हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # ९३६ ⇒ कंधा और बोझ ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “कंधा और बोझ ।)

?अभी अभी # ९३६ ⇒ आलेख – कंधा और बोझ ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

हाथ जहां से शुरू होते हैं, उसे कंधा कहते हैं जितने हाथ उतने ही कंधे।

अक्सर हम जिन हाथों को मजबूत करने की बात करते हैं, वे खुद मजबूत कंधों पर आश्रित होते हैं।

अगर कंधा कमजोर हुआ, तो हाथ किसी काम का नहीं। फिल्म नया दौर में दिलीप साहब हाथ बढ़ाने की बात करते हैं। साथी हाथ बढ़ाना साथी रे। एक अकेला थक जाएगा, मिलकर बोझ उठाना। यहां पूरा बोझ तो कंधों पर है, और श्रेय हाथ ले रहे हैं।

एक फिल्म आई थी जागृति। उसमें भी कुछ ऐसा ही गीत था। हम लाए हैं तूफान से कश्ती निकाल के। इस देश को रखना मेरे बच्चों संभाल के। यानी पूरा बोझ बेचारे मासूम बच्चों पर। क्या आपको उनके कंधों पर लदे भारी बस्ते का बोझ नजर नहीं आता। और पूरे देश का बोझ उन पर लादने चले हो। बच्चे की जान लोगे क्या।।

हम जब छोटे थे तो कुछ औरतों को सर पर टोकनी उठाए देखते थे। किसी में सब्जी तो किसी में बर्तन।

ये मोहल्ले में फेरी लगाती थी। बर्तन वाली औरतें घर के पुराने कपड़ों के एवज में नए घर गृहस्थी के बर्तन देती थी। एक तरह का एक्सचेंज ऑफर था यह।

कपड़े दे दो, बर्तन ले लो, पैसे दे दो, जूते ले लो, की तर्ज पर। याद कीजिए फिल्म, हम आपके हैं कौन।

ऐसी ही कोई कपड़े बर्तन वाली औरत राह चलते, हमें रोक लेती थी। बोझा जब जमीन पर होता है, तो उसे सर पर लादने के लिए किसी की मदद लेनी पड़ती है। जब वह हमसे मिन्नत करती, बेटा जरा हाथ लगा दो, बहुत भारी है, तो हम पहले आसपास देखते थे, लेकिन फिर अनिच्छा से ही सही, हाथ लगा ही देते थे। वाकई, बोझा बहुत भारी होता था। कुछ समय के लिए हम सोच में भी पड़ जाते थे, इतना वजन, यह औरत कैसे उठा लेती है, लेकिन फिर सजग हो, अपने रास्ते चल पड़ते थे। उसकी दुआ जरूर हमें सुनाई देती थी, जिसे हम भले ही अनदेखा कर देते थे, लेकिन मन में किसी को मदद की संतुष्टि का भाव फिर भी आ ही जाता था।।

किसके कंधों पर कितनी जिम्मेदारियों का और कितनी मजबूरियों का बोझ है, यह केवल वह ही जानता है। शरीर के बोझ से मन का बोझ अधिक भारी होता है, लेकिन आप मानें या ना मानें, वह बोझ भी यही कंधे ढोते रहते हैं।

किसी के झुके हुए कंधों से ही पता चल जाता है, यह बेचारा, काम के बोझ का मारा, कुछ लेते क्यों नहीं, हमदर्द का सिंकारा।

जब बच्चे थे, तो पिताजी के कंधे पर बैठकर घूमने जाते थे। बड़े खुश होते थे, हम कितने बड़े हो गए हैं। जब असल में बड़े हुए तो असलियत पता चली, हमारे कंधों पर कितना बोझ है।।

चलो रे, डोली उठाओ कहार, पीया मिलन की रुत आई। लेकिन आजकल कहां कहार भी डोली उठाते हैं। चार पहियों की चमचमाती कार से, ब्यूटी पार्लर से सज धजकर आई दुल्हन, विवाह मंडप में प्रवेश करती है। कंधों से अधिक, कानों पर डायमंड इयररिंग्स का बोझ।

जमाना कितना भी आगे बढ़ जाए, जब इंसान यह संसार छोड़ता है तो चार कंधों की अर्थी पर ही जाना पड़ता है। यानी जन्म से अंतिम समय तक कंधे का साथ नहीं छूटता। अर्थी का बोझ भी मजबूत कंधे ही उठा पाते हैं। हमने तो जिधर भी कंधा लगाया है, अर्थी उधर ही झुकी है। कहीं से लपककर मजबूत कंधे आते हैं, और अर्थी से अधिक हमें राहत महसूस होती है। ईश्वर ना करे, हमें कभी किसी को कंधा देना पड़े, बोझ के मारे, हमारा कंधा उतर भी सकता है।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ काव्य धारा #२६० ☆ कविता – इस दुनियाँ में… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆

स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – इस दुनियाँ में…। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६०

☆ इस दुनियाँ में…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

इस दुनियाँ में सबसे सुन्दर अनुपम भारत देश है

अपने में अपना सा प्यारा इसका हर परिवेश है ।।

इस दुनियाँ में…

पूरब, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण बिखरा अति सौंदर्य है

वन, मरूथल, पर्वत, नदियों मंदिरों में भी आश्चर्य है

प्राकृत सुषमा, हरे भरे खेतों में अजब मिठास है

हर प्रदेश का खान-पान कुछ भिन्न है, मोहक वेश है || 1 ||

इस दुनियाँ में…

उत्तर, ओड़ीसा, कर्नाटक अलग नृत्य संगीत है

खान पान जीवन पद्धति में सबकी अपनी रीति है

फिर भी सब हैं सरल भारतीय, संस्कृति अनुपम एक सी

गंगोत्री से रामेश्वर तक धार्मिक भाव विशेष है || 2 ||

इस दुनियाँ में…

राष्ट्र प्रेम से ओतप्रोत हर मन की पावन चाह है

प्रगति हिमालय सी संवृद्धि हो जैसे सिन्धु अथाह है

जीवन सबका निर्मल मन पावन हो कर्मठ भावना

भारत का युग युग से “बंधुता’ प्रेम रहा संदेश है ||3||

इस दुनियाँ में…

सकल देश में दूर छोर तक सरल सादगी व्याप्त है।

अभ्यागत का स्वागत मन से करना सबको आप्त है।

धार्मिक मर्यादाओं का सभी निर्वाह सदा हर हाल में

हरेक निवासी के मन में बैठा पूर्वज आदेश है ||4||

 *

इस दुनियाँ में सबसे सुंदर अनुपम भारत देश है।

जिसके आध्यात्मिक वैभव की चर्चा देश-विदेश है ।।

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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सूचनाएँ/Information ☆ प्रतिभाशाली कथाकार सोनी पांडेय को पांचवां सविता कथा सम्मान – अभिनंदन ☆

☆ सूचनाएँ/Information ☆

(साहित्यिक एवं सांस्कृतिक समाचार)

☆ प्रतिभाशाली कथाकार सोनी पांडेय को पांचवां सविता कथा सम्मान – अभिनंदन ☆ 

सविता कथा सम्मान का यह पांचवां वर्ष है। इसे प्रतिवर्ष चयनित महिला कथाकार को दिया जाता है। इसे श्रीमती सविता दानी की स्मृति में प्रारंभ किया गया है। यह देश का विशिष्ट सम्मान है। इस वर्ष इसे प्रतिभाशाली कथाकार सोनी पांडेय को दिया जा रहा है। सोनी पांडेय आजमगढ उत्तर प्रदेश में निवास करती हैं।

अन्विति पत्रिका, पहल और सविता कथा सम्मान आयोजन समिति के द्वारा आयोजित यह सम्मान समारोह आज 7 मार्च 2026 को संध्या 7 बजे डा हीरालाल कला वीथिका, रानी दुर्गावती संग्रहालय, भंवरताल जबलपुर में संपन्न होगा। प्रसिद्ध शिल्पकार व लेखिका शम्पा शाह, भोपाल यह पुरस्कार प्रदान करेंगी। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ कवियत्री सविता भार्गव करेंगी। कार्यक्रम का संचालन कथाकार श्रद्धा श्रीवास्तव करेंगी।

जबलपुर शहर के इस प्रतिष्ठा आयोजन में आप सादर आमंत्रित हैं। कृपया अवश्य पधारें। कार्यक्रम में शामिल होने का आग्रह राजेन्द्र दानी, शरद उपाध्याय, योगेन्द्र श्रीवास्तव, विवेक चतुर्वेदी, कुंदन सिद्धार्थ, हिमांशु राय व सभी साहित्यिक सांस्कृतिक संस्थाओं ने किया है।

💐 ई- अभिव्यक्ति परिवार की ओर से कथाकार सोनी पांडेय जी को इस विशिष्ट उप्लब्धि के लिए हार्दिक बधाई 💐

≈ श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ हेचि दान देगा देवा… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ हेचि दान देगा देवा… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

पाहीले मी

एक स्वप्न नवे

दूर गवताचे हिरवेगार,

गालीचे होते पसरले…

 

नदी नाले

ओसंडून वाहत होते,

नाद खळाळत्या पाण्याचा

कानात घुमतो आहे..

 

प्रत्येकाच्या

होते सुहास्य वदनी,

मतमतांतरे होती

मन भिन्नता मात्र नव्हती..

 

नव्हते कुणाच्याही

मनात जातीपातीचे किल्मिषे

धार्मिक सण साजरी होई

उत्साने, आनंदाने..

 

स्वप्नात पाहीले

ते सत्यात उतरु दे

राहू दे गुण्यागोविंदाने

देवा हेचि दान दे…

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ अंकुरित आभाळ… ☆ सुरेखा चिखलकर ☆

सुरेखा चिखलकर

संक्षिप्त परिचय 

सुरेखा महिपती चिखलकर

शिक्षण – B.A. मराठी
दिव्यांग – 80% दोन्ही पायांनी

सध्या सामाजिक कार्य, कवयित्री, ब्यूटी पार्लर आणि लेडीज शॉप चालवते. सामाजिक कार्यासाठी महाराष्ट्र शासनाचा पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होळकर पुरस्कार, आणि साहित्यिक 30 आसपास पुरस्कार.वाचन आणि लेखन अविरत चालू आहे…

 

? कवितेचा उत्सव ?

☆ अंकुरित आभाळ… ☆ सुरेखा चिखलकर ☆

अजाणत्या वयात कळत नव्हते काही

सर्वासारखे मला उभे राहता येत नाही…

*

पण याच जमिनीत एक स्वप्नांचा अंकुर रुजला ,

पंख नसतानाही आभाळाकडे झेप घेण्याचा ध्यास लागला..

*

दोन्ही हात जमिनीवर उड्या मारण्याची हौस भारी ,

पण ह्याच जिद्दीतून फुलली माझ्या अस्तित्वाची गाथा खरी..

*

कळले जेव्हा बालमनाला दोष दिला नाही देवाला

आरूढ झाले दैवावरती केली सुरवात शिकण्याला…

*

केली चिरफाड पायांची जिद्द होती उभे राहण्याची

 नशिबाने दिली आस मिळाली साथ कुबड्यांची …

*

शिक्षणाची पायरी दिवसेंदिवस चढत नव्या उमेदीने घडत होते,

लेखणीच्या बळावर मी आभाळालाही स्पर्श करत होते…

*

तुटले होते पंख जरी घेतली झेप उडण्यासाठी

अंकुरलेल्या स्वप्नांना कवेत घेण्यासाठी…

*

बनेल उदाहरण प्रत्येकाला सोडून लाचारी भिड आयुष्याला

थकतील पाय जरी पथ चाल तू घडण्याला…

*

नाही  आशा मला उद्याची धडपडते मी मनोरुग्णांसाठी,

मांडते रोज नवा डाव स्वतःशीच पुन्हा जिंकण्यासाठी..

*

धन्य ती माझी मायमाउली  उभी मी आज तिच्यासाठी,

जोपासले तिने कष्टाने ताठमानेने लढण्यासाठी…

*

ऋण तुझे फेडण्यास आई नको दुसरी ओटी,

पुन्हा पुन्हा जन्म मिळो माय तुझ्याच ग पोटी

🙏 

© सुरेखा महिपती चिखलकर

गोटखिंडी, तालुका वाळवा

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ नमस्कार… ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

🔅 विविधा 🔅

☆ नमस्कार☆ सौ शालिनी जोशी

नमस्कार

भारतीय संस्कृतीचे एक विलोभनीय वैशिष्ट्य म्हणजे नमस्कार. नमस्कारायची सुरुवात सकाळी उठल्यापासूनच होते.

‘समुद्र वसने देवी पर्वतस्तन मंडले l विष्णू पत्नी नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे’

समुद्र, पर्वत यांना धारण करणाऱ्या विष्णुपती लक्ष्मीला पदस्पर्श करण्याआधी तिला नमस्कार करून तिची क्षमा मागणारी आपली संस्कृती आहे. भूमी विषयी कृतज्ञता व्यक्त करण्याचा, आदर व्यक्त करण्याचा भाव यात आहे. नंतर स्नान झाल्यावर देवाला, आई-वडिलांना, घरातील जेष्टाना, गुरुना नमस्कार करणे व त्यांचे आशीर्वाद घेणे दोन्ही तितकेच महत्त्वाचे. नमस्कारात प्रेम, आदर, नम्रता, सद्भाव आहे.त्यानंतर मिळणारा आशीर्वाद दिवसभराच्या कार्याला यश देणारा,सत्कार्याची प्रेरणा देणारा असतो.

नमस्काराला वंदन,नमन, प्रणाम, प्रणिपात, अभिवादन, असे प्रतिशब्द आहेत. विनय हे नमस्काराचे मूळ आहे. दोन्ही तळवे एकमेकांना चिकटून सरळ छातीवर, आणि मस्तक श्रद्धेने वाकलं की नमस्कार होतो. तेथे अहंकार नाही. नम्रता, आदर, प्रेमभाव असावा. वंदन म्हणजे नमस्कारच पण श्रद्धा जास्त. ‘वंदे मातरम्’ म्हणून मातृभूमीला तसेच ध्वजवंदन म्हणजे ध्वजाला वंदन करतात. नवविधाभक्ती मध्ये वंदन भक्ती आहे.

देव, गुरु,आचार्य, सत्पुरुष यांना साष्टांग नमस्कार करतात. साष्टांग म्हणजे स अष्टांग, आठ अंगे जमिनीला टेकून केलेला नमस्कार. दोन पाय, दोन गुडघे, दोन हात, नाक व कपाळ. यात पूर्ण शरणागती व्यक्त होते. हाच प्रणिपात ऋजुता, नम्रता सांगणारा.

सूर्यनमस्कार ही भारतीय संस्कृतीतील श्रेष्ठ नमस्कार पद्धती आहे.हे बारा भागात घातले जातात. याचे शारीरिक व मानसिक फायदे आहेत. व्यायाम व आसने दोन्ही साधतात. कोणत्याही साधनाशिवाय करायची ही भारतीय पद्धत आता जगन्मान्य झाली आहे.

आपली संस्कृती सर्वाभूती परमेश्वर पाहणारी आहे.त्यामुळे ‘दीपज्योती नमोस्तुते’ म्हणून साऱ्या तेज तत्वाला नमस्कार. नदीतही मनुष्यत्व बघून तिची ओटी भरून नमस्कार केला जातो. समुद्राला नारळ आपण करून जलतत्त्वाची पूजा असते. वृक्ष पूजा तर सर्वांना माहीतच आहे. एकंदरीत नमस्कार भारतीय संस्कृतीचे सौंदर्य आहे. चूक झाल्यास नमस्कार करून माफी मागितली म्हणजे तोच नमस्कार संरक्षक कवच होतो. भारतात धर्म,भाषा, वेशभूषा यात विविधता असली तरी नमस्कार सगळ्यात आहे. प्रपंच्यात, परमार्थात, स्वागत आणि निरोपातही नमस्काराला स्थान आहे. समोरच्या व्यक्तीला रामराम म्हणून नमस्कार करणे म्हणजे स्वतःच्या व दुसऱ्याच्या हृदयस्थ रामाला नमस्कार होतो. सर्वात तोच आत्मा हा भाव समानता प्रस्थापित करतो. आपोआप राग, द्वेष दूर होतात. दोषरहीत दृष्टीने सर्वत्र भगवंत पाहणे हीच नमन भक्ती.

ग्रंथारंभी किंवा शुभकार्याच्या आरंभी संबंधित सर्वांना नमस्कार करण्याची प्रथा आहे. यातून कार्यपूर्तीसाठी त्यांचे आशीर्वाद मिळतात. ग्रंथाची सुरुवात ‘श्री गणेशाय नमः’ने करतात.‘नमस्ते नमस्ते’ असे दोनदा म्हणल्याने त्याची तीव्रता वाढते.’ सर्वदेव नमस्कार: केशवं प्रतिगच्छति l’हा विश्वात्मक भाव नमस्कारातून व्यक्त होतो. गुरु हा नेहमी वयाने मोठा असतो असे नाही. तेव्हा आपल्यापेक्षा लहान गुरु असतात तरी त्याला नमस्कार करावा. हा त्या गुरुतत्त्वाचा मान असतो. कन्या पूजनाच्या वेळी कुमारीकेला व बटू पूजनाच्या वेळी बटूला नमस्कार करतात. डोळे मिटून देवतेला नमस्कार करताना देवतेचे ध्यान होऊन सुख समाधान प्राप्त होते.मानसिक आरोग्य चांगले राहते.

नमस्काराचे सुद्धा वेगवेगळे प्रकार आहेत. हाताने पायाला स्पर्श करून मस्तक खाली वाकवतात. काहीजण चरणावर मस्तक ठेवतात. काहीजण हस्तालोंदन करतात. कोणी आलींगन देतात. कोणी नुसतेच कमरेत वाकतात. तर कोणी टोपी, पागोटे काढतात. पत्रातही ज्याला आपण पत्र लिहितो, त्याला नमस्कार लिहून मग लिखाणाला सुरुवात केली जाते. अशा प्रकारे नमस्कार हा साधा, सोपा, बिन कष्टाचा पण लाभदायक आहे.

 या कारणें नमस्कार श्रेष्ठ l नमस्कारें वोळती वरिष्ठ ll

(दा.४/६/२५)

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ परीक्षा… ☆ संध्या बेडेकर ☆

संध्या बेडेकर

🌸 जीवनरंग 🌸

☆ ‘परीक्षा…’ ☆ सुश्री संध्या बेडेकर ☆

” दुःख माणसाच्या धैर्याची परीक्षा घेत असत..”

अजय अनिता दोघे ही एकाच college मधे शिकत होते.•• दोघे ही हुषार. त्यामुळे लगेचच चांगल्या नोकऱ्या मिळाल्या. हेही त्यांच्या लक्षात आले की They are in love. तेंव्हा त्यांनी लग्न करायचे ठरविले. दोघांच्या घरी एकमेकांची माहिती होतीच, त्यामुळे लगेचच दोन्ही घरचे भेटले व लग्न ठरलं.••••

अनिता ने मात्र सर्वांसमोर एक अट ठेवली. ती म्हणाली••• मी एकत्र कुटुंबात राहणार नाही. हे ऐकून अजय व त्यांचे आई-वडील तर चकित झालेच ,बरोबर अनिता चे आई-वडील पण अनिता कडे आश्चर्याने बघू लागले ••

लगेचच अजय चे बाबा म्हणाले, ठीक आहे. मला अनिता चे कौतुक वाटतं की तिने हे लग्नाआधी सर्वांसमोर सांगितले.•••थोडा वेळ द्या आम्हाला .••• आपण उद्या पुन्हा भेटू व पूढचे ठरवू .असं म्हणून बाबांनी परिस्थिती सांभाळुन घेतली.•••

घरी येताना सर्व शांत होते .अजय व आई खूप disturb आहे .हे बाबांच्या लक्षात आले .

घरी आल्यावर बाबा म्हणाले ••••

अरे !! तुम्ही वेगळे राहिला तर आम्हाला काही हरकत नाही .••जवळ राहिलं म्हणजेच प्रेम असत का ? अनिता चांगली मुलगी आहे. तुम्ही दोघे एकमेकांना मागच्या पाच वर्षांपासून ओळखता. चांगली शिकलेली आहे .दिसायला सुंदर आहे. मुख्य म्हणजे तुला आवडते ना •••.मग आम्हाला काही हरकत नाही ••

.आजी मात्र नाखुश होत्या. त्यांनी एकुलत्या एक सुनेबद्दल बघीतलेली सर्व स्वप्न एका क्षणात संपल्यासारखी त्यांना वाटलं. •••.अजय फक्त ऐकत होता .••••

दुसऱ्यां दिवशी अजयने अनिताला समजविण्याचा खूप प्रयत्न केला .पण काही उपयोग झाला नाही .••••

बाबां मात्र आईला समजविण्यात यशस्वी झाले.•• मुलांच्या सुखासाठी व आनंदासाठी आई वडील नेहमीच कोणतेही निर्णय लवकर घेतात.••कोणत्याही प्रकारची तडजोड करायला ते लगेच तयारी दाखवतात .••••

आता अजय अनिता चा संसार सुरू झाला. आई बाबांनी स्वतः लक्ष देऊन त्यांच्या घरातील सर्व सामान अनिता च्या पसंती ने घेतले .••अगदी चमच्या पासून फ्रीज पर्यंत सर्व वस्तू घरात तयार होत्या ••••.

दोघांची नोकरी होती. अजय आठवड्यातून एकदा घरी यायचा ••.येताना फोन करून , विचारून पिशव्या भरभरून तो आई बाबांकरिता त्यांची औषधे ,फळ ,भाज्या आणून देत असे .•••

बाबा म्हणायचे. अरे !!मग मी काय करू??? आम्हाला बाहेर जायचे कारणच मिळत नाही.•• तेंव्हा अजय हसून म्हणत असे ,•••• बाबा !! तुम्ही फक्त आईला घेऊन फिरायला जात जा.•• अनिता मात्र काही खास कारण असेल तरच यायची.•• आईला त्याचे खूप वाईट वाटत असे .बाबांना याची जाणीव होती. ते खंबीर होते .बायकोला सांभाळायची जबाबदारी पण माझीच आहे .हेही बाबांना माहीत होते .••••

बाबा म्हणजे एक प्रसन्न चित्त व्यक्तिमत्त्व .••नेहमीच वेगळ्या आयडिया असतात त्यांच्या जवळ .••• आणि आपली आयडिया कशी छान आहे ,हे त्यांना पटवून पण देता येत .••••

दोघांची गाडी हळूहळू रुळावर येऊ लागली. वरवरून आई खूष आहेत ,असं दाखवत जरी असल्या ,तरी कुठे तरी त्यांचे मन दुखावले होते .••••

अजय आज येणार हे कळलं की आई अगदी तयारीला लागायच्या.••• बाबा लिस्ट घेऊन आईंनी सांगितले ले सर्व साहित्य आणून द्यायचे .•••आई वेगवेगळे पदार्थ तर करायच्याच. बरोबर त्यादिवशी चा डबा म्हणून दोन तीन भाज्या, पोळ्या पण द्यायच्या••. अरे !! तेवढंच अनिताला काम कमी होईल. असं म्हणायच्या.••• नोकरी करुन सर्व करताना ती थकत असेल .••••

अनिता मात्र आपल्या विश्वात अगदी दंग होती . रमलेली होती .••आता तर project leader होती •••.त्यामुळे आनंदात होती••.पण वाढत्या कामाबरोबरच तिचा stress ही वाढत होता.••••

कंपनी मधे employees साठी कधी कधी काही कार्यक्रम आयोजित होत असतात.••• आजचा कार्यक्रम••

‘ Stress management’ वर होता.••••

अनिता ने attend केला ••.वक्ता अर्थातच तयारीने आले होते .••त्यांनी ‘ what is stress?’ त्यांचे शारीरिक व‌ मानसिक कसे परिणाम होतात. stress management करिता काय काय आपण करू शकतो?? त्याबद्दल ते बोलले .योग करणे , regular excercise करणे का गरजेचे आहे हे सांगितले .••••

आपले भाषण संपवताना ते म्हणाले तुम्ही सर्व शिकलेले तरूण अहात. पैसा , post , promotion , फक्त याचाच विचार करू नका . कुठे तरी फुल स्टोप लावायला शिका . कुठे थांबायचे ?? हे ठरवायला शिका .••••

आनंद केंव्हा घेणार आयुष्यात ?? आनंद घेणे ही वर्तमान काळातील गोष्ट असते . भविष्यात घेऊ म्हणून पूढे ढकलायची गोष्ट नव्हे..••••

Life मधे priorities ठरवायाला शिका. पैसा आणि फॅमिली दोन्ही महत्वाचे.••• freedom, privacy. च्या नावाखाली आपल्या माणसांहुन आपण दूर तर होत नाही ना . याचे भान ठेवा .•• एकटेपणा हे सुद्धा स्ट्रेस चे एक मोठे कारण आहे .•• जेंव्हा व्यक्त व्हायला कोणी विश्वासाचे मिळत नाही.तेंव्हा •• स्ट्रेस एकत्र होत जातो ••. तुमच्या या नवीन कल्चर मधे नोकरी सोडणे ,बदलणे, किंवा नोकरी जाणे, या सहज घडणाऱ्या गोष्टी आहेत. •• त्यामुळे अस्थिरता व अनिश्चितता या दोन्ही तलवारी सतत टांगलेल्या असतात तुमच्या आयुष्यात .• निश्चित काही गोष्ट असेल तर ती तुमची फॅमिली आहे .••तो तुमचा आनंद आहे. तेंव्हा विचार करा.••

तुम्ही त्या सर्वांबरोबर जीवापाड तडजोड करता जे निश्चित नाही .•••मग परिवार बरोबर का नाही ??? ती तर जास्त सोपी व सहज गोष्ट आहे .ओझ आणि मन हलकं करायला परिवारासारखी दुसरी सेफ जागा नसते.••• तुमचे कौतुक करायला व तुम्हाला, तुमच्या मुलांना सांभाळायलाही कोणी तरी पाहिजेच ना.••••

माझ्या भाषणात हा उल्लेख मी सर्वात शेवटी जरी केला असला ,तरी ही सर्वात महत्त्वाची गोष्ट आहे .•• हे लक्षात ठेवा .••••

अचानक अनिता च्या डोळ्यासमोर अजय च्या आई बाबांचा चेहरा आला .••त्यांनी पाठविलेले डबे ,वेळोवेळी घेतलेली काळजी तिला आठवली .•••

अनिता घरी आली ती वेगळ्याच विचारात.•• येताना तिने बाबांना फोन केला ••.अजय ला पण सुट्टी घ्यायला सांगितले .••••

अनिता अजय उद्या घरी येतायेत . बाबांनी आईंना सांगितले .दोघांच्या चेहऱ्यावर प्रश्न चिन्ह??? होते. मिश्रीत भाव होते.•••

बाबा म्हणाले अग !! उद्या अनिता च्या आवडीचा स्वयंपाक कर.••••

दुसऱ्या दिवशी अजय अनिता घरी आले. अनिता ने आई बाबांना सांगितले ,•••

आम्ही येथे तुमच्या बरोबर रहायला येणार आहोत नेहमी करिता .,••

अजय ,आई बाबा पुन्हा एकदा आश्चर्य चकित झाले.•• पण यावेळी मिळणारा धक्का सुखद होता.•••

बाबा म्हणाले •••••

“Yes , you are always welcome .”

फक्त मला पंधरा दिवस द्या. तुमची खोली व्यवस्थित करायला .,••• आई नी बाबांकडे बघीतले , त्यांच्या चेहऱ्यावर आनंद व बाबांबद्दलचा अभिमान स्पष्ट दिसत होता.••• .

” दुःख माणसाच्या धैर्याची परीक्षा घेत असत. .”

‘संयम ‘आणि ‘माफ करायची ताकद ‘ मनुष्यात असली की सर्व साध्य होते .•••

इतरांकडून कमीत कमी ‘अपेक्षा ‘ व स्वतःकडून जास्तीत जास्त ‘तडजोडी :या दोन गोष्टी प्रत्येकाचे जीवन आनंदी व यशस्वी बनवू शकतात .••••

” चुकीने चूकीच्या मार्गावर गेले तर काही हरकत नाही .पण चूक लक्षात येताच मार्ग बदलायची इच्छा व हिम्मत दाखविणे हे कौतुकास्पद आहे .”••••

म्हणतात ना •••••

“जिंदगी हमें हमेशा एक नया पाठ पढ़ाती है — हमें समझाने के लिए नहीं — हमारी सोच बदलने के लिए. “

© सुश्री संध्या बेडेकर 

वारजे, पुणे.  

7507340231

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ ती – – – ☆ श्री सुनील देशपांडे ☆

श्री सुनील देशपांडे

? मनमंजुषेतून ?

☆ ती – – – ☆ श्री सुनील देशपांडे

आज मधुबाला हयात असती तर अशी दिसली असती

ती – – – 

आमच्या आईच्या वयाची (आमची नातवंडं आता रोमँटिक सिनेमा पाहायच्या वयात आलीत)

तरीही ती आमची लाडकी रोमँटिक हिरोईन.

तिचं नाक नाजुक आणि धारदार होतं?

छे हो नाजूक कसलं, थोडं जाडंच. धारदार तर अजिबात नाही.

तिचे ओठ नाजूक होते?

ते हो नाजूक कुठले आकाराने सुंदर परंतु थोडे जाडेच नाही का?

जिवणी नाजूक? नाहीच.

डोळे माशा सारखे म्हणजे मीनाक्षी हो! छे ते तसेही नव्हते.

सिंहकटि ? न न् नाही.

मग होतं काय तिच्यात?

आधी तुम्ही ते मासे, त्या चाफेकळ्या त्या गुलाबाच्या पाकळ्या यांचे लोणचे घालून टाका.

सौंदर्याच्या सर्व पारंपरिक कल्पनांना झुगारून देऊन तिने जे आपलंसं केलं

तेच खरं चिरसौंदर्य ठरलं!

ते भावुक, अथांग, काळेभोर डोळे! त्यामध्ये एक खट्याळपणाची झाक!

डोळ्यांचे आणि भुवयांचे विभ्रम!

त्या सुंदर ओठांची मोहक हालचाल!

त्या नाकाच्या शेंड्यावर बेफिकीरपणाची एक झाक!

त्या भव्य कपाळावरून केस सरकवण्यातील एक वेगळीच विलोभनीयता!

त्या निरागस चेहऱ्यावरील खोडसाळ हास्य!

ती अभिनेत्री कधी वाटलीच नाही. तिच्या चेहऱ्यावर जे दिसलं तो अभिनय कधी वाटलाच नाही!

सतत बदलणारे चेहऱ्यावरचे भाव!

संवादातील आणि गाण्यातील शब्दांना न्याय देणारे ते विभ्रम! ती शब्दांची फेक, आणि त्या शब्दांमध्ये मिसळलेली भावगर्भता!

आमचे काही दोस्त त्या विभ्रमांना अदा असे म्हणत!

परंतु एकदा दाखवलेली अदा पुन्हा परत नाही. सतत नवीन नवीन विभ्रम!

एकदा सादर केलेली अदा पुन्हा परत नाही, नो रिपीटिशन!

हाता पायांच्या सर्व शरीराच्या हालचालींमधील सहजता, मोहकता!

निरागसता, खोडसाळपणा, छद्मीपणा या साऱ्यांचं मिश्रण एका मोहक पद्धतीने सतत चेहऱ्यावर जाणवत राहतं आणि मग तेथून नजर हटत नाही.

मधाळ आणि बालिश या दोन्हीचे अफलातून मिश्रण म्हणजेच

मधुबाला!!

तिचा वाढदिवस आणि व्हॅलेंटाईन डे या दोन्हीचे एकाच दिवशी असणे हा मधुनवनीतशर्करा योगच की!

तिचा वृद्धापकाळ काळालाही सहन झाला नसावा म्हणून तरुण वयातच तो तिला घेऊन गेला!

आर्टिफिशियल इंटेलिजन्स च्या एका ॲपवर मी एक इमॅजिनेशन टाकली 95 वर्षाची मधुबाला कशी दिसेल?

पण त्याने उत्तर दिले,

I can’t imagine!

दुसऱ्या एका पला हाच प्रश्न एका वेगळ्या पद्धतीने विचारला

आज मधुबाला जिवंत असती तर कशी दिसली असती ?

त्याने रेखाटलेले चित्र यासोबत मी जोडले आहे.

आज मधुबाला जिवंत असती तर ती ९५ वर्षाची असती!

त्या चिरतरुण स्मृतीला वंदन!

तिच्या आठवांचे सतत मनावर बंधन!

अशी मधुबाला पुन्हा न होणे!!!

म्हणूनच वसंत बापट त्यांच्या कवितेत म्हणाले होते

 

 

मधुबाला ती मधुबाला

मदीरा साकीसंगे जेथे

एकच होतो मधु प्याला

ती स्वर्गाहुन सुखकर म्हणती

कुणी बच्चंजी मधुशाला

नकोत असल्या व्यर्थ जल्पना

सर्व असंभव काव्यकल्पना

तुम्हास तुमची मधुशाला

अम्हास प्यारी मधुबाला

नार अनारकलीसम नाजुक

पडदा दूर जरा झाला

महाल स्वप्नांचा झगमगता

लखलखली चंद्रज्वाला

डोळे दिपता चोरी झाली

दिलदारांची ह्रदये गेली

कठोर काळा दाद न देता

फरार झाली मधुबाला

कुठे हरपली शोधीत बसला

जगात जो तो दिलवाला

स्वप्नामध्ये खळी चाचपून

स्पर्शुन पाही कुणी गाला

अजुन तिला मन शोधीत राही

धुंडुन झाल्या दाही दिशाही

रजतपटावर कितीक झाल्या

मधुबाला ती मधुबाला…

© श्री सुनील देशपांडे 

 फोन :९६५७७०९६४०

 ई मेल : sunil68deshpande@outlook.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर ≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ प्रियन रंगोत्सव… ☆ तृप्ती कुलकर्णी ☆

तृप्ती कुलकर्णी

🪷 मनमंजुषेतून 🪷

☆ प्रियन रंगोत्सव…  ☆ तृप्ती कुलकर्णी

वैशाख वणव्यातल्या भर दुपारी आपली पहिली भेट झाली. 

आठवतोय त्या भरजरी दुपारचा रंग? 

 

पावसाळ्यातल्या एका संध्याकाळी 

चिंब होऊन झाडाखाली उभी असताना 

तुझी लाल सायकल घेऊन तू माझ्यासोबत थांबलास 

आणि तुझा निळा रेनकोट घालून मला डबलसीट घरी आणलंस… 

त्या वेळेला काळ्या, करड्या, निळ्या, लाल इतक्या सगळ्या ढगांची मोजणी केली होती आपण, ती रंगीत सांज आठवते का तुला?

 

वाढदिवसाच्या दिवशी माझ्या

सायकलच्या कॅरियरवर चाफ्याच्या पिवळ्या फुलांचा पुडा ठेवून गेला होतास तू…

सोबतीला वाढदिवसाच्या शुभेच्छा अशी गुलाबी रंगाची चिठ्ठी… तुझ्या‌ वळणदार पण रंगीबेरंगी हस्ताक्षरातलं ते शब्द आणि त्यावर काढलेलं सुंदर जहाज आठवतं का रे तुला? 

 

इतक्या जवळ राहतो म्हणून कधीच पत्र लिहिता येणार नाही म्हणून चार दिवस हट्टाने मामाकडे गेलास आणि एका पोस्टकार्डवर पत्र लिहून पाठवलंस त्यात शेवटी तुझ्या नावाऐवजी छोटंसं रंगीत घर काढलंस… 

ते घर आजही स्वच्छ दिसतं मला… पण आठवतं का रे तुला? 

 

तुझ्या घर बांधण्याच्या हौसेनं कितीतरी रंगीबेरंगी दगड, विटा, टाइल्स गोळा करायचो आपण,

तेव्हा एका काचेनं माझ्या बोटावर अचूक वार केला होता…‌ त्यातून येणारं रक्त पाहून तुझ्या  आवडीचा पांढराशुभ्र रुमाल माझ्या बोटावर विसावला होता…. अनेक दिवस तुझ्या सॅकच्या चोरकप्यात तो रुमाल ठेवला होतास..आठवतो का रे तुला??

 

इतक्या वर्षांच्या आठवणींमध्ये किती रंगांची उधळण…

गंधाची पखरण…

आठवते का रे तुला? 

चित्रकलेच्या तासाला सर म्हणाले होते काही रंग इतके गडद असतात की ते कधीच पुसले जात नाहीत. त्यावर नवे रंग चढत नाहीत… त्यासाठी कोराच कॅनव्हास वापरावा लागतो. हे ऐकून तुझ्या वहीच्या प्रत्येक  पानावर तू माझ्या आवडीचा हिरवा रंग दिलास… 

हे आठवतं का रे तुला????

 

कदाचित नसेल 

किंवा असेलही…

 पण

प्रियन,

तेव्हापासून मी मात्र पांढऱ्या रंगाचा कागद वापरणं आवर्जून टाळलंय…

 हे या रंगोत्सवाच्या निमित्ताने सांगायचं होतं तुला… 

© तृप्ती कुलकर्णी

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – इंद्रधनुष्य ☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७ आणि ८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

? इंद्रधनुष्य ?

☆ मनाचे श्लोक – एक सार्वकालिक ‘मनोपनिषद’… – श्लोक ७ आणि ८ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्लोक ७ – –

मना श्रेष्ठ धारिष्ट्य जीवी धरावे |

मना बोलणे नीच सोशीत जावे |

स्वये सर्वदा नम्र वाचे वदावे |

मना सर्व लोकांसि रे निववावे |७ |

अर्थ : हे मना तू धीराचा अंगीकार कर म्हणजेच तुझ्या ठायी धैर्य असू दे. लोकांनी निंदा किंवा टीका केली तरी ती सहन कर. बोलताना नेहमी नम्रतेनेच बोल आणि आपल्या बोलण्याने आणि वागण्याने लोक संतुष्ट होतील असे वाग.

या श्लोकात समर्थांनी मनाला फार सुंदर उपदेश केला आहे. तो लक्षात घेण्याआधी मागील श्लोकाचा संदर्भ घेऊया. मागील श्लोकात समर्थ म्हणतात,” साधकाने काम क्रोध मोह इत्यादी विकारांपासून दूर राहिले पाहिजे.” अर्थात हे दूर राहणे सोपे नाही. त्यासाठी काय करायला हवे ते समर्थ या श्लोकात आपल्याला सांगतात. समर्थ म्हणतात, “आपण धैर्याचा अंगीकार करायला हवा. जीवनामध्ये अनेक संकटे येतात, मोहाचे प्रसंग येतात, आपली परीक्षा पाहणारे प्रसंग येतात. या सगळ्या प्रसंगामध्ये आपले मानसिक धैर्य टिकवून ठेवणे आवश्यक असते. ही एक प्रकारची साधना आहे जी सरावाने जमू शकते.

ज्याला प्रवाहविरुद्ध पोहायचे आहे आणि काही विशेष कर्तृत्व करून दाखवायचे आहे, त्याच्या अंगी धैर्य तर हवेच ! छत्रपती शिवाजी महाराजांना लढाईमध्ये काही वेळा माघारही घ्यावी लागली. प्रत्यक्ष श्रीकृष्णाला देखील रणांगणातून पळ काढावा लागला. स्वामी विवेकानंदांना देखील अनेक समस्यांचा, टीकेचा, नींदेचा सामना करावा लागला. परंतु या सगळ्या महापुरुषांनी कठीण परिस्थितीतही आपले धैर्य टिकवून ठेवले. संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम यांच्यासारख्या संतांना तर केवढी लोकनिंदा सहन करावी लागली परंतु  आपण अंगीकारलेले समाजप्रबोधनाचे कार्य ते करीतच राहिले.

अशा महापुरुषांना निंदा आणि स्तुती, सुख आणि दुःख समान असतात. त्यामुळे ते विचलित होत नाहीत. रामाला राज्याभिषेक होणार होता. तो त्याच्या जीवनातील अत्यंत आनंदाचा प्रसंग होता. परंतु दशरथाने कैकयीला दिलेल्या वरामुळे त्याला वल्कले धारण करून वनवासात जावे लागले. परंतु याही परिस्थितीत त्याने आपले धैर्य आणि आनंदी वृत्ती सोडली नाही. आणि अशाही परिस्थितीत भरताला माता कैकयीकडे दुर्लक्ष करू नकोस असे सांगण्यास तो विसरला नाही. म्हणूनच महापुरुषांचे जीवन म्हणजे दीपस्तंभ असतात. कोणत्या परिस्थितीत कसे वागावे याचा वस्तूपाठ ते आपल्याला घालून देतात. म्हणूनच ते गुण अगदी धारण करण्यासाठी समर्थ आपल्याला तोच उपदेश करतात.

माणसाला स्तुती आवडते परंतु जेवढ्या सहजतेने आपण स्तुतीचा स्वीकार करतो तेवढ्याच सहजतेने निंदेचा करू शकत नाही. त्यासाठी धैर्य लागते. म्हणूनच समर्थ म्हणतात मना बोलणे नीच सोशीत जावे. या ठिकाणी धैर्याचा आणि टीका सहन करण्याचा दुसराही एक अर्थ घेता येईल. तो म्हणजे मनावर संयम राखणे, प्रतीक्षा करणे. प्रत्येकाच्या जीवनामध्ये काही एक काळ असा येतो की त्या प्रसंगामध्ये त्याला मनावर संयम ठेवून कठीण प्रसंगांना तोंड द्यावे लागते. आजच्या पिढीत हा संयम, हे धैर्य कमी होताना दिसते आहे. तरुण अपयशाचा स्वीकार आणि अपमानाचा सामना सहजपणे करू शकत नाहीत. जी गोष्ट आपल्याला हवी आहे ती मिळायलाच हवी ती नाही मिळाली तर ते एक तर खचून जातात किंवा हिंसक बनतात. अशी अनेक उदाहरणे आपण व्यवहारात पाहतो. म्हणूनच धैर्य अंगीकारणे, अपमान सहन करणे याचे प्रशिक्षण मनाला देणे आवश्यक आहे. ती वृत्ती अंगी बाणवावी लागते. मुलांना सुद्धा आई-वडिलांनी कठीण परिस्थितीचा सामना करणे, संकटात खचून न जाणे आणि अपयश आले तरी त्यातून पुन्हा उभे राहण्याची हिंमत ठेवणे या गोष्टी शिकवायला हव्यात. क्रिकेटसारख्या किंवा अन्य खेळांमधूनही अशा प्रकारची वृत्ती आपल्याला शिकायला मिळते. एखादा सामना हरला तरी निराश न होता, खेळाडू पुढचा सामना कसा जिंकता येईल त्या तयारीला लागतात. या सगळ्या गोष्टींमध्ये यश आणि अपयश सहजपणे कसे स्वीकारायचे याचे सुंदर शिक्षण आपल्याला मिळते.

जीवनामध्ये वागताना नम्रतेने बोलणे आवश्यक आहे. तसे संस्कार लहानपणापासून व्हायला हवेत ओल्या मातीच्या गोळ्याला हवा तसा आकार देता येतो म्हणूनच पालकांनी तसे आपल्या मुलांना संस्कार द्यायला हवेत. ही नम्रता आतून घ्यायला हवी. ती मनाची वृत्ती व्हायला हवी. बऱ्याच वेळा आजच्या कार्पोरेट जगामध्ये काही लोक कृत्रिम नम्रता किंवा विनय धारण करताना दिसतात. परंतु त्या गोष्टी मनापासून नसतील तर त्या गोष्टी म्हणजे एक प्रकारचे ढोंगच !

श्रीकृष्ण, श्रीराम यांचे सर्वांशी वागणे-बोलणे कसे होते हे पालकांनी गोष्टीतून मुलांना शिकवायला हवे. त्यांच्याजवळ ज्ञान होते, सामर्थ्य होते. परंतु तरी देखील त्यांनी आपली नम्रता सोडली नाही. संत तुकाराम महाराज म्हणतात,” नम्र झाला भुता, त्याने कोंडीले अनंता.” त्याचे तात्पर्य हेच आहे. आपल्या बोलण्याने दुसऱ्याचे समाधान झाले पाहिजे, दुसरी व्यक्ती संतुष्ट झाली पाहिजे अशा पद्धतीने बोलता आले पाहिजे. आपले म्हणणे दुसऱ्याला न दुखवता देखील उत्तम पद्धतीने सांगता येते. या गोष्टी वरील महापुरुषांच्या उदाहरणांकडे पाहिले तर आपल्या सहज लक्षात येतात.

या श्लोकात समर्थांनी धैर्य, संयम, नम्रता आणि गोड बोलणे ही आपल्या जीवनाला दिशा देणारी चतु:सूत्री दिली आहे. ती आपण लक्षात घ्यायला हवी.

स्वसंवाद: 

  • संकटसमयी माझे मन स्थिर राहते का, की लगेच खचते ?
  • टीका झाली तर मी संतुलित राहू शकतो का ?
  • माझ्या वागण्या, बोलण्यात नम्रता आणि सौजन्य आहे का ?
  • माझ्या बोलण्याने लोक संतुष्ट होतात का ?

– – –

श्लोक ८ वा – – – 

देहे त्यागिता कीर्ति मागे उरावी |

मना सज्जना हेचि क्रीया धरावी |

मना चंदनाचे परी त्वां झिजावे |

परी अंतरी सज्जना नीववावे |८|

अर्थ : हे मना ( सज्जन माणसा ), तुझी वागणूक अशा प्रकारे असू दे की मृत्यू पावल्यानंतरही तुझी कीर्ती मागे राहील. सुगंध देण्यासाठी चंदन ज्याप्रमाणे स्वतःला झिजवते अशाच प्रकारे तू देखील इतरांसाठी झिजून सज्जनांना संतोष होईल अशा प्रकारे वागावे.

माणसाचा देह नाशिवंत आहे. जो जन्माला आला त्याला एक दिवस मृत्यू निश्चित आहेच. जीवन आणि मृत्यू यांच्या दरम्यानचा कालावधी म्हणजे आपले आयुष्य. एखादी व्यक्ती किती जगली यापेक्षाही ती कशी जगली हे अधिक महत्त्वाचे. शंभर वर्षांचे दीर्घायुष्य मिळवून आपले आयुष्य मौजमजेत घालवणाऱ्या व्यक्तीपेक्षा अल्पायुष्य लाभलेल्या परंतु इतरांच्या सेवेत आपले जीवन घालवणाऱ्या व्यक्तीचे जीवन कधीही श्रेष्ठ ! स्वामी विवेकानंदांना उणेपुरे चाळीस वर्षांचे आयुष्य लाभले परंतु या आयुष्यात त्यांनी जी मानवतेची सेवा केली ती अनेक जन्म घेऊनही इतरांना करणे कठीण आहे. आपले आयुष्य सत्कारणी लावायचे असेल तर त्यासाठी इतरांसाठी झिजण्याची तयारी हवी.  एक सुंदर मराठी गीत आहे…

आनंद या जीवनाचा, सुगंधापरी दरवळावा

गाण्यातला सूर जैसा ओठांतुनी ओघळावा

झिजूनी स्वतः चंदनाने

दुसर्‍यास मधुगंध द्यावा…

शीतलता आणि सुगंध हे चंदनाचे गुण आहेत. ते इतरांना देण्यासाठी ते स्वतः झिजत असते. चंदन रोज सहाणेवर थोडे थोडे उगाळले जाते. असे करताना त्याची झीज होत असते. परंतु ही झीज सोसून ते इतरांना सुगंध आणि शीतलता प्रदान करते. आपण असेही म्हणतो की जे हात इतरांना सुगंध वाटतात, त्या हातांनाही सुगंध येतो. तो गंध त्यांना आपोआप प्राप्त होतो.

इतरांसाठी काही करायचे तर फक्त एक दिवस झिजून चालत नाही. ती सवय व्हावी लागते, वृत्तीला तसे वळण लावावे लागते. म्हणूनच समर्थ म्हणतात मना सज्जना हेचि क्रीया धरावी. अशा प्रकारचे सेवेमध्ये सातत्य असावे लागते. अशा प्रकारचे सातत्य जर आपल्या सेवेत आणि वागण्याबोलण्यात असेल तर त्यामुळे सज्जन म्हणजे समाजातील सदाचरणी लोक प्रसन्न होतात, संतुष्ट होतात.

समाजातील बऱ्याच लोकांकडे सत्ता आणि संपत्ती असते. त्यातील काही लोक आपल्या सत्तेच्या आणि संपत्तीच्या बळावर विविध संस्थांना देणग्या देऊन आपले नाव द्यायला लावतात. विविध प्रकारे प्रसिद्धी मिळवण्याचा प्रयत्न करतात. तशी ती त्यांना काही काळ मिळते देखील. इमारतीच्या फलकांवर किंवा दगडांवर त्यांचे नाव कोरले गेलेले असते. तरीदेखील काही काळानंतर अशा व्यक्ती विस्मृतीत जातात. परंतु कोणत्याही प्रकारचा स्वार्थ किंवा प्रसिद्धीची हाव न धरता जे सातत्याने समाजासाठी झिजत असतात, अशा व्यक्तींचे नाव समाज कायम आदराने घेत असतो. अशा व्यक्तींचे नाव समाजाच्या मनात कोरले जाते. त्याला कायमस्वरूपी आदराचे स्थान असते. अहिल्याबाईंनी आपला राज्यकारभार करत असताना समाजासाठी घाट बांधले, अन्नछत्रे पाणपोया उभारल्या. यासारखी विविध प्रकारची कामे केली आणि त्यासाठी पैसा खर्च केला. त्यामुळे आपण आजही त्यांचे नाव आदराने घेतो. इतरांची नावे विसरली जातात. म्हणूनच त्यांची कीर्ती आजही जिवंत आहे.

समर्थांचा संदेश स्पष्ट आहे —

.. .. ..  कीर्ती मागे राहावी असे वाटत असेल तर आयुष्य इतरांसाठी झिजवले पाहिजे. आणि हे झिजणे एकदाच नव्हे, तर वृत्ती म्हणून अंगीकारले पाहिजे.

“मना सज्जना हेचि क्रीया धरावी” —

.. .. .. ही कृती, ही वृत्ती, ही सातत्यपूर्ण सेवा — हाच खरा साधनेचा मार्ग आहे.

स्वसंवाद :

  • मी केवळ स्वतःसाठी जगतो आहे की इतरांसाठी झिजून त्यांनाही आनंद देण्याचा प्रयत्न करतो आहे ?
  • माझ्या कृतींमागे प्रसिद्धीची अपेक्षा आहे का, की निखळ सेवाभाव ?
  • हा सेवाभाव मी एक वृत्ती म्हणून अंगीकारला आहे का ?
  • माझ्या वागण्याने किंवा सेवाभावाने समाजातील सज्जन किंवा सदाचरणी लोक संतुष्ट होतात का ?

– क्रमशः श्लोक ७ आणि ८ .   

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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