हिन्दी साहित्य – आलेख ☆ अभी अभी # १०६१ ⇒ प्रेम पर्वत ☆ श्री प्रदीप शर्मा ☆

श्री प्रदीप शर्मा

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “प्रेम पर्वत।)

?अभी अभी # १०६१ ⇒ आलेख – प्रेम पर्वत ? श्री प्रदीप शर्मा  ?

जो शब्द हिंदी में ढाई आखर का है, वह अंग्रेजी का four letter word LOVE है। अक्सर प्रेम, प्यार अथवा इश्क में ऊंचाइयों की बात होती है, गहराइयों की बात होती है, प्यार के सागर में या तो हम डूब जाते हैं, या फिर इतने ऊंचे उठ जाते हैं, कि हमारा प्रेम ईश्वरीय प्रेम हो जाता है।

किसी के प्यार में डूबना तो बहुत आसान है लेकिन प्रेम की ऊंचाई को नापना इतना आसान भी नहीं। प्रेम परीक्षा लेता भी है और परीक्षा देता भी है। प्रेम में सफल होने पर प्रेमी प्रसन्न होता है, उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ते। लेकिन प्रेम में असफल होते ही उसका मन खिन्न हो जाता है। ये दुनिया और यह महफिल उसके काम की नहीं रह जाती।।

कहीं कहीं प्रेम शर्तिया होता है, प्रेम में कुछ शर्तें रख दी जाती हैं। प्यार नहीं हुआ, मानो सौदा हो गया हो। पहली नजर में प्यार अंधा प्रतीत होता है, लेकिन आंख खुलते ही सच सामने आ जाता है। प्रेम में अपेक्षा तो होती है, लेकिन प्रेम उपेक्षा बर्दाश्त नहीं कर पाता।

प्रेम का ही दूसरा नाम आसक्ति है। हमें जो प्रिय है, उससे हमें प्रेम हो ही जाता है। आप उसे लगाव, अथवा आकर्षण भी कह सकते हैं। हमारे प्रेम का दायरा कितना विस्तृत है, यह हम नहीं जानते। बच्चे से लेकर बूढ़े तक, मां से लेकर दादी मां तक, और बेटी से लेकर पोती तक इसकी जड़ें फैली होती हैं। हमारे प्रेमपाश में जर्रा जर्रा समाया है, लेकिन यह जीव कभी इसे समझ नहीं पाया है।।

ये वादियां ये फिजाएँ, बुला रही हैं तुम्हें, खामोशियों की अदाएं, बुला रही हैं तुम्हें।

हमें कभी फूलों से प्यार होता है तो कभी सावन की घटाओं से। कभी दिन सुहाना नजर आता है, तो कभी रात। खुशियों में मन झूमने लगता है, जब किसी का जन्म होता है, तो कहीं निकलने लगती है किसी अपने की बारात।

पसंद प्रेम का ही दूसरा स्वरूप है। जो तुमको हो पसंद, वही बात कहेंगे। तुम दिन को अगर रात कहो, रात कहेंगे ! क्या यह प्रेम नहीं। अच्छा संगीत, अच्छी फिल्में, अच्छा साहित्य, अच्छे लोग, अच्छा खाना, एक अच्छी पत्नी और अच्छी अच्छी बातें, हमें बहुत पसंद है। इन सबसे हमें कितना प्रेम है। सोचिए क्या हम इनके बिना रह सकते हैं।।

अगर फिर भी हम दुखी हैं, तो इसका मतलब अभी भी हममें प्रेम की कमी है। हम मीठा मीठा तो गप कर जाते हैं, लेकिन कड़वा हजम नहीं कर पाते। जब प्रेम हमारी परीक्षा लेता है, तो हम वहां से भाग खड़े होते हैं।

प्रेम के पर्वत पर चढ़ना इतना आसान भी नहीं। कई कंकर, पत्थर, कांटे, विषैले और हिंसक जीव प्रेम की राह में हमारा रास्ता रोकने की कोशिश करते हैं। कुछ लोग प्रेम का रास्ता छोड़ खुदगर्जी और स्वार्थ की पगडंडी पकड़ लेते हैं। ऐसे लोग कभी प्रेम पर्वत पर चढ़ नहीं पाते। बस रास्ता भटक जाते हैं, और कह उठते हैं ; कह दो, कोई ना करे यहां प्यार। इसमें खुशियां हैं कम, और आंसू हजार।।

प्रेम त्याग, समर्पण और निष्ठा मांगता है, प्रेम सहूलियत नहीं, जीवन की असलियत है। अक्सर लोगों का प्यार स्वामित्व वाला प्यार (posessive love) होता है, वे बस लेना ही लेना जानते हैं। प्यार संग्रहालय में रखने की वस्तु नहीं, बांटने की चीज है।

प्यार बांटते चलो। मेरी मोहब्बत पाक मोहब्बत, और जहां की ख़ाक मोहब्बत। आइए, झमाझम बारिश में, प्रेम रस में भीगें, प्रेम का ही छाता, प्रेम की ही बरसाती, प्रेम की ही छड़ी, प्रेम पर्वत पर कदम बढ़ाएं।।

♥ ♥ ♥ ♥ ♥

© श्री प्रदीप शर्मा

संपर्क – १०१, साहिल रिजेंसी, रोबोट स्क्वायर, MR 9, इंदौर

मो 8319180002

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – कविता ☆ कोई गणितज्ञ नहीं…! ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी ☆

डॉ. रामेश्वरम तिवारी

संक्षिप्त परिचय

  • हिंदी-प्राध्यापक(सेवानिवृत्त) महारानी लक्ष्मीबाई शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भोपाल  (म.प्र).
  • नई दुनिया, दैनिक भास्कर, वीणा, हंस, धर्मयुग, कादम्बिनी आदि पत्र-पत्रिकाओं में कविता और लघुकथाएँ प्रकाशित। पुस्तकः कविता के ज़रिए,  मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के सौजन्य से प्रकाशित।

आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता – कोई गणितज्ञ नहीं…!

☆ ॥ कविता॥ कोई गणितज्ञ नहीं…!  ☆ डॉ. रामेश्वरम तिवारी

किसी बौद्धिक, वणिक्

या राजनीतिज्ञ के घर में

पैदा होने मात्र से

कोई परम विज्ञ,

सफल सौदागर या

लोकप्रिय नेता नहीं हो जाता है।

 

जब होने को होता है

तब किसी वनवासी के घर में

कविवर बाल्मिकी

बेनामी घर में धीरूभाई अंबानी

बेदखली के घर में

सम्राट चंद्रगुप्त पैदा हो जाता है।

 

कुदरत की इस

शाश्वत उलझी हुई गुत्थी को

आज तक कोई

गणितज्ञ नहीं सुलझा पाया है।

© डॉ. रामेश्वरम तिवारी

सम्पर्क – सागर रॉयल होम्स, होशंगाबाद रोड, भोपाल-462026

मोबाईल – 8085014478

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सलिल प्रवाह # २८८ – ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

(आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ जी संस्कारधानी जबलपुर के सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं। आपको आपकी बुआ श्री महीयसी महादेवी वर्मा जी से साहित्यिक विधा विरासत में प्राप्त हुई है । आपके द्वारा रचित साहित्य में प्रमुख हैं पुस्तकें- कलम के देव, लोकतंत्र का मकबरा, मीत मेरे, भूकंप के साथ जीना सीखें, समय्जयी साहित्यकार भगवत प्रसाद मिश्रा ‘नियाज़’, काल है संक्रांति का, सड़क पर आदि।  संपादन -८ पुस्तकें ६ पत्रिकाएँ अनेक संकलन। आप प्रत्येक सप्ताह रविवार को  “साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह” के अंतर्गत आपकी रचनाएँ आत्मसात कर सकेंगे। आज प्रस्तुत है  – ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – सलिल प्रवाह # २८८ ☆

☆ ग़ज़लिका – लोकतंत्र ने जिनको पोसा ☆ आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’ ☆

इसने ताका, उसने ताका

कौन न जिसने जी भर ताका

.

मौका देख न चूका कोई

दोस्त यार फूफा या काका

.

चीख न अबला की सुनता जग

सबला की झट सुनता आका

.

जिन पर जिम्मा संरक्षण का

वे ही डाल रहे हैं डाका

.

मन की बातें हैं मनमानी

कमीशनों का निश्चित खाका

.

हुए पड़ोसी सभी विरोधी

आँख दिखा गुर्राए ढाका

.

फेंक रहे हैं लाखों हँसकर

पोस्टिंग हो पा जाएँ नाका

.

खाते जाते जो डकार ले

उनके कारण होता फाका

.

लोकतंत्र ने जिनको पोसा

उनके कारण करता साका

©  आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

१६.७.२०२६

संपर्क: विश्ववाणी हिंदी संस्थान, ४०१ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१,

चलभाष: ९४२५१८३२४४  ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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हिन्दी साहित्य – व्यंग्य ☆ चुभते तीर # १२० – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य – ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ ☆

डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

(‘उरतृप्त’ उपनाम से व्यंग्य जगत में प्रसिद्ध डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा अपनी भावनाओं और विचारों को अत्यंत ईमानदारी और गहराई से अभिव्यक्त करते हैं। उनकी बहुमुखी प्रतिभा का प्रमाण उनके लेखन के विभिन्न क्षेत्रों में उनके योगदान से मिलता है। वे न केवल एक प्रसिद्ध व्यंग्यकार हैं, बल्कि एक कवि और बाल साहित्य लेखक भी हैं। उनके व्यंग्य लेखन ने उन्हें एक विशेष पहचान दिलाई है। उनका व्यंग्य ‘शिक्षक की मौत’ साहित्य आजतक चैनल पर अत्यधिक वायरल हुआ, जिसे लगभग दस लाख से अधिक बार पढ़ा और देखा गया, जो हिंदी व्यंग्य के इतिहास में एक अभूतपूर्व कीर्तिमान है। उनका व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’ भी काफी प्रसिद्ध है, जिसमें उनकी कालजयी रचना ‘किताबों की अंतिम यात्रा’ शामिल है। इसके अतिरिक्त ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’ भी उनके प्रसिद्ध व्यंग्य संग्रह हैं। ‘इधर-उधर के बीच में’ तीसरी दुनिया को लेकर लिखा गया अपनी तरह का पहला और अनोखा व्यंग्य उपन्यास है। साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान को तेलंगाना हिंदी अकादमी, तेलंगाना सरकार द्वारा श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान, 2021 (मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव के हाथों) से सम्मानित किया गया है। राजस्थान बाल साहित्य अकादमी के द्वारा उनकी बाल साहित्य पुस्तक ‘नन्हों का सृजन आसमान’ के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है। इनके अलावा, उन्हें व्यंग्य यात्रा रवींद्रनाथ त्यागी सोपान सम्मान और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों साहित्य सृजन सम्मान भी प्राप्त हो चुका है। डॉ. उरतृप्त ने तेलंगाना सरकार के लिए प्राथमिक स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय स्तर पर कुल 55 पुस्तकों को लिखने, संपादन करने और समन्वय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बिहार, छत्तीसगढ़, तेलंगाना की विश्वविद्यालयी पाठ्य पुस्तकों में उनके योगदान को रेखांकित किया गया है। कई पाठ्यक्रमों में उनकी व्यंग्य रचनाओं को स्थान दिया गया है। उनका यह सम्मान दर्शाता है कि युवा पाठक गुणवत्तापूर्ण और प्रभावी लेखन की पहचान कर सकते हैं।)

जीवन के कुछ अनमोल क्षण 

  1. तेलंगाना सरकार के पूर्व मुख्यमंत्री श्री के. चंद्रशेखर राव के करकमलों से  ‘श्रेष्ठ नवयुवा रचनाकार सम्मान’ से सम्मानित। 
  2. मुंबई में संपन्न साहित्य सुमन सम्मान के दौरान ऑस्कर, ग्रैमी, ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, दादा साहब फाल्के, पद्म भूषण जैसे अनेकों सम्मानों से विभूषित, साहित्य और सिनेमा की दुनिया के प्रकाशस्तंभ, परम पूज्यनीय गुलज़ार साहब (संपूरण सिंह कालरा) के करकमलों से सम्मानित।
  3. ज्ञानपीठ सम्मान से अलंकृत प्रसिद्ध साहित्यकार श्री विनोद कुमार शुक्ल जी  से भेंट करते हुए। 
  4. बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट, अभिनेता आमिर खान से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।
  5. विश्व कथा रंगमंच द्वारा सम्मानित होने के अवसर पर दमदार अभिनेता विक्की कौशल से भेंट करते हुए। 

आप  डॉ सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ जी के स्तम्भ – चुभते तीर में उनकी अप्रतिम व्यंग्य रचनाओं को आत्मसात कर सकेंगे। इस कड़ी में आज प्रस्तुत है आपका विचारणीय व्यंग्य – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य।)  

☆  चुभते तीर # १२० – व्यंग्य  – महानगरों का ट्रैफिक और धैर्य ☆ डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’ 

(तेलंगाना साहित्य अकादमी से सम्मानित नवयुवा व्यंग्यकार

महानगरों का ट्रैफिक इंसान को अध्यात्म की ओर ले जाता है। जब आप तीन घंटे तक एक ही जगह पर खड़े होकर सामने वाली गाड़ी की नंबर प्लेट पढ़ रहे होते हैं, तो आपको जीवन की नश्वरता का अहसास होता है। हॉर्न बजाना यहाँ का राष्ट्रीय शगल है; लोगों को लगता है कि जितना तेज़ हॉर्न बजाएंगे, सामने वाली गाड़ी उतनी ही जल्दी गायब हो जाएगी। रेड लाइट पर हरा रंग होते ही पीछे से ऐसे हॉर्न बजते हैं मानो कोई एम्बुलेंस सीधे सीधे यमराज के घर जा रही हो। सड़कें इतनी गड्ढों से भरी हैं कि समझ नहीं आता कि गड्ढे में सड़क है या सड़क में गड्ढा। सरकार हर साल टैक्स बढ़ाती है ताकि आपको और बेहतर तरीके से जाम में फंसने का अवसर मिल सके। इस ट्रैफिक में सिर्फ गाड़ियां ही नहीं रुकतीं, बल्कि इंसान का विकास भी रुक जाता है।

(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

संपर्क : चरवाणीः +91 73 8657 8657, ई-मेल : drskm786@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (3 अगस्त से 9 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

विज्ञान की अन्य विधाओं में भारतीय ज्योतिष शास्त्र का अपना विशेष स्थान है। हम अक्सर शुभ कार्यों के लिए शुभ मुहूर्त, शुभ विवाह के लिए सर्वोत्तम कुंडली मिलान आदि करते हैं। साथ ही हम इसकी स्वीकार्यता सुहृदय पाठकों के विवेक पर छोड़ते हैं। हमें प्रसन्नता है कि ज्योतिषाचार्य पं अनिल पाण्डेय जी ने ई-अभिव्यक्ति के प्रबुद्ध पाठकों के विशेष अनुरोध पर साप्ताहिक राशिफल प्रत्येक शनिवार को साझा करना स्वीकार किया है। इसके लिए हम सभी आपके हृदयतल से आभारी हैं। साथ ही हम अपने पाठकों से भी जानना चाहेंगे कि इस स्तम्भ के बारे में उनकी क्या राय है ? 

☆ ज्योतिष साहित्य ☆ साप्ताहिक राशिफल (3 अगस्त से 9 अगस्त 2026) ☆ ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय ☆

जय श्री राम और जय श्री हनुमान। आप सभी को आश्चर्य हो रहा होगा कि मैं जय श्री राम के साथ में जय हनुमान भी क्यों कह रहा हूं मेरा अपना व्यक्तिगत विचार है कि हमें अपने कार्यों को करने के लिए श्री राम भक्त श्री हनुमान जी का ही सहारा लेना चाहिए। हम सभी जानते हैं कि माता जानकी ने श्री हनुमान जी को अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों का वरदान दिया हुआ है। इस वरदान के कारण वे किसी को भी अष्ट सिद्धियां और नौ निधियां प्रदान कर सकते हैं इसके अलावा वे किसी भी कार्य को अपनी इन सिद्धियों के कारण बड़े आसानी से कर सकते हैं। श्री हनुमान चालीसा में गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है कि –

अष्ट सिद्धि नौ निधि के दाता |

अस बर दीन जानकी माता ||

 इस चौपाई के संपुट पाठ करने से दुष्टों का नाश होता है, जातक की रक्षा होती है और जातक की सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

जब हमारे सभी इच्छाएं श्री हनुमान की पूर्ति कर सकते हैं तो हम फिर उनके स्थान को छोड़कर के किसी और के पास क्यों जाएं।

“नासे  रोग हरे सब पीरा” नाम की पुस्तक में श्रीहनुमान चालीसा की चौपाइयों से संबंधित सभी उपायों का विस्तृत विवरण दिया हुआ है। इस पुस्तक को आप हमारे यहां से प्राप्त कर सकते हैं।

मैं पंडित अनिल पाण्डेय आज आपको 3 अगस्त से 9 अगस्त 2026 तक के सप्ताह के साप्ताहिक राशिफल के बारे में बताऊंगा। परंतु राशिफल से पहले मैं आपको इस सप्ताह के ग्रहों के विचरण की जानकारी दूंगा।

इस सप्ताह सूर्य और गुरु कर्क राशि में, मंगल मिथुन राशि में, शुक्र कन्या राशि में, शनि मीन राशि में और राहु कुंभ राशि में गोचर करेंगे। बुध प्रारंभ में मिथुन राशि में रहेगा तथा 5 तारीख के 7:06 रात से कर्क राशि में प्रवेश करेगा।

आई अब राशिवार राशिफल की चर्चा करते हैं।

मेष राशि

इस सप्ताह आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि होगी। थोड़े प्रयास से ही आपकी प्रतिष्ठा में अच्छी वृद्धि होगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में थोड़ा सा तनाव आ सकता है। आपको अपने संतान से थोड़ा सहयोग प्राप्त हो सकता है। भाग्य से इस सप्ताह थोड़ी मदद मिल सकती है। शत्रुहन्ता योग भी बन रहा है, जिसके कारण आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। थोड़ा ही प्रयास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 तारीख सफलता दायक है। 3 और 4 तारीख को आपको बहुत सावधानी से अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन चावल का दान करें और शुक्रवार को मंदिर में जाकर पुजारी जी को सफेद वस्त्रो का दान दें। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

वृष राशि

इस सप्ताह आपके भाई बहनों को लाभ हो सकता है। उनका अच्छा सहयोग भी आपको मिलेगा। भाग्य से आपको मदद मिलेगी परंतु उसकी मात्रा बहुत कम होगी। अतः आपको मुख्य रूप से अपने कर्म पर विश्वास करना पड़ेगा। आपका, आपके जीवनसाथी का और आपके माताजी का स्वास्थ्य सामान्य रहेगा अर्थात पहले जैसा ही रहेगा। कर्मचारी एवं अधिकारियों को अपने वाणी पर नियंत्रण रखना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ अगस्त विभिन्न प्रकार के कार्यों में सफलता प्राप्त करने हेतु अनुकूल हैं। 5 और 6 अगस्त को आपको सचेत रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन लाल मसूर की दाल का दान करें और मंगलवार को हनुमान जी के मंदिर में जाकर कम से कम तीन बार हनुमान चालीसा का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शुक्रवार है।

मिथुन राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने का उत्तम योग है। आपको प्रयास कर इस सप्ताह का भरपूर उपयोग करना चाहिए। आप जितना प्रयास करेंगे उससे ज्यादा धन की प्राप्ति होगी। आपको इस सप्ताह अपने प्रसिद्धि के प्रति सतर्क रहना चाहिए। आपको अपने माता जी के स्वास्थ्य के प्रति थोड़ा सावधान रहना चाहिए। भाग्य से इस सप्ताह आपको मदद नहीं मिल पाएगा। आपको अपने कर्म पर विश्वास करना पड़ेगा। इस सप्ताह आपके लिए तीन, चार तथा 9 अगस्त उपयोगी है। 7 और 8 अगस्त को कचहरी के कार्यों के मामले में आपको सतर्क होकर कार्य करना चाहिए। सफलता प्राप्त हो सकती है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गाय को हरा चारा खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

कर्क राशि

यह सप्ताह आपके लिए कई मामलों में उपयोगी रहेगी। आपको अपने भाइयों से अच्छा सहयोग प्राप्त हो सकता है। कचहरी के कार्यों में आपको सावधान रहने की आवश्यकता है। भाग्य से सामान्य मदद ही प्राप्त होगी। अधिकारी कर्मचारियों के लिए सप्ताह ठीक-ठाक है। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 अगस्त विभिन्न प्रकार से मददगार है। सात और आठ अगस्त को थोड़े से धन की प्राप्ति हो सकती है। 9 अगस्त को आपको होशियारी से अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले उड़द की दाल का दान करें और शनिवार को शनि मंदिर में जाकर शनि देव का पूजन करें। सप्ताह का शुभ दिन सोमवार है।

सिंह राशि

कचहरी के कार्यों में इस सप्ताह शुभ संदेश मिल सकता है। भाग्य से आपको सामान्य मदद मिलेगी। भाई बहनों के साथ संबंधों में टकराव हो सकता है। धन के प्रति इस सप्ताह आपको सतर्क रहना चाहिए, नहीं तो आपका धन व्यर्थ के कार्यों में बर्बाद हो सकता है। संतान से इस सप्ताह आपको थोड़ा सा सहयोग मिलेगा। आपका या आपके जीवनसाथी का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ अगस्त लाभदायक है। 7 और 8 अगस्त को किए गए कार्यों में आप सफल रहेंगे। तीन और चार अगस्त को आपको बहुत सावधानी से कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन काले कुत्ते को तंदूर की रोटी खिलाएं। सप्ताह का शुभ दिन बृहस्पतिवार है।

कन्या राशि

इस सप्ताह आपके पास धन आने की पूर्ण उम्मीद है। धन अच्छी मात्रा में आ सकता है, परंतु आपको इसके लिए विशेष परिश्रम करना पड़ेगा। अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। उनके विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। प्रेम संबंधों में भी वृद्धि संभव है। अधिकारी और कर्मचारियों को अपने कार्यालय में सतर्कता पूर्वक कार्य करना चाहिए। आपको अपने स्वास्थ्य के प्रति भी थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए तीन-चार और 9 अगस्त फलदायक है। 5 और 6 अगस्त को आपको सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन हनुमान चालीसा का पाठ करें तथा शनिवार को दक्षिण मुखी हनुमान जी के मंदिर में जाकर हनुमान चालीसा का वाचन करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

तुला राशि

यह सप्ताह अधिकारी और कर्मचारियों के लिए उत्तम है। उनको अपने कार्यालय में प्रतिष्ठा प्राप्त होगी। अपने वरिष्ठ अधिकारियों से उनको सम्मान भी प्राप्त हो सकता है। भाग्य से इस सप्ताह आपको विशेष मदद नहीं मिलेगी। आपको अपने परिश्रम पर यकीन करना पड़ेगा। कचहरी के कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है परंतु इसके लिए आपको विशेष ध्यान देकर प्रयास करना होगा। आपके प्रतिष्ठा में वृद्धि हो सकती है। आपके शत्रु इस सप्ताह शांत रहेंगे परंतु समाप्त नहीं होंगे। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 अगस्त विभिन्न प्रकार से अनुकूल हैं। सप्ताह के बाकी दिनों में आपको सतर्क रहकर कार्यों को करने की आवश्यकता है। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन रुद्राष्टक का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन बुधवार है।

वृश्चिक राशि

इस सप्ताह भाग्य आपका अच्छा साथ देगा। आपके कई कार्य भाग्य के सहारे हो जाएंगे। लंबी यात्रा का योग भी बन सकता है। आपको प्रतिष्ठा की हानि हो सकती है। भाई बहनों के साथ संबंध सामान्य रहेंगे। कर्मचारी एवं अधिकारियों को अपने कार्यालय में कार्य करते समय थोड़ा सतर्क रहना चाहिए। इस सप्ताह आपके लिए 7 और 8 अगस्त विशेष रूप से परिणाम दायक हैं। 5, 6 और 9 अगस्त को आपको सावधानी के साथ कार्यों को अंजाम देना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

धनु राशि

इस सप्ताह आपका स्वास्थ्य अच्छा रहेगा। धन आने का योगहै। दुर्घटनाओं से आप बच जाएंगे। लंबी यात्रा का योग बन सकता है। कर्मचारी एवं अधिकारियों को कार्यालय में बहुत सतर्क रहना चाहिए। अगर वे सतर्क नहीं रहेंगे तो उनका नुकसान संभव है। भाई बहनों के साथ संबंध ठीक नहीं रहेंगे। संतान के साथ सामान्य संबंध रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए तीन-चार और 9 अगस्त कार्यों के लिए शुभ और लाभप्रद हैं। सात और 8 अगस्त को आपको अपने कार्यों को थोड़ा सावधानी से करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन भगवान शिव का दूध और जल से अभिषेक करें। सप्ताह का शुभ दिन मंगलवार है।

मकर राशि

अविवाहित जातकों के लिए यह सप्ताह ठीक है। उनको विवाह के प्रस्ताव प्राप्त होंगे। भाग्य से आपको थोड़ी बहुत मदद मिल सकती है। आप अपने शत्रुओं को आसानी से पराजित कर सकते हैं। आपका स्वास्थ्य उत्तम रहेगा। कचहरी के कार्यों में सावधानी पूर्वक कार्य करने पर सफलता प्राप्त हो सकती है। भाई बहनों के साथ सामान्य संबंध रहेगा अर्थात जैसे पहले था वैसा ही रहेगा। इस सप्ताह आपके लिए 5 और 6 तारीख कार्यों को करने के लिए उचित और लाभदायक है। 9 अगस्त को आपको सजग रहकर अपने कार्यों को करना चाहिए। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन शिव पंचाक्षर स्त्रोत का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

कुंभ राशि

इस सप्ताह कचहरी के कार्यों में आपको सफलता मिल सकती है। परंतु कार्यों में सावधानी बरतना आवश्यक है। धन आने का मामूली योग है। आपका या आपके जीवन साथी दोनों में से किसी एक का स्वास्थ्य थोड़ा खराब हो सकता है। शत्रुओं को आप आसानी से पराजित कर सकते हैं। धन आने की मात्रा कम रहेगी। इस सप्ताह आपके लिए सात और आठ तारीख उत्तम है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक है। सात या 8 तारीख को आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि भी हो सकती है। आपको चाहिए कि आप इस सप्ताह प्रतिदिन गायत्री मंत्र का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन शनिवार है।

मीन राशि

यह सप्ताह आपके संतान के लिए अत्यंत उत्तम है। आपको अपनी संतान का बहुत अच्छा सहयोग भी प्राप्त होगा। छात्रों की पढ़ाई के लिए भी यह सप्ताह बहुत अच्छा रहेगा। उनको परीक्षाओं में सफलता भी प्राप्त होगी। आपको इस सप्ताह अपने प्रतिष्ठा पर ध्यान देना होगा। इस सप्ताह आपको अपने माता जी के स्वास्थ्य के प्रति भी सतर्क रहना चाहिए। कर्मचारी और अधिकारियों के लिए यह सप्ताह ठीक रहेगा। धन आने का भी योग है। इस सप्ताह आपके लिए तीन चार और नौ अगस्त विभिन्न प्रकार के कार्यों के लिए उत्तम है। सप्ताह के बाकी दिन भी ठीक-ठाक हैं। इस सप्ताह आपको चाहिए कि आप प्रतिदिन गणेश अथर्वशीर्ष का पाठ करें। सप्ताह का शुभ दिन रविवार है।

ध्यान दें कि यह सामान्य भविष्यवाणी है। अगर आप व्यक्तिगत और सटीक भविष्वाणी जानना चाहते हैं तो आपको मुझसे दूरभाष पर या व्यक्तिगत रूप से संपर्क कर अपनी कुंडली का विश्लेषण करवाना चाहिए। मां शारदा से प्रार्थना है या आप सदैव स्वस्थ सुखी और संपन्न रहें। जय मां शारदा।

 राशि चिन्ह साभार – List Of Zodiac Signs In Marathi | बारा राशी नावे व चिन्हे (lovequotesking.com)

निवेदक:-

ज्योतिषाचार्य पं अनिल कुमार पाण्डेय

(प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ और वास्तु शास्त्री)

सेवानिवृत्त मुख्य अभियंता, मध्यप्रदेश विद्युत् मंडल 

संपर्क – साकेत धाम कॉलोनी, मकरोनिया, सागर- 470004 मध्यप्रदेश 

मो – 8959594400

ईमेल – 

यूट्यूब चैनल >> आसरा ज्योतिष 

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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मराठी साहित्य – कवितेचा उत्सव ☆ विवश ☆ मुग्धा कानिटकर ☆

मुग्धा कानिटकर

? कवितेचा उत्सव ?

☆ विवश ☆ मुग्धा कानिटकर ☆

इंधन अन्न पाण्याची टंचाई

वाढत राहते रोज महागाई

*

संसार चालवावा कसा तरी

सुख राही मग स्वप्नच उरी

*

इंटरनेटवरचे आहे जग आभासी

सुखदुःख सांगावे तरी कोणासी

*

असाकसा ‌नियतीच मांडते छळ

कुठवर सोसवेल युद्धाची झळ

*

निर्लज्ज संधीसाधूंची मजाच मजा

सामान्य मात्र भोगती भलतीच सजा

*

नाडली जाते गरजवंत जनतेला

कसा मार्ग सुचेना विचारवंताला

*

स्वार्थ बसला सर्वत्र ठाण मांडून

चालणार कसं पण निराश होऊन

 *

माणुसकीची न सोडता कास

 जाऊ सामोरे जीवन संघर्षास

*

राहू एकमेकां सोबत न खचता

काढू मार्ग दैवाला दोष न देता..

© मुग्धा कानिटकर

विश्रामबाग, सांगली – मो. 9403726078

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – क्षण सृजनाचा ☆ ‘राग मेघ…’ ☆ श्री दिवाकर बुरसे ☆

श्री दिवाकर बुरसे

☆ क्षण सृजनाचा ☆ ‘राग मेघ…’ ☆ श्री दिवाकर बुरसे

काही दिवसांपूर्वी मी माझी ” मल्हार महुडे ” ही कविता रसग्रहणासाठी आपल्याला पाठवली होती.

त्या कवितेतील पाऊस धिंगाणा घालत येणारा आषाढातला पाऊस होता. त्यातले मेघ ” झिंगल्यापरी डोंगर माथ्यावर धडका मारणारे, मत्त गजांसारिखे होते. ”

आताचा हा पाऊस रिमझिमणारा, हळवा आहे. त्याची संतत धार चालू आहे. अशा वेळी एखाद्या विरही नववधूच्या मनाची काय अवस्था असेल बरे!माझ्या या ” मेघ” कवितेतूनच समजून घ्या ना!

मेघ  दिवाकर बुरसे 

सय येई पाहुन मेघ नवा

घननीळ सावळा सवे हवा।। ध्रु।।

 *

प्रजक्त बहरले चोहिकडे

तरुतळी केशरी सडे सडे

शंकासुर डुलतो बघ भगवा

घननीळ सावळा सवे हवा ।।१।।

 *

वेलीवर डुलती कळ्या, फुले

डोहात निळ्या डुलती कमळे

उधळतो गंध हिरवा मरवा

घननीळ सावळा सवे हवा ।।२।।

 *

या निळ्या घनातुनि नीर गळे

झेलती परांवर त्या बगळे

जाहला चिंब बघ विहगथवा

घननीळ सावळा सवे हवा।।३।।

 *

कानावर येई सूर निळा

ऐकून दाटतो उगा गळा

वा-यास गवसला छंद नवा

घननीळ सावळा सवे हवा ।।४।।

 *

घन निळासावळा गगनखुळा

जणु गालावरला तीळ निळा!

तो चुंबाया साजण हळवा

घननीळ सावळा सवे हवा ।।५।।

 *

ही कुंद हवा करि धुंद जिवा

हा अनुभव अगदी नवा नवा

वाटतो तरीही हवा हवा!

घननीळ सावळा सवे हवा ।।६।।

© श्री दिवाकर बुरसे

पुणे

संपर्कः ९२८४३००१२५, ९५५२६२९२४५

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – विविधा ☆ “गादी…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे ☆

श्री कौस्तुभ परांजपे

? विविधा ?

☆ “गादी…” ☆ श्री कौस्तुभ परांजपे

काल शेजारच्यांनी चांगल्या तीन चार नवीन गाद्या करून रिक्षेने आणल्या. या गाद्यांवर त्यांचा मुलगा आनंदाने एखाद्या राजासारखा राजेशाहीथाटात बसला होता. आणि…

गादी या शब्दावर मी भाळलो आणि लोळलो सुध्दा. कशाकशाच्या संदर्भात हा शब्द वापरतो हा विचार आला… राजेशाही, किंवा घराणेशाही. धार्मिक, आध्यात्मिक, किंवा संत परंपरेची. झोपायची, आणि अगदी जुन्या गोष्टीत असणारी पानाची गादी. पण तरीही गादी म्हंटलकी डोळ्यासमोर पहिल्यांदा येतात त्या दोन गाद्या. एक राजघराण्यातली, आणि दुसरी अर्थातच आपली नेहमीची झोपायची. पानाची गादी हा शब्द बहुतेक जुने लेखक आणि सिनेमा यांच्या बरोबरच ईतिहास जमा झाला. वरच्या पैकी पानाची गादी सोडली तर सगळ्या प्रकारच्या गादींना ईतिहास आहे. पानाच्या गादीचाही ईतिहास असला तर तो इतरांबरोबर आपलाही असेल. राजघराण्यातला गादीला अर्थातच घराण्याचा, आणि आपल्या गादीला (कदाचित) घोरण्याचा.

राजघराण्यातल्या गादीवर आदराने बसवलं जात. डोक्यावर छत्र असत आणि शेजारी हातातल्या भल्या मोठ्या पंखाने वारा घालायला कोणीतरी. (म्हणजे असंच पाहिलं किंवा दाखवलं आहे.) आणि आपण मात्र अंगावर पांघरूण घेतलं असेल तर ते ओढून, आणि प्रसंगी ओरडून उठवतो. लगेेच उठला नाही तर… वर फिरणारा आणि वारा घालणारा पंखा कधीकधी मुद्दाम बंद केला जातो. आदर आणि बसवणं हे राजघराण्यातल्या गादीबद्दल असतं. तर कोणत्याही प्रकारचा आदर न ठेवता गादीवरुन उठवणं हे आपल्या गादीबद्दल. राजगादीवर बसल्यावर वारा घातला जातो, तर गादीवरुन उठवण्यासाठी वारा बंद केला जातो.

राज गादीवर बसल्यावर जयजयकार किंवा स्तुतीसुमनं ऐकायला मिळत असावीत. आम्हाला किंवा आम्ही गादीवरून उठवतांना आवाज सुरुवातीला कदाचित गोड निघाला नाही तरी काढण्याचा प्रयत्न असतो, पण ठराविक वेळेनंतर तो आवाज गोड वाटणरच नाही याचीच काळजी घेतो. स्तुती आणि सुमनं याचा संबंध नसतो. असतो तो सुस्ती घालवण्याचा खटाटोप.

राजगादीवर बसल्यावर अनेक बाबतीत बरेच चांगले सल्ले दिले जातात. आपल्या गादीच्या बाबतीत ऊठा आता हाच सल्ला असतो. हल्ली मुलांना झोपा आता असा सल्लाही द्यावा लागतो, पण ऊठा आता हाच जवळचा वाटतो.

राजघराण्यातल्या गादीवर व्यक्ती बसली कि तीला, व्यक्ती आणि गादी दोघांना वजन प्राप्त होतं. किंमत असते. आपली गादी किती किलोची आहे यावरुन गादीचच वजन व सोबत किंमत सांगितली जाते. आपल्याला आणि वजनालाही किंमत नसते. राजघराण्यातली गादी ही त्याच व्यक्तीची आणि गादीच असते. आपली मात्र सिंगल, डबल, नुसत्याच कापसाची, किंवा ब्रँडेड असते. तर राजघराण्याच्या गादीला त्यांचाच आणि आपलाच असा ब्रॅड असतो.

काय लागतं या गादीसाठी… म्हंटल तर बरंच काही… नाहीतर काहीही नाही. गादी कोणती, कधी, कशासाठी मिळणार यावर अवलंबून असतं.

राजघराण्याच्या गादीला त्या घराण्यात एकतर जन्म घ्यावा लागतो, किंवा दत्तक तरी जावं लागत. कर्तुत्व (असेल तर…) नंतरसुध्दा सिध्द करता येत. (अपवाद असु शकतात. काही घराणी आहेत. जे आजही कर्तृत्वाच्या शोधात आहेत. पण तरीही गादीवर आहेत असं वाटतं.)

धार्मिक, आध्यात्मिक, संत परंपरेच्या ठिकाणच्या गादीवर बसायला पावित्र्य, संस्कार, बौध्दिक व वैचारिक बैठक व पात्रता लागते. कर्तुत्वासोबत वक्तृत्व असाव लागतं. वाचन, मनन, चिंतन लागत. संस्कृती माहीत असावी लागते व तीचा अभिमान असावा लागतो. रितीरिवाजाची जाण असावी लागते. आणि अंगी नम्रता आणावी लागते. आणि हे सगळं आलं की बोलणं चांगलच वाटतं, कारण अहंकार नसतो.

राजघराण्यात कधीकधी गादीवरचा माणूसच बदलतो. यासाठी दगाफटका पण होतो. आपल्या बाबतीत मात्र तस नसतं. आमच्या गादीला या सगळ्यांची गरज असेलच असं नाही. फक्त ती व्यवस्थित राहण्यासाठी अधूनमधून तीला कडक ऊन मात्र दाखवावं लागतं. आणि याचवेळी आम्ही गादीवरच फटके मारतो. यात कोणताही दगा नसतो. काहीवेळा तर गादीच बदलतो.

राजघराण्यातल्या गादीवर बसल्यावर ती व्यक्ती बसल्या गादीवरुन आपलं राज्य विस्तारण्याचा प्रयत्न करते. आमचा संसार विस्तारला की आम्हाला नवीन गादीचाच विचार करावा लागतो. आणि देह विस्तारला तर असलेल्या गादीवरच तो पसरावा लागतो. म्हणजे राज्य पसरवणं, आणि आपण पसरणं यासाठी गादी लागते हे महत्वाच.

गादीवर बसवण्याचा समारंभ व सोहळा असतो. मुहूर्त पण असतो. यात मंत्रोच्चार असतात. गादीवरुन उठवण्याचा सोहळा रोजच असतो, आणि मंत्रोच्चार नसले तरी उच्चार मात्र वरच्या स्वरात असतात. आणि मुहूर्त पाहणार आहे का अशी विचारणा असते.

राजगादीवर आल्यावर कारभार पहावा लागतो. आणि सगळे कारभार आटोपले की आम्ही गादीवर येतो. अगोदर घरातल्या गाद्या सकाळी गुंडाळून ठेवल्या जात होत्या. आता सिंगल, डबल बेड आल्यामुळे त्या चोवीस तास पसरलेल्याच असतात. आणि आमच्या सोयीच्या वेळेने आम्ही त्यावर पसरतो.

वरच्या सगळ्या गाद्या या द्रृश्य स्वरुपात असतात. पण याशिवाय न दिसणारी एक गादी आहे जी आमच्या चांगल्या वाईट सवयींबद्दल असते. या गादीला फार जूनी किंवा फारतर मागच्या पिढीची परंपरा असते. आणि त्याचा ऊल्लेख गादी चालवतोय असाच होतो.

©  श्री कौस्तुभ परांजपे

मो 9579032601

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ.उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ.मंजुषा मुळे/सौ.गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – जीवनरंग ☆ “गोष्ट इंग्लिश बोलण्याची…” ☆ श्री मंगेश मधुकर ☆

श्री मंगेश मधुकर

? जीवनरंग ?

☆ “गोष्ट इंग्लिश बोलण्याची…” ☆ श्री मंगेश मधुकर

 झालं असं की,

रुटीन वर्किंग डे, केबिनमध्ये साहेब लॅपटॉपवर काम करत होते. इतक्यात दारावर टकटक झाली.

“सर, आत येऊ”

“कोण !! शांतामावशी, या या, बरेच दिवसांनी… ”

“नमस्कार सर, बरे हात ना”

“मस्त, मजेत, नेहमीसारखा. तुम्ही कशा आहात. ”

“बरी हाय. रिटायर झाले. रिकामं बसून करमत नाही. हापिसची लय आठवण येते. ”

“चालायचंच, आज इकडं काय काम?”

“या बाजूला आलते म्हणून समद्याना भेटायला आले. ”

“चांगलं केलंत. चहा घेणार”

“थोड्या टायमानं. नवीन बाई झाडूपोचा, साफसफाई नीट करती ना”

“हो, करतीये पण तुमच्याइतकी चांगली नाही. हळूहळू शिकेल. ” 

“तुमचे आनी हापिसचे लई उपकार हायेत. माज्यासारक्या अडण्याच्या हाताला काम दिलं. इत तीस वर्स काम केलं. चुका झाल्या तरीबी सांबाळून घेतलं. या कामानं घर चाललं. पोरी शिकल्या. नोकरीलापण लागल्या. ”

“तुम्ही सुद्धा फार मेहनत घेतलीत. आता आराम करा. पोरी काळजी घेतील. ”

“सर, धाकटी सोबत आलीये”

“मग बोलवा की आत”मावशीनी मुलीची ओळख करून दिली.

थोडया वेळानं निरोप घेऊन निघालेल्या मावशी परत आल्या – – 

“सर, माजी पोरगी इंग्लिस बोलते”

“अरे वा, चांगलयं की”

“तसं न्हाई. यक इनंती. नाय म्हणू नगा”

“मावशी, बोला!!”

“तुमी माज्या पोरीशी इंग्लिसमध्ये बोला. ” 

मावशींची अनपेक्षित मागणी ऐकून साहेबांना हसायला आलं. मुलगी मात्र गडबडली. प्रचंड ऑकवर्ड झालेल्या तिनं आईकडं पाहत डोळे वटारले.

“रिलक्स, आईसाठी आपण बोलू या. टेंशन घेऊ नकोस. टेल मी अबाऊट युवरसेल्फ”साहेबांच्या बोलण्यानं मुलीला धीर आला. तिनं अडखळत इंग्लिशमध्ये सुरवात केली. साहेबांच्या सोप्या प्रश्नांना आत्मविश्वासानं उत्तरं दिली. हे इंग्रजी संभाषण चालू असताना अचानक मावशी जोरजोरात टाळ्या वाजवायला लागल्या. साहेब आणि मुलगी दोघंही आश्चर्याने मावशीकडे पाहत होते.

“मावशी, पोरगी हुशार आहे. इंग्लिश चांगलं बोलते. ”साहेब म्हणाल्यावर मावशीचे डोळे घळघळा वहायला लागले.

“माप करा, सर. जरा येडयासारखी करतेय. ”मावशी 

“असं काही नाही. ”साहेब.

“जास्त येळ घेत नाई. माज्यासाठी आजचा दीस लई मोठा हाय. समदा जनम गरीबीत. दारुड्या नवऱ्याचा नावापुरता आधार. पोरींना शिकवून हापिसर बनवायचं हेच डोक्यात व्हतं. आज पोरीला इंग्लिस बोलताना पाहिल्यावर लई लई भारी वाटलं. ”मावशीना खूप भरून आलं. घाईगडबडीत नमस्कार करून बाहेर गेल्या. मोठ्या साहेबांसोबत पोरगी इंग्लिस बोल्ली म्हणून सगळ्या ऑफिसला मावशींनी समोसा-बर्फीची पार्टी दिली.

… तसं पहायला गेलं तर खूप साधी घटना परंतु मावशींसाठी आयुष्याची लढाई जिंकल्याची भावना होती. स्वप्नपूर्तीचा आनंद फार मोठा असतो.

© श्री मंगेश मधुकर

मो. 98228 50034

≈संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – सौ. उज्ज्वला केळकर/श्री सुहास रघुनाथ पंडित /सौ. मंजुषा मुळे/सौ. गौरी गाडेकर≈

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मराठी साहित्य – मनमंजुषेतून ☆ अंश… ☆ राधिका भांडारकर ☆

राधिका भांडारकर

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☆ अंश… ☆ राधिका भांडारकर ☆

आपुली आपण करी जो स्तुती। तो एक पढत मूर्ख।। 

– – असे संत रामदासांनी सांगून ठेवले आहे. त्यामुळे स्वतःबद्दल, स्वतःच्या प्रतिमेबद्दल नेमके काय बोलावे, बोलावे की न बोलावे, या संभ्रमात मी आहेच.

स्वतःबद्दल खरे सांगणारी एकच वस्तू आहे. आणि ती म्हणजे आरसा. आरसा खोटे बोलत नाही. पण आरशातली प्रतिमा ही सुद्धा बाह्यरंगी असते ना? आरसा फार तर सांगेल, “तू गोरी नाहीस, तुझे डोळे जरा जास्तच मोठे आहेत, केस आता पांढरे होत चाललेत, रागावलेली दिसतेस, खूश दिसतेस. वगैरे वगैरे. पण अंतरंगातली वादळं, तत्वं आरसा कशी टिपणार? फार फार तर तुम्ही जसे आतून असता, त्याचा तुमच्या चेहऱ्यावर परिणाम होतो आणि तो परिणाम, आरशातली प्रतिमा टिपू शकेल असे तूर्तास म्हणूया.

तर स्वप्रतिमा… मी कोण? कशी आहे मी? अगदी “कोsहम” सारखाच हा प्रश्न आहे नाही का? 

आपण आणि आपली समाजातील प्रतिमा ही तंतोतंत जुळणारी असते का? हाही एक प्रश्न आहे. माझ्याबद्दल माझ्या भवतालचे स्नेही म्हणतात, कशी हसतमुख, बिनधास्त आहे, रोखठोक आहे, आत एक बाहेर एक असे मुळीच नाही, वातावरणात एक सहज चैतन्य आणते, एकेका वाक्याला सगळ्यांना हसवते, या वयात ही किती उत्साही आहे वगैरे वगैरे. या सर्व स्तुतिसुमनांनी माझी छाती नक्कीच फुलते. अंगावर मुठभर मासही चढते (लाक्षणिक अर्थाने—नाहीतर त्याची गरज काय?) अगदी हळुवार मोरपीस फिरते. पण जेव्हां मी माझ्या अंतरंगात हळूच बुडी मारते तेव्हां जाणवते— हसतमुख, बिनधास्त, विनोदी ही विशेषणे माझ्यासाठी खरंच योग्य आहेत का?

मला प्रचंड राग येतो. खूप चिडचिड होते माझी. समोरच्या माणसाचे चांगलेच लोणचे घालावे असेही वाटते. बिनधास्त तर मुळीच नाही. जी व्यक्ती काटेकोरपणे वेळ पाळण्यासाठी धडपडत असते ती बिनधास्त कशी असेल? आणि कसली रोखठोक बोलते? ” जाऊदे! याला बोलून काय उपयोग आहे? उगीच तोंडाची वाफ दवडा” या विचाराने मी कितीतरी वेळा गप्पच बसते. माझं विनोदी बोलणं हे ही माझ्या विसंगत मानसिकतेतून आलेलं असतं.

मनात ज्वाळा पेटलेल्या असतात.

मला खूप वेळा जाणवतं, आपल्याला वाटत असतं की आपण असं असावं, असं बनावं, म्हणजे मितभाषी, शांत, सोशिक, शालीन, नम्र वगैरे वगैरे. पण अशा असणाऱ्या लोकांबद्दलही मला नेमकं काय वाटतं तेही मी सांगू शकणार नाही. कधी कधी हीच माणसं मला अगदी पचाक आणि बावळटही वाटतात. मग मी त्यांच्यासारखं का असावं? थोडक्यात एका खिशात तलवार आणि दुसऱ्या खिशात बासरी अशी काहीतरी संमिश्र प्रतिमा आहे माझी, माझ्या मनातली. मी चांगली, मी वाईट, मी अशीही, मी तशीही पण “अशी मी अशी” मी नक्कीच नाही.

माझ्या एका प्रोफेसर मैत्रिणीबरोबर मी एक दिवस गाडीवरची पाणीपुरी खात होते. छान अटोपशीर ड्रेसेस वगैरे आम्ही घातले होते. मस्त मजेत होतो.

“भैय्या थोडा तेज बनाओ, ज्यादा मीठा नही मंगता “वगैरे बिनधास्त हिंदी बडवत होतो. खाता खाता प्रोफेसर मैत्रीण म्हणाली, ” अग! माझ्या एखाद्या स्टुडंटने असे मला पाहिले तर त्याचे माझ्याविषयी काय मत होईल?”

म्हणजे ती माझी मैत्रीण आणि प्राध्यापक या दोन प्रतिमांमध्ये चक्क विभागलेली होती. त्यावेळीही माझ्या मनात आले मग “मी कोण?” मीही बँकेत उच्चपदस्थ होते मग माझ्या मनात असा विचार का नाही आला?

माझ्या आईचे एक म्हणणे असायचे, नाटकाला जाताना साडीच नेसायची.

.. खरोखरच आपल्या प्रतिमा अशा घटकांमध्ये दुभंगलेल्या असतात. या मुद्द्याचा विचार करताना मी जेव्हा माझ्या खऱ्या प्रतिमेंशी येऊन थांबते किंवा मी माझ्या प्रतिमेला शोधत बसते तेव्हा एकच जाणवते, मूळात मी तशी खडूस, स्वान्तप्रिय, स्वतःशीच संवाद साधणारी, अत्यंत अनसोशल, मात्र निसर्गप्रेमी, गंभीर प्रवृत्तीची एक अत्यंत कंटाळवाणी व्यक्ती असावी. कोण जाणे मीच मला अजूनही सापडलेली नाही. खट्टी की मिठी? “मी कोण?”चा शोध अजूनही चालूच आहे. आणि तो शेवटच्या श्वासापर्यंत चालूच राहणार.

पण त्यादिवशी गॅलरीत झोपाळ्यावर निवांत बसले होते. संध्याकाळ होत होती. मावळत्या सूर्याने आकाशात सुरेख रांगोळी काढली होती. नजरेसमोर उंचउंच इमारतीच होत्या. त्यातून दिसणारे आकाशाचे हे रंगीन तुकडे मी न्याहळत होते. माणसे आणि वाहनांची गर्दी बघत होते. एका यांत्रिक विश्वाची चाललेली धावपळ, दमछाक निरखत होते आणि या संपूर्ण भौतिक पार्श्वभूमीवर मला एका काहीशा दूरच्या रिकाम्या रस्त्याच्या वळणावर मस्त नारिंगी फुले अंगावर पांघरून ऐटीत उभा असलेला सुंदर “गुलमोहर” दिसला. आणि माझ्या अंतरंगात एक हलकासा तरंग उमटला.

“कोण मी”?… खरं तर याच विश्वाचा फक्त एक अंश मी..

© राधिका भांडारकर

पुणे

मो.९४२१५२३६६९

≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडळ (मराठी) – उज्ज्वला केळकर/सुहास रघुनाथ पंडित /मंजुषा मुळे/गौरी गाडेकर≈

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