हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय आलेख  – “प्रश्नविहीन“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ५६ ☆

✍ लघुकथा – प्रश्नविहीन… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

प्रतीक की कार्यालय में नौकरी लगी तो भंडार विभाग में लिपिक के रूप में और धीरे धीरे प्रमोशन पाकर अधीक्षक के पद तक प्रोन्नत हो गए। भंडार विभाग से उनका कहीं ट्रांसफर नहीं हुआ। भंडार विभाग के जरिए ही हर विभाग के हर सामान की खरीद हुआ करती थी और मरम्मत कार्य भी। पता नहीं क्यों किसी भी वस्तु का डैड स्टाक रजिस्टर नहीं मिलता था। शायद कोई देखता ही नहीं। हालांकि हर साल ऑडिट होता। विजिलेंस द्वारा भी इंसपेक्शन हुआ करता। लेकिन प्रतीक पर कभी आंच नहीं आई। हर अफसर के परिवार के लोग प्रतीक को जानते थे और बच्चे तो उनसे लिपट जाते थे। कुछ भी चाहिए प्रतीक अंकल मौजूद।

सभी अफसरों की वे नाक का बाल थे। नए अफसर कहीं से ट्रांसफर होकर आते तो प्रतीक उनकी सेवा में हाजिर। चैंबर के पर्दे साहब की मरजी के अनुसार बदल जाते । नया फर्नीचर आ जाता। नई डिजाइनदार टेबल व कुर्सियाँ। पुराने पर्दे व फर्नीचर कहां जाते किसी को पता नहीं।

एक डायरेक्टर आए कोलकाता से ट्रांसफर होकर। नाम था सदानंद कुरील। बहुत तेज तर्रार। उन्होंने पदभार संभाला तो दूसरे दिन प्रतीक उनके चेंबर में हाजिर। कुरील साहब ने उनकी तारीफ पूछी तो बताया मैं प्रतीक, अधीक्षक भंडार विभाग। कुरील साहब ने कहा, मैंने तो आपको बुलाया नहीं फिर कैसे चैंबर में सीधे आ गए। प्रतीक ने कहा कि आपके पी.ए. ने बुलाया। कुरील साहब ने पी.ए. को बुलाकर पूछा कि मैंने तो नहीं कहा कि भंडार अधीक्षक को बुलाओ, फिर ये यहां क्यों आए। पी.ए. ने कहा कि सर जो भी नए डायेक्टर आते हैं तो उन्हें नया फर्नीचर पर्दे आदि लगते हैं, इसलिए। अच्छा, कुरील साहब ने हुंकार भरी। अच्छा प्रतीक बाबू आप आ ही गए हैं तो बताइए, नए अफसरों के लिए क्या क्या मंगाते हैं और पुराना सामान कहां जाता है। अब तक की खरीद और पुराने सामान के निपटारे का रिकार्ड ले आइए।

प्रतीक की बोलती बंद। जी सर कहकर चैंबर से बाहर निकल आए। कई दिनों बाद तक वे नहीं आए तो कुरील साहब ने पी.ए. से प्रतीक को बुलाने को कहा। पी.ए. ने बताया कि वह अस्पताल में भरती हैं। कुरील साहब ने पी.ए. से उनकी छुट्टी और सिक रिपोर्ट का रिकार्ड मंगवाया। रिकार्ड देखकर कुरील साहब ने भंडार अधिकारी को बुलाया। उनसे पूछा कि प्रतीक आपके अधीक्षक हैं, उन्हें क्या हुआ है। भंडार अधिकारी का मुंह सूख गया। बोल नहीं पाए। कुरील साहब बोले चलिए प्रतीक को देखने अस्पताल चलते हैं। दोनों पहुंचे तो अस्पताल में अफरा तफरी मची थी। कुरील साहब को देखकर चिकित्सा अधिकारी और घबडा गए, तुतलाते से बोले, सर प्रतीक ने विष पान कर लिया। कुरील साहब बोले कि आप यहां क्या कर रहे हैं. जाइए उसे बचाइए। चिकित्सा अधिकारी भर्राए स्वर में बोले, नहीं बचा पाए सर। अस्पताल के बाहर मीडिया कर्मी और प्रेस प्रतिनिधियों की भीड थी। हर एक का चेहरा प्रश्नविहीन।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९४० ⇒ गया और बोधगया ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “गया और बोधगया।)

?अभी अभी # ९४० ⇒ आलेख – गया और बोधगया ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

मैं कभी गया नहीं गया, बोधगया नहीं गया। सुना है दोनों जगह ऐसी हैं, जहां मुक्ति मिलती है।

जो चला गया, उसे भी और जिसे जीवन का बोध हो गया, उसे भी। जिसे बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया। इसी स्थान पर बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति हुई थी, वह बोधिवृक्ष यहीं है।

आखिर यह कैसा बोध है जो बोधगया में ही होता है। आप चाहें तो इसे आत्मबोध कहें, आत्म साक्षात्कार कहें, सेल्फ रियलाइजेशन कहें, यह होता तो हमारे अंदर ही है। यह बोधिवृक्ष भी हमारे अंदर ही है। अंदर की खोज के लिए बाहर का आलंबन तो लेना ही पड़ता है। चारों धाम की यात्रा अंतर्यात्रा के बिना कभी पूरी नहीं होती।।

मैं इतना अभागा, कभी प्रयागराज भी नहीं गया। गया हो या बोधगया, बद्रीनाथ धाम हो या हर की पेढ़ी, मुक्ति का द्वार तो गंगा ही है और गंगा, जमना और सरस्वती, तीनों नदियों का संगम भी प्रयागराज ही में है। हो गया न महाकुंभ। ज्ञान, भक्ति और वैराग्य की प्रतीक ही तो हैं ये तीनों नदियां। जिसमें सरस्वती यानी वैराग्य तो लुप्त है। बिना वैराग्य के कहां मुक्ति। बुद्ध का वैराग्य ही बोधगया है।

हां मैं कन्याकुमारी स्थित विवेकानंद रॉक मेमोरियल जरूर गया हूं, कुछ समय के लिए ध्यानमग्न हो विवेकानंद भी बना, फिर वापस चला आया। काश विक्रमादित्य के सिंहासन की तरह बोधिवृक्ष के नीचे बैठने से ही बुद्धत्व की प्राप्ति हो जाए तो जीवन कितना आसान हो जाए। लेकिन यहां गुडविल नहीं, स्ट्रांग विल काम आती है। वैराग्य कोई जागीर नहीं, कि वसीयतनामे के जरिए चाहे जिसके नाम कर दी जाए।।

कबीर अक्सर ताने बाने की बात करते हैं, इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना की बात करते हैं। इड़ा, पिंगला को आप चाहें तो सूर्य चंद्र नाड़ी समझें अथवा प्रतीक रूप में ज्ञान और भक्ति रूपा गंगा जमना, लेकिन सुषुम्ना तो अदृश्य वही सुप्त नाड़ी है, जो वैराग्य रूपी सरस्वती नदी की प्रतीक है। तीनों का संगम ही महाकुंभ है जो इसी शरीर में सहस्रार है। जिसे अमृत कहा जाता है, वह वह मुक्ति है जो हमें जन्म मरण के बंधन से मुक्त करती है। देव असुर दोनों मूर्ख थे, जो मुक्त होने की अपेक्षा, स्वर्ग प्राप्ति के लिए, और अमर होने के लिए, अमृतपान करना चाहते थे।

कबीर को भी इसका बोध था और बुद्ध को भी। जीते जी जिसे इसका बोध हो गया, वह बुद्ध हो गया, अमर हो गया वर्ना लगाते रहो डुबकी ज्ञान और भक्ति की गंगा में, बिना वैराग्य भाव के, करते रहो अमृत पान। जब छूटेंगे प्रान, यहीं गया में ही होगा पिंड दान।।

काश मुक्ति इतनी आसान होती ! काशी मरणोन्मुक्ति। काशी में तो केवल प्राण त्यागने से ही मुक्ति मिल जाती है। मैं मति का मारा तो कभी काशी भी नहीं गया। सोचता हूं, जीते जी ही एक बार काशी हो आऊं, प्रयागराज के संगम में स्नान करके बोधगया भी हो आऊं। मन में यह मलाल तो नहीं रहेगा, जीते जी मैं कहीं भी नहीं गया ; न गया, न बोधगया..!!

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १०५ – सुकून… ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – सुकून।)

☆ लघुकथा # १०५ – सुकून श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

इस भाग दौड़ की जिंदगी में समझ में नहीं आता क्या करूँ क्या न करूँ?

आज पैदल चल रही हूँ तो यह रास्ता भी मुझे बहुत लंबा लग रहा है कमल जी अपने आप से बातें करते हुऐ आराम से धीरे-धीरे चल रही थी।

दीवार पर लिखे हुए सभी पोस्ट को ध्यान से पढ़ रही थी और आसपास की दुकानों के बोर्ड भी पढ़ रही थी। चलो अच्छा है आज गाड़ी खराब हो जाने से कुछ तो फायदा हुआ पता चल जाएगा कि कहाँ क्या मिलता है?

तभी अचानक  एक पोस्ट दिखाई दिया उसमें लिखा था कि चाय कॉफी के साथ यहाँ बातों का आनंद लें।

यह कैसी दुकान है कमल जी ने सोचा कुछ देर रुकने के बाद उनके मन में विचार आया चलो अंदर चल कर देखती हूँ घर जल्दी जाकर क्या करूंगी अकेली ही तो रहती हूँ बच्चों ने तो मुझे अकेला छोड़कर विदेश चले गए समय काटने के लिए पास के स्कूल में पढ़ाती हूँ।

उन्होंने देखा काफी सारे लोग बैठे हैं एक लाइब्रेरी है उसमें कुछ लोग ऑनलाइन पढ़ रहे हैं कुछ पेपर और किताबें पढ़ रहे है, चाय कॉफी और नाश्ता भी मिल रहा है।

तभी एक मुस्कुराती हुई महिला ने कहा -” मैडम आप क्या लेंगे लिए यहाँ बैठ जाइए।”

कमल जी ने कहा बहन जी कैसी जगह है इसके बारे में आप मुझे कुछ बताइए?

उसे महिला ने कहा मेरा नाम कविता है, हम पति-पत्नी यहां रहते हैं हमारा बहुत बड़ा घर था सड़क के किनारे हम अकेले रहते थे इसलिए हम लोगों ने सारी किताब कॉपी को एक जगह रख दिया और कुछ कंप्यूटर भी खरीद लिए हैं बच्चे पढ़ते हैं और जो हमारी तरह बुजुर्ग हैं वह भी यहां आते हैं हम सभी एक दूसरे के साथ अपना अनुभव बताते हैं और इतनी देर हम सब कैसे बैठ पाएंगे इसलिए यहाॅं पर चाय कॉफी नमकीन बिस्कुट सैंडविच और पकौड़ी मिलती है।

बाबाजी आप लोग तो बहुत अच्छे कार्य कर रहे हो मुझे तो यह पता ही नहीं था।

कविता ने कहा बहन क्या करें हमारी मजबूरी है और वक्त की मांग है आज के जमाने में किसी के पास समय नहीं है और हमारे पास समय ही समय है तो क्यों ना हम सभी को सुकून बाँटे।

कविता ने कहा ठीक कह रही हो बहन मुझे भी एक कप चाय पिला दो। कविता और रागिनी दोनों मुस्कुराने लगती हैं उनकी आंखों में एक चमक आ जाती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३०५ ☆ गझल… आयुष्य ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३०५ ?

गझल आयुष्य ☆  प्रभा सोनवणे ☆

हे पात्र नदीचे सुशांत.. अवखळ नाही

जगण्यात अता कुठलेही वादळ नाही

*

आयुष्य कधी थांबते का कुणासाठी ?

हृदयात जराही तसली  खळबळ नाही

*

तू ठेव तिथे लपवून तुझी गाऱ्हाणी

सरकार म्हणे आम्हाला कळकळ नाही

*

बाईस विचारा काय पाहिजे आहे ?

गावात तिच्या मुक्तीची चळवळ नाही

*

की मूग गिळावे आणि मूकच रहावे ?

मी त्यांच्या इतकी मुळीच सोज्वळ नाही

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ मनाचा मागोवा… ☆ प्राची अभय जोशी ☆

प्राची अभय जोशी

? कवितेचा उत्सव ?

☆ मनाचा मागोवा… ☆ प्राची अभय जोशी ☆

असं वाटतं मन एक…

 

 तेवणारी वात व्हावे,

 काळोख विझवणारे

मातीसारखे सुपीक व्हावे

 सृष्टीला फुलवणारे..

 

मन एक आधार व्हावे,

 कोणाच्या दुःखाचे अन्

खळाळता झरा व्हावे,

 आनंद उधळणारे..

 

मन उंच उडणारा पतंग,

 पक्षांसवे विहरणारे

झाडांमध्ये लपलेल्या,

 घरट्यात डोकावणारे..

 

मन एक आकाश व्हावे,

 इंद्रधनुसम रंगांचे

रिमझिम सोन सरींना,

 ओंजळीत घेणारे.

 

मन एक कृष्ण व्हावे

 गोप गोपींच्या श्रद्धेचे

मैत्रीत भिजलेल्या,

 सुदाम्याच्या पोह्यांचे..

 

मन एक असा मागोवा,

 माझे मीपण सरण्याचा

मनाच्या हिंदोळ्यात विसावा,

 माझ्या मनातील,

 निश्चल भावनेचा…

 निश्चल भावनेचा…

©  प्राची अभय जोशी

मो 9822065666 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ गंमत… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

श्री तुकाराम दादा पाटील

?विविधा ?

☆ गंमत… ☆ प्रा तुकाराम दादा पाटील ☆

माणसाचं मन जीवसृष्टीतल एक अजब रसायन आहे ते कधी कुणात एकजिनसी होऊन मिसळून एकरूप होऊन जाईल आणि कुणाशी बेइमानी करून कुणापासून कशासाठी फारकत घेऊन विभक्त होईल याचा काही नेम नाही. कारण ते चंचल अस्थिर, चपळ, चालाख आहे. याचा सर्वानी अनुभव घेतलेला असेलच. मना मुळेच मानवजातितील विवीधता, मतभिन्नता आवडीनिवडी, नितीमानता, आणि संतानी सांगितलेल्या शड्ररिपुंची देहावरची मजबूत पकड ठेवण्याच्या मनाच्या अफाट शक्तीचे धोरण सूक्ष्म निरीक्षणाने ध्यानात येते. मग माणूस आपल्यातला खरा माणूस शोधू लागतो. तो कोणाला किती सापडतो हे शोधणारालाच माहिती पडतं. पण ते सापडणं इतरांना सविस्तरपेणे सांगता येईल ही बाबही तशी अवघडच.

कारण जो तो मनाच्या या फाजील पणामुळेच आपल्याला राज समजून वागताना दिसतो राजासारखा पण जगतो चिंताग्रस्त माणसा सारखा. कारण त्याच मन त्याची कशी कधी फसगत करील हे त्यालाच माहीत नसतं. असलं हे लबाड, ढोंगी, आपमतलबी. निगरगटृठ, दिलदार, कपटी, रानटी, अडेलतट्टू, अशी बिरुदावली मिरवणार मन महा डांबीस असतं. ते ओढाळपणा करत माणसाला समाधनान निवांतपणे जगूच देत नाही. आणि स्वतःही मरत नाही. ते आपलं अधाशी बुभुक्षित स्वरूप एकवटून चिकाटीन जगतच रहातं. म्हणुनच माणसा‌ला देवाने दिलेला शाप म्हणजे मनच आहे असं वाटू लागतं. तो शाप तहहयात सोसण्याशिवाय दुसरा पर्यायच नाही माणसा पुढं. याच्या कचाट्यातून सुटण्याची बुद्धी माणसाला फारफार उशीरा सुचते तेव्हा सुटण्याची वेळ निघून गेलेली असते. मग आपली हतबलता लपवत माणूस आपल्याला आल़ेला अनुभव आपलं तत्वज्ञान म्हणून दुसऱ्यांना आग्रहान सांगत बसतो. ते ऐकणाराही तेव्हा त्याचं आवर्तनातून जात असतो. हीच खरी तर गंमत आसते‌ जगण्यातली

 

© प्रा. तुकाराम दादा पाटील

मुळचा पत्ता  –  मु.पो. भोसे  ता.मिरज  जि.सांगली

सध्या राॅयल रोहाना, जुना जकातनाका वाल्हेकरवाडी रोड चिंचवड पुणे ३३

दुरध्वनी – ९०७५६३४८२४, ९८२२०१८५२६

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अनुत्तरित प्रश्न… ☆ पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

पुष्पा चिंतामण जोशी

☆ जीवनरंग ☆

☆ अनुत्तरित प्रश्न… ☆ पुष्पा चिंतामण जोशी ☆

किनाऱ्याकडे झेपावणाऱ्या, फेसाळणाऱ्या लाटा पाहत मृणाल निवांत बसली होती. समोरच्या क्षितिजकडेवर मावळणाऱ्या सूर्यदेवांची लाल सोनेरी आभा तरंगत होती. आज कितीतरी वर्षांनी मृणालला तिच्या माहेरच्या व्याडेश्वर दैवताचं दर्शन घडलं होतं. धूप- उदबत्त्यांच्या सुवासात, समयांच्या शांत, मंद प्रकाशात त्या अनादी- अनंतापुढे नतमस्तक होताना तिचे डोळे आपोआप पाझरू लागले होते.

मृणालच्या थोडा बाजूला बसलेला फिरोज, छोट्या झरीनबरोबर वाळूचा किल्ला करण्यात रमून गेला होता. झरीनसारखाच निरागस, आनंदी दिसत होता तो.

‘बरं असतं बाबा या पारशी लोकांचं! मनमोकळी, साधी, स्वच्छ विचारसरणी आणि आयुष्याचा भरभरून आनंद घेण्याची वृत्ती’. मनातल्या या विचारांनी मृणालच्या ओठांवर हसू उमटलं.

‘ फिरोज पारशी. मग आपण कोण? फिरोजशी लग्न केल्याला आता तीस वर्ष होऊन गेली. ही आपली नात झरीन आता चार वर्षांची होईल. हातातल्या वाळूबरोबर गतकाळातल्या अनेक आठवणी मृणालच्या मुठीतून ओघळू लागल्या.

‘गोऱ्या-घाऱ्या, नाकेल्या, सुशिक्षित कुटुंबात आपला जन्म झाला. नऊवारी साडीतली, कपाळावर चंद्रकोर रेखणारी आई अजूनही त्याच रूपात आठवते. बाकी सारी भावंड आई-वडिलांना शोभेशी. आपल्यावर मात्र निसर्गाने अन्याय केला. कसं कोण जाणे, पण नाकावर म्हशीने पाय द्यावा तसं नकट्यापेक्षाही नकटं नाक जन्मतःच आपल्या वाट्याला आलं. श्वास घेण्याची दोन भोकं तेवढी चेहऱ्यावर दिसायची. लहानपणापासून लोकांच्या चेहऱ्यावरचं आश्चर्य आणि कीव पाहत आपण मोठे झालो. कित्येकदा आईच्या ओच्या- पदराचा तोंड लपवायला आणि मनसोक्त रडायला उपयोग केला. घरात कुणीच आपल्याला दुखावत नसे पण आरसा म्हणजे वैरी झाला होता.

नशिबाने शाळेत चित्रेबाई भेटल्या. त्यांनी आपल्याला खूप समजावलं. वाचनाची गोडी लावली. स्वतःतल्या चांगल्या गुणांकडे बघायला शिकवलं. हळूहळू मनावर दाटलेलं मळभ नाहीसं झालं. समाजात आत्मविश्वासानं वावरता येऊ लागलं. आजूबाजूला आपल्यापेक्षा अधिक व्यंग असलेली माणसं दिसायला लागली आणि दैवदत्त दान शांतपणे स्वीकारण्याचा शहाणपणा आला. स्वभाव आपोआप सहनशील झाला. बी. कॉम. झाल्यावर चांगल्या बँकेत नोकरी लागली, पण लग्नाच्या बाजारात घोडं अडलेलंंच राहिलं. लहान- मोठ्या सगळ्या भावंडांची लग्न झाली. वयानं तिशी ओलांडली. आई- बाबांची खंत आणि आपल्या लग्नाचे प्रयत्न संपत नव्हते.

एक दिवस आपण नेहमीप्रमाणे फिरोजच्या केबिनमध्ये कामासाठी गेलो होतो. हा अविवाहित, सज्जन, पारशी बॉस त्याच्या हसतखेळत काम करण्याच्या वृत्तीमुळे सगळ्यांचा आवडता होता. ‘टेन्शन नई लेवानू. काम थई जसे. ‘ असा त्याचा सर्वांना आश्वस्त करणारा मंत्र होता. आपल्याला बसायला सांगून फिरोजने आपण पुढे केलेलं रजिस्टर बाजूला सारलं आणि म्हणाला, ‘घणा दिवसथी तने एक वात पुछवी हती, पुछूं के? ‘ प्रश्नार्थक चेहऱ्याने त्याच्याकडे पाहिल्यावर तो पटकन म्हणाला, ‘मृणाल, विल यू मॅरी मी? ‘

फिरोजच्या या अनपेक्षित प्रश्नाने आपण एकदम दचकलो. फिरोज म्हणाला, ‘ टेक इट इझी. तू विचार कर. मला घाई नाही. तुझा शांत, समंजस स्वभाव, कामातलं कौशल्य कौतुक करण्यासारखं आहे. तू मला मनापासून आवडली आहेस, म्हणून मी तुला प्रपोज केलं आहे. काही कारणाने तू माझं प्रपोजल नाकारलंस, तरी माझी ही ऑफर मी कुणालाही कळू देणार नाही याबद्दल खात्री बाळग. थिंक इट ओव्हर अँड लेट मी नो, आय विल वेट फॉर युवर रिप्लाय. ‘

अंतर्बाह्य थरथरत आपण फिरोजच्या केबिनमधून बाहेर आलो. या दृष्टीने आपण कधी फिरोजचा विचारच केला नव्हता. मनात प्रचंड उलघाल सुरू झाली. फिरोज सर्वार्थाने चांगला होता, पण… पारशी. मनाचा हिय्या करून आपण ही गोष्ट रेखा आणि अनघाच्या- आपल्या खास मैत्रिणींच्या- कानावर घातली.

‘अरे वा! छान! अभिनंदन! चांगला आहे फिरोज. एक लक्षात घे, तुझ्या घरच्यांसाठी आणि बाकीच्यांसाठी ही शॉकिंग न्यूज असेल. तरी पण तू तुझ्या आयुष्याचा विचार करावा. फिरोजची ऑफर म्हणजे तुझ्यासाठी एक चांगली संधी आहे. तुझं आयुष्य मार्गी लागेल. लग्नानंतर माहेरची माणसं तर तुला दुरावतीलंच पण फिरोजच्या घरीही तुझा स्वीकार व्हायला वेळ लागेल. या साऱ्या परिणामांची मानसिक तयारी ठेव. ‘ रेखाने हे अवघड गणित सोडविण्यासाठी आपल्याला मदतीचा हात दिला.

॓आणि हे बघ लोकं काय म्हणतील याचा अजिबात विचार करू नकोस. एक वेगळी घटना म्हणून काही दिवस त्यावर चर्चा होईल मग दुसरी वेगळी बातमी आली की लोक ती बातमी चघळंत बसतील. तुला माहित आहे की मी जॉर्जशी लग्न करायचं ठरवल्यावर सगळ्या नातेवाईकात मित्र मैत्रिणी खळबळ उडाली होती. आमच्या वाडीत राहणारा, लहानपणापासून आमच्याबरोबर खेळणारा जॉर्ज सर्वांना माहीत होता. पण मराठी मुलीचे ख्रिश्चन मुलाशी लग्न ऐकून सगळ्यांच्या भुवया उंचावल्या होत्या. माझ्या घरच्यांच्या मला पूर्ण पाठिंबा होता म्हणून सारं निभावलं. कालांतराने बाकीच्यांचा विरोधी मावळत गेला.

‘फिरोजचं प्रपोजल चांगलं आहे. गो अहेड. फक्त तुला घेतलेल्या निर्णयावर ठाम राहावं लागेल आणि मन घट्ट करावं लागेल. ही पारशी माणसं बाकी उदार, प्रेमळ असली तरी धार्मिक बाबतीत अगदी कर्मठ असतात. त्यांच्या अग्यारीत तुला प्रवेश मिळणार नाही. तसं बघितलं तर आपणही देवळात किती वेळा जातो? आता तुझी तिशी होऊन गेली. एकटीने आयुष्य काढण्यापेक्षा तुलाही तुझं हक्काचं माणूस, घरदार मिळेल. धाकट्या भावाला विश्वासात घे. आम्हाला वाटतं की तू या प्रपोजलचा जरूर विचार करावा. ‘अनघानेही आपल्याला ग्रीन सिग्नल दिला.

मैत्रिणींच्या सल्ल्याने आपल्याला धीर आला. मार्ग सापडला. फिरोजबरोबरच्या रजिस्टर्ड लग्नाला या दोघी मैत्रिणी आणि धाकटा भाऊ हजर होते. आई-बाबांनी नाईलाजाने मूक संमती दिली होती. लग्नानंतर दोन्हीकडचा समाज काही काळ ढवळून निघाला. मग परवेजच्या जन्मानंतर सारं स्थिरस्थावर झालं. परवेजच्या ‘नवजोत’ समारंभाला तर माहेरची खूप माणसं आली होती. सगळ्यांनी त्या समारंभात परवेजच्या टिपिकल पारशी दिसण्याचं आणि आपलं खूप कौतुक केलं. सकाळी अग्यारीत झालेल्या धार्मिक कार्यक्रमाच्या वेळी आपण अग्यारीच्या पायऱ्यांवर बसून डोळ्यात दाटलेले ढग अडवून ठेवले होते. संध्याकाळी माहेरच्या प्रेमळ गराड्यात डोळ्यात दाटलेले ढग आनंदाश्रूंमध्ये विरघळून गेले.

झरीनच्या आवाजाने मृणाल तंद्रीतून बाहेर आली. समुद्रावर फिरायला गेलेले परवेज आणि शिरीन परत येताना पाहून झरीन आनंदाने त्यांच्याकडे पळत गेली आणि हात धरून आई-बाबांना किल्ला दाखवायला घेऊन आली. हॉटेल मॅनेजमेंटच्या पोस्ट ग्रॅज्युएशनसाठी परवेज फ्रान्सला गेला होता. तिथे त्याला शिरीन भेटली. लग्न झाल्यावर पाच वर्षांसाठी त्यांनी फ्रान्समध्येच जॉब करायचं ठरवलं आहे. थोडी सुट्टी घेऊन दोघं आली आहेत म्हणून तर हा कोकण ट्रिपचा कार्यक्रम आपण जमवला.

दुसऱ्या दिवशी रत्नागिरीला जाताना, दोन्ही बाजूंच्या मागे पळणाऱ्या झाडांसारखं मृणालचं मन मागे पळालं. परवेजच्या जन्मानंतर आपण नोकरी सोडली तरी अनघा, रेखा आणि आपण महिन्यातून एकदा तरी गप्पांची मैफिल जमवतो. अशाच एका मैफलीत बोलता बोलता अनघा म्हणाली, ‘मृणाल तुझ्या मैत्रीचा खरंच अभिमान वाटतो आम्हाला. किती शांतपणे, सहज निभावतेस तू आयुष्यातले सारे प्रसंग! ‘ 

‘अगदी खरं! तुझ्यामुळे आम्हीही थोडं शांतपणे, संयमाने आयुष्यातल्या प्रश्नांकडे बघायला शिकलो आहोत. ‘ रेखाने अनघाच्या म्हणण्याला दुजोरा दिला.

‘आजचं हॉटेलचं बिल मी द्यायचं आहे का? ‘ या आपल्या मिश्किल प्रश्नावर हास्यलहरी उठल्या. रेखा म्हणाली, ‘ एक छोटसं वादळ आलंय आमच्याकडे. त्याला तुझ्या पद्धतीने तोंड द्यायचं ठरवलंय. आमचा संदेश जर्मनीत राहतो हे तुम्हाला माहित आहे. त्याने त्याच्या ऑफिसमधल्या एका मुलीशी लग्न करायचं ठरवलं आहे. ही मुलगी आहे भारतीय, पण एका अनाथाश्रमात वाढलेली आहे. अर्थातच आमच्या साने कुटुंबात हे लग्न कुणालाच पसंत नाही.

‘अगं, काळ कितीही पुढे गेला तरी समाजमन बदलायला खूप वेळ लागतो. आपली तरुण पिढी प्रॉमिसिंग आहे. त्यांचं वागणं आणि विचार अगदी प्रॅक्टिकल असतात. भूतकाळात रेंगाळायला त्यांना आवडत नाही. आपण त्यांच्याशी जुळवून घ्यायला शिकलं पाहिजे. आणि असं वेगळ्या वाटेवरून जाताना त्या मुलांनाही टेन्शन असतं. अशावेळी आई-वडिलांनी मुलांच्या पाठीशी खंबीरपणे उभं राहिलं की समाजातल्या अर्ध्या लोकांची वायफळ बडबड थांबते आणि मुलांनाही आधार वाटतो. ‘आपण रेखाला दिलासा देण्याचा प्रयत्न केला.

”हो. असाच विचार करून आम्ही दोघांनीही घरच्यांची नाराजी पत्करून संदेशच्या लग्नासाठी जर्मनीला जायचं ठरवलं आहे. ‘

 ॓ ‘॓व्हेरी गुड. अभिनंदन. ‘अनघानेही दुजोरा दिला.॔

॓बरं वाटलं तुमच्याशी बोलून आणि आज हॉटेलचं बिल मी देणार बरं का! सुनबाईंचे स्वागत म्हणून! रेखा म्हणाली.॔ त्यावर आपण आणि अनघाने हसून दाद दिली.

मुक्कामाचं हॉटेल आलं आणि मृणाल तिच्या आठवणीतून बाहेर आली. हॉटेलमधलं महाराष्ट्रीयन पद्धतीचं जेवण सर्वांना आवडलं. मनपसंत जेवून गाढ झोपलेल्या मृणालला मोबाईलच्या आवाजाने जाग आली. डोळे उघडून तिनं पाहिलं तर, फिरोज रूमच्या बाल्कनीत असलेल्या छोट्या झोपाळ्यावर बसून ‘टाइम्स’ वाचत होता. फोनवर अनघा होती. अनघाला ॓हॅलो॔ ॔म्हणताना मृणालच्या मनात आलं,  ॓आपल्या कोकण ट्रिपचे फोटो कालच आपण व्हाट्सॲप वर टाकले आहेत.. काय बरं अर्जंट काम असावं अनघाचं?

॓अगं रिटायरमेंटनंतर काहीतरी चांगले कार्यक्रम बघावेत, नवीन ओळखी व्हाव्या म्हणून आत्ता दुपारी मी आमच्या जवळच्या एका नावाजलेल्या महिला मंडळात सभासद होण्यासाठी गेले होते तर त्यांनी माझी मेंबरशिप चक्क नाकारली. कारण माझं आडनाव फर्नांडिस आहे ना, म्हणून! माझ्याबरोबर आलेल्या मैत्रिणीनं त्यांना माझं लव्ह मॅरेज, माझी मराठी कार्यक्रम बघण्याची आवड, मराठी वाचन सारं सांगितलं. त्यांना माझी बाजू पटत होती पण त्यांचे नियम आड येत होते. तू नेहमी म्हणतेस ना की समाजामध्ये आधीच खूप ताणतणाव आहेत. त्यात आपण भर घालू नये. तडजोडीचा मार्ग स्वीकारावा. ते आठवून मी अगदी शांतपणे त्यांच्याशी बोलत होते. नियमाप्रमाणे त्यांचं बरोबर होतं. आणि कालबाह्य नियम बदलायला हवेत हेही त्यांना पटत होतं. मी त्यांना माझ्या माहेरच्या नावानं सभासदत्व दिलं तरी चालेल असे सांगितलं. बघूया त्यांच्या पुढील मीटिंगमध्ये काय ठरते ते. मी एकदम खूप अस्वस्थ झाले म्हणून तुला फोन केला. तू आल्यावर बोलूया परत. एन्जॉय युवर ट्रिप.॔

फोन बंद केल्यावर मृणालच्या मनात उलट सुलट विचारांनी गर्दी केली ज्ञानविज्ञानाने माणसाची भौतिक प्रगती झाली पण माणूस म्हणून त्याची वाटचाल उलट दिशेने होते आहे का? काळ कोणताही असो, स्त्रीपुढचे प्रश्न संपत नाहीत. त्यांचं स्वरूप बदलतं एवढंच. या अफाट विश्वात प्रत्येकाच्या आयुष्याचा मार्ग कोण ठरवत असेल? प्रत्येकाचं आयुष्य वेगळं, समस्या वेगळ्या. आपल्या शेजारच्या झोपाळ्यावर जोडीदार म्हणून कोण असेल? की मनासारख्या जोडीदाराची वाट पाहात राहावी लागेल? आपलं फिरोजबरोबरच लग्न ही घटना अतर्क्यच नाही का? सारे देव सारखेच असं आपण म्हटलं तरी आपल्यालाही व्याडेश्वर दर्शनाचीच आस का लागली होती? अनपेक्षित घटना आणि अनुत्तरित प्रश्न यांना गृहीत धरून एकदाच मिळालेल्या या मनुष्यजन्माचा आनंद घेणं श्रेयस्कर नाही का?॔ मृणालच्या मनात विचारांचे आवर्तन उठले होते.

मृणालला उठलेली पाहून फिरोज बाल्कनीतून रूममध्ये आला. गंभीर चेहऱ्याने हातात मोबाईल धरून बसलेल्या मृणालकडे पाहून म्हणाला,

“एनी प्रॉब्लेम? ” 

“नाही रे. नेहमीचंच. चहाच्या पेल्यातलं वादळ. चल,! चहा पिता पिताच सांगते तुला काय झालं ते. ” 

“ओके! नो प्रॉब्लेम….. ” फिरोज हसत हसत म्हणाला. त्याला हसून साथ देत मृणालही उठली.

© सौ. पुष्पा चिंतामन जोशी

कोथरूड, पुणे

मो ९९८७१५१८९०

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “बोल्ले तो मराठी…” ☆ श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला ☆

श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला

? मनमंजुषेतून ?

☆ बोल्ले तो मराठी☆ श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला ☆

जसविंदर… ऊर्फ जस्सी.

आमच्या चांडाळ चौकडीतला एक कोन.

खरं तर तो आमच्या गँगमधे कसा?

कोणालाही आश्चर्य वाटेल.

आम्ही तिघे.

म्हणजे मी, लल्या आणि सम्या… कौस्तुभ, ललित आणि सम्यक.

अनुक्रमे सदाशिव, नारायण आणि शनिवार. पुणे 30.

झोपण्यापुरते घरी असायचो.

बाकी स. प. महाविद्यालय किंवा त्यामागे तिलक.

आम्ही तिघेही एम. ए. मराठी करतोय.

खरं सांगायचं तर खाज म्हणून.

मराठी साहित्यविश्वाला,

आमच्या असण्यानं आणि नसण्यानं,

काहीही फरक पडणार नाहीये…

तरीही.

मी सो काॅल्ड पटकथा लेखक आहे.

दोन चार वेळकाढू, रोजच्या साबुछाप मालिकांच्या काही भागांचं लेखन केलंय.

नवीन कामाची धडपड चालूय.

असली रिकामी धडपड,

शिकतोय या नावाखाली, सहज खपून जाते.

लल्या एका नामवंत वृत्तपत्रात ऊमेदवारी करतोय.

बी. जे. झालंय.

त्याला शब्दप्रचूर असं काहीसं, जडजड स्तंभलेखन करायचंय.

एरवी नाईटशिफ्ट करतो.

राहिला सम्यक.

तो ऊत्तम निवेदक होणारेय म्हणे.

एका रेडिओ चॅनलवर पार्ट टाईम आर जे आहे.

थोडक्यात आमच्यापैकी कोणीही, वेल सेटल्ड नाही.

रिकामं घरी बसण्यापेक्षा काॅलेजदर्शन बरं.

आमचा अभ्यास.

हा एक अभ्यासाचा विषय.

अभ्यास फारसा करत नसलो तरी, वाचायचो भरपूर.

अत्रे सभागृहातलं एकही पुस्तकांचं प्रदर्शन चुकवायचो नाही.

आप्पा बळवंतचे वारकरी.

वाचनाची भूक वाढत चाललेली.

भरपूर वाचायचो.

अगदी तहानभूक विसरून.

माज करावा अशी एकच चीज, आमच्याकडे होती.

आमची शुद्ध, साजूक पुणेरी मराठी भाषा.

काय तिचा तो दिमाख.

तो लहेजा.

ते पावित्र्य.

ते भाषिक सौंदर्य.

ते अनुनासिक ऊच्चारण.

आम्ही तिघं बोलत बसलो की,

तमाम जन, तयांचे कान आम्हास बहाल करीत.

एखाद्या नऊवारीतल्या सुवासिनीने,

ईकडच्या स्वारीला, ” आम्ही नाही जा “

असे लटके बोल ऐकवावेत.

आणिक तो नरोत्तम, आनंदाने बेहोश व्हावा. ,

तस्सं.

तस्स मराठी असायचं आमचं.

जाम माज होता आम्हाला, आमच्या शुद्धतेचा.

किंबहुना खरं मराठी भाषासौंदर्य,

हे फक्त पुणे 30 या टापूतच टिकून राहिले आहे,

याविषयी आमच्या मनात किंतू नव्हता.

‘ आनी, पानी, करायलास, करतूस, काय बे… ‘

हे सगळं ऐकलं की आमचा पारा चढायचा.

बाहेरची लोकं, पुण्यात फार वाढलीयेत आजकाल.

त्यामुळे ईथल्या मराठीचा, घडी घडी विनयभंग होतोय, असं वाटायचं.

असल्या परभाषीक मंडळींपासून, आम्ही चार हात लांब असायचो.

थोडक्यात आम्ही शिष्टवर्गात गणले जात होतो.

हे असं होतं.

एकदा शुद्ध पुणेरी मराठीची भूतबाधा झाली की साला…

क्षमा असावी.

मेहुणा म्हणायला हवं खरं तर.

जाऊ दे.

एक दिवस असाच तिलकवर चहा ढोसत होतो.

आणि जस्सी भेटला.

त्यानं स्वतःहूनच ओळख करून दिली.

‘मी जसविंदरसिंग पंजाबी.

एम. ए. मराठी करतोय.

पुढं पीऐच. डी. पण करणार आहे.

संतसाहित्यावर.

नामदेवांवर. ‘

आम्ही ऊडालो.

एक तर शुद्ध, स्पष्ट भाषा.

अस्सल पुणेरी.

चितळ्यांच्या साजूक तुपातल्या, जिलबीहूनही साजूक.

एकदम वाटलं,

सुबोध भावे पंजाबी पगडी घालून, आला की काय?

‘ तु इतका शुद्ध मराठी कसा बोलू शकतोस? ‘

मी ओठांचा चंबू करून विचारलं.

‘ अरे त्यात काय?

आमची पुण्यातली चौथी पिढी आहे ही.

चिमण्या गणपतीपाशी आमचं पेंटस्चं दुकान आहे.

गेली चाळीस वर्ष.

मी काय, आमच्या घरी सगळे, ईतकंच अस्सल मराठी बोलतात. ‘

माझं तोंड चिमणीएवढं.

जस्सी कधी आमच्या गँगमधे सामील झाला, कळलंच नाही.

खरं तर आमच्यात खरा अभ्यास तोच करायचा.

एकदम सिनसियर.

प्रत्येक अॅक्टिव्हीटीत सक्रीय सहभाग.

मराठी साहित्य मंडळ, वक्तृत्व स्पर्धा सगळीकडे.

हे सगळं करून दुकानही सांभाळायचा.

परचेज, डिलीव्हरी, आॅर्डर, टेंडर…

यापैकी कशासाठी तरी टूरही करायचा.

नगर, औरंगाबाद, जालना, बुलढाणा ते पार नागपूरपर्यंत.

सातारा, कोल्हापूर, रत्नागिरी, सावंतवाडी ते पार गोव्यापर्यंत.

महिन्यातून दहा दिवस तरी जस्सी टूरवर असायचा.

दिवाळीची सुट्टी लागली.

जस्सी नागपूरला जाणार होता.

लल्या म्हणाला, आपणही जाऊ.

सम्याही तयार झाला.

तेवढंच महाराष्ट्र दर्शन.

जस्सीला विचारलं.

“मजा येईल.

एकट्याला जाम कंटाळा येतो.

ईन्डिका असते माझ्याकडे.

ड्रायव्हरही असतो. “

आठ दिवसाचा प्रोग्रॅम ठरला.

प्रत्येक ठिकाणी जस्सीचे सप्लायर.

अगदी घरगुती संबंध.

त्याच्याबरोबर आमचंही स्वागत व्हायचं.

हटकून घरी जेवायला बोलवलं जायचं.

मनापासून आग्रह व्हायचा.

नगरपासून सुरवात.

औरंगाबाद, जालना, मेहकर, बुलढाणा, अमरावती, अकोला, नागपूर…

प्रत्येक ठिकाणी वेगळा मेनू.

अस्सल प्रादेशिक.

आमची माती, आमची माणसं.

आम्ही सगळे खुष.

आम्हाला जस्सीचं खूप कौतुक वाटलं.

इतक्या कमी वर्षात, खूप माणसं जोडली होती त्यानं.

नागपूरला पोचलो.

संत्रा बर्फी हादडली.

नागपुरी पोहा चाखला.

परत निघालो.

सहज विषय निघाला.

“जस्सी, तुला कसं जमतं हे सगळं? “

सम्यानं विचारलं.

जस्सीनं मोठ्ठा श्वास घेतला.

” खरं सांगू, मायमराठीमुळे.

पंजाबीईतकंच माझं मराठीवर, प्रेम आहे दोस्तांनो.

पण माझ्या मराठीला भिंती नाहीयेत तुमच्यासारख्या.

अरे दहा मैलावर भाषा बदलते.

नगरला मी नगरी बोलतो.

नागपुरला नागपूरी.

अकोल्याला जाऊन, काय बाप्पा म्हणतो.

सगळं शिकून घेतलंय मी.

भिंती आपोआप गळून पडतात.

माणसं जवळ येतात.

भाषा माणसं जवळ करणारी असावी.

लांब नेणारी नको.

शुद्धलेखनात नियम पाळायलाच हवेत.

पण बोलीभाषेचा अनादर नको.

तीही तितकीच जपायला हवी.

शुद्धतेच्या कसोट्या त्याला लावायला नकोत.

भले भाषेचा लहेजा वेगळा असेल, पोत वेगळा असेल..

पण शेवटी मराठीच आहे ती..

मुळामुठेच्या सीमा ओलांडा अन् बघा, काय बहार येते ती.

समोरच्यानं दोन शब्द ऊच्चारले की, गाव सांगू शकतो मी.

माझ्या धंद्याचं हेच गुपित आहे.

माणसं जोडायला तिथली बोली यायला हवी. “

आम्ही सुन्न.

ऊघडा डोळे.

बघा नीट.

ऊघडले.

सम्यानं त्याच्या रेडिओ चॅनलवर एक टाॅक शो ठेवला.

वेगवेगळ्या गावची, आता पुण्यात सेटल झालेली मंडळी बोलावली.

मराठीची वेगवेगळी रूपं ऐकवली.

बहारदार कार्यक्रम झाला.

पुणेरी मराठी माणसाळतेय, असं वाटायला लागलं

परवा असाच जस्सीच्या दुकानात बसलो होतो.

” काला रंग का दाखवून राहिला बे, मले पारवा हवे हाय ना ” समोरचा माणूस दुकानातल्या माणसाला सांगत होता.

माझी ट्यूब पेटली.

‘ तुम्ही जळगावचे का हो?

ऐकायला छान वाटते तुमची भाषा. ‘

तो ताजाताजा पुण्यात आलेला.

एकदम खुष झाला.

पिशवीतून केळ्याच्या वेफर्सचा पॅक काढला.

मला गिफ्ट केला.

तिखट वेफर्ससुद्धा..

गुलाबजामूनपेक्षा गोड लागले.

मायमराठी तुला सलाम!

 

©  श्री कौस्तुभ केळकर नगरवाला

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ दुनियेतील सारे रंग तिच्याचमुळे…” – (अनुवादित) हिन्दी कवी : अज्ञात ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

प्रा.भारती जोगी

? मनमंजुषेतून ?

☆ “दुनियेतील सारे रंग तिच्याचमुळे…” – (अनुवादित) हिन्दी कवी : अज्ञात ☆ प्रा.भारती जोगी ☆

स्त्री नेच तर केली आहे ना तिच्या हातांनी, विविध रंगांची उधळण,

पहिल्यांदा फाल्गुनातच शिकली गुलाल उडवणं.

तिनं पहिल्यांदाच जेव्हा अंगण सजवलं रांगोळीने…

तेव्हाच बहुधा भकास, उदास धरती ला ; रंगांत रंगून जाणं,

आणि जगणं कळलं, आपलेसे केले ते रंग तिने.

 

 

तबकात गुलाल घेऊन निघते ना ती…

तेव्हा चेहरेच नाही रंगवत त्याने;

तर… नात्यांचा रंग पार उडालेल्या भिंती

रंगवून टाकते आपलेपणा च्या रंगात!!

 

 

प्रेमाच्या उबदार स्पर्शाची, लालिमा उमटते तिच्या गाली अन् मोहक हास्यात.

वसंताचं सोनसळी तेज आहे डोळ्यांत.

हरित स्वप्नांची शीतल छाया आहे तिच्या पदरात.

आणि मनाच्या गहिरेपणात आहे आकाशाची निळाई.

 

 

ती जेव्हा हळूच येऊन रंग लावते ना कुणाच्या गालाला… तर जणू म्हणते..

तुच तर आहेस ना रे… माझं ; आपलं माणूस! “

 

 

तिनंच तर उदास, एकाकी घरांचे सण-सोहळे बनविले, साजिरं केलं घरांना.

आपलं दु:ख लपवून, हसणं शिकवलं इतरांना.

 

 

घराच्या भिंती भले ही बनविल्या असतील पुरूषांनी…

पण… त्या भिंतींना घर बनवलं ते स्त्रीनेच!! घरातल्या चुलीच्या धगीत,

आपली स्वप्न वितळवून…

त्याच राखाडी रंगात परिवार रंगवला.

 

 

खरं सांगायचं ना तर…

स्त्री फक्त होळी नाही खेळत;तर…

आपलं सगळं जगणंच दुस-याच्या नावात रंगवून टाकते.

आणि येवढं करूनही काय येतं तिच्या वाट्याला??? … तर…

बस्स्… फिकुटलेला पांढरा रंग!!

कारण सत्य तर हेच आहे ना… की…

स्त्री ने सा-या जगात रंगांची उधळण केली, पखरण केली…

पण जगाने मात्र तिच्या जीवनातले सगळे रंग बळकावून तिला बेरंग केले…

(एका भावलेल्या आणि मनाला भिडलेल्या हिंदी कवितेचा स्वैर भावानुवाद)

हिन्दी कवी : अज्ञात 

अनुवादिका / कवयित्री : प्रा.भारती जोगी.

पुणे. 

 फोन नंबर..९४२३९४१०२४.

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ “एक अस्वस्थ करणारे वास्तव…” –  लेखक : डॉ. राजेंद्र गर्गे  ☆ सुश्री प्रभा हर्षे ☆

सुश्री प्रभा हर्षे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ “एक अस्वस्थ करणारे वास्तव” –  लेखक : डॉ. राजेंद्र गर्गे  ☆ सुश्री प्रभा हर्षे

 एक अस्वस्थ करणारे वास्तव

 – – – डॉक्टरांचे अकाली मृत्यू आणि आधुनिक वैद्यकीय क्षेत्रापुढील यक्षप्रश्न…  

“डॉक्टर, तुम्ही तर आमचे प्राण वाचवले! ” असे म्हणत रुग्ण जेव्हा डॉक्टरांचे आभार मानतो, तेव्हा त्या डॉक्टरांच्या चेहऱ्यावर एक समाधानाचे हास्य असते. पण, दुर्दैवाने आज चित्र बदलत आहे. दुसऱ्याचे आयुष्य वाढवणारा, समाजाला आरोग्याचा मंत्र देणारा ‘आरोग्य रक्षक’च आज अकाली मृत्यूच्या जाळ्यात ओढला जात आहे. सध्या वैद्यकीय वर्तुळात एक अतिशय वेदनादायक घटना वारंवार घडताना दिसते—एखादा तरुण, तडफदार डॉक्टर, जो कालपर्यंत परिषदांमध्ये उत्साहाने सहभागी होत होता, हसत-खेळत होता, तो अचानक एका रात्रीत हे जग सोडून जातो. ‘सडन कार्डियाक अरेस्ट’ (Sudden Cardiac arrest) किंवा हृदयविकाराचा तीव्र झटका हे आज वैद्यकीय क्षेत्रातील मृत्यूंचे सर्वात मोठे कारण बनले आहे. ज्या वेगाने आपण आपले सहकारी आणि मित्र गमावत आहोत, ते पाहता आता यावर केवळ चर्चा करून चालणार नाही, तर गंभीर आत्मचिंतन करण्याची वेळ आली आहे. धक्कादायक आकडेवारी व वास्तव: काय सांगते?

 समाजातील सामान्य व्यक्तीपेक्षा डॉक्टरांचे आयुष्य अधिक असावे, असा आपला एक समज असतो. कारण त्यांना रोगांचे ज्ञान असते. पण, संशोधनातून समोर आलेले सत्य अत्यंत धक्कादायक आहे.

 १) केरळमधील संशोधन: केरळमध्ये डॉक्टरांच्या मृत्यूदराचा तब्बल १० वर्षे अभ्यास करण्यात आला. त्यातून असे सिद्ध झाले की, सामान्य जनतेच्या तुलनेत डॉक्टरांचे आयुष्य सरासरी १३ वर्षांनी कमी आहे.

२) आयएमए (IMA) पुणे अहवाल: इंडियन मेडिकल असोसिएशनच्या पुणे शाखेने सुमारे १५, ००० डॉक्टरांच्या आरोग्याचा अभ्यास केला. त्यांचा निष्कर्षही असाच भयावह होता—डॉक्टरांचे आयुष्य सर्वसामान्यांपेक्षा १० ते १५ वर्षांनी कमी होत चालले आहे. प्रश्न हा उरतो की, असे का घडतेय? रोगाचे निदान करणाऱ्या डॉक्टरांना स्वतःच्या मृत्यूची चाहूल का लागत नाही?

डॉक्टरांचे आयुष्य कमी होण्यामागे केवळ एकच कारण नाही, तर तो अनेक गोष्टींचा एकत्रित परिणाम (Cumulative Effect) आहे.

डॉक्टरांच्या अकाली मृत्यूची ५ प्रमुख कारणे

१. निसर्गाच्या विरोधात काम – (Biological Clock Disruption) निसर्गाने मानवी शरीराचे एक घड्याळ (Circadian Rhythm) निश्चित केले आहे. दिवसा काम आणि रात्री विश्रांती हे त्याचे सूत्र आहे. मात्र, वैद्यकीय पेशात या सूत्राचा बळी जातो.

 * डॉक्टरांना आठवड्याला ५०, ६० किंवा अनेकदा ७० तासांपेक्षा जास्त काम करावे लागते.

 * प्रशिक्षण काळात आणि त्यानंतरही सलग २४-२४ तास ड्युटी करावी लागते.

 * रात्रपाळी (Night Shifts) आणि अपुरी झोप यामुळे शरीरातील चयापचय क्रिया (Metabolism) बिघडते. यामुळे शरीरात ‘इन्सुलिन रेझिस्टन्स’ तयार होतो, जे पुढे जाऊन मधुमेह आणि हृदयविकाराचे मूळ कारण बनते.

२. तणावाचा स्फोट (High Stress Levels)आज डॉक्टर केवळ रुग्ण तपासत नाहीत, तर ते एका प्रचंड मानसिक दबावाखाली असतात.

 * निर्णय घेण्याचा ताण: आपत्कालीन स्थितीत एका सेकंदात घेतलेला निर्णय रुग्णाचा जीव वाचवू शकतो किंवा गमावू शकतो. हा तणाव सतत मनावर असतो.

 * कायदेशीर आणि सामाजिक दबाव: “रुग्णाला काही झाले तर डॉक्टर जबाबदार, ” ही समाजाची मानसिकता आणि त्यातून उद्भवणारे कायदेशीर खटले (Consumer Protection Act) यामुळे डॉक्टर सतत दहशतीखाली असतात.

 * या तणावामुळे शरीरात अडरिणालीन(adrenalin) व कार्टीसोल (cortisol)ही हार्मोन्स शरीरात सतत वाढलेली राहतात. त्याचा हृदयावर प्रचंड ताण येतो व तो घातक असतो. आपत्कालीन परिस्थितीत असे होते पण जेव्हा तसे वारंवार होते, तेव्हा रक्तदाब वाढतो, हृदयाचे ठोके खूप वाढून अनियमित आणि अनियंत्रित होतात(ventricular fibrilation) व अचानक हृदयाचे स्पंदन थांबते, आणि कार्डियाक अरेस्ट (cardiac arrest)होतो, त्यामुळे मेंदूचा रक्त प्रवाह थांबतो व मृत्यू ओढवतो.

 वास्तव असे आहे की, डॉक्टर स्वतः सर्वात वाईट रुग्ण असतात.

 * छातीत दुखले तरी “अॅरसिडिटी असेल” म्हणून दुर्लक्ष करणे.

 * स्वतःची नियमित तपासणी (Check-up) टाळणे.

 * “मला काही होणार नाही, ” हा फाजील आत्मविश्वास बाळगणे.

 ३) बिघडलेली जीवनशैली आणि आहार – कामाच्या व्यापात डॉक्टरांच्या जेवणाच्या वेळा निश्चित नसतात.

 * दुपारचे जेवण संध्याकाळी आणि रात्रीचे जेवण मध्यरात्री घेणे.

 * ऑपरेशन थिएटरमधून बाहेर आल्यावर पटकन भूक भागवण्यासाठी वडापाव, समोसा किंवा जंक फूड खाणे.

 * व्यायामाचा पूर्ण अभाव.

 या दुर्लक्षामुळे जेव्हा आजार समजतो, तेव्हा अनेकदा खूप उशीर झालेला असतो. या सवयींमुळे ‘मेटाबॉलिक सिंड्रोम’ (Metabolic Syndrome) जडतो—ज्यात उच्च रक्तदाब, वाढलेले कोलेस्ट्रॉल, मधुमेह आणि लठ्ठपणा हे चारही शत्रू एकत्र येतात.

४) व्यसनाधीनता हे दुर्दैवी असले तरी सत्य आहे की, काही प्रमाणात वैद्यकीय क्षेत्रातही धूम्रपान आणि मद्यपानाचे प्रमाण वाढले आहे. तणाव कमी करण्यासाठी (Stress Buster) म्हणून सुरू झालेले व्यसन शेवटी हृदयाचा घात करते.

५) आता वेळ आली आहे बदलाची! जर आपल्याला समाजाचे आरोग्य टिकवायचे असेल, तर आधी डॉक्टरांना जगावे लागेल. यासाठी काही कठोर निर्णय घेणे आवश्यक आहे:

 * नियमित ‘फिटनेस ऑडिट’: वयाच्या पस्तीशीनंतर किंवा चाळीशीनंतर प्रत्येक डॉक्टरने स्वतःची सखोल आरोग्य तपासणी (Cardiac Profile, TMT, Lipid Profile) वर्षातून एकदा करणे बंधनकारक करावे.

 * ‘नो’ म्हणायला शिका: कामाचा अतिरेक होत असेल तर त्याला नकार देण्याची हिंमत ठेवा. कामाचे तास मर्यादित करा आणि विश्रांतीला प्राधान्य द्या.

 * कुटुंबाला वेळ द्या: रुग्णालयाच्या बाहेरही एक जग आहे. आपले कुटुंब, मित्र आणि छंद यांच्यासाठी वेळ काढा. हा ‘क्वॉलिटी टाइम’ तुमचा मानसिक तणाव निम्म्याने कमी करतो.

 * व्यायाम हाच धर्म: दिवसातील किमान ४५ मिनिटे स्वतःच्या शरीरासाठी द्या. चालणे, योगासने किंवा ध्यानधारणा (Meditation) याला पर्याय नाही.

निष्कर्ष आयुष्य किती अनिश्चित आहे, हे आपण दररोज आपल्या रुग्णांच्या रूपाने पाहतो. तरीही आपण स्वतःला अमर समजण्याची चूक करतो.

आपण १०० वर्षांचे नियोजन करतो, घरांचे हप्ते भरतो, मुलांच्या भविष्याची चिंता करतो; पण पुढच्या क्षणी श्वास सुरू राहील की नाही, याची कुणालाच खबर नसते.

म्हणूनच, सर्व डॉक्टर मित्रांना आणि आरोग्य कर्मचाऱ्यांना माझे कळकळीचे आवाहन आहे— दुसऱ्यांची हृदये सांभाळताना, स्वतःच्या हृदयाचे ठोके ऐकायला विसरू नका. डॉक्टर निरोगी राहिला, तरच समाज निरोगी राहील!

एका प्रसिद्ध शायरने म्हटले आहे:

 “आगाह अपनी मौत से कोई बशर नहीं,

 सामान सौ बरस का है, पल की खबर नहीं… “

 

लेखक : डॉ. राजेंद्र गर्गे 

प्रस्तुती : सुश्री प्रभा हर्षे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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