हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष # 46 ☆ अपनी सेना बड़ी महान ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष”

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. 1982 से आप डाक विभाग में कार्यरत हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.    “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में प्रस्तुत है प्रेरक एवं देशभक्ति से सराबोर भावप्रवण रचना  “अपनी सेना बड़ी महान ”। आप श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार  आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # 46 ☆

☆ अपनी सेना बड़ी महान ☆

 

अपनी सेना बड़ी महान

रखना याद सदा बलिदान

 

सियाचीन की सर्द पहाड़ी

उस पर भी ये खूब दहाड़ी

 

जयति जयति जाँबाज जवान

अपनी सेना बड़ी महान

 

जैसलमेर की तपती गरमी

फिर भी तनिक न इसमें नरमी

 

साहस देख शत्रु  हैरान

अपनी सेना बड़ी महान

 

बड़ी कारगिल की पटखनी

बनी पाक सेना की चटनी

 

सारा जग करता गुणगान

अपनी  सेना बड़ी महान

 

साहस भरा हुआ रग -रग में

चपला सी फुर्ती डग -डग में

 

क्या भूला दुश्मन नादान

अपनी सेना बड़ी महान

 

शिला खंड से डटे खड़े हैं

दुश्मन से निर्भीक  लड़े हैं

 

झुके नहीं दे दी पर जान

अपनी सेना बड़ी महान

 

करें न मौसम की परवाह

देश भक्ति की मन में चाह

 

रक्षा की है हाथ कमान

अपनी सेना बड़ी महान

 

होता सैनिक से “संतोष”

दुश्मन पर आता है रोष

 

सदा सैनिकों से है  शान

अपनी सेना बड़ी महान

 

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

सर्वाधिकार सुरक्षित

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.)

मो 9300101799

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हिन्दी/मराठी साहित्य – लघुकथा ☆ डॉ लता अग्रवाल की हिन्दी लघुकथा ‘अर्धांगिनी’ एवं मराठी भावानुवाद ☆ श्रीमति उज्ज्वला केळकर

श्रीमति उज्ज्वला केळकर

(सुप्रसिद्ध वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  मराठी साहित्य की विभिन्न विधाओं की सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपके कई साहित्य का हिन्दी अनुवाद भी हुआ है। इसके अतिरिक्त आपने कुछ हिंदी साहित्य का मराठी अनुवाद भी किया है। आप कई पुरस्कारों/अलंकारणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपकी अब तक 60 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें बाल वाङ्गमय -30 से अधिक, कथा संग्रह – 4, कविता संग्रह-2, संकीर्ण -2 ( मराठी )।  इनके अतिरिक्त  हिंदी से अनुवादित कथा संग्रह – 16, उपन्यास – 6,  लघुकथा संग्रह – 6, तत्वज्ञान पर – 6 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। )

आज प्रस्तुत है  सर्वप्रथम डॉ लता अग्रवाल जी  की  मूल हिंदी लघुकथा  ‘अर्धांगिनी’ एवं  तत्पश्चात श्रीमति उज्ज्वला केळकर जी  द्वारा मराठी भावानुवाद ‘अर्धांगिनी ’।

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डॉ लता अग्रवाल

(सुप्रसिद्ध हिंदी वरिष्ठ साहित्यकार  एवं शिक्षाविद डॉ लता अग्रवाल जी का ई- अभिव्यक्ति में हार्दिक स्वागत है । आप महाविद्यालय में प्राचार्य पद  पर सेवारत हैं । प्रकाशन शिक्षा पर – 16 पुस्तकें, कविता संग्रह –4,  बाल साहित्य – 5, कहानी संग्रह – 2, लघुकथा संग्रह – 5, साक्षात्कार संग्रह –1, उपन्यास – 1, समीक्षा – 3, लघुरूपक – 18 । पिछले 10 वर्षों से आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर संचालन, कहानी तथा कविताओं का प्रसारण, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में रचनाएँ प्रकाशित | )

☆ अर्धांगिनी ☆

“अच्छा ! माँ –बाबा ! मैं चलता हूँ।”

“कितनी बार कहा है चलता हूँ नहीं आता हूँ कहते हैं बेटा।” मां ने गंभीर चेहरे पर बनावटी शिकायत का भाव लाते हुए कहा।

“ओह हां ! आता हूं माँ –बाबा।” अभी 8 ही दिन हुए हैं अवधेश के विवाह को, पूरे 1 माह की छुट्टी लेकर आया था, विवाह के पश्चात पत्नी को कहीं मनोरम स्थान पर घुमाने ले जायेगा …दोनों एक दूसरे के मन के भाव जानेंगे, मगर अटारी बॉर्डर पर हुए सैनिक हमले में कई सैनिक मारे गए अतः हेड ऑफिस से कॉल आया,

‘लेफ्टिनेंट अवधेश ! इमीजियेट ज्वाइन योर ड्यूटी।’ आदेश पाते हैं अवधेश ने जब अपनी नवविवाहित पत्नी से सकुचाते हुए कहा,

“सीमा ! हेड क्वार्टर से बुलावा आया है मुझे अर्जेंट ही जाना होगा।”

“क्या कल ही चले जायेंगे ?”

“हां ! अलसुबह निकलना होगा।”

“कुछ दिन और नहीं रुक सकते।” सीमा ने आत्मीय भाव से पूछा।

“नहीं सीमा उधर बॉर्डर पर मेरी आवश्यकता है …मेरा इंतजार हो रहा होगा। पता नहीं मेरे कौन-कौन साथी …।” अपने अनजाने खोये साथियों के शोक की कल्पना में अवधेश के स्वर डूब गये।

“फिर कब लौटना होगा ?”

“कह नहीं सकता …जब तक सीमा पर शांति बहाल ना हो या …शायद ……।”

“बस आगे कुछ मत कहिए, अच्छा सोचिये सब शुभ होगा।” सीमा ने पति के होठों पर प्यार से उंगली रखते हुए कहा।

“मैं जानता हूँ सीमा यह सप्ताह तुम्हारा रीति रिवाजों की औपचारिकता और मेहमान नवाजी के बीच बीत गया और अब हमें अपना हनीमून भी कैंसिल करना होगा मैं तुम्हें कुछ नहीं दे पाया उल्टे अब घर की मां -बाबा की देखभाल भी तुम्हें सौंपे जा रहा हूं। ” अवधेश ने सीमा को सीने से लगाते हुए कहा।

“आप चिंता मत कीजिए जी, हम सैनिकों की पत्नियों को ईश्वर अतिरिक्त साहस और धैर्य देकर भेजता है। आप निश्चिंत रहें आपके लौटने तक मैं मां -बाबा का पूरा ख्याल रखूंगी और आपका इंतजार करूंगी।” पत्नी ने अवधेश के मन का बोझ उतार दिया। अत: आज जाते हुए अवधेश स्वयं को  हल्का महसूस कर रहा था अपना प्रतिनिधि मां -बाबा की सेवा के लिए जो छोड़े जा रहा था। जाते हुए घर के बाहर गांव के कई लोग जमा थे बुजुर्ग कह रहे थे,

‘गांव के अपने इस लाड़ले पर हमें नाज है।’ युवा, बच्चे सभी अवधेश को सैल्यूट देते हुए,

‘जय हिन्द अवधेश भैय्या’ कह रहे थे।  दूर दहलीज पर पर्दे की ओट में खड़ी सीमा की ओर देखते हुए आंखों में कृतज्ञता का भाव लिए अवधेश ने एक जोरदार सैल्यूट दिया,

‘थैंक्स अर्धांगिनी, सही मायने में सैनिक तो तुम हो जो अपने जीवन के अमूल्य पल हंसते- हंसते हम पर कुर्बान कर देती हो।’ भाव सीमा तक पहुंच गये थे, उसके मुट्ठी के कसाव ने पर्दे  को जोर से भींच लिया ।

© डॉ लता अग्रवाल

भोपाल, मध्यप्रदेश मो – ९९२६४८१८७८

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☆ अर्धांगिनी ☆

(मूळ  रचना –  डॉ लता अग्रवाल भोपाल  अनुवाद – उज्ज्वला केळकर  )

 ‘अच्छा! आई-बाबा मी जातो.’

‘किती वेळा सांगितलं, जातो, नाही येतो, म्हणावं रे!’ आई गंभीर चेहर्‍याने  खोट्या तक्रारीच्या सुरात म्हणाली.

‘ओह! येतो!’

अवधेशाच्या विवाहाला अद्याप आठ दिवससुद्धा झाले नव्हते. चांगली एक महिन्याची सुट्टी घेऊन आला होता तो. विवाहानंतर पत्नीला एखाद्या निसर्गरम्य ठिकाणी तो घेऊन जाणार होता. दोघांना एकमेकांच्या मनातले भाव नीटपणे जाणून घेता येतील. पण अटारी बॉर्डरवर सैनिकांवर आक्रमण झाले. अनेक सैनिक मारले गेले. हेड ऑफिसमधून त्याला कॉल आला, ’लेफ्टनंट अवधेश, ताबडतोब तुमच्या ड्यूटीवर हजार व्हा.’ आदेश मिळताच अवधेश आपल्या नवपरिणीत पत्नीला संकोचत म्हणाला, ‘सीमा, हेडक्वार्टरवरून आदेश आलाय, मला लगेचच निघायला हवं!’

‘उद्याच निघणार?’

‘हो! उद्या पहाटेच निघायला हवं’

‘आणखी काही दिवस नाही थांबू शकणार?’ सीमानं आत्मीयतेने विचारलं .

‘नाही सीमा, तिकडे बॉर्डरवर माझी वाट बघत असतील. कुणास ठाऊक माझे कोण कोण साथी…’ आपल्या अज्ञात हरवलेल्या साथिदारांच्या शोकाच्या कल्पनेने अवधेशचा स्वर भिजून गेला.

‘परत कधी येणं होईल?’

‘काही सांगता येत नाही. जोपर्यंत सीमेवर शांतीचा वातावरण… किंवा मग…’

‘बस… बस .. पुढे काही बोलू नका. चांगला विचार करा. सगळं शुभ होईल. सीमा पतीच्या ओठांवर बोट ठेवत म्हणाली.’

‘सीमा, हा आठवडा रीती-रिवाजांची औपचारिकता आणि पाहुण्यांचे आदरसत्कार करण्यात निघून गेला॰ आता तर आपल्याला आपला हनीमूनही कॅन्सल करावा लागतोय. मी तुला काहीच देऊ शकलो नाही. उलट आई-बाबांना सांभाळण्याची जबाबदारी तुझ्यावर सोपवून चाललोय.’ सीमाला छातीशी कवटाळत अवधेश म्हणाला.

‘आपण काळजी करू नका. आम्हा सैनिकांच्या पत्नींना ईश्वर अतिरिक्त साहस आणि धैर्य देऊन पाठवत असतो. आपण निश्चिंत रहा. आपण येईपर्यंत आई-बाबांची मी नीट काळजी घेईन आणि आपली वाट पाहीन.’ सीमाने अवधेशच्या मनावर असलेला भार  हलका केला. त्यामुळे आज घरातून बाहेर पडताना अवधेशला अगदी हलकं हलकं वाटत होतं॰ आपल्या आई-बाबांची सेवा करण्यासाठी तो आपला प्रतिनिधी मागे ठेवून जात होता. तो घराबाहेर पडला, तेव्हा बाहेर किती तरी लोक त्याला निरोप देण्यासाठी जमा झाले होते. ज्येष्ठ मंडळी म्हणत होती, ‘गावाच्या या लाडक्या मुलाचा आम्हाला अभिमान आहे.’ तरुण , मुले सगळे अवधेशला सॅल्यूट देत म्हणत होते, ‘जय हिंद अवधेशभैय्या!’ दूर उंबरठ्यावर पडद्याआड उभ्या असलेल्या सीमाकडे बघताना त्याच्या डोळ्यात कृतज्ञता होती. अवधेशने तिला एक जोरदार सॅल्यूट देत, तो डोळ्यांनीच म्हणाला , ‘थॅंक्स अर्धांगिनी खर्‍या अर्थाने तूच सैनिक आहेस. आपल्या जीवनातले अमूल्य क्षण तू हसत हसत आमच्यावरून ओवाळून टाकतेस.’

त्याच्या मनातले भाव सीमापर्यंत पोचले. तिच्या मुठीने पडद्याची कड घट्ट धरून ठेवली.

 

© श्रीमति उज्ज्वला केळकर

176/2 ‘गायत्री ‘ प्लॉट नं12, वसंत साखर कामगार भवन जवळ , सांगली 416416 मो.-  9403310170

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मराठी साहित्य – कविता ☆ विजय साहित्य – पंढरी माहेर . . . ! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते

कविराज विजय यशवंत सातपुते

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन “माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। कुछ रचनाये सदैव समसामयिक होती हैं। आज प्रस्तुत है  आपकी  एक भावप्रवण रचना “पंढरी माहेर . . . !” )

☆ विजय साहित्य – पंढरी माहेर . . . ! ☆

मुराळी होऊन

घेतसे विसावा

माये तुझ्या नेत्री

विठ्ठल दिसावा. . . . !

 

पंढरीची वारी

ऊन्हात पोळते

गालावरी माये

आसू ओघळते.. . . !

विठ्ठलाची वीट

उंबरा घराचा

ओलांडून येई

पाहुणा दारचा.

पंढरीची वारी

भेटते विठूला

आठवांची सर

आलीया भेटीला. . . . !

विठू दर्शनाची

घरा दारा आस

परी सोडवेना

प्रपंचाची कास.

पंढरीची वारी

हरीनाम घेई

माय लेकराला

दोन घास देई. . . . !

पंढरीची वारी

रिंगण घालते

माय शेतामधी

माया कालवते.. . . !

पंढरीची वारी

माऊलींच्या दारा

माय पदराचा

लेकराला वारा. . . . !

म्हणोनीया देवा

पंढरी माहेर

आसवांचे मोती

करती आहेर.

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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हिन्दी साहित्य – ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद # 38 ☆ लघुकथा – जिज्जी ☆ डॉ. ऋचा शर्मा

डॉ. ऋचा शर्मा

(डॉ. ऋचा शर्मा जी को लघुकथा रचना की विधा विरासत में  अवश्य मिली है  किन्तु ,उन्होंने इस विधा को पल्लवित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी । उनकी लघुकथाएं और उनके पात्र हमारे आस पास से ही लिए गए होते हैं , जिन्हें वे वास्तविकता के धरातल पर उतार देने की क्षमता रखती हैं।  आप ई-अभिव्यक्ति में  प्रत्येक गुरुवार को उनकी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनकी महानगरीय जीवनशैली पर विमर्श करती लघुकथा जिज्जी।  आज भी हम जीवन में ऐसे  संबंधों को निभाते हैं  जिसकी अपेक्षा अपने रिश्तेदारों से भी नहीं कर सकते हैं। डॉ ऋचा शर्मा जी की लेखनी  को जीवन के कटु सत्य को दर्शाती  लघुकथा रचने के लिए सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संवाद  # 38 ☆

☆  लघुकथा – जिज्जी ☆

किसी ने बडी जोर से दरवाजे भडभडाया,  ऐसा लगा जैसे कोई दरवाजा तोड ही देगा , अरे ! जिज्जी होंगी, सामने घर में रहती हैं, बुजुर्ग हैं, हमारे सुख – दुख की साथी. जब से शादी होकर आई हूँ इस मोहल्ले में माँ की तरह मेरी देखभाल करती रही हैं, सीढी नहीं चढ पातीं इसलिए नीचे खडे होकर अपनी छडी से ही दरवाजा खटखटाती हैं – सरोज बोली.  यह सुनकर मैं मुस्कुराई कि तभी आवाज आई – तुम्हारी दोस्त है तो हम नहीं मिल सकते क्या ?  हमसे मिले बिना चली जाएगी ? नहीं जिज्जी, हम उसे लेकर आपके पास  आते हैं . लाना जरूर,  यह कहकर जिज्जी छडी टेकती हुई अपने घर की ओर चल दीं. पतली गली के एक ओर सरोज और दूसरी ओर उनका घर था. दरवाजे पर खडे होकर भी आवाज दो तो सुनाई पड जाए. गली इतनी सँकरी कि  दोपहिया वाहन ही उसमें चल सकते थे. गलती  से अगर गली में गाय – भैंस आ जाए फिर तो  उसके पीछे – पीछे   गली के अंत तक जाएं या खतरा मोल लेकर उसके बगल से भी आप जा सकते हैं.

सरोज बोली – जिज्जी से मिलने तो जाना ही पडेगा,  नहीं तो बहुत बुरा मानेंगी. हमें देखते ही वह खुश हो गईं,बोली – आओ बैठो,  सरोज भी बैठने ही वाली थी कि बोली- अरे तुम बैठ जाओगी तो चाय, नाश्ता कौन लाएगा ? जाओ रसोई में, हाँ  जिज्जी  कहकर वह चाय बनाने चली गई.  जिज्जी बडे स्नेह से बात करे जा रही थीं और मैं उन्हें देख रही  थी. उम्र सत्तर से अधिक ही  होगी, सफेद साडी और सूनी मांग  उनके वैधव्य के सूचक  थे. सूती साडी के पल्ले से आधा सिर ढंका था जिसमें से  सफेद घुंघराले बाल दिख रहे थे. गांधीनुमा चश्मे में से बडी – बडी आँखें झाँक रही थीं.हाथों में  चाँदी के कडे पहने थीं. झुर्रियों ने चेहेरे को और ममतामय बना  दिया था. बातों ही बातों में  जिज्जी ने बता दिया कि बेटियां अपने घर की हो गईं और बेटे अपनी बहुओं के. सरोज तब तक चाय, नाशता ले आई,उसकी ओर देखकर बोलीं- हमें अब किसी की जरूरत भी नहीं है, डिप्टी साहब ( उनके पति ) की पेंशन मिलती है और ये है ना हमारी सरोज,  एक आवाज पर  दौडकर आती है. बिटिया हमारे लिए तो आस-  पडोस ही सब कुछ है, ये लोग ना होते तो कब के मर खप गए होते.

जिज्जी, बस भी करिए अब,  बीमारी -हारी में आप ही तो रहीं हैं  हमारे साथ, मेरे बच्चे इनकी गोद में बडे हुए हैं, जगत अम्माँ हैं ये —-  सरोज और जिज्जी एक दूसरे की कुछ भी ना होकर बहुत कुछ थीं. कहने को ये दोनों पडोसी ही थीं, जिज्जी  का  स्नेहपूर्ण अधिकार और सरोज का सेवा भाव मेरे लिए अनूठा था. महानगर की फ्लैट संस्कृति में रहनेवाली  मैं  हतप्रभ थी जहाँ डोर बैल बजाने पर ही दरवाजा खुलता है नहीं तो सामने के दरवाजे पर लगी नेमप्लेट  मुँह चिढाती रहती है . दरवाजा  खुलने और बंद होने में घर के जो लोग दिख जाएं बस वही परिचय, बाकी कुछ नहीं, सब एक दूसरे से अनजान, अपरिचित. फ्लैट से निकले  अपनी गाडियों में  बैठे और  चल दिए, लौटने पर  दरवाजा खुला और फिर अगली सुबह तक के लिए बंद.

मन ही मन बहुत कुछ समेटकर जब  मैं चलने को हुई, जिज्जी छडी टेकती हुई उठीं – हमारा बटुआ लाओ सरोज, बिटिया पहली बार हमारे घर आई है,  जिज्जी  टीका करने के लिए बटुए में  नोट ढूंढने लगीं.

© डॉ. ऋचा शर्मा

अध्यक्ष – हिंदी विभाग, अहमदनगर कॉलेज, अहमदनगर.

122/1 अ, सुखकर्ता कॉलोनी, (रेलवे ब्रिज के पास) कायनेटिक चौक, अहमदनगर (महा.) – 414005

e-mail – richasharma1168@gmail.com  मोबाईल – 09370288414.

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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि ☆ शब्द- दर-शब्द ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज 

(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) 

☆ संजय दृष्टि  ☆ शब्द- दर-शब्द ☆

 

शब्दों के ढेर सरीखे,

रखे हैं काया के

कई चोले मेरे सम्मुख,

यह पहनूँ, वो उतारूँ

इसे रखूँ , उसे संवारूँ..?

 

तुम ढूँढ़ते रहना

चोले का इतिहास

या तलाशना व्याकरण,

परिभाषित करना

चाहे अनुशासित,

अपभ्रंश कहना

या परिष्कृत,

शुद्ध या सम्मिश्रित,

कितना ही घेरना

तलवार चलाना,

ख़त्म नहीं कर पाओगे

शब्दों में छिपा मेरा अस्तित्व!

 

मेरा वर्तमान चोला

खींच पाए अगर,

तब भी-

हर दूसरे शब्द में,

मैं रहूँगा..,

फिर तीसरे, चौथे,

चार सौवें, चालीस हज़ारवें

और असंख्य शब्दों में

बसकर महाकाव्य कहूँगा..,

 

हाँ, अगर कभी

प्रयत्नपूर्वक

घोंट पाए गला

मेरे शब्द का,

मत मनाना उत्सव

मत करना तुमुल निनाद,

गूँजेगा मौन मेरा

मेरे शब्दों के बाद..,

 

शापित अश्वत्थामा नहीं

शाश्वत सारस्वत हूँ मैं,

अमृत बन अनुभूति में रहूँगा

शब्द- दर-शब्द बहूँगा..,

 

मेरे शब्दों के सहारे

जब कभी मुझे

श्रद्धांजलि देना चाहोगे,

झिलमिलाने लगेंगे शब्द मेरे

आयोजन की धारा बदल देंगे,

तुम नाचोगे, हर्ष मनाओगे

भूलकर शोकसभा

मेरे नये जन्म की

बधाइयाँ गाओगे..!

 

©  संजय भारद्वाज

( कविता संग्रह ‘मैं नहीं लिखता कविता।’)

# सजग रहें, स्वस्थ रहें।#घर में रहें। सुरक्षित रहें।

☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆

मोबाइल– 9890122603

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # 64 ☆ आज कितनी बार मरे! ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ”  में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल  (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। आज प्रस्तुत है श्री विवेक जी का एक बचपन से वृद्धावस्था तक न जाने कितनी बार अनायास ही मुंह से निकल जाता है  ‘ मर गए ‘ और श्री विवेक जी ने इस रचना  “आज कितनी बार मरे!” से कई स्मृतियाँ जीवित कर दीं । इस अत्यंत सार्थक आलेख के लिए श्री विवेक जी का हार्दिक आभार। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # 64 ☆

☆ आज कितनी बार मरे ☆

बचपन में बड़ी मधुरता होती है, ढेरों गलतियां माफ होती है, सब की संवेदना साथ होती है, ’अरे क्या हुआ बच्चा है’। तभी तो भगवान कृष्ण ने कन्हैया के अपने बाल रूप में खूब माखन चुरा चुरा कर खाया, गोपियों के साथ छेड़खानी की कंकडी से निशाना साधकर मटकियां तोड़ी, पर बेदाग बने रहे, बच्चे किसी के भी हो,  बड़े प्यारे लगते हैं, चूहे का नटखट, बड़े-बड़े कान वाला बच्चा हो या कुत्ते का पिल्ला प्यारा ही लगता है, शेर के बच्चे से डर नहीं लगता, और सुअर के बच्चे से घिन नहीं लगती मैंने भी बचपन में खूब बदमाशियां की है, बहनों की चोटी खींची है, फ्रिज में कागज के पुडे में रखे अंगूर एक-एक कर चट कर डाले है, और पुडा ज्यों का त्यों रखा रह जाता, जब मां पुडा खोलती तो उन्हें सिर्फ डंठल ही मिलते, छोटी बड़ी गलती पर जब भी पिटाई की नौबत आती तो, ’उई मम्मी मर गया’ की गुहार पर, मां का प्यार फूट पड़ता और मैं बच निकलता . स्कूल पहंचता, जब दोस्तों की कापियां देखता तो याद आती कि मैंने तो होमवर्क किया ही नहीं है, स्वगत अस्फुट आवाज निकल पड़ती ’मर गये’।

बचपन बीत गया नौकरी लग गई, शादी हो गई बच्चे हो गये पर यह मरने की परम्परा बकायदा कायम है, दिन में कई-कई बार मरना जैसे नियति बन गई है। जब दिन भर आफिस में सिर खपाने के बाद घर लौटने को होता हूं ,  तो घर में घुसते घुसते याद आता है कि सुबह जाते वक्त बीबी, बच्चों ने क्या फरमाईश की थी। कोई नया बहाना बनाता हूं और ’मर गये’ का स्वगत गान करता हूं, आफिस में वर्क लोड से मीटिंग की तारीख सिर पर आती है, तब ’मर गये’ का नारा लगाता हूं और इससे इतनी उर्जा मिलती है कि घण्टों का काम मिनटो में निपट जाता है, जब साली साहिबा के फोन से याद आता है कि आज मेरी शादी की सालगिरह है या बीबी का बर्थ डे है तो अपनी याददाश्त की कमजोरी पर ’मर गये’ के सिवा और कोई तात्कालिक प्रतिक्रिया होती ही नहीं। परमात्मा की कृपा है कि दिन में कई कई बार मरने के बाद भी ’वन पीस’ में हट्टा कट्टा जिंदा हूं और सबसे बड़ी बात तो यह है कि पूरी आत्मा साबूत है। वह कभी नहीं मरी, न ही मैंने उसे कभी मारा वरना रोजी, रोटी, नाम, काम के चक्कर में ढेरों लोगों को कुछ बोलते, कुछ सोचते, और कुछ अलग ही करते हुये, मन मारता हुआ, रोज देखता हूं . निहित स्वार्थो के लिये लोग मन, आत्मा, दिल, दिमाग सब मार रहे है। पल पल लोग, तिल तिल कर मर रहे है। चेहरे पर नकली मुस्कान लपेटे, मरे हुये, जिंदा लोग, जिंदगी ढोने पर मजबूर है। नेता अपने मतदाताओं से मुखातिब होते है, तो मुझे तो लगता है, मर मर कर अमर बने रहने की उनकी कोषिषों से हमें सीख लेनी चाहिये, जिंदगी जिंदा दिली का नाम है।

मेरा मानना है, जब भी, कोई बड़ी डील होती है, तो कोई न कोई, थोड़ी बहुत आत्मा जरूर मारता है, पर बड़े बनने के लिये डील होना बहुत जरूरी है, और आज हर कोई बड़े बनने के, बड़े सपने सजोंये अपने जुगाड़ भिड़ाये, बार-बार मरने को, मन मारने को तैयार खड़ा है, तो आप आज कितनी बार मरे? मरो या मारो! तभी डील होंगी। देश प्रगति करेगा, हम मर कर अमर बन जायेंगे।

 

© विवेक रंजन श्रीवास्तव, जबलपुर

ए १, शिला कुंज, नयागांव,जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ समय चक्र # 36 ☆ शहादत को नमन ☆ डॉ राकेश ‘चक्र’

डॉ राकेश ‘ चक्र’

(हिंदी साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर डॉ. राकेश ‘चक्र’ जी  की अब तक शताधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।  जिनमें 70 के आसपास बाल साहित्य की पुस्तकें हैं। कई कृतियां पंजाबी, उड़िया, तेलुगु, अंग्रेजी आदि भाषाओँ में अनूदित । कई सम्मान/पुरस्कारों  से  सम्मानित/अलंकृत।  इनमें प्रमुख हैं ‘बाल साहित्य श्री सम्मान 2018′ (भारत सरकार के दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी बोर्ड, संस्कृति मंत्रालय द्वारा  डेढ़ लाख के पुरस्कार सहित ) एवं उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा ‘अमृतलाल नागर बालकथा सम्मान 2019’। अब आप डॉ राकेश ‘चक्र’ जी का साहित्य प्रत्येक गुरुवार को  उनके  “साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र” के माध्यम से  आत्मसात कर सकेंगे । इस कड़ी में आज प्रस्तुत हैं  एक भावप्रवण कविता  “शहादत को नमन”.)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – समय चक्र – # 36 ☆

☆ शहादत को नमन ☆ 

 

जो वतन पर मिट गए

उनकी शहादत को नमन।

है नमन उनको हृदय से

कर रहे जो जागरण

 

सरहदों पर जो खड़े

प्रहरी प्रबल हिमताज से

धन्य उनको हो रहा है

खेल ये जीवन-मरण

 

प्राण देकर जो बचाते

हैं वतन की आबरू

उनकी माताओं के चरणों

में विनत श्रद्धार्पण

 

बर्फ की चादर कफन-सी

ओढ़कर चढ़ते शिखर

ऐसे वीरों की करूँ

मैं प्रार्थनाएँ संवरण

 

भूल मत जाना कभी

बलिदान यह इतिहास का

याद रखना शौर्य का

उनका प्रतापी आचरण

 

कर सको तो तुम भी करना

गर्व उनकी जीत पर

कीर्ति के जब गान से

गूँजे गगन का प्रांगण।।

 

डॉ राकेश चक्र

(एमडी,एक्यूप्रेशर एवं योग विशेषज्ञ)

90 बी, शिवपुरी, मुरादाबाद 244001

उ.प्र .  9456201857

Rakeshchakra00@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 27 ☆ शेयर का चक्कर  ☆ श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

( ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं।  आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना “शेयर का चक्कर* ”।  शेयर शब्द ही ऐसा है जिसमें  “अर्थ” जुड़ा है। किन्तु, शेयर का कुछ और भी अर्थ है जिसके लिए आपको यह रचना पढ़नी पड़ेगी। ।  इस सार्थक रचना के लिए  श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।

आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएँ # 27☆

☆ शेयर का चक्कर ☆

शेयर बाजार में उथल – पुथल मची ही रहती है । मंदी की मार कब किस को प्रभावित कर देगी ये कोई नहीं कह सकता । फिर भी लोग शेयर खरीदते व बेचते रहते हैं,  जिससे शेयर मार्केट का अस्तिव बना हुआ है ।

ये तो था शेयर के धन का चक्कर जिसके फेर में न जाने कितने लोग आबाद व बर्बाद होते रहते हैं । अब एक और शेयर पर  भी नजर डाल ही लीजिए,  देखिए कितनी तेजी से फेसबुक पर पोस्ट की शेयरिंग होती है । बस पोस्ट में कुछ दम होना चाहिए । जब जनमानस के कल्याण की पोस्ट हो या कुछ विशेष चर्चा हो ; तो शेयर की बाढ़ लग जाती है । और देखते ही देखते पोस्ट वायरल हो जाती है ।

मजे की बात ये है,  कि इस शेयर ने चेयर को भी नहीं छोड़ा है । आये दिन चेयर के शेयर उछाल पकड़ ही लेते हैं। जितनी मजबूत चेयर उतने ही उसके दीवाने । बस हिस्सा- बाँट की बात हो तो शेयर के कदम बढ़ ही जाते हैं । चेयर को बचाये रखना कोई मामूली कार्य नहीं होता है । जोर आजमाइश से ही इसके साथ जिया जा सकता है । सभी लोग अपने – अपने पदों को शेयर करने में लगें । ये कार्य कोई जनहित  की भावना से नहीं होता, ये तो अपना रुतबा बढ़ाने की चाहत के जोर पकड़ने से शुरू होता है,  और हिस्सा – बाँट पर ही  पूर्ण होता है ।

पहले तो शेयर करो,  का अर्थ अपनी अच्छी व उपयोगी चीजों को बाँटना होता था , पर जब से मीडिया का प्रभाव बढ़ा तब से लोगों ने इसकी अलग ही परिभाषा गढ़ ली है । अब तो कुछ भी शेयर कर देते हैं, बस लाइक और कमेंट मिलते रहना चाहिए । इस दिशा में जन सेवक तो सबसे बड़े शेयर कर्ता सिद्ध हुए वे अपनी सत्ता तक शेयर कर देते हैं ; बस चेयर बची रहे । कर्म की  पूजा का महत्व तो घटता ही जा रहा है , अब  तो शेयर देव, चेयर देव यही  आपस में उलझते हुए इधर से उधर आवागमन कर रहें हैं । नयी जगह नया सम्मान मिलता है,  सो अपने जमीर को व जनता के विश्वास को भी शेयर करने से ये नहीं चूकते बस चेयर मजबूती से पकड़े रहते हैं ।

अरे भई इतना तो सोचिए कि,  वक्त से बड़ा समीक्षक कोई नहीं होता , ये सबका लेखा जोखा रखता है । अतः सोच समझ कर ही चेयर को शेयर करें, घनचक्कर न बनें ।

© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं # 57 – जालसाज ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

 

(सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं ”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं आप प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  आज प्रस्तुत है उनकी एक विचारणीय लघुकथा  “जालसाज”। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्री ओमप्रकाश जी की लघुकथाएं  # 57 ☆

☆ लघुकथा – जालसाज ☆

 

“आप को अध्यक्ष महोदय ने फोन किया था कि मेरी बेटी का चिकित्सा में प्रवेश हो जाना चाहिए. आप ने पूरी गारंटी ली और हम ने आप के कहे अनुसार काम किया. पूरा पैसा भी दिया. मगर आप ने मेरा काम नहीं किया ?” लड़की का पिता अपनी बेटी के चिकित्सा महाविद्यालय में चयन न होने पर नाराज था.

“वह तो अच्छा हुआ मुझे सदबुद्धि आ गई और मैं सरकारी गवाह बन गया, वरना तुम, तुम्हारी लड़की और अध्यक्ष महोदय भी मेरे साथ जेल में होते या फिर मेरा भी रामनाम सत्य हो गया होता.”

 

© ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश”

१७/०७/२०१५

पोस्ट ऑफिस के पास, रतनगढ़-४५८२२६ (नीमच) मप्र

ईमेल  – opkshatriya@gmail.com

मोबाइल – 9424079675

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मराठी साहित्य – कविता ☆ सुजित साहित्य – कॅनव्हास ☆ सुजित शिवाजी कदम

सुजित शिवाजी कदम

(सुजित शिवाजी कदम जी  की कवितायेँ /आलेख/कथाएँ/लघुकथाएं  अत्यंत मार्मिक एवं भावुक होती हैं. इन सबके कारण हम उन्हें युवा संवेदनशील साहित्यकारों में स्थान देते हैं। उनकी रचनाएँ हमें हमारे सामाजिक परिवेश पर विचार करने हेतु बाध्य करती हैं. मैं श्री सुजितजी की अतिसंवेदनशील  एवं हृदयस्पर्शी रचनाओं का कायल हो गया हूँ. पता नहीं क्यों, उनकी प्रत्येक कवितायें कालजयी होती जा रही हैं, शायद यह श्री सुजित जी की कलम का जादू ही तो है! आज प्रस्तुत है उनकी एक अतिसुन्दर भावप्रवण कविता  “कॅनव्हास”। आप प्रत्येक गुरुवार को श्री सुजित कदम जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं। ) 

☆  सुजित साहित्य  –  कॅनव्हास ☆ 

मी कॅनव्हास वर अनेक सुंदर

चित्र काढतो….

त्या चित्रात. . मला हवे तसे

सारेच रंग भरतो…

लाल,हिरवा,पिवळा, निळा

अगदी . . मोरपंखी नारंगी सुध्दा

आणि तरीही

ती.. चित्र तिला नेहमीच अपूर्ण वाटतात…

मी तिला म्हणतो असं का..?

ती म्हणते…,

तू तुझ्या चित्रांमध्ये..

तुला आवडणारे रंग सोडून,

चित्रांना आवडणारे रंग

भरायला शिकलास ना. .

की..,तुझी प्रत्येक चित्रं तुझ्याही

नकळत कँनव्हास वर

श्वास घ्यायला लागतील…

आणि तेव्हा . . .

तुझं कोणतही चित्र

अपूर्ण राहणार नाही…!

 

© सुजित शिवाजी कदम

दिनांक  5/3/2019

पुणे, महाराष्ट्र

मो.७२७६२८२६२६

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