(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – क्योंकि परम्परागत सब प्यार खो गया है…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्वप्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २५६ ☆
☆ क्योंकि परम्परागत सब प्यार खो गया है… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “भारत की आत्म-व्यथा…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २०
कविता – भारत की आत्म-व्यथा… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
(डा. मुक्ता जीहरियाणा साहित्य अकादमी की पूर्व निदेशक एवं माननीय राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित/पुरस्कृत हैं। साप्ताहिक स्तम्भ “डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य” के माध्यम से हम आपको प्रत्येक शुक्रवार डॉ मुक्ता जी की उत्कृष्ट रचनाओं से रूबरू कराने का प्रयास करते हैं। आज प्रस्तुत है डॉ मुक्ता जी की मानवीय जीवन पर आधारित एक विचारणीय आलेख वर्तमान : सुंदरतम उपहार। यह डॉ मुक्ता जी के जीवन के प्रति गंभीर चिंतन का दस्तावेज है। डॉ मुक्ता जी की लेखनी को इस गंभीर चिंतन से परिपूर्ण आलेख के लिए सादर नमन। कृपया इसे गंभीरता से आत्मसात करें।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – डॉ. मुक्ता का संवेदनात्मक साहित्य # ३०६ ☆
☆ वर्तमान : सुंदरतम उपहार… ☆
‘अतीत लैसन है, वर्तमान गिफ़्ट और भविष्य मोटिवेशन’…इस वाक्य में ज़िंदगी का यथार्थ अथवा प्रयोजन निहित है। अतीत हमें शिक्षा देता है; पाठ पढ़ाता है; अच्छे-बुरे की पहचान कराता है। सो! अतीत से लगाव मत रखिए … उसकी स्मृतियों को अपने ज़हन से निकाल बाहर फेंकिए, क्योंकि वे आपके विकास में बाधक-अवरोधक होती हैं… आपको पथ-विचलित करती हैं। हां! अतीत में झांकिए, परंतु उसमें लिप्त मत रहिए… जो अच्छा है, उसे ग्रहण कीजिए; संजोकर रखिए और जो बुरा है, उसे सदैव के लिए त्याग दीजिए। अतीत अर्थात् जो गुज़र गया, कभी लौटकर नहीं आता…फिर उसके लिए शोक क्यों?
वर्तमान अर्थात् आज गिफ़्ट है, उपहार है…उसकी महत्ता समझिए; उसका सम्मान कीजिए और उसे प्राप्त कर खुशी का इज़हार कीजिए…जो भी आपको वर्तमान में मिला है, उसे प्रभु-कृपा समझ अभिवादन-अभिनंदन कीजिए… उसके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित कीजिए और मासूम बच्चे की भांति निरीह-निश्छल भाव से प्रसन्नता प्रकट कीजिए। वास्तव में वर्तमान ही सत्य है, क्योंकि अतीत कभी लौटता नहीं और भविष्य अर्थात् कल कभी आता नहीं। ‘जो भी है, बस! यही एक पल है। आगे भी जाने ना तू पीछे भी जाने न तू’ इस भाव को सार्थक करती हैं यह पंक्तियां… आज की अथवा वर्तमान की उपादेयता पर प्रकाश डालती हैं। बुद्धिमान लोग आज में अर्थात् वर्तमान में जीते हैं; समय की महत्ता को स्वीकारते हैं और एक भी पल व्यर्थ नहीं जाने देते। चार्वाक दर्शन भी ‘खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ’ सिद्धांत का पक्षधर है, संदेश-वाहक है और प्रयोगवाद व नयी कविता का क्षणवादिता का दृष्टिकोण भी हर पल को खुशी से जीने व भोग लेने की सीख देता है, क्योंकि वे नहीं जानते कि अगला पल आएगा या नहीं…यह शाश्वत सत्य है; परंतु अनास्था की पराकाष्ठा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने वर्तमान की सार्थकता दर्शाते हुए हर पल को अंतिम पल स्वीकार, कर्म-निष्ठता का संदेश दिया है। संसार में जो जन्मा है, उसकी मृत्यु निश्चित है। सो! वर्तमान में जीना सीखिए, यही ज़िंदगी का सार है।
भविष्य अनिश्चित है, परंतु वह हमारा प्रेरक है…जिससे तात्पर्य है कि मानव को जीवन में अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और यह जानने की चेष्टा करनी चाहिए कि ‘वह कौन है और उसका संसार में आने का क्या प्रयोजन है? उसका लक्ष्य क्या है? लक्ष्य निर्धारण के पश्चात् ही आप उस लीक पर चल सकते हैं अर्थात् लक्ष्य-प्राप्ति में स्वयं को जी-जान से जुटा सकते हैं। इसके लिए हमारे पूजनीय माता-पिता, गुरुजन व धार्मिक ग्रंथ ही हमारा मार्गदर्शन कर सकते हैं। सो! उनके प्रति श्रद्धा भाव रखना अपेक्षित है। परंतु आजकल तो यह ‘दूर के ढोल सुहावने’ वाली बातें मात्र जुमले बन कर रह गयी हैं। पहले वे हमारे आदर्श होते थे और हम उनके व्यक्तित्व को देख स्वयं को उसी रूप में ढालने में प्रयासरत रहते थे।
परंतु आजकल तो जीवन-मूल्य दरक़ रहे हैं…
उनका निरंतर पतन हो रहा है। सो! ‘यथा राजा तथा प्रजा’ चारों ओर अराजकता का वातावरण छाया हुआ है। सो! किसी से आस्था व विश्वास की अपेक्षा करना व्यर्थ है, निष्फल है, निष्प्रयोजन है। हिंसा, लूटपाट, अनाचार, अनास्था व भ्रष्टाचार के वातावरण में, जहां इंसान किसी भी कीमत पर अधिकाधिक धन कमाना चाहता है; वहीं उसके हृदय से स्नेह, प्रेम व सौहार्द के भाव नदारद होते जा रहे हैं। वह रिश्तों की अहमियत को नकार, परिवार की खुशियों को अपने हाथों बेदर्दी से रौंद डालता है और दूर… बहुत दूर निकल जाता है, जहां उसे अपने सभी बेग़ाने नज़र आते हैं। इस मन:स्थिति में वह केवल धन की महत्ता को सर्वोपरि मानता है और अपने परिवारजनों और परिजनों की अहमियत व अपेक्षा-आवश्यकता नहीं महसूसता।
धन-संपदा हमेशा साथ नहीं देते। लक्ष्मी स्वभाव से चंचल है… ‘आज यहां, कल वहां।’ सो! एक लंबे अंतराल के पश्चात् उसे अपने आत्मजों की याद आती है, जिन्हें समय की आंधी बहा कर बहुत दूर ले जा चुकी होती है। अब वे उसे लेशमात्र अहमियत भी नहीं देते और वह एकांत की त्रासदी झेलने को विवश हो जाता है। समय नदी की भांति सदैव बहता रहता है, कभी रुकता नहीं। इसलिए मानव को समय के महत्व व अस्तित्व को स्वीकार करना चाहिए। बुद्धिमान व्यक्ति दूसरों के अनुभवों से शिक्षा प्राप्त करता व सचेत रहता है तथा उस ग़लती को नहीं दोहराता… ग़लत राह का अनुसरण भी नहीं करता। भविष्य हमें प्रेरणा देता है। सो! लक्ष्य निर्धारित कर उसे प्राप्त करने के मार्ग पर अग्रसर होना श्रेयस्कर है, जिसके लिए दरक़ार है… आत्मविश्वास व दृढ़ निश्चय की। हां! रास्ते में आने वाली बाधाओं के सिर पर पाँव रखकर आगे बढ़ना ही हमारे धैर्य की परीक्षा है।
अब्दुल कलाम जी इसलिए ‘खुली आंखों से सपने देखने की बात कहते हैं; बंद आंखों से नहीं।’ आप स्वयं को परिश्रम की भट्ठी में झोंक डालिए…अच्छे-बुरे का ध्यान रखते हुए, स्व-पर, राग-द्वेष व लाभ- हानि से ऊपर उठ जाइए… यही सफलता की कसौटी है। दूसरे शब्दों में संसार में आप व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बन कर जिएं, क्योंकि व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, व्यक्तित्व की नहीं…वह अपने आदर्शों के रूप में सदैव ज़िंदा रहता है। परंतु यह तभी संभव है, जब हमारा लक्ष्य सामान्य मानव की तरह जीने का न हो अर्थात् संसार के समस्त प्राणी-जगत् में खाना-पीना सोना व सृष्टि-संवर्द्धन में सहयोग देना–तो सामान्य क्रियाएं हैं; परंतु मानव को प्रदत्त सोचने-समझने की शक्ति उसे श्रेष्ठता प्रदान करती है। मानव का मस्तिष्क अर्थात् बुद्धि उसे शेष प्राणी-जगत् से अलग स्वरूप प्रदान करती है, जिसके बल पर वह सृष्टि पर आधिपत्य स्थापित कर सबको उंगलियों पर नचा सकता है। परंतु उसकी सकारात्मक सोच उसे ‘व्यक्ति से व्यक्तित्व’ बनाने का सामर्थ्य रखती है। व्यक्तित्व अर्थात् जिस पर दुनिया नाज़ करती है; उसके गुणों की चर्चा समस्त विश्व में होती है। सब उसके गुणों का अनुसरण करते हैं; वैसा ही बनने का प्रयास करते हैं और उसका सानिध्य पाकर वे स्वयं को धन्य अथवा सौभाग्यशाली स्वीकारते हैं। ऐसा व्यक्ति भले ही दुनिया से रुख़्सत हो जाए, परंतु वह मानव-मात्र के हृदय में समाया रहता है; सबके दिलों पर राज्य करता है। इसलिए मानव को व्यक्ति नहीं, व्यक्तित्व बनकर जीने का सार्थक संदेश दिया गया है।
सोना अग्नि में तप कर ही कुंदन बनता है तथा उसकी चमक कीचड़ में गिरने के पश्चात् भी कम नहीं होती। इसलिए मानव का चरित्र भी कुंदन की भांति होना चाहिए, जिस पर आलोचनाएं प्रभावी न हो पाएं। सो! उसे स्थितप्रज्ञ होना चाहिए, जिस पर सुख-दु:ख, हानि-लाभ, मान-अपमान व निंदा-स्तुति का लेशमात्र भी प्रभाव न हो। शायद! इसीलिए आलोचनाओं को साबुन स्वीकार कर उनसे अपने अंतर्मन में निहित अहं को धोने व त्यागने की सीख दी गयी है, क्योंकि अहं मानव का सबसे बड़ा शत्रु है। इसलिए उस से अपने भीतर छुपी दुष्प्रवृत्तियों …काम, क्रोध, लोभ, मोह आदि से मुक्ति पाने का आग्रह किया गया है। सो! हमें आलोचकों अर्थात् निंदकों को जीवन में श्रेष्ठ स्थान देना चाहिए तथा सबसे बड़ा हितैषी स्वीकारना चाहिए, क्योंकि वे ही तो अपना सारा समय आपको, आपके दोष-दर्शन कराने में नष्ट करते हैं। वे अपने समय को आपके हित व समुन्नत करने में प्रयोग करते हैं। ‘निंदक नियरे राखिए, आंगन-कुटी छ्वाय’ अर्थात् निंदक को सदैव अपने निकट रखना चाहिए। इस तरह वे आप के विकास के निमित्त सदैव चिंतित रहते हैं और आपको व्यक्ति से व्यक्तित्व बनाने में उनका योगदान श्लाघनीय है, अविस्मरणीय है।
मानव को इन हितैषियों द्वारा सुझाए गए रास्तों का अनुसरण कर, अपने अंतर्मन को निर्मल रखना चाहिए, क्योंकि ऐसे लोग बिना साबुन पानी के आप को दोषों व अवगुणों से अवगत करा कर प्रसन्न होते हैं। वे आपके प्रति ईर्ष्या-भाव नहीं रखते, क्योंकि वे आपके हित-चिंतक होते हैं। वास्तव में मानव को ऐसे लोगों का शुक्रगुज़ार होना चाहिए, जो नि:स्वार्थ भाव से आपको सर्वश्रेष्ठ, सर्वोत्तम व सर्वोत्कृष्ट बनाने में अपने जीवन का अनमोल समय रूपी धन निवेश करते हैं, जिसका लाभ आपको मिल सकता है। यदि आप सजग व सचेत होकर स्वयं में परिवर्तन व सुधार लाएंगे, तो आपकी गणना उत्तम श्रेणी के लोगों में होने लगेगी।
इसी संदर्भ में मुझे याद आ रही हैं, वे पंक्तियां ‘जो बाहर की सुनता है, उसका बिखरना निश्चित है और जो भीतर की सुनता है, उसका निखरना व संवरना निश्चित है, अवश्यंभावी है’…उपरोक्त विचारों की पोषक हैं। सो! आप व्यर्थ की आलोचनाओं से हताश-निराश न हों, बल्कि उनसे प्रेरित होकर स्वयं में सुधार लाएं। हां! लोग तो आपको बातों में उलझा कर आपको पथभ्रष्ट करना चाहते हैं। परंतु वही मनुष्य वास्तव में महान् है, जो उनके कटाक्षों व निंदा से विचलित होकर बिखरता नहीं… बल्कि अपने अंतर्मन की पुकार सुन कर संवर जाता है, निखर जाता है। सो! माया रूपी सांसारिक आकर्षणों के पीछे न भागें और न ही दूसरों की आलोचना, व्यंग्य- बाण व कटाक्षों से हैरान-परेशान हों, बल्कि उनकी उपेक्षा कर निरंतर आगे बढ़ते जाएं … यही मानव का लक्ष्य है। हमें अपने अतीत से सीख लेकर, भविष्य के प्रति आश्वस्त होना चाहिए और वर्तमान में जीना चाहिए, क्योंकि वर्तमान ही सत्य है…उसे सुंदर बनाना अत्यंत कारग़र है, क्योंकि जो सुंदर होगा, कल्याणकारी अवश्य होगा। वर्तमान वह उपहार है, जो प्रभु-प्रदत्त है और आप उसे अपनी इच्छानुसार रूपाकार प्रदान करने में सक्षम हैं, समर्थ हैं।
(डॉ भावना शुक्ल जी (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान किया है। हम ईश्वर से प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – – बसंत ।)
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं.“साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – संस्कार और संस्कृति… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘पूजनीय वृक्ष…‘।)
☆ शशि साहित्य # ९ ☆
कविता – परम सत्य… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ
☆
उसको आना है, वो आएगी जरूर..
ना करेगी इंतजार, किसी स्नेह आमंत्रण का..
जब तय है आना, तो राह पर टकटकी कैसी..
सारी जद्दोजहद तो, जिंदगी के लिए
हंस के और हंसा के गुजरे,
तो सोने पर सुहागा है..
ना नाप पैमाने को, कि खाली है वो आधा,
दम रखता है वह बेतहाशा हिलोरें भरने का,
गर पूरा भर गया, तो छलक कर बह जाएगा..
मानव जीवन पाया, मौका मिला, नर से नारायण हो जाने का..
सृजन की क्षमता दे, ईश्वर ने अपने समकक्ष कर दिया,
फिर सोचना कैसा, योग्यता से अपनी, नारायणी बन जा ना..
☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ४ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆
भक्तीतून तुकारामांना प्राप्त झालेली अधिकार वाणी-
गाथेतील एकेक अभंग वाचत गेले की संत तुकाराम महाराजांना विठ्ठलाच्या भेटीची अत्यंत तळमळ लागून राहिली आहे, हे आपण पहिल्या तीन भागात पाहिले. अशी अनन्य भक्ती करत असताना पांडुरंगाशी ते कित्येक वेळा मोठ्या अधिकार वाणीने बोलत आहेत याची जाणीव होते.
पांडुरंगाने त्यांना भेट द्यावी म्हणून या अभंगातील महाराजांचा युक्तिवाद पहा.
ठाईची ओळख ही येईल टाकू टाका सुखी
तुमचे जाईल इमान माझे कपाळी पतन
ठेवीला तो ठेवा अभिलाषा बुडवावा
मनी न विचारा तुका म्हणे हे दातारा
स्वतःचा उद्धार करण्यासाठी तुकाराम महाराज विनवणी करत आहेत. ते म्हणतात, ” देवा, तुझी आणि माझी फार जुनी ओळख आहे, ती तू विसरू शकत नाहीस. जर विसरलास तर तूच बदनाम होशील. तुझे इमान जाईल आणि माझे पतन होईल. ” यासाठी ते दृष्टांत देतात. म्हणतात, ” एखाद्या जवळ कोणी काही ठेवा ठेवण्यासाठी म्हणून दिला आणि त्याच्याकडून तो काही कारणास्तव बुडाला, तर तो लोभाने बुडाला असेच म्हटले जाईल. म्हणून हे दातारा
या गोष्टीचा तू विचार कर (आणि मला दूर लोटू नकोस.)
कारे माझा तुज ये कळवळा
असोनी जवळा हृदयस्था
अगा नारायणा निष्ठा निर्गुणा
केला शोक नेणा कंठस्फोट
काय चित्त नाही पावत विश्रांती
इंद्रियाची गती खुंटेचीना
तुका म्हणे का हो धरीयेला कोप
सरले नेणो पाप पांडुरंगा
पांडुरंगा तू माझ्या हृदयात आहेस. इतका जवळ आहेस तरी तुला माझी करुणा का येत नाही?
हे नारायणा, तू देव असून गुणातीत आहेस, मग इतका निष्ठूर का आहेस? घसा फुटेपर्यंत मी रडलो तरी तू माझ्याकडे जराही लक्ष देत नाहीस. माझी विषयासक्ती दिवसेंदिवस वाढतच आहे, ती का थांबत नाही? माझे चित्त अजून शांत का होत नाही? देवा तू माझ्यावर रागावला आहेस का?
मधूनच ते विठ्ठलाशी अशा प्रकारे सलगीने बोलतात.
दीनानाथ तुझी ब्रिदे चराचर
घेशील कैवार शरणागता
तू दीनांचा स्वामी आहेस आणि तुला शरण आलेल्या तुझ्या भक्तांचा तू कैवारी आहेस.
पुराणी जे तुझे गरजेची पवाडे
ते आम्हा रोकडे कळो आले
आपल्या दासाचे न साहसी उणे
उभा त्या कारणे राहिलासी
तुका म्हणे तुज भक्तीचे कारण
करावया पूर्ण अवतार*
वेद पुराणात तुझी कीर्ती वर्णिली आहे. तुझ्या दासांवरची संकटे तुला सहन होत नाहीत. तू ती तात्काळ दूर करतोस. त्याच्यासाठी तू सदैव उभा आहेस. भक्ताचे कार्य पूर्ण करण्यासाठीच तुझे अवतार आहेत.
शिवाजी महाराजांवर परचक्रं आली, तेव्हा महाराज विठ्ठलाला अधिकाराने सांगतात.
न देखवे डोळा ऐसा हा आकांत
परपीडे चित्त दुःखी होते
काय तुम्ही येथे नसालसे झाले
आम्ही न देखीले पाहिजे हे
परचक्र कोठे हरिदासांच्या वासे
न देखजे ते देशे राहातिया
तुका म्हणे माझी लाजवीली सेवा
हीन पणे देवा जिणे झाले
देवाला निर्वाणीच्या शब्दात गाऱ्हणे घालतात. विठ्ठला, हा दुःखद प्रसंग मला पाहवत नाही. हे असे का व्हावे? त्यावेळी तू तेथे नव्हतास का?
अशा प्रकारचे दुःख आम्हाला दिसता कामा नये. हरिदासाच्या घरी परचक्र येतेच कसे? मी तुमची इतकी सेवा केली, तिला तुम्ही लाज आणली आणि मलाही न पणे जगणे प्राप्त झाले. — किती ही अधिकार वाणी!
पुढच्या अभंगात महाराज विठ्ठलाला सांगतात, हरी किर्तन आणि सर्व भक्त तरले जावेत, हे त्याचे खरे फळ आहे. हे जे परचक्र आले आहे, त्यावरून आपणच सगळा उच्छाद मांडला असावा असे वाटते. पूर्व जन्मातील पाप असल्याशिवाय असे पाप पुढे येत नाही हे या प्रसंगाने उघड आहे, पण जेथे तुमचे दास राहतात तेथे तुम्ही पण राहता हे मी खरे कसे मानावे? असा परखड प्रश्न महाराज देवाला विचारतात.
पुढील भागात अधिकारवाणीच्या आणखी काही अभंगांचा विचार मांडण्याचा प्रयत्न असेल.
☆ ।। श्री नारद उवाच ।। – नारद भक्ति सूत्रे — सूत्र ३७ व ३८ ☆ श्री संदीप रामचंद्र सुंकले☆
।। श्री नारद उवाच ।।
नारद भक्ती सूत्र क्र. ३७ आणि ३८.
भक्तीसूत्र ३७ – –
लोकेऽपि भगवतगुणश्रवणकीर्तनात् ॥३७॥
अर्थ :- साधकाने प्रपंचातील कामे करताना, लोकांमध्ये वावरताना भगवंताच्या गुणांचे श्रवण आणि कीर्तन करावे म्हणजे भक्ति संपन्न होते.
विवेचन:
मागील छत्तिसाव्या सूत्राचेच हे अधिक स्पष्टीकरण आहे असे म्हटले तरी चालेल. तेथे ‘भजन’ असे पद आहे. भजनात श्रवण-कीर्तनादिकाचाही अंतर्भाव होतो. लोकव्यवहारात भक्ती उत्पन्न होण्याकरिता भगवद्गुण श्रवण-कीर्तनादि साधनाचा अवलंब केला जातो. सत्संगतीत श्रद्धापूर्वक हरिगुण श्रवण-कीर्तनादिकानेच अंतःकरणात भगवतभाव निर्माण होतो व प्रेमवृद्धी होत असते. असा सर्व भक्तिमान पुरुषाचा अनुभव आहे.
आज संवादाची अनेक साधने उपलब्ध आहेत. माध्यम कोणतेही असले तरी त्याचा मुख्य हेतू ‘सुसंवाद’ हाच असतो आणि तोच असायला हवा. येत्या काळात आणखी काही साधनांची भर यात पडू शकेल. तंत्रज्ञान कितीही प्रगत झाले तरी ‘श्रवणकला’ अपरिहार्य राहील, यात दुमत असणार नाही.
दैनंदिन व्यवहार पाहिला तर लोकांची ऐकून घेण्याची क्षमता आज खूप क्षीण होत चालली आहे असे लक्षात येते. सध्या वैयक्तिक जीवनात आणि सामाजिक जीवनात एक गोष्ट लक्षात येते की एकतर लोकं पूर्णपणे ऐकत (श्रवण) नाहीत किंवा त्यांना ऐकायचेच नसते. आपलं लोकांनी ऐकावं असे प्रत्येकाला वाटते, परंतु दुसराही असा विचार करीत असेल, हे त्याच्या ध्यानातच येत नाही. याचा परिणाम असा होतो की लोकं स्वतःला व्यक्त करायचे टाळतात आणि त्यांच्या मनात अनेक बऱ्यावाईट गोष्टीं साचत जातात. जरा, आजूबाजूला डोळे उघडे ठेवून पाहिले तर याचे दुष्परिणाम प्रत्येकाला नक्कीच जाणवतील, काही जणांनी याचे चटके भोगलेही असतील, सहनही केले असतील.
– – सांगण्याचा मुद्दा असा आहे की जो मनुष्य शांतचित्ताने, पूर्ण एकाग्र होऊन श्रवण करतो, *त्याच्या मनाचा तळ आणि मनाच्या तळाशी असलेला मळ दोन्हीही अगदी स्वच्छ होऊन जाते*. उत्तम श्रोता असलेला मनुष्य कोणताही विषय सहज समजून घेऊ शकतो आणि त्यामुळे त्याची लौकिक आणि पारलौकिक जीवनात यशस्वी होण्याची शक्यता जास्त असते. नज्याला साधक व्हायचे आहे, त्याने आधी ऐकायला शिकावे. काय ऐकायचे? कसे ऐकायचे? कोणाचं ऐकायचे याचा विचार आपण पुढील लेखांत करू. जाता जाता एक वाक्यावर आपण चिंतन करू. *’समोरचा मनुष्य जे बोलतो ते ऐकायलाच हवे परंतु तो जे बोलू शकत नाही ते सुद्धा ऐकता यायला हवे. ‘*
– – मनुष्याला भगवंताने दोन कान आणि एक तोंड दिले आहे. कान ऐकण्याचे एकच काम करते, परंतु एकमेव असलेले तोंड बोलणे आणि खाणे अशी दोन कामे करीत असते. मनुष्याने दोन्ही कानांनी नीट लक्षपूर्वक ऐकावे आणि त्यानुरूप उत्तम अशी कृती केली जावी अशी भगवंतांची ईच्छा असावी. परंतु, सामान्यपणे मनुष्य बरेचवेळा नीट ऐकत नाही आणि जिथे त्याचा स्वार्थ साधला जाईल, तीच कृती करतो. यामुळे जरी तत्काळ फायदा होत असला तरी मनुष्याच्या पूर्ण आयुष्याचा विचार केला तर ते घातक ठरण्याची शक्यता जास्त असते. म्हणून मनुष्याने ‘अवधान’ देऊन ऐकावे आणि आपल्या सद्गुरूंना भूषण वाटेल अशी कृती करण्याचा प्रयत्न करावा. यासाठी ‘विवेका’ची कास धरावी. जो मनुष्य प्रत्येक गोष्ट विवेकाने करतो, तो मनुष्य यशस्वी होतो असे सर्व संत सांगतात.
*”ऐसें हें अवघेंचि ऐकावें । परंतु सार शोधून घ्यावें ।*
*असार तें जाणोनि त्यागावें । या नांव श्रवणभक्ति।।”*
(दा. 4. 1. 29)
भगवदगुण श्रवण हे अनेक अंगाने होत असते. कीर्तीश्रवण, चरित्रश्रवण, लीलाश्रवण, अवतारकथाश्रवण, भजनश्रवण, इ. नवविधा भक्तीमध्ये श्रवणभक्ती ही प्रथम सांगितली आहे. संसारातही एखाद्या वस्तूचे नाम व त्या वस्तूचे विशेष गुण याचे ज्ञान त्या त्या वस्तूचा वाचक जो शब्द त्याच्या श्रवणानेच होते. त्या वस्तूच्या ठिकाणी अनुकूल बुद्धी असली म्हणजे त्या वस्तूचे प्रेम निर्माण होते, म्हणून कथाश्रवणानेच भगवदभक्ती निर्माण होत असते.
*”तरी अवधान एकले दीजें । मग सर्व सुखासि पात्र होईजे । हें प्रतिज्ञोत्तर माझें । उघड ऐका ।।*
(ज्ञा. 9. 1)
श्रीज्ञानेश्वर माऊली म्हणतात, *’अहो श्रोते हो, तुम्ही एकवेळ श्रवणाकडे लक्ष द्या, म्हणजे मग सर्व सुखाला पात्र व्हाल. हे माझे उघड प्रतिज्ञेचे बोलणे ऐका. *
“ज्ञाना’ची ईश्वर असलेली आपली ज्ञानेश्वरमाऊली आपल्याला कळकळीने सांगत आहेत की श्रोते जनहो अवधान देऊन ऐका. अवधान म्हणजे कोणतेही कार्य करण्यासाठी प्राण्याने केलेली देह-मनाची सिद्धता होय. अवधानात जाणिवेचे केंद्रीकरण असते आणि इष्ट विषय जाणिवेच्या केंद्रस्थानी आणला जातो. थोडक्यात, अवधान देणे म्हणजे नीट लक्ष देऊन ऐकणे.
– – *मनुष्य अवधान देऊन ऐकायला शिकला तर त्याच्या जीवनातील ५०% समस्या कमी होतील असे वाटते. आपण ‘अवधानी’ होण्याचा प्रयत्न करू. *
जय जय रघुवीर समर्थ।
भक्तिसूत्र ३८ – –
मुख्यतस्तु महत्कृपयैव भगवत्कृपालेशाद्वा ॥ ३८ ॥
अर्थ : प्रामुख्याने पराभक्ती ही केवळ सत्पुरुषांच्या कृपेमुळेच किंवा भगवंताच्या अल्पशा, अंशात्मक कृपेमुळेच प्राप्त होत असते.
विवेचन :
मागील चौतिसाव्या सूत्रात त्या भक्तिप्राप्तीची साधने आचार्यगुण सांगतात असे सांगून पुढील सूत्रातून विषयत्याग, संगत्याग, अव्यावृत भजन, भगवद्गुण-श्रवण, कीर्तनादि साधनांचा अनुवाद केला आहे. जेव्हा अनेक साधने सांगितली जातात तेव्हा त्यांत गौणमुख्यभाव निर्माण होतो, मग या साधनांत श्रेष्ठ व मुख्य कोण, असा संशय आला असता या अडतिसाव्या सूत्रात त्याचे उत्तर देतात. ही मागील साधनेही तत्त्वतः अमुख्यच आहेत. मुख्य साधन महात्मे जे संत त्यांची कृपा अथवा भगवतकृपेचा अंश का होईना पण तो प्राप्त होणे हे आहे. जे जे भक्तिमान पुरुष म्हणविले गेले ते महात्म्यांच्या कृपेने किंवा भगवत्कृपेनेच प्रेमभक्तीचे अधिकारी बनले. इतर सर्व साधनांना फलद्रूप होण्याकरितादेखील महात्म्यांची कृपा लागते.
शेतकऱ्याने धान्य पिकविणे आणि साधकाने भगवंत प्राप्तीसाठी साधना करणे या दोन गोष्टी वेगवेगळ्या आहेत असे मला वाटत नाही. दोन्ही ठिकाणी फळ अपेक्षित आहे. जो हाडाचा शेतकरी आहे, तो अन्य फुटकळ गोष्टीत वेळ न घालवता, आपल्या जमिनीची पुरेशी मशागत करतो. पावसाचा अंदाज घेऊन उत्तम अशा बियाण्याची पेरणी करतो. आवश्यक ती खते पुरवितो, शेतात मध्येच उगवणारे तण काढतो. बांधबंदिस्ती करतो. पाखरांपासून शेताची राखण करतो. पीक चांगले येईल या एका आशेने देवावर विश्वास ठेवून तो हे सर्व काही करीत असतो. जमिनीत पेरलेले बियाणे नक्की रुजेल असा त्याचा विश्वास असतो. यातील एक पाऊस सोडला तर बाकीच्या गोष्टी सर्वसाधारणपणे त्याच्या हातात असतात. भगवंत योग्य वेळी आणि योग्य प्रमाणात पाऊस पाडतो, तेव्हा शेतकऱ्याला मुबलक आणि उत्तम प्रतीचे धान्य मिळते असे म्हटलं तर अतिशयोक्ती होणार नाही. परमार्थ साधनेत सुद्धा हेच सूत्र उपयोगी पडते. साधक साधना नेटाने करू शकतो, पण त्यावर पाऊस रुपी कृपेचा वर्षाव करणे हे निव्वळ त्याच्या कृपेमुळेच शक्य आहे. अनेक साधकांचे चरित्र अभ्यासले तर आपल्याला सहज लक्षात येईल.
सर्वश्रेष्ठ भक्त प्रल्हादाचे चरित्र आपण पाहू. बाळ प्रल्हाद नारायण नारायण असा जप करीत असे. त्याच्या पित्याने त्याला अनेक वेळा, अनेक प्रकारे छळले. त्याने ते सर्व छळ अत्यंत शांत राहून सोसले. मग भगवंताला दया आली आणि मग तो स्तंभातून प्रगट झाला. अमुक एक गोष्ट केली की भगवंत प्रगट होतो, दर्शन देतो असे सांगता येणार नाही.
माता शबरी भगवंत येणार म्हणून आपली कुटी सजवत होती, आपल्या घरासमोरील पायवाट झाडून ठेवत होती. असे करता करता ती वृद्ध झाली, मग एक दिवस प्रभू श्रीराम तिच्या कुटीत आले. तिच्या हातची उष्टी बोरे खाल्ली.
महर्षी नारद एक गोष्ट इथे अधोरेखित करतात, ती म्हणजे सत्संगती. काहीही झाले तरी साधकाने सत्संगती सोडू नये. आणि आजच्या भीषण कलियुगात नामासारखी शुद्ध संगत असूच शकत नाही असे सर्व संत सांगतात.
संत तुकाराम महाराज म्हणतात,– –
“नाम घेता वांयां गेंला । ऐसा कोणे आईकिला ॥१॥
सांगा विनवितो तुम्हांसी । संत महंत सिद्ध ॠषी ॥२॥
नामे तरला नाही कोण । ऐसा द्यावा निवडून ॥३॥
सलगींच्या उत्तरा । तुका म्हणे क्षमा करा ॥४॥”
(संदर्भ~ अभंग क्रमांक २२७३. सार्थ तुकाराम गाथा धार्मिक प्रकाशन संस्था.)
(प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक साहित्य ” में हम श्री विवेक जी की चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी , जबलपुर ) से सेवानिवृत्त हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। आपको वैचारिक व सामाजिक लेखन हेतु अनेक पुरस्कारो से सम्मानित किया जा चुका है।आज प्रस्तुत है एक विचारणीय कथा – “बर्फ में धूप ” ।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३९६ ☆
कथा – कहानी – बर्फ में धूप श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
डॉक्टर राजिंदर कुमार अपने टोरंटो स्थित अपार्टमेंट की खिड़की से बाहर देख रहे थे। कनाडा की सफेद, चुभती ठंड शीशे के पार दुनिया को जमा देना चाहती थी। सब कुछ बर्फ़ से ढका था। गाड़ियाँ, पेड़, सड़क, दिख रहे थे तो बर्फ पर कदमों के निशान। यह एकांगी, निस्तब्ध सफेद सुंदरता थी, जिसमें उनकी आत्मा की गूँज खो जाती थी। अंदर, हीटर की समान गरमाहट थी, सरकारी पेंशन की नियमितता थी, स्वास्थ्य सेवाओं का भरोसा भी था, एक आत्मनिर्भर, पूर्ण दुनिया, जो अचानक बहुत खोखली लगने लगी थी।
उनकी नज़र सोफे के पास टंगे एक फोटो फ्रेम पर टिक गई। पंजाब के अपने गाँव ‘चमकपुर’ की एक पुरानी तस्वीर। गर्मी की दोपहर, नहर का पानी चमक रहा है, खेतों में हरियाली लहरा रही है, और दूर, गुरुद्वारे का निशान साहब, चमक रहा है। यह वह गाँव था जिसे उन्होंने पचास साल पहले, डेंटिस्ट्री की पढ़ाई के लिए चंडीगढ़ आने के बाद छोड़ा था। फिर संघर्ष, फिर सपना, बेहतर जीवन, बेहतर कमाई। राकेश कौर उनके साथ थीं, उनका प्यार, उनका सहारा था। कनाडा आने का फैसला साथ में किया था, नए सिरे से शुरुआत करने का जोश। राकेश ने ही इस अपार्टमेंट को घर बनाया था, पंजाबी मसालों की खुशबू से, गुरबाणी के शब्दों से, उनकी मंजिल को गर्मजोशी से सराबोर कर दिया था।
पर पाँच साल पहले, राकेश चली गईं, एकाएक, दिल का दौरा पड़ने से। उनके साथ वह धूप भी चली गई जो कनाडा की सबसे अधिक ठंडक में भी धूप से ज़्यादा गर्म प्यार का अहसास थी। राजिंदर अकेले रह गए। इसी अकेलेपन ने, रिटायरमेंट के बाद, उन्हें फिर से जड़ों की तलाश में चमकपुर ने बुला लिया।
लेकिन गाँव बदल चुका था। नहर अब कंक्रीट की नाली थी। पुराने पेड़ कट चुके थे। चौपाल की जगह एक ‘यूथ क्लब’ ने ले ली थी, जहाँ लड़के मोबाइल पर बिजी रहते। रिश्तेदार मिले, पर उनकी बातचीत का केंद्र बिंदु अक्सर यही होता “कनाडा में तो बहुत पैसा है न?”, “हमारे बेटे के लिए वीजा स्पॉन्सर कर दो। ” उस ‘अपनेपन’ की तलाश, जो राजिंदर की यादों में कैद था, वह हवा हो चुकी थी।
एक दिन, स्थानीय ‘शब्द साधना साहित्य परिषद’ के सचिव, श्री ओमप्रकाश शर्मा, उनसे मिले। बड़े आदर से, फूलमाला पहनाकर।
ओमप्रकाश ने कहा “डॉक्टर साहब! आप तो विदेश से आए हुए साहित्य के महान पारखी हैं! हम आपके नाम पर एक ‘राजिंदर कुमार साहित्य रत्न सम्मान’ शुरू करना चाहते हैं। देश की सेवा का यह पुनीत अवसर है। “
राजिंदर ने खुश होकर कहा, “ज़रूर, यह तो बहुत अच्छी बात है। मैं कैसे मदद कर सकता हूँ?”
ओमप्रकाश अपनी योजना सफल समझ मुस्कुराते हुए बोले “बस एक छोटी सी संस्थागत फीस है… तीन लाख रुपये। हमारे पास आपका चेक स्वीकार करने की सुविधा भी है। “
राजिंदर का दिल बिना कहे एक पल में काफी कुछ समझ गया। यह पहला झटका नहीं था। कई ‘संस्थाओं’ के फोन आ चुके थे। उनके ‘विदेशी’ होने ने, उनकी साहित्यिक रुचि को एक ‘लेन-देन’ में बदल दिया था। उन्होंने विनम्रता से मना कर दिया। लेकिन फोन आते रहे। कभी सुबह, कभी रात। एक तरफ पंजाब की वह याद, दूसरी तरफ इस तरह की मांगों से उपजी विरक्ति।
और फिर वह दिन आया। भारत में सुबह के दस बजे थे, धूप फैलने का वक्त। पर टोरंटो में अँधेरी, बर्फ़ीली रात के दो बजे थे। फोन की कर्कश घंटी ने नींद तोड़ दी।
अनजान आवाज़, “नमस्ते डॉक्टर साहब, मैं ‘काव्य भारती’ से बोल रहा हूँ। आपको ‘वैश्विक पंजाबी रत्न’ से सम्मानित किया जाएगा। बस कुछ प्रबंध खर्च…”
राजिंदर ने फोन काट दिया। उनकी नींद उचट गई थी। वह खिड़की के पास गए। बाहर, एक निर्मम, खामोश बर्फ़बारी जारी थी। उन्हें लगा जैसे वह खुद दो टुकड़ों में बँट गए हैं। एक टुकड़ा यहाँ, इस बर्फीली नियमितता में फँसा हुआ तो दूसरा टुकड़ा, उस चमकपुर में भटक रहा है जो अब है पर बचा ही नहीं। वह न तो यहाँ के थे, न वहाँ के। एक ‘विभक्ति’ उनके भीतर घर कर गई।
कई रातों की मानसिक जद्दोजहद के बाद, एक सुबह, जब पहली किरण बर्फ पर पड़ी और सब कुछ हीरे की तरह जगमगा उठा, तो एक शांति उन पर छा गई। उन्होंने खिड़की से बाहर देखा। यह दृश्य उनका था। यह ठंड उन्होंने झेली थी। यहाँ उन्होंने दाँत दर्द से तड़पते मरीजों को राहत दी थी। यहीं राकेश उनके साथ थीं। “प्रारब्ध, ” उन्होंने धीरे से कहा, “यही हमारी कर्मभूमि बना दी गई। यहाँ हमारा दाना-पानी रहा। अब यही घर है। “
उसी दिन उन्होंने अपनी वसीयत लिखी। कोई भव्यता नहीं। सादगी से। इलेक्ट्रिक भट्टी में शवदाह। और फिर… उनकी चुटकी भर राख नियाग्रा प्रपात के उफनते, गर्जते जल में प्रवाहित कर दी जाए। वह शक्तिशाली, अनंत प्रवाह, जो सब कुछ अपने में समा लेता है। उनकी जीवन यात्रा, उनकी यादें, उनका पंजाब और उनका कनाडा, सब कुछ एक हो जाए।
और एक अंतिम निर्देश, टोरंटो के ही एक गुरुद्वारे में, ‘डॉ. राजिंदर कुमार एंड राकेश कौर साहित्य संवाद’ नाम से एक वार्षिक कोष स्थापित किया जाए। बिना किसी शोर-शराबे के, बिना किसी फीस के, सिर्फ़ शब्दों के लिए, विश्व हिंदी साहित्य के लिए।
डॉक्टर राजिंदर कुमार ने एक बार फिर खिड़की से बाहर देखा। बर्फ अब भी गिर रही थी। पर अब वह उसकी खामोशी में एक संगीत सुन पा रहे थे। यह उनकी ख़ामोशी थी। यह उनका घर था। और इस बार, देर रात फोन बजने से उनकी नींद उचटने वाली नहीं थी, वे वसीयत कर चुके थे।
(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)
जीवन के कुछ अनमोल क्षण
तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित।
मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी से भेंट करते हुए।
बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए।
आप प्रत्येक गुरुवार डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के साप्ताहिक स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी विचारणीय व्यंग्य – आयुष्मान भव अमित बेटा !)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ चुभते तीर # ७८ – व्यंग्य – आयुष्मान भव अमित बेटा ! ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’☆
(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार)
आयुष्मान भव अमित बेटा,
तेरा लंबा-चौड़ा ‘शोक संदेश’ मिला। उसे पढ़कर ऐसा लगा जैसे हमने घर की सफाई नहीं की, बल्कि संयुक्त राष्ट्र संघ की कोई पुरानी लाइब्रेरी जला दी हो। तूने शहर में रहकर शब्दों की खेती तो अच्छी सीख ली है, पर ये भूल गया कि खेत जब तक जोता न जाए, तब तक उसमें अगली फसल नहीं उगती। तू कह रहा है कि हमने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ कर दी? बेटा, ये तो मामूली ‘डस्टिंग’ थी, असली स्ट्राइक तो तूने उस दिन की थी जब तूने यहाँ की यादें एक सूटकेस में ठूँसी थीं और शहर जाकर ‘सेट’ हो गया था। तूने तो वाट्सएप पर फोटो देखकर घर को ‘ऑपरेशन थिएटर’ बता दिया, पर कभी उस सन्नाटे को महसूस किया है जो उन अस्सी के दशक के अखबारों में दीमक बनकर रेंग रहा था? तूने तो इसे ‘मिनिमलिज्म’ का नाम दे दिया, पर हम इसे ‘बोझ उतारना’ कहते हैं।
रही बात उन अखबारों की ‘बौद्धिक जागीर’ की, तो बेटा, ज्ञान जब रद्दी बन जाए तो उसे बेच देना ही बुद्धिमानी है। उन अखबारों में ‘उम्मीदें जवान’ थीं, ये सच है, पर उन उम्मीदों पर तीस साल की धूल जम चुकी थी। तू शहर में बैठकर ‘क्लाउड’ की बातें कर रहा है, यहाँ ज़मीन पर उन अखबारों के नीचे बिच्छू पल रहे थे। तू चाहता था कि मैं महासिंह को वे खबरें सुनाऊँ जो अब इतिहास के कूड़ेदान में जा चुकी हैं? अब महासिंह खुद ‘डिजिटल’ हो गया है, वह अब अखबार की सुर्ख़ियों से नहीं, अपनी पेंशन की ‘ओटीपी’ से डरता है। जिसे तू ‘यादों का इलाज’ कह रहा है, वह दरअसल पुरानी कब्ज थी, जिसे संक्रांति के बहाने हमने साफ कर दिया। अब घर में सन्नाटा नहीं, चैन की सांस गूँजती है।
तेरी माँ की पीतल की परात पर तो तूने पूरा ‘आर्थिक सर्वेक्षण’ ही पेश कर दिया। तू कह रहा है कि वह खानदान की ‘जीडीपी’ थी? अरे मूर्ख, उस परात का वज़न इतना था कि तेरी माँ की कमर ‘आर्थिक मंदी’ का शिकार हो गई थी। तूने तो उसे ‘उत्सव की खनक’ कह दिया, पर उसे माँजते-माँजते तेरी माँ के हाथों की लकीरें मिट गईं, वह तुझे कभी नहीं दिखा। तू जिसे ‘बचपन की चिपचिपाहट’ कह रहा है, उसे यहाँ ‘गंदगी’ कहते हैं। तू शहर में नॉन-स्टिक पैन में ‘ऑमलेट’ खाता है और हमें यहाँ पीतल की भारी गुलामी की सलाह दे रहा है? यह वैसा ही है जैसे कोई खुद तो मर्सिडीज़ में घूमे और अपने बाप को उपदेश दे कि ‘बाबू जी, पैदल चलने में जो मिट्टी की सोंधी खुशबू है, वह कार में कहाँ!’
वह ‘सस्पेंस वाला संदूक’ तुझे अभी भी याद है? शुक्र कर कि उसे नहीं खोला, वरना उसमें तेरी उन ‘बौद्धिक जागीरों’ का कच्चा चिट्ठा निकलता जिसे तू यादों के नाम पर यहाँ छोड़ गया था। उसमें तेरी वे फटी कमीजें नहीं, तेरा वह आलस बंद है जिसे तू कभी समेटकर नहीं ले गया। तू कह रहा है कि हमने खुद को ‘म्यूजियम का चौकीदार’ बना लिया है? बेटा, म्यूजियम में वे चीजें रखी जाती हैं जिनका वर्तमान मर चुका हो। हम तो घर को ‘घर’ बना रहे हैं, ‘कबाड़खाना’ नहीं। तुझे अगर म्यूजियम ही देखना है तो कभी अपने उस शहर वाले फ्लैट के स्टोर रूम में झाँकना, जहाँ तूने आधी किस्तों पर लिया हुआ सामान ‘स्टेटस सिंबल’ के नाम पर ठूँस रखा है।
तूने लिखा है कि फर्श पर ‘फिसलने’ से बचना। बेटा, फर्श पर वे फिसलते हैं जिनके पैर ज़मीन पर नहीं होते। हम तो सालों से इसी मिट्टी पर टिके हैं। तुझे डर है कि रद्दी के ढेर नहीं होंगे तो गिरने पर हमें कौन बचाएगा? अरे, गिरने का डर उन्हें होता है जो ‘मिनिमलिज्म’ का ढोंग करते हैं, हम तो उस पीढ़ी के लोग हैं जो गिरकर खुद संभलना जानते हैं। तूने जिसे ‘सन्नाटे की गूँज’ कहा है, वह दरअसल ‘शांति’ है, जो तुझे शहर के ट्रैफिक और ऑफिस की किच-किच में कभी समझ नहीं आएगी। तुझे शोर में रहने की इतनी आदत हो गई है कि तुझे सुकून भी ‘बीमारी’ जैसा लग रहा है।
तू कहता है कि बिना कबाड़ के घर ‘सैंपल फ्लैट’ लगता है। तो सुन, यह ‘सैंपल फ्लैट’ कम से कम उस ‘गोदाम’ से तो बेहतर है जिसमें हम सालों से साँस ले रहे थे। तू शहर में ‘स्पेस’ (Space) के लिए लाखों रुपये लुटाता है, और हमें यहाँ चार कोने साफ करने पर ‘दर्शनशास्त्र’ पढ़ा रहा है? ‘नया नौ दिन, पुराना सौ दिन’ वाली कहावत तूने अच्छी झाड़ी, पर यह भी याद रख कि ‘पुरानी जूती काटती ज्यादा है’। हमने जो निकाला, वह कचरा था; और जिसे तू ‘याद’ कह रहा है, वह तेरा मोह है जो तूने यहाँ डंप कर रखा था ताकि खुद शहर में आज़ाद रह सके।
महासिंह और मेरी पंचायत की चिंता तू मत कर। अब हम पुराने अखबारों पर नहीं, नई तकनीक पर चर्चा करते हैं। कल ही महासिंह कह रहा था कि अमित का पत्र आया है, लड़का बहुत भावुक हो गया है। मैंने कहा—’भावुक नहीं हुआ है, उसे डर है कि जब वह अगली बार आएगा तो उसे अपना पुराना कबाड़ यहाँ नहीं मिलेगा जिसे देखकर वह अपनी महानता के किस्से सुनाता था।’ तू चाहता है कि हम तेरी पुरानी फटी कमीजों की पूजा करें ताकि तुझे लगे कि तेरा बचपन सुरक्षित है? बेटा, यादें दिल में होती हैं, दीमक लगे कागजों में नहीं।
तेरी माँ ने जो नॉन-स्टिक पैन लिया है, उसमें वह ‘चिपचिपाहट’ वाकई नहीं है जिसकी तू वकालत कर रहा है। वह चिपचिपाहट तो उस तेल की थी जिसे खा-खाकर तू शहर जाकर ‘जिम’ की सदस्यता ले चुका है। तू यहाँ की रसोई में ‘संस्कार’ ढूँढ रहा है और खुद वहाँ ‘माइक्रोवेव’ की प्लास्टिक की थालियों में खाना गरम करता है। यह दोगलापन शहर की हवा में है या तेरे शब्दों में? माँ कह रही है कि ‘अमित से कहना कि अब उस स्टील के कटोरे में खाना खाएगा तो शायद उसकी बुद्धि भी थोड़ी स्टील जैसी साफ़ और मज़बूत हो जाए।’
बेटा, घर ‘बौद्धिक रूप से दिवालिया’ नहीं हुआ है, बल्कि ‘मानसिक रूप से अमीर’ हुआ है। हमने अपनी पहचान उन पुरानी चीजों से नहीं बनाई थी। हमारी पहचान तो तू है, पर तू तो खुद को ‘शहर में सेट’ बताकर हमसे अलग कर चुका है। तू जब आता है, तो यहाँ की हर चीज़ को ‘एंटीक’ नज़र से देखता है, जैसे तू किसी विदेशी दौरे पर आया हो। हमें ‘शो-पीस’ बनकर रहने का शौक नहीं है। हम तो चाहते थे कि तू आए तो तुझे एक साफ कमरा मिले, पर तुझे तो उस धूल से प्यार है जिसे तू खुद झाड़ना नहीं चाहता।
तूने लिखा है कि तू ‘नया कबाड़’ लेकर आएगा। शौक़ से लाना, पर याद रखना कि इस बार कबाड़ रखने का ‘किराया’ लगेगा। तू शहर का कचरा यहाँ डंप करेगा और हम उसे ‘संस्कृति’ मानकर सहलाते रहेंगे, ये दिन अब लद गए। संक्रांति पर हमने सिर्फ घर की सफाई नहीं की, अपनी सोच की भी झाड़-पोछ की है। अब यहाँ सन्नाटा नहीं, वह सुकून है जिसकी तलाश में तू ‘मेडिटेशन’ के ऐप डाउनलोड करता फिरता है। अगली बार आए तो यादों का गट्ठर नहीं, अपनापन लेकर आना—बिना किसी व्यंग्य के।