हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल (म.प्र).
नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए, मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।
आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – होली पर चारः क्षणिकाएँ…!
☆ ॥ कविता॥ होली पर चारः क्षणिकाएँ…!☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं।)
अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज (स्वायत्त) अहमदनगर ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
मोबाइल– 9890122603
संजयउवाच@डाटामेल.भारत
writersanjay@gmail.com
☆ आपदां अपहर्तारं ☆
आशुतोष साधना संपन्न हुई। अगली साधना की जानकारी शीघ्र ही दी जावेगी।
अनुरोध है कि आप स्वयं तो यह प्रयास करें ही साथ ही, इच्छुक मित्रों /परिवार के सदस्यों को भी प्रेरित करने का प्रयास कर सकते हैं। समय समय पर निर्देशित मंत्र की इच्छानुसार आप जितनी भी माला जप करना चाहें अपनी सुविधानुसार कर सकते हैं ।यह जप /साधना अपने अपने घरों में अपनी सुविधानुसार की जा सकती है।ऐसा कर हम निश्चित ही सम्पूर्ण मानवता के साथ भूमंडल में सकारात्मक ऊर्जा के संचरण में सहभागी होंगे। इस सन्दर्भ में विस्तृत जानकारी के लिए आप श्री संजय भारद्वाज जी से संपर्क कर सकते हैं।
≈ संपादक – हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
वाटिका में भ्रमण के उपरांत, देवी अपनी सखी के संग, प्रासाद के प्रवेश द्वार पर पहुँची ही थीं कि दृष्टि ठिठक गई। यह क्या! द्वारपाल के बगल में साक्षात् नारद मुनि, अपनी वीणा हाथों में थामे, विराजमान हैं। मुख पर वही शाश्वत मुस्कान, जैसे युगों से समस्त लोकों का रहस्य जानकर भी निष्पाप बने हों।
“नारायण, नारायण! एक लघु निवेदन है,” उन्होंने वीणा के तारों को हलके से झंकृत करते हुए कहा, “संध्याकाल में भीतर देवियाँ गोष्ठी करती हैं। अति आनंददायक! हास्य, विनोद, रस-परिहास—सब कुछ। आपकी भी उपस्थिति प्रार्थनीय है। अवश्य पधारें!”
वीणा के स्वरों ने मानो आकाश में अदृश्य कमल खिला दिए। वे स्वर ऐसे थे कि वायु भी ठिठककर सुनने लगे। देवियों के हृदय में उनके स्मरण का एक कोमल कक्ष निर्मित हो गया—जहाँ वे प्रतिदिन संध्या से पूर्व जाकर विराजते।
संध्याकाल में वे गोष्ठी स्थल के आसपास अपनी वीणा के तार झंकृत करते दृष्टिगोचर होते। कभी किसी की आरती की थाली सँभाल देते, कभी किसी की पायल का टूटा घुँघरू जोड़ देते। संरक्षण का ऐसा भाव कि मानो स्वयं त्रिलोक के अभिभावक हों। देवियाँ उनके इस सौजन्य से अभिभूत रहतीं—“देखो, कितने सज्जन हैं! कितने सरल!”
और वे, अत्यंत विनीत भाव से, थोड़ी दूरी पर खड़े रहकर भी सबके निकट बने रहते—जैसे चन्द्रमा, जो स्पर्श तो नहीं करता, पर प्रकाश से सबको अपने घेरे में ले लेता है।
महाशिवरात्रि का पर्व निकट आया। पुनः वही मधुर मुस्कान, वही सम्मोहन।
“शिवरात्रि के अवसर पर मंदिर में अति सुंदर आयोजन है। अवश्य पधारें, महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करें,” उन्होंने कहा।
उत्सव की संध्या पर वे भोले बाबा-सी अलमस्त चाल में चहुं दिशा विचरते रहे। कहीं दीपक प्रज्वलित करा रहे हैं, कहीं भस्म का तिलक लगा रहे हैं। देवियाँ श्रद्धा से गदगद। कोई कहे—“क्या तपस्वी पुरुष हैं!” कोई कहे—“कितने सजग, कितने सतर्क!”
किंतु अद्भुत यह कि जहाँ-जहाँ देवियाँ एकत्र हों, वहीं-वहीं वे अनायास प्रकट हो जाते—जैसे वसंत की हवा, जिसे किसी ने बुलाया न हो, फिर भी वह आ ही जाती है।
और आज—होली का दिवस।
वह कृष्ण-कन्हैया मुद्रा में हैं। अधर पर मुरली, नेत्रों में अर्धनिमीलित करुणा और चपलता का संगम। गोपिकाएँ उन्हें घेरे हुए हैं। गुलाल और पुष्पों की वर्षा हो रही है। वातावरण में रंगों का ऐसा जादू कि स्वयं इन्द्रधनुष भी ईर्ष्या से फीका पड़े।
उनकी सौम्यता आज भी अक्षुण्ण है। मुख पर वही सहजता, मानो कुछ हुआ ही न हो। परन्तु रंग की एक महीन परत उनके वस्त्रों पर नहीं, उनके चारों ओर फैली प्रतिष्ठा पर भी चढ़ती प्रतीत होती है।
आँखें मूँदकर, वे मन ही मन गुनगुना रहे हैं—
“रंग बरसे भीगे चुनर वाली, रंग बरसे…”
वीणा के तार जैसे स्वयं ही थिरक उठते हैं।
देवियाँ हँसती हैं, इठलाती हैं, उन्हें और रंगती हैं। और वे—सबके प्रिय, सबके हितैषी, सबके ‘अपने’—रंगों के इस महासमर में भी अदृश्य मर्यादा की रेखा खींचे रहते हैं, जिसे कोई देख नहीं पाता, पर सभी मानते अवश्य हैं।
लोक-लाज के आँगन में, भलमनसाहत की ओट में, उनका यह चिर-परिचित चरित्र यूँ ही विचरता रहता है—
A Pathway to Authentic Happiness, Well-Being & A Fulfilling Life! We teach skills to lead a healthy, happy and meaningful life.
The Science of Happiness (Positive Psychology), Meditation, Yoga, Spirituality and Laughter Yoga. We conduct talks, seminars, workshops, retreats and training.
≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’≈
संस्कारधानी के सुप्रसिद्ध एवं सजग अग्रज साहित्यकार श्री मनोज कुमार शुक्ल “मनोज” जी के साप्ताहिक स्तम्भ “मनोज साहित्य” में आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “फागुन के दिन आ गये…”। आप प्रत्येक मंगलवार को आपकी भावप्रवण रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे।
☆ जीवन यात्रा ☆ व्यक्तित्व-पाठकों को समर्पित व्यंग्यकार – विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र” ☆ श्री सुनील जैन राही ☆
व्यंग्य का संक्रमण काल है या स्वर्ण काल? तय है कि व्यंग्य की चर्चा और व्यंग्य जितना लिखा जा रहा उससे ज्यादा पढ़ा जा रहा है। थोथा भ्रम है कि व्यंग्य पढ़ा नहीं जा रहा है, यदि ऐसा होता तो व्यंग्यकार कुछ भी लिखकर इतिश्री कर देते। जरा सी चूक व्यंग्यकार को थाना दर्शन करवा सकती है। जरूरी नहीं कि कबीर की तरह प्रहार किया जाए, प्रहार आप वरिष्ठ व्यंग्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव की तरह भी कर सकते हैं। सांप भी मर जाए और व्यंग्यकार भी बच जाए। व्यंग्य अगर पढ़ा नहीं जा रहा होता तो व्यंग्य का कालम अखबार की मजबूरी न बन जाता? अखबार 16 पेज का हो या चार पेज का उसमें व्यंग्य की मौजूदगी तय करती है कि उसकी आवश्यकता सम्पादकीय से कम नहीं है। पाठक अखबार पढ़ते समय पाठक हत्या, बलात्कार, राजनीति, युद्ध और प्रेम के अलावा कुछ ऐसा पढ़ना चाहता है जिससे, वह क्षणिक आनंद या भावविभोर हो सके।
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव “विनम्र”
विशेष बात आज व्यंग्यकाल में एक ऐसे व्यंग्यकार भी जो व्यंग्य को पढ़ने-पढ़ाने के लिए समर्पित है। विवेक रंजन श्रीवास्तव स्वांत सुखाय के साथ-साथ पाठकों को पुस्तकें उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध हैं। ऐसे कितने साहित्यकार हैं जो अपनी लाइब्रेरी आम आदमी के लिए खोलकर बैठे हैं? यह कोई नहीं जानना चाहता कि किताब को कितना पढ़ा, कितने फोन आए, कितने मेसेज आए? किसी संस्था को पुस्तकें भेंट कर देना अलग बात है, लेकिन पुस्तक पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना उससे भी श्रेष्ठ कार्य है।
जबलपुर की भूमि आधुनिक व्यंग्य की कर्मभूमि कही जा सकती है। वैसे तो मध्य प्रदेश व्यंग्य की भूमि है, जहां व्यंग्यकारों की उपज बिना खाद-पानी के होती है। इलाका कोई सा भी हो। छोटे से छोटे गांव में दमदार व्यंग्यकार दिखाई दे जाएंगे। इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि हर व्यंग्यकार को जमीन नहीं मिलती, मंच नहीं मिलता, माइक नहीं मिलता, लेकिन वह पूरी तन्मयता से व्यंग्य उगाने में लगा रहता है। विवेक रंजन श्री वास्तव को जमीन, माइक और मंच भी मिला। लेखन में निस्वार्थ भाव से लगे रहे हैं। खासियत है-व्यंग्य पढ़ना और उसके बारे में अखबारों में सटीक समीक्षा के माध्यम से उस पुस्तक को पढ़ने के लिए प्रेरित करना, व्यंग्य समारोह में शिरकत करना अपनी बात रखना और व्यंग्य के क्षेत्र में पदार्पण कर रहे व्यंग्यकारों को मुफीद जमीन दिखाना, वे कर्तव्य मान सक्रिय अवदान के लिए सदैव तत्पर रहते आए हैं।
विवेक रंजन केवल व्यंग्य के लिए काम करते हैं? व्यंग्य के पाठकों के लिए काम करते हैं, इसके लिए उन्होंने अपने घर पर डिब्बा लाइब्रेरी का संयोजन कर रखा है। पुस्तक उठाओ, घर ले जाओ, पढ़ो और फिर उसी बाॅक्स में रख दो। कोई इंट्री नहीं, कोई खतोकिताबत नहीं बस केवल समर्पण ही समर्पण। समीक्षा के लिए यह जरूरी नहीं कि उन्हें दो प्रतियां दी जाएं? उसके बाद ही उस कृति पर कलम दौड़ायेंगे। स्वयं किताबें खरीदकर गुणवत्ता और लेखक के कर्म को विस्तार से रुचिकर बनाते हुए प्रस्तुत करने की कला में माहिर है। यही कारण है कि उनके पाठक दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं यानी उनके माध्यम से व्यंग्य के पाठकों की वृद्धि दिन पर दिन हो रही है। इस महती कार्य के लिए व्यंग्य जगत निश्चित रूप से उनका ऋणी हैं। एक चैनल से ज्यादा वे व्यंग्य पाठक तैयार कर रहे हैं, व्यंग्य के पाठक।
वर्तमान परिवेश में अपनी पुस्तक तो हर कोई पढ़वाना चाहता है, लेकिन स्वयं दूसरे की पुस्तक पढ़कर दो शब्द लिखने की जहमत उठाना पसंद नहीं करता। पुस्तक पसंद आती तो संदर्भ के लिए लाइब्रेरी में सहेज कर रख लेता है। सार्वजनिक रूप से प्रशंसा करने में कोताही बरतता है। वहीं विवेक जी इस कार्य में दक्षता के साथ सारे जहां में उसे पढ़ने के लिए प्रेरित करते दिखाई देते हैं।
विवेक जी केवल व्यंग्य पुस्तकों की बात नहीं करते, वे व्यंग्य आलोचना पर भी सिद्धहस्त हकदार माने जाते हैं। इस पुस्तक मेले (2026) व्यंग्य आलोचना पर श्री राहुल देव की पुस्तक आना थी, आई, डाॅ0 अतुल चतुर्वेदी की पुस्तक आना थी, लेकिन नहीं आ पाई। आ0 श्री सुभाष चन्दर की आलोचना पर पुस्तक आना थी, वह भी नहीं आई। डाॅ0 संजीव कुमार की व्यंग्य आलोचना पर कई पुस्तकें आईं, जिसमें व्यंग्य का इतिहास भी शामिल है-यह पुस्तक तो पढ़ने के बाद ही बता पाएगी कि श्री सुभाष चन्दर के लिखे व्यंग्य साहित्य से इतिहास कितना आगे या फिर…..?
बात विवेक रंजन श्रीवास्तव की- आलोचना पर आई पुस्तक ‘‘व्यंग्यः कल, आज और कल।’’ व्यंग्य के वर्तमान परिदृश्य के अलावा व्यंग्य के अन्य पहलुओं पर चर्चा प्रस्तुत करती है। व्यंग्य को वर्तमान की धरोहर मानने वालों को चुनौती पेश करती है कि व्यंग्य कल भी था आज भी और कल भी रहेगा। बिना उदाहरण के पुस्तक पर बात करना समझदारी नहीं है।
लखन कहा सुनु भृगकुल भूषण।
भट भटेश भय बिभूषण।।
कोटिन कोटि कपि केसरी नंदन।
समर भांति करिहहिं समंदन।।’’
– बालकाण्ड
तीखा व्यंग्य जो लक्ष्मण द्वारा कहा गया। महाभारत काल की बात अक्सर व्यंग्यकार करते पाए जाते हैं, लेकिन इस प्रकार का उदाहरण कदाचित ही प्राप्त होता है। विवेक जी कबीर काल की बात करते हैं, नरेन्द्र कोहली की बात करते हैं। भला परसाई और जोशी के बिना हिन्दी व्यंग्य की कल्पना कैसे की जा सकती है। एक बात अवश्य विचारणीय है कि यह पुस्तक व्यंग्य पाठकों के लिए किसी हीरे से कम नहीं है। व्यंग्यकार, व्यंग्यकारों की बात करते हैं, लेकिन विवेक जी ने नागार्जुन के कवित्त में जो व्यंग्य बसा हुआ है उस पर चर्चा करके अचंम्भित कर दिया है। कविता में व्यंग्य की चर्चा कम ही पाई जाती है।
कुत्ता बैठा कार में, मानव मांगे भीख।
मिस्टर दुर्जन दे रहे, सज्जनमल को सीख।।
विवेक जी व्यंग्य साहित्य में महिला हस्तक्षेप को विस्तार से देखते हैं। आज जिस प्रकार महिलाओं का व्यंग्य क्षेत्र में जबरदस्त पदार्पण देखा जा रहा है, वह व्यंग्य के लिए सुखद पहलु है। नारी दृष्टि की अवलोकन क्षमता मात्र पुरूष पर न हो कर आसपास की विसंगतियों की सूक्ष्म पड़ताल तक जा पहंचती है।
यह तो तय है हिन्दी नाटक में व्यंग्य की वह प्रखर अनुभूति नहीं मिलती जो मराठी नाट्य संसार में देखने को आसानी से मिल जाती है। यह दीगर बात है कि मराठी नाटकों में अधिकांशतः फार्स के माध्यम से बात कही जाती है। बहरहाल हिन्दी नाटकों में व्याप्त व्यंग्य के कुछ चर्चित नामों का भी उल्लेख है।
विवेक रंजन श्रीवास्तव वरिष्ठ व्यंग्यकार होने के साथ-साथ व्यंग्य पाठको को समर्पित करने वाले एक मात्र व्यक्ति हैं। जो व्यंग्य लिखने से लेकर पाठकों तक पहुंचाने तक का श्रेष्ठ कार्य कर रहे हैं।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-
श्री सुनील जैन राही
पालम गांव
मो -9810 960 285
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/ सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “भौंकने का अधिकार…“।)
अभी अभी # ९३२ ⇒ आलेख – भौंकने का अधिकार श्री प्रदीप शर्मा
∆ BARKING RIGHT ∆
दुनिया बनाने वाले ने सभी प्राणियों को कुछ जन्मसिद्ध अधिकार दिये हुए हैं, इनमें बोलना, काटना और भौंकना भी शामिल है। मनुष्य तो खैर, इन सभी में आय एम द सर्वश्रेष्ठ है ही, क्योंकि वह दिमाग की खाता है। केवल उसमें ही नर से नारायण बनने की संभावना निहित है और केवल यही गुण जहां उसके उत्थान का कारण बनता है वहीं यही घमंड उसके पतन के लिए भी उत्तरदायी होता है।
जुबां और दिमाग का धनी यह इंसान इतना चालाक है कि इसने सभी प्राणियों से कुछ न कुछ गुण/अवगुण अपने जीवन में उतार लिए हैं। बिना कारण रात भर जागना, कुत्ते की तरह भौंकना और अपने स्वार्थ के लिए प्रकृति के संसाधनों का सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही इसमें शामिल है।।
बिना कारण सृष्टि के किसी जीव का जन्म नहीं होता। एक फूल के खिलने में जितना हाथ एक तितली का है, उतना ही एक भंवरे का भी। एक मधु मक्खी किसके इशारे पर छत्ते में शहद का निर्माण करती है, कोई नहीं जानता। मुर्गी किससे पूछकर अंडे देती है, गाय भैंस क्यों दूध देती है। एक रेशम का कीड़े से यह बुद्धिमान मनुष्य रेशम तक निकाल लेता है। और शायद इसीलिए वह इस सृष्टि का मालिक भी बन बैठा है।
अब आप एक श्वान को ही ले लीजिए ! उल्लू की तरह वह रात भर जागने के लिए अभिशप्त है। वह बिना वेतन का एक चौकीदार है। चूंकि वह बोल नहीं सकता, अतः पहरेदारी करते वक्त उसे भौंकने का अधिकार मिला है। उसके हाथ में कोई डंडा अथवा बंदूक नहीं, इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए वह किसी को काट भी सकता है।।
आज का नर, जो नारायण भी बन सकता है, कभी वानर ही तो था। आज भी उसकी नकल करने की आदत नहीं गई। सांप की तरह डंसना और कुत्ते की तरह भौंकना भी उसमें शामिल है। हम अगर कुत्ते की भाषा समझते तो शायद उसके भावों को पकड़ पाते। वह हमसे ज़्यादा समझदार है। जैसा आप सिखाओ, सीख ही लेता है। जो इंसान खुद एक बंदर की तरह नाचता फिरता है, वह मदारी बन, पहले सड़कों पर बंदरों का नाच करता है और बाद में पढ़ लिखकर नच बलिए में शामिल हो जाता है।
बंदर से नाचने का और कुत्ते से भौंकने का अधिकार भी आज इंसान ने छीन लिया है। कुत्ता मालिक का हो या सड़क का, जिस तरह भौंकना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है, आज राजनीति में भी भौंकने का अधिकार जितना विपक्ष के पास है उतना ही सत्ता पक्ष के पास भी।।
अंतर सिर्फ इतना है किसी के गले में सत्ता का पट्टा है तो कोई निर्विघ्न सड़क पर घूम रहा है। Have और have nots की लड़ाई हमने इन मूक प्राणियों से सीखी या इन्हें सिखाई यह कहना बड़ा मुश्किल है।
इंसान के साथ रह रहकर श्वान, इंसानों के तौर तरीके सीख गया। एक इशारे पर चुप रहना, दुम हिलाना सीख गया। काश इंसान भी इन मूक प्राणियों से कुछ सीख पाता। अपनी भाषा छोड़ इनकी भाषा में भौंकना न तो राजा को शोभा देता है और न ही प्रजा को। मीठी जुबां दी बोलने को, इसमें जहर कौन घोल गया। मैं देशभक्त, वह देशद्रोही, कानों में यह कौन बोल गया।।
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “होलिका दहन”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २५७ ☆
🌻लघुकथा🌻 🔥 होलिका दहन🔥
मोहल्ले में होलिका रखी गई थी। साज सजावट, डीजे की धुन, आनंद उल्लास, उमंग को बढ़ा रही थी। मस्ती में झूमते सभी नजर आ रहे थे।
फूल बताशामाला, धूप, कच्चा धागा, हल्दी गाँठ लाईलावा, सुखे श्रीफल, मावा की थाली, सजा सभी महिला पुरुष होली पूजन के लिए जाने लगे।
देखते- देखते पूरा प्रांगण भर उठा सृष्टि अभी दो महिने ही हुए थे पति का स्वर्गवास हो गया था। छोड़ गए थे अपने पीछे यौवन से भरपूर सृष्टि और दो मासूम बच्चे।
बच्चों को लेकर वह भी थाल सजा होलिका पूजन में पहुंच गई। अरे यह क्या?? सभी की निगाहें सृष्टि की तरफ – – बातें बनने लगी इशारे इशारों में सभी तानों की फाग छेड़ने लगे।
गाना बज रहा था। माइक पर पंडित जी बैठे शुभ मुहूर्त का समय और होली की पौराणिक कथा बता रहे थे। सृष्टि ने हाथ जोड़ माईक हाथ में ले लिया। बड़े विनम्र भाव से सभी को प्रणाम कर कहने लगी— आप सभी मेरे आत्मिय और मार्गदर्शक है। मुझे बता दे क्या मैं अपने बच्चों के लिए जी नहीं सकती।
यदि आप में से कोई इनका भरण-पोषण भविष्य बनाने के लिए तैयार हैं, तो मैं यहीं पर आज इसी होलिका में अपने आप को दहन कर लूंगी।
परंपरा और रीत जीवंत तो उठेगी। यदि नहीं तो मुझे भी रंगों के साथ जीने दीजिए और बच्चों के लिए दोहरी भूमिका निभाने दीजिए।
पंडित जी ने माइक हाथ में ले, दूसरे हाथ से गुलाल उड़ा होली की शुभ बधाई देने लगे। देखते-देखते सृष्टि की श्वेत साड़ी गुलाबी, लाल हो चली।
बच्चे खूब ताली बजा- बजा कर नाच रहे थे। रूढ़िता, द्वेष, ईर्ष्या, होलिका में दहन हो गई। सृष्टि को जीने का रंग मिल गया।
(श्री राकेश कुमार जी भारतीय स्टेट बैंक से 37 वर्ष सेवा के उपरांत वरिष्ठ अधिकारी के पद पर मुंबई से 2016 में सेवानिवृत। बैंक की सेवा में मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, राजस्थान के विभिन्न शहरों और वहाँ की संस्कृति को करीब से देखने का अवसर मिला। उनके आत्मकथ्य स्वरुप – “संभवतः मेरी रचनाएँ मेरी स्मृतियों और अनुभवों का लेखा जोखा है।” आज प्रस्तुत है आलेख की शृंखला – “देश -परदेश ” की अगली कड़ी।)
☆ आलेख # १६८ ☆ देश-परदेश – च से चाय ☆ श्री राकेश कुमार ☆
चाय की चाहत तो हर समय रहती हैं। मोबाइल के आ जाने से चाहत कुछ कम तो हो गई है, परन्तु चाय अभी भी सबसे पसंदीदा पेय हैं।
चाय के भी अनेक नाम, रंग रूप और स्वाद होते हैं। प्रातः काल खटिया पर पी जाने वाली चाय अंग्रेज हमें “बेड टी” के नाम से छोड़ गए हैं। दूसरा चाय का कप “हैंगओवर ब्रेक टी” के नाम रहता हैं। ब्रेकफास्ट टी के बिना ब्रेकफास्ट अधूरा कहलाता हैं।
11 बजे ऑफिस की पहली चाय के बाद ही सरकारी दफ्तरों में कार्य करने के लिए मानस बनाना आरंभ होता हैं। दोपहर के भोजन पश्चात “नींद भगाओ चाय” के बाद ही सरकारी कर्मचारी अपना आसन ग्रहण करते है। सांय के चार बजे के लिए अंग्रेज़ “इवनिंग टी” का ज्ञान दे कर चले गए थे।
सांय छः बजे पत्नी के हाथ से बनी हुई घर की चाय के साथ हल्का नाश्ता आपकी रात्रि भोजन की मात्रा को कम करने का राम बाण फार्मूला हैं।
चाय के बहुत सारे रंग तो हम सब जानते ही हैं, जिनमें लाल, काली, सफेद चाय यानी शुद्ध दूध में थोड़ी सी पत्ती को उबाल कर पिया जाता हैं। विगत कुछ वर्षों से “हरी चाय” भी हम सब के घरों में अपने पैर जमा चुकी हैं।
कुछ दिन पूर्व एक मित्र ने पूछा नीली चाय पियोगे क्या ? वज़न कम हो जाता हैं। उसके भाव सुनकर ही हमारी जेब का वजन अवश्य कम हो गया हैं। मित्र ने हंसते हुए बोला कोई बात नहीं तुमको “ठंडी चाय” ही पिलाते हैं। आप गलत दिशा में विचार करने लगें है। मित्र ने बिना दूध की चाय को ठंडा कर उसमें बर्फ के कुछ टुकड़े डाल कर “आइस टी” परोस कर इतिश्री कर ली।