगल का कानून, ब्रदर्स, सुल्ताना: भारत का रॉबिन हुड, वफादारी, बुद्धू, लालाजी, चमारी, मोकामा घाट पर जीवन।

5.जंगल विद्या। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1953

सामग्री: मार्टिन बूथ, डैनसे, लर्निंग टू शूट, मागोग, लुकिंग बैक, जंगल एनकाउंटर, कैटेगरी, जंगल विद्या, जंगल की पुकार, स्कूल के दिन / कैडेट, जंगल की आग और बीट्स, गेम ट्रैक्स, जंगल संवेदनशीलता परिचय।

6.कुमाऊं का टेंपल टाइगर और अन्य आदमखोर। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 1954

सामग्री: द टेंपल टाइगर, द मुक्तेसर मैन-ईटर, द पनार मैन-ईटर, द चुका मैन-ईटर, द तल्ला देस मैन-ईटर, उपसंहार।

7.माई कुमाऊं: अनकलेक्टेड राइटिंग्स। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस, 2012

सामग्री: प्रकाशक का नोट; समयरेखा; प्रस्तावना: ‘मैं कैसे लिखने आया’; ए लाइफ वेल लिव्ड: एन इंट्रोडक्शन टू जिम कॉर्बेट बाय लॉर्ड हैली; खंड एक: अप्रकाशित कॉर्बेट—रात जार का अंडा; ‘हम में से एक’; माई जंगल कैंप से; रुद्रप्रयाग पत्र; रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर कॉर्बेट; द मेकिंग ऑफ कॉर्बेट्स माई इंडिया: कॉरेस्पोंडेंस विद हिज एडिटर्स; ‘शूटिंग’ टाइगर्स: कॉर्बेट एंड द कैमरा; गांव में वन्यजीव: एक पर्यावरण अपील; भारत में एक अंग्रेज; केन्या में जीवन; खंड दो: कॉर्बेट एंड हिज़ ऑडियंस-‘द आर्टलेसनेस ऑफ़ हिज़ आर्ट’; द मैन रिवील्ड: कॉर्बेट इन हिज़ राइटिंग्स; जिम कॉर्बेट की सार्वभौमिक अपील: पत्र और समीक्षाएं; रुद्रप्रयाग के लिए उद्धार: कॉर्बेट द्वारा आदमखोर तेंदुए की हत्या पर प्रतिक्रिया; कॉर्बेट का प्रभाव: कुमाऊं के आदमखोर और छिंदवाड़ा कोर्ट केस; सूक्ति

उनकी किताब  मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं (कुमाऊं के आदमखोर) भारत, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका में एक बड़ी सफलता थी, अमेरिकन बुक-ऑफ-द-मंथ क्लब का पहला संस्करण 250,000 प्रतियां था। बाद में इसका 27 भाषाओं में अनुवाद किया गया। कॉर्बेट की चौथी पुस्तक, जंगल लोर, उनकी आत्मकथा है। 1948 में, कुमाऊं की सफलता के आदमखोरों के मद्देनजर, एक हॉलीवुड फिल्म, मैन-ईटर ऑफ कुमाऊं, बायरन हास्किन द्वारा निर्देशित और साबू, वेंडेल कोरी और जो पेज अभिनीत, बनाई गई थी। फिल्म ने कॉर्बेट की किसी भी कहानी का अनुसरण नहीं किया; एक नई कहानी का आविष्कार किया गया था। फिल्म फ्लॉप रही, हालांकि बाघ के कुछ दिलचस्प फुटेज फिल्माए गए। कॉर्बेट ने कहा है कि “सर्वश्रेष्ठ अभिनेता बाघ था” ‘कॉर्बेट लिगेसी’ का निर्माण उत्तराखंड वन विभाग द्वारा किया गया था और बेदी ब्रदर्स द्वारा निर्देशित किया गया था, जिसमें कॉर्बेट द्वारा शूट की गई मूल फुटेज थी। 1986 में, बीबीसी ने जिम कॉर्बेट की भूमिका में फ्रेडरिक ट्रेव्स के साथ मैन-ईटर्स ऑफ़ इंडिया नामक एक डॉक्यूड्रामा का निर्माण किया।

कॉर्बेट की किताबों पर आधारित एक आईमैक्स फिल्म इंडिया: किंगडम ऑफ द टाइगर, 2002 में क्रिस्टोफर हेअरडाहल द्वारा कॉर्बेट के रूप में अभिनीत थी। 2005 में जेसन फ्लेमिंग अभिनीत रुद्रप्रयाग के आदमखोर तेंदुए पर आधारित एक टीवी फिल्म बनाई गई थी। पूरी शाम प्रिय शिकारी और वाइल्ड लाइफ़ पर रोचक व रोमांचक किताबें देने वाले बेहतरीन इंसान की यादों में गुज़ारी। उनकी सभी किताबें और उनके हिंदी अनुवाद सब आसानी से आमेजोन पर उपलब्ध हैं। जिम कार्बेट के संग्रहालय में गुज़ारी। उनके द्वारा उपयोग की है सामग्रियों को निहारा। उनके फ़ोटोग्राफ़ कुर्सियाँ मेज़ कटलरी सब कुछ देखा। रात आठ बजे के आसपास नैनीताल पहुँचे।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२६ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ज़िम कार्बेट-नैनीताल – भाग- २६ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

29 जुलाई को पूर्वाह्न दस बजे हरिद्वार से नैनीताल की यात्रा आरम्भ की। अब हमारी दाहिनी तरफ़ गंगा का तेज बहाव और बाईं तरफ़ हिमालय तराई से जुड़ी पहाड़ियाँ और उनसे निकलती पहाड़ी नदियाँ और इन पर बने पुलों से गुज़रते मनमोहक दृश्य की क़तार साथ लिए बढ़ चले।

आधा घंटा चलने के बाद उत्तर प्रदेश का बिजनौर जनपद लग गया। एक बड़ी बस्ती निज़ामाबाद आई। जिसकी बसावट इतिहास की एक बड़ी घटना से जुड़ी है। पानीपत का तीसरा युद्ध अहमद शाह अब्दाली और मराठा सेनापति सदाशिव राव भाऊ के बीच 14 जनवरी 1761 को वर्तमान पानीपत के मैदान मे हुआ जो वर्तमान समय में हरियाणा में है, इस युद्ध में तोपची इब्राहीम ख़ाँ गार्दी ने मराठों का साथ दिया था। दोआब के अफगान रोहिला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अहमद शाह अब्दाली का साथ दिया। अवध के तराई इलाक़े पर एक अफ़ग़ान सरदार नजीबुल्लाह का क़ब्ज़ा था। उसने अहमद शाह अब्दाली को भारत पर आक्रमण कर दिल्ली पर क़ब्ज़ा करने बुलाया था। उसने ही नजीबाबाद बसाया था।

नवाब नजीब-उद-दौला, जिसे नजीब खान के नाम से भी जाना जाता है, एक प्रसिद्ध रोहिल्ला मुस्लिम योद्धा और मुगल साम्राज्य और दुर्रानी साम्राज्य दोनों का रणनीतिकार योद्धा था। नजीब-उद-दौला 18 वीं शताब्दी के रोहिलखंड में एक प्रसिद्ध रोहिल्ला आदिवासी प्रमुख था, जिन्होंने 1740 के दशक में बिजनौर जिले में नजीबाबाद बसाया और “नवाब नजीब-उद-दौला” की उपाधि धारण की। 1757 से 1770 तक वह देहरादून पर शासन करते हुए सहारनपुर का गवर्नर था। वह मुगल सम्राट आलमगीर द्वितीय के एक समर्पित सैनिक था; बाद में अपने करियर में उन्हें नवाब नजीब-उद-दौला के नाम से जाना जाने लगा। उस अवधि के कई स्थापत्य अवशेष नजीबाबाद में हैं, जिन्हें उन्होंने मुगल मंत्री के रूप में अपने करियर की ऊंचाई पर बनवाए थे। उन्होंने सफदरजंग को वजीर के रूप में उत्तराधिकारी बनाया।

नजीब-उ-दौला की मृत्यु के बाद, उनका पुत्र जबीता खान  उनका उत्तराधिकारी बना। उनका कब्रिस्तान आज भी नजीबाबाद में है। नजीबाबाद में सुल्ताना डाकू या “द सुल्तान बैंडिट” का अड्डा था। जिसके खंडहर अभी भी नजीबाबाद में स्थित है। नजीबाबाद शहर को “हिमालय का प्रवेश द्वार” और “शहरों का शहर” के रूप में भी जाना जाता है।

उत्तर प्रदेश का पिछड़ापन उजागर होने लगा। दो घंटे चलने के बाद उत्तराखंड के ऊधमपुर ज़िले का इलाक़ा लगते ही साफ़ सफ़ाई और विकास के दर्शन हुए। एक ढ़ाबे पर खाना खाकर रामनगर की तरफ़ यात्रा शुरू की। अब मुरादाबाद जनपद लग गया।

मुरादाबाद उत्तर प्रदेश में एक ज़िला, आयुक्त और नगर निगम है। मुरादाबाद राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली से 167 किमी की दूरी पर और राज्य की राजधानी लखनऊ से 344 किमी उत्तर-पश्चिम में रामगंगा नदी के तट पर स्थित है। मुगल बादशाह शाहजहां के तहत कटेहर के सिपाहसालार रुस्तम खान ने बादशाह के सबसे छोटे बेटे राजकुमार मुराद बख्श के नाम पर बस्ती का मुरादाबाद नाम रखा था। इसकी स्थापना के तुरंत बाद, बादशाह ने संभल को भी कटेहरा के अधीन कर दिया। मुरादाबाद को बाद में 1740 में अली मोहम्मद खान द्वारा रोहिलखंड राज्य में मिला दिया गया था। पहले रोहिल्ला युद्ध में रोहिलों के पतन के बाद 1774 में अवध राज्य के नियंत्रण में आ गया था और फिर 1801 में नवाब द्वारा ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया था। उन्नीसवीं शताब्दी की शुरुआत में, रोहिलखंड क्षेत्र को रामपुर की रियासत और दो जिलों – बरेली और मुरादाबाद में विभाजित किया गया। उत्तर प्रदेश के उसी मुरादाबाद ज़िला की एक बड़ी बस्ती काशीपुर से उत्तराखंड के नैनीताल ज़िले में प्रवेश किया।

अंग्रेज वन्य जन्तुओं की रक्षा करने के शौकीन थे। सन् 1935 में रामगंगा के इस अंचल को वन्य पशुओं के रक्षार्थ सुरक्षित किया गया। उस समय के गवर्नर मालकम हेली के नाम पर इस पार्क का नाम ‘हेली नेशनल पार्क’ रखा गया। स्वतंत्रता मिलने के बाद इस पार्क का नाम ‘रामगंगा नेशनल पार्क’ रख दिया गया। विश्व में जिम कार्बेट नाम एक प्रसिद्ध शिकारी के रूप में प्रसिद्ध हो गया था। जिम कार्बेट जहाँ अचूक निशानेबाज थे वहीं वन्य पशुओं के प्रिय साथी भी थे।

आज यह पार्क इतना समृद्ध है कि इसके अतिथि-गृह में 200 अतिथियों को एक साथ ठहराने की व्यवस्था है। यहाँ आज सुन्दर अतिथि गृह, केबिन और टेन्ट उपलब्ध है। खाने का उत्तम प्रबन्ध भी है। ढिकाला में हर प्रकार की सुविधा है तो मुख्य गेट के अतिथि-गृह में भी पर्याप्त व्यवस्था है।

रामनगर रेलवे स्टेशन से 12 कि॰मी॰ की दूरी पर ‘कार्बेट नेशनल पार्क’ का गेट है। रामनगर रेलवे स्टेशन से छोटी गाड़ियों, टैक्सियों और बसों से पार्क तक पहुँचा जा सकता है। बस सेवाएँ भी उपलब्ध हैं। दिल्ली से ढिकाला तक बस आ-जा सकती है। यहाँ पहुँचने के लिए रामनगर कालागढ़ मार्गों का भी प्रयोग किया जा सकता है। दिल्ली से ढिकाला 297 कि॰मी॰ है। दिल्ली से गाजियाबाद- हापुड़- मुरदाबाद- काशीपुर- रामनगर होते हुए ढिकाला तक का मार्ग है। मोटर की सड़क अत्यन्त सुन्दर है।

पहाड़ी हिमालय का तराई क्षेत्र फिर शुरू हो गया। रामनगर पहुँच कॉर्बेट राष्ट्रीय उद्यान के गेट पर पहुँचे। जिप्सी की बुकिंग कर हल्की बूंदाबाँदी के बीच तीन घंटे पार्क भ्रमण किया। दोपहर के समय खुले क्षेत्र में हिरण, नीलगाय, मोर दिखे लेकिन राजा साहिब किसी गुफा में आरामतलबगीर थे।

फिर कॉर्बेट संग्रहालय देखा। उनके साहसिक जीवन और लेखन की यादों के साथ कुछ समय वहाँ गुज़ारा। अब हम एक बहुत ही शानदार इंसान जिम कार्बेट के इलाक़े में हैं। उनकी कहानी न सिर्फ़ रोचक बल्कि रोमांचक भी है।

एडवर्ड ज़िम कॉर्बेट (25 जुलाई 1875 – 19 अप्रैल 1955) एक ब्रिटिश शिकारी, वन्यप्रेमी, प्रकृतिवादी और लेखक थे, जिन्होंने भारत में कई आदमखोर बाघों और तेंदुओं का शिकार करके भोलेभाले ग्रामीणों को भययुक्त किया था। उन्होंने ब्रिटिश भारतीय सेना में कर्नल का पद धारण किया और उनको तात्कालिक आगरा और अवध के संयुक्त प्रांतों की सरकार द्वारा आदमखोर बाघों और तेंदुओं को मारने के लिए बुलाया जाता था।

जिम कॉर्बेट का जन्म कुमाऊं के नैनीताल शहर में ब्रिटिश परिवार में 25 जुलाई 1875 को हुआ था। वह क्रिस्टोफर विलियम कॉर्बेट और उनकी दूसरी पत्नी मैरी जेन की आठवीं संतान थे। मैरी जेन के पहले पति आगरा के डॉ चार्ल्स जेम्स डॉयल थे, जिनकी मृत्यु 1857  के संग्राम में इटावा में हो गई थी। मैरी जेन अपने तीन बच्चों के साथ नैनीताल भाग कर जान बचाने में कामयाब रहीं। क्रिस्टोफर कॉर्बेट सैन्य सेवा से निवृत्त होने के बाद नैनीताल शहर के पोस्टमास्टर नियुक्त होकर 1862 में नैनीताल चले गए थे। उनकी पहली पत्नी की मृत्यु हो चुकी थी। नैनीताल में उनकी मुलाक़ात मैरी जेन  से हुई। दोनों ने शादी कर ली। उन दोनों के नौ बच्चे हुए, क्रिस्टोफर कॉर्बेट के रिश्तेदार के 1857 संग्राम में मारे गए, रिश्तेदारों के तीन बच्चे और मैरी जेन के तीन बच्चे इस प्रकार पंद्रह बच्चों के भीड़ भरे परिवार में ज़िम का उम्रदराज़ नम्बर ऊपर से चौदहवाँ था। परिवार नैनीताल में रहता था परंतु सर्दियों में तलहटी में चला जाता था, जहाँ उनके पास गाँव में “अरुंडेल” नामक एक झोपड़ी थी, जो अब कालाढुंगी के नाम से एक बड़ी बस्ती हो गई  है।

1891 तक कुमांऊँ कमिश्नरी में कुमांऊँ, गढ़वाल और तराई के तीन जिले शामिल थे। उसके बाद कुमांऊँ को अल्मोड़ा व नैनीताल दो जिलों में बाँटा गया। ट्रैल, लैशिगंटन, बैटन, सर हेनरी रामसे आदि विभिन्न कमिश्नरों ने कुमांऊँ में समय-समय पर विभिन्न सुधार तथा रचनात्मक कार्य किए। जमीन का बंदोबस्त, लगान निर्धारण, न्याय व्यवस्था, शिक्षा का प्रसार, परिवहन के साधनों की उपलब्धता के कारण अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान कुमांऊँ की खूब उन्नति हुई। हेनरी रामसे के विषय में बद्रीदत्त पांडे लिखते हैं- ‘उनको कुमांऊँ का बच्चा-बच्चा जानता है। वे यहाँ के लोगों से हिल-मिल गए थे। घर-घर की बातें जानते थे। पहाड़ी बोली भी बोलते थे। किसानों के घर की मंडुवे की रोटी भी खा लेते थे।’ अंग्रेजों ने शासन व्यवस्था में पर्याप्त सुधार किए, वहीं अपने शासन को सुदृढ़ बनाने के लिए कठोरतम न्याय व्यवस्था स्थापित की, जो अब नैनीताल के उच्च न्यायालय के रूप में साकार है।

मैरी जेन यूरोपीय लोगों के बीच नैनीताल के सामाजिक जीवन में बहुत प्रभावशाली महिला थीं और वह एक तरह की रियल एस्टेट एजेंट बन गईं। क्रिस्टोफर विलियम 1878 में पोस्टमास्टर के पद से सेवानिवृत्त हुए। 21 अप्रैल 1881 को दिल का दौरा पड़ने के कुछ सप्ताह बाद उनकी मृत्यु हो गई। जिम तब छह वर्ष के थे और उनके सबसे बड़े भाई टॉम ने नैनीताल के पोस्टमास्टर के रूप में पदभार संभाला। बहुत कम उम्र से, जिम कालाढुंगी में अपने घर के आसपास के जंगलों और वन्य जीवन पर मोहित हो गया था। लगातार भ्रमण से उन्होंने अधिकांश जानवरों और पक्षियों को उनकी आवाज़ से पहचानना सीखा। समय के साथ वह एक अच्छा ट्रैकर और शिकारी बन गया। उन्होंने ओक ओपनिंग स्कूल में अध्ययन किया, जो नैनीताल में फिलेंडर स्मिथ कॉलेज, जिसे बाद में हैलेट वॉर स्कूल के रूप में जाना जाता है, और अब बिड़ला विद्या मंदिर, नैनीताल में विलय हो गया। उन्नीस साल की उम्र से पहले उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और बंगाल और उत्तर पश्चिम रेलवे में नौकरी कर ली। शुरू में एक ईंधन निरीक्षक के रूप में काम किया, और बाद में बिहार के मोकामा घाट पर गंगा के पार माल के ट्रांस-शिपमेंट के लिए एक ठेकेदार के रूप में काम किया। जिम कॉर्बेट ने मोकामा घाट पर रेलवे कर्मचारियों के लिए एक स्कूल शुरू किया।

अपने जीवन के दौरान जिम कॉर्बेट ने कई आदमखोर तेंदुओं और बाघों का पता लगाया और उन्हें गोली मार कर इलाक़े के बाशिंदों को डर से निजात दिलाई। लगभग एक दर्जन अच्छी तरह से प्रलेखित आदमखोर थे। कॉर्बेट ने अपनी पुस्तकों में मानव हताहतों का ब्योरा प्रदान किया है, जिसमें रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ, चंपावत टाइगर और द टेंपल टाइगर और कुमाऊं के आदमखोर शामिल हैं। ब्रिटिश और भारतीय सरकारों के रिकॉर्ड के अनुसार इन आदमखोर ने 1,200 से अधिक पुरुषों, महिलाओं और बच्चों को मार डाला था। इसलिए आदमखोरों को जीने का अधिकार नहीं था।

पहला नामित आदमखोर बाघ, चंपावत टाइगर अनुमानित 436 प्रलेखित मौतों के लिए जिम्मेदार था। 1910 में पनार तेंदुआ था, जिसने कथित तौर पर 400 लोगों को मार डाला था। 1926 में रुद्रप्रयाग का आदमखोर तेंदुआ था, जिसने आठ साल से अधिक समय तक बद्रीनाथ की यात्रा करने वाले तीर्थयात्रियों को आतंकित किया, और 126 से अधिक मौतों के लिए जिम्मेदार बताया गया। उसके द्वारा मारे गए अन्य उल्लेखनीय आदमखोरों में तल्ला-देस आदमखोर, मोहन आदमखोर, ठक आदमखोर, मुक्तेसर आदमखोर और चौगढ़ बाघिन थे।

खतरनाक शिकारी खेल का पीछा करते हुए कॉर्बेट अकेले और पैदल शिकार करना पसंद करते थे। वह अक्सर एक छोटा कुत्ता रॉबिन के साथ शिकार करते थे, जिसके बारे में उन्होंने कुमाऊं के आदमखोरों किताब में लिखा था।

कॉर्बेट ने 1920 के दशक के अंत में अपना पहला कैमरा खरीदा और अपने दोस्त फ्रेडरिक वाल्टर चैंपियन से प्रेरित होकर सिने फिल्म पर बाघों को रिकॉर्ड करना शुरू किया। हालाँकि उन्हें जंगल का घनिष्ठ ज्ञान था, लेकिन अच्छी तस्वीरें प्राप्त करना एक कठिन काम था, क्योंकि जानवर बेहद शर्मीले थे।

उन्होंने कुमाऊं हिल्स में भारत के पहले राष्ट्रीय उद्यान, हैली नेशनल पार्क की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसका नाम शुरुआत में लॉर्ड मैल्कम हैली के नाम पर रखा गया था। 323.75 किमी 2 (125.00 वर्ग मील) को कवर करने वाले हैली नेशनल पार्क के रूप में जाना जाने वाला एक आरक्षित क्षेत्र 1936 में बनाया गया था, जब सर मैल्कम हैली संयुक्त प्रांत के गवर्नर थे; और एशिया का पहला राष्ट्रीय उद्यान अस्तित्व में आया। 1954-55 में रिजर्व का नाम बदलकर रामगंगा नेशनल पार्क कर दिया गया और 1955-56 में इसका नाम बदलकर जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क कर दिया गया। इंडोचाइनीज टाइगर का नाम जिम कॉर्बेट के नाम पर 1968 में व्रातिस्लाव माज़क द्वारा रखा गया था, जो दक्षिण पूर्व एशिया में रहने वाले बाघ की नई उप-प्रजातियों का वर्णन करने वाले पहले व्यक्ति थे। 1968 में, बाघों की पांच शेष उप-प्रजातियों में से एक का नाम उनके नाम पर रखा गया था: पैंथेरा टाइग्रिस कॉर्बेटी, इंडोचाइनीज़ टाइगर, जिसे कॉर्बेट का बाघ भी कहा जाता है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२५ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २५ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

हरिद्वार

हरिद्वार शहर गंगा नदी के दक्षिणी किनारे पर शिवालिक पर्वतमाला की तलहटी में स्थित है। हरिद्वार कई प्रमुख तीर्थ स्थलों का प्रवेश द्वार है। धार्मिक आयोजनों में सबसे महत्वपूर्ण कुंभ मेला है, जो हर 12 साल में हरिद्वार में भरता है। हरिद्वार कुंभ मेले के दौरान लाखों तीर्थयात्री हरिद्वार में गंगा नदी में स्नान कर मोक्ष प्राप्ति की आकांक्षा से आते हैं।

समुद्र मंथन की पौराणिक मान्यता के अनुसार उज्जैन, नासिक और प्रयागराज (इलाहाबाद) के साथ हरिद्वार में अमृत की बूंदें घड़े से झलक गिरी थीं। जहां अमृत गिरा वह स्थान ब्रह्म कुंड हर की पौड़ी (भगवान के कदम) पर स्थित है और इसे हरिद्वार का सबसे पवित्र घाट माना जाता है। यह कांवड़ तीर्थयात्रा का प्रमुख स्थान भी है, जहाँ से लाखों श्रद्धालु गंगा का पवित्र जल लेकर शिव मंदिरों में चढ़ाने के लिए सैकड़ों मील दूर पैदल जाते हैं।

हरिद्वार भारतीय संस्कृति और विकास का बहुरूपदर्शक प्रस्तुत करता है। पवित्र ग्रंथों में, इसे कपिलस्थान, गंगाद्वार और मायापुरी के रूप में अलग तरह से निर्दिष्ट किया गया है। यह छोटा चार धाम (उत्तराखंड में चार प्रमुख तीर्थ स्थलों, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री) के लिए एक मुख्य पड़ाव  है।

शहर के आधुनिक नाम में दो वर्तनी हैं: हरिद्वार और हरद्वार। इन नामों में से प्रत्येक का अपना अर्थ है। संस्कृत में, हिंदू धर्म की प्रचलित भाषा, हरि का अर्थ है “भगवान विष्णु”, जबकि द्वार का अर्थ है “प्रवेश द्वार”। तो, हरिद्वार का अनुवाद “भगवान विष्णु का प्रवेश द्वार” है। क्योंकि यह आमतौर पर वह स्थान है जहां तीर्थयात्री भगवान विष्णु के एक प्रमुख मंदिर बद्रीनाथ के दर्शन करने के लिए अपनी यात्रा शुरू करते हैं। इसी तरह, हर का अर्थ “भगवान शिव” है। इसलिए, हरद्वार “भगवान शिव के प्रवेश द्वार” कैलाश पर्वत, केदारनाथ, सबसे उत्तरी ज्योतिर्लिंग और छोटे चार धाम तीर्थयात्रा सर्किट के स्थलों तक पहुंचने के लिए एक विशिष्ट स्थान है। पौराणिक कथा के अनुसार, हरिद्वार में देवी गंगा अवतरित हुईं जब भगवान शिव ने अपने बालों की जटाओं में गंगा नदी को धारण मृत्यलोक में अवतरित किया था। गंगा नदी, गंगोत्री ग्लेशियर के किनारे पर गौमुख स्रोत से 253 किलोमीटर (157 मील) बहने के बाद, हरिद्वार में पहली बार मैदान में प्रवेश करती है, जिसने शहर को इसका प्राचीन नाम गंगाद्वार दिया।

महाभारत के वनपर्व में ऋषि धौम्य ने युधिष्ठिर को भारत के तीर्थों के बारे में बताया, तब गंगाद्वार, यानी हरिद्वार और कनखल का उल्लेख किया गया है, यह भी उल्लेख है कि अगस्त्य ऋषि ने अपनी पत्नी लोपामुद्रा के साथ यहां तपस्या की थी। कहा जाता है कि ऋषि कपिला का यहां एक आश्रम है, जिसका प्राचीन नाम कपिला या कपिलस्थान है। पौराणिक राजा, भगीरथ, सूर्यवंशी राजा सागर (राम के पूर्वज) के परपोते के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने 60,000 पुरखों की मुक्ति के लिए, सतयुग में वर्षों की तपस्या से गंगा नदी को स्वर्ग से नीचे लाए थे। भगवान विष्णु ने हर की पौड़ी की ऊपरी दीवार में स्थापित पत्थर पर अपने पदचिह्न छोड़े थे, जहां हर समय पवित्र गंगा इसे छूती है।

पुरातत्व संबंधी निष्कर्षों से सिद्ध होता है कि इस क्षेत्र में 1700  ईसा पूर्व और 1200 ईसा पूर्व के बीच टेराकोट्टा संस्कृति मौजूद थी। हरिद्वार का प्रथम आधुनिक युग का लिखित प्रमाण एक चीनी यात्री ह्वेनसांग के वृत्तांतों में मिलता है, जो 629 ईस्वी में भारत आया था। राजा हर्षवर्धन (590-647) के शासनकाल के दौरान हरिद्वार को ‘मो-यू-लो’ के रूप में दर्ज किया गया, जिसके अवशेष अभी भी मायापुर में मौजूद हैं, जो आधुनिक शहर के दक्षिण में है। खंडहरों में एक किला और तीन मंदिर हैं, जिन्हें टूटी हुई पत्थर की मूर्तियों से सजाया गया है, उन्होंने मो-यू-लो के उत्तर में एक मंदिर की उपस्थिति का भी उल्लेख किया है, जिसे ‘गंगाद्वारा’ कहा जाता है। 13 जनवरी 1399 को यह शहर तैमूर लैंग (1336-1405) के अधीन आया।

गुरु नानक (1469-1539) ने हरिद्वार की अपनी यात्रा के दौरान, ‘कुशावर्त घाट’ पर स्नान किया, जिसमें प्रसिद्ध, ‘फसलों को पानी देना’ प्रकरण हुआ। गुरुद्वारा (गुरुद्वारा नानकवाड़ा) की दो सिख जन्मसखियों के अनुसार, यह यात्रा 1504 ईस्वी में बैसाखी के दिन हुई थी। बाद में उन्होंने गढ़वाल में कोटद्वार के रास्ते में कनखल का भी दौरा किया। 

आइन-ए-अकबरी, मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल के दौरान 16 वीं शताब्दी में अबुल फजल द्वारा लिखी गई, इसे माया (मायापुर) के रूप में संदर्भित करती है, जिसे गंगा पर हरद्वार के रूप में जाना जाता है, हिंदुओं के सात पवित्र शहरों के रूप में। इसमें आगे इसका उल्लेख है। अठारह कोस (प्रत्येक लगभग 2 किमी) लंबा है, और चैत्र की 10 तारीख को बड़ी संख्या में तीर्थयात्री इकट्ठा होते हैं। अपनी यात्रा के दौरान और घर पर रहते हुए, मुगल सम्राट, अकबर ने गंगा का पानी पिया जिसे उन्होंने ‘अमरता का पानी’ कहा। सोरुन और बाद में हरिद्वार में सीलबंद जार में भेजने के लिए विशेष लोग तैनात किए गए थे।

मुगल काल के दौरान, हरिद्वार में अकबर के तांबे के सिक्के के लिए टकसाल थी। ऐसा कहा जाता है कि अंबर के राजा मान सिंह ने वर्तमान शहर हरिद्वार की नींव रखी और हर की पौड़ी में घाटों का जीर्णोद्धार भी किया। कहा जाता है कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी अस्थियों को भी ब्रह्म कुंड में विसर्जित कर दिया गया था। सम्राट जहांगीर (1596-1627) के शासनकाल में इस शहर का दौरा करने वाले एक अंग्रेज यात्री थॉमस कोर्याट ने इसे शिव की राजधानी ‘हरिद्वार’ के रूप में वर्णित किया है।

सबसे पुराने जीवित शहरों में से एक होने के नाते, हरिद्वार का उल्लेख प्राचीन हिंदू शास्त्रों में मिलता है क्योंकि यह बुद्ध की अवधि से लेकर हाल के ब्रिटिश आगमन तक के जीवन और समय के माध्यम से बसा माना जाता है। हरिद्वार की एक समृद्ध और प्राचीन धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत है। इसमें अभी भी कई पुरानी हवेलियां हैं जिनमें उत्तम भित्ति चित्र और जटिल पत्थर का काम है।

गंगा नदी पर दो प्रमुख बांधों में से एक, भीमगोड़ा, यहाँ स्थित है। 1840 के दशक में निर्मित, यह गंगा के पानी को ऊपरी गंगा नहर की ओर मोड़ता है, जिससे आसपास की भूमि की सिंचाई होती है। हालांकि इससे गंगा के जल प्रवाह में गंभीर गिरावट आई, और अंतर्देशीय जलमार्ग के रूप में गंगा के क्षय का एक प्रमुख कारण है, जो 18 वीं शताब्दी तक ईस्ट इंडिया कंपनी के जहाजों द्वारा भारी उपयोग किया जाता था। गंगा नहर प्रणाली का मुख्यालय हरिद्वार में स्थित है। अप्रैल 1842 में काम शुरू होने के बाद 1854 में ऊपरी गंगा नहर खोली गई, नहर की अनूठी विशेषता रुड़की में सोलानी नदी के ऊपर आधा किलोमीटर लंबी एक्वाडक्ट है, जो मूल नदी से 25 मीटर (82 फीट) ऊपर नहर को उठाती है।

हरिद्वार संघ नगर पालिका’ का गठन 1868 में किया गया था, जिसमें मायापुर और कनखल के तत्कालीन गाँव शामिल थे। हरिद्वार पहली बार लक्सर के माध्यम से 1886 में रेलवे से जुड़ा था। जब अवध और रोहिलखंड रेलवे लाइन को रुड़की से सहारनपुर तक बढ़ाया गया था, इसे बाद में 1900 में देहरादून तक बढ़ा दिया गया था। 1901 में, इसकी जनसंख्या 26,597 थी और यह संयुक्त प्रांत के सहारनपुर जिले में रुड़की तहसील का एक हिस्सा था, और 1947 में उत्तर प्रदेश के निर्माण तक ऐसा ही रहा।

हरिद्वार तन, मन और आत्मा के थके हुए लोगों का धाम रहा है। यह विभिन्न कला, विज्ञान और संस्कृति के लिए भी आकर्षण का केंद्र रहा है। आयुर्वेदिक दवाओं और हर्बल उपचार के एक महान स्रोत के रूप में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय सहित अद्वितीय गुरुकुल (पारंपरिक शिक्षा का स्कूल) का घर है, जिसमें एक विशाल परिसर है, और पारंपरिक शिक्षा प्रदान कर रहा है। हरिद्वार के विकास ने 1960 के दशक में आधुनिक मंदिर की स्थापना के साथ, 1975 में एक ‘महारत्न पीएसयू’, की स्थापना के साथ एक गति पकड़ी, जो न केवल बीएचईएल की अपनी एक बस्ती को साथ लेकर आई, tबल्कि इस क्षेत्र में सहायक इकाइयों का एक समूह भी है। रुड़की विश्वविद्यालयहै। विज्ञान और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में सीखने के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित संस्थानों में से एक है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग-२४ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – ऋषिकेश-हरिद्वार – भाग- २४ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

ऋषिकेश-हरिद्वार

सामान्यत: ऋषिकेश जाने के लिए लोग हरिद्वार से होकर जाते हैं। देहरादून से एक सीधा रास्ता भी हरिद्वार जाता है। मसूरी से भी ऋषिकेश जाना चाहें तो पहाड़ों से गुज़रते आप ऋषिकेश पहुँच सकते हैं। मसूरी से आप सीधे यमनोत्री भी जा सकते हैं। वापसी लौटते समय पौंथी से रास्ता बदल कर टेहरी गढ़वाल से गंगोत्री भी जा सकते हैं। वहाँ से वापस ऋषिकेश आकर रुद्रप्रयाग पहुँचिए। रुद्रप्रयाग से केदारनाथ और बद्रीनाथ की यात्रा की जा सकती है। इस तरह ऋषिकेश छोटे चार धाम का प्रवेश द्वार है। ऋषिकेश (संस्कृत : हृषीकेश) उत्तराखण्ड के देहरादून जिले का एक हिन्दू तीर्थस्थल है। यह गढ़वाल हिमालय का प्रवेश्द्वार है। ऋषिकेश, हरिद्वार से 25 किमी उत्तर में तथा देहरादून से 43 किमी दक्षिण-पूर्व में स्थित है।

 ऋषिकेश

28 जुलाई 2021 को हम ग्यारह बजे के लगभग देहरादून से निकले। दाहिनी तरफ़ मैदान और बाईं तरफ़ हिमालय के पहाड़ बहुत सुंदर चित्रमय झांकी प्रस्तुत कर रहे थे। देहरादून से ऋषिकेश के रास्ते में एक स्थान थानो और भोगपुर गाँव के बीच एक पहाड़ी बड़ा झरना बरसाती पानी से बह रहा था। सामने से एक कार आती दिखी वह इस पार निकल आई। उसे निकलती देख हमारी टेक्सी के ड्रायवर मुबारक खान ने हमारी गाड़ी भी झरना पार करने को आगे बढ़ा दी। लेकिन हमारी तरफ़ पानी का बहाव तेज था। गाड़ी के आगे पानी का सैलाब बढ़ता गया और गाड़ी निकलने के पहले गाड़ी के चकों ने ज़मीन छोड़ दी और चके रेत में फ़्री घूमने लगे। गाड़ी में पानी भरने लगा। ड्राईवर को गाड़ी का एंजिन चालू रखने बोलकर तुरंत कार का दरवाज़ा खोलकर नीचे उतरना मुनासिब समझा क्योंकि कार के भीतर तेज़ी से पानी भरने लगा था। यदि आटोमेटिक लॉक बंद हो जाए और गाड़ी में पानी भरता रहे तो जान के लाले पड़ सकते थे। इसलिए कार का गेट खोलकर जैसे ही बाहर निकले कार के अंदर तेज़ी से पानी भर गया। सभी को बाहर निकालना पड़ा। सबने मिलकर खूब धक्के लगा कर गाड़ी निकालने की कोशिश की। राहगीरों की भीड़ लगने लगी। दो लड़के मोटर साईकिल से भोगपुर की तरफ़ जा रहे थे। उन्होंने आकर गाड़ी को धक्का देकर निकालने में मदद की। लेकिन गाड़ी हिली तक नहीं।

गाड़ी को धक्का लगाने के प्रयास में हमारा एक मोबाईल पानी में गिर गया। बहुत ढूँढा पर नहीं मिला। सब घबरा गए। बहुत कोशिश की गाड़ी नहीं निकली। दूसरे मोबाईल से उत्तराखंड राज्य के रेस्कू टीम को 112 पर खबर दी। इसके पहले उनकी टीम आए। आठ दस लोग आ गए। उनमें एक बड़ी बोलेरो लोडिंग गाड़ी भी थी। पास में ही जुगाड़ का तार मिल गया। कार को तार से बांध कर गाड़ी खींच कर बाहर निकाली। जान में जान आयी।

धक्का लगाने वालों में एक लड़के का नाम न्यूटन आस्टिन था। वह ईसाई प्रचारक था। उसे पानी में गिरे मोबाईल मिलने पर सूचना देने हेतु अपना नम्बर देकर हम ऋषिकेश की तरफ़ बढ़ गए। ऋषिकेश पहुँचने पर उसका संदेश आया कि हमारा मोबाईल मिल गया है। उसे लेने बीस किलोमीटर दूर उनके घर पहुँचना होगा। हम ऋषिकेश भ्रमण करके उनके घर पहुँचे। उन्होंने चाय नाश्ता कराया और हमारा मोबाईल हमें दिया। हमने उन्हें मिठाई के लिए पाँच सौ रुपए देकर उनसे बिदा ली। गाड़ी में पानी भरने से लग़ेज में रखे हमारे सारे कपड़े गीले हो गए। एक भी कपड़ा सूखा नहीं बचा। 

ऋषिकेश हिमालय का प्रवेश द्वार है। जहाँ गंगा पर्वतमालाओं को पीछे छोड़ समतल धरातल की तरफ तेज़ी से आगे बढ़ती जाती है। ऋषिकेश का शान्त वातावरण कई विख्यात आश्रमों का घर है। उत्तराखण्ड में समुद्र तल से 1360 फीट की ऊँचाई पर स्थित ऋषिकेश भारत के पवित्र तीर्थस्थलों में एक है। हिमालय की निचली पहाड़ियों और प्राकृतिक सुन्दरता से घिरे इस धार्मिक स्थान से प्रवाहित गंगा नदी इसे अतुल्य बनाती है। ऋषिकेश को केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री का प्रवेशद्वार माना जाता है। हर साल यहाँ के आश्रमों में बड़ी संख्या में तीर्थयात्री ध्यान लगाने और मन की शान्ति के लिए आते हैं। विदेशी पर्यटक भी यहाँ आध्यात्मिक सुख की चाह में नियमित रूप से आते रहते हैं।

ऋषिकेश से सम्बन्धित अनेक धार्मिक कथाएँ प्रचलित हैं। कहा जाता है कि समुद्र मन्थन के दौरान निकला विष शिव ने इसी स्थान पर पिया था। विष पीने के बाद उनका गला नीला पड़ गया और उन्हें नीलकण्ठ के नाम से जाना गया। शिव ने केदार में गंगा को जटा में इसी स्थान पर ऋषि स्वरुप धारण कर केश से गंगा को हरिद्वार में अवतरित किया था। जहाँ गंगा ने विष्णु की चरण वंदना कर मैदान में प्रवेश किया था। एक अन्य अनुश्रुति के अनुसार भगवान राम ने वनवास के दौरान यहाँ के जंगलों में कुछ समय व्यतीत किया था। रस्सी से बना लक्ष्मण झूला इसका प्रमाण माना जाता है। विक्रमसंवत 1996 में लक्ष्मण झूले का पुनर्निर्माण किया गया। यह भी कहा जाता है कि ऋषि रैभ्य ने यहाँ ईश्वर के दर्शन के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान हृषीकेश के रूप में प्रकट हुए। तब से इस स्थान को ऋषिकेश नाम से जाना जाता है।

गंगा नदी के एक किनारे को दूसरे किनारे से जोड़ता लक्ष्मण झूला नगर की विशिष्ट पहचान है। इसे विक्रम सम्वत् 1996 में वर्तमान रूप दिया गया था। कहा जाता है कि गंगा नदी को पार करने के लिए लक्ष्मण ने इस स्थान पर जूट का झूला बनवाया था। झूले के बीच में पहुँचने पर वह हिलता हुआ प्रतीत होता है। 450 फीट लम्बे इस झूले के समीप ही लक्ष्मण और रघुनाथ मन्दिर हैं। झूले पर खड़े होकर आसपास के खूबसूरत नजारों का आनन्द लिया जा सकता है। लक्ष्मण झूला के समान राम झूला भी नजदीक ही स्थित है। यह झूला शिवानन्द और स्वर्ग आश्रम के बीच बना है। इसलिए इसे शिवानन्द झूला के नाम से भी जाना जाता है। ऋषिकेश मैं गंगाजी के किनारे की रेत बड़ी ही नर्म और मुलायम है, इस पर बैठने से यह माँ की गोद जैसी स्नेहमयी और ममतापूर्ण लगती है, यहाँ बैठकर दर्शन करने मात्र से असीम शान्ति और रामत्व का उदय होने लगता है। ऋषिकेश में स्नान करने का प्रमुख घाट है जहाँ प्रात: काल में अनेक श्रद्धालु पवित्र गंगा नदी में डुबकी लगाते हैं। इसी स्थान से गंगा नदी दायीं ओर मुड़ जाती है। गोधूलि वेला में यहाँ की नियमित पवित्र आरती का दृश्य अत्यन्त आकर्षक होता है।

स्वामी विशुद्धानन्द द्वारा स्थापित आश्रम ऋषिकेश का सबसे प्राचीन आश्रम है। स्वामी जी को ‘काली कमली वाले’ नाम से भी जाना जाता था। इस स्थान पर बहुत से सुन्दर मन्दिर बने हुए हैं। यहाँ खाने पीने के अनेक होटल हैं जहाँ केवल शाकाहारी भोजन ही परोसा जाता है। आश्रम के आसपास हस्तशिल्प के सामान की बहुत सी दुकानें हैं।

लगभग 5,500 फीट की ऊँचाई पर स्वर्ग आश्रम की पहाड़ी की चोटी पर नीलकण्ठ महादेव मन्दिर स्थित है। कहा जाता है कि भगवान शिव ने इसी स्थान पर समुद्र मन्थन से निकला विष ग्रहण किया था। विषपान के बाद विष के प्रभाव  से उनका गला नीला पड़ गया था और उन्हें नीलकण्ठ नाम से जाना गया था। मन्दिर परिसर में पानी का एक झरना है जहाँ भक्तगण दर्शन करने से पहले स्नान करते हैं।

भरत मंदिर ऋषिकेश का सबसे प्राचीन मन्दिर है जिसे आदि गुरू शंकराचार्य ने बनवाया था। भगवान राम के छोटे भाई भरत को समर्पित यह मन्दिर त्रिवेणी घाट के निकट ओल्ड टाउन में स्थित है। मन्दिर का मूल रूप 1398 में तैमूर आक्रमण के दौरान क्षतिग्रस्त कर दिया गया था। हालाँकि मन्दिर की बहुत सी महत्वपूर्ण चीजों को उस हमले के बाद आज तक संरक्षित रखा गया है। मन्दिर के अन्दरूनी गर्भगृह में भगवान विष्णु की प्रतिमा एकल शालीग्राम पत्थर पर उकेरी गई है। आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रखा गया श्रीयन्त्र भी यहाँ देखा जा सकता है।

लक्ष्मण झूले को पार करते ही कैलाश निकेतन मन्दिर है। 12 खण्डों में बना यह विशाल मंदिर ऋषिकेश के अन्य मन्दिरों से भिन्न है। इस मंदिर में सभी देवी देवताओं की मूर्तियाँ स्थापित हैं।

ऋषिकेश से 22 किलोमीटर की दूरी पर 3,000 साल पुरानी वशिष्ठ गुफा बद्रीनाथ-केदारनाथ मार्ग पर स्थित है। इस स्थान पर बहुत से साधुओं विश्राम और ध्यान लगाए देखे जा सकते हैं। कहा जाता है यह स्थान भगवान राम और बहुत से राजाओं के पुरोहित वशिष्ठ का निवास स्थल था। वशिष्ठ गुफा में साधुओं को ध्यानमग्न मुद्रा में देखा जा सकता है। गुफा के भीतर एक शिवलिंग भी स्थापित है। यह जगह पर्यटन के लिये बहुत मशहूर है।

राम झूला पार करते ही गीता भवन है जिसे 2007 में श्री जयदयाल गोयन्दकाजी ने बनवाया था। यहां रामायण और महाभारत के चित्रों से सजी दीवारें इस स्थान को आकर्षण बनाती हैं। यहां एक आयुर्वेदिक डिस्पेन्सरी और गीताप्रेस गोरखपुर की एक शाखा भी है। प्रवचन और कीर्तन मन्दिर की नियमित क्रियाएँ हैं। शाम को यहां भक्ति संगीत का आनन्द लिया जा सकता है। तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए यहाँ सैकड़ों कमरे हैं।

ऋषिकेश से नीलकण्ठ मार्ग के बीच मोहनचट्टी स्थान आता है जिसका नाम है फूलचट्टी, यह स्थान बहुत ही शान्त वातावरण का है यहाँ चारो और सुन्दर वादियाँ है। नीलकण्ठ मार्ग पर मोहनचट्टी आकर्षण का केंद्र बनता है |

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान का अस्पताल परिसर 400 मीटर के दायरे में फैला है देखने योग्य भव्य ईमारत है, इसके कई भाग हैं-ट्रॉमा सेण्टर, Emergency आदि।

ऋषिकेश घूमकर आठ बजे रात को हरिद्वार लेवल होटल में रुके। होटल के चारों तरफ़ खाने-पीने की दुकानों का अम्बार लगा था लेकिन बाहर निकलने को कपड़े ही नहीं थे इसलिए होटल के ज़रूरत से ज़्यादा महँगे मीनू कार्ड से भिंडी मसाला और चपाती का सेवन कमरे में किया।

जब सामान खोल कर देखा तो सभी कपड़े और अन्य सामान पानी से तरबितर मिले। यह तय किया कि सभी कपड़ों की गीज़र के गर्म पानी में निथार कर सुखाए जाएँ। दस-बारह हैंगर मंगा कर उनमें कपड़े फँसाकर पंखे की हवा में सूखने डाले। कपड़ों से टपकता पानी देख श्रीमती जी ने एक लम्बी रस्सी ढूँढ निकाली उसे कमरे में आरपार बांधने की कोशिश दो घंटे होती रही लेकिन कपड़ों के वज़न से रस्सी टूट जाती थी। हारकर कपड़ों को यहाँ वहाँ फैलाया। सौम्या ने एक प्रेस करने वाली स्त्री मंगा ली। दूसरे दिन पहनने के लिए एक जींस और दो टॉप प्रेस से सुखा लिए। दो बजे रात तक यही सब चलता रहा।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “Mind–Body Connection.. कसे?”  – मूळ लेखक व अनुवादक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – सौ. मंजुषा सुनीत मुळे ☆

सौ. मंजुषा सुनीत मुळे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “Mind–Body Connection.. कसे?”  – मूळ लेखक व अनुवादक : अज्ञात ☆ प्रस्तुती – सौ. मंजुषा सुनीत मुळे ☆

“Mind–Body Connection” 

: किंवा अंतिम प्लासिबो इफेक्ट.

काठीच्या आधाराने चालणाऱ्या वृद्ध पुरुषांचा एक गट एका घरात शिरला… आणि आठवड्याभराने ते धावत बाहेर पडले!

ना औषध, ना शस्त्रक्रिया.

… फक्त त्यांच्या मेंदूतला एक छोटासा स्विच ‘ऑन’ केल्यामुळे.

कसे? …

 

ही घटना १९७९ साली घडली.

हार्वर्ड विद्यापीठातील एक अत्यंत बुद्धिमान मानसशास्त्रज्ञ – डॉ. एलेन लॅंगर – यांनी काहीतरी विलक्षण करण्याचा निर्णय घेतला. त्यांना टाइम ट्रॅव्हल करायचे होते, पण कोणत्याही मशीनशिवाय.

 

त्यांनी जवळजवळ ८० वर्षांचे आठ वृद्ध पुरुष निवडले. काहींना काठीशिवाय चालता येत नव्हते, काहींचे हात थरथरत होते, काहींना मोतीबिंदू होता, तर काहींना स्वतःचे नावसुद्धा नीट आठवत नव्हते.

 

त्यांच्या मुलांना वाटले की त्यांच्या वडिलांना वृद्धाश्रमात पाठवले जात आहे.

पण त्यांना हे माहीत नव्हते की त्यांच्या वडिलांना १९५९ सालात पाठवले जात होते!

 

नाही, कोणतेही जादुई जग नव्हते.

डॉ. लॅंगर यांनी बोस्टनमधील एका जुन्या मठाची सजावट पूर्णपणे १९५९ च्या शैलीत केली होती. तिथे १९७९ चा कसलाही मागमूस नव्हता. टीव्ही काळा-पांढरा होता, त्यावर १९५९ मधील बातम्या आणि Ed Sullivan Show चालू होते. रेडिओवर त्या काळातील गाणी होती. मासिके, वर्तमानपत्रे—सगळेच वीस वर्षे जुने!

 

आता कथेतला पहिला धक्का…

 

ते आठ वृद्ध पुरुष तिथे पोहोचल्यावर त्यांना वाटले की कोणी तरी येऊन त्यांचे सामान खोलीत नेऊन देईल—जसं त्यांच्या घरी होत असे.

 

पण डॉ. लॅंगर ठामपणे म्हणाल्या,

“इथे कोणीही तुमची मदत करणार नाही. तुम्हालाच तुमच्या बॅगा उचलून न्याव्या लागतील. ”

 

ते चिडले, कुरकुरले.

पण पर्याय नसल्यामुळे जड सूटकेसेस घेऊन जिना चढले.

– – आणि तिथेच त्यांच्या मेंदूला पहिला संदेश गेला—

“मी असहाय नाही… मी हे करू शकतो. ”

 

एकच अट होती—या एका आठवड्यासाठी त्यांना असे वागायचे होते की साल १९५९ आहे.

 

त्यांना भूतकाळात बोलायचे नव्हते, फक्त वर्तमानकाळात.

उदा. “आत्ता राष्ट्राध्यक्ष आयझेनहॉवर काय करत आहेत? ”

किंवा “हवाना मध्ये कास्त्रो काय करत आहेत? ”

 

त्या काळातील राजकारण, खेळ, चित्रपट—सगळ्यांवर चर्चा करायची होती, जणू ते अजूनही तिथेच जगत होते… ज्या वयात त्यांच्यात जी ऊर्जा होती—५५–६० वर्षांची—त्याच ऊर्जेने बोलायचे होते.

 

पहिले दोन दिवस फार अवघड गेले. पण तिसऱ्या दिवसापासून एक विचित्र जादू सुरू झाली… 

 

संधिवातामुळे सरळ बसू न शकणारा माणूस आता जेवणाच्या टेबलावर ताठ बसून राजकारणावर वाद घालत होता.

ज्याला नीट ऐकू येत नव्हते, तो रेडिओचा आवाज कमी करून गाणी ऐकत होता.

 

.. ते संपूर्ण वातावरणच त्यांना सांगत होते—

“तुम्ही म्हातारे नाही… तुम्ही अजूनही मजबूत, मध्यमवयीन आहात. ”

 

सर्वात मोठा धक्का आठवड्याच्या शेवटच्या दिवशी बसला.

– – आश्रमासमोरील मैदानातले दृश्य पाहून डॉ. लॅंगर यांना स्वतःच्या डोळ्यांवर विश्वास बसत नव्हता.

आठवडाभरापूर्वी बसमधून उतरताना इतरांची मदत घेणारे हे वृद्ध पुरुष आता मैदानात ‘टच फुटबॉल’ खेळत होते! हो, फुटबॉल!

त्यांना धावताना पाहून असं वाटत होतं, जणू त्यांचे वय खरंच २० वर्षांनी कमी झाले आहे.

 

प्रयोगाच्या शेवटी जेव्हा त्यांची शारीरिक तपासणी झाली, तेव्हा डॉक्टरही थक्क झाले.

– – त्यांची पकड (grip strength) वाढली होती, सांध्यांची लवचिकता सुधारली होती, दृष्टी आणि श्रवणशक्तीही सुधारली होती! चष्म्याशिवाय लहान अक्षरे वाचता येत होती.

त्यांचा IQ स्कोअरही वाढला होता.

 

सगळ्यात रंजक गोष्ट म्हणजे—

प्रयोगापूर्वी आणि नंतरचे फोटो जेव्हा अशा लोकांना दाखवले गेले ज्यांना या प्रयोगाबद्दल काहीच माहीत नव्हते, ते म्हणाले,

“नंतरच्या फोटोमध्ये हे लोक खूपच तरुण दिसतात! ”

 

– – म्हणजे फक्त त्यांची भावना नाही, तर चेहऱ्यावरील सुरकुत्याही कमी झाल्या होत्या.

जैविकदृष्ट्याही त्यांचे वय मागे गेले होते!

 

डॉ. एलेन लॅंगर यांनी हे सिद्ध केले की जेव्हा आपण स्वतःला सांगतो—

“मी म्हातारा झालोय, आता माझ्याकडून होत नाही”—

तेव्हा आपले शरीर ते मान्य करते आणि हळूहळू बंद पडू लागते.

 

आपला समाज आपल्याला शिकवतो की म्हातारपण म्हणजे आजारपण.

आणि आपण तेच स्क्रिप्ट फॉलो करतो.

 

पण जेव्हा त्या वृद्ध लोकांचे वातावरण बदलले आणि त्यांना अजूनही तरुण आहोत असे वाटायला लावले, तेव्हा त्यांच्या शरीरानेही तसाच प्रतिसाद दिला.

 

– – यालाच म्हणतात “Mind–Body Connection” — किंवा अंतिम प्लेसिबो इफेक्ट!

 

म्हणून मित्रांनो,

कधी कधी म्हणता 

“मूड नाहीये, थकवा आलाय, माझ्याकडून नाही होणार…”

 

— तेव्हा जरा विचार करा 

८० वर्षांचे लोक फक्त विचार बदलून काठ्या फेकून देतात आणि फुटबॉल खेळतात, तर तू काय नाही करू शकणार?

.. तुझ्या मर्यादा शरीरात नाहीत, त्या मनात आहेत.

.. जेव्हा तू स्वतःला कमकुवत समजतोस, तेव्हा तू कमकुवत होतोस.

.. आणि जेव्हा तू स्वतःला सुपरहिरो समजतोस, तेव्हा मेंदू शरीराला तसा सिग्नल देतो.

 

फोन बाजूला ठेव, आरशात बघ आणि म्हण—

“मी बॉस आहे. माझ्या ऊर्जेला मर्यादा नाहीत. ”

 

माझ्यावर विश्वास ठेव—

तुझं शरीर ते ऐकायलाच लागेल.

 

सुरुवात कर.

जग तुझी वाट पाहत आहे!!!

*******

लेखक व अनुवादक : अज्ञात

प्रस्तुती : सौ. मंजुषा सुनीत मुळे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग-२३ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग- २३ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

सहस्त्रधारा देहरादून

सुबह दस बजे गेस्ट हाऊस से रवाना हुए। देहरादून से राजपुर सड़क से दाहिनी तरफ़ के रास्ते पर 16 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है रामपुर। इस गांव में बहने वाला गंधक झरना अपनी औषधीय गुणों के लिए बहुत प्रसिद्ध है। ऐसा माना जाता है की त्वचा से जुड़ी बीमारियों के लिये इस झरने से बहने वाला पानी बहुत उपयोगी होता है। विश्वास है कि इस झरने के पानी से नहाने पर कई तरह के त्वचा रोगों को खत्म किया जा सकता है।

पहाड़ियों के बीच से रिमझिम बारिश के साथ चलते हुए सहस्त्रधारा पहुँच गए। इस जगह का नाम सहस्त्रधारा रखे जाने का कारण बहुत रोचक है, इस जगह के पास स्थित पहाड़ो में बहुत छोटी-छोटी गुफाएं बनी है। इन सभी छोटी-छोटी गुफाओं के अंदर से बूंदों के रूप मे लगातार पानी टपकता रहता है। यह पानी एकत्र होकर बहुत सारी छोटी-छोटी धारा के रूप में आगे बढ़ता है। यहाँ बहने वाली पानी की छोटी-छोटी धाराएँ तलहटी में पहुंच कर एक बड़ी धारा का रूप ले लेती है इस वजह से इस जगह को सहस्त्रधारा कहा जाता है। पहाड़ो की तलहटी में बसे होने की वजह से प्राकृतिक रूप से भी बहुत ज्यादा सुंदर और मनमोहक जगह है। वर्तमान में सहस्त्रधारा एक पारिवारिक पिकनिक स्पॉट के रूप में बहुत ज्यादा प्रसिद्ध है।

मालसी डियर पार्क देहरादून

सहस्त्रधारा से देहरादून वापस लौटते समय राजपुर सड़क पर स्थित मालसी डियर पार्क पहुँचे। 22 एकड़ में फैला हुआ यह डियर पार्क परिवार और बच्चों के लिए सबसे शानदार जगहों में से एक है। इस पार्क के अंदर डियर के अलावा अन्य वन्यजीवों में मोर और नीलगाय, जैसे जानवर और पक्षी दिखाई देते है। बच्चों के मनोरंजन के लिए पार्क कुछ झूले भी लगाए हुए है। सप्ताहांत में स्थानीय निवासी मालसी डियर पार्क में आना बेहद पसंद करते है।

रोबर्स केव (गुचुपानी) देहरादून

रोबर्स केव देहरादून से 8 किलोमीटर दूर अनारवाला गांव में स्थित देहरादून का सबसे ज्यादा रोमांचक पर्यटक स्थल है। स्थानीय निवासी रोबर्स केव को गुचुपानी के नाम से पुकारते है। रोबर्स केव एक प्राकृतिक गुफा है जिसकी लंबाई लगभग 600 मीटर है।

इस गुफा की सबसे रोमांचक बात यह है की इस गुफा में पूरे साल घुटनों तक पानी बहता रहता है, इसलिए जब आप इस गुफा में प्रवेश करते है तो आपको एक अलग ही रोमांच महसूस होता है। आप जैसे-जैसे रोबर्स केव में अंदर जाते है तो कई जगह गुफा सँकरी हो जाती है। इस गुफा में वैसे तो पानी के मुख्य स्त्रोत अभी तक पता नहीं चला है लेकिन गुफा के अंदर लगभग 10 मीटर ऊंचाई से एक झरना गिरता है।

स्थानीय निवासियों का ऐसा मानना है की बहुत पहले इस जगह का उपयोग चोर और डाकू छुपने के लिए किया करते थे इस वजह से इस गुफा को रोबर्स केव के नाम से जाना जाने लगा। रोबर्स केव के आसपास स्थानीय निवासियों ने खाने पीने की दुकाने लगा रखी है। गुफा में आप के जूते या सैंडल खराब ना हो इसलिए अंदर पानी में चलने के लिए रोबर्स केव के पास आपको चप्पल भी किराए पर मिल जाएगी।

टपकेश्वर मंदिर देहरादून –

देहरादून से 5.5 किलोमीटर दूर गढ़ी केंट में एक प्राचीन शिव मंदिर है। यह प्राचीन शिव मंदिर गढ़ी केंट में बहने वाली एक छोटी नदी के किनारे पर बना हुआ है। इस प्राचीन मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से जाना जाता है। टपकेश्वर मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। ऐसा माना जाता है कि गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वथामा का जन्म इसी स्थान पर हुआ था।

आज भी इस प्राचीन शिवलिंग पर चट्टान से लगातार पानी की बूंदे टपकती रहती है इसलिये इस मंदिर को टपकेश्वर महादेव के नाम से पुकारा जाता है। टपकेश्वर महादेव मंदिर के पास एक छोटी नदी भी बहती है जिसमें यहाँ आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु नहाने का आनदं भी ले सकते है।

इस मंदिर और इस स्थान को लेकर गुरु द्रोण और उनके पुत्र अश्वथामा को लेकर एक रोचक कथा प्रचलित है। एक बार की बात है गुरु द्रोण के पुत्र अश्वथामा को एक बार बहुत जोर से भूख लगती है तो वह अपने माता पिता से पीने के लिए दूध मांगते है। गुरु द्रोण अपने पुत्र के दूध की मांग को पूरा करने में असमर्थता दिखाते है। गुरु द्रोण की इस बात से दुखी होकर अश्वथामा उसी समय भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिये तपस्या करने लग जाते है। कुछ समय के बाद अश्वथामा की तपस्या से प्रसन्न हो कर भगवान शिव तपस्या स्थल पर पर दूध की धारा बहा देते है और इस प्रकार अश्वथामा की भूख शान्त होती है। कहते हैं उस समय के बाद से ही यहाँ स्थित गुफा की चट्टान से शिवलिंग पर दूध की बूंदे टपक रही है। हमें दूध की बूँदें नहीं दिखीं। वहाँ एक पंडित जी ने बताया कि पापियों को दूध की बूँदें नहीं दिखतीं।

फारेस्ट रिसर्च इंस्टिट्यूट देहरादून

देहरादून में स्थित वन अनुसंधान संस्थान भारत का सबसे बड़ी प्राकृतिक अनुसंधान संस्थान है। देहरादून के घण्टाघर से वन अनुसंधान संस्थान की दूरी लगभग 6 किलोमीटर है। भारत में इसका निर्माण 1906 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान किया गया था। इस संस्थान की इमारत अपने ग्रीक-रोमन वास्तुशैली में बने हुए होने के कारण पूरे विश्व में प्रसिद्घ है। वन अनुसंधान संस्थान की इमारत का आकार भी इसकी प्रसिद्ध का बहुत बड़ा कारण है, यह इमारत लगभग 450 हेक्टेयर क्षेत्र में बनी हुई है।

वन अनुसंधान संस्थान में वानिकी से जुड़े छह संग्रहालय बने हुए है। इन छह संग्रहालय में जंगल-विज्ञान, कीट-विज्ञान, सामाजिक वानिकी, गैर-लकड़ी से बने वन उत्पाद, प्रकृति विज्ञान और लकड़ी की अलग-अलग किस्म का प्रदर्शन किया गया है। इस संस्थान में संग्रहालय के अलावा यहाँ बना हुआ उद्यान भी पर्यटकों के आकर्षण का विशेष केंद्र रहता है। फ़िल्म इंडस्ट्री की कुछ बड़ी फिल्मों का फिल्माकंन भी इसी वन अनुसंधान संस्थान में किया गया है। वनस्पति विज्ञान और जंगल विज्ञान से जुड़े हुए लोगों के लिए यह संस्थान किसी खजाने से कम नहीं है। वन अनुसंधान संस्थान के अंदर फोटोग्राफी पूरी तरह से प्रतिबंधित है। 

झंडा जी दरबार साहिब

देहरादून में झंडा दरबार साहिब सिख समुदाय की धार्मिक आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है, और देहरादून के नामकरण का इतिहास भी झंडा गुरु दरबार साहिब से जुड़ा हुआ है। बाबा राम राय (1745-1687) सातवें सिख गुरु हर राय के सबसे बड़े पुत्र और आठवें गुरु हर कृष्ण दास के भाई थे। औरंगज़ेब ने आठवें गुरु हर कृष्ण दास और राम राय में फूट डालने के उद्देश्य से राम राय को दिल्ली में सिक्ख पंथ की जड़ें मज़बूत करने हेतु कई सहूलियतें दीं और जिस जगह आज देहरादून आबाद है वहाँ गुरुद्वारा स्थापना हेतु मदद दी।

मंदिर का केंद्रीय परिसर गुरु राम राय की मृत्यु के बारह साल बाद 1699 में पूरा हुआ था, और पूरा संरचनात्मक कार्य 1703 और 1706 के बीच समाप्त हो गया था; माना जाता है कि संरचना के पूरा होने के बाद भी अलंकरण और पेंटिंग का काम लंबे समय तक चलता रहा। गुरु राम राय की पत्नी माता पंजाब कौर ने निर्माण कार्य की देखरेख की और 1741/42 में अपनी मृत्यु तक दरबार के मामलों का प्रबंधन किया।

राम राय सिख धर्म में एक अपरंपरागत संप्रदाय, रामरायस के संस्थापक थे। उन्होंने गुरु राम राय दरबार साहिब की स्थापना की, जो देहरादून में एक गुरुद्वारा है जिसे इंडो-इस्लामिक वास्तुकला शैली में बनाया गया था। उन्होंने गढ़वाल के समकालीन महाराजा फतेह शाह से राम राय को हर संभव मदद देने के लिए कहा। प्रारंभ में, धमावाला में एक गुरुद्वारा (मंदिर) बनाया गया था। वर्तमान भवन, गुरु राम राय दरबार साहिब का निर्माण 1707 में पूरा हुआ था। दीवारों पर देवी-देवताओं, संतों, संतों और धार्मिक कहानियों के चित्र हैं। फूलों और पत्तियों, जानवरों और पक्षियों, पेड़ों, नुकीली नाकों वाले समान चेहरे और मेहराबों पर बड़ी-बड़ी आँखों के चित्र हैं जो कांगड़ा-गुलेर कला और मुगल कला की रंग योजना के प्रतीक हैं। ऊंची मीनारें और गोल शिखर मुस्लिम वास्तुकला के नमूने हैं। सामने 230 गुणा 80 फीट का विशाल तालाब वर्षों से पानी की कमी के कारण सूख गया था। लोग कूड़ा फेंक रहे थे; इसे पुनर्निर्मित और पुनर्जीवित किया गया है। मुगल शैली से बनी हुई एक इमारत है।

झंडा गुरु दरबार साहिब में प्रत्येक वर्ष झंडा पर्व मनाया जाता है। देहरादून में होने वाला यह झंडा पर्व होली के दिन से पांच दिन बाद मनाया जाता है जो आठ दिन तक चलता है। यहाँ होने वाले झंडा पर्व में लाखों की संख्या में गुरु राम राय के अनुयायी और सिख धर्म से जुड़े हुए श्रद्धालु दर्शन करने के लिए आते है।

बुद्ध मोनेस्ट्री

देहरादून से 11 किलोमीटर दूर स्थित बुद्ध मोनेस्ट्री जिसे Mindrolling Monastery के नाम से भी जाना जाता है। बौद्ध धर्म को बढ़ावा देने के लिये इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कुछ बौद्ध भिक्षुओं द्वारा गया। जापानी वास्तुशैली में निर्मित इस बौद्ध मंदिर का निर्माण कार्य 1965 में पूरा हुआ।  

बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले और बहुत सारे देशी और विदेशी पर्यटक आते है। इस बौद्ध मंदिर के प्रमुख आकर्षण केन्द्र यहाँ स्थित 103 फ़ीट ऊंची भगवान बुद्ध की प्रतिमा और मंदिर के अंदर बनाई गई सुंदर पेंटिंग्स है। इन पेंटिग्स में भगवान बुद्ध के पूरे जीवन को बहुत ही सुंदर तरीके से उकेरा गया है।

इसके अलावा इस मंदिर की पांच मंजिला इमारत भी अपने वास्तुकला की वजह से पर्यटकों का ध्यान आकर्षित करती है। इस मंदिर की इमारत की ऊंचाई कुल 220 फ़ीट है और मंदिर की चौथी मंजिल से बहुत ही मन मोहक प्राकृतिक दृश्य दिखाई देते है। यहाँ आने वाले पर्यटकों की सुविधा के लिये मंदिर के परिसर में ही खाने पीने की दुकानें बनी हुई है और अगर आप की बौद्ध धर्म में रुचि है तो आप यहाँ से बौद्ध धर्म से जुड़ी पुस्तकें भी खरीद सकते है।

देहरादून के आस पास घूमने के लिए कुछ प्रसिद्ध पर्यटन स्थल  – धनोल्टी, नई टिहरी, टिहरी झील, ऋषिकेश, नरेंद्र नगर, नाग टिब्बा, राजाजी राष्ट्रीय उद्यान, मालसी डियर पार्क, मसूरी, हरिद्वार, चम्बा, दशावतार मंदिर, जोरांडा फाल्स, बरेहिपानी और न्यू टेहरी टाउनशिप, माताटीला डैम और देओगढ़ किला है। पर्यटक यहाँ पर कई एडवेंचर स्पोर्ट जैसे रिवर राफ्टिंग, बंजी जम्पिंग, रॉक क्लाइम्बिंग, हाईकिंग और ट्रैकिंग का आनंद भी ले सकते हैं। पेशेवर कैंप पर्यटकों को रुकने के साथ साथ अन्य सुविधाएं भी उपलब्ध करते है।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मी प्रवासिनी ☆ आमची थोडी धार्मिक, आध्यात्मिक आणि निसर्ग सहल…! ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे

☆ आमची थोडी धार्मिक, आध्यात्मिक आणि निसर्ग सहल… ☆ सौ.उज्वला सुहास सहस्त्रबुद्धे ☆

“केल्याने देशाटन, पंडित मैत्री, सभेत संचार, शास्त्र, ग्रंथ विलोकन मनुजा चातुर्य येतसे फार! “

फार पूर्वीपासून आपण हा श्लोक ऐकत आलो आहोत. पूर्वीच्या काळी प्रवास, सभा, दूर वर जाऊन शास्त्रांचा अभ्यास या गोष्टी थोड्या अवघड होत्या… त्यामुळे हे ज्याच्या हातून घडत असेल तो हुशार, चतुर आणि पंडित समजला जाई, पण काळ इतका झपाट्याने बदलला आहे की, आता फोन, मोबाईल, गुगल यामुळे जग क्षणात जवळ येत आहे. सुदैवाने आम्ही या बदलत्या काळात राहिलो आहोत. त्यामुळे आम्ही चौघी जावांनी ज्येष्ठ नागरिक असूनही स्वतःच्या जीवावर प्रथमच अशी लांबची ट्रिप आयोजित केली होती..

मुख्य म्हणजे साठे टूर्सचे मालक आमच्या नात्यातीलच असल्याने त्यांच्याकडून आम्हाला ट्रिप संबंधी सर्व मार्गदर्शन मिळाले. ट्रीपचा प्रत्येक दिवस एक एक स्थळ तसेच तेथील मुक्कामही त्यांनी आम्हाला बुक करून दिला होता. ट्रेनची तिकिटे, हॉटेल बुकिंग या दोन महत्त्वाच्या गोष्टी कळल्यावर आता ट्रिप ची तयारी करायला हरकत नाही असे वाटले. चौघींच्याही मुलांनी आम्हाला घराबाहेर पडायला प्रोत्साहन दिले हे विशेषच! अशा तऱ्हेने सर्व प्रकारची तयारी करून एक महिन्यापूर्वी आम्ही या ट्रिपसाठी पैसे भरले आणि आता शरीराने आणि मनाने ट्रिप साठी तयार झालो होतो. आत्ता पर्यंत नवऱ्याबरोबर फिरायची सवय, त्यामुळे महत्त्वाच्या गोष्टी त्यांच्याकडे सोपवल्या की, आम्ही फक्त कपड्यांच्या बॅगा भरणार! पण यावेळी सर्वच तयारी आपली आपण!

त्यातून कारवार, कर्नाटकात जायचं म्हणजे भाषेचा प्रश्न! पण आमच्या मोठ्या जाऊबाई कानडीच्या बऱ्यापैकी जाणकार असल्यामुळे त्यांनी ती बाजू सांभाळली. नंबर दोनच्या जाऊ बाई ही मार्गदर्शनाला तत्पर! मी आणि धाकटी जाऊ दोघींनी फायनान्स विभाग सांभाळला. ठराविक पैसे गोळा करून झालेला खर्च लिहिणे आणि पैसे सांभाळणे! असो, ही झाली ट्रीपची सुरुवात! नमनाला घडाभर तेल! प्रत्यक्षात ट्रिपचं वर्णन येणार आहेच!

आमचा उतू चाललेला उत्साह घेऊन 10- 1 -2026 रोजी रात्री पुणे रेल्वे स्टेशनवर जमलो, तेव्हा आम्ही पाल्य आणि आमची मुले पालक असल्याने नीट जा, काळजी घ्या, तब्येती सांभाळा, उगीच पळापळी करू नका वगैरे वगैरे सल्ले ते आम्हाला देत होते. आम्ही लहानपणी त्यांच्या मागे पळलो, आता ते आमच्या मागे! रिझर्वेशन मध्ये जागांची थोडी उलटापालट झाली होती. सर्वांची रिझर्वेशन तिकिटे वेगवेगळ्या कंपार्टमेंटमध्ये होती. , पण रात्रीचे अकरा वाजता ट्रेन सुटल्याने उद्या सकाळी बघू काही ॲडजस्टमेंट होते का? अशा विचाराने आम्ही आपापल्या 

बेडवर झोपलो. रात्री वेगवेगळी गावे, शहरे रेल्वे बरोबर मागे पडत होती. सकाळी सकाळी मिरज आले, पुढे रेल्वे कर्नाटकात शिरली आणि वातावरण बदलत गेले.

प्रत्येकीने ठरवल्याप्रमाणे लाडू, चिवडा, मेथी पराठे, गुळपोळ्या याशिवाय काही चटक-मटक पदार्थ घेतले होतेच, तरीही सकाळी इडली वडा हा गरम गरम नाश्ता आम्ही घेतला. गाडी जसजशी कर्नाटकात जात होती तशीच थंडी कमी जाणवू लागली पण बाहेरची हिरवी झाडी मनाला आनंद देऊ लागली!

 चौघी जावांच्या गप्पा तर अखंड चालू होत्या. बेळगाव नंतर लोंढ्याला ट्रेन ने ट्रॅक बदलला आणि वेग पकडला. संध्याकाळी पाचच्या दरम्यान उडपी स्टेशन आले.. आता बघायचे होते की, आपल्याला कोणती गाडी आणि ड्रायव्हर मिळणार आहे याची!

 आम्हाला गाडीचा नंबर आणि ड्रायव्हर कोण असेल ते कळवलेले होते, त्याप्रमाणे ‘जॉय’ या ड्रायव्हरची भेट झाली. “जॉय” खरोखरच जाॅयफुल, एनर्जेटिक माणूस होता! वयाने जेमतेम पंचविशीचा असेल पण त्याच्या कामात हुशार होता. त्याच्या कानडीला आमच्या मोठ्या वहिनी बरोबर समजून घेत होत्या. आम्ही आपले थोडा इंग्रजी, मराठीचा सहारा घेत संवाद करत होतो. सामान डिकीत टाकून आमची गाडी आमच्या पहिल्या हॉटेल मुक्कामावर गेली. हॉटेलचं नाव होतं ” *हॉटेल पर्ल”*

हॉटेल खरोखरच छान होतं! तिथे दोन खोल्यांचे बुकिंग होते. एका खोलीत नंबर १/२ आणि दुसऱ्या खोलीत नंबर ३/४ असा जावांचा क्रम होता. खोलीची पाहणी केली आणि प्रथम रूमवर चहा मागवला, फ्रेश झालो, तयार झालो, उडुपी ची फेरी मारायला बाहेर पडलो.

एका सरळ रस्त्याने जाऊन त्याच पावली परत येताना आईस्क्रीम आणि थोडी पोट पूजा केली आणि रूमवर परत आलो. कालची रात्र प्रवासात गेली होती, त्यामुळे आज रूमवर छान झोप लागली!

सकाळी ठरल्याप्रमाणे पहिली आवराआवरी करून उडपीच्या कृष्ण मंदिरात आलो. तिथे माझ्या तिन्ही जावांनी लिहिलेल्या भगवद्गीतेच्याप्रती दिल्या, प्रमाणपत्र घेतले. मी यात नसल्याने हॉलमध्ये बसले होते. तिथे लहान मुलांचा एक ग्रुप भगवद्गीता म्हणत होता. त्यांच्या मॅडमच्या मार्गदर्शनाखाली त्यांनी 2, 12 आणि 15 असे अध्याय म्हटले.. मला श्रवण भक्ती करता आली!

(आता गीता लिहिण्यासाठी मी आणली आहे, बघूया कधी संकल्प सुरू होईल आणि पूर्ण करेन)

त्यानंतर आम्ही प्रसादाच्या रांगेत उभे राहिलो तो अनुभव मात्र जरा जास्त त्रासदायक होता. गर्दी खूप होती, पण इतके कृष्णभक्त आहेत हे पाहून बरे वाटले. जवळपास दीड तास उभे राहिल्यावर दर्शन प्रसाद मिळाला. त्या दिवशी दुपारीच आम्ही मुरडेश्वर ला जायला निघालो. मुर्डेश्वर चे *आर एन एस गेस्ट* *हाऊस* वर आमचा दुसरा मुक्काम होता..

मुर्डेश्वर ला मसाल्याच्या पदार्थांची बरीच दुकाने होती. तिथे खरेदी करण्याचा मोह काही आवरला नाही! थोडे काजू घेतले. किरकोळ खरेदी म्हणत म्हणत बॅगा भरल्या जात होत्या!

हॉटेल समुद्राजवळच असल्याने मनसोक्त सागर दर्शन होत होते! शंकराचे मंदिर छानच! परिसर निसर्गरम्य असल्यामुळे खूपच छान वाटत होते. तिथे प्रसाद घेऊन दुपारी आम्ही गोकर्ण महाबळेश्वरला जाण्यास निघणार होतो.

आमचा ड्रायव्हर खूप उत्साही असल्यामुळे त्यांनी आम्हाला काही ठिकाणी स्वतः हून दाखवली. वाटेत एक मारुतीचे मंदिर बघायला मिळाले. सभोवतालचा निसर्ग बघत बघत आम्ही गोकर्ण महाबळेश्वरला निघालो होतो.. त्या छोट्याश्या प्रवासात आम्ही धारेश्वर आणि गुणवंतेश्वर ही दोन ठिकाणे पाहिली. त्या दिवशी मंगळवार असल्याने गणपती दर्शन मिळाले याचा आनंद वाटला!

13तारखेला सकाळी गोकर्ण महाबळेश्वर दर्शन खूप छान झाले. तरीही योगायोगाने काही अभिषेक वगैरे करायचा असल्यामुळे आम्हाला दुपारी पण देवळात जाऊन दर्शन घेता आले.

आम्हाला 14 तारखेला दुपारपर्यंत मडगाव येथे पोहोचायचे होते. मडगावहून निजामुद्दीन रेल्वे पकडायची होती.

14 तारखेच्या सकाळी हॉटेल वर भरगच्च नाश्ता करून सामानासह आम्ही बाहेर पडलो. ओम बीचवर गेलो, तेव्हा समुद्र पाहून मन प्रसन्न झाले. समुद्रात घुसलेल्या खडकांच्या एका रांगेने ओम चा आकार धारण केलेला आम्हाला दाखवला, संपूर्ण प्रवास समुद्राबरोबरच चालू होता, त्यामुळे मला तरी खूप छान वाटत होते! त्या बीच चे नाव ‘ *कुडले बीच’* असे होते. तिथे किनाऱ्यावर अनेक स्टॉल्स होते. ते पाहता पाहता किरकोळ खरेदी ही झालीच! वाटेत महाबलम् गुंफा पाहिली. शंकराचे वास्तव्य गुहेत पाहताना मन नेहमीच गंभीर होते!

ओम बीचवर फिरवून आमच्या सारथ्याने आम्हाला स्टेशनवर नेण्यासाठी गाडी काढली.. आमची ट्रेन 3-45वाजता होती. पण आम्ही सव्वा दोन वाजेपर्यंत स्टेशनवर पोहोचलो.

आता घराची ओढ लागली होती. खूप थकलो होतो… पाय भरभर उचलत नव्हते.. नाही- नाही म्हणत सामानाची एखादी पिशवी वाढली होतीच, त्यामुळे सामानासाठी कुली ठरवला आणि अर्थात ते बरेच झाले. कारण गाडी एक नंबर प्लॅटफॉर्मवर न लागता तीन किंवा चार नंबर वर येणार आहे.. अशी अनाउन्समेंट झाली. आम्ही चौघी सावकाशीने दादर चढून प्लॅटफॉर्म गाठला. कुली चांगला मिळाला. त्याने सामान चढवून दिले. इतरही लोकांनी आम्हाला मदत केली.

आता मात्र आम्हाला भूकही लागली होती.. सकाळच्या नाश्त्यानंतर खायला वेळच मिळाला नव्हता. संध्याकाळी दिप्ती ने आणलेल्या गुळपोळ्या आणि इतर किरकोळ खाऊ खाऊन आम्ही पुन्हा पसरलो.. परतीचा प्रवास झोपेतच झाला. पहाटे चार वाजता पुणे स्टेशनवर उतरलो. मस्त चहा प्यायलो. इतक्यात अद्वैतची गाडी आली आणि आम्हा सर्वांना सुखरूप घरी पोहोचता आले.. आत्तापर्यंत केलेले प्रवास हे थोडे कमी वयात आणि नवऱ्यांच्या जीवावर केलेले होते, पण स्वतंत्रपणे ठरवून चौघी जावांनी ही मोठी ट्रीप ठरवली आणि पार पाडली याचा निश्चितच आनंद झाला. पुन्हा नवीन ऊर्जा घेऊन आलो! वयानुसार सर्वांनाच आल्यावर दोन दिवस झोपावे लागले पण मिळालेला आनंद हा नक्कीच खूप होता! लगेच एकमेकींना फोन करून पुढची ट्रिप कधी करू या अशी विचारणाही आम्ही केली!

एकमेकीं बरोबर ट्रीप चे फोटो शेअर केले आणि पुनः प्रत्ययाचा आनंद घेतला!

© सौ. उज्वला सुहास सहस्रबुद्धे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग-२२ ☆ श्री सुरेश पटवा ☆

श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – उत्तराखंड तराई क्षेत्र – भाग- २२ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

5.उत्तराखंड तराई क्षेत्र – हरि के द्वार से नैनों के ताल तक  

किसी क्षेत्र विशेष का भौगोलिक और ऐतिहासिक अध्ययन करके वहाँ मनोरंजक रूप से घूमना पर्यटन कहलाता है और बिना अध्ययन के कहीं जाना घूमना कहलाता है। हिमालय पर्वत और हिंद महासागर स्थित विभिन्न स्थानों का पर्यटन लोगों को हमेशा से लुभाता रहा है। हिमालय पर्यटन में जम्मू-कश्मीर लद्दाख़, हिमाचल, नेपाल, सिक्किम, भूटान अब तक घूम चुके थे और उत्तराखंड के बद्रीनाथ और केदारनाथ घूम कर कुमायूँ और गढ़वाल के तराई वाले हिस्से छूटे थे। 24-31 जुलाई 2021 के बीच इनके पर्यटन को निकले।

 

उत्तराखंड के तराई इलाक़ों की यात्रा हेतु भोपाल से 24 जुलाई को तीन बजे शताब्दी एक्सप्रेस से रवाना हुए। ग्वालियर में सहकर्मी रहे मित्र राजीव दुबे ट्रेन पर मिलने आए और चिप्स के पैकेट एवं पेप्सी की बड़ी बोतल थमा गए। कुरकुरी नमकीन चिप्स चबाते और पेप्सी के घूँट हलक के नीचे उतारते राजीव के साथ ग्वालियर में 2006 से 2010 के बीच गुज़ारे दिन की मानसिक जुगाली में मुरेना निकल गया। मुरेना निकलते ही पुल की धड़धड़ाहट से चौंक कर नीचे देखा तो चम्बल लबालब यौवन से लकदक नवयौवना की तरह इठलाती चली जा रही थी। पेप्सी का घूँट गले के ऊपर रोककर नदी का सम बहाव निहारते वह पुल निकल गया, जिसके नीचे अप्रेल 2010 की झुलसती दोपहरी में बैंक के ऑडिटर के साथ चिल्ड बियर और मुर्ग़ मुसल्लम की दावत का लुत्फ़ उठाया था। ऑडिटर साहब को डाकू देखना था, उन्हें जयप्रकाश नारायण के समक्ष ऐच्छिक समर्पित एक बुजुर्ग डाकू से उसी पुल के नीचे मिलवाया था जिसके ऊपर से ट्रेन गुज़र रही थी।

 

चिप्स की कुरमुराहट के बीच धौलपुर स्टेशन निकलते ही दिमाग़ में डाकुओं के क़िस्से कुडमुँड़ाने लगे। माधौसिंह और पान सिंह तोमर के अलावा अत्याचार सहती बैंडिट क्वीन फूलन देवी और उनके पीछे भागती पुलिस के सिपाही के पैरों से रोंदे चम्बल के बीहड़ रिमझिम फुहार से नहाते नज़र आ रहे थे। सोचते-सोचते झपकी लग गई। उसके बाद घर से लाया खाना खाकर सिटिंग चेयर को पीछे झुकाकर एक हल्की नींद निकाली ही थी, तभी सवारियों की रेलमपेल में आँख खुली तो देखा रेलगाड़ी आगरा कैंट स्टेशन पर खड़ी है। एक भारी भरकम सवारी भारी भरकम सामान सहित पूरा कुनबा लेकर चढ़ी। उनकी कुर्सियाँ तो पक्की थीं परंतु सामान को ऊपर रखने को लेकर झिकझिक होने लगी। उन्होंने दूसरों का सामान हटा कर अपना सामान ज़माना शुरू किया तो आसपास की सवारियाँ भड़कने लगीं। आख़िर में सवारियों के हिसाब से सामान की जगह तय होकर व्यवस्था बनने ही जा रही थी। तभी एक जनानी सवारी ने साथ वाले से पूछा- मोटा पागल है क्या? पीछे से किसी सज्जन ने फुसफुसाती चुटकी ली कि लगता है अस्पताल से छुट्टी कराकर आए हैं। आगरा वाले भारी भरकम भाई साहब के तेज कानों ने सुन लिया। आधा घंटा हंगामेदार माहौल रहा। लोग मास्क हटाकर तुमुल युद्ध में शरीक हो गए। आगरा वाले भाई साहब बोले हाँ! हम तो ठीक होकर आ गए। आपको भर्ती कराए देते हैं। चुटकी वाले भाई साहब नींद का बहाना करते चिमाई दावे पड़े रहे। मामला ठंडा हुआ, तब सबको मास्क नाक पर चढ़ाने का ध्यान आया। तब तक मथुरा स्टेशन से वैंडरों की “मथुरा के पेड़े और आगरा का पेठा” आवाज़ें आने लगीं। फिर एक झपकी के बाद नींद खुली तो ट्रेन निज़ामुद्दीन स्टेशन से गुजर रही थी।

 

रात्रि को साढ़े ग्यारह बजे नई दिल्ली स्टेशन पर वेटिंग लाउंज में दस रुपए प्रति घंटे के हिसाब से भुगतान करके कमर सीधी करने लेटे परंतु यात्रियों के आने-जाने से ख़लल होता रहा, लिहाज़ा मुश्किल से दो घंटे नींद लगी। करवट बदलते छह बजे तक समय बिताया। फिर पता चला कि देहरादून शताब्दी रेलगाड़ी प्लेटफ़ार्म नम्बर एक के बजाय सोलह से रवाना होगी। प्लेटफ़ार्म नम्बर एक से सोलह तक की दो किलोमीटर की दूरी तय करके ट्रेन में जा बैठे। ट्रेन नियत समय पर चल पड़ी।

 

देहरादून शताब्दी की यात्रा सुखद रही। रेलगाड़ी तय समय से चली। ग़ाज़ियाबाद, मेरठ, मुज़फ़्फ़रनगर, सहारनपुर, रुड़की, हरिद्वार होते हुए देहरादून समय से पहले पहुँच गई। प्लेटफ़ार्म से बाहर निकले तो एक लम्बी क़तार कोविड की जाँच के लिए लगी थी। हम भोपाल के बंसल अस्पताल से कोविड जाँच रिपोर्ट साथ लेकर चले थे, इसलिए बिना किसी परेशानी के बाहर निकल टेक्सी में बैठ स्टेट बैंक के गेस्ट हाऊस पहुँच गए।

 

देहरादून में इंदिरा मार्केट, तिब्बत बाज़ार, पल्टन बाज़ार और राजपुर रोड पर दोनों तरफ़ दुकानों का जमावड़ा है। उत्तराखंड की राजधानी बनने के बाद देहरादून मैदानी इलाक़ों तरफ़ तेज़ी से बसना शुरू हो गया था। जिसकी रफ़्तार जारी है। हम शाम को शहर के हृदय स्थल घंटाघर पहुँचे। घंटाघर से लगे पल्टन बाज़ार घूमे वहाँ से एक रास्ता सीधा नगर के सबसे पुराने गुरुद्वारे पहुँचता है जहाँ गुरु रामराय ने दिल्ली से आकर डेरा रखा था। दून घाटी में डेरा रखने से यह स्थान देहरादून हो गया। वह गुरुद्वारा झण्डा गुरुद्वारा कहलाता है। वहाँ का होली पर मनाया जाने वाला रंग उत्सव प्रसिद्ध है। शाम को पल्टन बाज़ार और राजपुर रोड पर घूमते रहे। रात को देहरादून के प्रसिद्ध के सी सूप बॉर में चाइनीज़ खाना खाकर आराम किया।

 

25 जुलाई को रविवार का दिन था। देहरादून में लॉकडाउन था इसलिए गेस्ट हाऊस से निकलना सम्भव नहीं था। नाश्ता करके एक अच्छी नींद निकाली। दोपहर को लंच के बाद जिम कार्बेट की किताबें पढ़ते रहे। कुछ कहानियाँ साथ वालों को पढ़कर सुनाईं। शाम को अरविंद भैया की नातिन श्रद्धा सिसोदिया की बिटिया श्रुति सिसोदिया तंवर दामाद साहब सहित पधारीं। तीन घंटे उनके साथ गुज़ारे। वे जाते-जाते बहरूज की बिरयानी का ऑनलाइन आर्डर दे गईं। नौ बजे के लगभग बिरयानी की डेलिवरी प्राप्त हुई। भोजन करके आराम  किया।

 

 

मसूरी धनोल्टी

26 जुलाई 2021 को सुबह आठ बजे देहरादून गेस्ट हाऊस से मसूरी के लिए रवाना हुए। देहरादून 2001 में राजधानी और टेहरी बाँध बनने के बाद से तेज़ी से जनसंख्या के दबाव में फैलना शुरू हुआ था। वहाँ एक मात्र मुख्य सड़क राजपुर मार्ग के दोनों तरफ़ प्रीमीयम और साधारण फ़्लैट की भरमार हो गई है। आगे बढ़ने पर राजपुर रोड से एक रास्ता मसूरी को कट जाता है। मसूरी के लिए रास्ता कटते ही तराई से पहाड़ियों में यात्रा  शुरू होती है। एक तरफ़ ऊँचे पहाड़ और दूसरी तरफ़ गहरी खाईयों का न ख़त्म होने वाला सिलसिला आरम्भ होता है। चढ़ाई शुरू होते ही सड़क किनारे एक शिव मंदिर पड़ा। वहाँ सूचना लगी थी कि यह निजी मंदिर है इसमें कोई भी नगद या अन्य चढ़ावा न चढ़ाएँ। उल्टा आपको प्रसाद और चाय का सेवन कराया जाता है। बाजू में एक छोटा रेस्टोरेंट है जिसमें मंदिर की तरफ़ से पचास प्रतिशत अनुदान पर सामान मिलता है।

 

आधा घंटा चलने के बाद भट्टा जल प्रपात तक नीचे उतरने की ट्रोली सेवा की बुकिंग कुटिया आई। वहाँ से दो सौ रुपए का टिकट कटा कर ट्रोली में सवार हुए। ट्रोली का इंतज़ार कर रहे थे, तभी केंटीन वाला आया। उसकी चाय के दाम बीस रुपए था। यह सोचकर कि उनका रोज़ी रोज़गार का ज़रिया भी हम जैसे पर्यटक हैं। बीस रुपए की चाय गले के नीचे उतारी, तब तक ट्रोली का झूला आ गया। सवार होकर एक हज़ार फुट नीचे उतर चले। चारों तरफ़ बादलों से घेरे में लग रहा था कि स्वर्ग की यात्रा आरम्भ हो गई है। चिकोटी काट कर देखी तब पता चला कि पूरे होशोहवास में चीड़ चिनार देवदार के वृक्षों के बीच से हवा में तैरते चले जा रहे हैं।

 

रिमझिम बारिश की बूँदों के बीच भट्टा प्रपात पहुँचे तो पता चला कि मसूरी झील का पानी इस तरफ़ उतार पर झरना बनाकर एक प्रपात बनाता है। थोड़ी देर रुककर वापसी यात्रा करके टेक्सी में आ बिराजे। फिर तीखी चढ़ाई से गुज़रते हुए मसूरी पहुँच गए। परंतु हमने तय किया था कि अभी सीधे धनौल्टी जाएँगे जो मसूरी से और आगे तीस किलोमीटर ऊँचे पहाड़ों को पार करके आने वाला था। रास्ते में चार-दुकान पर्यटन स्थल आया। पता करने पर मालूम हुआ कि एक ऊँची पहाड़ी पर सचिन तेंदुलकर ने एक शाही फ़्लैट ख़रीदा था तब वे अपने दोस्तों के साथ यहाँ पधारे थे। उसी समय चार लोगों ने भीड़ की सेवा हेतु दुकान लगा ली थीं जिसमें सचिन ने साठ रुपए कप के हिसाब से दोस्तों के साथ चाय का सेवन किया था। वह स्पॉट चार-दुकान पोईंट नाम से प्रसिद्ध हो गया।

 

मसूरी बसावट की भी एक कहानी पता चली। देहरादून मध्य युग में औरंगज़ेब की सिक्खों में फूट डालने की नीति से बस चुका था। मसूरी बसने की राह देख रहा था। जिसे एक अंग्रेज ने शुरू किया। ईस्ट इंडिया कंपनी के लेफ्टिनेंट फ्रेडरिक यंग शिकार के लिए मसूरी आए। उन्होंने कैमल्स बैक रोड पर एक शिकार लॉज बनाया, और 1823 में दून के मजिस्ट्रेट बने। उन्होंने पहली गोरखा रेजिमेंट बनाई और घाटी में पहला आलू बोया। मसूरी में उनका कार्यकाल 1844 में समाप्त हुआ, जिसके बाद उन्होंने दीमापुर और दार्जिलिंग में सेवा की, अंत में एक जनरल के रूप में सेवानिवृत्त होकर आयरलैंड लौट आए। मसूरी में यंग का कोई स्मारक नहीं है। हालांकि, देहरादून में एक यंग रोड है जिस पर ओएनजीसी का तेल भवन खड़ा है। 1832 में, मसूरी भारत के महान त्रिकोणमितीय सर्वेक्षण का टर्मिनस था जो देश के दक्षिणी सिरे पर शुरू हुआ था। उस समय के भारत के महासर्वेक्षक जॉर्ज एवरेस्ट चाहते थे कि भारतीय सर्वेक्षण का नया कार्यालय मसूरी में स्थित हो। उसी वर्ष मसूरी में पहली बियर ब्रूवरी सर हेनरी बोहले द्वारा “द ओल्ड ब्रूवरी” के रूप में स्थापित की गई थी। 1850 में मैकिनॉन एंड कंपनी के रूप में सर जॉन मैकिनॉन द्वारा फिर से स्थापित किए जाने से पहले शराब की भठ्ठी दो बार खुली और बंद हुई। हिंद महासागर से बनकर उठे बादल पूरे देश में बारिश का मनभावन सुहावना मौसम रच कर हिमालय से रुककर तराई के इलाक़ों में अच्छी बारिश करते हुए पहाड़ों पर रुककर छाए रहते हैं। उन्ही के बीच से रास्ता गुजरता रहा।

 

मसूरी शांत और खूबसूरत जगह। हम समय बचाने के हिसाब से मसूरी पार करके सीधे धनौल्टी चले गए। धनौल्टी देवदार के जंगल से घिरा है। अब देवदार का जंगल ही इसकी पहचान बन चुका है। यहां रहने के लिए कुछ होटल बन गये है। गढवाल मंडल टूरिज्म का गेस्ट हाउस भी है। शहर की भीडभाड़ से दूर जाना चाहते हैं तो धनौल्टी अच्छी जगह है। मसूरी घूमने के बाद यहां ठहरा जा सकता है।

 

धनौल्टी काफ़ी शान्तिपूर्ण स्थल के रूप में भी जानी जाती है जिस कारण यहाँ पर्यटकों की भीड़ अधिक रहती है। लंबी जंगली ढलानें, ठंडी व शांत हवाएँ, स्थानीय लोगों द्वारा की जाने वाली मेहमान नवाजी, मनमोहक मौसम, बर्फ से ढंके पहाड़ यहाँ की ख़ास विशेषताओं में शामिल हैं, जो इस जगह को सुकूनभरी छुट्टियाँ बिताने के लिए एक आदर्श जगह बनाते हैं। देखने लायक़ जगहों में बारेहीपानी और जोरांडा फॉल्स, दशावतार मन्दिर, ईको-पार्क, सुरकंडा देवी, मन्दिर, हिमालयन वीवर्स, जैन मंदिर आदि शामिल हैं। सर्दियों में स्नो फॉल का मजा लेना चाहते हैं तो वहाँ जरूर जाएं। यहां देखने लायक कई जगह हैं। जैसे एप्पल गार्डन में घुड़सवारी का आनंद ले सकते हैं। यहां सालभर मौसम ठंडा रहता है। दिसंबर के बाद यहां बर्फबारी होना शुरू हो जाती है। धनोल्टी मै एडवेंचर से भरपूर 🏕️camping की अच्छी सुविधा है।

 

धनौल्टी से वापसी में मसूरी के दर्शनीय स्थल देखे। मसूरी में माल रोड प्रसिद्ध जगह है लेकिन बाज़ार बहुत महँगा है। देहरादून से माल लाकर वहाँ दुगुने-तिगुने दाम पर बेंचा जाता है। ख़रीदी के लिए देहरादून का पल्टन बाज़ार या इंदिरा मार्केट वाजिब है।

 

केम्पटी फाल याने जल प्रपात मसूरी से पंद्रह किलोमीटर है। एक बहुत छोटा पहाड़ी जल प्रपात चट्टानों को काटकर गिरता है। अंत में एवरेस्ट हाऊस देखने गए। यह एवरेस्ट के स्वामित्व में लगभग 11 वर्षों तक उनका निवास था। उन्होंने इसे जनरल व्हिश से खरीदा था। 1832 में बने इस घर को आज सर जॉर्ज एवरेस्ट हाउस एंड लेबोरेटरी या पार्क हाउस के नाम से जाना जाता है। यह घर पार्क एस्टेट में गांधी चौक/लाइब्रेरी बाजार (मसूरी में माल रोड के पश्चिमी छोर) से लगभग 6 किलोमीटर पश्चिम में स्थित है। इसके स्थान से एक तरफ दून घाटी और उत्तर में अगलर नदी घाटी और हिमालय श्रृंखला के मनोरम दृश्य दिखाई देते हैं। परंतु घाटियों में बादलों की जमघट होने के कारण हमें कुछ भी दिखाई नहीं दिया। अप्रेल-मई के महीनों में जब आसमान साफ़ होता  है तब घाटियों का दृश्य मनोरम होता है। दिसम्बर-जनवरी में बर्फ़वारी से घाटियाँ सफ़ेद चादर ओढ़ लेती हैं। भूमिगत पानी के कुंड हैं (या शायद बर्फ के भंडारण के लिए गड्ढे, क्योंकि क्षेत्र में पानी की कमी है) जो काफी गहरे हैं और घर के बाहर सामने के यार्ड में खुले पड़े हैं, कूड़े से भरे हुए हैं और फिसलने का खतरा है।

 

इंटीरियर को हटा दिया गया है लेकिन फायरप्लेस, छत, और दरवाजे और खिड़की के फ्रेम अभी भी बने हुए हैं। घर स्टील ग्रिल से सुरक्षित है और इसमें प्रवेश नहीं किया जा सकता है। यह संपत्ति बेहतर रूप से जानी जाती है और पहुंच मार्ग में सुधार किया गया है, दीवारों को भित्तिचित्रों से ढक दिया गया है और समय-समय पर साफ किया जाता है। इसका पूरी तरह जीर्णोद्धार और रखरखाव वांछित है।

 

 

27 जुलाई 2021 का दिन हमने देहरादून के दर्शनीय स्थलों के लिए तय कर रखा था क्योंकि एक दिन कठिन यात्रा के बाद दूसरा दिन थोड़ा आराम भरा होना चाहिए, नहीं तो लगातार थकान से घूमने का मज़ा जाता रहता है और पर्यटक ऊब का शिकार होने लगते हैं। इस समय चारों तरफ़ से घनघोर बारिश की खबरें आ रही हैं। हालाँकि हमने जिन स्थानों को चुना है वे बारिश के मौसम में जोखिम भरी नहीं मानी जाती परंतु फिर भी मौसम का क्या भरोसा। यही बात यात्रा को रोमांचक बनाती है।

 

देहरादून गढ़वाल इलाक़े का प्रमुख शहर और उत्तराखंड की राजधानी है। देहरादून दून घाटी में हिमालय की तलहटी में स्थित है, जो पूर्व में गंगा की एक सहायक सोंग नदी और पश्चिम में यमुना की सहायक आसन नदी के बीच स्थित है। यह शहर अपने सुरम्य परिदृश्य और थोड़ी हल्की ठंडी जलवायु के लिए जाना जाता है और आसपास के क्षेत्र के लिए प्रवेश द्वार प्रदान करता है। शहर समुद्र तल से 2,100 फुट की ऊंचाई पर स्थित है। देहरादून गढ़वाल शासकों के लिए एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है जिसे अंग्रेजों ने कुमायूँ-गढ़वाल के शासन का केन्द्र बना लिया था। इस शहर को उत्तराखंड हिमालय का प्रवेश द्वार भी कहा जाता है।

 

स्कंद पुराण में दून का उल्लेख केदारखंड नामक क्षेत्र के एक भाग के रूप में किया गया है, जो शिव का निवास स्थान है। हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन भारत में महाभारत महाकाव्य युग के दौरान, कौरवों और पांडवों के महान शिक्षक द्रोणाचार्य यहां रहते थे, इसलिए इसका नाम “द्रोणनगरी” पड़ा। शहर को देवभूमि (“देवताओं की भूमि”) के रूप में भी माना जाता है।

 

देहरादून उपनाम “दून वैली” का इतिहास रामायण और महाभारत की कहानी से जुड़ा है। ऐसा माना जाता है कि रावण और भगवान राम के बीच युद्ध के बाद, भगवान राम और उनके भाई लक्ष्मण ने इस स्थल का दौरा किया था। इसके अलावा, महाभारत में कौरवों और पांडवों के महान गुरु, द्रोणाचार्य के नाम पर ‘द्रोणनगरी’ के रूप में जाना जाता है। माना जाता है कि उनका जन्म और निवास देहरादून में हुआ था। देहरादून के आसपास के क्षेत्रों में प्राचीन मंदिरों और मूर्तियों से मिले साक्ष्यों को रामायण और महाभारत की पौराणिक कथाओं से जोड़ा गया है। ये अवशेष और खंडहर लगभग उतने ही पुराने माने जाते हैं। इसके अलावा, स्थान, स्थानीय परंपराएं और साहित्य महाभारत और रामायण की घटनाओं के साथ इस क्षेत्र के संबंधों को दर्शाते हैं। महाभारत की लड़ाई के बाद इस क्षेत्र पर पांडवों का प्रभाव था क्योंकि हस्तिनापुर के शासकों ने सुबाहू के वंशजों के साथ इस क्षेत्र पर सहायक के रूप में शासन किया था। इसी तरह, इतिहास के पन्नों में ऋषिकेश का उल्लेख है जब भगवान विष्णु ने संतों की प्रार्थना का जवाब दिया, राक्षसों का वध किया और संतों को भूमि सौंप दी। महाभारत के समय में चकराता नामक स्थान का ऐतिहासिक प्रभाव बताया जाता है।

 

सातवीं शताब्दी में, इस क्षेत्र को सुधानगर के नाम से जाना जाता था और चीनी यात्री ह्वेन त्सांग ने इसका वर्णन किया था। सुधानगर को बाद में कालसी के रूप में पहचाना जाने लगा। कालसी में यमुना नदी के किनारे के क्षेत्र में अशोक के शिलालेख पाए गए हैं जो प्राचीन भारत में इस क्षेत्र के महत्व को दर्शाते हैं। पड़ोसी क्षेत्र हरिपुर में, राजा रसला के समय से खंडहरों की खोज की गई थी जो इस क्षेत्र की समृद्धि को भी दर्शाते हैं।

 

ब्रिटिश राज के आरम्भिक दिनों में शहर का आधिकारिक नाम देहरा था। देहरादून दो शब्दों “देहरा” + “दून” से मिलकर बना है। देहरा शब्द “डेरा” से लिया गया है, जिसका अर्थ है शिविर और गढ़वाली भाषा में दून एक घाटी को कहते हैं। यह घाटी मध्य हिमालय और “शिवालिक” के बीच स्थित है। शहर की स्थापना तब हुई जब सातवें सिख गुरु, गुरु हर राय के पुत्र बाबा राम राय ने 1675 में इस क्षेत्र में अपना “डेरा” या शिविर लगाया। उस समय से आधुनिक देहरादून शहर का विकास शुरू हुआ। यह तब की बात है जब देहरा शब्द दून से जुड़ा और इस तरह इस शहर का नाम देहरादून पड़ा। आसपास की अन्य प्रमुख दून घाटियां कोटली दून, पाटली दून और पिंजौर दून हैं।

 

देहरादून के नाम का इस्तेमाल होने से पहले, जगह को पुराने नक्शों पर गुरुद्वारा (वेब ​​द्वारा एक नक्शा, 1808) या गुरुद्वारा (जेरार्ड द्वारा एक नक्शा, 1818) के रूप में दिखाया गया है। जेरार्ड के नक्शे में उस स्थान का नाम “देहरा या गुरुद्वारा” रखा गया है। इस मूल सिख मंदिर के चारों ओर कई छोटे गाँव थे जो अब आधुनिक शहर के कुछ हिस्सों के नाम हैं।

 

देहरादून पर गजनी के महमूद ने 1024 में, 1368 में तैमूर लंग ने, 1757 में रोहिल्ला प्रमुख नजीबउद्दौला और 1785 में गुलाम कादिर ने  आक्रमण किया था। नेपाली राजा पृथ्वी नारायण शाह ने 1806 में अल्मोड़ा, पठानकोट, कुमाऊं, गढ़वाल, सिरमुर, शिमला, कांगड़ा और देहरादून को एकजुट किया। पश्चिमी मोर्चे पर गढ़वाल और हिमाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों में पंजाब तक और पूर्वी मोर्चे पर सिक्किम राज्य से परे दार्जिलिंग तक एक संक्षिप्त अवधि के लिए नेपाल का हिस्सा रहा आया। ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी 1814 से 1816 तक ब्रिटिश-नेपाल युद्ध से उसे भारत में मिला लिया। युद्ध सुगावली की संधि पर हस्ताक्षर के साथ समाप्त हुआ जिसमें नेपाल ने अपने नियंत्रण का लगभग एक तिहाई ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया था। अंग्रेजों ने 1816 में देहरादून प्राप्त किया और 1827-1828 में लंढौर और मसूरी का विकास किया। भारत के पहले प्रधान मंत्री जवाहरलाल नेहरू देहरादून शहर के काफी शौकीन थे और अक्सर वहाँ जाते रहते थे। 1964 में दिल्ली में निधन से पहले उन्होंने अपने अंतिम कुछ दिन यहां बिताए। स्वतंत्रता आंदोलन के एक अन्य नेता, रास बिहारी बोस, जो ग़दर षडयंत्र भारतीय राष्ट्रीय सेना के प्रमुख आयोजकों में से एक थे जिसका मुख्यालय अपने शुरुआती दिनों में देहरादून में स्थित था। जिन्हें स्वतंत्रता संग्राम जारी रखने के लिए 1915 में जापान जाने के लिए मजबूर होना पड़ा था।

 

देहरादून का अफगान संबंध प्रथम आंग्ल-अफगान युद्ध (1839) से जुड़ा है, जिसके बाद अफगान अमीर दोस्त मोहम्मद खान (अफगानिस्तान के अमीर) को अंग्रेजों ने देहरादून में निर्वासित कर दिया था। वह 6 साल से अधिक समय तक मसूरी में रहे। मसूरी नगरपालिका के अंतर्गत आने वाले बालाहिसर वार्ड का नाम दोस्त मोहम्मद के महल के नाम पर रखा गया है। प्रसिद्ध देहरादून बासमती को उनके साथ अफगानिस्तान के कुनार प्रांत से लाया गया था और इसे आज भी घाटी के व्यंजन के रूप में गिना जाता है।

 

चालीस साल बाद, दूसरे एंग्लो-अफगान युद्ध के बाद, उनके पोते, मोहम्मद याकूब खान को 1879 में निर्वासन के लिए भारत भेजा गया था। अपने दादा की तरह, उन्होंने अपने निवास के रूप में दून घाटी को चुना। याकूब औपचारिक रूप से देहरादून में बसने वाला पहला अफगान बना। वर्तमान मंगला देवी इंटर कॉलेज कभी काबुल पैलेस था जहाँ याकूब ने अपने जीवन के कुछ साल बिताए थे।

 

अफगान शाही परिवार ने देहरादून में उपस्थिति बनाए रखी। यह अफगानिस्तान के अंतिम से दूसरे राजा मोहम्मद नादिर शाह का जन्मस्थान था। दो विचित्र महल – देहरादून में काबुल पैलेस और मसूरी में बाला हिसार पैलेस – अफगानिस्तान के साथ इस संबंध की गवाही देते हैं। वे इन अफगान शासकों द्वारा 20 वीं शताब्दी के शुरुआती भाग में भारत में निर्वासन में बनाए गए थे। बाला हिसार पैलेस को अब मसूरी के विनबर्ग एलन स्कूल में बदल दिया गया है।

 

अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ गनी ने उल्लेख किया है कि उनकी दादी देहरादून में पली-बढ़ी हैं। “मैं टैगोर की बात करता हूं क्योंकि मुझे टैगोर से प्रशिक्षित मेरी दादी ने पाला था जो देहरादून में रहती थीं …,” डॉ गनी ने भारत की दृष्टि और उल्लेखनीय परिवर्तन के बारे में बात करते हुए कहा।

 

देहरादून शहर मुख्य रूप से दून घाटी में स्थित है और क्लेमेंट टाउन 1,350 फीट की ऊंचाई पर है और मालसी 2,300 फीट से ऊपर है जो शहर से 15 किमी दूर है। मालसी लेसर हिमालयन रेंज का शुरुआती बिंदु है जो मसूरी और उससे आगे तक फैला हुआ है। देहरादून जिले में जौनसार-बावर पहाड़ियाँ समुद्र तल से 12,100 फीट ऊपर हैं। मसूरी का पहाड़ी क्षेत्र समुद्र तल से 6,135 से 6,617 फीट की ऊंचाई तक जाता है। इसकी भू-आकृति विज्ञान और मौसम संबंधी विशेषताएं इसे कई प्राकृतिक खतरों के प्रति संवेदनशील बनाती हैं। भूकंप के अलावा, यह क्षेत्र अक्सर भूस्खलन, बादल फटने, अचानक बाढ़, शीत लहरों और ओलावृष्टि से तबाह हो जाता है।

 

दून घाटी में रायवाला, ऋषिकेश, डोईवाला, हर्रावाला, देहरादून, हरबर्टपुर, विकासनगर, सहसपुर, सेलाकी, सुभाष नगर और क्लेमेंट टाउन सहित बस्तियां शामिल हैं। जिले में राजाजी राष्ट्रीय उद्यान है जो हाथियों का घर है, मसूरी में बेनोग वन्यजीव अभयारण्य और आसन संरक्षण रिजर्व (आसन बैराज)। दून घाटी में तराई और भाबर के जंगलों के साथ-साथ शिवालिक पहाड़ियाँ और मसूरी और चकराता जैसे हिल स्टेशन युक्त कम हिमालयी रेंज हैं। जिले की सीमा उत्तर में हिमालय, दक्षिण में शिवालिक पहाड़ियों की राजाजी रेंज, पूर्व में गंगा नदी और पश्चिम में यमुना नदी से लगती है। पर्वत श्रृंखलाओं की तलहटी में स्थित शहरों में सहस्त्रधारा, लाखमंडल, गौतम कुंड, चंद्रबनी, कालसी और डाकपत्थर शामिल हैं।

 

यह जिला दो प्रमुख भागों में विभाजित है: शिवालिक से घिरा मुख्य शहर देहरादून और हिमालय की तलहटी में स्थित जौनसार-बावर। उत्तर और उत्तर पश्चिम में यह उत्तरकाशी और टिहरी गढ़वाल जिले से, पूर्व और दक्षिण में पौड़ी गढ़वाल और गंगा नदी से, पश्चिम में, यह हिमाचल प्रदेश के शिमला और सिरमौर जिलों, हरियाणा के यमुनानगर जिले और टोंस और यमुना नदियाँ से घिरा है। दक्षिण में हरिद्वार और उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले हैं।

 

स्वतंत्रता के बाद देहरादून और गढ़वाल और कुमाऊं के अन्य हिस्सों को संयुक्त प्रांत में मिला दिया गया था जिसे बाद में उत्तर प्रदेश राज्य का नाम दिया गया था। उत्तर प्रदेश पुनर्गठन अधिनियम 2000 के तहत उत्तर प्रदेश के उत्तर-पश्चिमी जिलों से उत्तराखंड राज्य (जिसे पहले उत्तरांचल कहा जाता था) बनाकर देहरादून को इसकी राजधानी बनाया गया।

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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श्री सुरेश पटवा

(श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। अब आप प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकते हैं यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर)

? यात्रा संस्मरण – सगरमाथा से समुन्दर – लद्दाख़ यात्रा – भाग- २१ ☆ श्री सुरेश पटवा ?

अमृतसर पंजाब का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र शहर माना जाता है। सिक्खों का सबसे बड़ा गुरूद्वारा स्वर्ण मंदिर अमृतसर में है। ताजमहल के बाद सबसे ज्यादा पर्यटक अमृतसर के स्वर्ण मंदिर को ही देखने आते हैं। स्वर्ण मंदिर अमृतसर का दिल माना जाता है। अमृतसर का इतिहास गौरवमयी है। यह अपनी संस्कृति और लड़ाइयों के लिए बहुत प्रसिद्ध रहा है। अमृतसर अनेक त्रासदियों और दर्दनाक घटनाओं का गवाह रहा है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे बड़ा नरसंहार अमृतसर के जलियांवाला बाग में ही हुआ था। इसके बाद भारत पाकिस्तान के बीच जो बंटवारा हुआ उस समय भी अमृतसर में बड़े स्तर पर हत्याकांड हुआ। यही नहीं अफगान और मुगल शासकों ने इसके ऊपर अनेक आक्रमण किए और इसको कई बार बर्बाद किया। इसके बावजूद सिक्खों ने अपने दृढ संकल्प और मजबूत इच्छाशक्ति से इसे हर बार बसाया। हालांकि अमृतसर में समय के साथ काफी बदलाव आए हैं लेकिन आज भी अमृतसर की गरिमा बरकरार है।

स्वर्ण मंदिर अमृतसर का सबसे बड़ा आकर्षण है। इसका पूरा नाम हरमंदिर साहब है लेकिन यह स्वर्ण मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। अमृतसर शहर स्वर्ण मंदिर के चारों तरफ बसा हुआ है। स्वर्ण मंदिर में प्रतिदिन हजारों पर्यटक आते हैं। अमृतसर का नाम उस तालाब के नाम पर रखा गया है जिसका निर्माण गुरू रामदास ने अपने हाथों से कराया था। यह गुरू रामदास का डेरा हुआ करता था। अकबर ने गुरु रामदास को उस ज़मीन का पट्टा दिया था, जिस पर स्वर्ण मंदिर का निर्माण हुआ है।

हमने टैक्सी नियत पार्किंग में खड़ी कर दी। जूतों की उतराई-पहनाई और रखने-उठाने की मुश्किल से बचने के लिए, जूते वाहन में ही छोड़ दिए। पार्किंग से मंदिर प्रांगण तक़रीबन डेढ़-दो किलोमीटर रहा होगा। धूप तेज होने से पाँव जलने लगे। बाज़ार के बीच से होकर रास्ता था। छाया देखकर ठंडी जगह पर पैर रख कर चलते रहे। दुकानों पर लस्सी और सिकंजी की बहार थी। अधिकतर दुकाने कपड़ों की और कुछ जूते-चप्पल की दुकाने भी थीं। आधा घंटा में मंदिर परिसर पहुँच गये। परिसर में चोकोर परकोटा है। बीच में स्वर्णमंदिर चमचमाता नज़र आ रहा है। जिसकी प्रतिच्छाया सरोवर में झिलमिला रही है। मंदिर के दाहिने और बाएँ तरफ़ से परकोटा में प्रवेश द्वार हैं। हम बाएँ दरवाज़े से अंदर घुसे। हरमंदिर साहब का इतिहास याद आने लगा।

गुरुनानक, गुरु अंगददेव और गुरु अमरदास के बाद चौथे सिख गुरु रामदास ने अमृतसर में दरबार साहिब के नाम से मशहूर मंदिर बनाने की  शुरुआत 1577 में की थी और पांचवें गुरु अर्जन ने मंदिर की स्थापना का कार्य पूरा किया था। मंदिर को पूरा करने में आठ साल लगे थे। इसके निर्माण के बाद गुरु अर्जन ने सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ आदि ग्रंथ को स्थापित किया था। आदि ग्रंथ, सिखों द्वारा दस मानव गुरुओं के वंश के बाद अंतिम, संप्रभु और अनंत जीवित गुरु का रूप माना जाता है। इसमें 1,430 पृष्ठ हैं, जिनमें से अधिकांश को 31 रागों में विभाजित किया गया है।

सिखों और मुस्लिमों के बीच लंबे समय से चले विवाद से 1762 में मंदिर ध्वस्त हो गया था। 1776 में एक नया मुख्य प्रवेश द्वार, मार्ग और गर्भगृह का निर्माण पूरा हुआ, जबकि सरोवर  के चारों ओर पूल का काम 1784 में समाप्त हो गया।

रणजीत सिंह ने घोषणा की कि वह संगमरमर और सोने के साथ इसका पुनर्निर्माण करेंगे। मंदिर को 1809 में संगमरमर और मिश्रित सोना-तांबे में पुनर्निर्मित किया था, और 1830 में रणजीत सिंह ने सोने की पर्त के साथ गर्भगृह को सुसज्जित करने के लिए सोना दान किया।

मंदिर में अकाल तख्त भी मौजूद है जो ‘छठे गुरु का सिंहासन कहा जाता है। छठे गुरु हरगोबिंद द्वारा इसे बनवाया गया था। यह सिखों के लिए सत्ता के  पांच तख़्तों में से एक है। अकाल तख्त राजनीतिक संप्रभुता का प्रतीक है और ऐसी जगह है जहां सिख लोगों के आध्यात्मिक और लौकिक सरोकारों को संबोधित किया जाता है। हरमंदिर साहब में पूरे दिन गुरुबानी की स्वर लहरियां गुंजती रहती हैं। मंदिर परिसर में पत्थर का स्मारक लगा हुआ है। यह पत्थर जांबाज सिक्ख सैनिकों को श्रद्धाजंलि देने के लिए लगा हुआ है।

सिक्ख गुरूग्रंथ साहिब में आस्था रखते हैं। उनके लिए गुरू ही सब कुछ हैं। स्वर्ण मंदिर में प्रवेश करने से पहले वह मंदिर के सामने सर झुकाते हैं, फिर पैर धोने के बाद सीढ़ियों से मुख्य मंदिर तक जाते हैं। सीढ़ियों के साथ-साथ स्वर्णमंदिर से जुडी हुई सारी घटनाएं और इसका पूरा इतिहास लिखा हुआ है। स्वर्ण मंदिर बहुत ही खूबसूरत है। इसमें रोशनी की सुन्दर व्यवस्था की गई है। सिक्खों के अलावा भी बहुत से श्रद्धालु यहां आते हैं। उनकी स्वर्ण मंदिर और सिक्ख धर्म में अटूट आस्था है। हमने परकोटा से मंदिर की परिक्रमा करके लंगर में प्रसादी ग्रहण की और परिसर से वापस निकले।  

अमृतसर एक भयानक जलियांवाला बाग हत्याकांड का गवाह रहा है। 13 अप्रैल 1919 को इस बाग में एक सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा को बीच में ही रोकने के लिए जनरल डायर ने बाग के एकमात्र रास्ते को अपने सैनिकों के साथ घेर लिया और भीड़ पर अंधाधुंध गोली बारी शुरू कर दी। इस गोलीबारी में बच्चों, बूढ़ों और महिलाओं समेत लगभग 300 लोगों की जान गई और 1000 से ज्यादा घायल हुए। यह घटना को इतिहास की सबसे दर्दनाक घटनाओं में से एक माना जाता है। जलियांवाला बाग हत्याकांड इतना भयंकर था कि उस बाग में स्थित कुआं शवों से पूरा भर गया था। अब इसे एक सुन्दर पार्क में बदल दिया है और इसमें एक संग्राहलय का निर्माण भी कर दिया है। इसकी देखभाल और सुरक्षा की जिम्मेदारी जलियांवाला बाग ट्रस्ट की है। यहां पर सुन्दर पेड लगाए गए हैं और बाड़ बनाई गई है। इसमें दो स्मारक भी बनाए गए हैं। जिसमें एक स्मारक रोती हुई मूर्ति का है और दूसरा स्मारक अमर ज्योति है।

बारह बजे अमृतसर से पठानकोट होते हुए धर्मशाला के लिए रवानगी डाली। पंजाब की उर्वरा ज़मीन पर बासमती चावल की खेती लहरा रही है। सफ़ेद बगुले कुलाँचे भरते मटरगश्ती में संलग्न हैं। अमृतसर से पठानकोट तक छै लेन की मज़बूत सड़क बन गई है। सबसे पहले बटाला आया। बटाला पंजाब राज्य के गुरदासपुर ज़िले का एक शहर है। बटाला एक मुख्य औद्योगिक केन्द्र है और पंजाब के महत्वपूर्ण माझा सांस्कृतिक क्षेत्र का एक केन्द्रबिन्दु माना जाता है। फिर धारीवाल आया। धारीवाल गुरदासपुर जिले में पंजाब का 5 वां सबसे बड़ा शहर और अपनी ऊनी मिल के लिए सबसे प्रसिद्ध है। यह शहर अपर बारी दूबा नदी के तट पर स्थित है जो व्यास नदी में मिलती है। वहाँ से गुरदासपुर 13 किमी दूर है।  

गुरदासपुर की स्थापना 17वीं शताब्दी की शुरुआत में पनियार गांव के एक ब्राह्मण गुरिया जी ने की थी। उन्होंने गुरदासपुर के लिए सांगी गोत्र के जाट समुदाय से जमीन खरीदी थी। उन्ही के नाम पर गुरदासपुर नाम पड़ा। गुरिया जी के दो पुत्र थे-नवल राय और पाला जी। नवल राय के वंशज गुरदासपुर में बस गए। गुरु नानक देव की पत्नी का मायका गुरदासपुर में था।

भारत के विभाजन से पहले, गुरदासपुर जिले का भविष्य लंबे समय तक तय नहीं किया गया, क्योंकि यह मुसलमान बहुल था। सीमा सीमांकन समिति द्वारा प्रारंभिक योजना पठानकोट (उस समय गुरदासपुर जिले का हिस्सा) को पाकिस्तान और शकरगढ़ को भारत में रखने की बात थी। हालांकि, बाद में निर्णय की बारीक ट्यूनिंग के रूप में इसके विपरीत किया गया। यानी शकरगढ़ पाकिस्तान को दिया गया था और गुरदासपुर जिला (पठानकोट के साथ) भारत को दिया गया। गुरदासपुर ब्यास और रावी नदियों के बीच एक शहर है। इसमें गुरदासपुर जिले का प्रशासनिक मुख्यालय है, जो पाकिस्तान के साथ सीमा साझा करता है।

अंत में, रैडक्लिफ अवार्ड के तहत, केवल एक तहसील शकरगढ़- को पाकिस्तान में स्थानांतरित कर दिया गया, और शेष जिला भारत के साथ रख दिया। गुरदासपुर जिले से कई मुसलमान पाकिस्तान चले गए; सिख और हिंदू सीमा पार कर भारत आ गए। भारी मात्रा में हिंसक वारदातें हुईं। गुरदासपुर भारत को देने का दबाव नेहरू-पटेल का था। पाकिस्तान को भरोसा था कि मुस्लिम बहुल होने से और सीमा पर होने से गुरदासपुर उन्हें मिलेगा तो जम्मू-कश्मीर भारत से पूरी तरह कट जाएगा। वह उसे अधिग्रहण कर लेगा। जब पाकिस्तान ने देखा कि गुरदासपुर उन्हें पूरा नहीं मिला तो उन्होंने कश्मीर में क़बायली हमला शुरू करवा दिए। गुरदासपुर ज़िले में गुरुद्वारा दरबार साहिब, करतारपुर – सबसे प्रसिद्ध सिख गुरुद्वारों में से एक, जहाँ सिख गुरु नानक देव ने अपने अंतिम दिन बिताए थे।

धारीवाल के बाद पठानकोट आया। पठानकोट ऐतिहासिक महत्व वाला एक प्राचीन शहर है। पठानकोट में पाए गए पुराने सिक्के यह सिद्ध करते हैं कि यह पंजाब के सबसे पुराने स्थलों में से एक है। यह हमेशा से बहुत महत्व का स्थान रहा होगा क्योंकि यह पहाड़ियों की तलहटी में स्थित है। पठानकोट हिमाचल में स्थित नूरपुर राज्य की राजधानी थी और अकबर के शासनकाल में इसका नाम बदलकर धमेरी (नूरपुर) कर दिया गया था। राजपूत के पठानिया कबीले ने अपना नाम पठानकोट से लिया है।

पठानकोट को कांगड़ा और डलहौजी की सुरम्य तलहटी में चक्की नदी पर स्थित होने के कारण जम्मू, कश्मीर, डलहौजी, चंबा, कांगड़ा, धर्मशाला, मैकलोडगंज, ज्वालाजी, चिंतपूर्णी और आगे हिमालय पहाड़ों में जाने से पहले एक विश्राम स्थल के रूप में उपयोग किया जाता है। पठानकोट जम्मू और कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के आस-पास के क्षेत्रों के लिए एक शिक्षा केंद्र के रूप में प्रसिद्ध है। इन राज्यों के कई ग्रामीण छात्र शिक्षा के लिए पठानकोट आते हैं। पठानकोट में हल्का नाश्ता किया और गाढ़ी चाय पी। अब शिवालिक पहाड़ियाँ शुरू हो गईं। सबसे पहले काँगड़ा ज़िले का नूरपुर आया।

काँगड़ा क्षेत्र में ब्रिटिश राज के आगमन से पहले धर्मशाला और इसके आसपास के क्षेत्रों में दो सहस्राब्दियों तक कटोच राजवंश का शासन था। 1810 में सिख राजवंश के महाराज रणजीत सिंह और राजा संसार सिंह कटोच के मध्य हुई ज्वालामुखी की संधि के बाद कटोच केवल काँगड़ा क्षेत्र में स्थानीय जागीरदार रह गए। 1848 में अंग्रेज़ों ने कब्ज़ा कर लिया था। 1849 में कांगड़ा जिले के अंदर एक फौजी छावनी के लिए धौलाधार पर्वत की ढलानों पर एक स्थान को चुना गया, जहां एक हिन्दू धर्मशाला स्थित थी। ऐसी मान्यता है कि धर्मशाला नगर का नाम धर्मशाला शब्द से उत्पन्न हुआ है।

धर्मशाला वर्ष 1849 में कांगड़ा में स्थित सैन्य छावनी के रूप में अस्तित्व में आया। वर्ष 1855 में धर्मशाला को कांगड़ा जिले का मुख्यालय घोषित किया गया था। धर्मशाला में सिविलियन और छावनी क्षेत्र की बढ़ती चहल-पहल को देखते हुए, सुविधाएं लोगों को मुहैया करवाने के लिए नगर परिषद बनाने का विचार बना था। पांच मई 1867 को यहां नगर परिषद अस्तित्व में आई थी। उस समय बनी नगर परिषद की पहली बैठक भी 6 मई 1867 को तत्कालीन जिलाधीश एल्फिनस्टोन की अध्यक्षता में हुई थी।

धर्मशाला के 1867 में नगर परिषद बनने के बाद यहां सुविधाओं में इजाफा हुआ। 1896 में धर्मशाला में लोगों को बिजली भी मिलनी शुरू हुई थी। तत्पश्चात नगर में कार्यालयों के विकास के अतिरिक्त व्यापार व वाणिज्य, सार्वजनिक संस्थान, पर्यटन सुविधाओं तथा परिवहन गतिविधयों में भी उन्नति हई। वर्ष 1905 व 1986 के भूकम्पों से नगर का बहुत नुकसान हुआ। 1926 से 1948 के बीच यहां पर इंटर कॉलेज सहित महाविद्यालय खुला तो वर्ष 1935 में सिनेमा हाल भी यहां खुला। बढ़ते समय के साथ-साथ सामाजिक सुधारों के साथ संगीत, साहित्य और कला के क्षेत्र में भी यह क्षेत्र कहीं पीछे नहीं रहा। 1960 से महामहिम दलाई लामा का मुख्यालय भी धर्मशाला में स्थित है।

धर्मशाला राज्य की शीतकालीन राजधानी है। यह कांगड़ा नगर से 16 किमी की दूरी पर स्थित है। धर्मशाला के मैक्लॉडगंज उपनगर में केंद्रीय तिब्बती प्रशासन के मुख्यालय हैं, और इस कारण यह दलाई लामा का निवास स्थल तथा निर्वासित तिब्बती सरकार की राजधानी है। दो घंटे बौद्ध मंदिर में गुज़ारे। धर्मशाला को भारत सरकार के स्मार्ट सिटीज मिशन के अंतर्गत एक स्मार्ट नगर के रूप में विकसित होने वाले सौ भारतीय नगरों में से एक के रूप में भी चुना गया है।

12 जुलाई 2022 को पठानकोट से जम्मू के रास्ते पर पंजाब की जम्मू-कश्मीर सीमा पर करके कठुआ, बरनोटी, जसरोटा, छन्नी और सम्बा जो कि चिकन नेक बिंदु पर स्थित हैं, को पार करके जम्मू शहर में दाखिल हुए। जम्मू शहर ऐतिहासिक नगर है और पूर्व जम्मू प्रांत की राजधानी रह चुका है और बाद में भी भारत के जम्मू एवं कश्मीर राज्य की शीतकालीन राजधानी रह चुका है। राय जम्बुलोचन राजा बाहुलोचन का छोटा भाई था। बाहुलोचन ने तवी नदी के तट पर बाहु किला बनवाया था और जम्बुलोचन ने जम्बुपुरा नगर बसवाया था। नगर के नाम का उल्लेख महाभारत में भी मिलता है। जम्मू शहर से 32 किलोमीटर दूर अखनूर में पुरातात्त्विक खुदाई के बाद इस जम्मू नगर के हड़प्पा सभ्यता के एक भाग होने के साक्ष्य भी मिले हैं। जम्मू में मौर्य, कुशाण और गुप्त वंश काल के अवशेष भी प्राप्त हुए हैं। 480 ई. के बाद इस क्षेत्र पर एफ्थलाइटिस का अधिकार हो गया था और यहां कपीस और काबुल से भी शासन हुआ था। इनके उत्तराधिकारी कुशानो-हेफ्थालाइट वंश के थे, जिनका अधिकार 565 से 670 ई. तक रहा। तदोपरांत 670 ई. से लेकर 11वीं शताब्दी तक शाही राजवंश का राज रहा जिसे गजनी के अधीनस्थों ने छीन लिया। जम्मू का उल्लेख तैमूर के विजय अभियानों के अभिलेखों में भी मिलता है। इस क्षेत्र ने सिखों एवं मुगलों के आक्रमणों के साथ एक बार फिर से शक्ति-परिवर्तन देखा और अन्ततः ब्रिटिश राज का नियंत्रण हो गया। यहां 840 ई. से 1869 ई. तक देव वंश का शासन भी रहा था। तब नगर अन्य भारतीय नगरों से अलग-थलग पड़ गया और उनसे पिछड़ गया था। उसके उपरांत डोगरा शासक आये और जम्मू शहर को अपनी खोई हुई आभा व शान वापस मिली। उन्होंने यहां बड़े बड़े मन्दिरों व तीर्थों का निर्माण किया व पुराने स्थानों का जीर्णोद्धार करवाया, साथ ही कई शैक्षिक संस्थान भी बनवाये। उस काल में नगर ने काफ़ी उन्नति की। 1817 में 43 कि.मी लम्बी रेल लाइन द्वारा जम्मू को सियालकोट से जोड़ा गया था, किन्तु 1947 में भारत के विभाजन के बाद यह रेल लाइन बंद कर दी गयी क्योंकि सियालकोट से आवाजाही की कड़ी टूट गयी थी। उसके बाद जम्मू शहर में 1971 तक कोई रेल सेवा नहीं थी। तभी भारतीय रेल ने पठानकोट-जम्मू तवी ब्रॉड गेज रेल लाइन डाली और अन्ततः 1975 में एक बार फ़िरसे नये जम्मू-तवी रेलवे स्टेशन के साथ जम्मू शेष भारत से रेल द्वारा जुड़ गया। वर्ष 2,000 में पुराने रेलवे स्टेशन का अधिकांश भाग ध्वस्त कर वहां एक कला केन्द्र बनाया गया।

जम्मू में बहुत तेज गर्मी है। न धरती पर बारिश है और न आसमान में बादल दिख रहे हैं। तभी दूसरे चौराहे पर अमरनाथ यात्रियों के लिए संचालित भंडारे में भोजन किया। उसके बाद दस मिनट में जम्मू विमानतल पहुँच गये। इलेक्ट्रॉनिक डिस्प्ले बोर्ड पर Go first की फ़्लाइट नम्बर G-196 दोपहर बाद तीन बजे का प्रस्थान प्रदर्शित हो रहा है।

इति वृतांत

क्रमशः…

© श्री सुरेश पटवा 

भोपाल, मध्य प्रदेश

*≈ सम्पादक श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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