हिन्दी साहित्य – कविता ☆ अकेला ? ☆ भावानुवाद – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? कविता ?

☆ अकेला? ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

(श्री सुहास रघुनाथ जी की मराठी कविता “एकटा ?” का उनके ही  द्वारा हिंदी भावानुवाद. आप उनकी मराठी कविता इस लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं 👉 मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ एकटा? ☆ श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆)

 

“आप अकेले ही रहोगे? “

जब तुम पूछती हो, तब,

सचमुच मुझे आती है हंसी!

 

कहा हूँ मैं अकेला?

साथ में होते हैं ना

ये शब्द, कल्पना और

हमारे ख्वाब!

सचमुच,

हम अकेले ही आये हैं

और अकेले ही जाएंगे

वैसे कितना भी कहो ,

किन्तु, वह सच नहीं है !

 

पैदा होते ही, होते हैं साथ

ख्वाब हमारे उज्वल भविष्य के

और जाते समय

होती है हमारे पास

जीवन भर के यादों की गठरी !

तो बताओ, कैसा हूँ मैं अकेला?

 

भीड़ में तो अकेला नहीं

और एकांत मे भी

मैं अकेला नहीं होता,

मेरे अंदर होती है

एक नगरी ख्वाबों की

और

साम्राज्य स्मृतियों का

तो बताओ

मैं अकेला कैसा?

© श्री सुहास रघुनाथ पंडित 

सांगली (महाराष्ट्र)

मो – 9421225491

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ रचना संसार #८५ – नवगीत – हार-जीत… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ☆

सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम गीत – हार-जीत

? रचना संसार # ८५ – गीत – हार-जीत…  ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’ ? ?

हम अपनों से हार रहे,

जग की कैसी अजब रीत रे।

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत रे।।

 

सुरभित उर की हैं साँसे,

मादक सावन का समीर है।

जलकण बन आँखे बरसे,

प्रतिपल पिया मिलन अधीर है।।

सेज सजी है सपनों की,

निशदिन गाते प्रेम गीत रे।

 

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

 

खिली कली भँवरे हँसते,

यौवन इठला रहा आज है।

साँस- साँस है नाच रही,

बतला सजन ये क्या राज है।।

व्याकुल है आलिंगन को,

ऋतु में  कैसी बढ़ी शीत रे ।

 

हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

 

 तिल -तिल मैं तो नित्य जली,         

 अगन लगाती प्रेम ज्वाल भी।

 आँख मिचौली खेलें सब,

  पूछें नहीं कोई हाल भी ।।

  मिलन यामिनी आयी अब,

  घूँघट पट खोलते मीत रे ।।

 

 हार मिली है आज मगर,

कल निश्चित ही मिले जीत ले।।

© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’

(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)

संपर्क –1308 कृष्णा हाइट्स, ग्वारीघाट रोड़, जबलपुर (म:प्र:) पिन – 482008 मो नं – 9424669722, वाट्सएप – 7974160268

ई मेल नं- meenabhatt18547@gmail.com, mbhatt.judge@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ साहित्य निकुंज #३१३ ☆ भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव ☆ डॉ. भावना शुक्ल ☆

डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३१३ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – मेरा प्यारा गाँव ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

यादों में बस झूलता, मेरा प्यारा गाँव ।

खूब मजा लेते सभी, ठंडी ठंडी छाँव।।

 *

मिलजुलकर रहते सभी, कच्चे ईट मकान।

साथ सुख – दुख बांट रहे, उनकी है पहचान।।

 *

चलो गाँव की ओर सभी, मिले वहाँ सुख चैन।

याद बहुत आती मुझे, ठंडी – ठंडी रैन।।

 *

आती गर्मी देख लो, तपन बढ़ेगी खूब।

संगी साथी गाँव में, नहीं लगेगी ऊब।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ इंद्रधनुष #२९५ ☆ गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी… ☆ श्री संतोष नेमा “संतोष” ☆

श्री संतोष नेमा “संतोष”

(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी  कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप  कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका एक गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी आप  श्री संतोष नेमा जी  की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # २९५ ☆

गीत – लेकर हाथ कनक पिचकारी☆ श्री संतोष नेमा ☆

लेकर हाथ कनक  पिचकारी |

होली   खेलें   कृष्ण   मुरारी ||

झूम-झूम   कर   नाचे   राधा,

निरखें  सखियाँ     बारी-बारी ||

लेकर हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

मिटी  सभी  आपस  की  दूरी।

हुई   कामना   सबकी  वी पूरी।

रँग    खुशी  के  बिखर  रहे  हैं, 

मिली   प्रेम   की   है   कस्तूरी।

 लगे न  युवती आज    कुँवारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

आज   शत्रु  भी  लगता  भाई।

होली    ने    दुश्मनी    मिटाई ।

पढ़ते  आज  सभी  मिल मानो,

सधे   प्रेम   के    अक्षर    ढाई।   

मन   भाए   हैं।  हृदय  बिहारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फूला     टेसू     भी    इतराये |

रंगों    का   मतलब  समझाये।

मन   भाती  फूलों   की  होली ,

रंग – रसायन     हमें  न   भाये।

गारी  आज  लगे  अति   प्यारी |

लेकर  हाथ  कनक  पिचकारी ||

*

फागुन  बौरा  कर  ज्यों  आया |

रंग   प्यार   के  अद्भुत   लाया ||

ढोल – मृदंग  चंग   सब   बाजें,

सबका   हृदय    देख    हर्षाया।   

मिलता  है  “संतोष”  सभी  को,

आज    उड़ेलो    मस्ती    सारी ||

लेकर  हाथ  कनक   पिचकारी |

रँग    खेल   रहे   कृष्ण  मुरारी ||

© संतोष  कुमार नेमा “संतोष”

वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार

आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 70003619839300101799

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ शशि साहित्य # १५ – कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सराफ ☆

श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशिसुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘मनवा बैरी…’।)

☆ शशि साहित्य # १५ ☆

? कविता – मनवा बैरी… ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

हृदय हो रहा वैराग्य का,

ढूंढ रहा शून्य में विस्तार का,

दौर है आज और अभी में जीने का,

पाल रहा सपना जन्म-जन्मांतर का,

दुनिया ठहरी निपट निराली,

क्यों ढूंढ रहा खुद अपना सा,

अति वृहद विशाल जगत में,

क्यों रचे है, स्वयं की दुनिया का,

पल पल बदलती दुनिया में,

ठीक नहीं, तटस्थ हो जाना तेरे कदमों का,

दुश्वार मगर बहुत यह काम,

खुद को समझा लेने का..

खुशियां भर लो जीवन में,

अल्प समय है जीने का…

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४२ ⇒ रेसिडेंसी एरिया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “रेसिडेंसी एरिया।)

?अभी अभी # ९४२ ⇒ आलेख – रेसिडेंसी एरिया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हमारे लिए हमारा निवास ही रेसिडेंस है लेकिन हमारे शहर में एक रेसिडेंसी एरिया भी है जहां कभी अंग्रेज अफसर रहते थे। जो भारतीय विदेशों में रहते हैं, वे नान – रेसिडेंट कहलाते हैं। भारत में तब अंग्रेजों का ही शासन था, इसलिए वे रेसिडेंट कहलाए।

हम अपनी पहचान, परिवेश इतनी आसानी से नहीं बदलते। आज भी रेसिडेंसी एरिया अपनी जगह है, वहां अफसरों के निवास हैं, कलेक्टर, कमिश्नर के बंगले हैं, रेसीडेंसी कोठी है, रेसिडेंसी क्लब है। देश में हर जगह गेस्ट हाउस है, सर्किट हाउस है। अंग्रेज चले गए, ठाट बाट छोड़ गए।।

आज भी आप शहर के इस शांत क्षेत्र में चले जाएं, साफ सुथरी सड़कें, हरियाली, बड़े बड़े बंगले, साथ में खुले अहाते, बड़े बड़े मैदान। बगीचा, टेनिस कोर्ट और शुद्ध हवा। आसपास कोई बहु – मंजिला इमारत नहीं, कोई शॉपिंग मॉल अथवा ट्रेडिंग सेंटर नहीं। आपका पड़ोसी कोई अफसर ही हो सकता है, या फिर कोई कॉलेज का प्रोफेसर।

इसी क्षेत्र में जेल भी है और आकाशवाणी का प्रसारण केंद्र भी। आकाशवाणी के क्वार्टर भी हैं और उनके कर्मचारियों द्वारा बसाई गई रेडियो कॉलोनी। बस, इतनी ही कहानी है रेसीडेंसी एरिया की। इसके बाद एक तरफ अगर चिड़िया घर है तो दूसरी तरफ आजाद नगर।।

देश को आजाद हुए सात से अधिक दशक बीत गए, अंग्रेजी राज चला गया, जन सेवक आ गए, राजाओं के महल खाली हो गए, जनता झोपड़ी में और मंत्री बंगलों में आ गए। सन् ७४ में प्रदेश की राजधानी भोपाल प्रवास के दौरान टी टी नगर से लगे हुए ७४ बंगलों के दर्शन प्रात: कालीन भ्रमण के दौरान किए थे। अफसरों और मंत्रियों की नेम प्लेट और आलीशान बंगले। तब और अब मैं सुविधाएं बढ़ी ही हैं, कम नहीं हुई। उसी अनुसार महंगाई भी बढ़ी ही है, कम नहीं हुई।

सामंती सोच, अंग्रेजियत और कांग्रेसी संस्कृति को छोड़ हम एक नई संस्कृति में प्रवेश कर चुके हैं जिसे आप शुद्ध भारतीय संस्कृति कह सकते हैं। हमारे आचार विचार में सादगी और आदर्श का प्रवेश अगर आज भी नहीं होता, तो यह तय है कि हम एक दोहरी जिंदगी जी रहे हैं, जिसमें सिर्फ पाखंड और दिखावा है। आज कोई लाल बहादुर शास्त्री नहीं जो देश पर संकट के समय एक वक्त का भोजन छोड़ने का संकल्प ले और बिना सरकारी विज्ञापन बाजी और कार्यकर्ताओं के शोर के, देशवासी प्रेरित हो, एक समय का भोजन त्यागने का संकल्प ले लें।।

अफसर, गाड़ी बंगले नहीं छोड़ सकता, मंत्री कारों के काफिले और विमान यात्रा नहीं छोड़ सकता। जिस देश में सादगी दिखावा और पाखंड का प्रतीक बन जाए, वहां शान शौकत और भव्यता ही एकमात्र विकल्प बच रहता है। अंग्रेजों ने भारत नहीं, इंडिया छोड़ा। हमने उनका रेसीडेंसी एरिया अपना लिया। आज से उनके सारे बंगले हमारे बंगले हो गए। अर्दली जो थे, चपरासी हो गए।

कुछ भी हो, आई लव माय इंडिया ! इसीलिए मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्टार्ट अप इंडिया, शाइनिंग इंडिया।

नमस्ते इंडिया, सावधान इंडिया।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विजय साहित्य # २८५ – जास्वंद…! ☆ कविराज विजय यशवंत सातपुते ☆

कविराज विजय यशवंत सातपुते

? कवितेचा उत्सव # २८५ – विजय साहित्य ?

☆ जास्वंद…!

(अक्षरछंद… पंधराक्षरी)

(शीर्षक – औषध खासे.)

ज्या सुमनाचे,‌ चित्र काढता

दिसतो देव

त्या मोरयाची,‌जास्वंद फुले,

पुजेत ठेव. १

*

पाच पाकळ्या, गर्भ रेशमी,

घेर अनोखा

तुरा शोभतो, फुलातुनी‌ ज्या,

झुलतो झोका. २

*

लाल,भगवा, छटा आगळ्या,

कातर पाने

रंगपंचमी, नाजूक कांती,

रंग दिवाणे.३

*

नको सुईने, हारात गुंफू,

वाहू‌ चरणी

जास्वंदीची, फुले अनोखी,

नाचे धरणी. ४

*

तेल औषधी,त्वचा निरोगी,

किती फायदे

केस त्वचेला, देई तजेला,

गोड वायदे.५

*

अर्क काढूनी, तेल करावे,

औषध भारी

चूर्ण करोनी, चहा करावा,

तो गुणकारी. ६

*

गजाननाच्या,शिरी शोभते,फुल जास्वंदी

निसर्गातले, औषध खासे,

करे आनंदी…७

© कविराज विजय यशवंत सातपुते

सहकारनगर नंबर दोन, दशभुजा गणपती रोड, पुणे.  411 009.

मोबाईल  8530234892/ 9371319798.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ द्वैत… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

श्री शरद कुलकर्णी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ द्वैत… ☆ श्री शरद कुलकर्णी ☆

आल भरुन आकाश

फक्त तुझ्यासाठी .

मी होईन पाऊस

फक्त तुझ्यासाठी .

मयूर मी नृत्यातुर

फक्त तुझ्यासाठी .

वारा होईन बेभान

फक्त तुझ्यासाठी .

वृक्ष होउन भिजेन

फक्त तुझ्यासाठी .

पक्षी होउन गायीन

फक्त तुझ्यासाठी .

मी झुूरेन मरेन

फक्त तुझ्यासाठी .

जन्मोजन्मी जन्म माझा

फक्त तुझ्यासाठी .

तुझ्या विना जगणे

सांग कशासाठी ?

द्वैत एवढेच आता

फक्त माझ्यासाठी .

 

© श्री शरद  कुलकर्णी

मिरज

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – प्रतिमेच्या पलिकडले ☆ # सीनें में जलन… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर ☆

श्री नंदकुमार पंडित वडेर

? प्रतिमेच्या पलिकडले ?

☆ # सीनें में जलन… # ☆ श्री नंदकुमार पंडित वडेर 

#सीनें में जलन… ऑंखों में तूफ़ान… #

…. तो आला, त्यानं पाहिलं आणि त्यानं सगळ्या भारतीय सिनेसृष्टीला आणि लोकांच्या हृदयाला जिंकून घेऊन एक अनभिषिक्त सम्राटाचं पद अनेक दशकं गाजवतं राहीला….स्वप्नं बघायची… ती पूर्णत्वास नेताना संघर्ष करायचा… आणि ती स्वप्नं सत्यात उतरावयाची याचा वस्तुपाठच त्याने आजवर केलेल्या शेकडो सिनेमातून तरूणाईलाच नव्हे तर तमाम लोकांना दिला… अन्याय घडो कुठेही.. इट का जवाब पत्थरसे देना… आणि आपल्या साध्या सरळ मार्गी दैनंदिन व्यवहारात जर कुणी आडदांडपणा करून त्रास देत असेल व त्यास दादापुता करूनही ऐकत नसेल तर… खेल तुम्हने शुरू किया तो खत्म हम कर देंगे.. ही अन्यायाविरूद्धची , नाहक पिळवणूकी विरुद्धची लढाई एकट्या खांद्यावर कशी लढायची याचं प्रशिक्षण तो देत गेला… यंग अंग्रीमॅन हा त्याने अशा विविध पैलूंच्या भूमिका साकारून मिळवला तो उगाच नाही… त्याचे खदिरांगासारखे आग ओकणारे डोळे जेव्हा आपल्याला दिसतात तेव्हा आता अन्याय कर्ता, जुलूम कर्त्याची आता काही खैर नाही हे हाणामारी आणि दे दणादण मारपिट पटातून आपल्या दिसून येते…पूर्व सुरीचा हिंदी चित्रपटातील रोड रोमियो ची असलेली नायकाची प्रतिमा त्याने आपल्या कलेच्या अदाकरीने बदलून टाकताना… नायकातली नजाकत आणि शांत डोक्याचा मुत्सद्दी  खलनायक रंगवताना नकारात्मक नायकाचे गुणधर्म जास्त भावतात…काहीवेळा तर त्याच्या नायकाची प्रतिमा आपल्या रसिक मनावर इतकी बिंबली गेली असल्याने त्याने हा खलनायक रंगवला आहे हेच मुळी पचनी पडत नाही…राग जितका टोकाचा त्याला दाखवता आला तितकेच प्रेमाचे, मोहब्बतेचे, इश्काचे नजारे सुध्दा अगदी संयत दाखवून दिले… तो ज्या चित्रपटात असेल त्या चित्रपटातील नायिका त्याच्यावर फिदा होताना पडद्यावर वर दिसायच्या पण पडद्या बाहेर खाजगी जीवनात देखील त्या नायिका ‘ ‘हाय मैं मर  जावाॅं’ करत अपनी जिंदगी न्यौछावर करायला मागे पुढे पाहत नसत… किंबहुना काहींना तर  त्याच्या प्रेमाचा सिलसिला असाच अखंड चालू राहावा असचं वाटल्याने त्यां आजही अतुट प्रेमापोटी त्याच्यासाठी  ‘ नजर लागी सय्या तोरे बंगले पे’ आळवत मैं तुलसी तेरे ऑंगन की बनून राहिल्या… पण आपल्या मनातील ही होणारी चलबिचल मात्र त्याने चारचौघात कधीही चर्चेवर दिसणार नाही याची काळजी घेतली… अफवा, कंडम गाॅसिप के चर्चे तर हर जुबान पर होत राहीले… असा हा हरहुन्नरी  कलावंत आपल्या अभिनयाच्या जोरावर रसिकांच्या मनावर अधिराज्य गाजवत राहीला… उत्तुंग उंचीवर पोहचला आणि या सम हाच असा एकमेवाद्वितीय राहिला…निसर्गाच्या नि नियतीनेही तशात त्याला असे काही फटकारले तेव्हा तर तो काळाच्या पडद्याआड लुप्त होता होता त्याच्या सतीच्या पुण्याईने  तारले… कलावंताला घडवता येत नसते तर तो घडत जात असतो ,पैदाईशीच असतो..याला आपल्या अलौकिक कीर्तीच्या अंहकाराने छेद देत कलावंत निर्मितीची प्रशाळा आपले सगळे तनमन नि ओतून उभा केली… पण नियतीला ते साफ ना मंजूर होते आणि त्याला क्षणात होत्याचे नव्हते केले… चलती हुई गाडी दलदलमें फस गई… तोपर्यंत यंग अंग्रीमॅन चा करिष्माही संपलेला होता… बाजारू चलनी नाण्यांचा अभिनेत्यांचा  खणखणाट सुरू असल्याने त्याला रोड पतीची अवकळा आली होती… पण इथं  नियतीचे दान त्याला  अनुकूल  असे पडले.. कौन बनेगा.. च्या टि. व्ही.  छोट्या पडद्यावर तो आला.. आणि पुन्हा त्याने आपल्या कलेची झलक दाखवून द्यायला सुरुवात केली.. बघता बघता ती कलावती अधिक जोमाने दौडत निघाली… पुनश्च त्याला उत्कर्षाचे दिवस लाभले… आणि मग खऱ्या अर्थाने म्हणू लागला मेरे पास अब पहलेसे ज्यादा सबकुछ है.. बंगला है, गाडी है,ढेर सारा पैसा है, दौलत है, आज पहले जैसे क्या नही मेरे पास…तुमही बताओ…हां एक गोष्ट मात्र तुम्हाला सांगायची राहून गेली…माझा पहिल्या भरभराटीच्या काळातले अवतीभवतीचे माझे माझे म्हणणारे लोक मात्र माझ्या पडत्या काळात सोडून गेले आणि आता  मधूचा सुवास येताच  माशा पुन्हा घोंगावू लागल्यात… एक गोष्ट माझी मात्र अजूनही तशीच साथ देतेय ती तीस पैश्याची पुत्तूशेठ बीडी कालही होती तशीच आजही माझ्या ओठांवर शिलागावून बसलेली आहे… ना तिची चव बदलली ना तिला माझ्या श्रीमंतीने लाथाडले… म्हणूनच मी तिला जवळ ठेवले आहे… तिच्या मदतीनेच मी माझ्या नैराश्याचा धूर बाहेर सोडत असतो… आणि बीडीचे जळणारे लालचुटूक थोटूकाची ठिणगी मला जगण्याची सतत उर्मी देतं असतं…

©  श्री नंदकुमार इंदिरा पंडित वडेर

विश्रामबाग, सांगली

मोबाईल-99209 78470 ईमेल –nandkumarpwader@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ११ … ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

सुश्री अरुणा मुल्हेरकर

? विविधा ?

☆ मला समजलेली संत तुकारामांची गाथा… भाग – ११ ☆ सुश्री अरुणा मुल्हेरकर ☆

अभंगांतून गीतेचे तत्वज्ञान

देह बुद्धी नष्ट होऊन भक्तिमार्गाने परब्रम्ह प्राप्त झाले, म्हणजे जन्म मरणाच्या चक्रातून माणसाची सुटका होते, हे तत्त्वज्ञान आहे. परंतु तुकाराम महाराजांना पांडुरंगाची अखंड भक्ती करून त्याची सेवाच करायची आहे. त्यांना मुक्तीची चाड नाही, म्हणून त्यांच्या एका अभंगात त्यांनी स्पष्ट म्हटले आहे,

आमुचे उचित/ हेचि उपकार/

आशपुलाची भार/ घालू तुज//

 आमच्या योगक्षेमाचा भार देवा तुझ्यावर घालून स्वस्थ बसणे हेच उचित आहे.

 मी भक्त व तू माझा हरी, अशी द्वैतभावना तुकाराम महाराजांच्या अभंगातून दिसत असली

 तरी अद्वैत झाल्याशिवाय, खरा भक्त असूच शकत नाही हे त्यांच्या अभंगातून दिसणारे गीतेचेच तत्त्व आहे. ते अभंगातून स्पष्ट सांगतात,

दुजेखंडे तरी/ उरला तो अवघा हरी/

आपण बाहेरी/ नलगे ठाव धुंडावा//

इतुले जाणावया जाणा/ कोड तरी मने मना/

पारधीच्या खुणा/ तेणेची जाणाव्या//

तुकाराम बुवा या अभंगात काय सांगतात? मनानेच मनाला जाणले पाहिजे. जो पारधी असतो तो शिकारीचा शोध कसा घेतो, हे दुसरा पारधीच जाणतो. आपला हरी हा आपल्या जवळच आहे, तो दुसऱ्या ठिकाणी शोधायची गरज नाही.

 देह आधी काय खरा/ देहसंबंध पसारा/

 बुजगावणे चोरा/ रक्षणसे भासते//

 तुका करी जागा/ नको वासपू वाऊगा/

 आहेस तू अंगा/ अंगी डोळे उघडी//

तुकाराम महाराज निजरूप विसरून एक प्रकारे झोपी गेलेल्यास जागे करतात, आणि सांगतात की तू भिऊ नकोस. अद्वैत रूप हरी तुला सापडेल, कारण तू स्वतःच परमात्मरूप आहेस. तुझी आत्मदृष्टी उघडी ठेवशील तर तुला हा बोध होईल.

थोडक्यात महाराजांना इथे असे सांगायचे आहे, की संपूर्ण विश्वात, चराचरात जो परमात्मा भरलेला आहे, तो तुला तू जर डोळे उघडे ठेवलेस तरच दिसू शकेल. आपल्याला एखादा माणूस सहज कुठेतरी भेटतो, आणि आपली मदत करून जातो. परमेश्वराच्या रूपानेच आपल्याला मदत करण्यासाठी तो आलेला होता याची मात्र आपल्या देहधारी माणसाना जाणीव नसते.

भगवंताने अर्जुनाला काय सांगितले?

“तुझे सर्व कर्म मला अर्पण कर.” तुकाराम महाराजही मुमुक्षुंना हेच सांगत आहेत.

आहे ते सकळ/ कृष्णासी अर्पण/

नकळता मन/ दुजे भावी//

म्हणून पाठे/ लागतील भुते/

येती गिवसित /पाच जणे/

(पंचमहाभूते, ज्यापासून माणसाचे शरीर बनले आहे)

 ज्याचे त्या वंचले/ आठव न होता/

दंड हा निमित्त कारणे/ तुका म्हणे//

अर्थात सर्व कर्मे हरीची असून त्याची त्याला अर्पण करायची आठवण न ठेवल्यामुळे, माणूस जन्म मरणाच्या चक्रात सापडतो, त्याला दंड मिळतो.

तुकाराम महाराज पुन्हा पुन्हा गीतेत आलेल्या धर्म रक्षणाचे महत्त्व जीवनात का आहे ते त्यांच्या अभंगातून सांगतात, त्याचप्रमाणे शांत मनोवृत्तीचे महत्व ते समजावून सांगतात.

शांती परते नाही सुख/ येर अवघेची दुःख/

म्हणवुनी  शांती धरा/ उतराल पैलतीरा//

अंगी भरती आधी व्याधी/ तुका म्हणे त्रिविध ताप/ मग जाती आपोआप//

 मन जेव्हा शांत असेल, त्याचवेळी सर्व दुःखांचा नाश होऊन पैलतीरास जाणे सोपे होईल.

साळंकृत कन्यादान/ पृथ्वीदानाच्या समान/

परिते न कळे या मुढा/ येईल कळो भोग पुढा//

आचरता कर्म/ भरे पोट राहे धर्म/

सत्या देव साहे/ ऐसे करूनिया पाहे//

अन्न मान धन/ हे तो प्रारब्ध आधीन/

तुका म्हणे सोसे दुःख/ आता पुढे नासे//

गीतेतील कर्मयोग महाराजांनी या अभंगात भक्तांना सांगितला आहे. या ठिकाणी त्यांनी तत्कालीन वर्णाश्रमधर्माचे महत्त्व लक्षात घेतले आहे. प्रत्येकाने आपल्या धर्माला अनुसरूनच कर्म केल्याने दुःख राहत नाही असा या अभंगातून त्यांनी उपदेश केला आहे.ज्याप्रमाणे

कृष्णाने पार्थास त्याच्या क्षात्र धर्माचे पालन करण्यास सांगितले.

क्रमशः… 

© सुश्री अरुणा मुल्हेरकर 

डेट्राॅईट (मिशिगन) यू.एस्.ए.

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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