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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ नानीची भांडी ☆ सुश्री तृप्ती कुलकर्णी

सुश्री तृप्ती कुलकर्णी  मनमंजुषेतून  ☆ नानीची भांडी ☆ सुश्री तृप्ती कुलकर्णी ☆  मी लहान असताना आमच्या शेजारच्या घरमालकीण (जिला सगळे नानी म्हणत) त्या माझ्या नानीची ही एक आठवण. एकंदरीत चार भाडेकरूंची मालकीण होती तरीही ती घरातली सगळी कामं स्वतःच करायची आणि ते ही अगदी आत्मीयतेनं. आपण शिकलो नाही पण मुलांना शिकवायचंय तर पैसा साठवायला हवा ही जाणीव तिला होती. शिवाय अजून एक गोष्ट म्हणजे नानीच्या मनासारखी स्वच्छता, टापटीपपणा दुसऱ्या कुणाला जमणं अवघडचं.  स्वच्छतेचं तिला व्यसन होतं असं म्हटलं तरी चालेल. याची छोटी झलक तिच्या भांडी घासण्यात दिसायची.  रोज रात्री अंगणात गोष्टी ऐकायची आमची वेळ आणि भांडी घासण्याची नानीची वेळ एकच असायची. त्यामुळे गोष्टीला आपोआपच बॅकग्राऊंड म्युझिक मिळायचं. अजूनही ते दृश्य लख्खं आठवतं. रात्रीचं जेवण झालं की नानी भांड्यांचा ढिगारा घेऊन अंगणात यायची. ढिगाराच असायचा. कारण एक तर माणसं जास्त असायची आणि त्यात नानीचं शाकाहारी जेवण आणि इतरांचं मांसाहारी जेवण यांची भांडी वेगळी असायची. मागच्या अंगणात दोन सार्वजनिक नळ होते त्यातल्या एका नळावर नानीचं भांडी घासण्याचं काम चालायचं. नानी भांडी घासता घासता गोष्टीत रस दाखवायची आणि...
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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ ख-या इंजिनियर तर सगळ्या महिलाच ☆ संग्रहिका – सुश्री मीनल केळकर

इंद्रधनुष्य   ☆ ख-या इंजिनियर तर सगळ्या महिलाच ☆ संग्रहिका  – सुश्री मीनल केळकर ☆  ख-या इंजिनिअर तर सगळ्या महिलाच------. ख-या इंजिनिअर तर सगळ्या महिलाच आहेत----. डब्याचं झाकण उघडत नसेल तर कोणत्या बाजूने दणका घालायचा ते तिलाच माहिती----.. निसटणारी पक्कड कशी पकडायची------… डुगडुगणारं पोळपाटाचा पाट स्थिर कसा करायचा------… गळणारा नळ बंद करताना कसा हळुच रिव्हर्स करायचा------. गॅस शेगडी कमी जास्त करताना मध्येच बंद पडत असेल तर, बंद न पडू देता कशी वापरायची-----.. संपलेल्या पावडरच्या डब्यातून शेवटच्या कणापर्यंत हातावर आपटून कशी पावडर काढायची------.. अशा एक ना अनेक कुशलतेची कामं करणाऱ्या------  --------- समस्त महिला इंजिनिअर्स  ना खूप  खूप शुभेच्छा   संग्राहिका : सुश्री मीनल केळकर  ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे ≈...
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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो #3 – व्यंग्य से मुठभेड़ की रचनात्मकता ☆ श्री रमेश सैनी

श्री रमेश सैनी (हम सुप्रसिद्ध वरिष्ठ व्यंग्यकार, आलोचक व कहानीकार श्री रमेश सैनी जी  के ह्रदय से आभारी हैं, जिन्होंने व्यंग्य पर आधारित नियमित साप्ताहिक स्तम्भ के हमारे अनुग्रह को स्वीकार किया। किसी भी पत्र/पत्रिका में  ‘सुनहु रे संतो’ संभवतः प्रथम व्यंग्य आलोचना पर आधारित साप्ताहिक स्तम्भ होगा। व्यंग्य के क्षेत्र में आपके अभूतपूर्व योगदान को हमारी समवयस्क एवं आने वाली पीढ़ियां सदैव याद रखेंगी। इस कड़ी में व्यंग्यकार स्व रमेश निशिकर, श्री महेश शुक्ल और श्रीराम आयंगार द्वारा प्रारम्भ की गई ‘व्यंग्यम ‘ पत्रिका को पुनर्जीवन  देने में आपकी सक्रिय भूमिकाअविस्मरणीय है।   आज प्रस्तुत है व्यंग्य आलोचना विमर्श पर ‘सुनहु रे संतो’ की अगली कड़ी में आलेख ‘व्यंग्य से मुठभेड़ की रचनात्मकता’। ☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सुनहु रे संतो #3 – व्यंग्य से मुठभेड़ की रचनात्मकता ☆ श्री रमेश सैनी ☆  [प्रत्येक व्यंग्य रचना में वर्णित विचार व्यंग्यकार के व्यक्तिगत विचार होते हैं।  हमारा प्रबुद्ध  पाठकों से विनम्र अनुरोध है कि वे हिंदी साहित्य में व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए उन्हें सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ] अमूमन जब आदमी लेखन के क्षेत्र में...
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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा # 47☆ शुद्ध तन हो शुद्ध मन हो सदाचारी हों नयन ☆ प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’  (आज प्रस्तुत है गुरुवर प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित एक भावप्रवण कविता “शुद्ध तन हो शुद्ध मन हो सदाचारी हों नयन“। हमारे प्रबुद्ध पाठक गण  प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे। )  ☆ काव्य धारा # 47 ☆ शुद्ध तन हो शुद्ध मन हो सदाचारी हों नयन ☆ शुद्ध तन हो शुद्ध मन हो सदाचारी हों नयन तो सदा हो शुद्ध जीवन और सब वातावरण हर बुराई का तो उद्गम मन का सोच विचार है कर्मों के परिणाम ही उत्थान अथवा हैं पतन   कर्मों से बनता बिगड़ता व्यक्ति का संसार है किए गए शुभ कर्म ही उन्नति के आधार हैं क्या उचित अनुचित है इस पर ध्यान होना चाहिए सबको अपने विचारों पर इतना तो अधिकार है   सुधरता जीवन परस्पर स्नेह मेल मिलाप से क्या सही है क्या गलत मन बोलता खुद आपसे वही होना चाहिए जो सबके हित का काम है जो अहित करता किसी का जलता खुद संताप से   शुद्ध बुद्धि से होते हैं जब काम खुश होता है मन मन...
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हिन्दी साहित्य – मनन चिंतन ☆ संजय दृष्टि – ज्योतिर्गमय ☆ श्री संजय भारद्वाज

श्री संजय भारद्वाज  (श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही  गंभीर लेखन।  शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं  और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं।  हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक  पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को  संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। ) संजय दृष्टि – ज्योतिर्गमय अथाह, असीम अथक अंधेरा, द्वादशपक्षीय रात का डेरा, ध्रुवीय बिंदु सच को जानते हैं, चाँद को रात का पहरेदार मानते हैं, बात को समझा करो, पहरेदार से डरा करो, पर इस पहरेदार की टकटकी ही तो मेरे पास है, चाँद है सो सूरज के लौटने की आस है, अवधि थोड़ी हो, अवधि अधिक हो, सूरज की राह देखते बीत जाती है रात, अंधेरे के गर्भ में प्रकाश को पंख फूटते हैं, तमस के पैरोकार, सुनो, रात काटना...
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हिंदी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – “मैं” की यात्रा का पथिक…2 ☆ श्री सुरेश पटवा

श्री सुरेश पटवा (श्री सुरेश पटवा जी  भारतीय स्टेट बैंक से  सहायक महाप्रबंधक पद से सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और स्वतंत्र लेखन में व्यस्त हैं। आपकी प्रिय विधा साहित्य, दर्शन, इतिहास, पर्यटन आदि हैं। आपकी पुस्तकों  स्त्री-पुरुष “, गुलामी की कहानी, पंचमढ़ी की कहानी, नर्मदा : सौंदर्य, समृद्धि और वैराग्य की  (नर्मदा घाटी का इतिहास) एवं  तलवार की धार को सारे विश्व में पाठकों से अपार स्नेह व  प्रतिसाद मिला है। आज से प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय  साप्ताहिकआलेख श्रृंखला की प्रथम कड़ी  “मैं” की यात्रा का पथिक…2”) ☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ आलेख – “मैं” की यात्रा का पथिक…2 ☆ श्री सुरेश पटवा ☆ दरअसल “मैं” की यात्रा दुरूह होती है। माँ के गर्भ में आते ही “मैं” को कई सिखावन से लपेटना शुरू होता है वह यात्रा के हर पड़ाव पर कई परतों से ढँक चुका होता है। घर, घर के सदस्य, मोहल्ला, मोहल्ला के साथी, पाठशाला, पाठशाला के साथी, शिक्षक, संस्कारों की बंदिशें, मूल्यों की कथडियों, संस्था और संस्थाओं के रूढ़-रुग्ण नियमों से “मैं” घबरा कर समर्पण कर देता है।...
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हिन्दी साहित्य – पुस्तक समीक्षा ☆ “प्रकृति की पुकार”- संपादक- डॉक्टर सूरज सिंह नेगी, डॉक्टर मीना सिरोला ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’

श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” (सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय “प्रकाश” जी का  हिन्दी बाल -साहित्य  एवं  हिन्दी साहित्य  की अन्य विधाओं में विशिष्ट योगदान हैं। आज प्रस्तुत है  आपके द्वारा पुस्तक की समीक्षा  “प्रकृति की पुकार”। आप साप्ताहिक स्तम्भ “श्री ओमप्रकाश जी का साहित्य”  के अंतर्गत उनकी मानवीय दृष्टिकोण से परिपूर्ण लघुकथाएं प्रत्येक गुरुवार को पढ़ सकते हैं।  ) ☆ पुस्तक समीक्षा ☆ प्रकृति की पुकार - संपादक- डॉक्टर सूरज सिंह नेगी, डॉक्टर मीना सिरोला ☆ श्री ओमप्रकाश क्षत्रिय ‘प्रकाश’ ☆  पुस्तक- प्रकृति की पुकार  संपादक- डॉक्टर सूरज सिंह नेगी, डॉक्टर मीना सिरोला प्रकाशक- साहित्यागार, धमाणी मार्केट की गली, चौड़ा रास्ता, जयपुर (राज) पृष्ठ संख्या- 340 मूल्य- ₹500   सभी सुनें प्रकृति की पुकार प्रकृति अमूल्य है। हमें बहुत कुछ देती है। जिसका कोई मोल नहीं लेती है। यह बात अस्पताल में कई मरीज बीमारी के दौरान जान पाए हैं। 10 दिन के इलाज में ऑक्सीजन के ₹50000 तक खर्च करने पड़े हैं। यही ऑक्सीजन प्रकृति हमें मुफ्त में देती है। जिसका कोई मोल नहीं लेती है। यह हमारे लिए सबसे अनमोल...
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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #59 – शोरगुल किसलिये ☆ श्री आशीष कुमार

श्री आशीष कुमार (युवा साहित्यकार श्री आशीष कुमार ने जीवन में  साहित्यिक यात्रा के साथ एक लंबी रहस्यमयी यात्रा तय की है। उन्होंने भारतीय दर्शन से परे हिंदू दर्शन, विज्ञान और भौतिक क्षेत्रों से परे सफलता की खोज और उस पर गहन शोध किया है।  अस्सी-नब्बे के दशक तक जन्मी पीढ़ी दादा-दादी और नाना-नानी की कहानियां सुन कर बड़ी हुई हैं। इसके बाद की पीढ़ी में भी कुछ सौभाग्यशाली हैं जिन्हें उन कहानियों को बचपन से  सुनने का अवसर मिला है। वास्तव में वे कहानियां हमें और हमारी पीढ़ियों को विरासत में मिली हैं। आशीष का कथा संसार ऐसी ही कहानियों का संग्रह है। उनके ही शब्दों में – “कुछ कहानियां मेरी अपनी रचनाएं है एवम कुछ वो है जिन्हें मैं अपने बड़ों से  बचपन से सुनता आया हूं और उन्हें अपने शब्दो मे लिखा (अर्थात उनका मूल रचियता मैं नहीं हूँ।”) ☆ कथा कहानी ☆ आशीष का कथा संसार #59 – शोरगुल किसलिये ☆ श्री आशीष कुमार☆ मक्खी एक हाथी के ऊपर बैठ...
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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग # 4 (36-40)॥ ☆ प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

॥ श्री रघुवंशम् ॥ ॥ महाकवि कालिदास कृत श्री रघुवंशम् महाकाव्य का हिंदी पद्यानुवाद : द्वारा प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’॥ ☆ “श्री रघुवंशम्” ॥ हिन्दी पद्यानुवाद सर्ग #4 (36-40) ॥ ☆   नौकायें ले बंग नृप जो लड़ने तैयार हरा उन्हें यश बढ़ा निज, बहा दिया मझधार ॥ 36॥   झुके हुओं को रोप फिर पा उनसे धनमान रघु ने उनको कर दिया ‘‘कलमा '' धान समान ॥ 37॥   राजरूपी पुल से सदल कर ‘कपिशा ' को पार उत्कल से पथ पूँछ के बढ़े कलिंग के द्वार ॥ 38॥   गिरि महेन्द्र पर रघु ने किया प्रचण्ड प्रहार मातलि ज्यों गज गण्ड पर अंकुश देता मार ॥ 39॥   पक्ष काटते इंद्र पर गिरि ने की ज्यों मार त्यों गज सेना ले कलिंग नृप ने किया प्रहार ॥ 40॥   © प्रो. चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’    A १, विद्युत मण्डल कालोनी, रामपुर, जबलपुर. म.प्र. भारत पिन ४८२००८ ≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈ ...
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ई-अभिव्यक्ति – संवाद ☆ 25 सप्टेंबर – संपादकीय ☆ सम्पादक मंडळ ई-अभिव्यक्ति (मराठी) ☆

 ☆ 25 सप्टेंबर- संपादकीय ☆   स्व बाळकृष्ण हरी  कोल्हटकर  25 सप्टेंबर – मराठीतील सुप्रसिद्ध नाटककार बाळ कोल्हटकर (बाळकृष्ण हरी  कोल्हटकर) यांचा आज जन्मदिन (जन्मदिनांक 25 सप्टेंबर 1926).  ते उत्तम नाटककार होते. दिग्दर्शक, अभिनेते होते आणि उत्तम कवीही होते. अनेक नाटकात त्यांची स्वत:ची पदे आहेत. त्यांची नाटके कौटुंबिक आणि भावनाप्रधान आहेत.  वाहतो ही दुर्वांची जुडी, दुरितांचे तिमिर जावो, देव दीनाघरी धावला, वेगळं व्हायचय मला इ.त्यांची गाजलेली नाटके. त्यांनी 30 हून अधिक नाटके लिहिली. त्यांच्या  दुरितांचे तिमिर जावो या अतिशय प्रसिद्ध नाटकामधील एक गीत---- ☆ तू जपून टाक पाऊल जरा ☆ जीवन सुख-दु:खाची जाळी त्यास लटकले मानव कोळी एकाने दुसर्‍यास गिळावे हाच जगाचा न्याय खरा हीच जगाची परंपरा  तू जपून टाक पाऊल जरा-- जीवनातल्या मुशाफिरा ।।   पापपुण्य जे करशील जगती  चित्रगुप्त मागेल पावती पापाइतुके माप ओतुनी  जे केले ते तसे भरा. ।।   निरोप जेव्हा येईल वरचा तेव्हा होशील सर्वांघरचा   तोवर तू या रिपू जगाचा चुकवून मुख दे तोंड जरा।।   दानव जगती मानव झाला  देवाचाही दगड बनविला  कोण कोठला  तू तर पामर चुकून तुझा करतील चुरा ।।   तू जपून टाक पाऊल जरा -----   प्रस्तुती – उज्ज्वला केळकर, सम्पादिका  - ई – अभिव्यक्ती (मराठी) चित्र साभार - कोल्हटकर,...
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