हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ मनोज साहित्य # १९६ – स्मृतियों के आँगन में… ☆ श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” ☆

श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी  के साप्ताहिक स्तम्भ  “मनोज साहित्य ” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “स्मृतियों के आँगन में…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।

✍ मनोज साहित्य # १९६ – स्मृतियों के आँगन में… ☆

☆

स्मृतियों के आँगन में यह,

काव्य कुंज का प्रतिरोपण ।

रंग – बिरंगे पुष्पों जैसे,

भावों का तुमको अर्पण ।

*

कविताओं में अनजाने ही,

लिख बैठा मन की बातें ।

मैं कवि नहीं,न कविता जानूँ ,

न जानूँ जग की घातें ।

*

आँखों से जो झलकी बॅूंदें ,

उनको लिख कर सौंप रहा ।

मन के उमड़े भावों की मैं ,

हृदय वेदना रोप रहा ।

*

माटी की यह सौंधी खुशबू ,

जब छाएगी घर आँगन में ।

संस्कृतियों के स्वर गूँजगे ,

सदा सभी के दामन में ।

*

यही धरोहर सौंप रहा मैं,

तुम मेरी कविताएँ पढ़ना ।

जब याद तुम्हें मैं आऊॅं तो ,

अपने कुछ पल मुझको देना ।

☆

©  मनोज कुमार शुक्ल “मनोज”

संपर्क – 58 आशीष दीप, उत्तर मिलोनीगंज जबलपुर (मध्य प्रदेश)- 482002

मो  94258 62550

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ शेष कुशल # ५६ ☆ व्यंग्य – “सोनम (गुप्ता नहीं) : बावफ़ा से बेवफ़ा तक…” ☆ श्री शांतिलाल जैन ☆ Edit

श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “सोनम (गुप्ता नहीं): बावफ़ा से बेवफ़ा तक…” ।)

☆ शेष कुशल # ५६ ☆

☆ व्यंग्य – “सोनम (गुप्ता नहीं): बावफ़ा से बेवफ़ा तक…” – शांतिलाल जैन ☆

वफ़ा का तो ऐसा है जनाब कि एक अनचाहा कदम उठा और आप बावफ़ा से बेवफ़ा हुए. 2016 की नोटबंदी में दस रूपए के नोट से मशहूर हुई सोनम गुप्ता के बेवफ़ा होने की कहानी की असलियत का तो अभी तक पता नहीं चला मगर सोनम के बेवफ़ा होने की चर्चा फिर से एकबार आम हो चली है. लेह के अवाम ने मनचाहा कदम उठाना चाहा तो मुल्क के निज़ाम ने अनचाहा फील किया और ‘सोनम(टू) बावफ़ा से बेवफ़ा’ हो गई. दस का नोट बच गया. लिखकर मुनादी कराने की जरूरत भी ना पड़ी.

अह्द आसान है पर उसकी वफ़ा मुश्किल है. सूबे को आईन की छठी अनुसूची में जोड़ेंगे.  वादा किया था निज़ाम ने. निभाया तो नहीं और बेवफ़ाई का इल्ज़ाम अलबत्ता सोनम के नाम जड़ दिया. कसूर बस इतना ही कि वे दो-तीन बरस से मुक़ाबिल थे निज़ाम के, दाग़ देहलवी का शेर दोहरा रहे थे – ‘वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे, तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था.’

स्टीरियो टाईप जवाब निज़ाम का – ‘क्यूँ पशेमाँ हो अगर वअ’दा वफ़ा हो न सका, कहीं वादे भी निभाने के लिए होते हैं.’

अब अवाम के इस भोलेपन पर क्या ही कहें – आदतन तुमने कर लिए वादे और आदतन हमने ए’तिबार कर लिया.  वादा तो पूर्ण राज्य का दर्ज़ा देने का भी था. ’सादगी तो हमारी ज़रा देखिए ए’तिबार आपके वादे पर कर लिया.’  इंतिज़ार लंबा खिंचा तो इधर सूबे का अवाम सड़कों पर उतर आया, उधर निज़ाम की आँखों में खून उतर आया. यूँ तो निज़ाम की बेवफ़ाई के दर्ज़नों किस्से हवा में तैरते रहते हैं मगर आँखों में इतनी तेज़ी से खून उतर आए ऐसा कम ही हुआ होगा. खून जो निज़ाम की आँखों में उतरता है वो अवाम की छाती चीर कर बहने लगता है. चार निर्दोष जवान सीने चाक् कर दिए गए. वफ़ादार नायक कल तक निज़ाम की आँख का तारा हुआ करे था, फलक से टूटा तो सीधे जेल में लेंड कर गया. पुलिस भी तेरी, अदालत भी तेरी, गवाह भी तू ही रहा. वफ़ा खुद से नहीं होती ख़फ़ा अवाम पर होते हो!!

निज़ाम के पास सतह से लेकर समंदर और आसमां को तक को चीरने के लिए सेना मौजूद थी. मगर उसकी सबसे मज़बूत सेना वर्चुअल दुनियाँ में थी – ट्रोल आर्मी. पुलिसिया कार्रवाई के सामानांतर चलते ट्रोल, कीचड़ फैंकने, कालिख पोतने में प्राम्प्ट भी और प्रवीण भी. बेवफ़ा का ख़िताब नवाजने तक सीमित नहीं रही ट्रोल आर्मी. ‘थ्री ईडियट्स’ का प्रेरणा-नायक, शिक्षाविद, दुनिया के सौ  सबसे प्रभावशाली टाइम क्लाईमेट लीडर्स में शामिल एक खरा-खरा पर्यावरण संरक्षक, देशभक्त को गद्दार, पाकिस्तानी एजेंट जैसे कारतूस चला-चला कर लहू-लुहान कर दिया उसने. गंगोत्रियाँ झूठ की भी तो होती हैं जनाब. सोनम को बेवफ़ा का ख़िताब नवाजने की मैली-धारा आईटी सेल की गंगोत्री से निकली और मीडिया में बह चली. ‘बेवफ़ा’ से ‘बदनाम हुई’ तक सोनम(टू) सलाखों के पीछे है, उसका सवाल है –

’मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा,

मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा.’

मुनासिब जवाब किसी के पास नहीं, अपन के पास तो बिलकुल नहीं.

-x-x-x-

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ विवेक साहित्य # ३८३ ☆ व्यंग्य – “काँपटेबिलिटी सॉफ्टवेयर अपडेट करो भगवान” ☆ श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ३८३ ☆

?  व्यंग्य – काँपटेबिलिटी सॉफ्टवेयर अपडेट करो भगवान ? श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆

कहा जाता है जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, लेकिन लगता है  भगवान को अपनी “मैचमेकिंग सिस्टम” की फाइलें फिर से स्कैन करनी होंगी। शायद उनके कंप्यूटर में “ विवाह सॉफ्टवेयर 1.0” अब बग से भर गया है। वरना धरती पर इतने असंगत युगल हर दिन “कम्पैटिबिलिटी एरर” क्यों दिखा रहे हैं।

शर्मा जी और उनकी पत्नी संगीता जी को ही ले लीजिए। शर्मा जी सुबह छह बजे उठकर योग और प्राणायाम करते हैं, और संगीता जी सुबह आठ बजे उठकर योगा नहीं बल्कि “जोगाड़” शुरू कर देती हैं कि आज खाना बाजार से किस तरह बुलवाया जाए । शर्मा जी नमक की मात्रा नाप-नापकर कम से कम खाते हैं और संगीता जी का सिद्धांत है कि “स्वाद, मूड से ज्यादा, भरपूर नमक से आता है।”

गुप्ता दंपति का हाल देखिए ,  गुप्ता जी को टीवी पर न्यूज़ देखना सबसे प्रिय लगता है, वो भी वो न्यूज़ जहां एंकर चीख-चीख कर बहस कर रहे हों। वहीं उनकी पत्नी सीमा जी को लगता है कि टीवी का उपयोग केवल “सास बहू सीरियल” के लिए है। नतीजा यह कि हर शाम गुप्ता जी और सीमा जी के बीच रिमोट वैसा ही मुद्दा बन जाता है जैसा संसद में बजट बिल। एक तरफ चीखता एंकर, दूसरी ओर रोती सास , घर में दोनों ही कार्यक्रम बराबर चलते हैं।

राजेश और कविता की जोड़ी में तो और भी दिलचस्प मेल है। राजेश को सुबह की सैर इतनी प्रिय है कि वो बिना घूमे दिन शुरू ही नहीं कर सकते। कविता के लिए सुबह की सैर का मतलब है,नींद में करवट बदल लेना। राजेश पार्क से लौटकर कहते हैं “तुम्हें भी चलना चाहिए था,” तो कविता तकिया पलटकर कहती हैं “तुम घूम आए न, कितने चैन से सोई मै पिछले एक घंटे।”

वर्मा जी को लगता है कि छुट्टी का दिन घर की डीप क्लीनिंग के लिए होता है, पंखा खोलो, बल्ब बदलो, स्क्रू कसो। और उनकी पत्नी मंजू जी मानती हैं कि छुट्टी का मतलब है “शॉपिंग डे”। नया कुकर, नई साड़ी, नई डील। सुबह से दोनों अपनी-अपनी दिशा में निकल पड़ते हैं, एक औजारों के साथ, दूसरी ऑफरों के साथ। शाम को थके हुए होते हैं, पर भगवान की राम मिलाई अपनी जोड़ी पर हंसते हैं।

कपड़ों पर भी मतभेद किसी राष्ट्रीय मुद्दे से कम नहीं। राठौर साहब की पत्नी को चटख रंग इतने पसंद है कि लगता है जैसे हर त्योहार होली ही हो। वहीं राठौर साहब को सफेद इतना प्रिय है कि लोग उन्हें देखकर पूछते हैं “क्या आप किसी फॉर्मल सम्मेलन से आ रहे हैं?” दोनों एक साथ बाजार जाते हैं, पत्नी कहती हैं “यह लाल साड़ी कितनी प्यारी है,” और पति सोचते हैं “अब घर में ट्रैफिक सिग्नल लगेगा क्या?”

भोजन पर बात छिड़े तो हर जोड़ा किसी कुकिंग शो का प्रतियोगी लगता है। मिस्टर तिवारी नॉनवेज के शौकीन हैं और मैडम तिवारी प्याज तक नहीं खाती। पति के हाथों में चिकन टिक्का और पत्नी के हाथों में तुलसीपत्र, किचन और पूजा घर के बीच दो विचारधाराएं टकराती हैं। पर प्रेम देखिए, दोनों साथ बैठकर खाते हैं, शायद एक स्वाद से, दूसरा सहनशीलता से।

घूमने का मामला तो और भी मजेदार है। मिश्रा जी कहते हैं “कश्मीर चलो, ठंड में मज़ा है।” और उनकी पत्नी कहती हैं “गोवा चलो, धूप में मज़ा है।” नतीजा यह कि दोनों  समझौते में शिमला के रास्ते निकलते हैं और मनाली पहुंचकर भी एक दूसरे के शारीरिक थर्मोस्टेट को  दोष देते हैं।

फिटनेस का भी अपना संघर्ष है। श्रीमती अग्रवाल जीरो फिगर के लिए डाइट पर हैं सलाद, सूप, स्मूदी। और अग्रवाल जी कहते हैं “भई जीवन में स्वाद न रहे तो सेहत का क्या फायदा।” जब वो परांठे खाते हैं तो श्रीमती जी उसे देख कर कहती हैं “तुम्हें अपने दिल की चिंता नहीं?” अग्रवाल जी हंसते हुए कहते हैं “दिल की ही सुनता  हूं, दिल को खुशी चाहिए।”

एक और वर्ग है, सेल्फी बनाम सन्नाटा। पत्नी को हर मौके पर फोटो चाहिए। खाना खाया, फोटो। मंदिर गए, फोटो। झगड़ा हुआ, तब भी फोटो, ताकि बाद में दिखा सकें। बल्कि झगड़ा ही इस बात पर शुरू होता है। श्रीमान जी को कैमरा देखकर ही तनाव हो जाता है,  लगता है हर क्लिक के साथ उनके निजी जीवन की पिक्सल घटती जा रही है।

तो क्या अब समय आ चुका है कि भगवान जोड़ियां बनाने वाला अपना सॉफ्टवेयर अपडेट कर ले।

शायद ये सारे पति-पत्नी एक जैसे सोचने लगें तो क्या बच जाएगा? न बहस, न नोक झोंक वाली मुस्कान,  “तुम हमेशा ऐसे ही क्यों करते हो ? वाला ताना, फब्ती।” विवाह तब वैसा हो जाएगा जैसे बिना नमक की खिचड़ी या बिना विज्ञापन का टीवी ।

इसलिए कहा जा सकता है कि भगवान ने जो जोड़ियां बनाईं, वे असंगति नहीं, रोचकता से भरी हैं। भगवान ने प्रेम के कोड में जानबूझकर थोड़ा “कन्फ्यूजन” डाला है, ताकि रिश्ते नीरस न हों। वरना शर्मा जी और संगीता जी अगर दोनों योगी बन जाएं, तो कौन ठहाके लगाएगा? गुप्ता जी अगर सीरियल देखने लगें, तो न्यूज चैनल बंद ना हो जाएंगे।

भगवान को सॉफ्टवेयर बदलने की जरूरत नहीं, बस उसमें एक नया अपडेट डालना चाहिए “विवाह वर्जन 2.0 बस इतना कि श्रीमती श्रीवास्तव के 20 डिग्री ऐ सी के चलते मिस्टर श्रीवास्तव को रात में दूसरे बेड रूम में शिफ्ट न होना पड़े।”

जहां हंसी है, वहीं रिश्ता स्वस्थ है, और जहां रिमोट की छीना-झपटी चल रही है, वहां प्रेम जिंदा है। आखिर मीठा विरोध ही तो विवाह की ऑक्सीजन है। थोड़ी ठंड, थोड़ी गर्मी, पर दोनों साथ में, हमेशा “स्वर्गिक संगति” में।

☆

© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

म प्र साहित्य अकादमी से सम्मानित वरिष्ठ व्यंग्यकार

संपर्क – ए 233, ओल्ड मिनाल रेजीडेंसी भोपाल 462023

मोब 7000375798, ईमेल apniabhivyakti@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४५ – रिटायरमेंट ☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆

श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “रिटायरमेंट”।) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २४५ ☆

🌻लघु कथा🌻 रिटायरर्मेंट 🌻

(पुरस्कृत लघुकथा)

अभी घनश्याम बाबू रिटायरर्मेंट होकर घर पहुंच भी नहीं पाये थे। आलमारी में सहेजे गये मेगजीन, पुराने अखबार को बाहर दालान पर ढेर लगा दिया गया था।

हँसते मुस्कुराते चेहरे का रंग अचानक श्वेत होता चला,

सच तो है अब उन पुरानेअखबारों को कौन देखेगा, जिसमें कभी परीक्षा परिणाम देखने की होड़ लगी होती थी।

पापाजी अच्छे दामों से ले रहा कवाड वाला। अब अलमारी में सोनू अपनी किक्रेट मैच का सामान रख लेगा।

शायद अखबार भी रिटायर हो चला।

☆

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख # १५२ – देश-परदेश – हमारे ट्रेन यात्रा के सहायक: कुली ☆ श्री राकेश कुमार ☆

श्री राकेश कुमार

(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ  की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)

☆ आलेख # १५२ ☆ देश-परदेश – हमारे ट्रेन यात्रा के सहायक: कुली ☆ श्री राकेश कुमार ☆

हम सब ने ट्रेन यात्रा के समय कुली की सहायता अवश्य ली हैं। लाल रंग की कमीज पहने कुली-कुली की आवाज आज भी याद हैं। इन के पास पीतल का एक “बिल्ला”(बैच) जिस पर नंबर अंकित रहता था। हमारे पिताश्री कुली पर सामान रखने से पूर्व उसका बिल्ला नंबर अवश्य पूछते थे।

रेलवे समय समय पर इनकी दरें निर्धारित करती हैं, जोकि बहुत कम रहती हैं। इसलिए जब भी कुली की सेवाएं प्राप्त की जाती हैं, तो पहले सौदा तय किया जाता हैं। कुली भी मौके पर चौका लगाने से नहीं चूकते हैं। गर्मी का सीज़न हो या वृद्धजनों से अधिक राशि की मांग करते ही हैं।

कुली की सेवाओं की कमर तोड़ने में विगत पांच दशकों में यात्रा के समय उपयोग किए जाने वाले सूटकेस द्वारा ही हुई हैं। भारी भरकम लोहे के ट्रंक के स्थान पर पहले चमड़े के सूटकेस का चलन आरंभ हुआ था। जिस प्रकार से चमड़े के सिक्के बहुत कम समय तक ही मुद्रा बाज़ार में टिक पाए थे, उसी प्रकार से यात्रा में चलने वाले सूटकेस को प्लास्टिक, कपड़े जैसे मैटेरियल के बने सूटकेस अधिक उपयोगी साबित हुए।

डिजाइन विज्ञान ने यात्रा को सुविधा जनक बनानें में महत्वपूर्ण योगदान दिया। सूटकेस के पैरों के नीचे आठ आठ पहिए लगा कर स्टेशन पर घसीटना सुविधाजनक बना दिया।

कुली भी अपनी सेवाएं सीट पर कब्जा दिलवाने में लग गए हैं। मेहनत भी कम और कमाई भी ज्यादा होती हैं। हालांकि ये काम गैरकानूनी है, कानून की जब बड़े बड़े लोग परवाह नहीं करते तो फिर कुली क्यों करते ?

कंप्यूटर सुविधा से रेल यात्रा के समय स्थान उपलब्धता में पारदर्शिता बढ़ जाने से कुलियों के लिए अब ये कार्य भी नहीं बचा था।

इन परिस्थितियों में अब कुली का कार्य करने वालों की प्रजाति भी विलुप्तता की कगार पर पहुंच चुकी हैं। सदी के महानायक अभिताभ बच्चन ने वर्षों पूर्व कुली जैसे विषय पर फिल्म बना कर बहुत शौहरत हासिल प्राप्त की थी। हमने भी इसी बात को मद्दे नज़र रखते हुए आज कुली पर अपनी ये रचना समर्पित की हैं।

© श्री राकेश कुमार

संपर्क – B 508 शिवज्ञान एनक्लेव, निर्माण नगर AB ब्लॉक, जयपुर-302 019 (राजस्थान)

मोबाईल 9920832096

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ श्री अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती #३०५ ☆ खोडरबर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे

 

? अशोक भांबुरे जी यांची कविता अभिव्यक्ती # ३०५ ?

☆ खोडरबर… ☆ श्री अशोक श्रीपाद भांबुरे ☆

☆

मित्रा

तुझ्या वाढदिवसाला

काय देऊ

असं मित्राला विचारताच

मित्र म्हणाला…

 

एक पेन्सिल

आणि

एक खोडरबर दे

आयुष्यात

काहीतरी चांगलं

लिहिण्याचा प्रयत्न करीन…

 

जर कधी काही

चुका झाल्याच

तर त्या खोडायला

तुझा खोडरबर

आणि तुझी आठवण

येवढंच पुरेल मला…

☆

 © अशोक श्रीपाद भांबुरे

धनकवडी, पुणे ४११ ०४३.

ashokbhambure123@gmail.com

मो. ८१८००४२५०६, ९८२२८८२०२८

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ माझी जडणघडण… भाग – ६३ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

सौ राधिका भांडारकर

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☆ माझी जडणघडण… – भाग – ६३ ☆ सौ राधिका भांडारकर ☆

(सौजन्य : न्यूज स्टोरी टुडे, संपर्क : ९८६९४८४८००)

बैलपोळा : एक कृषी संस्कृती.

 

श्रावण महिन्यातला एक अत्यंत महत्त्वाचा खानदेशी सण म्हणजे बैलपोळा.

बैलपोळा हा सण कृतज्ञता दिन आहे.. आमचे कुटुंब शेतकर्‍यांचे. त्यामुळे बैलपोळा हा पशुधन पूजेचा दिवस आणि आमच्यासाठी अत्यंत महत्वाचा असा सण. प्रेम, आपुलकी, जिव्हाळा व्यक्त करण्याचा दिवस.

आता शेतीची तंत्रे बदलली. शेती यांत्रिक झाली असली तरीही शेतकरी आणि बैल यांचं नातं अबाधितच आहे.

 

श्रावण अमावस्येला बैलपोळ्याचा सण साजरा होतो. श्रावणातला शेवटचा दिवस. त्यादिवशी पिठोरी अमावस्याही असते. हिंदू संस्कृतीतला हा मातृदिनच. माझ्या माहेरी श्रावणातल्या शेवटच्या दिवशी म्हणजेच श्रावण अमावस्येला “पिठोरी अमावस्ये”च्या पूजेचं महत्त्व असायचं.

– – या दिवशी ६४ योगिनींना प्रतिकात्मक रीतीने पूजले जाते. उपजीविकेसाठी उपयुक्त आशा या ६४ कला. घरच्या देव्हाऱ्यात ६४ योगिनी स्थानापन्न झाल्या आहेत असे समजून त्यांची पिठाच्या दिव्यांनी आरती केली जाते. घराचे प्रवेशद्वार, तुळशी वृंदावन आणि ईशान्य व दक्षिण दिशेला हे दिवे ठेवले जातात. आई, मुलांना एकत्रित बसवून ओवाळते आणि या दिव्यांचं “अतिथी कोण” म्हणत वाण देते. या पूजेमुळे पितृदोष दूर होतो, मुलाबाळांच्या जीवनात सुख, शांती, समृद्धी प्राप्त होते. पितरांचा आशीर्वाद मिळतो अशी भावना आहे आणि याच श्रद्धेनुसार आमच्याकडे पिठोरी अमावस्या साजरी केली जायची. तोपर्यंत मी पोळा या सणाविषयी फक्त पुस्तकातून वाचले होते.

माझे लग्न झाल्यानंतर जेव्हा मी अमळनेरला, आमच्या घरी याच दिवशी साजरा होणारा बैलपोळ्याचा सण अनुभवला तेव्हा त्या सणामागचा आनंदोत्सव नेमका कशासाठी हे कळल्यावर मी खरोखरच भावनात्मकतेने भारावून गेले.

त्यादिवशी प्रामुख्याने माझे दीर ज्यांनी आमच्या शेतीची धुरा अत्यंत मनापासून सांभाळली त्या सुहासदादांचे या मुक्या प्राण्यांशी तसेच शेतमजुरांशी जडलेले नाते पाहून मी तेव्हाही आणि आजही भावनिक होते….. खरं म्हणजे मातृदिन(पिठोरी अमावस्या) आणि बैलपोळा दोन्ही दिवस कृतज्ञता व्यक्त करण्याची माध्यमे… ज्या बैलांनी वर्षभर शेतकर्‍याची सेवाच केली असते त्यांच्या श्रमाचा गौरव, जाणीव म्हणजे बैलपोळा. त्यादिवशी बैलाला सुट्टी. वर्षातला एक दिवस त्याच्यासाठी आरामाचा, विश्रांतीचा.

पोळ्याच्या आदल्या दिवशी शेतकर्‍यांकडून बैलांना आमंत्रण दिले जाते.

“आज आवतण घ्या, उद्या जेवायला या. ”

पोळ्याच्या दिवशी त्यांना प्रेमाने आंघोळ घालायची. त्यांची शिंगे रंगवायची, गळ्यात घुंगुरमाळा, पाठीवर रंगीबेरंगी, सुरेख कशीदा काढलेली झूल—अशी ही नटलेल्या, सजलेल्या ढवळ्यापवळ्यांची जोडी इतकी गोजीरी दिसते…! घरातल्यासुना, पुरणपोळी, तांदळाच्या खिरीचा रुचकर स्वयंपाक रांधतात. या महत्वाच्या पाहुण्यासाठी.

– – गावात मस्त फेरफटका मारुन संध्याकाळी हे सजलेले बैल घरी आले की सुना, लेकीबाळी त्यांचे औक्षण करतात. कपाळावर गंधाचा टिळा लावतात आणि स्वत:च्या हातानं घास भरवतात. फार ह्रद्य सोहळा असतो हा! शेतकर्‍यांच्या डोळ्यातला भाव आणि ढवळ्या पवळ्यांची मऊ पाणीदार नजर एकमेकांना भिडते आणि या अलौकिक नात्याचा बंध अधिक घट्ट होतो.

– – thank you आणि you are welcome… असं तर नाही ना म्हणत ते एकमेकांना?

या सणामागेही एक सुंदर कथा गुंफलेली आहे. अंधश्रद्धेचा भाग सोडून दिला तरी या सर्वच पौराणिक कथांमागची कल्पना आणि फँटसी मला आजही आकर्षित करते. साहित्य क्षेत्रात परंपरेनं जपलेलं हे शब्दधन आहे. त्या कथांत गुंफलेली पात्रं, संवाद म्हणजे एक महान कल्पनाविश्व आहे आणि जे नकळत आपलं जीवन आनंददायी करतं… अशीच ही पोळ्याची कथा… 

नंदी म्हणजे भगवान शंकर-पार्वतीचे वाहन. नंदी हा शिवभक्त आणि पार्वतीलाही तो प्रिय होता. काही कारणाने, पार्वतीने रागाच्या भरात नंदीला शाप दिला की, ” तुला पृथ्वीवर जाऊन शेतकऱ्यांसोबत कष्ट करावे लागतील आणि तुझ्या माथ्यावर ओझे व्हावे लागेल. ”

नंदीला हा शाप ऐकून धक्का बसला. त्याने पार्वतीची क्षमा मागितली. माता पार्वतीचाही राग नंतर शांत झाला. तिचे हृदय परिवर्तन झाले आणि तिने नंदीला सांत्वन करत सांगितले, ” तुला मी शापमुक्त करते. मात्र तू शेतकऱ्यांचा साथीदार म्हणून कष्ट करशील आणि वर्षातून एकदा शेतकरी तुझी पूजा करतील आणि तुझा सन्मान करतील. त्या दिवशी तुला विश्रांती मिळेल आणि तुझा गौरव होईल, ”

हाच तो पोळ्याचा सण जो कृषी संस्कृतीचा अविभाज्य भाग आहे. या दिवशी शेतावर राबणार्‍या सगळ्या मजुरांनाही जेवणाचे आमंत्रण असते.

माझ्या सासुबाई सर्वांना स्वत:आग्रह करुन वाढायच्या..

“पुरे माई… “

“कारं इतनामंदी कसकाय जालं…? “

असे जेवतानाचे अहिराणी संवाद. अतिशय गोडव्याचे.

ज्यांच्या श्रमानं धान्याची रास रचली, त्यांचा या घासावर खरा अधिकार या भावनेचा हा सण. विशेषत: खेड्यात त्याचे महत्व अधिक असले तरी काही ठिकाणी बाजारातून मातीचे बैल आणून त्यांची प्रतिकात्मक पूजा केली जाते. नैवेद्य दाखवला जातो. बळीराजा हाच अन्नदाता. त्याच्याविषयीची ही उपकृत भावना या सणाच्या माध्यमातून व्यक्त केली जाते. त्याचबरोबर “बळीराजा सुखी तर राष्ट्र सुखी” ही भावना जपली जाते.

वसुधैव कुटुंबकम्! हे हिंदुधर्माचे तत्व आहे. आणि या कुटुंबात पशु, पक्षी, प्राणी, वृक्षवल्ली, माती, जल, आकाश, तारे सगळ्यांची पूजा होते.

बैलपोळा म्हणजे बैलांची पूजा. ”श्रमिकहो! घ्या इथे विश्रांती. ” हाच त्यातला भाव. हीच त्यांच्या श्रमाला दिलेली भावपूर्ण वंदना…! !

आजकाल शेतीत ट्रॅक्टरचा वापर वाढला आहे. भविष्यात कृत्रिम बुद्धीमत्तेचेही लोण शेतकर्‍यांच्या जीवनात क्रांती करेल पण तरीही ग्रामीण भागात बैलांचे महत्त्व कायम असेल. महाराष्ट्राच्या शेती संस्कृतीचा आणि ग्रामीण जीवनशैलीचा एक भाग म्हणून पिढ्यानुपिढ्या जपला जाईल.

माझ्या कन्यांच्या एका भारतभेटीत त्यांच्या सुहासकाकाने त्यांना एकेक शुभ्र रंगाची, लाल शिंगांची सुरेख छोटीशी बैलजोडी भेट म्हणून दिली. त्यांनीही ती तितक्याच आत्मीयतेने उरापोटी सांभाळत अमेरिकेला नेली.

– – प्रारूपतेने परंपरेचं लोण असं जपलं जातं हेच खरं!

– क्रमशः भाग ६३. 

© सौ. राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ लेखनी सुमित्र की # २५७ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ७ ☆ स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र” ☆

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  आपकी भावप्रवण बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली…।)

✍ साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २५७ – बुन्देली कविता – बूँदा भर बुंदेली… ७ ✍

(बढ़त जात उजयारो – (बुन्देली काव्य संकलन) से)

☆

बरनन तुमरे रूप की, छैंयां सौ बढ़ जात ।

कहने खों अँखियन रहत, रहत हत बहुजात ||

 *

जोबन बढ़ बढ़ लेते है, मेंगाई से होड़ ।

जिनके छोटे हाँत हो, उनखे उठे मरोड़ ||

 *

मन परबत बुड़ी रहत, तुमरे प्रेम समुन्द ।

नेंनन में छाई रहे, सदा रूप की धुन्द ||

 *

मुख छब बरनत ना बनें, की से समता होय ।

बाँचों जाँचो चन्द्रमा, हॉतन रहल सँजोय ||

 *

जात हमाई पूँछ लो, पूँछो हमरो नाँव ।

जौरें हमरे आव तौ, हम पीपर की छाँव ||

 *

पेसी पे आये सबई, नाँव लेत दरबान ।

को जाने की खों मिले, कैंसो का फरमान ||

 *

पिंगल की कविताड़ अब, है दिल्ली की कील ।

कविता की दुरगत भयी, बन गय कुकवि वकील ||

 *

जन्ता खों राजा कहें, राजा भये मजूर ।

सेवक राजा हो गये, सब कुइ कहें हजूर ।।

 *

नीत राज से अलग भइ, छितर गये, मन-भेद ।

कट्टर पन ने कर दओ, धरम-नाव में छेद ॥

* 

मन मोरो औगुन भरो, कैसे करौं पवित्र ।

सूझ गई तरकीब जा, राखो नाम सुमित्र ||

☆

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ अभिनव गीत # २५७ – “मुँह बाये खड़ी हुई है…” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

श्री राघवेंद्र तिवारी

(प्रतिष्ठित कवि, रेखाचित्रकार, लेखक, सम्पादक श्रद्धेय श्री राघवेंद्र तिवारी जी  हिन्दी, दूर शिक्षा, पत्रकारिता व जनसंचार,  मानवाधिकार तथा बौद्धिक सम्पदा अधिकार एवं शोध जैसे विषयों में शिक्षित एवं दीक्षित। 1970 से सतत लेखन। आपके द्वारा सृजित ‘शिक्षा का नया विकल्प : दूर शिक्षा’ (1997), ‘भारत में जनसंचार और सम्प्रेषण के मूल सिद्धांत’ (2009), ‘स्थापित होता है शब्द हर बार’ (कविता संग्रह, 2011), ‘​जहाँ दरक कर गिरा समय भी​’​ ( 2014​)​ कृतियाँ प्रकाशित एवं चर्चित हो चुकी हैं। ​आपके द्वारा स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम के लिए ‘कविता की अनुभूतिपरक जटिलता’ शीर्षक से एक श्रव्य कैसेट भी तैयार कराया जा चुका है। आज प्रस्तुत है आपका एक अभिनव गीत “मुँह बाये खड़ी हुई है...”)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ # २५७ ☆।। अभिनव गीत ।। ☆

☆ “मुँह बाये खड़ी हुई है...” ☆ श्री राघवेंद्र तिवारी ☆

☆

कितनी क्या मीठी हो,

 यह तुम्हारी, राय में ।

उतने चम्मच शक्कर

डालूँ मैं चाय में ॥

* 

कितनी कडुआहटें

घुली हुईं जीवन में ।

उधड़ गये टाँके सब

बचे छेद सीवन में ।

 *

भोजन नहीं सम्भव

छोटी सी आय में ।

 *

किश्तों में पनपी है

इस घरको बीमारी ।

मुँह बाये खड़ी हुई

है सब की लाचारी ।

 *

कितना समय बाकी,

रहना सराय में ॥

 *

वक्त जुटा करने को

है अपनी ऐयारी ।

हंस कर रहा बेशक

उड़ने की तैयारी ।

 *

कुछ तो हो सम्भव इस –

आखिरी उपाय में ॥

☆

©  श्री राघवेन्द्र तिवारी

07-11-2025

संपर्क​ ​: ई.एम. – 33, इंडस टाउन, राष्ट्रीय राजमार्ग-12, भोपाल- 462047​, ​मोब : 09424482812​

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अबुध ज़िद पर अड़े हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपका एक भावप्रवण कविता – अबुध ज़िद पर अड़े हैं…!

☆ ॥ कविता॥ – अबुध ज़िद पर अड़े हैं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

☆

तुम  भी ग़ज़ब करते हो यार,

खुद  पर करने चलो हो वार।

*

दुश्मन से जंग को निकले हो,

हाथ में लिए दुधारी तलवार।

*

घृणा के बीज बोए जा रहे हैं,

मात्र कहने को बचा है प्यार।

*

ज्यों-ज्यों हम सभ्य हो रहे हैं,

बढ़ता ही जा रहा है दुराचार।

*

अबुध अपनी ज़िद पर अड़े हैं,

बुध को सुनने को नहीं तैयार।

☆

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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