हिन्दी साहित्य – साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆ लघुकथा – राहत… ☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

डॉ सत्येंद्र सिंह

(वरिष्ठ साहित्यकार डॉ सत्येंद्र सिंह जी का ई-अभिव्यक्ति में स्वागत। मध्य रेलवे के राजभाषा विभाग में 40 वर्ष राजभाषा हिंदी के शिक्षण, अनुवाद व भारत सरकार की राजभाषा नीति का कार्यान्वयन करते हुए झांसी, जबलपुर, मुंबई, कोल्हापुर सोलापुर घूमते हुए पुणे में वरिष्ठ राजभाषा अधिकारी के पद से 2009 में सेवानिवृत्त। 10 विभागीय पत्रिकाओं का संपादन, एक साझा कहानी संग्रह, दो साझा लघुकथा संग्रह तथा 3 कविता संग्रह प्रकाशित, आकाशवाणी झांसी, जबलपुर, छतरपुर, सांगली व पुणे महाराष्ट्र से रचनाओं का प्रसारण। जबलपुर में वे प्रोफेसर ज्ञानरंजन के साथ प्रगतिशील लेखक संघ से जुड़े रहे और झाँसी में जनवादी लेखक संघ से जुड़े रहे। पुणे में भी कई साहित्यिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं। वे मानवता के प्रति समर्पित चिंतक व लेखक हैं। अप प्रत्येक बुधवार उनके साहित्य को आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – “राहत“।)

☆ साहित्यिक स्तम्भ ☆ सत्येंद्र साहित्य # ७६ ☆

✍ लघुकथा ☆ राहत☆ डॉ सत्येंद्र सिंह ☆

आजकल हाउसिंग सोसायटी हर जगह बनी हुई हैं। एक कालोनी या एक दो बड़ी बिल्डिंग में रहने वाले लोग सोसायटी बना लेते हैं ताकि बिजली पानी सफाई जैसे काम होते रहें और लोग अपना काम निश्चिंत होकर करते रहें। चिंता अगर रहती है तो अपने निजी काम की। सहकारिता की इस भावना की  लोकप्रियता व उपयोगिता को देखते हुए प्रशासन ने भी सोसायटी को मान्यता दी है उसके लिए वियम पर नियम बनाए हैं। उसका रजिस्ट्रेशन वगैरह सब कुछ होता है। सोसायटी अपने सदस्यों और स्थानीय प्रशासन के बीच की कड़ी बन गई है।

गली में कचरा है तो सोसायटी साफ कराएगी। नल में पानी नहीं आ रहा है तो सोसायटी व्यवस्था करेगी। कोई अपने मकान या फ्लैट में कुछ निर्माण करवा रहा है तो उसे सोसायटी देखेगी। पार्किंग व्यवस्था भी यानी जो भी सार्वजनिक काम हो सोसायटी देखेगी। किसी के फ्लैट का पानी दूसरे के फ्लैट में आ रहा है तो सोसायटी देखेगी। वे लोग आपस में बात करके हल नहीं निकाल सकते।

पता नहीं कैसे एक डंफर से एक बड़ा पत्थर सोसायटी के गेट के अंदर गिर गया। पत्थर भारी था। वॉचमैन अकेला उठा नहीं पा रहा था। जो भी आता सोसायटी को कोसता कि सोसायटी कर क्या रही है। कब से पत्थर पड़ा है और सोसायटी सोई हुई है। आते जाते चेयरमैन सेक्रेटरी को बोलते, भाई पत्थर हटवाओ सबको बहुत दिक्कत हो रही है।  सेक्रेटरी बोलता क्रेन नहीं मिल रही है, मिलते ही उठवा देंगे। सभी लोग पत्थर के इधर उधर से भुनभुनाते निकल जाते पर किसी ने उसे हटाने का प्रयास नहीं किया।

सोसायटी में चार पांच युवक थे । ड्यूटी से आने के बाद एक जगह बैठकर गप्पें मारा करते थे। एक ने कहा कि भाई यह पत्थर की दिन से एक ही जगह पड़ा हुआ है। चलो मिल कर उसे रास्ते के किनारे कर देते हैं। उनमें सहमति बनी और चारों पांचों उठे और मिल कर पत्थर को एक ओर खिसका दिया। अब किसी को परेशानी नहीं होगी।

दूसरे दिन लोगों ने पत्थर रास्ते में नहीं देखा तो सोसायटी के चेयरमैन सेक्रेटरी की तारीफ़ करने लगे कि ऐसे काम करना चाहिए और चेयरमैन सेक्रेटरी एक दूसरे का मुंह देखने लगे पर चुप रहे। तीन चार दिन बाद म्युनिसिपेलिटी की गाड़ी आई और पत्थर को उठा ले गई। सभी ने राहत की सांस ली।

© डॉ सत्येंद्र सिंह

एम.ए. विद्यावाचस्पति (मानद)

सम्पर्क : सप्तगिरी सोसायटी, जांभुलवाडी रोड, आंबेगांव खुर्द, पुणे 411046

मोबाइल : 99229 93647

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०७७ ⇒ दूर के रिश्ते ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “दूर के रिश्ते।)

?अभी अभी # १०७७ ⇒ आलेख – दूर के रिश्ते ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

क्या दूर के ढोल की तरह, दूर के रिश्ते भी सुहाने होते हैं ! रिश्ते भी ढोल की तरह ही तो होते हैं, रिश्तों में जीवन है, मिठास है, उत्सव है, परम्परा है। ढोल, रिश्तों को जश्न और धूमधाम से मनाने का ही तो प्रतीक है।

पास के रिश्तों का उत्सव पास के ढोल से ही मनाया जाता है। रिश्ता है तो ढोल है, ढोल है तो रिश्ता है। अगर रिश्ता नहीं, तो ढोल में पोल है।

रिश्तों में दरार आई, बेटा ना रहा बेटा, भाई ना रहा भाई। कोई नई बात नहीं ! पहले कहाँ हिंदू मुस्लिम और भारत पाकिस्तान था, हम ही तो कौरव पांडव भाई भाई थे। भारत में ही महाभारत था। जब भी पास के रिश्तों में फूट पड़ी है, दूर का रिश्ता पास आया है। कोई हमें लूटने बर्बाद करने तो कोई हमारा दिल जीतने। कोई हमारे आँसू पोंछता है तो कोई पीठ में छुरा भोंकता है।।

कोई करीबी इंसान क्यूँ अचानक जिन्दगी से बहुत दूर जाता है और कोई दूर का इंसान कब करीबी बन जाता है, दिल से अधिक यह देश, काल, परिस्थिति पर निर्भर करता है। दिल को ही परिस्थितियों से समझौता करना पड़ता है। परिस्थितियाँ कहाँ दिल की परवाह करती हैं।

दूर पास के रिश्तों में सामंजस्य ही तो खुशहाल जिंदगी का राज है। कभी ढोल के साथ हमें भी सबकी खुशी के लिए नाचना पड़ता है। तब ढोल के साथ कानों में शहनाई की आवाज भी गूंजती है, सबके साथ पांव थिरकने लगते हैं। पास के ढोल, पास के रिश्ते बड़े सुहाने लगते हैं। ।

इंसान पहले परिवार में प्यार तलाशता है। एक हँसते खेलते परिवार में कितना अपनापन लगता है। खुशियां दीवारों, खिड़की दरवाजों में समा नहीं पाती, घर के आसपास भी बिखर जाती हैं। महक रही फुलवारी। रिश्तों की डोर प्रेम से बंधी होती है। उधार की तरह स्वार्थ और नफ़रत भी प्रेम की कैंची है। जब करीबी रिश्तों में खटास आ जाती है तो दूर के रिश्ते तलाशे जाते हैं। जो दिल के करीब होता है, वही अपना कहलाता है।

इसी बीच रिश्तों की किताब में एक पन्ना और जुड़ गया जिसे फेसबुक नाम दिया गया। दूर के लोगों में कुछ करीबी नजर आने लगे। अचानक नए नए रिश्ते दस्तक देने लगे। मित्रता का संसार इतना वृहद भी हो सकता है, कभी कल्पना नहीं की थी।।

क्या पुस्तक खोलने से रिश्ते भी खुलते हैं, दूर के रिश्ते पास आने लगते हैं, दूर के ढोल सुहाने लगने लगते हैं। जिसे आभासी संसार नाम दिया गया है, वह क्या हमारी दिनचर्या का अंग नहीं बन गया है। कुछ आभासी रिश्ते तो परिवार में घुल मिल भी गए हैं। कौन कहता है, दूर के ढोल ही सुहाने होते हैं। जब इन रिश्तों की आवाज़ करीब आती है तो ये कानों में ही नहीं, मकानों में भी घुल मिल जाते हैं।

प्रेम एक ऐसा बंधन है, अगर निःस्वार्थ हो, तो मुक्त करता है।

सहमति, असहमति से परे होती है सच्ची दोस्ती, सच्चा प्यार, सच्चा रिश्ता। शर्तों पर नहीं निभाए जाते रिश्ते ! रिश्ते कभी अनफ्रेंड नहीं किए जाते, ब्लॉक नहीं किए जाते, बस निभाए जाते हैं। जब दूर के रिश्ते फेसबुक के जरिए पास आ सकते हैं, तो करीबी रिश्ते तो पहले से ही इतने करीब हैं। फिर रिश्तों के बारे में हम क्यों गरीब हैं। रिश्ते सुहाने हैं, ढोल सुहाने हैं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कथा कहानी ☆ लघुकथा # १२६ – दोष किसका? ☆ श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ ☆

श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – दोष किसका?)

☆ लघुकथा # १२६ – दोष किसका? श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

लगातार हो रही मूसलाधार बारिश से शहर की सड़कें तालाब में बदल गई थीं। नालियाँ कूड़े से अटी पड़ी थीं और गंदा पानी घरों में घुसने लगा था। शर्मा जी छतरी लेकर दरवाजे पर खड़े बड़बड़ा रहे थे।

“बस करो बारिश! आखिर कितना सताओगी? पूरा शहर डुबोकर ही मानोगी क्या?”

सामने से गुजर रहे वर्मा जी ठिठक गए।

“शर्मा जी, बारिश को क्यों कोस रहे हैं?”

“क्यों न कोसूँ? देख नहीं रहे, सड़क पर कमर तक पानी है। घर में रखा सामान खराब हो रहा है। बच्चे बाहर नहीं निकल पा रहे। यह बारिश नहीं, आफत है आफत!”

वर्मा जी मुस्कराए, “बारिश आफत नहीं, प्रकृति का वरदान है।”

“वाह! आपके घर में पानी नहीं घुसा, इसलिए वरदान लग रही है।”

“मेरे घर में भी पानी घुसा है, लेकिन दोष बारिश का नहीं है।”

“तो किसका है? बादलों का?”

“नहीं, हमारी व्यवस्था का और हमारी लापरवाही का।”

शर्मा जी तुनककर बोले, “अब इसमें हमारी क्या गलती?”

वर्मा जी ने सड़क की ओर इशारा किया। नाली के मुहाने पर प्लास्टिक की थैलियाँ, बोतलें और कूड़े का ढेर जमा था।

“यह देखिए। नाली किसने बंद की?”

शर्मा जी चुप रहे।

“बारिश ने?”

शर्मा जी ने मुँह फेर लिया।

वर्मा जी फिर बोले, “नालियाँ समय पर साफ नहीं होंगी, कचरा नालियों में फेंका जाएगा, प्राकृतिक जल निकासी के रास्तों पर अतिक्रमण होगा और फिर हम बारिश को दोष देंगे—यह कहाँ का न्याय है?”

शर्मा जी कुछ नरम पड़े।

“लेकिन नगर निगम की भी तो जिम्मेदारी है।”

“बिल्कुल है। जल निकासी की समुचित व्यवस्था करना, नालियों की नियमित सफाई करना और जलभराव वाले क्षेत्रों का स्थायी समाधान करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन शहर को साफ रखना नागरिकों का भी कर्तव्य है।”

अचानक नाली से निकला गंदा पानी सड़क पर फैलता हुआ शर्मा जी के दरवाजे तक आ पहुँचा।

वे घबराकर बोले, “अरे! मेरा सामान अंदर रखा है।”

वर्मा जी ने उनकी मदद करते हुए कहा, “यही पानी अगर सही रास्ते से निकल जाए तो मुसीबत नहीं, उपयोगी संसाधन है।”

शर्मा जी ने आश्चर्य से पूछा, “तो बारिश को दोष देना बंद कर दें?”

“बारिश को नहीं, अपनी सोच और व्यवस्था को सुधारिए।”

कुछ क्षण दोनों चुप रहे।

शर्मा जी ने सामने जमा कूड़े को देखा। फिर बोले, “कल मोहल्ले की बैठक बुलाएँगे। नालियों की सफाई के लिए नगर निगम में शिकायत करेंगे और लोगों को भी समझाएँगे कि कचरा नालियों में न डालें।”

वर्मा जी मुस्कराए, “अब बात बनी।”

आसमान से बारिश अब भी बरस रही थी। शर्मा जी ने पहली बार उसे शिकायत भरी नजरों से नहीं, बल्कि समझदारी भरी नजरों से देखा।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – मराठी कविता ☆ कवितेच्या प्रदेशात # ३२७ ☆ पाऊस… ☆ प्रभा सोनवणे ☆

प्रभा सोनवणे

? कवितेच्या प्रदेशात # ३२७ ?

पाऊस ☆  प्रभा सोनवणे ☆

खिडकीतून बाहेरचा पाऊस पहाताना,

पुन्हा आठवले ते झिम्माड दिवस ,

शाळेतले!

 

आणि ती रंगीबेरंगी छत्री—

छोटी पावलं..लाल बूट!

त्या त्या वयातला पाऊस !!

 

सत्तर पावसाळे पाहिल्यानंतरही…

 

पाऊस तरूणच!

आपण म्हातारे होत जातो….

म्हणूनच खिडकीतून दिसणारा

पाऊस….

शिंपडून घेतला आत्ताच मनावर!

किती ताजं टवटवीत झालं मन!

 

छोटी छत्री डोक्यावर घेऊन,

पावसाच्या पाण्यात सोडलेल्या–

कागदी नावेसारखं !!!

© प्रभा सोनवणे

संपर्क – “सोनवणे हाऊस”, ३४८ सोमवार

पेठ, पंधरा ऑगस्ट चौक, विश्वेश्वर बँकेसमोर, पुणे 411011

मोबाईल-९२७०७२९५०३,  email- sonawane.prabha@gmail.com

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) –  उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ पानगळ… ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

श्री अनिल वामोरकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ पानगळ☆ श्री अनिल वामोरकर ☆

गळू गळू दे

शंकेची, भ्रमाची

कुविचारांची वाळकी पाने,

गळू दे, गळू दे…

 

वृथा अहंची,

व्यष्टीची आणि

ईर्षेची पाने

गळू दे गळू दे…

 

लक्ष योनी नंतर

कर्मानुसार

प्राप्त हा देह वृक्ष

याला सत विचारांची,

नवी पालवी फुटू दे..

 

सद्गुरू कृपे

फुटतील नवी

ज्ञान पालवी

होईल वटवृक्ष

साऊली देई साऊली देई…

© श्री अनिल वामोरकर

अमरावती

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – काव्यानंद ☆ “उचलला हारा..” – कवयित्री : बहिणाबाई चौधरी – रसग्रहण : अनंत गद्रे ☆ प्रस्तुती – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆

श्री सुहास रघुनाथ पंडित

? काव्यानंद ?

☆ “उचलला हारा..” – कवयित्री : बहिणाबाई चौधरी – रसग्रहण : अनंत गद्रे ☆ प्रस्तुती – श्री सुहास रघुनाथ पंडित ☆


उचलला हारा… बहिणाबाईंची कविता

उचलला हारा, हारखलं मन भारी ।

निजला हार्‍यात, तान्हा माझा शिरीहारी ।।

डोईवर हारा, वाट मयाची धरली ।

भंवयाचा मया, आंब्याखाले उतरली ।।

 *

उतारला हारा, हालकलं माझं मन ।

निजला हार्‍यात, माझा तानका ‘सोपान’ ।।

 *

लागली कामाले, उसामधी धरे बारे ।

उसाच्या पानाचे, हातीपायी लागे चरे ।।

 *

ऐकूं ये आरायी, धांवा धांवा घात झाला ।

अरे, धांवा लव्हकरी, आंब्याखाले नाग आला ।।

 *

तठे धांवत धांवत, आली उभी धांववर ।

काय घडे आवगत, कायजांत चरचर ।।

 *

फना उभारत नाग, व्हता त्याच्यामधीं दंग ।

हारा उपडा पाडूनी, तान्हं खेये नागासंगं ।।

 *

हात जोडते नागोबा माझं वांचव रे तान्हं ।

अरे, नको देऊं डंख, तुले शंकराची आन ।।

 *

आतां वाजव वाजव, बालकिस्ना तुझा पोवा ।

सांग सांग नागोबाले, माझा आयकरे धांवा ।।

 *

तेवढ्यांत नाल्याकडे, ढोरक्याचा पोवा वाजे ।

त्याच्या सूराच्या रोखानं, नाग गेला वजेवजे ।।

 *

तव्हां आली आंब्याखाले, उचललं तानक्याले ।

फुकीसनी दोन्हीं कान, मुके कितीक घेतले ।।

 *

देव माझा रे नागोबा, नही तान्ह्याले चावला ।

सोता व्हयीसनी तान्हा, माझ्या तान्ह्याशीं खेयला ।।

 *

कधीं भेटशीन तव्हां, व्हतील रे भेटी गांठी ।

येत्या नागपंचमीले, आणीन दुधाची वाटी ।।

………

कवितेतल्या मोजक्या काही ओळीत किती सहजपणे एक थरारक प्रसंग उभा केला आहे बहिणाबाईंनी!

यातले काही शब्द भुरळ घालणारे आहेत.

प्रसंगाचे कथन असल्याने व कवितेत सांगायचा आहे म्हटल्यावर जिथून या प्रसंगास सुरवात झाली त्यानेच कवितेची देखील.

‘उचलला हारा’…

डोक्यावरच्या हाऱ्यात बाळ झोपलाय. म्हणून ‘शिरीहारी’. श्रीहरी नाही. किती गोड वाटते ते ऐकायला. अन कविता गातांना मिटर चुकला असते बहुतेक.

अन वाट मयाची धरल्ये. मयाची…म्हणजे मळ्याची.

आंब्याखाली हारा ठेवला. मनात कालवाकालव झाली. त्या बाळाला तसे तिथे एकट्याला सोडून उसाच्या फडात कामाला जातांना.

काम करतांना उसाची धारदार पाती हातापायास चरे पाडत होती.

आणि इतक्यात..

इतक्यात मोठ्या आवाजात ‘आरायी’ म्हणजे आरोळी ऐकू आली “धावा रे धावा! आंब्या खाली नाग निघालाय”

आंब्याखाली नागोबा?????

हे ऐकताच चर्र झाले. अरे देवा हे काय घडतंय. धावंतच पोहोचले आंब्याशी. पहाते तर काय? हारा पालथा पाडून बाळ व नागोबा दोघेही दंग आहेत खेळण्यात! तान्हं खेये नागासंग. अरे बापरे!

 

हात जोडले नागोबाला. शपथ घातली त्याला. तुला शंकराची शप्पथ आहे नागोबा. डंख नको मारू माझ्या सोपानाला.

आणि धावा केला त्या ‘बालकिसना’चा, बाळकृष्णाचा. अरे वाजव तुझा पावा, अन बोलाव त्या नागाला तुझ्याकडे. ऐक रे माझे, वाजव तुझा पावा.

आणि हे मी बोलत्ये तोच…

नाल्यापलिकडून ‘ढोरक्याचा’, म्हणजे गुराख्याच्या बासरीचे सुर ऐकू येवू लागले. आणि मग त्या सुरांच्या जादूने त्या रोखाने नाग निघून गेला.

 

तो निघून जाताच मी धावले आंब्याकडे. तान्ह्याला उचलून घेतले. कवटाळले. कानांत त्याच्या फुंकरले. आणि चटचट मुके घेतले त्याचे.

“नागोबा! मी आजूबाजूस नव्हते. तू त्याला डसला नाहीस. देवच रे बाबा तू. स्वतः तान्हा झालास व माझ्या या तान्ह्यास खेळवलेस.

नागोबा.  होत राहील आपली भेट. आणि हो, येणाऱ्या नागपंचमीला तुझ्याकरता दुधाची वाटी मी येईन घेऊन!”

 

रसास्वाद : अनंत गद्रे

प्रस्तुती – श्री सुहास रघुनाथ पंडित

सांगली 

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ खिडकीतून दिसणारे पक्षीजग ☆ शालिनी जोशी ☆

शालिनी जोशी

? विविधा ?

☆ खिडकीतून दिसणारे पक्षीजग ☆ शालिनी जोशी

आमच्या घराच्या शेजारच्या घरात आंबा आणि चिकू यांची मोठी झाडे आहेत. दोन्ही जवळ जवळ असल्याने एकमेकात मिसळून गेली आहेत. दोन्ही झाडे कायम हिरवीगार असतात. चिकू तर जास्तच, त्याची पानगळ कधी होते आणि नवीन पालवी कधी येते कळतच नाही. सहाजिकच असा वृक्षसंभार म्हणजे पक्षांचे आणि छोट्या सरपटणाऱ्या प्राण्यांचे निवासस्थान. आमच्या घराची खिडकी समोरच येते. त्यामुळे त्यांचे निरीक्षण करणे हा माझा छंद.

बरेच पक्षी झाडांना भेट देतात. कधी भारद्वाज आपल्या भारदस्त आवाजात साद घालतो. मला तो शाल पांगरलेल्या प्रौढ राजासारखा वाटतो. त्याच्या पाठीचा मखमली तांबूस रंग त्याला शोभून दिसतो. पांढऱ्या ठिपक्यांची साडी नेसलेली कोकिळा. आपल्या कर्कश आवाजात काळ्याभोर रंगाच्या, लाल डोळ्यांच्या, मंजुळ आवाजाच्या कोकिळाला साथ घालत असते. छोट्या सनबर्डची पळापळ  अखंड सुरू असते. बारीकशी पिवळी चोच असणारी साळुंकी दबक्या पावलांनी वावरत असते. खारुताई खालीवर अखंड धावत असते. या झाडावरून त्या झाडावर उडी मारणे हा तिचा आवडता छंद. शेपटीच्या हलण्यावर आवाज करते, का आवाजाच्या तालावर शेपटी हरवते ते कळत नाही. मात्र दोन्ही क्रिया अखंड आणि एकदमच सुरू असतात, एवढे मात्र खरे. एक दोनदा दुर्मिळ शिक्रा व चष्मेवाला यांनीही दर्शन दिले. टिट, रॉबिन, पोपट, कावळा ही अधून मधून असतात. बुलबुलांचा बुलबुलाट अखंड सुरू असतो. तो विविध आवाजात ओरडतो. म्हणून मी त्याच्या ओरडण्याला बुलबुलाट म्हणते. एकदा आमच्या घराच्या खिडकीच्या ग्रीलवर त्याने घरटे केले. काड्या काड्याजमवून गोल वाटी तयार झाली. एक दिवस पाहिले तर जोडी ग्रील वर बसलेली. अंडी कधी घालतील याची आम्ही वाट पाहत होतो. पण कोणीच फिरकले नाही. घरटे खाली लोंबताना दिसले. बहुतेक महाराणींच्या पसंतीस महाल उतरला नाही. काय करणार. पण या पक्षाचे वैशिष्ट्य म्हणजे याच्या डोक्यावर टोपी असते. तपकिरी काळ्या रंगाचा, पांढरे पोट, रुंद चोच असलेला हा पक्षी गालावर दोन बाजूला लाल भडक रंगाचे डाग मिळवतो. शेपटीखालीही तसाच मोठा लाल टिपका असतो. समोरून पाहिला तर काळ्या शेंडीचा पांढर्या दाढीचा साधूच तो वाटतो. सगळे पक्षी मिळून काही वेळेला इतका कलकलाट करतात की पक्षांची शाळा भरली असावी.

या सर्वांपेक्षा माझे लक्ष वेधले ते नाचण किंवा नाचरा यानी(fantail). चिमणी सारखा छोटासा पक्षी, दहा-बारा सेंटीमीटर लांब, छोटीशी चपटी चोच आणि मातकट रंग. रंगाचे कोणतेही सौंदर्य नाही. पण एका जागेवर थांबली की शेपटीचा पिसारा फुलवते, तो पाहत राहावा. या पक्षाला स्थिरता नाही. अखंड पिसारा फुलवीत नाचत असतो. त्यामुळे नाव नाचण. मोराचे नृत्य भारदस्त व सौंदर्यवती नर्तकीच्या  नृत्याची आठवण करून देते. तर नाचण तुरू तुरू चालणारी बारीक अशी छोटी बालिका. अखंड उत्साहाचा झराच. आता इथे दुसऱ्या क्षणी तेथे पसारा फुलवून तयार. या फुलवलेल्या पिसार्याची नागमोडी किनार त्याची शोभा वाढवते. मला उत्साह देणारी ही नाचण. अखंड घरात बसणारी मी. पण नाचण मला अखंड काहीतरी करायची उमेद देते. त्यामुळे मी काहीतरी लिहीत, वाचत राहते. म्हणूनच मला कार्य प्रवण करणाऱ्या या नाचणचे कौतुक.

 

©  शालिनी जोशी

संपर्क – फ्लेट न .3 .राधाप्रिया  टेरेसेस, समर्थपथ, प्रतिज्ञा मंगल कार्यालयाजवळ, कर्वेनगर, पुणे, 411052.

मोबाईल नं.—9850909383

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ अध्यात्म…- भाग २ ☆ श्री प्रदीप केळुस्कर ☆

श्री प्रदीप केळुस्कर 

?जीवनरंग ?

☆ अध्यात्म… – भाग २ ☆ श्री प्रदीप केळुस्कर 

(तिने तेल तापवायला घेतले. मी तिला म्हंटले..

‘संध्या.. मी पुऱ्या लाटून देते. तू तळून घे.

मी पुऱ्या लाटता लाटता तिच्याशी बोलू लागले..) 

इथून पुढे – – – 

‘संध्या.. आम्ही म्हणजे माझा मुलगा, सुन आणि मी सात वर्षांपूर्वी या जागेत राहायला आलो, माझा मुलगा आणि सुन नोकरीला जातात.. म्हणजे सकाळी नऊला बाहेर पडतात.. मग मी ग्यालरीत बसते.. आता तुमची ही बिल्डिंग झाली त्या ठिकाणी रिकामी जागा होती.. गुलमोहराची आणि आंब्याची झाडें होती..

‘मग ती झाडें तोडली की काय?

‘झाडें तोडूनच हा प्लॉट तयार केला.. मग मोजमाप सुरु झाले.. खड्डे पडले पाठोपाठ विटा, वाळू, लोखंड, सळी घेऊन ट्रक्स धावू लागले आणि कामगार पण पोचले. पुरुष आणि स्त्रिया… खड्ड्यात दगड, वाळू, सिमेंट घालू लागले. मग एका कामगारासाठी पाल उभे राहिले. बाकी कामगार जाऊन येऊन असायचे पण एक जोडी याच पालात राहू लागली.. कदाचित ते वाचमन असतील. त्यांची दोन मुले.. एक चार वर्षांची मुलगी आणि एक पाळण्यातील मुलगा. ती बाई त्या मुलाला झोळीत घालून काम करत असे. तिची मोठी मुलगी त्या आपल्या भावाला झोक देत असे, त्याच्या तोंडात पेजपाणी घालत असे. ती बाई दुपारी आली की त्या बाळाला पाजत असे.. मग संध्याकाळी आली की भाकऱ्या बडवत असे.. मग कालवण करून सगळी शांत झोपत.

‘मग तिचा नवरा? तो दारू पिऊन तिला मारत असे काय?

‘नाही.. तिचा नवरा कमालीचा देवभक्त होता.. तो संध्याकाळी भजने म्हणायचा.. मुलांना खेळवायचा..

‘म्हणजे काकू.. एकांदरीत ते गरीब, झोपड्यात रहाणारे पण समाधानी कुटुंब होते तर..?

‘होय.. खरेच.. मी देवळात जातानायेताना ती मुले दिसायची.. मी त्यांच्यासाथी खाऊ न्यायचे.. छोटया मुलाला बाहुल्या, खेळणी द्यायचे..

आणि एक दिवस ढग दाटून आले.. जोराचा वारा आणि पाऊस सुरु झाला, धुलीचे लोट जाऊ लागले, अनेक ठिकाणची झाडें पडली, त्यात त्या जोडप्याच्या पालावरील छप्पर उडून गेले.. संसार उघडा पडला..

‘अरे बापरे.. मग?

‘माझ्यासकट या बिल्डिंगमधील लोक धावली.. मी त्या सर्वाना माझ्या घरात घेऊन आले. चहापाणी दिले.

‘मग?

‘रात्रीपर्यत या बिल्डिंगचा बिल्डर आणि त्याची माणसे आली आणि त्यांनी त्या कुटुंबाची व्यवस्था त्यांच्या तोपर्यंत बांधून ठेवलेल्या जागेत केली.. म्हणजेच आज तुम्ही रहात आहात त्या जागेत केली..

‘काय? या आमच्या जागेत?

‘तेंव्हा ही तुमची जागा नव्हती आणि व्यवस्थित पण केलेली नव्हती, फक्त चार बाजूला विटा लावलेल्या होत्या.. खाली टाईल्स नव्हते, भिंतीना रंग नव्हता फक्त एक नळ जोडून दिला होता.

‘मग या जागेत ती मंडळी राहिली?

‘होय.. आता ती जोडी आणि त्यांची मुले मला अगदी जवळ आली.. त्या बाईचे नाव मुक्ता आणि त्याचे सदाशिव. मी ग्यालरीत बसले की त्यांचा संसार दिसायचा. मी मुक्ताला म्हंटले..

‘या मोठया पोरीला शाळेत घाल.. शिकेल ती..

‘साळेत घातलं तर बाबूला कोन बगणार… ती बघते म्हणूं मी कामावर जात्ये..

‘मग तू घरी आलीस की तिला माझ्याकडे पाठव.. मी घेईन तिचा अभ्यास..

‘ह्ये झाक हुईल..

असं म्हणून ती तिच्या मोठया मुलीला माझ्याकडे पाठवू लागली. मला पण जाग झाली.. मी तिला मुळाक्षरे, आकडे शिकवू लागले आणि ती पण शिकू लागली. पण त्याच दरम्याने मुक्ताचे पोट दिसायला लागले आणि त्या मुलीचे येणे अनियमित होऊ लागले आणि मुक्ताला मुलगी झाली.. मग मात्र आईचे करायला ती घरी राहू लागली. सातआठ दिवसांनी मुक्ता कामावर जायला लागली.. आणि आपल्या दोन्ही भावंडाना सांभाळायला ती मुलगी घरीच थांबली.

‘अरेरे.. मुलीचे शिक्षण थांबले म्हणायचे..

‘होय.. थांबले ते थांबलेच म्हणायचे.. पुढे ती शाळेत जाते की नाही की आईसारखी अशिक्षित राहते कोण जाणे?

‘मग कुठे आहेत आता मुक्ता आणि तिचा नवरा.. मुले?

तिसरे मूल सहा महिन्याचे होत आले तोपर्यंत या बिल्डिंगचे काम पुरे होत आले.. रंग लाऊन बिल्डिंग पुरी झाली.. तुमच्यासारखे लोक घर पहायला येऊ लागली.. आणि एक दिवस..

‘एक दिवस काय काकू?

‘एक दिवस मी नेहेमीप्रमाणे माझ्या ग्यालरीत बसले होते तर याच जागेतून मुक्ता आणि सदा ची बांधाबांध दिसून आली.. त्याचे सामान ते केव्हडे.. पण चार भांडी.. चिरंगुट.. लाकडे.. स्टोव्ह.. सगळे कापडात बांधलेली.. मला कळेना कुठ जातात ही? मी हाक मारुंन सदाला विचारलं..

‘सदाभाऊ.. कुठ बाहेर जाताय काय?

‘भायर कुठलं.. आता मालकांनी नवीन बांधायला घेतलं नव्ह.. तिथं जायचं..

माझा जीव कासावीस झाला.. गेली चार वर्षे या दोघांना आणि त्यान्च्या तीन मुलांना पहायची सवय.. तीनही मुले माझ्या डोळ्यसमोर मोठी झालेली..

‘मग आता परत येथे नाही येणार?

एव्हड्यात मुक्ता धाकट्या मुलीला कंबरेवर घेऊन आली. माझ्याकडे पाहून हलकेसे हसली.. थोरली एक पिशवी घेऊन चालायला लागली.. बाबूला सदाने खांदयावर घेतले आणि दोन हातात दोन पोती घेऊन चालायला लागला. मला वाटलेले निदान मुक्ताला तरी हे घर सोडताना जड वाटेल.. पण ती पण छोटीला कमरेवर आणि हातात लाकडाची मोळी, दुसऱ्या हातात एक पोत घेऊन नवऱ्याच्या मागोमाग चालायला लागली..

‘काय.. काकू.. रोज तुम्ही त्यांच्याशी बोलायचा.. त्याना जुने कपडे दयायचा..

मोठीचा अभ्यास घयायचा.. वाऱ्याने त्त्यांचे छप्पर उडाले तेंव्हा त्याना घरात घेतलेत तुम्ही.. तरीसुद्धा..

‘कशातही मन अडकवायचं नाही.. कसलेली पाश गुंडाळून घ्यायचे नाही यालाच जर अध्यात्म म्हणत असतील तर सदा आणि मुक्ताजोडीने मला ते शिकवले.. ज्या घरात म्हणजे संध्या आज तू ज्या घरात राहतेस, त्या घरात तीन वर्षे राहून त्या घराचा लोभ तिला झाला नाही.. मागे वळूनही न पहाता ती मुलांना घेऊन बाहेर पडली.

‘पण तुम्हाला कधी परत भेटतील का ती?

‘नाही भेटणार.. ती कदाचित मला आणि या बिल्डिंगला विसरून पण गेली असतील.. रोजचे काम हेच त्त्यांचे आयुष्य. मघा तू म्हणालीस संध्या.. दोन जागा सोडून तू या जागेत आलीस.. तुला ही तरी जागा लाभावी.. म्हणून. मी तुला खात्रीने सांगते.. ज्या जागेत सदा आणि मुक्ता.. त्यांची तीन मुले.. आनंदाने राहिली.. कसलीही अभिलाषा न ठेवता.. ती जागा तुला लाभणारच.. आजपर्यंत कधीही न मिळालेले सुख आणि समाधान या जागेत तुला मिळणारच..

पुऱ्या तळता तळता संध्या थांबली आणि तिने मला घट्ट मिठी मारली.

समाप्त –

© श्री प्रदीप रामदास केळुस्कर

मोबा. ९४२२३८१२९९ / ९३०७५२११५२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित / मंजुषा मुळे/ गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ “काल देव पुन्हा भेटला.. ” – लेखक : श्री सुबोध गाडगीळ ☆ प्रस्तुती – मंजुषा सुनीत मुळे ☆

मंजुषा सुनीत मुळे

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☆ “काल देव पुन्हा भेटला.. ” – लेखक : श्री सुबोध गाडगीळ  ☆ प्रस्तुती – मंजुषा सुनीत मुळे ☆

मी म्हटलं, “हल्ली जरा जास्तच भेटतोयस. ”

“तुझं वय बघता networking वाढवून ठेवलेलं बरं, ” तो म्हणाला.

“काहीतरीच काय! ”

“मग तूच सांग. तुमच्याकडे पन्नाशीच्या पुढे डॉक्टर, CA आणि देव या तिघांशी संबंध चांगले ठेवायला सुरुवात होते की नाही? ”

मी हसलो.

देव आज चांगल्या mood मध्ये दिसत होता.

मी सहज विचारलं, “एक सांग. माझ्या आयुष्याचा हिशोब तुझ्याकडे असतो का? ”

“असतो. ”

“सगळा? ”

“सगळा. ”

“म्हणजे मी काय कमावलं, काय खर्च केलं, कुठे गेलो, काय केलं…? ”

“नाही रे. एवढा फालतू data ठेवायला माझ्याकडे server space नाही. ”

मी चमकलो.

“मग कसला हिशोब? ”

तो काही बोलला नाही.

मीच पुढे म्हणालो, “मला वाटलं असेल काहीतरी मोठं account. पुण्य किती, पाप किती… शेवटी net balance. ”

“तुम्ही माणसं ना, मला फार कमी लेखता. मला CA समजता की चित्रगुप्ताचा junior? ”

“मग काय नोंदवतोस? ”

“उदाहरण देतो. परवा तू एका माणसाला फोन केला होतास. ”

“कुठल्या? ”

“ज्याच्याकडून तुला काही काम नव्हतं. ”

मी आठवायचा प्रयत्न केला.

“अच्छा! सहज केला होता. ”

“माझ्याकडे तो सहज नव्हता. ”

“म्हणजे? ”

“त्याचा दिवस खराब गेला होता. तुझ्या दहा मिनिटांच्या फोनने जरा बरा झाला. ”

मी काही बोललो नाही.

“आणखी एक. काही दिवसांपूर्वी घरी सगळे बसले होते आणि तुम्ही कसल्यातरी फालतू विषयावर पोट धरून हसलात. ”

“त्याचीही entry? ”

“मोठी. ”

“आणि मी केलेली महत्त्वाची कामं? ”

“कुठली? ”

“इतकी वर्षं काम केलं, व्यवसाय उभा केला, पैसे कमावले, जबाबदाऱ्या पार पाडल्या… ”

देवाने माझ्याकडे विचित्र नजरेने पाहिलं.

“त्यासाठी तुला पैसे मिळाले ना? ”

“हो. ”

“मग त्याचं credit पुन्हा माझ्याकडे कशाला मागतोयस? ”

हा मुद्दा मला आवडला नाही.

“म्हणजे achievements ना काही किंमतच नाही? ”

“आहे ना. भरपूर आहे. पण गंमत अशी आहे की तुम्ही ज्या गोष्टींचा हिशोब आयुष्यभर ठेवता, त्यांचा मला फारसा ठेवावा लागत नाही. आणि ज्या गोष्टी तुम्ही कुठेच नोंदवत नाही, त्या मला जपून ठेवाव्या लागतात. ”

आता मी शांत झालो.

“उदाहरणार्थ? ”

“तुझ्यामुळे कोणाचा अपमान टळला. कोणाला गरज असताना तू थांबलास. कोणाचं पूर्ण ऐकून घेतलंस. स्वतः बरोबर असूनही एखादा वाद वाढवला नाहीस. कुणाच्या आनंदात मनापासून आनंदी झालास. एखाद्या माणसाला त्याच्या कठीण काळात ‘मी आहे’ एवढंच सांगितलंस. ”

मी म्हणालो, “पण यापैकी बरंचसं मला स्वतःलाही आठवत नसेल. ”

“म्हणून तर मी लिहून ठेवतो! ”

त्याच्या चेहऱ्यावर पुन्हा तेच खोडकर हसू आलं.

मला अचानक एक शंका आली.

“पण मग चुका? त्या पण लिहितोस? ”

“नक्की. ”

“किती आहेत? ”

“तुला उद्या काही काम नाही ना? ”

“एवढ्या? ”

“अरे, मी देव आहे. जादूगार नाही. ”

मी हसलो.

थोड्या वेळाने विचारलं,

“मग शेवटी माझ्या खात्यात काय उरेल? ”

तो म्हणाला,

“हीच तुमची अडचण आहे. प्रत्येक नातं, प्रत्येक काम, अगदी आयुष्यसुद्धा तुम्हाला शेवटी profit की loss एवढ्यात काढायचं असतं. ”

“मग हिशोब कशासाठी? ”

देव काही क्षण शांत राहिला.

“हिशोब तुला न्यायला नाही रे. तुला कधीतरी दाखवायला. ”

“काय? ”

“तू आयुष्यभर ज्या गोष्टींना मोठं समजत होतास, त्यातल्या बऱ्याच गोष्टी किती लहान होत्या आणि ज्या क्षणांना ‘यात काय विशेष? ’ म्हणून विसरून गेलास, तेच प्रत्यक्षात किती मोठे होते. ”

तो उठून निघाला. मी मागून विचारलं,

“मग आत्तापासून काय करू? ”

त्याने मागे न बघताच उत्तर दिलं,

…. “काही वेगळं करू नकोस. नाहीतर उद्यापासून प्रत्येकाला मदत करून मनात म्हणशील — ‘देवा, entry केलीस ना? ’”

मी जोरात हसलो.

तो थोडा पुढे गेला आणि थांबला.

“फक्त एक गोष्ट कर. ”

“काय? ”

“तुझ्या आयुष्यात ज्या गोष्टींची पावती मिळत नाही, त्यांना कमी किंमत देऊ नकोस. ”

आणि तो निघून गेला.

आपल्याला पगाराची slip मिळते. Investment चं statement मिळतं. धावण्याला वेळ मिळतो. कामाला appraisal मिळतं. घराला market value मिळते. Social media वर likes मिळतात.

म्हणून त्या गोष्टी खऱ्या वाटतात.

पण आईबरोबर निवांत बसलेली दहा मिनिटं, जुन्या मित्राचा विनाकारण आलेला फोन, मुलांबरोबर झालेलं फालतू हसणं, कोणीतरी अडचणीत असताना आपण न बोलता त्याच्या बाजूला उभं राहणं, यापैकी कशाचीही receipt मिळत नाही.

त्यामुळे बहुधा आपण त्यांचा हिशोबच ठेवत नाही आणि कदाचित आयुष्याची सगळ्यात मोठी गंमत हीच आहे, ज्याचा आपण काटेकोर हिशोब ठेवतो, ते शेवटी इथेच राहून जातं.

आणि ज्याचा कधी हिशोबच ठेवला नाही, तेच बहुधा आपल्याबरोबर येतं.

लेखक : श्री सुबोध गाडगीळ

प्रस्तुती – मंजुषा सुनीत मुळे

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – श्रीमती उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ वाळवंटातील हिरवळ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

श्री विश्वास देशपांडे

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☆ वाळवंटातील हिरवळ ☆ श्री विश्वास देशपांडे ☆

बऱ्याच ठिकाणी लग्नानंतर स्वागत समारंभाचे आयोजन केले जाते. हल्ली त्यासाठी ‘ रिसेप्शन ‘हा इंग्रजी शब्द मोठ्या प्रमाणावर प्रचलित आहे. कधी कोणाचा गौरव सोहळा असतो तर कधी कोणाची एकसष्ठी किंवा एकाहत्तरी किंवा सहस्रचंद्र दर्शनाचा कार्यक्रम अशा विविध कारणांनी असे कार्यक्रम आयोजित केले जातात. अशा कार्यक्रमांना आपण हजेरी लावतो. कार्यक्रम पत्रिकेत उपस्थित राहून आपण कार्यक्रमाची शोभा वाढवावी आणि स्नेहभोजनाचा लाभ घ्यावा असे आवाहन केलेले असते. हे स्नेहभोजन म्हणजे बऱ्याच वेळा बुफे असते.

‘ कार्यक्रमास उपस्थित राहून शोभा वाढवावी ‘ असे आवाहन केलेले असल्यामुळे सर्वजण उत्तम प्रकारचा पोशाख घालून अंगावर सुगंधी द्रव्य फवारून अशा कार्यक्रमांना जाऊन खरोखरीच त्यांची शोभा वाढवत असतात. बऱ्याच वेळेला असे कार्यक्रम म्हणजे फॅशन शो सारखे वाटतात. या कार्यक्रमांमध्ये काही ओळखीची बरीच मंडळी भेटते. एखाद्या लांबट टेबलवर पांढरे स्वच्छ आच्छादन घालून निरनिराळे खाद्यपदार्थ आकर्षक पद्धतीने मांडून ठेवलेले असतात. बाजूलाच नव्या कोऱ्या डिश असतात. जणू काही त्या कार्यक्रमासाठी नवीनच आणलेल्या! प्रत्येक डिशवर पेपर नॅपकीन असतो. मंडळी रांगेत उभे राहून आपल्या हाताने आपल्याला हवे ते पदार्थ घेत असतात.

वधू-वरांना किंवा सत्कारमूर्तींना स्टेजवर जाऊन भेटवस्तू द्यायची, शुभेच्छा द्यायच्या आणि यजमानांचा निरोप घेऊन मार्गस्थ व्हायचे असा साधारण हा प्रकार असतो. यजमान बिचारे मनापासून अशा कार्यक्रमांचे आयोजन करत असतात. त्यासाठी आपला वेळ, पैसा आणि श्रम खर्च करत असतात. आपण कार्यक्रमासाठी यावे आणि शुभेच्छा किंवा शुभाशीर्वाद द्यावेत असा त्यांचा प्रामाणिक हेतू असतो. आणि तो मोठ्या प्रमाणावर साध्य होतानाही दिसतो. परंतु अलीकडे अशा कार्यक्रमांमध्ये त्यांची सहजता जाऊन आणि मूळ उद्देश बाजूला पडून औपचारिकता आलेली दिसते.

खरंतर असे कार्यक्रम म्हणजे सामाजिक जीवनातील एक सुंदर प्रसंग! यानिमित्ताने समाजाच्या विविध स्तरातील लोक एकत्र येत असतात. प्रत्येक जण नेहमी आपापल्या कामात व्यस्त असल्यामुळे इच्छा असूनही मित्रांच्या, नातेवाईकांच्या किंवा ओळखीच्या लोकांच्या भेटी होत नाहीत किंवा त्यांच्याकडे जाण्यासाठी वेळ मिळत नाही. परंतु अशा प्रकारचे कार्यक्रम आपल्याला आपल्या ओळखीच्या व्यक्तींना भेटण्याची संधी उपलब्ध करून देत असतात. त्यामुळे अशा व्यक्तींकडे जाण्यासाठी जो वेळ आपल्याला द्यावा लागला असता तो वेळ वाचतो आणि त्यांच्याशी अनौपचारिक गप्पागोष्टी करण्याची संधी अनायासे उपलब्ध होते. परंतु किती जण या प्रसंगाचा असा लाभ घेतात?

अशा कार्यक्रमात आपल्या ओळखीची व्यक्ती दिसली की आपण आपला हात उंचावून त्यांना अभिवादन करतो किंवा हाय हॅलो म्हणतो. चेहऱ्यावर एखादी स्मितरेषा असते. फार तर ” काय? कसे आहात? खूप दिवसांनी भेटला ” या पलीकडे संभाषणाची गाडी पुढे जात नाही. असा औपचारिक संवाद होऊन जो तो आपापल्या उद्योगात (म्हणजे येथे जेवण्याच्या किंवा शुभेच्छा देण्याच्या कार्यक्रमात) मग्न होऊन जातो.

अशा प्रसंगी समाजाच्या विविध स्तरातील लोक एकत्र आलेले असतात. परंतु आपण सर्वांशी संवाद साधत नाही. आपल्या ओळखीचे, आपल्या बरोबरीचे, आपल्या सामाजिक स्तराला शोभतील अशा प्रकारच्या व्यक्तींशीच आपण फार तर थोडे हितगुज करतो. या कार्यक्रमात असेही काही लोक आलेले असतात की ज्यांचा सामाजिक स्तर किंवा प्रतिष्ठा आपल्यापेक्षा कमी असते. अशा लोकांना आपल्याशी बोलावेसे वाटते परंतु अशावेळी आपली प्रतिष्ठा किंवा अहंकार आडवा येतो आणि आपण त्यांच्याशी बोलणे टाळतो काही लोक तर अशाप्रसंगी ओळखही दाखवत नाहीत. आयोजकांनी आवाहन केल्याप्रमाणे आपण खरोखरच कार्यक्रमाची फक्त शोभा वाढवण्यासाठी येतो आणि एखाद्या शोभेच्या वस्तूसारखेच येतो आणि जातो.

पण खरं तर असे कार्यक्रम म्हणजे लोकांशी संबंध दृढ करण्याची मोठी संधी असते असे मला वाटते. आजच्या काळात जसे आपण अनेक गोष्टींचे रिन्यूअल करतो तसेच संबंधांचे देखील रिन्यूअल करण्याची ही संधी असते. आपल्या मित्रमंडळींची, नातेवाईकांची आस्थेने विचारपूस करावी, त्यांची सुखदुःखे जाणून घ्यावी यासाठी हे कार्यक्रम अनायासे संधी उपलब्ध करून देतात. पण औपचारिकता, कृत्रिमता, अभिमान, अहंकार, खोट्या प्रतिष्ठेच्या कल्पना यासारख्या गोष्टींमुळे आपण अशा प्रकारची चांगली संधी अशा कार्यक्रमांमधून दवडतो.

पण अशाही प्रसंगात प्रेमाने विचारपूस करणारे, आस्थेने चौकशी करणारे काही लोक भेटतात. असे लोक मला वाळवंटातील हिरवळीसारखे वाटतात. त्यांच्याजवळ कृत्रिमता नसते. अभिमान किंवा अहंकार नसतो किंवा खोट्या प्रतिष्ठेच्या कल्पनाही नसतात. अशी माणसे प्रेमाचे किंवा शीतलतेचे गुलाबपाणी प्रत्येकाच्या अंगावर शिंपत असतात. अशी माझ्या ओळखीची काही माणसे आहेत. ती भेटली म्हणजे जवळ येऊन आवर्जून बोलणारच! कधी कधी त्यांच्या पिशवीत गुलाबपुष्पे किंवा चाफ्याची फुले असतात. आपल्या ओळखीच्या व्यक्तींना ही फुले देऊन आपुलकीच्या सुगंधाची देवाण-घेवाण करतात. काहीजण जवळ येऊन अकृत्रिम हस्तांदोलन करतात किंवा गळाभेट घेतात. यातूनही संबंध दृढ होतात अशा व्यक्तींबद्दलची आपुलकी, प्रेम वाढीस लागते. अशी माणसे संकटप्रसंगी धावून येतात, मदतीला नेहमीच तयार असतात. अशी माणसे म्हणजे समाजरूपी उपवनात फुललेली सुंदर फुलेच! वाळवंटात सगळीकडे वाळूच वाळू पसरलेली असते आणि रखरखीत वातावरण असते. अशा वातावरणात कुठे अपवादाने हिरवळ दिसली की मन प्रसन्न होते. अशीच ही माणसे वाळवंटातील हिरवळ!

© श्री विश्वास देशपांडे

चाळीसगाव

प्रतिक्रियेसाठी ९४०३७४९९३२

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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