(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं शृंखला में आज प्रस्तुत हैं उनकी एक भावुक एवं मार्मिक लघुकथा “गौरव ”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी की लघुकथाएं # 6 ☆
☆ गौरव ☆
माता पिता ने अपने इकलौते बेटे का नाम रखा गौरव।
मां हमेशा कहती बेटा जैसा नाम रखा है, वैसा कुछ काम करना। बस छोटे से बाल मन में ये बात घर कर गई थीं।
धीरे-धीरे बड़ा हुआ गौरव। गौरव ने बारहवीं कक्षा अच्छे नम्बरों से पास करने के बाद देश सेवा में जाने की इच्छा बताया। आर्मी बटालियन का पेपर, फिर ट्रेनिंग के बाद सिलेक्शन हो गया। और एक दिन बाहर बार्डर पर तैनात हो गया।
हमेशा मां की बात मानने वाला गौरव भारत माँ की निगरानी, रक्षा करते नहीं थकता था। माँ शादी की बात करने लगी। वह हँस कर कहता मुझे अभी भारत माता की सेवा करनी है। माता-पिता भी कुछ न कहते।
एक दिन सुबह सब कुछ अनमना सा था। माँ को समझ नहीं आ रहा था। दरवाजे पर एक सिपाही आया देख पिता जी बाहर आकर पूछे क्या बात हैं? उसने बड़े ही दर्द के साथ बताया कि गौरव भारत मां की रक्षा करते शहीद हो गया।
माँ समझ गई। रो रो कर कह उठी “मेरा गौरव मेरी बात का इतना बड़ा मान रखेगा। मैं जान न सकी। गौरव इतना महान बनेगा।” माँ का रूदन रूक ही नहीं रहा था।
(वरिष्ठ मराठी साहित्यकार श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे जी का अपना एक काव्य संसार है । साप्ताहिक स्तम्भ अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती शृंखला की अगली कड़ी में प्रस्तुत है एक भावप्रवण कविता “ अपहरणाचा बळी ”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # 6 ☆
(श्री जयप्रकाश पाण्डेय जी की पहचान भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी के अतिरिक्त एक वरिष्ठ साहित्यकार की है। वे साहित्य की विभिन्न विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं। उनके व्यंग्य रचनाओं पर स्व. हरीशंकर परसाईं जी के साहित्य का असर देखने को मिलता है। परसाईं जी का सानिध्य उनके जीवन के अविस्मरणीय अनमोल क्षणों में से हैं, जिन्हें उन्होने अपने हृदय एवं साहित्य में सँजो रखा है । प्रस्तुत है साप्ताहिक स्तम्भ की तीसरी कड़ी में उनकी एक सार्थक व्यंग्य कविता “तमाशा”। अब आप प्रत्येक सोमवार उनकी साहित्य की विभिन्न विधाओं की रचना पढ़ सकेंगे।)
(सुप्रसिद्ध युवा साहित्यकार, विधि विशेषज्ञ, समाज सेविका के अतिरिक्त बहुआयामी व्यक्तित्व की धनी सुश्री अनुभा श्रीवास्तव जी के साप्ताहिक स्तम्भ के अंतर्गत हम उनकी कृति “सकारात्मक सपने” (इस कृति कोम. प्र लेखिका संघ का वर्ष २०१८ का पुरस्कार प्राप्त) को लेखमाला के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। साप्ताहिक स्तम्भ – सकारात्मक सपने के अंतर्गत आज छठवीं कड़ी में प्रस्तुत है “खुशी की तलाश” इस लेखमाला की कड़ियाँ आप प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे।)
नया साल आ गया, हमने पार्टियां मनाई, एक दूसरे को बधाई दी नये संकल्प लिये, अपनी पुरानी उपलब्धियो का मूल्यांकन और समीक्षा भी की. खुशियाँ मनाई. दरअसल हम सब हर पल खुशी की तलाश में व्यथित हैं. खुशी की तलाश के संदर्भ में यहाँ एक दृष्टांत दोहराने और चिंतन मनन करने योग्य है. एक जंगल में एक कौआ सुख चैन से रह रहा था. एक बार उड़ते हुये उसे एक सरोवर में हंस दिखा, वह हंस के धवल शरीर को देखकर बहुत प्रभावित हुआ. उसे लगा कि वह इतना काला क्यो है ? कौआ हीन भावना से ग्रस्त हो गया. उसे लगा कि धवल पंखी हंस सबसे अधिक सुखी है. कौए ने हंस से जाकर अपने मन की बात कही, तो हंस ने जवाब दिया कि मित्र तुम सही कह रहे हो मैं स्वयं भी अपने आप को सबसे अधिक भाग्यशाली और सुखी मानता था पर कल जब मैने तोते को देखा तो मुझे लगा कि मेरे पंखो का तो केवल एक ही रंग है वह भी सफेद, जबकि तोता कितना सुखी पंछी है उसके पास तो लाल और हरा दोनो रंग हैं, और वह मधुर आवाज में बोल भी सकता है. जब से मैं तोते से मिला हूँ मुझे लगने लगा है कि तोता मुझसे कही ज्यादा भाग्यशाली और सुखी पक्षी है. हंस के मुँह से ऐसी बातें सुनकर कौआ तोते के पास जा पहुँचा और उससे सारी कथा कह सुनाई. तोते ने कौए से कहा कि यह तो ठीक है पर सच यह है कि मैं बहुत दुखी हूँ क्योंकि कल ही मेरी मुलाकात मोर से हुई थी और उसे देखकर मुझे लगता है कि भगवान ने मेरे साथ बड़ा अन्याय किया है, मुझे केवल दो ही रंग दिये हैं जबकि मोर तो सतरंगा है, वह सुंदर नृत्य भी कर पाता है. तोते से यह जानकर कि वह भी सुखी नहीं है, कौआ बड़ा व्यथित हुआ, उसने मोर से मिलने की ठानी. वह मोर से मिलने पास के चिड़ियाघर जा पहुँचा. वहाँ उसने देखा कि मोर बच्चो की भीड़ से घिरा हुआ था, उसे देखकर सभी बहुत प्रसन्न हो रहे थे. कौ॓ए ने मन ही मन सोचा कि वास्तव में मोर से सुखी और कोई दूसरा पक्षी हो ही नहीं सकता. वह सोचने लगा कि काश उसके पास भी मोर की तरह सतरंगे पंख होते तो वह कितना सुखी होता. जब मोर के पिंजड़े के पास से लोगों की भीड़ समाप्त हुई तो कौआ मोर के पास जा पहुँचा और उसने मोर को अपनी पूरी कथा सुना डाली कि कैसे वह हंस से मिला फिर तोते से और अब खुशी की तलाश में उस तक पहुँचा है. कौए की बातें सुनने के बाद मोर ने उससे कहा मैं सोचा करता था कि सचमुच मैं ही सबसे सुंदर और सुखी पक्षी हूं, पर जब मुझे कल मौका मिला तो मैने सारे चिड़ियाघर का निरीक्षण किया. मैने देखा कि यहाँ हर पक्षी छोटे या बड़े पिंजड़े में कैद करके रखा गया है. मेरी सुंदरता ही मेरी दुश्मन बन गई है और मैं यहां इस पिंजड़े में कैद करके रखा गया हूं. मोर ने कहा कि तब से मैं यही सोचता हूं कि काश मैं कौआ होता तो खुले आसमान में मन मर्जी से उड़ तो सकता, क्योंकि केवल कौआ ही एकमात्र ऐसा पक्षी है जिसे यहां चिड़ियाघर में किसी पिंजड़े में कैद नही रखा गया है. मोर के मुँह से यह सुनकर कौआ सोच में पड़ गया कि वास्तव में सुखी कौन है?
हमारी स्थितियां भी कुछ ऐसी ही हैं, हम अपने परिवेश में व्यर्थ ही किसी से स्वयं की तुलना कर बैठते हैं और फिर स्वयं को दुखी मान लेते हैं. उस जैसे सुख पाने के लिये तनाव ग्रस्त जीवन जीने लगते हैं. सचाई यह है कि हर व्यक्ति स्वयं में विशिष्ट होता है, जरूरत यह होती है कि हम अपनी विशिष्टता पहचानें और उस पर अभिमान करें न कि किसी दूसरे से व्यर्थ की तुलना करके दुखी हों. आत्म सम्मान के साथ अपनी विशेषता को निखारना हमारा उद्देश्य होना चाहिये. अपनी उस विशेषता को अपने परिवेश में सकारात्मक तरीके से फैलाकर समाज के व्यापक हित में उसका सदुपयोग करने का हमको प्रयत्न करना चाहिये. आइये नये साल के मौके पर हम सब यह निश्चित करें कि हम दूसरो से व्यर्थ ही ईर्ष्या नही करेंगे, अपने गुणो का जीवन पर्यंत निरंतर सकारात्मक विकास करेंगे और स्वयं के व व्यापक जन हित में अपने सद्गुणो का भरपूर उपयोग करेंगे.
(श्रीमती रंजना मधुकरराव लसणे जी हमारी पीढ़ी की वरिष्ठ मराठी साहित्यकार हैं। सुश्री रंजना एक अत्यंत संवेदनशील शिक्षिका एवं साहित्यकार हैं। सुश्री रंजना जी का साहित्य जमीन से जुड़ा है एवं समाज में एक सकारात्मक संदेश देता है। निश्चित ही उनके साहित्य की अपनी एक अलग पहचान है। अब आप उनकी अतिसुन्दर रचनाएँ प्रत्येक सोमवार को पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है उनका एक आलेख “प्राथमिक शाळेतील समस्या” जो प्राथमिक शालाओं की समस्याओं एवं शिक्षकों के दायित्व की विवेचना करता है। उनके जीवन में उनके प्रत्येक विद्यार्थी की शिक्षा का कितना महत्व है,आप यह आलेख पढ़ कर ही जान सकेंगे। मैं ऐसी शिक्षिका और उनकी लेखनी को नमन ही कर सकता हूँ। )
साप्ताहिक स्तम्भ – रंजना जी यांचे साहित्य #-6
? प्राथमिक शाळेतील समस्या ?
*शिक्षणाचा लावी लळा
माझा गुरूजी सावळा।
कलागुणांचा सोहळा
बाल गोपाळांचा मेळा*
अशा आमच्या गुरूजींच्या खांद्यावर शिक्षणाची धूरा अगदी गुरूकुल परंपरे पासून आजपर्यंत समाजाने सोपवली आहे.
याच समाजाने गुरूला ब्रह्मा विष्णू महेशाचीही उपमा दिलेली.
विद्यार्थी जीवनात,अगदी विधात्या प्रमाणे विद्यार्थ्यांच्या उत्पत्ती, स्थिती व लय निर्मितीचे अधिकारच समाजाने आपल्याला दिलेले आहेत. आपण विद्यार्थ्यांचे भाग्यविधाता आहोत या भूमिकेतून जर आपण सर्व अडचणींकडे पाहिले तर निश्चितच सर्व अडचणी क्षुल्लक वाटायला लागतील .कारण भाग्य विधाता ही उपाधी सर्व अडचणीवर मात करण्याची स्फूर्ती नक्कीच देऊन जाते.
*माझाएक विद्यार्थी शिक्षणा पासून वंचित राहिला म्हणजेच मी एक आयुष्य लयालानेले* ही जाणीव जेव्हा आपल्याला होईल तेव्हा शिक्षकांना कुठली अडचणच दिसणार नाही. मुख्य म्हणजे शाळेतील मुलं ही माझी मुलं आहेत ही भावना ज्या दिवशी निर्माण होईल, त्या दिवशी आपोआपच त्यांच्या संबंधातील सारे हक्क आणि कर्तव्य आपोआपच माझ्याकडे असतीलच यात तिळमात्र शंका नाही. तेव्हा आपण आज समोर बसलेली माझीच मुले आहेत असे गृहीत धरून अडचणींकडे पाहू या म्हणजे त्यांच्या सर्व समस्या माझ्या होतील आणि माझी समस्या कितीही कठीण असेल तरीही मी ती सोडवण्यासाठी नक्कीच समर्थ असेन कारण मुलं माझी आहेत ही भावना खूप महत्त्वाची आहे. जर क्रांतीज्योती सावित्रीबाईंना दीडशे वर्षापूर्वी याहून कठीण समस्या कुठल्याही मदती शिवाय सोडवायला कठीण वाटल्या नसतील तर तिच्या लेकींना 21व्या शतकात त्या इतक्या कठीण का वाटाव्यात हा विचार केला की समस्या क्षुल्लक वाटायला लागतात, मार्ग नकळत सापडायला लागतात.
*विधाता बनने निश्चितच सोपे काम नाही*.
मग अडचणीच सोप्या दिसायला लागतील.
पालकांचे दारिद्रय, अज्ञान, अंधश्रद्धा, पालकांचे स्थलांतर, लहान भावंडे सांभाळणे, घरकाम करणे, इ.अडचणी
तर अपुऱ्या शालेय सुविधा, शैक्षणिक साधनांचा अभाव, अपुरे खेळाचे मैदान नियोजनाचा अभाव, अधिकाऱ्यांचा दबाव, अपुरे विषय ज्ञान, शिक्षक पालक संबंधातील तफावत, शिक्षकातील मतभेद, समाज व शाळा यांच्यातील दरी अशी अनेक कारणे गुणवत्ता विकासात अडसर निर्माण करतात परंतु कुशल शिक्षक मनाचा पक्का निर्धार करून यातून योग्य मार्ग नक्कीच काढू शकतो यात यत्किंचितही शंका नाही. फक्त माझी 100% देण्याची तयारी हवी. आणि जो भरभरून देतो त्याला मागण्याचा नक्कीच हक्क असतो आणि तो कोणी नाकारू शकत नाही, आणि खरंतर विद्यार्थी आणि पालक यांचे प्रेम जिव्हाळा आपुलकी यात तो नकळत आकंठ बुडालेला असतो. चला तर मग नवीन शैक्षणिक वर्षाच्या सुरुवातीला गुणवत्ता विकाचा एक दृढ निश्चय घेवून सकारात्मक सुरुवात करूयात
(आपसे यह साझा करते हुए मुझे अत्यंत प्रसन्नता है कि वरिष्ठ साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं e-abhivyakti के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं । अब हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है उनका व्यंग्य –“बुरी नज़र और विघ्नहरण जूता” जो निश्चित ही …….. ! अरे जनाब यदि मैं ही विवेचना कर दूँ तो आपको पढ़ने में क्या मज़ा आएगा? इसलिए बिना समय गँवाए कृपा कर के पढ़ें, आनंद लें और कमेंट्स करना न भूलें । ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # 6 ☆
☆ व्यंग्य – बुरी नज़र और विघ्नहरण जूता ☆
एक निर्माणाधीन मकान की बगल से गुज़रता हूँ तो देखता हूँ कि ऊपर एक कोने में एक पुराना जूता लटकाया गया है। जूते की तली सड़क पर चलने वालों की तरफ है। यह मकान को बुरी नज़र से बचाने का अचूक नुस्खा है। किसी अधबने मकान पर काली झंडी लहराती दिखती है तो किसी पर काली हंडी उल्टी लटकी है। मतलब यह है कि ईंट, पत्थर, सीमेंट को भी नज़र लगती है।गज़ब की होती है यह बुरी नज़र जो ईंट,पत्थर, कंक्रीट को भी भेद जाती है। क्या करती है यह बुरी नज़र? मकान में दरार कर देती है, या नींव को कमज़ोर कर देती है, या सीधे सीधे मकान को पटक देती है? आदमी पर बुरी नज़र की कारस्तानी की बात तो सुनी थी। डिठौना लगाना देखा, राई-नोन उतारना देखा। लेकिन मकानों पर बुरी नज़र का असर जानकर तो लगा कि नज़र किसी लेज़र किरण से कम नहीं।
कैसी होती है यह बुरी नज़र? क्या यह कोई स्थायी चीज़ होती है या यह ईर्ष्या या द्वेष से एकाएक उपजती है? किसी का आलीशान बंगला देखा, दिल में हूक उठी, और तीसरे नेत्र की तरह बुरी नज़र भक से चालू हो गयी। अगर यह कोई स्थायी लक्षण है तो यह कुछ खास लोगों में ही पायी जानी चाहिए। देश के कुछ आदिवासी क्षेत्रों में कुछ स्त्रियों को ‘चुड़ैल’ मानकर मार डाला गया या मारा पीटा गया। उन पर आरोप था कि उनकी बुरी नज़र या उनके तंत्र-मंत्र से गांव में दूसरों को नुकसान हुआ। दिलचस्प बात यह है कि यह आरोप किसी पुरुष पर नहीं लगा क्योंकि ‘चुड़ैल’ का नाम बताने वाले ओझा जी अक्सर पुरुष होते हैं।
मकानों पर लटकी झंडियों, हंडियों और जूतियों को देखकर लगता है कि सरकार को भी लोगों की संपत्ति की रक्षा के लिए प्रयास करना चाहिए। यह प्रयास निजी स्तर पर ही क्यों हो? इसलिए सबसे पहले तो नेत्र-विशेषज्ञों के द्वारा सबकी आँखों की जांच कराके बुरी नज़र वालों की एक फेहरिस्त बना ली जानी चाहिए। फिर इन बुरी नज़र वालों को कानूनन कोई पहचान-चिन्ह धारण करने को बाध्य किया जाना चाहिए। हो सके तो उन्हें घर से निकलने पर गांधारी की तरह आँखों पर पट्टी बांधने को कहा जाए, या कोई ऐसा चश्मा बनाया जाए जिसके काँच में बुरी नज़र के घातक तत्व को ‘न्यूट्रलाइज़’ करने की शक्ति हो, जैसे सिगरेट का फिल्टर निकोटिन को जज़्ब कर लेता है। जो भी हो, देश की संपत्ति को नुकसान से बचाने के लिए सरकार को कुछ न कुछ करना ज़रूरी है।
यह अनुसंधान का विषय है कि बुरी नज़र आँख से प्रक्षेपित कैसे होती है। विज्ञान के हिसाब से तो आँख सिर्फ एक कैमरा है, जो तस्वीर को ग्रहण तो करती है, लेकिन भेजती कुछ नहीं। लेकिन विज्ञान पर यकीन करके हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने से तो काम नहीं चलेगा। जब सयाने कहते हैं कि बुरी नज़र धनुष से छूटे बाण की तरह चलती है तो ज़रूर चलती होगी। वर्ना लोग आदमियों और घरों को बचाने का इतना पुख्ता इंतज़ाम क्यों करते? फिल्मी गीतों के हिसाब से तो आँखें विभिन्न प्रकार के घातक अस्त्रों से सुसज्जित रहती हैं जो दिल को घायल करने से लेकर जान तक ले सकते हैं। नमूने हैं —-‘ना मारो नजरिया के बान’, ‘मस्त नजर की कटार, दिल के उतर गयी पार’, और ‘अँखियों से गोली मारे, लड़की कमाल।’ नायिका की आँखों के बारे में रीतिकालीन कवि रसलीन की पंक्ति है —–‘जियत मरत झुकि झुकि परत, जेहि चितवत इक बार।’
वैसे सब लोग बुरी नज़र के उपचार के लिए जूते की तरफ नहीं भागते। बहुत से ट्रक वाले ट्रक के पीछे ‘बुरी नजर वाले तेरा मुँह काला’ लिख कर काम चला लेते हैं। फिल्मों में नायक नायिका के लिए ‘चश्मेबद्दूर’ गाकर तसल्ली कर लेता है। लेकिन फिर भी इस बला से बचने के लिए जूते का प्रयोग बहुतायत से होता है।
इतिहास के बारीक अध्ययन से पता चलता है कि जूता बद-नज़र और बददिमाग़ के इलाज का प्रभावी उपकरण रहा है। रियासतों के ज़माने में इसका प्रयोग काफी उदारता से रिआया को उसकी औकात का एहसास दिलाने के लिए किया जाता था। तब का जूता शुद्ध चमड़े का और मज़बूत होता था। उसके सामने दंड के अन्य सब उपकरण हेठे थे क्योंकि जूता चमड़ी और इज़्ज़त दोनों खींच लेता था। आजकल रबर सोल के हल्के-फुल्के जूतों का फैशन है जो सिर्फ इज़्ज़त हरने के ही काम आ सकते हैं। इसलिए जिन लोगों के लिए इज़्ज़त का कोई ख़ास महत्व नहीं है उनके लिए जूता भयकारी नहीं रहा। ग़रज़ यह कि आज के ज़माने में जूते की कीमत में भले ही वृद्धि हुई हो, लेकिन उसकी उपयोगिता में कमी हुई है। यह बात उन लोगों को ध्यान में रखना चाहिए जो बुरी नज़र को निर्मूल करने के लिए जूता लटकाते हैं।
दरअसल बुरी नज़र वालों का उपयोग भी देश के हित में हो सकता है, लेकिन जैसे हम अपने शिक्षित युवकों, इंजीनियरों, डाक्टरों का उपयोग करना नहीं जानते वैसे ही हम बुरी नज़र वालों का रचनात्मक उपयोग करना नहीं जानते। बुरी नज़र वालों को लड़ाई के मोर्चों पर भेजा जा सकता है जहाँ उनकी नज़र का इस्तेमाल दुश्मन के बंकरों को तोड़ने, पुल उड़ाने और टैंकों को बरबाद करने के लिए किया जा सकता है। यह नुस्खा कारगर होने के साथ साथ बेहद सस्ता भी है। कुछ बुरी नज़र वालों को नगर निगम के अतिक्रमण हटाने वाले दस्ते में भर्ती किया जा सकता है, जहाँ वे घंटों का काम मिनटों में करेंगे। नलकूपों की बोरिंग, मकानों के लिए नींव की खुदाई और पत्थरों को तोड़ने के कामों के लिए भी बुरी नज़र बहुत कारगर सिद्ध हो सकती है। हमारे पास ही काम की ऐसी बढ़िया तकनीक है, और हम विदेशों से मंहगे उपकरण खरीदने में लगे हैं।
विशेषज्ञों को इस काम में तुरन्त लगा देना चाहिए कि बुरी नज़र कितने स्तरों पर और कितने तरीकों से काम में लायी जा सकती है। यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या बुरी नज़र में किसी और तत्व का संयोग करके कोई और ताकतवर चीज़ पैदा की जा सकती है। मेरे खयाल से बुरी नज़र में असीमित संभावनाएं हैं, बशर्ते कि हम इन संभावनाओं की खोज-बीन के प्रति जागरूक हों।अब तक हमने इस क्षेत्र की बहुत उपेक्षा की। परिणामतः दूसरे देश कहीं से कहीं पहुंच गये और हम पीछे रह गये। अब एक क्षण भी गंवाना आत्मघाती होगा।
( “साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच “ के लेखक श्री संजय भारद्वाज जी का साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के कटु अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।
श्री संजय जी के ही शब्दों में ” ‘संजय उवाच’ विभिन्न विषयों पर चिंतनात्मक (दार्शनिक शब्द बहुत ऊँचा हो जाएगा) टिप्पणियाँ हैं। ईश्वर की अनुकम्पा से इन्हें पाठकों का आशातीत प्रतिसाद मिला है।”
हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहेंगे। आज प्रस्तुत है इस शृंखला की तृतीय कड़ी। ऐसे ही साप्ताहिक स्तंभों के माध्यम से हम आप तक उत्कृष्ट साहित्य पहुंचाने का प्रयास करते रहेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच # 3 ☆
☆ मोक्ष… ☆
मोक्ष.., ऐसा शब्द जिसकी चाह विश्व के हर मनुष्य में इनबिल्ट है। बढ़ती आयु के साथ यह एक्टिवेट होती जाती है। स्वर्ग-सी धरती पर पंचसिद्ध मनुष्य काया मिलने की उपलब्धि को भूलकर प्रायः जीव अलग-अलग पंथों की पोशाकों, प्रार्थना पद्धति, लोकाचार आदि में मोक्ष गमन के मार्ग तलाशने लगता है। तलाश का यह सिलसिला भटकाव उत्पन्न करता है।
एक घटना सुनाता हूँ। मोक्ष के राजमार्ग की खोज में अपने ही संभ्रम में शहर की एक सड़क पर से जा रहा था। वातावरण में किसी कुत्ते के रोने का स्वर रह-रहकर गूँज रहा था पर आसपास कुत्ता कहीं दिखाई नहीं देता था। एकाएक एक कठोर वस्तु पैरों से टकराई। पीड़ा से व्यथित मैंने देखा यह एक गेंद थी। बच्चे सड़क के उस पार क्रिकेट खेल रहे थे। गेंद मेरे पैरों से टकराकर कुछ आगे खुले पड़े एक ड्रेनेज के पास जाकर ठहर गई।
आठ-दस साल का एक बच्चा दौड़ता हुआ आया। गेंद उठाता कि कुत्ते के रोने का स्वर फिर गूँजा। उसने झाँककर देखा। कुत्ते का एक पिल्ला ड्रेनेज में पड़ा था और शायद मदद के लिए गुहार लगा रहा था। बच्चे ने गेंद निकर की जेब में ठूँसी। क्षण भर भी समय गंवाए बिना ड्रेनेज में लगभग आधा उतर गया। पिल्ले को बाहर निकाल कर ज़मीन पर रखा। भयाक्रांत पिल्ला मिट्टी छूते ही कृतज्ञता से पूँछ हिला-हिलाकर बच्चे के पैरों में लोटने लगा।
मैं बच्चे से कुछ पूछता कि एकाएक उसकी टोली में से किसी ने आवाज़ लगाई, ‘ए मोक्ष, कहाँ रुक गया? जल्दी गेंद ला।’ बच्चा दौड़ता हुआ अपनी राह चला गया।
संभ्रम छँट गया था। मोक्ष की राह मिल गई थी।
धरती के मोक्ष का सम्मान करो, आकाश का परमानंद मोक्षधाम तुम्हारा सम्मान करेगा।
(प्रस्तुत है सुश्री आरूशी दाते जी के साप्ताहिक स्तम्भ – “मी _माझी “ शृंखला की दसवीं कड़ी व्यक्ती पूजा…। सुश्री आरूशी दाते जी ने व्यक्ति पूजा की अत्यन्त सुंदर रूप से विवेचना की है। किसी व्यक्ति विशेष के विचारों से सहमत होना या उसका सम्मान व्यक्ति पूजा की श्रेणी में नहीं आता है, यह अत्यन्त स्पष्ट है। किन्तु, कई बार इस भावना को न समझने से दोनों पक्ष असहज स्थिति में आ जाते हैं। हमारा आत्मसम्मान हमें समय समय पर सचेत भी करता रहता है। आवश्यक है हम अपने हृदय की सुनें। सुश्री आरूशी जी के आलेख मानवीय रिश्तों को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। इस शृंखला की क ड़ियाँ आप आगामी प्रत्येक रविवार को पढ़ पाएंगे। )
साप्ताहिक स्तम्भ – मी_माझी – #10
☆ व्यक्ती पूजा… ☆
ती कधी फारशी जमली नाही… (खरंच का?)
का?
कदाचित आपले विचार कोणावर लादायचे नाहीत, ही शिकवण जोपासलेली आहे.. आणि विचार कोणावर लादता येतील ह्यावर विश्वास नाही… एखादी गोष्ट दुसऱ्याला पटवून देऊ शकतो कदाचित, आणि पटवून दिले तर त्याचाच ध्यास असावा हे ही अयोग्य आहे, नाही का?
काही लोकांना हे जमतं बाई… कसं ना म्हणजे… जाऊ दे, आपण विचार कशाला करायचा, ह्या भावनेतून गप्प बसते…
पण खरंच मी कधी व्यक्ती पूजा केली नाही का? हा प्रश्न मनात येतो आणि मन वेगवेगळ्या दिशांवर आरूढ होते… जे काही चांगलं आहे, किंवा जे चांगलं नाही, ते ठरवताना आपण नक्की काय करतो… त्यात कधी स्वतः विचार असतो तर कधी दुसऱ्यांनी दिलेले सल्ले असतात… सल्ले अनेकांकडून मिळत असले तरी ठराविक लोकांचेच सल्ले आपण आचरणात आणतो… मग ही व्यक्तीपूजा झाली का?
नाही नाही, असं स्वतःला सांगत पुन्हा त्या विचार चक्रात अडकून जाते… नक्की कोण – व्यक्ती की विचार ? हे द्वंद्व दूर होत नाही… कधी कधी असं वाटतं की ती व्यक्ती आवडते, जवळची वाटते किंवा विश्वासक वाटते म्हणून आपण तिचे विचार, सल्ले मान्य करतो, म्हणजे व्यक्ती पुज़ाच झाली की !
स्वतःचं समाधान व्हावं म्हणून मग मी स्वतःलाच समजावते, ही व्यक्ती पूजा नाही गं, फक्त त्या व्यक्तीचे विचार घेतेस तू !
तुम्हालाही असंच वाटतं का?
पुन्हा एक गोंधळ सुरू होतो… व्यक्ती, माणूस म्हणजे तरी नक्की काय?
विचारांचे मूर्त रूप… हो ना! मग विचारांची स्वीकृतता म्हणजे त्या व्यक्तीचाही स्वीकार !
असो, खूप गुंतागुंतीचा विषय आहे… पण आयुष्यातील प्रत्येक व्यक्ती (जरी आपण तिचे पूजक नसलो तरी) आपल्याला काही तरी देऊन जाते ह्याची जाणीव जिवंत राहिली पाहिजे… !
(यह एक संयोग ही है की आज के ही दिन श्री आशीष कुमार जी की पुस्तक ‘पूर्ण विनाशक’ का विमोचन है। श्री आशीष जी को उनकी इस नवीनतम कृति की सफलता के लिए हार्दिक शुभकामनायें।)
(युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है। अब प्रत्येक शनिवार आप पढ़ सकेंगे उनकी लेखमाला के अंश “स्मृतियाँ/Memories”। आज के साप्ताहिक स्तम्भ में प्रस्तुत है एक अत्यन्त भावुक एवं मार्मिक संस्मरण “सरदार”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – ☆ स्मृतियाँ/MEMORIES – #6 ☆
☆ सरदार ☆
मैंने अपनी अभियांत्रिकी सूचना प्रौद्योगिकी से सन 2000 से लेकर 2004 तक की थी । इस दौरान मैंने अपनी जिंदगी के 4 साल उत्तर प्रदेश के बरेली शहर में व्यतीत किये और बहुत कुछ सिखने को मिला । मैं अभियांत्रिकी के सूचना प्रौद्योगिकी की बात नहीं कर रहा बल्कि जिंदगी ने बहुत कुछ सिखाया । अलग अलग तरह के लोगो से वास्ता पड़ा सबकी सोच को समझने की कोशिश की । उस दौरान ये भी समझ में आया की कैसे किसी की संस्कृति, रहन सहन, उसका क्षेत्र और उसके माता पिता, भाई बहन आदि का उसके विचारो, प्रकृति और चरित्र पर प्रभाव पड़ता है । अभियांत्रिकी में शुरू का 1 महीना तो जान पहचान आदि में ही बीत जाता है ।
धीरे धीरे मेरी भी मेरी शाखा सूचना प्रौद्योगिकी के बाक़ी साथियो से जान पहचान और कुछ से दोस्ती भी शुरू हो गयी एक लड़का जो की सरदार जी थे हमेशा कक्षा में देर से आता था कभी कभी तो आता भी नहीं था एक दिन हमारी व्यक्तित्व विकास (Personality Development) का व्याख्यान (lecture) था उसमे अध्यापिका ने बोला के आज आप सब लोग अपना परिचय (Introduction) दीजिये । तो सब साथी अपना परिचय ऐसे दे रहे थे ‘My Name is….’ और हमारी अध्यापिका सबको Ok Ok बोल रही थी । कुछ देर बाद सरदार जी का नंबर आया उन्होंने अपना परिचय My name is …….से शुरू नहीं किया बल्की ‘I am … ‘ से शुरू किया । अध्यापिका ने बोला वैरी गुड जब हमे कोई अपना परिचय देने को बोले तो हमे I am and name बताना चाहिए ना की शुरुवात ही my name is से करनी चाहिए । क्योकि सामने वाला आपके बारे में पूछ रहा है ना कि केवल आपका नाम । उसके बाद कक्षा के सब छात्र अपना परिचय ‘I am …’ से ही देने लगे । सरदार जी ने जो अपना नाम बताया था वो मेरे दिमाग पर छप गया वो नाम था ‘राजविंदर सिंह रैना’
धीरे धीरे राजविंदर और मेरी अच्छी दोस्ती हो गयी । फिर अभियांत्रिकी के दूसरे साल में मैं और राजविंदर कमरा साथी (Roommate) बन गए । मैं राजविंदर को बोला करता था यार तुम्हे तो Modeling में जाना चाहिए था तो वो हमेशा बोलता ‘नहीं यार Modeling के लिए तो बहुत कम उम्र से तैयारी करनी पड़ती है और मैं तो बूढ़ा हो गया हूँ’ तो जवाब में बोलता ‘तुम्हारा नाम है राजविंदर सिंह रैना मतलब तुम्हारे नाम में राजा भी है और शेर भी, और ना ही राजा कभी बूढ़ा होता है ना ही शेर’ इस बात पर राजविंदर बहुत हँसा करता था । राजविंदर में ये विशेषता थी की वो अपनी बातो से किसी रोते हुए को भी हँसा सकता था ।
इंजीनियरिंग में लड़के रात रात भर जागते है कुछ पढ़ाई करते है कुछ खुराफ़ात । हमारे कमरे से करीब 100 मीटर की दूरी पर एक चाय की टपरी थी जिसे एक बाप और दो बेटे चलाते थे । बाप और एक बेटा सुबह से रात तक चाय की टपरी संभालते थे और दूसरा बेटा रात से सुबह तक । ऐसे वो ‘गुप्ता जी’ की चाय की टपरी 24X7 खुली रहती थी । कॉलेज की परीक्षाओ के समय हम लोग रात को कभी भी गुप्ता जी की चाय की टपरी पर चाय पीने चले जाते थे कभी रात्रि में 11:30 कभी रात्रि में 2:00 कभी सुबह 5:00 आदि आदि । रात के समय गुप्ता जी की चाय की टपरी पर काफी रिक्शा वाले भी बैठे रहते थे क्योकि वो बेचारे अपना घर चलाने के लिए रात में भी रिक्शा चलाते थे क्योकि रात मे पैसे थोड़े ज्यादा मिल जाते थे धीरे धीरे मेरी और राजविंदर की उन रिक्शावालों से भी अच्छी पहचान हो गयी थी ।
अब अगर हम लोगो को अपने घर (Hometown) जाना हो तो हम लोग रात को गुप्ता जी की चाय की टपरी पर से ही रिक्शा लेते थे क्योकि ज्यादातर ट्रेन मेरे और राजविंदर के Hometown के लिए रात में ही चलती थी तो घर जाते समय हम लोग पहले गुप्ता जी के यहाँ चाय पीते फिर वही से रिक्शा में बैठ कर रेलवे स्टेशन चले जाते । सामान्य तौर पर हम लोग ट्रेन का टिकट कई दिन पहले ही बुक करा लेते थे पर कभी कभी अचानक भी जाना पड़ता था ऐसे ही एक बार राजविंदर को अचानक अपने घर जम्मू जाना था सर्दी का समय था उसकी ट्रेन करीब रात के 12:30 पर बरेली आती थी । हम लोग रात 10:00 बजे के करीब गुप्ता जी की चाय की टपरी पर पहुंचे हमने चाय पी, फिर मैंने राजविंदर से पूछा ‘यार तेरा ट्रेन में टिकट बुक नहीं हुआ है तो टिकट और रास्ते के लिए पैसे है या नहीं ?’ तो राजविंदर ने कहा ‘Don’t worry यार 500 रूपये है’ मैंने कहा ‘ठीक है’ फिर हमे गुप्ता जी की चाय की टपरी पर ही एक जानने वाला रिक्शावाला मिल गया राजविंदर उस रिक्शा में बैठ गया मैंने उसे विदा किया और वापस कमरे की तरफ चल दिया ।
मैं घर आ कर सो गया अगले दिन मुझे मेरे एक मित्र ने बताया की रात को करीब 3:00 बजे राजविंदर का फ़ोन आया था उस समय सन 2001 में मेरे पास मोबाइल फ़ोन नहीं हुआ करता था तो राजविंदर का फ़ोन उस दोस्त के पास आया था जिसके पास उस समय मोबाइल फ़ोन था मैंने उस दोस्त से घबरहाट और उत्सुकता से पूछा ‘क्या हुआ इतनी रात को उसने फ़ोन क्यों किया था ?’
उस दोस्त ने कहा ‘यार वो बिना टिकट यात्रा कर रहा था T.C. ने पकड़ लिया था तो किसी स्टेशन से फ़ोन कर के T.C. को ये confirm करा रहा था की वो स्टूडेंट है ताकि T.C. उसे छोड़ दे ‘ मैंने बोला ‘नहीं यार ऐसा कैसे हो सकता है जब वो गया था तो उसके पास 500 रूपये थे उतने में स्लीपर का टिकट आराम से आ जाता’ उस दोस्त ने कहा ‘पता नहीं यार’ । जब राजविंदर अपने घर से वापस आया तो सबसे पहले मैंने उससे यही पूछा ‘यार तेरे पास तो टिकट के लिए पैसे थे फिर बिना टिकट यात्रा क्यों कर रहे थे ?’ तो वो बोला ‘यार वो रामलाल चाचा वो जिनकी रिक्शा में बैठकर मैं स्टेशन तक गया था उनकी बच्ची बहुत बीमार थी और उनके पास डॉक्टर को दिखाने के पैसे नहीं थे इसलिए मैंने 500 रूपये उन्हें दे दिए थे’ मैं मन में सोच रहा था की जो किसी और की परेशानी मे अपने पास के सारे पैसे किसी जरूरतमंद को देदे और बिना टिकट यात्रा करता हुआ पकड़ा जाये शायद उसी को सरदार बोलते हैं। दिल से सलाम है राजविंदर को ।
(सुप्रसिद्ध युवा कवियित्रि सुश्री स्वप्ना अमृतकर जी का अपना काव्य संसार है । आपकी कई कवितायें विभिन्न मंचों पर पुरस्कृत हो चुकी हैं। आप कविता की विभिन्न विधाओं में दक्ष हैं और साथ ही हायकू शैली की सशक्त हस्ताक्षर हैं। हम आपका “साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्ना की कवितायें ” शीर्षक से प्रारम्भ कर रहे हैं। इस शृंखला की यह तीसरी कड़ी है। संभवतः ‘साहित्य संसार’ शीर्षक से काव्यप्रकार : सुधाकरी अभंग (६,६,६,४) में रचित यह कविता उनके साहित्य संसार में से उत्कृष्ट रचनाओं में से एक होनी चाहिए। आज प्रस्तुत है सुश्री स्वप्ना जी की कविता “साहित्य संसार”। )
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – स्वप्ना अमृतकर यांची कविता अभिव्यक्ती # -3 ☆